Skip to main content

Full text of "Markandeya Purana (with Hindi Translation)"

See other formats


(9 4 


| ९ 1-211-71 9 १ 


‰ श्रीहरिः # 


न 


(वेदव्यास प्रणीत ) 


र 


शिः 


#माकंणडेय पु 


ध 6 अ 1 


3 1 


4 # माषा टीका सहित € 
॥ णे ७ -<+- ¢ 1 
4 जिसको- र १८६ 
\ अनेक पुस्तकों के रचयिभा रः 
६ . बा ० इन्दावनदसि.बा०ए°ः एड-एछण्गार ` £ १६ 
4 न 
1 र बहुत शद्ध भोर सल हिन्दी भाषा ् त 
६ अनुवादित किया । 1 १ 
ौ प (135 ( र 
६ सुद्रफ श्रौर प्रकाशक ध (२ 
ध ख इवमरखढ हारडड र र 
८ द्यामकाशी प्रेष £ 
€ 4 मयुर । त 4 
16 अथमवार ११०० 1 सच्‌ १६५१ ई० [ मूल्य ४) ऋ र 
! र >~ ०4८62८25 59८५8 | 
ऋ 2 


ए) (षटवा ति तणठन्वाह 0४ 
प्तं 22351134 725 (प्ि)) 
011 4 €€1110€1' 2014 


माकंर्डेय पुराश। 
# भाषा रक्रा साहित # 
विषय-सूची 


~~ न्द ~ 


श्ध्याय चिषय 
१ जेमिनिश्रषिका माकौरडेयजी से महा- 
भास्तके सम्बन्ध मे पाँच प्रश्न करना 
` भरत्युत्तर खरूप मार्कणडेयजी का चु 
नाम अप्सरा को दुवांसाजी द्वारा 
` शाप दिये जाने का चरणन करना 
२ कनक श्रौर कन्धरः नामक पक्तियो का 


पृष्ठ [अ० 


4 


रा्तसङे साथ युद्ध श्नीर पक्चर्यो की उत्पत्ति ४ 


३ पर्सिया दारा शमीकसुनिको अपनेशाप 
“क्रा कारण बताया जाना, पर्चियों का 
` ` विध्याचल पर्व॑त पर पर्टुचना 
8 जैमिनि ऋषिका विध्याचलस्थ चासं 
` पक्षियों के पास पर्हुचकर अपने पाचों 
प्रच करना, उनका उत्तर देते इषः 
- प्रतिय दवाय चलुच्धू ह अ्रचतार का 
वरन 
, ४ इन्द्र चिक्रिया क्रा वैन तथा द्रौपदी 
कार्पाच खामियोँ की पत्ती होने का 
कारण 
६ वलदेवजी द्वारा ब्रह्म हत्या का वणेन 
तथा उसका कारण 
"७ विश्वामिन्नके कोप के कारण राजां 
हरिश्वंदर का साज्य-च्युत होना तथा 
` , द्रौपदी के पुर्ोंकी उत्पत्तिका नंन 
८ पत्तियों दवाय साजा दरिश्न्द्रकी कथां 
` को वणन 
६ विश्वामित्र श्चौर वशिष्ठ का क्रमशः 
` बगला श्रौर सारस बनकर श्रापसमें 


,“ धरोर युद्ध करना ह 
' १० पितापुज संवाद (शमे मरणके ९८४८ 


र 


५ | 


जीव की गति चौर दशा का वर्णन 
११ पितापुत्र संवाद (गेम स्भंस्थ जीव 
` "के दुखं का वरेन 


५२ 


~ 


७ 


विषय 

१२ पिता-ु्र सम्याद मे सौर्वादि नरकं 
का वर्णन 

१२ राजा विपश्चित श्रौर यसमदूतका संवाद 

१ यमरकिकर द्वार यह बताया जाना कि 
किस किख पाप से पीन कौन नरक 
मिसता है 

१५ वैश्यराज विपश्चिवका सव नरफबालों 
के साथ स्वं गमन 

१६ पतिव्रता ब्राह्मणी की कथा शौर शलु- 
सूया के पातिवतके महत्वका चरणन 

१७ ब्रह्मा के छरंश से चंद्रमा, शिवके धंश 
से दुवांसा चनौर विष्के थंशसे दत्ता- 
त्ेयकी उत्पत्ति की कथा 

१८ दन्तात्रेयजी की श्राराधना करने से 
देवतानां की दैत्यो पर विजय क्रा 
चरेन गग पि दाय 

१६ दत्ताञेयी प्रकरण मे राजा कर्तंवीयं 
की कथा 

२० राजा शनुजित के पुत्र ऋतध्वज का 
चृत्तान्त, उसका कुवलयाश्व नाम की 
उपाधि धारण करना 

२९ शुवलयाश्वका पातालकेतुनाम राच्तस 
दती मारकर पाताल में मदालसा स 
चिवाह करना 

२२ मदालसा वियोग 

२३ नागराज श्मश्वतर के प्रयत्न से पुनः 
अदालसाकी उत्पत्ति श्रीर कुचलयाभ्य 
का नागराजके धर जाना रादि त 

२७ कुवलयाश्व का नागराज अश्वतर से 
मदालसा को प्राप्त करना 

२९ मदालसा को पुत्र-पासि तथा उखको 

बदलानेके मिखसे मदालसयाका पुश्को 


(५, 


६८६ 


६१ 
६६ 


१०३ 


१११ 


० विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ 
निर्ममात्सक उथदेश करना ११४ त खष्टिका विस्तारपूर्वक घर्ण॑न १८० 
(द मदालसा के तीनो पुर्न का विरक्तो 8 ता के आदि मे मद्यो की दशा 
जाना, चौथे प्र को मदालसा का ह 
तितं ११४ | ५० स्वायम्मुवमज॒ शरोर श से श्रनेक 
!७ मदालसा का भ्रपने ष्वौथे पु श्रलकै ' सन्तत छो त र ब्रह्माजीका 
से राजाश्नौका कर्म वयन करना ११८ ० नामी यक्तको अचुशासन व 
ए८ मदालसा का अलकँके परति वणांश्रम ५१ ड्खदरूप दुःख की सन्तान, उसके 
ध्म का वर्णन करना ५6 १९१ ११ गीर यण, ९९५ 
२६ ग्रहस्थ धर्मका सविस्तर वर्णन 9 ५ 
३० पञ्चयक्ष, जातक, नैमित्तिक क्रिया, [ स्वायम्धुव मन्वंतरका परारम्म-१ | 
रौर राद्ध च्रादि का चरन १२६ | ५३ मन्वंतर की संख्या ्नौर सातो द्वीप 
६१ पार्वण श्राद्ध की विधि १२८ का चृत्तान्त २०७ 
३२ राद्धं मे बज्यावज्यं का वरन १३२ | ५४ पृथ्वी श्रीर दीपो का माण, सखसुद्ध 
३३ तिथि श्रौर नक्त के अ्रनुसार श्राद्ध पर्वत जीर जम्बूद्धीप का चन २०७ 
काफल १३४ | ४५ मन्दायदि पर्वतो का वणन १०६ 
३४ सदाचार श्रादि व्यवस्थाका वणन १३५ | ५६ गङ्धावतारः की कथा २११ 
३५ शृद्धाशद्ध श्नौर वज्याबर्ज्यका निर्णय १२३ | ५७ भारतवषे का विभाग वथा उसके 
३६ मदालसा का श्रपने पुत्र श्रलकं को पवेत श्रौर नदियोका वणन २.९९ 
श्रन्तिम उपदेश देकर श्रपने पति श्८ भगवान कूम पर भारतवषं की स्थिति २९६ 
राजा ऋतध्वज के साथ तप करने के ५६ भद्राश्व, केतुमाल श्नीरः कर नाम वर्षो 
हेतु बन को जाना १४७ का बृत्तान्त २२९ 
३७ राज्य चिन जाने पर अलकंको आत्म ६० किम्पुरुष, हरि, इलावसं, रम्यक्‌ श्मीर 
विवेक दोना १४ दिरएमय नाम बपौका वणन २२३ 
८ दन्ता्रेयजी का राजा अलक से [ स्वारोचिष मन्वंतर प्रारम्भ-२ | 
श्रात्मक्ञान कना १५० | ६१ प्क ब्राह्मण का हिमाचल पर्वतः पर 
३६ दत्तात्रेयजी का ्रलकंके भति योगा- पहुंचना, बरूथिनी नाम श्रप्लया का 
भ्यासक्ा बरन करना १५२ उखपर आखक्त होना श्नौर ब्राह्यणका 
४० योग की सिद्धयो कां वेन श्रीर्‌ उखकी प्रार्थनाको कस देना २२४ 
योगियों का परब्रह्म मे मिल जाना १५६ | ६२ कलि नाम गन्धर्वं का ब्राह्मण रूप हो 
७१ योगिचय्या _ „ १५६९ कर बरूथिनी से भोग करना २३० 
४२ योगिधर्मे कार स्वरूपका वरन १६१ | ६३ वरूथिनी से स्वेचि नाम पक पुत्र 
४२ सयु च्रादि अरिष्टो के लक्तण॒ दर की उत्पत्ति २३२ 
४४ जड़ोपाख्यान की समाप्ति, खुबाह्‌ शरीर | -स्वरोचि का मनोरमा, विभावरी श्नौर 
काशिराजका संबाद्‌ ओर क्ञान पाकर कलावती आदि से विवाद दद. 
अलक का विरक्त दोजाना १५७८ ६५ हंखनी श्नौर चक्रवाकी तथा हरिण 
४५ माकरडेयजी का करीषटुकिके भ्रति बरह्मा द्नौर हसिणियों का परस्पर वार्तालाप. . 
की उत्पत्ति का बरन करना ९७० तथा स्वरोचि का उसे सखुनना मेद 
४६ मन्व॑तरो ओर देवता के वष की दद स्वरोचि के पुत्र स्वारोचिष के जन्म 
संख्या तथा बह्याजीकी ्रायुकाप्रमाण १७५ की कथा २३९ ` 
१० र्था जगत्‌ की ६७ स्वारोचिष मन्वंतर के देवतान, 
उत्पत्ति का वशेन १७ अषियो चौर राजां ॐे नाम २७२ 


[ग 


[वका ण्यकन ' "ण 


छम विषय , पृष्ठ विषय , 
दम पद्चिनी नाम विद्या की अं निधियों ८७ चंडमुंड फे वध का चान्त ` 8 
का वणन . २७३ | धद रक्तवीज चध ३: 
, ( ओौत्तम मन्वंतर का पारम्भ-र ) ८६ निष्म्म वध ३० 
,६९ राजाउन्तमका अपनी पल्लीको त्यागना, ६० शम्भ वघ | ३९ 
एक बाह्ध्ए की खरी का खो जाना तथा ६१ सव देवतान छारा देवीकी स्त॒ति १. 
, उसको दंढनेके लिये ब्राह्मण का राजा ६र्देवी के चरित्र का मादात्स्यतथा ` 
 सेप्राथना करना २७६ देवता को वरदान ~ ३९ 
७० राजा के प्रयत्न से ब्राह्मण की खी ६३ राजा सुरथ नौर एक वेश्य का देवी ` 
 .. कामिल जाना १५९१ की तपस्या करना श्चौर उन दोनों को 
७१ राज्ञा उत्तम का श्रपनी खी को भी ` देवी का बरदान ३२४ 
, - ढंढने का प्रयत करना, इस विपय मे &४ दत्त खावणं लाम नवं मन्वंतर से 
. पक मुनि घे बा्तालाप २५४ रौच्य नाम तेरवें मन्वंतर तक का ` 
, ७२ तजमद्िषीकी पुनः पराति श्रौर श्रीत्तम चृत्तान्त तथा उन; मन्वंतरं के देव 
कै जन्मकीकथा २४६ तायो, ऋषियों श्रौर राजार्श्ो के ` ` 
,७३ श्रौत्तम मन्वंतर के देवता, इन्द्र^षि =. नाम ( ६-१३) २२१ 
, ..श्नौर रताश्रोःके नाम २४६ | ^६५ रुचि नाम ब्राह्मण को विरक्त देखकर : .. 
७४ तामस मन्वंतर की कथा (४) गद पतसे का उसको गृहस्थ धर्म का 
„^> 9 रेवत मन्वंतर की कथा (५) रद उपदेश देना ' दरद ` 
.७६. चाचुष मन्वंतर की कथा (६) २७० | ६६ रुचि कृत पितर्य की स्वति ३२९५ 
७७ वैवस्वत मन्वंतर प्रारम्भ (७ ) &७ पितसेँ का वप्षद्ोकर वरदान देना ३२६ 
- ` वैवस्वत मु की उत्पत्ति श्रौर सुं । & रुचि का प्रम्लोचा नाम शरष्सया की 
का तेज शमन दोने की कथा ++ पुत्री मालिनी से विवाह करना श्रौर 
७८ देवपिंछत सर्य-स्तोत्न तथा अश्विनी" उससे रौच्यनाम मञुका उत्पन्न होना ३३१ 
छमारो;की उत्पत्ति धियो २७६ | ६६ भौत्य मन्वन्तर धरारम्भ ( % ) 
७६ तैवखत मन्वंतरे देवताओं, ऋपियो शातिमनि द्वारा भनि की स्तुति ३३२ 
श्रीर सजा के नाम २७६ | १०० भूति मुनि से भौत्य नाम ॒चीददवे 
८० सावरिक मन्व्तर भार्म (८) मज की उत्पत्ति श्रौर उस मन्वन्तर 
इ मर््वतर के देवताओं, पिरयो के देवतान, ऋषियों न्नर राजाशोँ 
न्नर राजाश्चो के नाम ५ के नाम 1, 
च देवी माहात्म्य का ्ररस्न-- १०१ सूर्यं भगवान्‌ कीं उत्पत्ति तथा उनके 
मधुकेटम वघ ५ ० स्वरूप का वणन ३४८ 
८ महिपाञर की सेनाके चधकी कथा = >>> | ९०२ ऋग्‌, यजः, साम श्चौर श्रथवेवेद = ` 
न का र्स्| की उत्व दथ 
न व ४ ४ , २६४ | १०३ ब्रह्माजी दवारा सूं भगवाकी स्त॒ति दथ , 
८५ श्म निशुंभका देवीको बुलानके लिये १०६ न्य खष्ट र व १ 
दूतमेजना, देनी प्रर दूतका संगा । <“ गास कौ उत्पत, ९ 9 
= निथ॒म्म का रासो मे तल य॒, युध मे देव- 
दै देवी के न जाने पर शुस्भ शु 5 देवताच श्रौ दी 
श्रपने सेनापति धूम्रलोचन को देनी ताश्मा का पराजयः द ॥ की 
् करने को मेजना धूरलोचन मातां ्रादिति का भगवान्‌ सूयं की 
1 युद्ध न ३०२ स्तुति करना 39४. ॥ 


का बध 


# न श ` - कन = क = न 
ध, 


.-घ | 


य विषय 
सूयं भगवान्‌ का अ्रदिति को वरदान 
देकर उसके गभं से उत्पन्न होना 
शरीर रान्तसों को पराजित करना 

६ विश्वकर्मां द्धाय सूयं का तेज कम 
करिया जान 

9 विश्वकर्मां दवाय स्यं की स्तुति 

> स्यं भगवान्‌ से अश्विनीङ्कमारो श्रौर 
रेवत सनु की उत्पत्ति; स्यं का 
माहात्म्य 

६ राजा राज्यचर्खन की च्रायु-चृद्धि के 
लिये पजा दासा सथं की उपासना 

० राज्यवद्धंन च उनकी प्रजाश्मौं की 
छ्यु का वद्‌ जाना, सूयंका मादात्स्य 

१ सु्ंवंश का अनुक्रम 

२ राजा पृषध्र को कथा 

३ रजा नाभाग की कथा (१) 

8 राजा नाभाग की कथा (२) 

५ राजा सुदेव का चरित्र 

६ भनन्दन-नत्समरी चरि 

७ मद्ाराज खनित्र की कथा (१) 


पृष्ठ 


२७५ 


2८० 


श्मध्याय « विषय 


९१८ महाराज खनिज की कथा (२) 
११६ महाराज विर्विश का इत्तान्त 
१२० राजा खनीनेच का वर्णान 

१२९ महाराज करन्धम की कथा 
१२२ वीक्षित चरि (१) 

१२३ अवी्ित चरि (२) 

१२७ अीक्तित चरित्र (३) 

१२५ अवीक्तित चरित (४) 

१२६ वीचित चरित (४) 

१२७ अनीक्तित चरित्र (६) 

१२८ अवीर्तित चरित्र (७) 

१२६ मरुत्त चरि ( १) 

१३० मरुत्त चरित्र (२) 

१३१ मरुत्त चरि (३) 

१३२ नरिष्यन्त चरित 

१३३ महाराज दम क्रा चरित (१) 
१३७ महाराज दम का चरित्र (२) 
१३५ महारज दम का चरि (३) 
१३६ महाराज दम का चरि (४) 
१३७ पुराणएकी खमाप्ति श्नौर माहात्म्य 


# हति शभम्भुयात्‌ % 


रि 


श ॐ नमो भगवते बाहु र 


माकरडेयपु 
भाषाटीका रदित 


= सपद. €^ 


पहला अध्याय 


नारायणं नमछृत्य नरंचैव नरोत्तमम्‌ । च नरो म श्रेष्ठ नर, देवी सरस्रती 
देवीं सरवतींवैष = तथाव्यासक्रो नमस्कार करके जयरूप इस प्रन्थका 
दैवी सरसवर्तीचिव ततो जयमुदीरयेत्‌ ॥ वणन करता हं । ष्यासजीः फे शिष्य, परम तेज 


तपःसखध्यायनिरते माकंरडयं महामुनिम्‌ । | बाले जैमिनि ऋषि ने तप बीर धम म युत 
व्यासशिष्यो महातेजा नेमिनिः पर्यपृच्छत। १। महामुनि श्रीमाक॑रड्यजीसे पृदा ॥९॥ हे महात्मन्‌ ! 


भगवन्‌ भारताख्यानं व्यासेनोक्तं महात्मना । | अनेक विमल णवं खन्दर शाखो के समूह से युक्तं 
भारत श्राख्यान नाम महाभारत कथा की भवान्‌ 


एंमस्तमलेः शब्दैनानाशाखसयुचयः ॥ २॥ व्यास ने का है ॥ २॥ वह .पाचीनतायुक्त, पवित्र 
जातिशद्धिपमायुक्त साधृशब्दोपशोभितम्‌ । | तथा पूर्वापर उक्तियों शरीर सिद्धान्तो से . परिपू 
पूल्॑पकषोक्तिसिदधान्त-परिनिष्ासमन्वितम्‌ ॥ ३॥ दै ॥ ३॥ जिस प्रकार देवतां मे धिष्णु, मवुप्यो 


विपदा मे ब्राह्मण चौर सव भूषणम प्रे चूडामरिै ॥ 
्रिदशानां यथावि ब्राह्मणो यथा | तथा लिख प्रकार शदो सें वज्र शौर इन्दियों मे 


भूषणानांच सर्वेषां यथा चृढामणिवरः ॥ ४॥| मन उम दै उसी भकार सव शासं म मदामारत 
यथायुधानां कुलिशमिद्धियाणां यथा मनः । | उतम है ॥ ५॥ श्रौर यहाँ (महामार मे ) धम, 
तयेह सनव्वशास्राणां महाभारतयुचमम्‌ ॥ ५॥ श्रथ, काम, मोक आदि चारों पदाथ के परस्पर 


अत्रायश्यैव धर्मश कामो मोक्षश्च वरयते । | सम्बन्ध का पथक्‌ षृथक्‌ वरन है ॥ ६ ॥ यदी 
घ्मशाख् है, यदी ध्रेष्ठ अर्थ-शाख तथा कामश 


परस्परारुवन्धा् सानुबन्धाथ ते प्रथक्‌ ॥ ६॥ रीर उत्तम मो्ञ शाख है ॥७॥ हे महाभाग ! 
धर््मशाद्धमिदं श्रेष्मर्थशास्रमिदं प्रम्‌ । | महावद्धिमान्‌ वेदव्यास ने समे चारों श्राभ्मों 


1 
& ८ 


 कामशाल्लमिदश्राग्रयं मोक्षशास्रं तथोत्तमम्‌ | ७॥ धमे, आचार व साधन का वर्णन क्रिया दै ॥८॥ 


हे तात ¡ उदारः आशय वाले व्यासजी ने इसका 


1 


[न 
# 4४ 


ध ‰ ष्ठ ६ 
चतुराश्रमधम्माणामाचारस्थितिसाधनम्‌ । याव व वा वा 


ˆ तथा तात श्रतं देतद्व्यासेनोदारकम्मणा व्यासजी का वाक्य एक नदी केसमनदहैजो 


यथा व्याप्तं महाशाखं पिरोधेनाभिभूयते ॥ ६ । कतकैरूषी बतो को उखाड़ कर पोर देती है श्रौर 
ओ वेदरूपी पवेत से निकल कर प्रथ्वी को धूलि- 


६ 
व्यासवाक्यनलौपेन इतकतरुहारिणा । व 011 


ेदशेलावतीैन नीरनस्का मही ता ॥१०॥| वाक्य. (नदी के ) हसो ओ समान §, बङेबडे 
कलब्दमहाहंसं महाख्यानपराम्वुनम्‌ । | इतिदास कमल के समान ठ, कथा फैले हए जल 


कथानिस्तीणंसलिलं काष्ण वेदमहाृदम्‌ ॥११॥ ॥९१॥ हे भगवम्‌ ! म उस महामारत की कथा फो 
तदिदं भएरदार्यालं बहुथ॒श्रतिविस्तरम्‌ । । जे वदत छम से पूरं वथा वेदः शरीर चिस्तार 


के सदश है तथा सम्पू वेद उसक्ता हदयङूप है " 


। माकंण्डेयपुराख ० १ 


_____ ~ 


है तत्वरूप से जानने केः लि श्रापके पाक्त 
उपस्थित इश्मा दह ॥ १२ ॥ जगत्‌ की. उत्पतति, 
स्थिति शौर संयम के आदि कारण जनादन ने' ` 


भासो त संयमं निगुण दोते इष्य भी किख प्रकार मचुष्य का श्व- 
सुदेवो नगत्सूति-स्थिति-संयमकारणम्‌ ॥६२॥ तार क्या श्नीर वादेव कलाय ॥ १६॥ श्नौर 


कस्माच पाणडुपुत्ाणामेका सा दष्दात्मना। ,. | राजा दुपद की त्री कृष्णा श्रथात्‌ दरौपदी किस ' 
पानां महिषी कृष्णा त्र नः संशयो महान्‌।१४।| मकार पारड ॐ पाचों पुता की सानी हह इसमें. . 
पलं बतरेषो महाबल; । | मगरो वद्य सन्देह दै ॥ १४ ॥ छीर मदावलवान्‌ 
५4 वलदेवजी ने तीथै यात्रा करके किंस प्रकार ब्रह्म 
शीर्थयात्रामसगीन कस्माचकरे हलायुधः ॥१५॥ हत्यार्वी रोग की श्रौपधि छो १।९५॥ शरीर 
कृयश्च प्रौपदेयास्तेऽृतादारा महारथाः । 


द्रौपदी के पाचों ्रवियाहित इुमार जिनके श्रभि- 
सण्डुनाथा महात्मानो वथमापुरनाथवृत्‌ ॥१६॥ व 1 | ध ॥ 
५. विस्तरशो हरि ठ्दे स्वं (कथ 
एतत्‌ सत्यं विस्तरशो ममास्यामिहाहसि । | छाप ^ ६६॥ तद सव ‹ कथा 
। सुभसे विस्तार पू्ेक कने के योग्य है । 
पभबनतो ूदवुद्ीनामनबोधकराः सदा ५३ ॥ १७; | राप सदा मूख को ज्ञान देने लि दै ॥ ९७ ॥ उनके 
इति तस्य वचः श्रुत्वा माकण्डेयो मदाुनिः। स षन ं 
दोषरदितो वन्तः समुपचक्रमे ॥१८॥ दोषों से रदित चचन जेमिनि पि से बोले 1१ ` 


तवतो इातुकामोऽदं भगवंस्त्वाएुपस्थितः ॥१२॥ 
शरसमान्मालुषतं भप्त निगणोऽपि जनाईनः | 


यह वचन सुनकर महामुनि ` माकरडेय श्रगर्टो ` 


! माक॑रडय उवाच माकंरडेय चोले-- | (६ | 
एकरियाकालोऽ्यमस्माकं सम्पातो श॒निसत्तम । दे मुनिश्रेष्ठ ! यद श शनिक कार्य र करा 

2 समय दै । यह खुमय निस्तार पूर्॑क कने का नी. 
विस्तरे चापि षकत्ये नेप कालः मास्यते ॥१६।॥ है ॥ १६॥ हे जैमिनि ! जो कथा श्राप सुभे 
्ये तु वक्ष्यन्ति व्येऽ्य तानहं जेमिने तव । 


। कहलवाना चाहते हँ वद कथा मेरी दी सदश ` 
, तथा च नष्सन्दहं त्वां करिष्यन्ति पक्षिणः ॥२०॥॥| पत्तीगण श्पको. खनाकर श्चापका सन्देह दर 
दगा विबोष् सुतः सुलस्तथा । | भार = म वै भ्रष्ट पी पि्् निवोध, चु 
रषाः सगयाः श्चिताः ॥२१|।२९। द ल क वदान उ हाव 
पदशालानिह्नाने येपामन्याहता मतिः । | है, र वि्ाचल परवत करी न्दर मे रहते हे । 
विन्ध्यकन्दरमध्यस्थास्ताजुपास्य च पृच्छ च ॥२२)| उनके पास जाकर पो ॥ २२॥ परम चिद्धान्‌ . 
एवसुक्तस्तदा तेन माकण्डेयेन धीमता । माकरुडेयजी से यद सुनकर पि श्रेष्ठ मिनि फे 
^+ ॥२३॥ ह चकित होगये श्नौर वे बोलते ॥२२॥ - 
जभमान वाद्ये म ५ 
अतयदरुतमिदं ब्रह्मन्‌ सखगवागिवं मालुपी । | दे बहन्‌ ! यद अत्यन्त शाञ्च की वात है नि 
यत्‌ पक्षिणस्ते पिङ्ञानमापुरत्यन्तदुर्लभ्‌ ॥२४॥ ह सी दै येते चिकानी 
 रिच्य्योन्यां यदि मवस्तष बानं इतोऽभवत्‌। | उतपच व क 
| कथ ्रोएतनयाः चन्त ते पतत्रिणः ॥२५॥ र पठ रोर के धच रिख मकार कहलाये ॥ २४ 
¦ कथ द्रोणः भविरूयातो यस्य पुत्रचतुष्टयम्‌ । 


1 तें धर्मानं शरोर यट द्रोए कौन है जिसके चारों पुत्र इतने 
| जातं शुवतां तेषां धम्मजञानं महात्मनाम्‌ ॥२६॥|| शंणवान्‌, धमातमा, कानी तथा महात्मा दए ॥२६ 
;. ` ~ .: माकंरडेय उवाच ` भाकैरुडेय वोले- न. 


भ्यान. से सुनो, ` एक वार पराचीन काल भे 
व इन्द्र ्रण्सराध्ों फे साथ ` नन्दन बन मे थे कि. । 


{ 


~ 


भ्र० ९ माकरुदेयपुराण १ 


शत्रस्याप्सरसांचैव नारदस्य च सङ्गे दैवात्‌ नारदज्ी का भी वटँ समागम दगया ॥२७॥ 
नारदो नन्दनेऽयश्यत्‌ एुं्चलीगणमध्यगम्‌ । | नारद ने नन्दन बन 1 1 
कर सुराधिरानानं तन्दुखासक्तसोचनम्‌ श्रण्सरा्ं के मध्य भ वेढकर उनके सुखो को 
व पुर लापकतलोचनम्‌ ॥२८॥| सस येष से ल सदे £ ॥ र श्र ने 
नर्षिवरिष्ठन दमत शचीपतिः । नारद ऋषि को देखते ही उठकर उनको सम्मान 
सत्स्थौ खक्वास्मे ददावासनमाद्राद्‌ ॥२६॥| पूथ॑क श्चपना आसन खयं दिया ॥२६॥ श्रौर 
तं इष्ट बलत्रष्नसुत्थितं व्रिदशाङ्गना; । क ने भी बलब् के मारने बलि इन्द को 
भरशेुस्ताश्च देवर्षिः विनयावनता; स्थिताः । २०॥ ग त 
काभिरम्यदितः सोऽय न भणाम किया ॥,३०॥ अण्ससाघ्न से बन्दित दोकरः 
॥ ; साऽ्यञुपाचष्ट शतक्रत। । | नारदजी वैरगये च्रौर इन्द्र॑ ते उनकी पूजा कर 
यथाहं कृतसम्भाषः कथाश्चक्रे मनोरमाः ॥२१।॥ मनोहर वातालाप से उनका सत्कार किया ॥ २१ ॥ 
ततः कथान्तरे शक्रस्तयुयाच महाघुनिम्‌ । | बातचीत करने वीयि व 4 शा 
देयं ध कहा “श्ाज्ञा दीजिये क्रि आपको इच्छादसार 
देतां 1 तव यामिमतेति वै ॥३२॥ ष्यक गायन च मृतय खुनाया तथा दिखाया 
रम्भा वा मिश्रकेशी वाउव्वंश्यथ तिललोत्तमा। जावे" ॥ ३२॥ रम्भा, मिश्रकेशी, उशी, तिलोत्तमा, 
धृताची मेनका वापि यत्र षा भवतो रुचिः ॥३३॥ धृताची अथवा मेनका जिसपर भी श्ापकी रुचि 
एतच्छ ला द्विजश्रेष्ठो वचो शक्रस्य नारदः । हो ॥ ३२ ॥ इन्द्र का यदह वचन सुनकर दविजशेषठ 
विचिन्त्याप्सरसः पराह पिनयावनताः स्थिता५॥।२४॥ 


नारद विचार करे विनयपूर्वक चेटी र श्रष्सरा- 

सर्वासां श्रो के पति वोक्ते ॥ २४॥ चुम सव म से जो श्रपने 

ुप्माकमिहं व्वांसां रूपौदार्यगुणाधिकप्‌। | को रूप, सौदाय्यं शरीर शख की अधिकता मे प्रेष्ठ 

आत्मानं मन्यते या तु सा रृत्यतु ममाप्रतः॥|२४।॥ मानती दो वहमेरे प्रागे नृत्य करे ॥ ३५॥ गुण 

गुणस्मबहीनायाः सियिनाव्यस् नासि ब | रस स भिदीन छ मन्ड श 
चागधषटठानवन्नत् मृत्य वदी दै जो गुखः रूप, ध्वने खाद स क्त 

ध, दृत्यमन्यदिडम्बनम्‌ ॥२६॥| अन्यथा विडम्बना श्रथात्‌ नकल मान दै ॥ २६॥ 

् भाकेरडेय उवाच माक्रडेय बो्ते- = 

तदवाक्यसमकालश्च एकेकास्ता नतास्ततः । ता 9 स 

५ ८ एक दूसरे के पति कटने लगीं भ ठमसे अ्रधिक 

अहं गुणाधिका म त्वं न लं चान्याऽ्रवीदिदम्‌२७॥ यवान्‌ ह! दूसरी कदतीथी कि त्‌ नीं मे + 
तासां सम ; राजा इन्द्र ने उनका विश्वम देखकर नारदजी 

घासः भ्रमसालोक्य भगवान्‌ पाकशासन । | पदर पदी ददाम क्रि चन लप ओ अभिक 

पृच्छ्यतां शुमिरित्याह वक्तायाबोयुणाधिकाम्‌ ३८|| युणवाएली कौन दै ॥ ३८॥ इन्द्र के शब्द सुनने पर 

शक्रच्छन्दालुयाताभिः पृष्टस्ताभिःस नारदः । | तथा शा त त ट व ने जो 

जरि वाद्य जैमिनि ! बे सुभसे खनो ॥२६ ॥ खव 

भोनाच ५ सिने र्ननी भे २९॥ पर्वतों मे शरे परवत पर तप करते हुए ुबांसासुनि 

पप्मतति नगेन्द्रस्य या बः कषोभयते बलात्‌ । | को जो च्छया श्रपने मन से लमा ले बी ससे 

दुव्वाससं मुनिश्रेष्ठं तां बो मन्ये ुणाधिकाम्‌४०।| अधिक गुरवाली समसी जवेगीं ॥ ४०॥ ए 

। { वेपितकन्धराः की यह यात सुनकर खव अण्सयापं कम्पित टोग 

स्व तद्वनं ला सनन। पपितकन्धराः । | ओला कियद्‌ वाल हमारी साम्य ते 

शरश्यमेतदस्माकं न््रशश््रिरे कथाः ॥४१॥ 


। वार है ॥ ४१॥ फिर वयु नाम _चरण्छया जिखकी 
तत्रप्षरा वपुनाम भनिक्षोभणएग्िता । कि बहुत से सुनिर्यो को लभा लेनेका गव था चोली 
पल्युवाचाय यास्यामि यत्रासौ संस्थितो शुनि;४२॥ 


“जसँ बह सुनि दै बदँ म जां गीः" ॥ ४२ ॥ शरोर 
अयं तं 'देहयन्तारं परयुक्तन्दियवाजिनम्‌ । 


काकि पि की देह मै श्रपने इन्द्ियरूपी 
छ्मभ्ब जोत कर कामदेव के वाणो का वाग लगा , 


र 


ध माक॑र्यषुराण ्र० 


-त्मरशख्रगलद्ररिमं करिष्यामि इसारथिम्‌ । ४२ | कर उनको कुसारथी वना गी ॥ ४२ ॥ यदि ब्रह्मा, 


धरह्या जनारनो वापि यदि बा नीललोहितः विण्ु अथवाशिवभीहों तो उनको भी काम- 
बल्या जनाईनो वापि यदि वा नीलल।हतः । | चां से वेधन करूंगी ॥ ४४ ॥ यह कहकर वह 


तमप्यथ करिष्यामि कामबारक्तान्तरम्‌ ॥४४।| श्य व परत पर इवास पि के आथ 
इत्युक्त्वा परनगासाथ प्रालेयाद्र वपुस्तदा । परजो करिपिकेतपके मभाव से श्रापत्तियां से 
नेस्तपःपमापेए प्रशान्तश्वापदाश्रसम्‌ ।॥४१।, रष्देत था. गई 8 जहाँ दुवांसा 4 चां 

लोकि महायनिः से एक कोस की दूरी पर बद श्रण्सा कोकिल के 
१ = यत्रस्े स महायुनिः। खमान मधुरता से गायन करने लगी ॥४६॥ उसके 
क्रोशमात्रं स्थिता तस्मादगायत वराप्सराः ।४६।|| गीत की भ्यनि सुनकर आश्चयं मन बाजे वे सुनि 
तद्रीतध्वनिमाकणएयै॒युनिर्विस्मितमानसः । | जरा बह खुन्दर युखवाली थी बां गये ॥ ४७॥ 
जगाम्‌ तत्र यत्रास्ते सा वाला रुषिरस्वना ॥४७।] उस पाह अ्ण्छरा को देखकर सुनि स्वर्भित 
तांद चारप एनिः संस्तभ्य मानसम्‌ होगये । फिर अपने लुमाये जानेका कारण जानकर 


विणते व । क्रोचयुक्त दोगये ॥ ४८ ॥ श्नौर फिर उन तपस्वी 
४ ज्ञाला पामषसमन्ितः ॥ 1४८। ॥ मदरपिं <| उससे इसे प्रकार कटा ९ ॥ ह द्मक्ाण 


उवाचेदं ततो वाक्यं महर्षिस्तां महातपाः ॥४६॥ भ चिचरने बाली मूं ! यचयपि तू सुमे दुल देने 
।यस्मादुदुःखार्ितस्येह तपसो विष्नकारणात्‌। | तथा मेरे तप मे विष्न डालने के लिये आई दहै 
। आगतासि मदोन्मतते मम दुःखाय सेचरि ॥५०}॥ तथापि तृत रपे दी लिये दुःख उत्पतन किया है ॥ 
तस्मात्‌ इषणंगोतरे लं मत्ोथकलुषीकृता । | भरतपुर करो से कलक्ित दोकर परं पतते 


= - गोज भे जन्म लेकर सोलद वर्षं तक जीवित 
जन्म म्स दुङञे याबदपांणि षोडश ॥५१।| रनौ ॥ ५९१ हे नीच श्लसः! पने स्वरूप बोः 


(निनरूपं॑ परित्यज्य पक्षिणीरूपधारिणी । | छोडकर तू पचती रूप धारण करेगी श्रौर तुभे 
"चत्वारस्ते च तनया जनिष्यन्तेऽ्थमाप्सरः ॥५२।॥ चार पुज उत्पन्न होगे 1 ४२ ॥ फिर त उनकी परीति ] 
अपाप्य तेषु च भीति शच्पूता पुनर्दिवि ! | चोड़कर किसी शख दारा मरण पातत कर पवि 


[नोच 8. 1 होकर खगं मे पडुचेगी 1 इसके उच्तर मे तुमको 
वासमाप्स्यसि वक्तव्यं नोत्तरं ते रथंचन ॥५२॥ य म कहना धिये ॥ ५६॥ क्रो से र्कवयं . 


भावयित्वा वचनो को नकर वह अप्रा कम्पायमान गईं 


तरततर्तरङगा गा परित्यञ्य विपः न श्रौर अपने खुन्दर खरूपको दोडकर विप्र दुवांसा 
प्रथितगुणगणोषां सम्भयातः खगङ्खा्‌॥ ५४ ॥॥ दारा कथित पदी का रूप दोगई ॥ ४ ॥ 


[५1 [४ ५ [९१ 
इति श्रीमाकण्डयपुराण में वपु शाप नाम प्रथम अध्याय समप् । 
~ व ~ =+ ~ 


 . . द्स्रा अध्याय्‌ 


। माकररडेय उवाच माकैरडेय वोलते - 
` अरिषटनमिपुत्रोऽभूहर्टो नाम पक्षिराट्‌ । अरिनेमि के पुन गरुद हष जो सव परियो 


` गरुदुस्याभवेत्‌ पुत्र! सम्पातिरिति विश्रुतः ॥ १ के राजाधे। गक्ड्का पुज मसिद्ध सम्पाती इया 
: तस्याप्यास।त्‌ स॒तः शूरः एुपारर्थो बायुषिक्रमः। | ॥१॥ उसका पुर शूरवीर तथा पवन के समान 


 सुपाश्वेतनयः दुभ्मिः कुम्मिुतरः लोलुपः ॥ २ ॥ ४ इमा । छपाश्वं का 
:: ९५५५ तनयानास्तां ककः कन्धर एव्‌ च ॥ ३॥ मलोलुप्े दो ध 1 भ 


०.९ 


मारक॑र्देयपुराण 


४. 


१ ग्रै हि 
कड! कलासमिखर विद्येति विभुतम्‌ । 


ददशम्बनप्रक्षं रक्षसं घनदाठुगम्‌ ॥ ४ › 


 -्रापानासक्तममल-सण्दामाम्बरधारिणम्‌ । 
( भार््यासहायमासीनं शिलाष्ट्टऽमले शमे ॥ ५। 
तददषटमात्रं कड्ेन रक्षः क्रोधसमन्वितम्‌ । 


भरोषाच कस्मादायातस्त्वमितो ्ण्डजाधम ॥ ६ । 


सरीसननिकपे तिष्ठन्तं कस्मान्माुपसपसि । 


नेष धम्म सुबुद्धीनां मिथोनिप्यावस्तुषु ॥ ७।' 


कड उवाच 
साधारणोऽयं शेलेन्द्रो यथा तव तथा मम । 


न्येपांचैव जन्तूनां समता भवतोऽ् का ॥८॥ 


माकैरुडय उवाच 
तुवाणमित्यं खड्गेन कङ्कं [चच्छेद्‌ राक्षसः । 


रर्षतनवीभत्वं विस्फुरन्तमचेतनम्‌ ॥ & ॥: 


{ क्क विनिहतं शरुता कन्धरः क्रोधमच्छितः । 


विच्‌ दूपवधायाश्च मनशक्रऽण्डनेश्वरः ॥१ 


स॒ गलया शैलशिखरं कङ्को यत्र हतः स्थितः| 
तस्य सङ्कालनं चक्रे भ्रतुरज्यष्स्य खेचरः । 


कोपमर्पं वितानो नागेन्धं इव निश्रसन्‌ ॥११॥ 


जगामाथ स यत्रास्ते भ्रातृहा तस्य रक्षतः 


पक्षवातेन महता चालयन्‌ भूधरान्‌ वरान्‌ ॥१२॥ र पटाद दिल गये ॥ १२॥ क्रोध से र्तवशं ~ 


वेगाद्‌ पथोदनालानि पिक्षिपन्‌ क्षतनेक्षणः । 
क्षणात्‌ क्षयितरत्रुः स पाभ्यां क्रातभूधरः 
पानासक्तमरतिं तत्र तं ददशं निशाचरम्‌ । 
च्ाताश्रवक्तरनयनं हैमप्यंकमाश्रितम्‌ 
सण्दामापूरितरशिखं हप्चिन्दनभूपितम्‌ । 
केतकीगर्भत्रामैदन्ेरघोरतराननम्‌ 
पामोरूमाभितांचास्य ददशांयतलोचनाम्‌ । 


पतनी मदनिकां नाम पुंस्कोकिलकलंस्वनाम्‌॥।१६॥ नाम तेरी हरै. दै ॥ १६॥ क्रोध से मि 
| ॥ कल्थ॒र ते इख हालत मे उस राक्षस को , खोद. | 


ततो रोपपरीतात्मा कन्धरः कन्दरस्थितम्‌ । 


कन्धर '॥.३॥ कैलाश परयतं फे शिखर पर विज लीके 
समान प्रकाशमान्‌ कङ्क रहता थो ! उसने एक वारः 
कमल के समान नेच वाले एक राक्तस को जो 
कुयेरकः श्रजुचर था देखा ॥७॥ बह मदिरा च्राडिके 
नशे मे चुर, स्वच्छ फूलों की माला तथा, खुन्दर 
चख पदिन दये श्रौर एकं रदच्छ एवं पवित्र पत्थर 
पर अपनी सी का सहासा लिये वैडा था ॥ ५॥ बह 
राच्स उस कङ्क को देखते दी श्रत्यन्त करोधित 
दोगया छरीर उससे वोला, “रे दुष. पत्ती, तू यहाँ 
किस तरह श्राया“ ॥ ६ ॥ श्रपनी खी के साथ वैदे 
हये सुभको त्‌ क्यों देखता हे, बुद्धिमोनों का यह 
धमं नहीं है । त्‌ निश्चय दी इसी चण वध कियो 
जने के योग्य है॥७॥ ` क 
कङ्क वोला- . 
यद पर्व॑त जनसाधारण्‌ का दै, यद जैसा.तेय 
है वैसा दी मेरा है, च्नन्य जीयो का भी यह पव॑त 
है । इसे तुमको ममता क्यों इहई॥ ८॥ . - . 
मा्क॑रडेयजी चोल्ले- १ 

इख प्रकार कते हुये कङ्क को उस राज्ञस ने 
लरभर मेँ तलवार से कार डाला „ बह अचेत 
होकर गिर पड़ा श्रीर निर्जीव दोगया ॥ ६॥ कङ्क 
के वध को खूनकर पक्तिराज कन्धरः घ्रोधसे 


मूचछित होगया रौर फिर अपने मनको स्थिर . 


करः विजली के समान ददा ॥१०॥ बद्‌ उस पर्त॑त 


के शिखरः पर पषा जां कङ्क मरा हुश्रा पड़ा था, ; 
उख पक्षी ने बडे भाई का क्रियाकमं किया, ~ “ 

द्‌ =€ ~ € # 
फिर कोध से श्रंखं विकृत करके सपं के समान ¦ 


चे 


फुसकार मारने लगा ॥ ?१॥ वह बां की 


चला जहां उसके माई की हत्या करने वाला, : 


क्तख मौजूद था। उसके पंलो.की हवा से .2 


क 


शे है जिसके पेखा वह पत्ती त्षणभर मे .. ˆ 


~ ५. 


के समीप पर्हच गया श्रौर उसने श्रपने पंख _ ` 


॥१३।। पवेत को ढक लिया ॥ ९३ ॥ उसने बहा <. = 


राक्तस को शराच के नशे मे चूर तथां सुख 


वाई जं परः वदी-वड़ी आसो वाली, कोकिल? 
समान मधुर करट बाली उसकी पतनी ५1" 


नेन को तमतमाये हये सोने के पलङ्गः पर भै ` 
॥१४।। देखा ॥ १४ ॥ कूलो की माला पदिने, चन्दन, ; 
हये, नौर केतकी के पुष्प की सदश पीले +“ ‡ 
| ११५। बाले श्रौर.भयानक सुख वाले ॥१५॥ तश्रा जिस `` 


६  माकेरडेयपुरास अ०२ 
~ ~ 
सनम यथ्यख ॥१७॥ वैया देखा श्रौर उससे कटा, ^२ ट ! आरा, समसे 
छएव्राच सुटुष्ठात्मन्नेहि युध्य वै मपा यद कर॥ १७॥ जिस धकार दने भरे वड़े भं 
[स्मल्चयष्ठो मम भ्राता विश्रब्धो घातितस्त्वया। | को मार कर चैन क्या है उसी रकार मै भी ठक 


¡ मदसंसक्तं दनम्‌ नशे मे चूर को यमराज के प्रर भेजे देता हं ॥ १८॥ 
4 नयिष्ये यमादनबर्‌ ॥५८॥ जहाँ वि्बासयाती अथवा, वालक शरौर खीयावक 
वेश्वस्तथातिनां लोका ये च स्ीवालघातिनाम्‌। | जते ह वरदा दी त्‌ सुभे माया जाकर श्राज 


परास्यसे निरयान्‌ सन्वौस्तांस्सरमध मया हतः १६॥ प्टवेमा ॥ १६॥ 


माकरडेय उराच माकैर्डेयजी वोले- 
त्येवं पतोनदरेण भोक्त' श्ीपन्निधौ तदा | इस प्रकार स्त्री के सामने पक्षिराज द्वारा धम- 
५ ती काया हु वह रच्तस ऋोधितदो प्के प्रति बोला 
एसः करोधसमाविष्ट भ्यमापत पक्षणम्‌ ॥२०॥| ॥ २०॥ हे पत्ती ! जिस ध्रकार मैने तेरे भाता का 


दि ते निहतो भ्राता पौरुषं तद्धि दर्शितम्‌ । | वध किया था उसी पकार तेरा भी पौर्प देखकर 
आमष्यद्च हनिष्येऽहं खडगेनानेन खेचर ॥२१॥| इस तलवार से तमे मारूगा ॥ २१९॥ “र नीच 
४ पकती ¡ तनिक ठहर, ्षण॒भर मे तेरे जीवन का श्त 
तष्ट क्षणं न मे जीवन्‌ पतगाधम यास्यसि । | दोगा” यह कहकर उस गक्तस ने जिसका श 
कालोच के ठेर फे समान था एक स्वच्छं तलवार 
(सयक्लाद्धनपुञ्ञामं धिमलं सदगमाददे ॥२२॥| हाथमे ध ॥ २२ ॥ इसके श्यनन्तर 4 
प पतगराज पि य कन्धरः श्रोर यत्तं के राजा राक्षस में योर युद्ध 
‡ पतः व. 
(क | हु जिस धकार कि गरुड़ श्नौर इन्द्रम इत्र था 
[भूच युद्ध॒मत॒ल यथा गरुड्-शक्रयीः ॥२२॥ || २३ | इसके वाद्‌ उस यात्स ने कोधित दे. 
।तः स राक्षसः क्रोधात्‌ खड्गमागरिध्य वेगवत्‌। | तेजी से श्रङ्गारे के समान स्वच्छ तलवार को 
[4 (3 निर््वाणाङ्गारवर्चसम्‌ कन्धरः = २४ पत्तियों य 
चेष पतगे्द्राय ॥२४॥ ( ष १ 
¦ लडगं किरि भू पृथ्वी से कुद उदध॒ल कर उस ३ 
कोद्र तं खढगं | ध अ । | चोच से दस प्रकार उढा क्लिया जिख प्रकार रख 
व्त्रेण जग्राह तदा शरेढ्ः पृं यथा । सपं को ले लेता है ॥ २५॥ फिर पक्षिराज कन्धर 
क्त्रपादतलेमडक्त्वा चक्रे क्रोधमथांडनः । | ने चच श्चौर पवो के.वीच भे स्खकर उख तल- 
१ त ¢ को तोड डाला श्नौर {~ दोनों छन्द ५ 
स्मिन्‌ भग्न ततः खड्गे वाहयुदधमवत्तत ॥२६॥| च १८६ अला = शाना स व 
६ हुश्मा ॥ २६ ॥ फिर कन्धरः ने रत्तस को 
्ै परत्मराजन ५ र 
रि = ५ । ` | वक्षस्थल से दवाया श्नौर उसके शिर हाय शरीर 
न्त्र-पाद-कररद्यु शरसा च्च वियोजितः | [२७ चैसें छो न्चोच से कार डला ॥ २७ ॥ उस याच्तस 
(स्मिन्‌ विनिहते सा सरी सगं शरणमभ्यगात्‌। | भे मर जाने पर भय से समी हई उसकी स्वी 
ततने ह पत्ती की शरण मे आग ओर उसे बोली, “भँ 
कचित्‌ सञ्ञातसन्त्रासा प्राह भाय्यां भवामि ते २८॥ तेशै स्त्री होकर षर" ॥२८॥ वह भरष्ट पत्ती 
मादाय खगशरे्टः खकः ग्रहमगात्‌ पुन; । | जका भह न तोमरदीद्धुका था उख स्वी 
६ कगे लेकर विजली को तरह वेग से अपने धर 
0 स निष्कृतिं भ्रातुर्धच् टूपनिपातनात्‌ ।२६॥| गया ॥ २९ ॥ इच्छानुसार रूप धारण कएने वाली 
न्धरस्य च सा वेश्म परापयेच्छारूपधारिणी। खीने ध वड सुन्दरं थीं श्रौर 
। ‡ शुष सूप वस्तुतः सनका की पुव्री थी कन्धरके धर 
{नकातनया सुभ्रूः सपण रूषमाददे ॥३०॥ आकर र रूप धारण करज्िया ॥ ३० ॥ उसी 
स्यां ख जनयामास ताक्षीं नाम सुतां तदा! | खी से वाती नाम की कन्या रत्पन्च इई जो कि 


। निशपामनिवष्ुशं वपुमप्सरसां वराम्‌ । बसा युनि के शाय की अग्नि से नयु नाम 


ता्षीमिति अप्सरा कौ जगह पक्षिरी हो ग थी उसी का 
प्य नाम तदा चक्रे तार्षीमिति विहङ्गमः ॥२१।॥ नाम कल्धर ने ताकौ रकल ॥ ६१॥ डे द्विज षठ 


श्र०२ । माकंण्डेयपुराण ७ 


0 
, मन्दपालसताभासंशत्वारोऽमितव॒द्धयः । । । ५ ष पत्ती फे चार एु्र थे देखा 
क । जानो 1 उनमें ( उनके नाम ) जरितारि से लेकर 
जरितारिमभूतयो रन्ता द्विजसत्तमाः ॥३२॥ दो तक थे ॥ २२॥ उनम दोर्‌ के साथ जो 
तेषां जघन्यो धम्मात्मा वेदवेदांगपारगः । | धमां्मा तथा वेद-ेदा्गमे पूरं था कम्धरने प्रपनी 
उपयेमे स तां ताक कन्धरालुमतेः शुभाम्‌ ॥३३।॥| जन्द्री क्या ताक्ती का 0 ॥ ३२॥ 
¢ कट खमय वाद तारत गर्भवती इहै शरीरः. सात ~ 
9 गभ ५ ५ 
पस्यचित्वय किस्य तक्षी (० पखवाड़े अर्थात्‌ सादे तीन महीने वाद वह रदे 
सप्रपक्षाहिते गभ इर जगाम सा ॥२४। गई ॥ ३४ ॥ उस समय वदाँ कौरवो रौर पांडवों 
हृरुपाण्डवयोयुद्धे वत्तमाने सुदारुणे । | म घोर युद्ध हो श्ा था! होनहार व॒ कार्थ -से 
भावित्वाशचैव का्यैस्य रणमध्यं पिवेश सा।।२५।|| बह रण के वीच.मे ति र ॥ २५॥ उसने सव 
ॐ दी + पृथिवीक्षिताम्‌ रजिाश्राका तर, शकत श्रस्मालास पृर वह 
तत्रप्द्यत युद्ध प सपा पृः । _ | मीपण्‌ एद इस प्रकार देखा जैसा कि देवताश्च 
त्यष्टिभिर्भीमं यथा देवासुरं रणम्‌ ।॥२६॥ श्नौर 


र ्रसुरो मे इश्मा था ॥ ३६ ॥ इसके वाद्‌ उसने 
तत्रापश्यत्‌ तदा शुद्धः भगद्त-किरीटिनो; । | भगदत्त नर श्र्यन का रद देखा डस निरन्तर 
निरन्तरं शररासीदाकाशं शलभैरिव ॥२७॥ 


तीरों से आकाश इस प्रकार आच्छादित होगया 
था जिस प्रकार टीदीदल से होता है ॥ २७॥ उस 
पर्थकोदण्डनिम्यक्तमासन्नमतिवेगवत्‌ 1 | समय श्न ॐ धचष स (निकला इरा एक तीर 
तारित तव ठर भ्त्यन्त वेग से काले सपे के'समान तार्ती के पेट 
तस्या भहमदिश्यामं तचं चिच्छेद जाढरीम्‌॥२८।] मै चिद गया ॥२८॥ उसके पेड के फटने पर चंद्रमा 
भिम कोष्ठे शशांकाभं मभृमावर्ठचतुषटयम्‌ । श र ८ ष गिर 
¦ सावरोपलवात्‌ डे रौर वह ५ रु की 
आयुषः सारे तू्तराशाषिवापतव्‌ ॥३६।॥ वी पिर १ त: 
-* तत्पातसमकालंच. सुपमतीकाद्गनोत्तमात्‌ । | गिरने के समय दी सुप्रतीक नाम उत्तम हाथी का 
पपात म॒हती घटा वाणसैञ्छिन्नेवन्धना ॥४०।|| वड़ा धरय भी वाण से ध के कारण गिरा ॥ 
समं समन्तात्‌ माक्ष तु निर्भि्नपरणीतला । | बद्‌ धरटा इस भकार धथ पर या 5 व्‌ 
॥ पेशितं ट्डे इष्टी उस पक्षिणी के ्रंडे उसके नीचे स्थित. 
लादयन्ती खगांडानि स्थितानि पिशितोपरि| ४१ गये) ध. पिर रा सद स मारे जां 
हते च तस्मिन्‌ वपता. १ नरेश्वरे । पर कौरवो श्नौर पांड्थों की सेना मे वेडुत दिन 
बहून्यहान्यभूदुयुद्ध' इरुपाण्डवसेन्ययोः ।४२॥ तक घोर टच इत्रः ॥ ६ युध फे दोने ¦ 
इते युद्ध -धम्ब॑ुत्रे गते शान्तनवाम्तिकम्‌ । | पर वमुच युर भ व ९ व ब 
-तोषान्‌ श्रोतं उन्दने उन मदात्मा से वहत सी धमे की वाते 
भीष्मस्य गदतोऽेषान्‌ शतु पर्मान्‌ महात्मनः ०३|| खु ॥ ४३॥ दे दिजभे जैमिनि ! जद वरदे क 
घण्टागतानि तिष्ठन्ति यत्राडानि द्विजोत्तम । | चन्दर श्रडे रक्ते इ थे वदां दैवात्‌ मीक 
' आजगाम तद्देशं शमीको नाम संयमी ॥४४।| नामक ऋषि पड ॥ ४५॥ उन्दोनि पत्ती के 1 
शन्दमशृणोचिचीङकची , - | ची प्रावाजे सुना परन्ु वालक क श्रस्पष् वाक्या, 
स तत्र शन्दमगृणोचिचीडचीति वाशताम्‌ । ` | = त इ समभ म न शासक ९५॥ इसके 
बार्यादस्फुटवाक्यानां विहानेऽपि परे सति ॥४५।| वाद सुनि मै रपे शिष्यो समेत उस 2, 
ञमथर्षि; शिष्यसहितो घण्टायुत्पाव्य विसिपितः। | उढाया तो विस्मित होकर माच-पिपूविदीन उन | 


९ क ~ ¢, + 
तरमात्‌- थ शिशकान्‌ स ददशं च ॥४६॥॥ पत्ती के वों को देखा ॥ ४६॥ उनको पृथ्वी .परः 
मात्‌ पिवरपक्षांध श ददश्‌ ५०५ मयु देकर ` सुनिष्ठ शमीकी 
तास्ठु तत्र तथा भूम शमक मगृवान "^ | अपने शिष्यो से वोलते ॥ ४७॥ देवताश से मर्दित , 
दृष्ट्रा स विस्मयाषिष्ः भोवाचाुगतान्‌ द्विजा्‌७७।॥| स्कर राच्तसों की सेना जव भागी थी उस समय 


सम्यगुक्तं द्विजा्येण शक्रेणोशनसा स्वयम्‌ । उनको भागते हुये देखकर जो ङ बाह्मण श्रेष्ठ, 


[0 ५. 
14 
५। १ [६ ॐ 


८ माक॑रडेयपुराण ग्र०२. 


र -----------------------------------~----- -----~--~--- ~~~ 


-- ------------- 
पललोयनपरं दृष्टा दैत्यसैन्यं सुरार्ितम्‌ । 
त मन्तव्यं निव्त्वं कस्मादू्रनथ कातराः । 
उत्छल्य शौख्ययशसी इ गता न मरिष्यथ । | 
नश्यतो युध्यतो वापि तावद्भवति जीवितम्‌ । 

यावद्धाताख्चजते पूल्वं न यावन्मनसेप्सितम्‌ ।॥५०॥ 
ए भरियन्ते स्वे पलायन्तोऽपरे जनाः । 


।७८॥ शक्राचायं ने कडा था वह वडत ` ठीक था ॥ ध ॥ , 
श्भाग करन जारो, कातर होकर क्यों भागते 
हो? श्रता दौर यश को छोटकर काँ जाकर न 
मसेगे” ॥ ४९ ॥ अथ तक विधाता ने लिखा है युद 
करते बाला भी नहीं मर सकता } श्चपनी इच्छा ` 
से विधाता के प्रतिकरुल फोईै जीवित नदीं रह 
सकता ॥ १ ॥ कोई अपने र ममर इ है, ` 
, कोई भागते समय मरता है, कोड अन्न खाते समय 
भुज्न्तोऽ्नं तथेवापः पिवन्तो निधनं गताः ।\११।॥| तथा कोई पानी पीते समय मरता ॥ ५१ ॥ कितने 
पिल्लासितस्तथेवान्ये कामयाना निरामयाः दी चिल से, ठ चोर से, क विना वीमासी, 
अपिक्षताङ्गाः शश्च मेतराजवशं गताः ॥५२॥॥ उछ विना घान्‌ क श्रीर कुछ हथियारों से यम्‌- 
अन्ये तपस्यभिरता नीताः परेतदपाङुगैः राज क घर पवते है ॥ ८६1 कषठ लोग तपे 


स लीन इए तथा कु योगाभ्यास मे तत्पर टोते हण 
योगाभ्यासरताशवान्ये नेव | पापुरणयुताम्‌ ॥४२॥ सृलयु को श्रत द्योते है ॥ ५३॥ प्राचीन कालमे इन्द्र ` 
शम्बराय पुरा क्षिप्तं वज इुलिशपाणिना 


१1 


~~ 


ने एक वार शम्बर नामक्र असुर को वञ् से छाती 


हृदयेऽभिहतस्तेन तथापि न गृतोश्ुरः ॥५४॥ मे मारा था परु शससे बह अघर स्यु को भात 
तनैव सन क्जेण तननदरेण दानवाः । | गहा ॥ ५४ ॥ फिर उसी वज्र से उसी इन्द्र ने 


सताने समय श्राने पर उस दैत्य को एक क्षणं मे मार 
प्ते कसे हता दैत्यास्तः गताः॥५४॥ 
व्याग कर वै दैत्य रण॒ करने को लौे॥ ५६॥ इन 
ति कवचः सत्यंकृतमेभिः खगोत्तमः । 
न इप ॥ ५७॥ हे बह्मशो ! कयं ररुडों का गिरना 
श -रक्तेभमेर £ 
5 च मसि-वसा-क्तमूमेरास्तरणक्रिया ॥५८॥॥| उ ट ॥ 
हे ब्रह्मणो ! सर्वथा ये साधारण परती नरी हँ, श्ख 
एवशुक्तरा स तान्‌ वीय पुनवंचनमत्रषीत्‌ । | देखकर उन चालकों को लेकर श्रपने श्रा्रम को 
एयेनतो नङुलाापि स्थाप्यन्तां तत्र पक्षिणः||६१।|| धीक नहीं ॥ ६१॥ दे ब्राहमणो ! बहुत यल करने से 
तथापि यतः कत्तव्य नर, सर्वेषु कम्पु माग्य से जीवित हे ॥ ६२॥ तथापि सखव कमो मै ` 
व पतषणस्तान्‌ । तठवटपमाभितातिरङ्ं | मनि मीरः दाय के जाने पर वेश्य, 


£ नो ति डाला ॥ ५५॥ यद वात जानकर किं कोई भय नदीं 
पिदिलैवं न सन्त्रास; कचैन्यो तृ । | है श्रपने-त्रपने करव्यं धर लौटो । मरने के भयको 
पतो नि्टतास्ते दैत्यास्त्यक्त्वा मरणं भयम्‌॥५६॥ यो पू 
व ने श॒क्राचायं का वचन सत्यं कर . 
५ कू खाया किं युद्ध मे रहकर मीये सत्यु को पराप 
पे युद्ध ऽपि न सम्पाप्ठाः पञ्चत्वमतिमाटुषे ॥*५७॥ + भ । 
काणडान। पतनं विभराः क धर्टापतनं समम्‌ | कहां घरुटे का गिरना श्रौर कट मांस, मजा च 
रुधिर से भरी इ पृथ्वी मे , इनका वचना ॥४८॥ 
= ¢ नैते 
ऽ था न्पपक्षिणः ८ 
म्यत स्वे व नेते साम यप । 1 ( दैव षी श्रुता षडे समानय की, - 
रषेबुङ्ूलता महामाग्पमदर्थिनी ॥४६॥ दयोचक ह॥ ५६॥ यद कटकर उन व्यौ की श्नोरं 
निवत्तताभमं यात शृृहीतवा पक्षिवालकान्‌ ॥६०।| लोट गये श्रौर वोले ॥६०॥ दयँ पर षिल्ली, मूक, , 
मराज्जारासुभयं यत्र नैषामरडनजन्मनाम्‌ । | वाज ब च्छल रहते दों वदाँ इन पक्की स्थिति ` 
द्विः पिः बातियसनेन मायने कमि खकः] | भ्या रोता दै १ समप जीवों कौ रकता अपने कमे - 
यथैते म ५ हेती [4 व ध 
एप्यन्त चाखिला जीवा यथैते पक्षिबालकाः ६२॥| खे होतौ दै, जिस मकार ये प्री-वालकं शपते , 
नयन्‌ पुरुपकारनतु वाच्यतां याति नो सताम्‌ ६३।|| यल अवश्य करना चाद्ये । यत्व करजे से मनुष्य ' 
इति शुनिबरोदिता्ततसते एनितनयाः परि- | # धते डच कटनः ष नी रता दे ॥द३॥ इस ` 
1 उन पक्छियां को नेक चुचों से सुशोभित श्रपने 


श्रण्३ २ माकरडेयपुराण .& 


"~~ --------- * ~~~" ~~~ ~~~ 


स चापि चन्यं मनसाभिकामितं प्रग मूलं 
कैसुमं फल कुशान्‌ चकार चक्रायुध-श्र-पेधपां 
सेरन््-बवस्वत-नातवेदंसाम्‌ ॥६५॥ 

ग्रपाग्पतेगीप्यतिवित्तरक्षिणोः समीरणस्यापि , वश्खः वृहस्पति, कुवर्‌, पचन, धाता-प्रेधाता 

तथा द्विजोत्तमः। धातुर्धिधातुस्वथ वैश्वदपिकाः , श्रन्‌ ब्रह्मा च विश्वदेवियो की च्नेक क्रिया 


| फल, मूलः, पफल कशां आदि से परसंन्न मन दोकर 
विष्णु, मद्र. व्रह्मा, इन्द्र, खच, ग्नि तशा ॥ ६५॥ 


श्ुतिपयुक्ता विषिधास्तु सक्रियाः ॥६६॥ | से ब्रेदविष्टित पूजा की ॥ दद ॥ 
[न १ ० ¢ + नस्कोत्यत्नि 
इति श्रीमाकणडेयपुराण मे चरकोतवत्ति नाम हितीय यध्याय समा । 
~ ॐ ~ -ॐ ~~ । 
तीक्षरा अध्याय 
मार्यगडेय उचा | मार्कश्डेयजी वोले- 
-हन्यहनि विपेन्ध स तेषां भुनिसत्तमः | स व त ५ र 11 
चकाराहरपयसा तमा गुकषवा च पोषणम्‌ ॥ १॥ पालन किया ॥ ¶॥ पका महीना वीत सो प 


मासमनरेण जग्ुस्ते भानोः स्यन्दनवत्मनि । | चे यच्चे कौल पूर्वक मुनि बालको देखते.देखते 
कातूहनेषिलालाक्षदषएा भनिषैमारकेः ॥ २॥| णके दिन ण रथ १ उद ह ॥२॥ 
कररथ्कष पास हनि पृथ््रा श 
टश्च मरही सनगरं सराम्भानिधिसरिद्धराम्‌ । | नगर, समद्र, नदी दाचि जो 
रुथचकथमाणां ते पुनराश्रममागताः ॥ ३॥ श्रपने श्रामो वै वयिस श्यागये ॥ व मदान्‌ 
रमहानान्तयतान प पियोनिना आन्मा चाले पकी परिश्रम सरे धकरिंत दोगये .परल्तु 
श्रपञ्कन्तान्तसत्मानां महालानां व 
व्रनिञ्य भकदीपुतं ततर तेषां पमायत; ॥४॥| यमद दुध्रा ॥ ४ ॥ जयौ परर व ५ 
{ परा धम्मन याच्या पर छपा करक धमर क तत्व वर्च क्रत , 
चऋपेः एिप्यानुकम्पाथं कतां श्यम्‌ | व प प क 
त्या परदक्षिणं सय्यं चरावभ्यत्ादयन्‌ ॥ ५। चरणो मे थणम किया ॥५॥ श्रौर बोले, ५ डे मुनि! 
अचु मग्णाहुोरानमोषिताः समस्या मुने। | यापने टमो योर स से वचाय ह लया दय 
ध ॥ स ४ ि ४ = पतला ऋर दमाय पल्नें क्या दइ श्रतेः हमार 
श्रववाम-ल्प-पयसा त्व नो दतां पता गुरूः 1६ ॥॥ दाना. पिना, यरश्रापदी दद ॥ जव दम गर्भ॑ 
रभस्थाना मूला माता पितर नैवापि फलिता। | म दी थे हमारी मातां मग चौर न मो पिता 
ग [1 , ने टी पाला । श्रापने टये पत्रः की त् दूध 
‹ त्रया ना जौचितं दत्तं शिशव यन रक्षिताः ७ || पिला-पिलाकर पाला है श्रीर मासो रक्ता की है ॥ 
\ ितायघरततैजास्त्ं कमीणामिव शु्यताम्‌ । | इस प्रश्वी पर च्ापका तेज अलय दे, कीर कीः 
| तग्ट सूखते हणः हमको आ्रपने हाथी के ध्ररटे 
गजघरुट सथरुसवाच्य कृतवान. दुःखरेवनम्‌ ॥ ८ ॥ नीचे से निकाल कर दुःख से मखं किया है ॥६॥ 
७ ह नोर्गो ने 
कथ यद्धं गवना! खस्थान्‌ दक्ाम्यहं कदा क्व दम लोगों को चल की घ्ाप्नि होगी तथो अप 
कथं यद्ध युगवनाः स्स्थान्‌ द्रक्ष्याम्यहं कदा | कारो सानि व र 
कदा भये मं पराप्रान्‌ दर्ये शकषान्तर॑गतान॥ € ॥ इक्षो पर पटच कर कव दम चृ. ४४२५ | 
प्रयः सख परल्गे ?॥ ६) हमार खाभातिक क 
कदा मे सहना ऋन्विः परशुना नागुमेष्यति। ` हसश्नो क्व भितेगी, नान पकार की गर इत्यादि 


पर्या पक्षनिनोस्येन सत्पमीयव्िचारिणम्‌. ॥१०॥॥ से चमारी सकनाईं कव होगी तथी हमारे ` पलां से 


"ॐ ~ + 
[रि 


१० माकर्डेयपुराण - अ०३ 


इवा कव निकल्लेगी १॥ १०॥ श्रव हम यह सोचते 


इति चिन्तयता तात भवता भतिपालिताः । | है कि श्रापने दभा पालन किया है, अव दम बड़े 
परवरा; स्मः भवदा; || दोगये है रपा कर वताश्ये श्चापकी आक्षा का 
ते सामतं दाः सः वद्धः करवाम िभ९१ पालन कर ॥ ११॥ शमीक पि ने इस प्रकार 


इत्युषि्वचनं तेषां श्रु संस्कारयत्‌ सुटम्‌ । | संस्कार्युकत शौर स्प उन पदों के वचनो को 
त्यै त खना ! उस समय ऋपि श्रपने शिष्यो व पुत्र कै 
शिष्यः परितः सवः सह धरेण शृ्गिणा ॥१२॥| स वेड हये थे ॥१२॥ इतूहलवश तथा सोमांचित 
कौतृहलपरो भूत्वा रोमांचपटसम्डरतः । | होकर ऋषिं ते तत्वपूर्वक उनसे उनकी उत्पत्ति 
उवाच त्वतो ब्रत भ्हृत्तेः कारणं गिरः ॥१३॥| का कारण पा ॥ १३॥ किसके शाप से तुम इस 
् बिकृव रूप मे श्राय श्नीर ये रूप तथा वोलने की 


क्स्य शापादियं प्रक्षा भवद्वि्विक्रिया परा । वि त सपि 
रूपस्य वचसैव तन्मे वक्तुमिह ॥१४।॥ बतलाश्नो ॥ ९४॥ 

पक्षिण उचुः पक्ती वोले- 
विपुलस्वानिति ख्यातः भागासीन्सुनिसत्तमः। दे सुनिवर ! धाण्वीन काल भे विपुलान्‌ नाम 


। का पक पुरु था जिसके दो पुत्र हये जिनमे एक 
तस्य पत्रहरयं जज्ञे स्षस्तुसयुरुस्तथा ॥१५॥| का नाम खुश शौर दूखरे का नाम तुम्बुरु था ॥ 
सुदृषस्य वथं पुत्राश्चत्वारः संयतात्मनः; । | सुरु के म जितन्दिय चार पूत हये । दम लोगों 

वसय्विनयानार , _ | की विनय, आचार, भक्ति र न्रता सव॑दा 
"भक्तिनम्राः सदेव हिं ॥१६॥ पियो की सी थी ॥९६॥ तपस्या करते हये, तथा 
तपश्वरणसक्तस्य शास्यमानेन्द्रिस्य च । | इन्दि को जीतते हये हमारे पिता, हेम लिप 
वस्तु की अभिलाषा करते थे, उसी को उत्पादन, 

घुभितुष्पादिकं सव्यं यच्ेवाभ्यषहारिकम्‌ । | थे शमी के एल श्चादि जो भी व्यावहारिक वस्तुः 


+ = थीं सव मौजूद थीं ॥ १८॥ एक दफा बह्म राजा 
एवं तत्राय घसतां तस्यास्माकल्व कानने ॥१८॥| शध र द थर व व्वमव 


¦ विशालकाय, पंख दरटा हा, बुदापा छाया इचा 
आनगाम्‌ महावष्पं भसपञ्षो जरान्वितः । तावि के से नेतर बाले तथा डरे इ्येसेपेसे रूप मँ 


तामरे स्तात पष मूला सुरेधरः ॥१६॥ भे ॥ १९॥ ऋषभे खु के पास भो सत्यसादी 

सत्य-शौच-क्षमाचारमतीयोदारमानसम्‌ ] पावच्र, क्षमावान्‌, सदाचारल्क्त पव उदर चित्त 

= थे, राजा इन्द्र शाप के भय से डप्ते हृष्ट से उनकी 
जिक्ञासुस्तृपिश्रषठमस्मच्छापमवाय च ॥२०॥ पक्ता के लिये श्रये ॥ २० ॥ 

। पच्युवाच इन्दररूषीं पत्ती बोला-- । . , =. 

द्जन्द्र॒ भां धुधाषिष्ठं पिरातुमिहाद॑सि । दे वि्रबर महाभाग ! मं भित्था ओर जुधा 

1 से पीडितः म चलने फिरने मे असमथ हे. 

विंध्यस्य शिखरे तिष्ठन्‌ पत्रिषत्ररितेन वै। | म विध्या्टल पर्व॑त की चोरी पर रहता था, बहा 


ब नरि खे पक्षियेःके राजाने सुभे निकाल दिया अौर न्ट 
पतितोऽस्मि महाभाग श्वसनेनापिरंदसा ॥२२॥| मुभे इस मकार हटाया कि दै गिर पड़. ॥ २२॥ 


सोऽहं मोहसमाष्ष्ठ भूमौ स्ताहमस्फृतिः | |मैषक साह तक पृथ्वी पर श्रचेत पड़ा रहा ! 
स्थितस्तत्रा्टमेनाहा चेतनां प्राप्तवानहम्‌ ॥२२॥ आर दिन सु चेत हआ ॥२२॥ होश श्राने पर 
परप्तचेताः श्ुषापिष्ठो भवन्तं शरणं गतः । | भूख से व्याङ्ल दोकर इुःखित मन हो आनन्द्‌- 


= द ष रहित दशा मे साने की दच्छा से ्रापकी शरण मं 
स्याथी चेतसा व 
मयार्थ षिगतानन्दो दूयमानेन चेतसा ॥२४।॥| जया ह ॥ २8॥ हे बिमल मति वलते ! टे बाह्मण; 


बाममते मलाए।य(चजञा मतिभ्‌ । । मै ऋषि ! मेसो स्सा करने के निमित्त अचल मति 


श्र०र्‌ 


~~~ ~~ --~-~--~- 


परयच्छ भक्ष्यं विमरपं भारयव्राक्षमं मम ॥२१ 


स एवेयुक्तः पोयाच तमिन्द्रं पक्षिरूपिणम्‌ । 


भ्राणसन्धारणार्थाय दास्ये भक्ष्यं तवेप्ितम्‌।२६॥ 


। इत्युक्तां पुनरण्येनमपृच्छत्‌ स द्विजोत्तमः ) 

¶ आहारः कस्तषार्थांय उपफलप्यो भचेन्मया । 

` स चाह नरमांसेन रसनिभ॑वति मे परा 
श्एपिरुबाच 


माकंरुडेयपुराण 


११ 


बलि टौ जाश्नो श्नौर मुभे भोजन को आदार दो 


9 


जिससे मेरी जीवनकी याजा का अन्त न दो ॥२५॥ 
दरस धकार करैः जाने पर ऋषि ने उन पत्तीरपी 
इन्द्र से का, “तुम्हारी इच्छृ्सार भोजनं तुमको 
भाण धारण करने के लिये दंगा” ॥ २६ ॥ वह 
ब्राह्मण शरेष्ठ यह फटकर उससे पदयनेलगे “तुम्हारे 
ज्ये कीनसः श्रादार दम प्रस्तुत करे “बह बोला 
कि मेरी ठि भद्ुष्य का मांस भक्तण करने से 


॥२७॥| होती दै ॥ २७॥ 


ऋषि बोले 


हे पत्ती ! त॒म्दारी कुमार वस्था तथा जवानी 
वीत चुकी है श्नौर श्व तुम इस दुदृापिकी श्रवस्था 
पर पर्हुच शेः हो ॥ २८॥ इस वस्था म मयुष्यों 
फी षएच्छाश्रों की समासि दोजातीदै । इस 
लिये दस वृखावस्था मे भी कयोकर तुम तमे 
निर्दय श्रात्मा बलि दो ॥ २६॥ कदां तुम्दारी बुढ़ा 
की ्रवस्था श्नीर काँ नरमांस सानेकी लालसा ? 
यह सत्य है कि दु की दुभावनाग्नों की शन्ति 
कभी नदीं होती ॥ ३० ॥ अथवा यदह कि मुभे इन 
सव बातों के कटने से क्या प्रयोजन है । जो कदु 
तमने माँगा है चट मुभे देना दी योग्यै ॥ ३१९॥ 
चह बराह्मण गिरोमणि ( खुश ) उससे पेखा कद 
करः तश्रा तदतुसार निश्चय करके टम -सवक्रो 
शीध बुलार हमारे गुणो की प्रशंसा करने लगे ॥ 
फिर विनय से शुके इये श्रीर भक्ति पूवक दाथ 


कौमारं ते व्यतिकान्तमतीतं योवनश्च ते । 
वयसः परिणामस्ते वर्तते नूनमएडन ॥२८॥ 


यस्तिन्‌ नराणां सर्व्वेषामशपेच्छा निवर्तते । 
स कस्भादृद्धभयेऽपि सुदशंसास्मको भवान्‌॥२६॥ 
कर॒ मासुपस्य पिरितं फ वयश्वरमं तव। 


सर्व्वया} दृषमावानां प्रशमो नोपपद्यते ॥२०। 
श्मथया रषिः ममेतेन भोक्तेनास्ति प्रयोजनम्‌ । 

मतिशरुत्य सद्‌ देयमिति नो भावितं मनः ॥३१॥ 
९. इत्युक्तवा तं स॒ विमद्रस्तयेति कृतनिधयः । 

शीघ्रमस्मान्‌ समाहूय गुणतोश्तुपरशस्य च ॥३२॥ 
उवाच ुब्धहूदयो युनिवाग्यं सनिष्ठुरम्‌ । 

पिनयावनतान सथनि भक्तियुक्तान कृताजल्षीन२२॥ 
ृतात्माना द्विजश्रेष्ठा ऋणेमुक्ता मया सह । 

जातं शर्सपयं बो युयं मम यथा द्विना; ॥२४॥ 
गुरुः पू्यो यदि मतो भवतां परमः पिता । 

ततः कुरत मे वक्यं निरव्यलीफेन चेतसा ॥२५॥ 
तद्वाक्यसमकलञ्च भोक्तमस्मामिरादतः 
{ यद्यति भवांसतद्रै कृतमेवावधार्ताम्‌ 

ऋषिरुवाच 

मामेष शरणं प्राप्ने विहगः शुत्दषान्वितः । 
युष्पन्मसेन येनास्य क्षणं क्षिमवलिति । 
तृष्णक्षयश्च रतेन तथा शीध्र' विधीयताम्‌ ॥२७॥ चप 
ततो यं प्रव्यथिताः प्रकम्योदभूतसाध्वसाः । 
कृष कष्टमिति मोच्य नैतत्‌ कम्पति चा्रुवन्‌॥३८॥| "यद्‌ काम वदे कट का दै, हम से यद ` न 
कर्थं परमसीरस्य हैतोदेहं स्वकं बुधः । । दोगा ॥ ३८ ॥ दुसरे के शरीर के लिये. 


६ 
४. 


उन्पच हुये श्रे ब्राह्मणों की तरद उत्तम सन्तान 
कलने योग्य दो तथा मेर ऋण से अभी मुक्त 
नदीं हुए दो ॥ ३४॥ जिख प्रकार शुर पूज्य दै उसी 
प्रकार पिता भी प्म पुच्य है । इसरिये ज मँ 
करं उसे विना किसी दल के कयो ॥ ३५॥ 
हम सच ने कटाकिजो कु आप चाज्ञा करगे 
उसको हम श्रादर पूर्वक शिरोधाये करेगे ॥ २६॥ 
ऋषि वोले- 

यह परी भूख श्रौर प्या से व्याञुल होकर 
मेरी शर्ण मं राया है । वुम््ारे मांस से इसकी 
क्षरभरम दपि दोजावेगी यह प्ी तुम्दारे रक्त से 
ती दठृपा शंत करेगा इसलिये शीघ्र तैयार 


॥२६॥ 


जोड हुये टम से खित हदय सुनिने निद्र च्चन ` 
कटने शुरू किये ॥२३॥ दे पुमो ! तेम मुके 


जानो ॥ ३७॥ इसके चाद दम लोग वहत 
पित हृ तथा मय से कपि गये श्रौ यह वलि, . 


^ 
५४१ 


१ ` माकरुटेयषुराण 


०३ 


ष णि 
व~ ---------------------- ~~ ~ ~ ~ - -- =-= 


विनाशयेहुघातयेद्दा यथा ह्यात्मा तथा सुत५|२६॥ 


पिदःदेवमलुष्याणां यान्युक्तानि ऋणानि बे 


तान्यपृङ्करते पुत्रो त शरीरमदः सुतः ॥४०॥ 


तस्माचैतद्‌ करिष्यामो नो चीणं यत्‌ एरातने 


जीवन्‌ भद्राण्यवापोति जीवन्‌ पुण्यं कयोति च१ 


मृतस्य ॒देहनाशृशध धम्माचयुपरतिस्तथा । 


आत्मानं सर्व्वतो रश्यमाहु्स्मैषिदो जनाः।४२॥ 


तथं भुत्वा वचोऽस्माकं सनिः कोधादिष उलन्‌। 


मोवाच पुनरप्यस्मान नि्हन्निव लोचनैः ॥४२॥ 


प्रतिह्ञातं यचो मयं यस्मान्नैतत्‌ रिष्यथ । 


तस्मान्मच्छापनिर्धास्तिर्ण्यम्योनौ परयास्यथ।४४॥ 


एवशुक्छा तदा सोऽस्मास्तं विहङ्गमथात्रवीत्‌ । 


अन्तयष्िमात्मनः कृत्वा शास्रतशौदुध्यैदेदिकम्‌४१५॥ 


भक्षयस्व सुविश्रव्यो मामत्र द्विजसत्तम । 


आहारीकृतमेतत्‌ ते सया देहमिहात्मनः ।४६॥ 


एतावदेव धिपरस्य ब्राह्मणत्वं प्रचक्ष्यते । 


यावत्‌ परतगनत्यग्रूय स्वत्यपरिषालनम्‌ ॥४७॥ 


न यद॑कषिणावद्वस्तत्‌ पुर्यं प्राप्यते महत्‌ । 


कर्मणान्येन वा विमेयेत्‌ सत्यपरिपालनाद्‌ ॥४८॥ 


` इतयपेवंचमं श्रुता सोऽनतर्धस्मयनिभेरः । 


` भरयुवाच युनि शक्रः प्षिरूपधरस्तदा 


| योगमास्थाय मेन त्यजेदं खं कलेवरम्‌ । 


: जीबज्जन्तुं हि विभेद न भक्षामि कदाचन ॥५०॥ 


{ तस्येतद्टचनं श्रुत्वा योगथुक्तोऽमवन्धुनिः । 


तं तस्य नियं ज्ञात्रा शुक्रोऽप्याह स्वदेहभृत्‌ ५१ 


[ भो भो विभेद वुध्यस्वुदध्या बोध्यं बुधात्मक । 


> जिह्ञासायं मयाऽयं ते अषराधः कृतोऽनय ॥५२॥ 


तत्‌ क्षमस्व मलते का चेच्छा कियतां तव | 


॥ पालनात्‌ सत्यवावयश्य पतिर्मे परमा खयि॥५३॥ 
प 


प्रय भृति ते ज्ञानसेनट्रं पादुर्भिष्यति। 


५. 


४ 


श्रपने शरीर को क्यो त्र करे? जैसा श्रषना 
शरीर दहै वेसा ही पुत्र का होता है ॥ ३६ ॥ मनुष्य 
मे पिवदेव का छरी तो पुर द्योता है परन्तु जो २, 
फक्त ख दौ उनको छुकाना चाये, पच को 
भाणो की वलि न देना चाये ॥ ४० ॥ दृसलिये 
हम पेखा लीं कर सकते, यदि जीवनहै तो शरीर 
केः कर्थाणके निमित्त वइुत पुरय क्रिया जा सक्ता 
है ॥ ४१॥ सर जाने पर तथा देह के नष्ट होजाने 
पर ध्मा का श्चुमाचरण किसर प्रकार होगा ? 
इसलिप ध्म के तत्व को जानने वाल्ञे पुरुषो ने 
कटा है किं पनी दे की सर्वथा रक्ता करनी 
चाहिये" ॥ ४२॥ ठमारा इस प्रकार चन सुनकर 
मुनि ने क्रोध से जलते हुए लाल-लाल आसं कर 
हम से कदा ॥४३॥ तुम लोगों ने पिले वचन 
देकर प्रतिक्ञा की यर श्रव कहते हो रेखा नहीं 
करेगे । इसलिए मेरे शाप से भरम टोकर परियों 
की योनिने प्ुचोगे॥४७ाहमसे यह कहकर वद स 
इन्द्ररूपी पक्तीसे वोले.“श्रपनी अंत्येषि शाख्राट॒क्रूल 
करके श्राद्ध किये लेता. ह ॥ ४५॥ दे पर्चिराज ! 
चकि तुमको विश्वास दिया जा चुका है इसलिए 
तम मुूको मकण क्ये श्रौर मेरी देह को अपना 
छहर वनाच्च ॥ णद ॥ विथ क्रा बाह्मशत्व तभी. 
तक समश्ना चाद्ये जव, तक कि वह पने 
वचन च सत्य का पालन करता है ॥४७॥ जो 
महान्‌ पुरय यज्ञ करने, दक्षिणा देने रौर तप करने 
से भी नदीं होता बह केवल ब्राह्मणो दवारा सत्य 
चचन पालन करने दी से दो जाता है” ॥४८ ॥ तव 
उख ऋपि के यह वचन सुनकर अत्यन्त विस्मय 
को भाप हु पर्टीरूप राजा इन्द्र मुनि से यह वोले 
॥ ४६ ॥ हे विप्रघर ! योग की शुरण लेकर शच 
इस शरीर को छोड दगा । श्रव म कभी किसी 
जीवं जन्तु को न खाङं गा ॥५०॥ उसके इस प्रकार 
वचन सुनकर सुरण मुनि ने योगाभ्यास दाय 
विचारा । उनके इस प्रकार निय को देखकर 
इन्दं अपने अदखली शरीर को धारण कर बोला ॥ 
हे व्राह्मण श्रेष्ट! त्प निष्पाप श्नौर बुद्धिमान 
श्राप च्रक्षनियो को वोध कराने बले है । शने 
परीक्ञा करने के हेतु यह अपराध च्पमे भिर पर 
लिया ॥ ४२) रतः हे स्वच्छ वुद्धिवालत महात्मन्‌! 
मुमको कमा करो । श्रापकी क्या इच्छा है १ उस 
की ५ जाय । ्रापके सत्य बचन पालन से 
त्राप मे मेरी दढ्‌ भीति दोग है ॥ ५२॥ श्राज से 


आपका शान इन्द्रं सस्वन्धी परगट होगा । श्राप 


ष माकंण्देयषुरण । १२ 


तपस्यथ तथा धम्मे न ते पिष्नो भविष्यति ॥५४॥ तपस्या कीलिये, श्रापके धम मे कोई विध्नन 
इत्युक्तया तु गते शक्रे पिता कोपसमन्यितः 1 र न ध्र 
पू ने श्रपने पिता.से'हम शिर से 
परणम्य शिरसास्माभिरिदश्ु्छो महानि; ॥५५॥ कर यह वोले ॥ ५५॥ “हे पिता ! हे महान्‌ 
तिभ्यतां मरणात्‌ तात खमस्मकं महामते । ध 1 ९ जीधन भिय दै । हम 
तुमहसि दीनानां जीषितभियता हि नः ॥५६॥ समथ ह ॥ ४१ ॥ य 4 
त्वगस्थिमांससङ्काते - पूयशोणितपूरिते । | श्रौर स्थिर से पूरं है इसमे श्रिक श्रासक्ति न 
कर्तव्या न रतिर्यतर तत्रास्माकमिं रतिः ॥४७' | दोनी चाहिये 1 दम इस श्रधिक रत होगे ॥५७॥ 
श्रुयतां च महाभाग यथा ल्लोको विद्यति । 
कमक्रोपादिमिदौपिरवशः प्रवलारिमिः ॥५८॥ 


हे महाभाग ! सुनिये, जिस तरह संसार मे हर 
णक्र प्राणी काम, क्रोध, लोभ, मोह श्रादि प्रबल 
शनुश्रों से मोहित होता हुश्रा घ्रवशदै ॥ ५८ ॥ यह 
शरीर पक महलके सदटशरै जिसम सदद्‌ ॥ 
प्क कोड के सेमनि है चमडा जिसमे भीत 
समान हेः तथा मांस श्रौर रुधिर जिसका से , 
शरथात्‌ प्लास्टर के समान हे ॥ ५६॥ शसक = 
वड़-बडे दरवाजे हं जिनपर स्नायश्रं का पहरा 
इसका जा जो उसके श्न्दर वरैखता है 
पुरुष दे ॥ ६० ॥ उसके दो मन्त्री है, वे है * . 
मे प्क दृसर के विरोधी मन श्रौर वुद्धि, जहां ५ 
णक दृखरे से भग्ने लगते हें बां यजाका ग : 
हो जाता दै ॥ ६१ ॥ उस राजा का नाश ` बहुतं ` 
वेगी चाहते हैः । उनमें काम, क्रोध, लोभ, 
प्रादि तथा श्रीर्‌ भी दूसरे इस राजा के शत्र है | 
यदि राजा श्रपने द्वारो को वन्द करके रक्षा ५, 
हृ वेडता है तो वद स्वस्थ, वलवान्‌ श्रौर भयः 
रहित होता द ॥ ६२ ॥ वह सुखी रहता है श्रौर 
शचश्रों से दलित नदीं दता है ॥ ६४ ॥ यदि हं 
सव द्वा को ग्यज्ते रताद तो राग नाम | 
शचं उसके नब्रह्वार मे होकर प्रवेश करने षः 
इच्छा करता दै ॥ ९५ ॥ वह राग नामक शत्र ९ ` 
व्यप होत्ता ह्र पाँच द्वायों से प्रवेश चाहता 
मर उसक्रे साथ तीन शरीर शत्र उसके मां - 
छारा प्रवि होना चाहते दै ॥ ६६ ॥ वह्‌ २ 
श्राभिक् श्रनकों यों से घुस कर मन तथा 
रिफिश्या स सहकारिता प्रात्र करसेता दहं ॥ ६ 
फिर वह इन्द्ियो शौर मन को वश प करके 
द्वासें को श्रधीन फर उस कोटको तोता है ॥ 
मन को उसक्षे श्राभित देखकर वुद्धि भी उसी 
म्रहो जाती है श्रौर फिर चेतन पुरुप चि 
मन्ञियो ऋ श्रकला स्ह जाताद्‌ ॥६६॥ शस ¶# 
जिसके त्रश्च ने छिद्रों को प्राप्त कर लिया 
पेखा यजा नाण फो प्रात होता दै । यदतो 


भन्नापराकारसंयुक्तमस्थिस्युणं परं महत्‌ । 


चम्भैभित्तिमहारोधं मांसशोणितलेपनम्‌ ॥५६। 
नवारं महायासं सव्यतः स्नायुवेष्टितम्‌ । . 
` सप्च ॒परुपस्तत्र चेतनावानघस्थितः ॥६०॥ 
` मन्तिणौ ततस्य बुद्धिश्च मन्यव व्रिरोधिनौ । 


यतेते वैरनाशाय तानुमावितरेतरम्‌ ॥६१॥ 
सृपस्य तस्य. चत्वारो नाशमिच्छन्ति विष्ठिपः। 
कामः क्रोधस्तथा लोभो मोहथान्यस्तथा रिपुः ६२॥ 
यदा तु स दृपस्तानि दाराण्पाृस्य तिष्टति । 
तदा सुस्थवलश्ैव निरातङ्क जायते ॥६२॥ 
जातानुरागो भवति रत्रमिनामिभूगते ॥६४॥ 
, यदा तु सरव्हाराणि विदतानि स शुश्चति । 
रागो नाम तदा शतूरनत्रादिदवारणृच्छति ॥६५। 
सर्वव्यापी महायामः पएश्वदारमवेशमः 
तस्याञुमागं विशति तद्र करं रिपु्रयम्‌ ॥६६॥ 
परतरिर्याथय वं तत्रे द्वाररिन्रियसंज्गकः 
रागः संश्छेपमायाति मनसा च सहेतरः ॥६७)' 
हन्दिपाणि मन्यव ब्र कृतया दुरासदः । 

. द्वारि च बर खा भकारं नाशयत्यथ ॥६८॥ 
` मनस्तस्याशितं द्रा युद्धिनश्यति तस्षणात्‌ । 
 अ्रमास्यरहितस्तत्र परवरगोभ्मितस्तथा ॥६६॥ 


रिपुभिर्लन्यधिवरः स॒गृपो साशगृच्छतिः । 


माकैएडेयपुराण 


्र° र 


~. - ~ -----------~ 


एवं रागस्तथा मोहो लोभः क्रोधस्तथैव च 
वर्चन्ते दुरालानो मदुष्यस्एृतिनाशकाः । 
एगात्‌ कोधः भमि क्रोधाह्योभोऽभिनायते ७१॥ 
तोाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्‌ स्मतिषिभ्रमः) 


अतिभ्रंशाद्युद्धिनाशो बुद्धिनाशात्‌ प्रणश्यति७२॥ 


एवं भनष्ुद्धीनां र गलोभादुवर्िनाम्‌ । 


गीविते च स लोभानां भरसदं कुरु सत्तम ॥७२॥ 


मोऽयं श्वापौ भगवता दत्तः सन भवेत्‌ तथा । 


१ तामसीं गति कष्ठ व्रजेम मुनिसत्तम ॥७४॥ 
ऋषिरख्वाच 


न्पयोक्तं न तन्मिथ्या भविष्यति कदाचन । 
१ मे वागतरतं पराह यावदध्येति पुत्रकाः ॥७१५॥ 
वमत्र परं मन्ये धिक्‌ पौरुषमनथैकम्‌ । 


काय्यं कारितो येन वलादहमचिन्तितम्‌ ॥७६॥| शरनं रूप कायं का दिया ॥ ७६॥ अव जञ कि 


स्मा युष्माभिरहं प्रणिपत्य प्रसादितः । 
स्मात्‌ तिय्यंक्लमापन्नाः परं ्ानमषाप्स्यथ।७७॥ 


नदरितमारगाशच मिदध.तहेशकल्सषाः । 
स्सादादसन्दिग्धाः परां सिद्धिमवाप्स्यथ ।७८॥ 
वं शक्ताः स्म भगवन्‌ पित्रा दैवशात्‌ पुरा । 

त; कालेन महता योन्यन्तरणुपागताः | 
ताश रणमध्ये बै मता परिपालिताः । 
मित्थं द्विजश्रेष्ठ खगं सथुपागताः ॥८०॥ 
सयसाविह संसारे यो न दिष्टेन वाध्यते | 
ववैषामेव जन्तूनां दैवाधीनं हि चेष्टितम्‌ ॥८१ 
| माकरडेय उवाच 

ते तेषां षचः शरुता शमीको भगवान्‌ मनि; । 
दयुषाच महाभागः समीपस्थापिनो द्विनान्‌॥८२॥ 
प्रेमेष मया भोक्त भवतां सम्नियापिदम्‌ । 
पिमान्यपक्षिणो नेते फेऽ््येते ह्िजसत्तमाः । 
१युद्धेऽपि न सम्पाप्ठाः पश्चतमतिमानुपे ॥८२॥ 
1; प्रीतिमता तेन तेभ्नङ्गाता . महात्मना । 

पुः रिलरिणां भेटं व्यं दुमलतायुतम्‌ ॥८४॥ 


७०} | का दाल कदा इसी भकार मोह, लोम श्नौर क्रोध 


को समना चाहिये ॥ ७०॥ मयुप्य की स्यति 
श्रथात्‌ वुद्धि को नाश करने वाक्ते ये दुरात्मा रूप 
शरु हर समय भौजूद रहते है । राग से क्रोध 
होता है जौर कोध से लोभ दोता है ॥७१॥ लोम 
से मोद ओौर मोद से विश्रम दोता है । स्मृतिके 
विश्चम से बुद्धिका नाश होता है श्रौर वुद्धि नष्ट 
होने पर पराणः का श्रपदरण दो जाता है ॥ ७२॥ 
हे मुनिशेष्ठ ! हम नच बुद्धि वाल, सग श्नौर लोभ 
के पीले चलने बालों तथा जीवन के ल्लोभ करने 
बालों पर कृषा कीजिये ॥ ७३॥ टे मुनिवरः ! जो 
यह शाप ्रापने दिया है व्ह नदो नौर टम 
तामसी गति को प्राप्न हों" ॥ ७४॥ 
पि बोलते 

“जो मैने कटा है वह कभी भिध्यानदींदो 


| सकता । हे पुत्रो ! मेरा वाक्य आज तक मिथ्या 
"नदीं हुआ ॥ ७५॥ भ यहाँ पर पुरुपा से देवर को. 


श्रधिक._ मानता ह्व जिसमे बल॒ प्रवेक युह.. 
वि 
तुमने सुभे प्रणाम कर भ्रखन्न किया है श्सलिमे तुम- 


पत्ती योनि में प्रात दोकर भी परम ज्ञान से युक्त 


| होगे ॥ ७७ ॥ ज्ञान द्वारा दिखाये हण जितने मागं 


दै उनपर चलने से तुम क्तेश शौर पाप 
से रदित होगे । मेरे प्रसाद्‌ से निश्चय दी तुम 
परम सिद्धि को प्राप्त होगे" ॥ ७८ ॥ हे भगवन्‌ ! हे 
शमीक मुनि ! दैवयोग से पिता द्वारा इस भ्रकार 
शापित इए हम उस समय पक्षी योनि में 
पच गये ॥ ७६॥ हे द्विजवर ! हम रणभूमिमे.. 
श्राकर उत्यन्न हुए ओर श्रापने हमारा पालनकिया, 
इस धकार हम पक्तीरूप मे मौजूद हे ॥ ८० ॥ इसे 
संसार मे एेसा कोह नदीं है जिसक्रो प्रारब्ध से 
वाधा न परहची हयो । सव जीव-जन्तु -दैवके ही 
आधीन वतेन करते है ॥ ८१ ॥ 
मारकरडेयजी वोल्े- 

दस प्रकार उनका वचन सुनकर महात्मा 
शमीक अपने पास वटे हुए शिष्यो से वोज्ञे ॥८२॥ 
मैने त॒म लोगो को पिले दी वताया था कि यद 
साधारण पकती नदीं है वरन्‌. कोई भरे जीष है जो 
किये माननी रणभूमिमे भी शल्यको प्राप्न 
इये ॥८३॥ पिर परेम पूर्ंक उन मदात्मा ने उन 
पक्तियां को देश किया कि पवतो मे श्रेष्ठ तथा 
पडो ओर लतां के सहित विध्याचल पर्वत पर 
श्राप लोग.जाद्धे ॥ ८४ ॥ हे पक्ियो ! वक्षं जाकर ` 


ननन न~" ~ --~------------------- ~~ 
स न~-- ----- 


० ४ माक॑र्टेयपुराण १५ 


-------------------------------_--____ 


यावदद्य स्थितास्तस्मिननचले धस्पपक्षिणः । | श्नौर रहकर तप, स्वाध्याय श्रौर समाधिमे निश्चय. 


तपःसाध्यायनिरताः समाधौ दृतनिधयाः ॥८१॥| रप से तस्र रदे ॥ ८५॥ इस धकार शमीक मनि 
इति निवरलन्धसत्तियासते मितनया बिह. वे पीर व 
५ ~ न पोयेयत ४ । प मुन-पुत्र ` त्यन्त. गहनं [वभ्याचल. 
गत्वमभ्युपेताः। निरिवरगहनेऽतिपुएयतोयेयतमं वत पीड स अदौ अस्य पिशं सं शवा 
लघो निवसन्ति विन्ध्यप्‌९॥८६॥ था प्रसन्न गन से ण्टमे लगे ॥ ८६॥ ` 
इति श्रीमाक॑र्डेयपुराण मे विन्ध्य-माप्ि नाम तीसरा शरध्याय समाप्त । | 
-- >ॐ-०-€4- 


चौथा अध्याय 


मार्करडेय उवाच माक॑र्डेयजी वोल्े- । 


एवं ते दरोणतनयाः पक्षिणो ज्ञानिनोऽमवन्‌ । दे मुनि जैमिनिजी । इस भकार वे दरोरके भुव 
पक्षी ज्ञानवान्‌ हष श्रौर चव वे विध्याचल्ल पवेत 


बसन्त इचरे निन्य ५ त ९.९ पर रहते है । उनके पाख जाकर पृथिये ॥१॥ ऋषि 
हृत्यषेवचनं शरुत्वा माकण्डयस्य जमिनिः । | माक॑रडेय ॐे यद बचन सुनकर जेमिनिओी विर््या- 
जगाम विन्ध्यशिखरं यत्र ते धम्पैपक्षिणः ॥ २॥ चल के शिखर पर गये जां वे धर्मरूप पत्ती रहते 
तन्नगासमभूतस्च शुभराव पठतां ध्वनिम्‌ । ¦ थे ॥ २॥ उस पर्वत के समीप पहुंचकर उन्टोने 


विसया सैमिनिः , पक्चियों की पाट-ध्वनि सुनी । उसको सुनकर 
विस्मय परनि! ! ३। {त < ~ 
शरुत्वा च चिन्तयामास जरि | जैमिनि मनि आश्चयांन्वित होकर सोचनेलगे ॥३॥ 


स्थानसोष्वसस्पन नितश्वासमविश्रमम्‌ । | किये ष्ठ पदी विना श्वास रोके वदी सुषुता 
विरपष्टमपदोषञ्च पठ्यते द्विजसत्तमैः. ॥ ४ ॥ श्रौर सक्र से तथा दोष रदित पाड करते ह ॥४॥ 
तियोनिभपि सम्भकषानेतान्‌ सुनिष्मारकान्‌ । | इषौ 4 ष न युनि इमा को 
व | सरस्वती नदीं छोडती दै यदह वड़ा ्रा्चयं है ॥५॥ 
चिन्रमेतदह मन्ये वि नहाति सरस्वती + माई-वन्धु, मित्र श्रौर पभरियजन ये सव पने को 
वन्धुवरभस्तथा मित्र यच्च्मपर ग्रहे । छोड़ देते दै परन्तु सरस्वती नदीं = 
त्यक्तवा गच्छति तत्सव्वं न जहाति सरस्वती - ६॥ ह ॥ ६॥ इस प्रकार विचार करते हप जैमिनि ने 
इति स्िन्तयन्नेव विषेश गिरिकन्दपम्‌ । पर्वत की गुफा में भवेश क्या श्मौर वहाँ परवेशकर 


[* अ [२9 1] 
९ गता । ७ । | कर पर्या को एक शिला पर वेट ह्‌ देखा ॥७। 
रिर्य च ददशौसौ शिलापदगतान्‌ दिनान्‌ ॥ ७! | उन पियो को. दोष रहित उचारण से पठते &“ 


परतस्तान्‌ समालोक्य एखदोपविबन्नितान । | देखकर जैमिनि वड़े पसनन हए श्रौर कुठ चिन्ता 
सोऽय शोकेन हेण सव्वानेवाभ्यमापत ॥ ८ ' | शक हो उनसे वोक्ते ॥०॥ हे शम परियो ! ९, ०.९ 
सवस्यस्तु बो दविनशेष्ठ समिति मां निवोधत्त। | कल्याण हो, मुमको व्यास शिष्य जैमिनि संममो 

ध ¡ दशनोरसुकम्‌ मै श्रापके दशनं की इच्छा से यदय आया हं ॥ ६। 
व्यासरशिष्यमनुप्ाघ् भवता द  &। पिता कै क्रोचित होने सेजोश्राप लोग * ^ 


मन्युनं खल कर्तव्यो यत्‌ पित्रातीवमन्युना । होकर पर्ति योनि मे प्रा इष्ट है इसका श्याल ° 


६ करना चाहिये, ~ ~ इच्छा थी पस्‌ 
शप्ताः खगत्वमा५न्ाः स्वथ दिष्टमेव तत्‌ ॥१०॥| मानना चाहिये ॥ १०॥ कुल के च्व्ये कं नाशं होः 


¦ किल मनस्विनः । | पर बहत से सम्धान्त कल के लोग नीच कल ३ 
सीदे कले केचिऽनाताः मल लोगों से आश्रय पाति ह ॥ ९१॥ तपकं ची ह 


्रवयनाये द्िजे्रात शव्रेण ससान्तिताः ॥१९॥ जानिपर जिन भधुप्योने दान दिया वे भीख मग 
दत्वा याचन्ति पुरुषा द्त्वा वध्यन्ति चापरे | चै, जिन्दनि मार है वे मारे जति ह तथा १1 “2 
पातयित्वा च पा्यन्ते त एव तपसः ्षयात्‌॥९२॥ दूखणे को भिराया है वे गिरये ` जते ह ॥ १२ 


४ + 

५, 

४०, ६ 
= १८५६ 
1; 


१६ माकरडेयपुराण | अन 
-------------------------------- 
तदच सुबहुशो विपरीतं तथा मथा । ` | इस भकार मैने वहुतंसौ वाति परस्पर विरोधी देखी 
सच्दैस १ है । भाव मे च्थवा श्माव मे लोग निरन्तर व्या- 
[चामावसुर व्यङ्लं जगत्‌ ॥१२॥ कुल हो ण्डे ह ॥१३॥ इस पश्र मनमे बिचार कर. 
ति सश्चिन्स्य मनसान शोकं कर्तमहथ | | याप लोग शोक नकर ज्ञानका फलदी यदहं 

च्योकपरध्ष्य ध १४॥ कि-सख दुख मे समान रहे ॥ १४॥ इसके वाद 
नस्य फलमेतावच्यीकहपरघरषयता इन सव पर्चियां ने पाथ, दध्यं शादि से जैमिनि. 
समिर ७ 
तस्ते जैमिनिं सर्व्व पाद्ाघ्याभ्यामपूनयन्‌ । 
प्रनामयञ्च पच्छः परणिपत्य महामुनिम्‌ ॥१५॥ 
प्थोचुः खगमाः सर्वे व्यासशिष्यं तपोनिधिम्‌ 


कीं पूजा की श्नौग उन महाम॒नि को प्रणाम कर. 
उनकी कुशल पृद्धी ॥ ६५॥ फिर उन सव परक्षियों 
पखोपनिष्टं विश्रान्तं पक्षानिलहतक्ृमम्‌ ॥१६ 
पक्ति उचुः 


ने तथखीं योर व्यासजीके ष्य जमिनिसे जो कि 
सख से वेठ गये थे तथा जिनकी धकान पर्चियों ने 
श्रपने पंखोंकी हवा से दर करदी थी कटा ॥ १६॥ ` 
रर नः सफलं जन्म जीवितञ्च सुजीवितम्‌ | 
पत्‌ पयामः सुरषन्ध तव पादा्जद्वयम्‌ ॥ ः 
पेत्रकोपागिरुटभृतो मो नो देहेषु वत्ते | 
मोऽ्व शान्तिं गतो विप्र युप्मदशंनवारिणा॥१८॥ 
कचित्‌ ते दुशलं बहमन्नाश्रमे मृगपक्षिषु । 
ृेष्वथ लतागुसम-त्वकूसार-तृणनातिंषु ॥१६॥ 
प्रथवा नेतदुक्तं॒हि सम्यगस्मामिराहतं 
मृता सङ्कमो येषां तेषामङृशलं इतः ॥२०॥ 
परसाद्य इरष्वात्र ब्रह्मागमनकारणम्‌ । 
देवानामिव संसर्गो भवतोऽभ्युदयो महान्‌ । 


फेनास्मद्वाग्यगुरुणा आनीतो दृष्टिगोचरम्‌ ॥२१। 
जामननिस्वाच 


रयता द्विजशाद लाः कारणं येन कन्द्रम्‌ । 
वरन्ध्यस्येहागतो रम्यं रेवावारिकणोक्षितम्‌ । 


न्देहान्‌ भागते शासे तान्‌ प्रष्टुं गतवानहम्‌॥ २२ 
भकण्डेयं महत्मानं पूव्यं भगुह्लोददम्‌ । 

मह्‌ पृष्टवान्‌ पाप्य -सन्दहान भारतं प्रति .॥२३॥ 
¶ च पृष्टो मया पाह सन्ति वध्ये महाचले। 
णपुत्रा महात्मानस्ते बष्थन्त्यथविस्तरम्‌ ॥२४॥ 


दवाक्यचोदितरेममागतोऽं महागिस्‌ | 


£च्छरुध्वमरेषेण श्रुता व्यार्थातुमहथ ॥२५॥ 
प्ण उः ` 
पषये सति वक्ष्यामो निर्धिशंकः शूरुष्व तत्‌ । 


पत्ती लोग बोलते - 


जो दोनों चरण कमल शआ्पके देवताश्रोंसे 
पूजित ह उनको आजे देखकर हमारा जन्म सफल 
होगया ॥ १७ ॥ हे विप्र ! पिताजी की करोधाननि में 
जलते इए टम इस योनि मे मौजूद दै । बह श्रनि 
आज श्नापके दशनरूपी ज॑ल से शास्त हुई ॥ १८॥ 
टे भगवन्‌. ! आपके आ्ाश्रम तरे श्रग, पकती, वक्त, 
लता, पुप्प, त्वकखार रौर ठण इनमे कोन सुखी 
नीं है श्रथात्‌ सव कुशल दह ॥ १६ ॥ अथवा दमनं 
आदर पूर्वक ठीक नदीं कहा । जो श्रापके संगमं 
है उनका श्रमङ्गल कँ १॥ २०॥ -छृपां कर श्रपने 
शागमन का कारण वताद्रये । आपका संसग पेसा 


+ 


है जैसे देवताश्च का । सम्भव है हेमारे भाग्योदयं 
से ही ्यापका नां हुश्ा हो ॥ २१ ॥ 
जैमिनि वोले- 
ठे शरेष्ठं पक्तियो ! सुनो, म जिसक्रार्णसे 
विन्ध्याचल पतेत कां इस कन्दरा मं जहा रवा 
ग का जल चिडका हुदै श्राया ह । पटाभारन 
म मुभे कई जगेह संदेह है उखको पृष्धने के लिये 
थात्‌ उसकी निन्रत्ति के तिये मे आया हं ॥२य 
पिले मं भ्रयुङुलोप्पन्न महात्मा माकरड्यजी के 
पास महाभारत मं इप संदेहो को पूदने के लिये 
गया ॥ २३॥ मेरे पृद्ुने "पर उन्दने वताय कि 
चिन्ध्यष्वल पवेत पर द्रोण के महात्मा पुत्र रदतेहै 
वे विस्तार पूरक तुम्दे वतबेगे ॥ २४॥ उन्दी की 
परेर्णा खे म देस महा पवेत पर श्राया ह, श्सलिये 
आप व्रिस्तार पूर्वक उन संदेहो को सनिये श्चौर 
उनकी निचत्ति कीजिये ॥ २५॥ 
पत्ती वो्ते- 


जो विषयो उसे निस्संदेद किमे हम उसको 


ध्वं तन्न वदिष्यामो यदम इडुद्धिगोचरम्‌ ॥५६॥। सगे श्नौर जो क इमास बुद्धि मेँ वेगा उसे 


५ ध्र 1 द 


चतुष्वेपि दि वेदेषु षर्ममशास्त्ेषु चैव हि । 


-माकौरुडेयपुराण 


१ ७ 


क्यो न कगे ॥ २६॥ चारो वेद; वेदाङ्ग, धमशा 


समस्तेषु तथागिषु यचान्यदेदसम्मितम्‌ ,{.२७॥| तथा अन्य शाख जो वेद से सम्मत दै ॥ २९॥ हे 


एतेए गोचरोऽस्माकं बुद्ध ब्राह्मणसत्तम । 


भतिङ्ान्तु समारोदुं तथापि न हि शक्तुमः । २८॥ 


तस्माषटदस्व विभ्वं सन्दिग्धं यद्धि भारते । 


` व्ष्यामस्तव धर्मत न वेन्मोहो भविष्यति ।२६॥ 


जैमिनिमवाच 
सन्दि्धानीह पस्तूनि भारतं भरति यानि मे । 
शृशध्पममन्तास्तानि शरुत्वा व्याख्यातुमर्हथ ॥३० 
करमान्पादुपतां भाप्नो निगणोऽपि जनाईनः । 


वासुदेवो ऽसखिलाधार; सन्ध॑कारणकारणम्‌ ॥३१॥ 
¦ | एँ की एकदी भायां द्रुपदं राजा की पुत्री.रृष्ण 
के हुई इसमे महान्‌ संशय है ॥२२॥ महावलवान्‌ 


कस्माच पाणएडुपत्राणमेका सा दुपदात्मना । 


पश्वोनां महिषी कृष्णां समानत्र संशयः ॥३२॥ 
भप व्रह्महत्याया वलदेवो महाबलः । 
तीयेयात्राप्रसगेन कस्माचक्रे हलायुधः ॥२३॥ 


` कथंच द्वपदेवास्तेऽकृतदासा महारथाः । 


1 


पणडनाथा मदात्मानो वधमापुरनाथवत्‌ ॥३४॥ 


एतत्‌ व्यं कथ्यतां मे संदिग्ं मारतं भरति । 


कृतार्थो सुखं येन गच्छेयं निजमाभमम्‌ ॥२५॥ 


क्र पक्षिण उचुः 
नमस्कृत्य सुरेशाय विष्णवे प्रभविष्वे । 


पुरुपायाभमेयाय शाश्वतापाग्ययाय च ॥२६॥ 


€ द, 
चतुव्यहातमने तस त्रियुणापायुणाय च । 


वरिष्ठाय गरिष्ठाय व्रेणएयायामृताय च 


यस्माद्रणुतरं नास्ति यस्मान्नास्ति दत्तम्‌ । 


येन विश्पमिदं व्याघ्चमजेन जगदादिना ॥३८॥ 


. अरनि्माव-तिरोभाव-द्रा्विलक्षणम्‌ । 


` छऋकूसामनयुद्विर्‌ यक्ते; पुनाति जगत्रयम्‌ ॥४०॥ 
परणिपत्य `! तथेशानमेकवाणविनिरधनतेः । ^ 
यस्यासौ विज्प्यन्ते न यस्िनाम्‌, ॥४१।॥'तमस्कार करक ॥ ५९ ॥ दन + ` 


- दन्ति थत्‌ चष्टमिदं त्ैवान्ते च संहतम्‌ ॥२६॥ 


ब्रह्मणे चादिदैवाय नमर्छृत्यं समाधिना । 


दिजवर ! वै सव हमारी बुद्धिगोचरः हैँ । इससे 
श्रतिरिक्त ज ज्ञान है बह भी हम श्रापको वता 
सकते हँ ॥ २८॥ हे धर्मक्ञ ! जो कुदे महाभारत म 
श्रापको संदेह दो हमसे कषठिये, वह दम श्रापको 
वताेगे श्रौर आपको संदेहरहित करेगे ॥ २६॥ 
जेमिनिजी वोले- व 
महाभारत शाखे जो धमे सन्देदं वे सुनिये 
छरीर उनको सुनकर उनकी व्याख्या कीकिये.॥२०॥ 
परमेश्वर जो निर्ण है तथा सवांधार श्नौर सव | 
कारणे; कामी कारश है व मुष्यत को प्रप्तहो 
कर वासुदेव क्यो कदलाया १।३१॥ पाड के पाचों 


चलरामजीने घरह्म हत्या के पापसे मुक्त दोनेके लिये 
तीर्थयात्रा किस तरह की १।३३॥ श्रीर द्रौपदी के 
पोँचों पुत्र जो ऊुमार, मद्टारथी तथा महाता. थे 
श्रौर जिनके अभिभावक रपर से, पारडव लोग 
मौजूद थे, कर्योकर श्रनाथौ की मांति मारे गये १॥ ` 
महाभारत के परति ये सव सन्देह मेया दर ` करिये 
जिससे भें तार्थं होकर सुख से श्रपने आम ` 
को जाड ॥ ३५॥ 
पत्ती चोले- निव 

सवस पिले देवताश्रौँ के स्वामी भमु विष्णु ' 
को जो पुरुष, श्रपमेय शाश्वत श्रीर श्रन्ययद हम 
नमस्कार करते दै ॥ १६ ॥ उनके चारं स्वरूप हे,वे 
निगण दै तथा गुणातीत है । वे -बडे शट, गरि, ' 
ञवर्श॑नीय तथा अमरः दै ॥ ३७ ॥ उनसे न तो को 
छोटा है श्नौर न वड्ा,श्रथात्‌ वे सुरमातिसस्म ओर ` 
बृददाति वदत्‌ द । उनसे सम्पूणं अगत व्यौ दे 
शरीर वे जगत के श्रादि कारण है ॥ ३८॥ जो जन्म 

८ 

न्रौ मरण, दशय श्रौर अद्य से परे है रौर 
जिनसे सष्टि का आदि शौर चन्त है उनको नमः 
स्कार है ॥ ३६॥ पिर समाधिस्थ ब्रह्माजी को: 
नमस्कार करते है जिनके मुख से ऋक्‌, साम्‌, 
युद तथा श्रथ वेद निके है तथा-जो तीनो 
जगतो को पविच्च करते है .॥ ४०॥ उसी भरकर, 
शिवजी को जिनके पक वाण से यज्ञ, कएने बालं 
ॐ यज्ञा से श्रसुसो ॐ समूह लघ हो जाते है 
४ कर्म करने वाजे 


१८ 


-माकंरढेयपुराण 


०४ 


-=------~---~- 


पवध्यामो मतं कृचं व्यासस्यादथुतकम्मंणः । ` | व्यास का जिन्दों ने कि महाभारत लिखकर धमा 


येन भारतिय धर्म्माधाः भकटीकृताः ॥४२॥ 
आपो नारा इति भोक्ता भुनिमिस्तत्वदर्शिमिः। 


दिकोंको भगट किया है सम्पूणं मतत ्रापको 
वतलायेगे ॥ ४२॥ तत्वदर्शी भुनियों ने जल को , 


नारा कदा है श्रौर उसमें जिस पुरुप का बास है . 


श्रयनं तस्य ता पूर्व्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥४२।॥ उसको नारायण कहते हँ ॥ ४२॥ वहीं भगवान्‌ 


स देवो भगवान्‌ सत्वं व्याप्य नारायणो विथु; । 
चतुद्धा संस्थितो घरहमन्‌ सगुणो निरएस्तथा ४४ 
एका भूर्िरनिदेश्या शु्ां पयंति तां बुधाः। 


नारायण देव ईश्वर सर्व-व्यापी टोकर चार स्वरूप ,. 
म स्थित है तथा सगुण श्रौर निगु है ॥४४॥ 
पिला स्वरूप अनिर्हश्य है जिसको विद्धान्‌ श॒ङ्ग 
कहते ह श्नौर परम योगी जिसको ज्योतिःस्वरूप 


ज्वालामालोपरुदढाङ्गी निष्ठा सा योगिनां परा॥४५॥| कहते है ॥ ४५॥ गी लोग कते है कि वह दुर 


दूरस्था चान्तिकस्था च धिजञेया सा गुणातिगा । 


रूपवणंदयस्तस्या न भावाः कल्पनामयाः । 
ञस्त्येव सा सदा शुद्धा सुपरतिष्टेकरूपिणी ॥४७॥ 


द्वितीया पृथिवीं मूद॒धां शेषाख्या धारयत्यधः । 
तामसी सा समास्याता तिय्यक्त्वं समुपाथिता८॥ 
ठतीया कम्मं॑इरते प्रनापालनतत्परा 1 


पक्तोद्िक्ता तु सा ज्ञेया धम्मंसंस्थानकारिसी४६। 
चतुथी जलमध्यस्था शेते पन्नेगतत्प्गा । 
ए्नस्तस्या गुणः सगं सा करोति सदेव हि ॥१०॥ 
या ठृतीया दरेमृिः मनापालनंतत्परा । 

पा तु धम्म॑न्यवस्थानं करोति नियतं श्वि ॥५१। 
्ोदूतानसुरान्‌ न्ति धरम्म॑विच्ित्तिकारिणः। 
पाति देवान्‌ सतशान्यान्‌ घमरक्षापरायणान्‌॥५२॥ 
य्दा यदा हि धम्य ग्लानिर्भवति लेमिने । 
अभ्युत्थानमधम्मस्य तदात्मानं सनत्यसौ ॥५३॥ 
भूत्वा पुरा वराहेण त॒ण्डेनापो निरस्य च । 
एकया दृूयोतूसाता नलिनीव वसुन्धरा ॥५४॥ 
त्वा उसिहरूपञ्च दिरणए्यकशिपुरंतः । 
विग्रचित्तियुखाश्चान्ये दानवा विनिपातिताः॥५१॥ 
वामनादीस्तयेषान्यान्‌ न संख्यातुमिहोत्सहे । 
अवतारं तस्येह माथुरः साम्बतं त्वयम्‌ ॥५६॥ 
हति सा साचचिकी मू्भिखतारान्‌ करोति वै । 

चय म्नेति च सा स्याता रकताकम्म॑रुयवस्थिता ५७॥ 


ज्नीर पास दोनों है । उसी वो बासुदेव कटते हं 


तिमपलेन शरीर वह ममत्व रदित लोगों को दीं दिखाई देता 
वासुदेवाभिषानाऽपौ निम्मेमत्ेन दृश्यते ॥४६॥| है 


॥ ४६॥ उस स्वरूप का रूप रङ्ग नदीं है, उस 
का भाव कल्पनामय है । वह सदा शद्ध, सुपि. 
तिष्टत नौर पक रूप वाला है ॥ ४७॥ दूसरा 
खरूप शेपनाग है जो नीचे से श्रपने शिर पर 
पृथ्वी को उटाये हष है । इस खरूप को तामसी , 
कते है ॥ ४८ ॥ तीसरा खरूप वह है जो कम॑ 
करता है अर्थात्‌ पजा पालन मे तत्पर है शौर 
धर्मः का संस्थापनं करता है इसको सास्विक 
खरूप कहा दै ॥ ४६॥ चौथा स्वरूप बह है जो 
शेषशायी है इसको गजोगुरी कदते. दै ॥ ५० ॥ 
तीस जो स्व्ररूप पजा पालन मे तत्पर है बट 
पृथ्वी पर नियत रूप से धमे की व्यवस्था करता 
है ॥ ५१॥ ( भगवान्‌ ) राक्तसों को जो ध्म के 


नाश करने वलि है, मारते है ओर धर्म की रक्ता 
म प्रायण देवतां की रक्ता करते हं ॥ ५२॥ 
हे जैमिनि ¡ जव-जव धस का हास होता है श्नौर 
मधम की वृद्धि होती हे तभी भगवान्‌ मगर होते 
ह ॥ ५३॥ प्राचीन काल मे वाराह ने अपने पक 
दात से पृथ्वी को जल मेसेक्मलकी तरह 
निकाल कर स्थित किया ॥ ४४ ॥ चौर चसह रुप 
धारण कर हिररयकशिपुका चध किया श्नौर विध- 
चित्ति आदि रासो को मारा ॥ ५५॥ उन्न 
दी वामनादिक अनेकों श्रसंख्य ्रवतार धारण 
कयि है ओर उन्टोने ही आज-कल मथुरामे 


अवतार लिया दै ॥ ५६॥ यह सात्विकी भूति दी 


परमेश्वर का अवतार लेती दै । दूसरी तामसी 
सूतिं शेष अथात्‌ च्‌ स्न का श्रवतार लेकर रक्ता 
कम भं तत्पर रती है ॥ ५७॥ बासुदेव की इच्यु 


ञ्० ५ माकरएख्यपुराण १६ 


देव्मेऽथ मुष्यते तिवयम्योनौ च संस्थिता । । से देवताश शौर मद्यो की. योनि स्वभावानु- 


५ 


गहाति तत्छमावंच वाघुदेवेच्छया सदा ॥५८॥ सार मिलती हे ॥ ५८॥ इटलिये परमेश्वर विष्णु 
इत्येतत्‌ ते समाख्यातं कृतङकत्योऽपि यल; । | मानच ्रवतार हेते ह । श्व दूसरे भशन का 
माुषत्वं गतो विष्णुः ृरष्वास्योत्रं पुनः ॥५६।॥ उन्तर सुनिये ॥ ५६॥ 


स्ति श्रीमाकरुडेयषुराण भे चतु्यंह अवतार वणन नामक चौथा श्रध्याय सम । 


-- स्णक-@969 < -~ 
पोँचवां अध्याय | 
चिण्‌ उचुः | पी बोले # 
त्षपत्रे हते पूवं व्रह्मनिन्द्रस्य तेनसः । भाचीन काल मे इन्द ने त्वरा के पुत्र फो 


| तेजस्वी बाह्मण था मारा था । इससे. उसको 
्र्हत्यामिमूतस्य परा हानिरनायत ॥ १॥|| ्रहत्या का पाक लगा शौर इ्दकी वद हानि 
तदधम भमियेशाय शाक्रतेोऽपचारतः । | इं ॥ १॥ उस पाय के लगने से इन्द्र निस्तेज हो 
न्ते भचछको षम तेनसि नित ॥२॥ गया श्रौर उसका तेज निकल कर धर्म मे प्रविष्ट 
नाश्वामव होगया ॥ २॥ जव प्रजापति त्वष्ट ने श्रपने पु का, 
ततः पुत्रं हतं श्रुचा लष्ठ करुद्धः मनापतिः । (| मरण सुना तो क्रु होकर श्रपनी प्क जया 
अवसव्य जटामेकामिदं वचनमत्रवीत्‌ ॥ २ ॥| उलाडृ कर चद्‌ वचन थला ॥ ६॥ श्रव मेरी शुक्ति 
अच पश्यन्तु मे बी रयो लोकाः सदेवताः। को देवतां सदित तीनों लोक तथा ब दुुद्धि 
स च पश्यतु दववद्धि्रंहदा पाकशासन; ॥ ४ ॥ 1 
+ २ । मे लगे हु मेरे पुज का वघ किया है यह ककर 
स्वकम्माभिरतो येन त्युत विनिपातितः । | लाललाल ने करके जटा को श्रगिनि मै डाल 
इयुक्तवा केोपरक्ताक्षो जटामश्री घाव ताम्‌ ॥ ५ ॥ दिया ॥ ५॥ उस व श्रग्नि 9 नासु 
नाम वाल्ला ण्स › बड़-वड़े दांतों 

तता छ; सए्स्थौ ज्वालामाली महासुरः । | बाला तथा काले पषाड़ की सी आरामा वाला था ` 


महाकायो महादे भिन्नाञ्जनचयग्रभः ॥ ६ ।|| निकला ॥ ६॥ बह इन्र का शयु, मावली, तथा 
५ व्व्ठके तेज से उत्पन्न हुश्रा रात्तस वृत्ासुर नित्य- 


हरशवरुरमेयात्मा -लषटेनोष हितः । प्रति वढृता था इस तरह किं जिस प्रकार छूटा । 
श्रहन्यहनि सोभवद्ध दिषुपातं महाबलः ॥ ७ ॥ हु तीर ऊँचा जाता दै ॥ ७॥ इन्दर न महाश्रसुर 
वधाय चात्मनो दृष्ट श्रं शक्रो महासरम्‌ । | चन्र से अपना मर्ण जानकर,  भयान्वित हो, 


सप्तश्कषियों को सन्धि की खवर लेकर ब्न्नासुर 


मषयामसि सपर्पीन सन्धिमिच्छन्‌ भयातुरः ॥ ८ ॥ के पास सेजा ॥ ८॥ उन ऋषियों ने जो पराणि मात्र 


सर्यंचरुस्ततस्तस्य छण समयांस्तथा । | का. दितचिन्न करते थे, इनदर की चचार के 
ऋषयः भीतमनसः स्वभूते रताः ॥ ६ ॥ साथ एक अवधि के लिये मित्रता 1 ॥ ६॥ 

+ अवधि के वीतमे पर शक्र ( इन्द्र ) ने बूच का वध ; 
छो हस्याभिमूतस्य तदा वलमशीय्यत ॥१०॥| गया ॥ १० ॥ इसके वाद इन्द्र कौ देहस बल निकल 
तच्छक्रदेहविभरष्ं ' बलं भारुतमाबिरत्‌ । कर सर्वव्यापी, श्रव्यक्त तथा वल के देवता पवन ` 


सर्व्वव्यापिणमव्यक्त' बलस्येवाधिदैवतम्‌ ॥॥११॥ मै भेण कर गया ॥११॥ जव इन्र ने गौत्तमका रूपं. 
श्रहरयाश्च यदा शक्रो गौतमं रूपमास्थितः, | , | धारण कर अस्या के सतीत्व करा नाश क्रिया तच 


६६, ` माक॑रुडेयपुराण ` भ्र* १ 


~~ ------------------------------------ ~~ 
न~~ 
= ~ - ~ ~न =------~ 


प्यामास दवद्रस्दा रूपमदहीयत ॥१२।| उसका रूप भी कीर होगया ॥ १२॥ श्रौर बह 


॥ मनोरम लावरय उस दए इन्द्र फे श्रङ्गग्रह्न से 
अ्गमतयङ्गलपरए्यं यदतीव मनौरमम्‌ । निकल कर ्रश्चिनी कुमाय में प्राप्त दुश्ा ॥ १२॥ 


पिहिय दुष्टं देवेन्द्रं नासत्यावगमत्‌ ततः ॥९२॥ धर्म, तेज, वल च्रीर स्प से इन्द्र॒ को दीन ह्र 
धर्म्मेण तेनसा त्यक्तं बलदीनमरूपिणम्‌ | | देखकर दैत्यो ने इन्द्र को जीतने का उद्रम दिया 
नाला सुरेशं दैतेयास्तज्जये चक्ररुधमम्‌ ॥१ ॥ १४॥ हे महासुनि जेभिनि ! इन्द्र॒ को जीतने 


देवेद्ध विजिगीषवः की दृच्छासे प्रथ्वी पर श्रनेक वलवान्‌ राजाग्रोँ के 
ज्ञदयं देवे ४ राज्य-कुलों से राकस ने जन्प्र लिया ॥ १५॥ 


हृलेष्वतिवला दैत्या अनायन्त महान ॥१५॥| इन यत्तस्य के भार से घ्याकुल देकर पृथ्वी दां 


कस्यदित्वथ कालस्य धरणी भारथीडिता । | खमेर पर्वत पर देवतां की सभाथी वटं ग 
लगाम मेरुशिखरं सदो यत्र दिवौकसाम्‌ ॥१६।॥ ५९९१ त्यन्त भर र सीदित सोकर उने 
तेषां सा कथयामात भूरिभारावपीडिता । देवताश्रले कदा कि ैत्योके भारे पीदित होकर 


यतयं से ,| मै यहाँ राई ह ॥ १७॥ श्रापने जो भगा पराव्रम 
दुजात्मजदत एद्कारणमात्मनः ॥ १७ वाले रा्तसो छो मारा हे चे लव मलुष्य-लोक मे 
एते भवद्विरखुरा निहताः पथुलोजसः । | राजाच के धर भ उतपन्न हण द ॥ १८॥ उन्देनि 
ते सर्वं मापे लोके जाता गेहेषु भूमृताम्‌ ॥१८।॥| ्ननेक च्रौदिसी, सेनाश्रों के भार ॐ भुमको 
, | ःखित क्रिया ह रौर इसी कारण से मे नीचेन 
अक्षौहिण्यो हि बहुलास्तद्वारात्तं व्रनाम्यधः। | बीर जाती. ह 1 दे शेवा } पेसा करिकर 
तथा इुरुध्वं त्रिदशा यथा शान्ति्बेन्मम ॥१६; | जिससे मै शान्ति पा सँ ॥ १६॥ 
पक्तिः ध पत्ती बोले-- श 4 
त ,। इखकारण श्रपने-खपने तेजा भाग लेकर देव- 
तेोमागेसततो द्वा अवतेरूदिषो महीम्‌ । | ताच्मो ने प्ृध्ठी पर परजा फे उपकार के निभित्त 
प्रजानष्घुपकाराथं भूभारहरणाय च ॥२० | तथा पएृथ्वीखा भार उनारमे के ह््ियि श्रवतार 


यदिन्रहनं तेनस्तनधुमोच सयं एषः । | क्तिया ॥ २०॥ इष्‌ के शरीर स जो तेज धर्म न 


धः ग्रहण किया उससे न्ती दाय महा तेजखी राजा 
कृन्त्यां नाती महातेनास्ततो राजा युधिष्ठिरः ॥२१. शथिष्ठिर उत्पन्न इए ॥ २१॥ इन्द्र॒ से निकल कर 
५ जो वल पवन म मिला उससे भीम उत्पन्न हु । 
५ मोच पवनस्ततो भीमो व्यनायत । तथा इन्द्र के वीर्यं से उद्धव पाथं नाम अर्जुन 
शक्रवीय्यादतश्चेव जङ्ग पाथा धनञ्जय; ॥२२॥| उत्पन्न दु ॥ २२॥ इर्‌ का जो रूप श्ण्विनी- 
यलो ध कुमारो म मिला था उखे इन्द्र खरूप दो पुत्र 
उत्पन्न `पमजौ माद्रयां शक्ररूपी मदाच्‌ ती । मद्री के उत्पन्न हप जिनके नाम नकल श्नौर 
सहदेव ध } इस प्रकार भगवान इन्द्र खयं पांच 
। खरूपो मे प्रगट इए ॥ २२॥ श्रीर हे जैमिनिजी । 
श्रनि से उत्पन्न इह द्रौपदी उन इन्द्र रपी प्च 
तस्योत्पनना महाभागा पत्नी कृष्णा हुताशनात्‌९४॥॥ पारडयों की पत्नी हई ॥ २४ ॥ इसलिये वह द्रौपदी 
नान्यस्य कस्यवित्‌। | प्क इन्द्र की दी पतली दै श्ौर किती की नदीं । 
` शक्रस्येकस्य सा पत्नी ष्णा कस्यपित्‌। योगीश्वर भी अयते योग ॐ चल से चनेक शरीर 
: योगीश्वराः शरीराणि इव्बन्ति बहुलान्यपि ॥२५।॥| घारण्‌ कर तेते दै ( जिस इन्दर तोः देवत है ) 
 पचानामेकपत्नीतवमित्येतत्‌ कथितं तष । | खनि जमिनिजी ¦ पां पारड्ों की पक ही 
तौ । पः्नीका रदस्य आपसे कटा । श्रव खुनिये कि किस 
श्रुयतां बलदेवोऽपि यथा यातः सरस्वतीम्‌ ॥२६॥. भकार बलदेवजी सरस्वती तीथं को गये ॥ २६॥ 


। . इति श्रीमाकरुदेयपुराण मे हृरधिकरिया नाम पच. अध्याय समापन । 


पथ्चधा मगवानित्थमवतीरं; शतक्रतुः ॥२३। 


~~~ ~ 


स व~ 


कठा अध्याय 


॑ पर्षिण ऊ पती वोले- 
रामः पाथं परां मतिं ज्ञास कृष्णस्य लद्खली। ` _ वलरामजी श्रीृष्ण श्रे शञुन में परस प्रीति 


६ ' करो लानकर्‌ यट सोचने लगे कि जुभे कौनसा 
चिन्तयामरस बहुधा रि एतं सुकृतं मवेत्‌ ॥ १॥ काम ेसा करना चाहिये जिससे पर्य दो ॥१॥ 


कृष्णेन हि पिना नादं यास्ये दु्योधनान्तिकम्‌। ह क विना दुर्योधन क्री तरफ जाना उचित 
थं रोधनं पम्‌ नही । इसी रकार णजा दुर्योधन को छोडकर 
पारडषं [भनि ट भ *ॐ ५८ 
1: ॥ 1 ९॥ पारड की शोर जाना च्छा नरी ॥ २॥ एक 
जामतरं तथा शिष्यं घातयिप्ये नरेश्वरम्‌ । | श्रोर जामात्रा दै छरीर दृसरी ओर शिष्य श्रौर 
य पोधनं दृथम्‌॥२॥ यज का वध । इसलिये मे न तो श्न की ओर 
ब्र प्रि (६ नारि द्र््‌ ष्य 1 २ ४ ७ (५ [१ खु 
थं यास्यामि नारि दुरधधिनंवरपम्‌॥२ ॥ जरगा शौर न दुर्योधन की शरोर ॥ २॥ इसलिये 
तीर्थेष्वाप्लव्रयिष्यामि तावदत्मानमात्यना । जवर तक कौर श्चौर पारडवों का रद्ध समाप्त हो 
वि क ोवनीवपि कर गा ॥ ४॥ इस प्रकार श्रीकृष्ण, श्रयुन श्चौर 
सत्यामन्य हरक प यापना (6 दुर्यधन रे मिलकर एनी सेना सहित वलदेदजी 
जगाम हारफां शारि, खसेन्यपसवारितिः 


+. 


॥ ५ ॥| द्वारकापुर को गये ॥ ५॥ व्तदेवजी ने द्वारकापुर 


गत्वा हारवतीं रामो  दषटपु्टजनाङ्लाम्र्‌ । | मे जिसमे हपु श्रौर खी मनुष्य रहते है जा 
स्वगन्तव्येषु तीए पए पानं द्रलादुधः ॥ ६ । कर मदिरा एन किया ॥६॥ मदिरा पाय कारके वे 
पीतपानो जगामाय रवतोचानगृद्िमद्‌ । | खत गने भे जीर वह जाकर न्न मदोतमच 


द स र रेवतीको जो श्रण्ससके तुल्यथीं हासे पकड्ल्लिया॥ 


( सीफदम्बकमध्यरथो चयौ मतः षदा स्खसन्‌। | तथा उन्मत्त द्यो डिगमरिगाते हए पतों से 1 
ददशं च वनं वीरो रमणीयमलुतमम्‌ ॥ ८ ॥| शौर उन्दने रमशीक णयं उत्तम वनको देखा ॥८॥ 
९५  शाखाभृयगणा्कल ¦ घंट महावन सव ऋतुं के फलः पुष्प,.शाखा, 
(| 
० त ५ गरलम्‌ । श्म समूह तथा पित्र कमल चीर न्दर वाव- 
प्यं पञ्चय सपस्वलमदायनम्‌ ॥ ६।| लियो से य॒त था॥६॥ वहाँ पियो के सुख से 
स भरएयन्‌ मीतिनननान्‌ बहून. मदकलान्‌ मान | उचारित मधुर एष्द्‌ जो ख॒नद्रः छम, मदोन्मत्त 
भो्रम्यान्‌ सुमधुरान शब्दान्‌ खगघखेरितान्‌ १०।॥| करने वाले शरौर 1 व 
क्त 40) खव छल ॐ खच्छ शूला श्रीर फलो से लदा => , 
सव्यतुफलमाराल्यन्‌ सर्ङुमोज्नवलान्‌। | चर "चय परियां के यष्ट खे निनादित ५" 
श्राप्रानाम्रातकान्‌ मव्यान नारिकेलान्‌ सतिन्दुकान्‌ 
श्राविदयकास्तथा जीरान्‌ दादिमानधीजपूरकान्‌९२। 
पनसान्‌ लक्कचान्‌ भोचान्‌ नीएंधात्तिमनोहरान्‌। 
पारावता कङ्लोल्लान्‌ नलिनानस्लवेतसन १२ 
भट्ारकानामलकांस्िन्दृकांध महाफलान्‌ । 1 
हगुदान्‌ करमदरीशच हरीतक-पिभीतकान्‌ ॥१४॥| कर्मच, छर शौर वदेडे ॥९४॥ यदुनन 2 
एतानन्थांथ स॒ तरन्‌ ददं यदुनन्दनः । | नै दलको तथा इसी भकार अन्य छ चस ~ 1 
तेवाशोक-घुनाग-रेतकरी-बङलानथ  ॥१५।॥| पुग, केतकी चौर मौलसिरी को भी देखा ॥५ 
चभ्पकान्‌ स्पर्ध किकारान सम।लतीन्‌ । | चस्या, सवण, कनेएमालती,पारज त, ५ ५५५ 


सि्‌, चेल, शञजीरः नार्‌ श्नौर नीवू ॥ १२ ॥ . ^ 

1 
कटहल, बद्दल, भ्रोचरल, कदम शरीर †- ` 
| मनोहर पायनत, कक्कोल, चल्िन श्रौर २ 


॥ १३ ॥ भल्लातक, दुक शरीर महाल , ६५५ ५ 


माकैरुडेयपुराण श्र ६ 
_ -___ ~~~ 
= 
पारिजातान्‌ कोषिदारानन्दारान्‌ वदरांस्तथा१६।| मंदार चनौर वेर ॥ १६॥ पार्ल त्ऋदि सुन्दर पुष्य 
पाटल्लान्‌ पुधितान्‌ रम्यान्‌ देवदाद्मास्तथा। तथा देवदार श्राद्रि वक्त, गालः ताल, तमालः 
श्लास्तालास्तमालांधर्ि्कानधज्ुलानवरा न १७॥ परस च खुन्दर चञ्चल ॥ १७॥ चकोर, शतपत्रः 
चकोर; शत्तपत्रेथ मृद्गराजस्तया शकः । भरे, तोते, कोयलः मैना, हारीत तथा जीजजीवक 


२२ 


कोकिलैः कलविङ्ध हारातरजािलावकः 
मियपुतरेषातकेव ॒तयथान्ये्विविधः सगः । 
श्रोत्ररम्यं सुमधुरं इलद्विशवप्यधिष्ठितम्‌ 
सरसि च मनोज्ञानि भसचरपलिलानि च । 
इषुः पुएढरीकौश्च तथा नीलोत्पलैः शुभैः ॥२ 
कारेः कमतेश्चापि ्राचितानि समन्ततः 
ऊाठम्वेश्चक्रवाकेश्च तथेव जलङ्क्टः ॥२१॥ 
कारणैः प्लवैहतेः सृ्येमदगुभिरेव च । 
एभिश्चान्येश्च कौशंनि समन्ताल्जलचारिभिः२२ 
करमेेत्थं यनं शोरिवीभ्रमाणो मनोरमम्‌ । 
जगामालुगतः द्वीमितायहमसुत्तमम्‌ ॥२२॥ 
स॒ददशं द्विजास्तत्र बेदयेदाङ्परगान्‌ । 
कौशिकान्‌ भार्गवाश्चैव भारद्वाजान्‌ सगोतसान्‌२४॥ 
विविघेषु च सम्भूतान्‌ वंशेषु द्विजसत्तमान्‌ । 
कथाश्रवणएवद्धो्कासुपविष्टान्‌ महत्य च ॥२१५॥ 
छृष्टाजिनोत्तरीयेु ङ्दोषु च दृषीषु च । 
सत्व तेषां मध्यस्थं कथयानं कथाः शुभाः ।।२६॥ 
पौराणिकीः सुरषीणामाच्यानां चारिताश्रयाः 


1१८] ॥ दख ॥ तथा पपीदा श्रौरं श्रन्य श्रनेक ध्रकार के 
पकती अपने प्रिय पुतो सदत वरैडे हुए द्धी श्रुति 
१&॥॥ मधुर चौर मीठी वासी बोल रे ये॥ १६॥ बडे 


स्वच्छं जकन वाते मनोहर तालाव थे जिनमे 
खुन्दर स्वच्छ कुमुदिनी व लाल श्चीर नीले कमल 
खिल रदे थे ॥ २० ॥ जिनमे कर्टार श्रौर कमल 
इत्यादि चारं तरफ खिल रदे घे 1 तथा कदम्ब, 
[4 
चकवा रौर चतस्र ॥ २१॥ श्रौर फारतड, प्लव, 
दंस, कलु मदटलियों तथा चौर भी श्रनेक 
जलचरो से तालाव चारों चोर से पृणँ थे ॥ २२॥ 
वलरामजी क्रम से इख खुन्दर चन को देखते हुए 
लियो के साथ एक अन्यन्त उत्तम लतागृह मेँ गये 
॥ २३॥ उन्नि वहां पर वेद वेदाङ्ग म पार्त 
कौशिक, भार्गव, भारद्वाज च्रौर गौतम व्री 
ब्राह्मणों को देखा 1 २ ॥ श्रौर भी अनेक वंशीय 
श्रेष्ठ बाह्रा वहाँ वरे हुए कथा सुन रदे ये ॥२५॥ 
खगच्छालाओं, कश्ाश्यां अथवा श्रास-पात पर वैठे 
हुए उन व्राह्मण के' वीच मेँ स्थित घूतजी शभ 
कथा छुना रहे थे ॥ २६॥ चे कथायं पुसर-संवन्धी 
तथा प्राचीन देवताप्रो ओर ऋपियां के चरि 
सम्बन्धी शीं । वे सव ब्राह्म मदिरा के नये मे 


द रामं दिनाः सुच सधुपानार्छेक्षणम्‌ 1}२७॥ चूर वलराम्‌ञ् का ठख कर ॥ २७॥ श्रौर यहे 


;सत्तोऽयमिति मन्वानाः समु्स्युस्छरान्विताः 
पूनयन्तो हलधरमृते तं सूतवशजम्‌ 
।ततः क्रोयसमाविषठो हली सूतं महाबलः । 
पवरिजयान विदतताक्षः क्षोभितारेषदानवः 

ऽश्ध्यास्यति प्रदं त्राह्यं तस्मिन्‌ सृते निपातिते 
निष्क्रान्तास्ते द्विजाः सते बनात्‌ कृष्णालिनावराः 
अवधूतं तयात्मानं मन्यमानो हलायुधः 


॥२८] 


समः कर कि यह मतचलेद्योरटे है, शीव्रदही 
उनके स्वागताश्रं उर वेड परन्तु सूती न उरग) 
सूत के इस प्रकार अवदेलना करमे पर महावली 
चलदेवडी ने जिलकी शख कोध से विगड््‌ रीं 


२६ धा सूत का राक्तस चग भातत मार डल्ला ॥२६॥ 


सूत के मरने को वह्म-दत्या समस करवे चूमि 
सव ऋपने-अपने गचमं को केकर वनको द्टोड़ 
कर खल्ते यये ॥ ३० ॥ वलरामजी श्रपमे उन्मादको 
समभ कर सोचने लगे कि रने यह वड पाप 


प्रचिन्तयामासर सुमहन्पया पापमिदं कतम्‌ ॥\२१।॥| या ॥ ३९ ॥ जाह्यण के स्थाने मे आक्र हमने 


बिं स्थानं गतो शष यत्‌ सूतो विनिपातितः 


सथाहमे द्विना सर्व मामवेक्ष्य विनिर्गताः ॥३२॥ 


एरीरस्य च मे गन्थो लोहस्येवायखावहः । 


खूतजी का वध च्या! इसी कारण सेये सव 


लोग सको देखकर अ्रथोत्‌ सुकसे धरा 
करके इस वन को छोड़ कर चले गये हँ ॥ ३२॥ 


मेरे शरीर मे से खृतात्माकी सी दर्गन्धि अतीद 


` अ्र०७ मावरडेयपुराण २३ 
----------------------------------------------- ~~~ -- --~----- 
भ्ातमानध्वावगच्चामि बरहम्नमिव इत्सितम्‌॥२२॥ इस क के पापको र २३॥ 
मर कराध, मादः 9 क 
धिगम॒भ तथा भ्मतिमानमभीरताम्‌ । | को भिका स रान यरा 
येराविष्टेन सुमहन्मया पापमिदं तम्‌ ॥३४॥ ववि 1 
८ ४ इख पाप कफे नाश करने 

ततेक्षयाथं चरिष्यामि व्रतं दादशवार्षिकम्‌ । को वारहवर्पं तक बत तथा उत्तम प्रायधित्त करूंगा 

सकम्मख्यापनं इव्वन्‌ मायधित्तमयुत्तमम्‌ ॥३१॥ ॥ २५॥ शरव मै तीर्थं याचा करूंगा श्रौर पिजत 
भू अथ येयं समारव्या तीरयया्ा मयाधुना । | यनिलोमा सरस्वती तीथं पर. जाकर श्पनीं चात्मा 
“ एतामेव भयास्यामि प्रतिलोमां सरस्वतीम्‌ ॥३६॥| को पवित्र करूंगा ॥ २६॥ श्नतः बलरामजी भरति. 

ञ्रतो जगाम रामोऽसौ प्रतिलोमां सरखतीम्‌ । लोमा अर्थात्‌ खरस्बती तीर्थको गये । अरव पांडवों 

ततः परं शृशष्वेमं पाण्डवेयकथाश्रयम्‌ ॥२३७॥ के पु की कथा को सुनो ॥३७॥ 


इति श्रीमाकण्डेयपुराण म बलदेव ब्रह्महत्या कथन नाम छटा अध्याय समाप्च । 


= ("द 4१ , द्द -- 
सातां अध्याय 
पत्तिण उचुः धर्मपक्ती लोग वोल्े-- 
हरिष्चन्दरेति राजर्षिरासीत्‌ प्रेतायुगे पुरा । पूवे काल में तेता युग मेँ राजपिं हरिन 


राज्य करते थे । बे धर्मात्मा, पृथ्नी पालक, तथा 

धर्म्मात्मा पृथिवीपालः परोसत्कीर्चिरुत्तेमः ॥ १॥| उत्तम कीतिं वाले थे ॥ १॥ उनके शासन मे कभी 

८ न दरिं न च व्याधिर्नाकालमरणं दरणाम्‌। | श्रकाल, रोग चीरः महामारी रादि नही हप । 
ए 


र धमात्मा थी ॥ २॥ उनके 
नाधरम्रुचयः पौरास्तस्मिन्‌ शसति पार्थिवे ॥ २॥ 1 नौर न किसी को धन, म 


बभूवु तथोन्पत्ता धननवीर्य-तपोमदे; । | श्रौर तप का श्रभिमान था । उनके राज्य मे सियां 


प्रयौवना 
। ~ ¦ ॥ कभी द्ध प्रतीत नदीं दोतीं थीं ॥ ३॥ पक दफा 
नाजायन्त सलियश्चय काश्चिदमा ९ चह राजा मृग का पीछा करता हुश्चा वनम निकल 


स॒ कदाचिन्महाबाहुररण्येश्युसरन मृगम्‌ । | गया । षहोँ सिय के विलाप का शब्द सुना कि । ‡ 
श्राव शब्दमस़त्‌ त्रायस्वेति च योषिताम्‌", ४ ॥| “वचान्नो, वचाश्रो" ॥9॥ सग को चड़ कर राजा | 


॥ भेषीरित्वभापत ने का, “डसे मत, मेरे शासनम अन्यायमें परचत्त 
स षिहाय मृगं राजा मा भपीरिः | [ला ददि कौन दै १ ॥५॥ उस शने की 


मयि शासति दु्मेधाः कोऽयमन्यायदत्तिमान्‌॥४ ॥ ्रावाज्ञ का पीदा करता हृश्रा राजा चला । दसी "" 


न्दिताघुसारी च सर्व्वारम्भाविषातद्त्‌ । श्रदखर पर सव श्रच्छे काम के रम्भे कुटारा- ,. 
 ा श्रात करने बाला, विध्नोका राजा रद्र यद सोचने 


एतस्मिनन्तरे रौद्रो विघ्नराट्‌ समचिन्तयत्‌ ॥ ६ ॥| लगा ॥ ६॥ यह वलवान्‌ वती विश्वामिव्रजी तुल 
विश्वामित्रोऽयमतुलं तप आस्थाय बरी्यैवान्‌। | तपस्या करके उख विद्या को सिदध , करना चादते 


भवादीनां वियाः ७॥ द जो पदे शं आदि से भी न हो सकी ॥७॥ ¡+ 
भागसिद्धा भवादीनां विधाः साधयति त्ती ॥ ७॥| च न 


साध्यमानाः क्षमामौनचित्तसंयमिनाऽ्युना । | चित्त 1 शा रे दै । विचाये इनके मय से 
$ ९ श्रातं होकर है । अव मुभे क्याकरना, 
तावै भयार्ताः नदन्त कयं कमि मया ॥ ८॥ दिये ॥५॥ मिभ्वामिनयी भरति तेजस्वी ई 


तेजखी कौशिको वयमस्य सुदुब्बला; । | शरीर दम वड़ी निवल है, इस तरद डरकर विये ` ^ 
क्रोशन्त्येतास्तथा भीता दुष्पारं परतिभाति मे॥ ६ ।॥ रोती है । सभे कायं वड़ा कठिन मालुमहोता ३।६॥ 


क्का 
५५४ 


4 


२४ | . माकंरडेयपुराण ग्रु० ७ 
(~ --~--------------------------------------------- 
त माभेरिति वदन्‌ शह अथवा इस राजा मे जो यह कट्ता इत्या श्राया दै 
अथवाय छक पक्ष बर वदन्‌ $ कि भत योः प्रवेश कर अपने कायं का इच्छा 
हृममेव प्पिश्याश साधयिष्ये यथेप्सितम्‌ ॥१०।॥ सार शीघ्र साधन कर का ॥ ९० ॥ विष्नराल रौद्र 

यह विचार करते हृष राजां दरिश्चन्छे दे शरीर मं 
इति संचिन्त्य सौरेण विध्नशजेस वै ततः । | पेश कर ये अर राजाभी उनसे भभांवित होकर 


तेनाविषठो वृषः कोशदिदं वचनमव्रवीत्‌ ¦ ११|| कोध्क्त यह वचन बोले ॥ ११॥ यह पापी मतुप्य 
कौन दै जो वख की दोर से श्ण्नि को मारता | 


कोऽयं वाति वचचान्ते पाष पापडजरः । वलवाय्‌ ओर तेजगक्त मेरे खाने पर भी यह पाप 
वलोष्णतेजसा दीपे मयि पत्पावपस्थिते ॥१२ | क्म करता है ॥९य। अतः श्च मेरे धनुष के निकले 
कोऽ सक्कास्मुकाक्षेप-विदीपितदिगन्तरः । इय काण सखे तेय शरीर भिन्न भिन्न दिशाच्या कों 


वभित्रसव्गो दीनि © प्रप्त सो दीघेनिद्वामंसो जावेगा ॥१२॥ उस राजा 
शरविभित दीनि भेष्यति । १२ के यह वचन शुनकर विश्यामिज्न बडे करोधमें श्चाये 


= त्वच | पथितं होतें ~ 
विश्वामित्रस्वतः कद्धः श्रा तन्दर्तर्वघः । श्रौर छपि के कोधित होने पर ते विद्या क्षणभर 
रद्ध चर्षिवरे तस्मिन्‌ नेशर्धियाः क्षणेन ताः।॥१४॥| मे उनके शरीर से निकल गई ॥ १ ॥ वदं राजा 
स चापि राजा तंद्रा विश्वामित्रं तपोनिधिम्‌ | | दरिनद्र भी तपस्वी विश्वामित्र को देखकर रसे 


हं ल खदसा पीपल फे पत्ते के समान कंपने लया॥ ९५ 
1 { ॥ 4 भ ~ ९ [कप ४४ 
भीतः भवेषतात्यथ सदसाशवत्यपणत्‌ ॥१५॥ ऋषि ्रिश्वामित् ने राजा से कडा, ५त्‌ दुष्टात्मा है 


स॒ दुरात्मक्निति यदा इुनिस्तिष्ठेति चाजीत्‌। | खड़ा रह फिर सजा इस्श्चनद्र ने श्रत्यन्त चिनथ 
ततः स॒ राजा भिनयाद्‌ पणिप्त्यास्यभापत ॥॥१६।॥| पूवक प्रणाम कर उनसे कडा | १६॥ हे . भगव 
मगवन्तेप धर्मो मे नापराधो मम॒ भ्रमो | | यह्‌ मे धं दै, इसमे मेरा अपराध नहीं दे । दै 


सुने ! अपने धमं में लगे दुष मुम पर श्राप क्रोधेन 
पररि ख 
न ब्रोमहपि शुने निनयमभरतस्य भे ॥१७॥ करः 1 १७ ॥ धमात्मा राजा का यह धम है कि दानं | 


दातव्यं रक्षितव्यं धम्मन महीक्षिता । | दे शौर रला करे । धर्मशाल क श्मलुसार धटुपको 
चापश्वोचस्य यदव्य पस्पशास्चाुसारः ॥१८॥ धारण कर यु करना चादिये ॥ १८॥ 
विश्वामित्र उवाचं दिश्वासिजजी वोल्ले-- 


त दे राजन्‌ ! किसको दान देना चादिये.करिखकी 
दतिम्प ठ कस्य स्य क ) [६ 1 द्व्य्‌ पु प 
। र रयाः कयष्दन्यञ्चत्‌ छप । रक्ता करनी चाहिये चौर किंसके साथ युद्ध करना 


च यथ त्य चाहिये १ यदि तुको अधमे का डर है सो इसका 
्िममेततत्‌ समाचक्ष्व चचथम्ममयं तव ॥१६॥| नु 


हरिशचन्द्र उवत्व राजा हरिश्चन्द्र वोले- | 
दातव्यं पिभदुख्येभ्यो ये चान्ये ुशददयः । श्रेष्ट रिथ छो श्रौर भृशो को दान दियाजातां 


है, उरे इष लोगों की रता ` की जाती है, तथा 


र्ट [4 ताः [| कर्तव्यं [4 रऽ पमि # 
्या भीताः सदा युद्धं कततयं परियन्थिभिः २० व्ैरियो के साथ अद्ध किय जाता है ॥२०॥ * 
पवश्वामित्र उवाच ` विभ्कमिच्रजी वोल्े- 
यदि ् ~ भयान्‌ ग्रानधर्मसवेक्षते ४ 
¦ राजो मचान्‌ स॒स्थग्रान । यदि राप्‌ राजा है श्नौर सम्यक्‌ राजन्धमै का | 


0 । श पालन करते दै तो में बाह्मण ह शौर दच्छाकरताहं ` 
नि्वष्टुकामो विभोऽं दक्षिण ॥२१॥॥ सुमत श्रमी दान दीज्यि॥९॥। ` ` | 


पत्ति स क्ली बोले- 
एतद्राजा वचः; श्रुत्वा प्रहृष्टेनान्तरात्मना । रजा यह चेचन सुनकर मन मे वहत प्रसन्न 


पुनजातभिवात्मानं मेने राह च कौशिकम्‌ ।२२।| च! ओर अपना दूसरा जन्म हुआ देखा समसः 
इरिधन्द उनाच कर पिश्वाश्ये्र से वोज्ला॥ २२॥ । 


हरिश्चन्द् वाले-- 
उच्यतां भगवन्‌ यत्‌ ते दातव्यमविशङ्खितम्‌ ! दे भगवन्‌ ! आपो जो कु चाये. ` 


नन्व 


9 
म 


॥ भीष 


०७ ४ माकरएडेयमुराण २४ 


स तर. स्री, दे. प्राण, गराल्य, नगर, ल्तध्मी जिस 
पाणा राज्यं पुरं ल्मीयदमिेतमात्मनः ह ची की हो ॥ २४॥ 


विश्वामित्र उत्राच चिष्त्ामिच बोक्ते-- 
राजन्‌ प्रतिग्रहीतोऽगं यस्ते दत्तः प्रतिग्रह हे राजन. ! यट जो श्चापने दियासो मैने जिया 
परयच्छ प्रथमं तावदक्षिणां रनघुयिकीम्‌ ॥२५॥ परन्तु पटिते मजसूयययवी दक्तिणा सुमे दो ॥२५॥ 
राजोवाच राजा ने कदा-- 
्रह्मस्तामपि दास्यामि दक्षिणां भवतो घम्‌ । वा 


वी ति । ध्रापनेकटी दै । हे विधवर । श्रव जो श्रापको 
तविथरतां तू यस्तवेष्ठः प्रतिग्रहः 1 २६ # परिय हो वह्‌ दान मांगियि 1 २६॥ 
| विभ्वामिच उवाच विश्वामिच वोले-- 
ससागरां धरामेतां सभूभृ्ग्रामपत्तनाम्‌ । सुद्र, पृथ्वी, पर्वन, श्राम श्रीर नगर तथा 
राज्यंच सकलं वीर रथाश्व-गजसंङृलम्‌ ॥२७॥| सेना, स्थ, रश्व, टाशरले युक स्पूं रज्य ॥२अ॥ 


गास्व कोपंच यदान्यद्ियते प्रौग दे निष्पाप ! कोषटागार, खज्ञाना तथा श्रपनी 
कोषठागारच कोपंच यचान्यदविधते तव॒ । | दौ, पन र शपे शरीर कौ दोदर ओ पथं 


विना भायाज्च ध्रै शरीरं तवानघ ॥२८॥ तमार पास है वह सथ ॥२८॥ शरगर तुय धमातर 
धम्पच्‌ वधम यो यान्तमनुगच्छेति । | हयो श्रीर धर्मं को जानते हो तो श्रथिक कमै से 
बहुना वा कक्तं न सव्यमेतत्‌ भदीयताम्‌ ॥२६॥| क्या जो कद मैने कटा दै वह सव मु दो ॥२६॥ 
। पक्तिण उचुः पती वोल्ते- 
भहृष्टेनैव मनसा सोऽधिकारयुखो परप । राजा ने श्रति प्रसन्न चित्त शोकर उस ऋषि 
= यह वचन सुने श्रोर हाथ जोड कर कटा कि पेखा 
तस्यपवेचनं श्रुत्वा तथेत्याह ृताज्जलिः ॥२०। दही दोगा ॥ २०॥ 
निश्वामिन्न उवाच विश्वामित्र चोज्े-- 
स्वंसं यदि मे दत्तं राज्ययु्वीं वलं धनम्‌ । यदि राज्य, रथी, सेना, धन श्रादि सर्वं 
४ = द वि सुभेदेद्वियाहैतोश्रापक्राइखपर कोर प्रभु 
मथतवं कस्य राजप राज्यस्थे तापसे मयि ॥२१॥ नदीदि श्रीःवप्रय श्राप इस याज्यते कयो उदर्तेरो॥ 
हरिश्चन्द्र उच दसरिथिन्द्र चले- 
यस्मिन्नपि मयाकाले वब्रहमन्दता वसुन्यरा । दे ्ञ्न्‌ ! जिस समय सते इस परुची छरा रान्य 
£ श्रापको दिया उख समय से श्रापदी इसे स्वामी 
तस्मिसि भपान्‌ स्वामी किषएताय मदीपतिः२२॥| है । मै श्रव राजा नदीं ह ॥३२॥ 


विश्वाभि उवाच विश्वामित्र वोले-- 
यदि रजस्या दत्ता मम सर्ववां बरन्धरा। ् श सुभेदेदिया नो शरी प्र 
यत्र धू | तर न्तम ¡| मेस स्वामिन्व दगया । श्रतः छव च्रषि यद्‌ ४६। 
न र व ४ मानिष ह तुमसि। ।९२ निकरे ॥३२॥ श्रोणी सूज, कपष श्रौर ज्र सथं 
भाएपसुतरा्कल युक्त्वा भूषणतग्रहम्‌ । | याँ उतार कर बहल वस्र धारण कारे श्रपनी.- 
तसूषरछलमवध्य सह पर्या सुतेन च ॥२३४॥ शरी श्रौर पुत्र फेः साथ चले जाद्ये ॥ ३४॥ 
पक्तिण उचुः पदी बोले- 


पक्ता छः ध चिध्वासिच मुनिका चह करना भी फक याजा 
मन्त्‌ 2 
तथेति चक्त्या ङृत्वा च राजा गन्तं मचक्रमे। सस्व रती सी धया सग पुन फो काय 


स्वपल्या शन्यया घाद वालकेनात्ममेन २।२५॥| लेकर चले ॥ ३५॥ अनि दर गजा फी गाद्‌ येक 
तरनतः स ततो रदृध्वा वन्थानं भह तं ग्रपम्‌। कर विण्यानिशरने सजा स कदया-"यजस्य यङ 


२६ भकेर्ठेयपुराण ` अ०७. 


ह यास्यसीत्यदचचा से दक्षिणां रानसूयिकीम्‌।३६॥ मसी दक्षिखा धियि विना कदां जते दो {” ॥२६॥ . 


इस्धिन्द्र उवाच हरि्चन्द्र वो | 
परगवन्‌ राज्यमेतत्‌ ते दत्तं निहतकण्टकम्‌ । | दे भगवन्‌ ! मैने निष्कंटक राज्य तो -आपको 
प्रवशिषटमिदं ब्रह्मन्च दैह्यं मम ॥३७।॥ ३ दिया । अव मेरे पास ये तीन देददी वचे है।२७॥ 

विश्वामिच उचाच विश्वामिच बोक्ते- = 
पथापि खलु दातव्या त्वया मे यत्दक्षिणा । | तौ भी तुमको मेरी यक्ञ-दक्षिणा श्रवध्य देनी -" 


चाये । विशेष कर ब्राह्मणः को वायदा करके न 
विशेषतो बाह्मणानां हन्त्यदत्तं भतिश्चतम्‌ ॥२३८॥ देने से पुरय का क्षय होता है ॥द८॥ जव तक राज- 


यावत्‌ तोषो रानघ्ये बराह्मणानां भवेनहप । | खय य मे बाहा की संतु नही होती दै तव 


तक राजसूय यज्ञ की दक्षिणा देनी चाहिये ॥ २६॥ 
हावदेव तु दातव्या दक्षिणा राजष्ूयिकी ॥२६॥| थम तो तुमने ही कडा था कि भ बाह्मणौ को 


रतिश्रुत्य च दातव्यं योद्न्यश्वाततापिमिः । | दान देता ह, आततायियो से युद्ध करता दह तथा 
रक्ितव्यास्तथा चात्तास्त्वयेव प्रार्‌ परतिभ्रतम्‌ ४०।| आतंजनों की रक्ता करता टं ॥९०॥ 

हरिश्चन्द्र उचाच हरिश्चन्द्र बोले-- | 
भगवन्‌ साम्पतं नास्ति दास्ये कालक्रमेण ते। हे भगवन्‌ !दससमय मेरेपास ऊ नर्द 


काल वीतने पर दुगा । हे व्रह्मपिं ! मेस सद्धादं 
प्रसादं इर्‌ बिर्ष सद्वावमसुचिन्त्य च ॥४१।॥ विचार कर मेरे ऊपर छपा क्षीजिये ॥५१॥ 
विश्वामित्र उवाच विश्वामित्र वोल्े-- ध । 

; भतीध्यस्त हे राजन्‌ ¡ वह अवधि दै उसे प्रव्यक्त 
िम्ममाणो मया कालः पतीरयस्ते जना । कर शीध् वताच्मो, अन्यथा मेस शापाग्नि तुमको . 
शीघ्रमाचक्ष्व शापाभरिरन्यथा त्वां परध्यति ॥४२ भस्म कर देगी ॥ ४२॥ 1 
। इरिशन्द्र उवाच हरिन वो्ते-- ) 

मासेन तव विपरष प्रदास्ये दक्षिणाधनम्‌ । हे ब्रह्मपिं ¡ आपकी दक्षिणा प्क महीने 


दुगा इस समय मेरे पात धन नदीं है, च्व श्राप 
साम्पतं नास्ति मे चित्तमनुन्ञां दातुमर्हसि ॥४३॥ सुमे त्राचा दीजिये ॥ ४३॥ ~ 


विश्वामित्र उवाचं , | विश्वामित्र वो 
गच्छं गच्छं टूपश्रष्ठ स्वधम्ममनुपालय । हे गरष श्रे ! जाश्रो, जाश्यो. अपने धमे का 
1 व, पालन करो 1 पका भागं म कल्याण हो तथा 
ध्वा भवतु मा सन्तु पौरपान्यनः ॥४४॥| आपके.मिन्न न दों ॥ ४४॥ 
पक्लिण उखः पक्षी वोले-- 
अलुङ्ञातच गच्छेति जगाम बसुधाधिप! । ` | ` , इस भकार विभ्वामिगर छौ आन्ञा पाकर जा 


दरिश्न्द्र पेदक्ञ रवाना हृष श्रौर उनके पीपी 
पद्वयामनुचिता मन्तुमन्वगच्छत तं परिया ॥४१॥ उनकी रानी जाती थी ॥७५॥ उस राजा को रानी 


ष ओर पुत्र के साथ नगर से वार निकल कर जाते 

ते खभब्य तरप 5 
पश्र नियानं ससुतं एरात्‌ । दुष देखकर राजा के श्रजुयायीं श्रौ? पुरवासी 
दष्टा परचुक्रुशः पारा राह्थवाञ्ुयायिनः ॥४६॥| लोग डौडे ॥ ४६ ॥ चौर डे दुःखित होकर करने 


-हे नाथ '! हम लोगों को आप क्यो छोड़-करः 
हा नाय क नहास्यस्मान्‌ सित्या्िपरि 1 0 
म ४ पीडितान्‌ जाते दो ? हे राजन्‌ ! राप चडे धर्मात्मा हं तथा 
त्वे धम्मतत्परा राजन्‌ पोराटुग्ररकृत्‌ तथा ४७] पुरवासियों पर सदा .्नु्रह रखते हो” ॥ ४७॥ 


-नयास्मानपि रान यदि .धम्म॑मयेक्षे । | र राजभ! यदि धमं का विचार करके आप न 


हरं तो है राजन्‌ ! एक क्ण तो उहरिये जिससे. 
श्त तिष्ठ॒ रजेन भवतो युखपड्कनम्‌ ॥४८ । धम शपे कमलरूपी सुख का.॥ ४८ ॥ रसाखादन 


अण्-५ ९, 
ध माकरदेयपुराण २७ 


= शश नवर 

पिामो ने्भरमरैः कदा द्रष्यामहै पुनः । | अपने मर रूपी न्को कराम । आपको फिर 
यस्थ प्रयातस्य पुरो यान्ति पृष्ठे च पार्थिवाः ४६। 1 जिसके पीपी राजा लोग 
तस्यादुयाति भार्येयं शदीत्वा बालकं शतम्‌ । ह 


। केवल भायां ही चल र्दी दै । जिसके आगे पदिते 
यस्य भृत्या; यातस्य यात्यग्रे इजञरस्थिताः ५०॥ ५८ पर यढकर्‌ सेक्गण चलते थै, वे राजा 
स एष पट्भ्यो रणेन हरिन्रऽ्य गच्छति । | नौर ल 1 दा जन्‌ आ 
हा राजस्‌ चमार दभ श्रौर आपकी सी चनौर बालक कोमल द ॥ ५०॥ 
न भु एत्वचछनसम्‌ ॥५१।| ॥ ५९॥ मागं की गै जव सुख पर पडेगी तव 
प्रथि पाथ खं कीरम्भविष्यति । प्रापकी कैसी दशा दोगी १ हे महाराज ! श्राप यदीं 
तिष्ठ तिष्ठ शरपश्ेष्ठ स्धम्मैमलुपालय ॥५२॥ उद्रि ओर श्रपने ( राजोचित ) धमे का पालन 
द्दृशंस्यं परो धर्मः क्षत्रियाणां विरेपतः । सनि 1 9 
=, ति ््ैरथापि + तत्रिया का । हे नाथ । सी, पुर, रथ, 
रि क किं सुतेन धनै चा ॥१३॥| धन, धान्य से क्या १।५३॥ हम दन ५८ त्याग 
सव्वभेतत्‌ परित्यज्य चायाभृतां वयं तव । + र भे १ ५ {साथ रदेगे । 
५, नाथ । हे महाराज । हे स्वामिन्‌ {' हमको श्राप 
हा नाय हा महारान हा स्वामिन्‌ किजहासि न; ५४ क्यों छते ॥ ५४॥ जद राप दोगे वदी दम 
यत्रतत्र हि बयं तत्‌ सुखं यत्र वै भवान्‌। होगे, मकरो छख व ही है जद आपटे) अदां 
नगरं क यत्र स सर्गो यत्र नो दषः ॥५५॥| ~क बद नगर शर बही ॥ ९५॥ यजा 
हति पौरवचः । † का यदह बचन सुनकर राजा शोक से पीडित 
अरि ला रना शोकपरिप्लुतः } | हण तथा उनके ऊपर दया करके भागं मे उस 
त्‌ स तदा माग तेषामेवासुकस्पया ॥५६॥ समय ठहर गये ॥ ५६॥ विश्वामित्र भी उनको 
मिश्वामित्रोऽपि तं टटा पौरवाक्याहलीकृतम्‌ मजाजनो के भरेम भे मेडल देखकर बोध से अं 
रोपाम्षविहताशषः समागम्य वचो्नयीत्‌ ॥१७।॥ वयल त्‌ भ न व 01 
पिङ्‌ त्वां दृष्टसमाचारमदृतं जिहमापणम्‌ । अ त क 
त्व & ४ कर अव उखे वापिस , 
मरम राज्यञ्च द्वा यः पुनः माक्रष्टुमिच्छसि ४८॥| लेना चाहवे हो ॥४८॥ विश्वामित्रे रोप मरे वचन 
इत्युक्तः परुषं तेन गच्छामीति सपेपथः | भु ने कंपते हष का किं जाता 
ज्वभेवं ययौ ९ ४.२ है । ओर शीर श्रपन खली का हाथ सीचकर 
वभवं यौ शी्रमाकपन्‌ दयितां करे ।॥५६॥| चलने लगे ॥ ५६॥ खम से करित, इमास, 
कपंतस्तां ततो भाय स्मारी श्रमातुराम्‌ । | यायै को भिखका हाथ कि राजा ने सचा था, 
सहसरा दण्डकाष्ठं न तादयामास कौशिकः ॥६०॥ ५ ख्या काड के डंडे से मारा ॥ ६० ` 
तां तथा वादितां शा हिनो महीपतिः उसको इस भकार डंडेसे पिर इ देखकर «ग " 
र हरिथन्रो महीपतिः । , | दरिथिन्द्र दुःख से श्रातं होते प भी ङं न घोले 
गच्चामीत्याह दुःखात्तो नान्यत्‌ किचिदुदाहरत्‌६१॥ केवल यदी कदा कि जाता हँ ॥ ६९ ॥ इसे ५५ , 
ञ्रथ धिश्च तदा देवा; पंच प्राहुः एपालवः । | रपाल पचि विश्वदेवं साजा दरिशचन्द्रकी वद २ 
विश्वामित्रः सुपापोऽयं लोकान्‌ कान्‌ समषाप्स्यति९२ र २ व क | 
| येनायं यल्यनां ष्ठ सराज्यादवरोपितः | रजी { यदह पाष दहै, श्रपणे क्या कः ह ६1... 
कस्य वरा शरद्धया पूतं शुतं सोमं महाध्वरे । 


॥ ६२ ॥ ये राजा यज्ञ करने बालो मे धरे दै तथा} ^ 
इसने श्चपना राय्य श्ापको दिया दै 1 चराप्रने क्या “ 
पीत्वा वयं पयास्यामो शरदं मन््रपुरःसरम्‌ ' ६२॥ 
पक्षिण उचुः 


यक्षे श्रद्ध पूर्वक सोमरस नदीं पिय!१ हम लोग 
६ श्रानन्द पूर्वक सोमरस पीकर आरे ६" ॥६३॥ 
इति तेषां वचः भुता कौशिकोऽतिरपान्वितः 


पत्ती वोल्ि-- त 
उनके यह वचनं सुनकर विश्वामित्र -५ 


# २ । माषौरडेयपुराण भ्र ८ 


---------------------------------- 


[शाप तोन भुय स यूयमवाप्सवथ ॥६४॥ मु हो जत्र ॥ ९४ ॥ उने विनय करते प्र 
सादित तै ह एन भंएनिः । सन्न होकर मदाभुनि विश्वामित्रजी ने कडा किं 
्रातुषत्वेऽपि भवतां भवित्री नैवं सन्ततिः ॥६५। । न होमी ॥६५॥ तुम खी के संसगे से वच रोगे 
न दारैव ममता न च मत्सरः । | वया मत्सरो श्र का को से च होते इ 
कौ निम्कत भिष्य ¦ पनः । पुनः देवता दो. जाश्रोगे॥ ६६॥ वी पाचों बिश्व 
विनिम्ु्ता िष्यय चुर मनि ० १ दैव कौरव छल मेँ द्रौपदी के गभ से उत्पन्न पचा 
ततो्वतररशः सदेवा इवेश्मनि । | पारडव-पुत्र हण ॥ ६७॥ इसी कारण से वे पाचों 
्रीपदीगभसम्भूताः पंच वै पाण्डुनन्दनाः ॥६७॥ मदारथी पाएडवपुत् श्रविवाहित दशा मंदी महाः 
एतस्मात्‌ कारणाद्‌ पंच पाएढेया महारथाः | नि १ कार ० राप 
स ¦ ॥६८॥| इदम हे जेमिनिजी ! इसप्रकार श्रापसे पारडव 
न दारसगरह आ शापात्‌ सस महामुने ५ पुनो की कथा कदी श्रौर श्रापकरे चासो प्रश्नों का 
एतत्‌ ते सव्वमार्यातं पाएडयेयकयांयम्‌ । | उत्तर दे दिथा, श्रव श्रौर क्या सुनने की 
रश्च चतुष्टयं गीतं फिमन्यच्छोतुमिच्छसि । च्चा है १ ॥ ६६॥ . 


इति श्रीमाक॑रडेयपुराण भे द्रौपदेयोते्॑ति नाम सातवँ श्रध्याय समापन 


आखा अध्याय 
जैमिनिरुवाच जेमिनि वोक्ते- 1 ष 
भवद्भिरिदमाख्यातं यथामद्नमयुक्रमात्‌ । जिस प्रकार मने प्च किया था उसी भकार 


मह कौलं मेऽस्ति हर्थिनद्र कथां भति ॥ १\॥ बरसे प्रापने उत्तर दिया । परन्तु 'धीदंसिशन्् ` 


की कथा भे मुभे वडा कौतूहल . हा ॥ १॥ हा ! 
अहो महात्मना तेन भाप वृच्छमरुत्तमम्‌ । | उन महात्मा ने चड़ -दुःख पाया । हे श्रेष्ठ पक्छियो ! 
कित्र युखमतुपाप ताहगेव द्विजोत्तमाः ॥ २\॥ उन्दने फिर कख खख पाया या नदीं ॥२॥ . . 

, परि उचुः | पती वोले-- 


ह # 


: विश्वामित्रवचः शरुत्वा स राजा प्रययौ शनेः। हे जैमिनिजी ! विश्वामित्र येह वचन सुन 


शेन्ययानुगतो दुःखी भाय्यैया बालपुत्रया ॥ ३॥ त पत्नी शैव्या तथा पुज सदित 
स॒ गला षुधापालो दिव्यां वाराणसीं परीम्‌। -ीर रागे चा ॥ २॥ वह्‌ राजा दिष्य काशी 
नैषा मनुप्यमोग्येति शूपाणेः परिग्रहः ॥ ४ 


साति ५ कैलाश परह ॥४॥ दुःखसे श्रातं पनी अनुकूल खी 
जगाम पटुभ्या दुखात्तः सह्‌ पल्यानुद््लया | 


के साथ पैदल जाकर उसने नगर मेँ. प्रवेश कर 
पुरीपरवेशे ददृशे ` विश्वामित्रमुपस्थतम्‌ ॥ ५॥ देला कि विश्वामित्र भी बह मौजूद ॥५॥ उनको 
त॑र समनुपराप् विनयाबनतोऽमवत्‌ । ` | वहो मौजूद ह्या देखकरः हरिः बिनयपूर्वक 
प्राह चैवा्चलिं छता हरिथन्द्रो महायुनिम्‌। ६।॥| दाथ जोड़कर महामुनि विश्वामित्र से वले ॥६॥ 
हमे भरणा; सुतथांयमियं पत्नी एने मम । , | ये भर माण पुत्र छर खी ह । दे नि ! इनमे से 
येन ते कत्यमस्त्याशु तदग्रदाणाय्यैमुत्तमम्‌ ॥ ७ ॥ जिसको श्राप चा ले लीजिये ॥७॥ अरथा हमारे 
। ९ दनातमहपिः | ८ लिये जो कुच आप आज्ञा करे बह हंम करने को 
 यद्रान्यत्‌ क ॥ ८ ॥| तैयार है ॥-८॥ -. : ध 
वामत्र उच्च विश्वामिनजी [3 
पूर्णः स मासो राजर्षे दीयतां मम.दक्षिणा । , 1 


दे राजर्षिं ! षक मदीना व्यतीत दोगया, - सुमे, 


पुरी को गया जोकि मटेष्य लोक मे न होकर 


# १ 


राजानं व्यालं दीनं चिन्तयानमधोगुखम्‌ । 


श्र माकंर्डेयपुराण २६ 


निमितं ह स्त स्वव | दीजिये । राजख्य की दिशा के विपय 
राज हि सम्यत खवचो यदि ॥ ६ ॥ मे जो श्रापने वचन दिया था वह स्मरणदैया 


नहीं ?॥ ६॥ 
हरिन बोले- 

ड बरह्मन ! अभी सम्पण मास नदीं व्यतीत 
हा है । हे तपोधन ! अभी श्राधा दिन वाङ्गी है, 
इसलिये परतीत्ता कीजिये ॥१०॥ 
चिश्त्रामित्न बोले - 

हे राजन्‌ ! ेखा दी दोगा । मै फिर श्राङ+गा ] 
श्रगरः ्चाज नहीं दोगे तो तुमको शाप दुगा ॥११॥ 
पक्त बोल्ञे - 

यह कहकर विश्वामित्र चले गये तथा गजा 
तओोचने लगे । कटी इद दक्षिणा मे किंस तरह से 
दुगा ॥१२॥ मेरे मित्र काँ है १ मेर घन कट है ? 
यदि श्रा ने दिन दी तो सुमे रौरव न्व 
मे जाना पड़गा ॥ १३॥ कया मे श्रपने प्राणों को 
त्याग दु, थवा की-चला जाऊ ! श्रगर विना 
दक्षिणा द्यि मर जाऊ नो ॥ १४॥ ब्राह्मण के 


८ दरिथन्द्र उवण्च 
व्रह्मन्धेघ सम्मूर्णो मासोऽम्लानतपोधन । 


तिष्ठतयेतधविनाद्ध यत्‌ तत्‌ परतीक्षर मा चिरम्‌॥॥१०॥ 
विश्वामिन्न उवाच 
एवमस्तु महाराज श्रागमिष्याम्यहं पुनः) 
शापं तव प्रदास्यामि न चेद भदास्यसि ॥११॥ 
पक्िण उचुः 
इत्युक्त्वा परययौ विप्रो राजा चाचिन्तयत्‌ तद 
कथमसौ प्रदास्यामि दक्षिणा या भरतिश्रुता ॥१२॥ 
कृतः पुष्टानि मित्राणि इतोऽयैः साम्पतं मम। 
प्रतिग्रहः भदु्टो मे नाहं यायामधः कथम्‌ ॥१२॥ 
कि भरणान्‌ नियंचामि कां दिशं याम्यर्िचनः । 
यदि नाशं गमिष्यामि मदाय प्रतिश्रुतम्‌ ॥१४॥ स्वत्व को दरण करके पाप वश श्रधम कीट हो 
ब्रह्मस्व कृमिः पापो भविष्याम्यधमाधमः | जागा । श्रथवा श्रपने को वेचकर रक्षिण दे 
अथवा भेध्यतां यास्पे वरमेवात्मयिक्रयः ॥१५॥॥| देना उत्तम दै ॥१५॥ 
पद्िण उचुः पत्ती वोले- 


भल्युवाच तदा पत्नी वाषगद्वदया गिरा ॥१६॥ € देखकर गनी ने रोते हप स्थे इणः करट से 


चिन्ता त कहा ॥१। हे महागज ! चिन्ता को छोडकर - < 
त्यज चिन्तां महाराज स्वसत्यमनुपालय । | का पालन करो । सत्यसे वदिष्छृत मवुष्य श्मशान 


शमशानवद््जनीयो नरः सत्यवदिष्ृतः ॥१७।॥ की तरद्‌ बरजैनीय दै ॥६७॥ श्रवण्न ह पुरुषि । - 
नातः परतरं म्प वदन्ति पुरूपस्य तु | पुव्य को ज्रपने 1 करने के ४ 
- परम धम दुखा कोई नदीं है ॥१८॥ अग्निहोत्र, । 
यादृशं पुषव्याघ्र स्वसत्यपरिपालनम्‌ ॥ १८॥ सव्याय, तथा दानादिक सम्पू यायं, , 
अधिहोत्रमधीतं वा दानाया्राखिलाः करिया | व्यक्ति कौ निष्फल हो जाती दै जिखका कि ५ 
भजन्ते तस्य वैफसयं यस्य वाक्यमकारणम्‌ ॥ १६।॥ मिथ्या होता है ॥ १६ ॥.ध्मेशाखो मे बुद्धिमानों 


तन्तएदिं ^ ~ व्य को मश्चष्य के तारने के लिये अत्यन्त <" 
। | | सत्य को मद्य के तारने, र 
सत्यम धरम्मशसेपु धीमताम्‌ वताया है, उसी प्रकार हठ को मञुप्य का 


तारणायाव्रतं तदत्‌ पातनायाङरतात्मनाम्‌ ॥२० | करानमे श्रति निष्ट बताया है ॥२०॥ सात अश्व , 
सुक्ाश्वमेधानाहूत्य रानसूर्यंच पार्थिवः । मेध त व व ध 
कृतिर्न च्युतः ५ वार श्च | ए. 
सरोद रानी उदन करने लगी 1 श्रपनी आखा मे आरः 
वाष्यास्युप्लुतेत्रान्ता्वाचेदं महीपतिः ॥२२॥ भरकर मह्याराज दस्र अपनी सीसे चोले॥प- 
हरिश्चन्द्र उवाच हरिश्चन्द्र वोले-- 
विषंच भद्रे सन्तापमयं तिष्टति वालकः । हे भदे ! षस सन्ताप को छोडो, यँ ८५ 


॥। 


। ५५ 


राजा फो व्याल, दीन श्रौर नीचं सुख कयि ` 


~ छ न ~ 


[न ० म्र 


३० भा॑रुडेयपुराण 2 


= 


। पुत्र वैढा है । हे गजगामिनि ! जो ऊं तटं 
उच्यतां ववतुकामासि यद्रा त्वं गनगमिनि॥२३॥ कहना हो चह को ॥ २६.॥ 


पलन्युवाच पत्नी बोली-- 
रानन्‌ जातमपलयं मे सतां युज्रफलाः क्षियः हे राजन्‌ ! मेरे सन्तान हो चुकी, चखियां पुत्र 


मू फलके क्लिये ही दोती ह । इसलिये सुमको वेच 
स मां मदाय विततेन देहि विमाय दक्षिणाम्‌॥२७॥| कर आहय को द्विश दे दीजिये ॥ २४॥ 
पण्‌ पक्षीगर बोले 
एतद्राक्यधुपशरुत्य ययो मोहं महीपतिः । रानी का इसे करार वचन सुनकर जाको 


च ;खितः मूलो श्रागई । फिर होश में श्राकर रति 
भतिलभ्य च दं स विललापातिटुसितः हय विललाप करने लगे ॥२५॥ हे भद्रे !. यद यड़े घोर 


` महहृदुःखमिदं भद्रं यत्‌ त्वमेवं त्रवीपि माम्‌} | इःखलकी वात दै कि तुम रेलाकटती दो । कया | 


(य विसता प्रपते 
पा मम पापस्य ५।२६॥ तुम्दारे देसी से क्त बातालापको भी मे श्प 
: किं तव स्मितसंलापा मम पापस्य विस्फताः पाप के कारण भल गया !? ॥२६॥ डे शुभानने ¦ 


हा कथं लया शृकयंवक्तमेतच्छचिस्मिते। हा! तुम इस थश्रार कैसी किन गत कह रदी 
। दु्व्वाच्यमेतद्वचनं कतु शक्रोम्यदं कथम्‌ ॥२५७।॥ हो ? मै किख भकार तुम्हारे दस दुव चन का पालन 
इत्युक्तवा स नरश्रेष्ठो धिग्धिगित्यसटृटुत्रवन्‌] | करः ख्थुगा १॥ २७। वे महात्मा राजा यह ककर 


+ श्रपने को ्रनेक वार धिक्ञारने लगे ! तथा मुच्छ 
निपपात सहीृष्ठं॒मूच्छंयाभिपरिप्लुतः ॥२८॥ द 


शयानं चवि तं दट्ा हरिन महीपतिम्‌ । | को भूषि पर गिर हा देखकर श्रत्यन्त दुःखित 
उवाचेदं सकरुणं राजपत्नी सुदुःखिता ॥२६।॥ हो रानी करूणा पूर्वक वोली ॥ २६॥ 

पल्सुवातच रानी वोली-- । 
हा महाराज कस्येदमपध्यानुपस्थितम्‌ । महाराज ! किस लिय श्राप इस पकार 


सूर्धित होकर पृथ्वी पर गिरे हो ? यदि आपदी 
यत्‌ तवं निपतितो भमौ राङ्कवास्तरणोचितः।।३०। इस तरह करेगे तो साधारण मलुष्यों की क्या 

गिनती है ? ॥३०॥ जो मेरा खामी प्रथ्वीपति 
येन कोच्यग्रगो वित्तं बिमाणामपवन्मितम्‌ | 
स॒ एष पृथिवीनाथो भूमो स्वपिति मे पति;॥३१।॥| चह चाज भमि पर श्यन करता है ॥३१९॥ हा 

१ भ क न यन 1 

यदिन्रगरतसो्यं नीतः भापनी दशाम्‌ ॥३२॥ को भात हया ।द२॥ यह. वकर बह रानी 
इत्युक्या सापि सुश्रोणी मूच्छिता निपपात ह ] | खामी के दुःख रूपी मदा सहा भार से पीडित 


भ्त दुःखमहाभारेणासघ्न निषीडिता ॥२३॥ स दोग द प्ली परर पड़ी ॥ 
मति खर प्ति दनाका अनध क्म तरह भाय 
तौ तथा पतितौ भूमावनाथौ पितरौ शिः पर पडे ह देखकर शरत्यन्त भूख से पीडित ोकर 
दृष्टात्यन्तं सुधाषिष्टः भाह वाक्यं सुदुःखितः ।॥२४॥ ध ॥ २७ ॥ स ¡ सुशको अन्न 
दीजिये, हे माता ! सुभको खाने क लिये दो, मुभे 
पात्‌ तात ददस्वन्नमस्वास्ब भोजनं दद्‌ | वड़ी भूख लगी है तथा मेरी जिहा का अघ्रंभाग 
न्मे बलवती जाता जिहर ष्यते तथा ॥२५॥ सखा जा रदा है ॥ २५॥ 
। पन्िश-उख | पत्ती वोले- 
.एतस्मित्रन्तरे भराघ्रो विश्वामित्रो महातपाः । इसी समय तपस्वी विश्वामि्र भी वहाँ भा 
त तं हरिन पतितं शि मूचितम्‌ ॥३६॥| पच ओर टी पर शन्त पडे हर्‌ रजा 


दरेश्वन्द्र को देखा ॥ ३६.॥ वे जल के 
स॒ वारिणा समभ्युक्ष्य रानानमिदमव्रवीत्‌ । | कर राजा दसिन्द्र से बते ५) व 


०८ माकंण्डेयपुराण ३१ . 


--- ---~------------------ -- -~~--. 


उतिष्ठोतिष्ठ राजेन तां ददस्वेष्टदक्षिणाम्‌ ॥२७॥| उघे श्रौर मेरो दकिणा सुमे दो ॥ ३७॥ ऋर को 
शरणं धारयतो दुःखमंहन्यहनि वदधते । | कयम रखने से दिन-दिन ल बदृता है, जिख 


भकार वरं से जल शनैः शनैः उणएडा होतादी ज्ञाता 
आप्याय्यमानः स तदा हिमशीतेन बारिणा॥२८॥ ड ॥२॥ दोश मै श्राकर राजा बिश्वामिन को ठेख 


श्रवाप्य चेतनां राजा विश्वाभित्रमवे्ष्य च । | कर फिर मूषित होगा । इससे शुनि विश्वामित्र 
पुनमोहं समापेदे स च क्रोधं ययो शनिः ॥३६॥ बहत ष १ ॥१६॥ फिर ५ 
स + द्रनोचभः राजा को होश मे लाकर यह वचन ध्यदि 
स समाश्वास्य राजानं वाक्यमाह द्विजोत्तम छो वत शा निवार ॥ तो पि 
दीयतां दष्षिणा सा मे यदि पभमवे्षसे ॥४०॥| रो ॥४०॥ सत्य से सूं कामान्‌ दै, सत्य से 
सत्येनाकः प्रतपति सत्ये तिष्ठति मेदिनी । | दी पथवी ठ्ठरी इ दै, सत्य को ही प्रम धम 
सत्यश्वोक्त' परो धभ्मैः स्वगे सव्ये प्रतिष्ठितः ४१। का है ओर स्वगं 9 । 
धसुहस्र ४ एक हजार अश्वमध का पक शरोर श्रर सत्य 
अश्वमेषसहस्तश्च सत्यंच तुलया धतम्‌ । दृखरी श्योर तुला परः रखिये, जार शश्वमेध यज्ञ 
अश्वमेषसहसार्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥४२।॥| ऊ पुश्य से सत्य अधिक वैदेया ॥४२॥ श्नथवा सुस 
अयमा किं ममैतेन साम्ना भक्तेन कारणम्‌ । | यद सव एक दु, पी, रूर शीर मड रे सामने 
नाय्य पापसङ्कसपे रर चायृतबादिमि ॥४३॥ क्यों कहना चाद्ये १॥४२॥ हे राजन्‌ ¡ तुम मे 
त्वयि राज्ञि भवति सद्भाव; श्रुयतामयम्‌ । | सद्ाव मौजूद है इसलिये मेरी खनो । यदि तुम 
शरद्य मे दक्षिणां राजन्‌ न दास्यति मवान्‌ यदि रान भेरी दक्षिणा न दोगे तो ॥४४॥ सुरया होने , 


= ल पर तमको निश्चय ही शाप दंगा । देतना कहकर ` 
शरस्ताचलं 1 शप्स्यामि व ष्‌ । वह विभ विशवामि्नजी चलते गये श्रौर राजा भी 
इत्युक्तया स ययो विमो राजा चासीद्रयातुर)४५।॥| भय से विल दोगयेः ॥ ४५॥ ।राजा ने कडा कि 


{५ कान्द्गमूतोऽ्यमो निःस्वो गृशंसधनिनार्दितः। | मेरे समान द, श्रभागा, निर्दयी तथा ऋरब्रस्त 
भाय्यस्य भूयः भिदं क्रियतां वचं मम ॥४६॥ 1 दै १ ने कटा स श 
मरा शापानलनिरदः पंचत्वषुपयास्यसि । | करद = सुत क च ॥ ४९ शपि क 


ह 0 मै दग्ध होकर रत्यु को प्राच नदो जघ्न । दस 
स तथा चोचमानस्तु राना पल्या पुनःपुनः।॥४५७। प्रकार पत्नी के वार वार भरणा करने पर ॥ ४७॥ , ४ 


प्राह भद्र करोभ्येषप विक्रयं तव निधरणः | साजाने कटाहे अद्रे । मे तमको वेचनेका घृणित । 
शतैरपि यत्‌ करतु न शयं तत्‌ करोम्यहम्‌४८।| काम करुणा ¦ ओ काम कि इति निवी लोग भी | , 
यदि मे शक्यते वाणी ववतुभीटक्‌ सुदुर्वचः) नहीं करते है चह ओं करेगा “ ॥४८॥ यह कोर! ; 


भाव्य $ बचन कटने दी मेरी वारी मे शक्ति है क्या १ य 
' एवशुवत्वा ततो भाययौ गल्ला नगरमातुरः । काटकर स्री के साथ. शीघ नगर को गये श्रौर 


वाष्पापिहितकर्टकषस्ततो वचनमब्रवीत्‌ ॥४६॥| अशुशरोख कारश सं धे कठ यह बचनवोले ॥ 


१८ 


राजोवाच राजा बोले - ‡ 
५ भो भो नागरिकाः सर्वै शृणुध्वं वचनं मम । हे नागरिको ! श्राप सव मेरे बष्वन को खनो ! ,: 


. | यह क्या पृकतेदोकिमैकौनर्हं१ मे पक न्‌. ", 
कि मां पृच्छथ कस्त्वं भो दशंसोऽहममातुषः ५०॥।॥| शौर मदप्यता से हीन व्यक्ति दँ ॥ ५०॥ 4 + : 


; षा ` | किन राप्तस तथा उससे भी अधिक पापी ह ५ 
राक्षसो घातिकठिनस्ततः पापतरोऽपि वा । शनी जी को वचने तो ववार ह जर वो क 


विक्रेतुं दयितां भाक्तो यो न भराणांस््यनाम्यहम्‌५१ नहीं त्यागता दह ॥९१॥ यदि किसी को मेरी भाण" 
यदि बः कस्यचित्‌ कायं दास्या भाष्या म॒म] | भिया को दासी के रूप मे लेना हो तो पीघ्ता से 
स व्रवीतु त्वरायुक्तो यत्‌ सन्थारयाम्दम्‌।५२।॥ बोलो जिससे यद कायं समासो ॥ ५२॥ 


, ३२ माकेएश्यपुराण अ०८ 


पक्लिण उचुः पकती वोले- ू 
ञ्रथ दद्धो द्विनः कथिदागत्याह नराधिपम्‌ । इसके वाद्‌ पएक वृद्ध आह्यण कीं से श्राकरः 


।५३॥ राजा से बोला, इस दासीक) सुभे दो, मे खरीदार 
समयस मे दासीमहं क्रेता धनमदः ॥५३ तथा इसकी क्रीमतत दंगा ॥ ५२ ॥ मेरे पास धन 


दस्ति मे वित्तमस्तोकं सुषमारी च मे परिया | बहत है शौर मेरी शी गोभल है रौर धरका का 
ग्रहकम्प न शक्रोति कततेमस्मात्‌ भयच्छ मे ॥५४। | नहीं कर ५५ इसलिये तै .श्से मागता ॥५५॥ 

॥ तेरी खी सप श्रौर शील खे युक्त दै यद सखव काम \ 
कमएयता चयो रप शीलाना तव योषित करलेगी । इसलिये इसके अचुकृल क्रीमत लेकर । 
अनुरूपमिदं धितं शृदाणाप्य मेऽ्वलाम्‌ ॥५१॥| इस स्री को मेरे सुपु कर ॥ ५५ बद ब्राह्मण के 
एवुक्तस्य विमेण हरिधनद्रस्य भूपते | इस प्रकार कहने पर राजा हरिशचन्द्र का हृदय फट 

गया श्नौर अत्यन्त क्गेशित होने के कारण बह छु 
व्यदीय्येत्‌ मनो दुःखाच चनं किंचिदतरषीत्‌॥१९॥| न योला ॥ ५६॥ इसपर उस बुध राय ने राजा के 
ततः स विप्रो वरपतवैसलान्ते ददः धनम्‌ 1 | वल्कल कख ॐ छोर से रानी का मूल्य वध दिया 
वहुष्वा देरोष्थादाय दृपपत्नीमकर्षयत्‌ ॥५७।॥ शरीर रानीके कय 4 
लावी त राजा के पुत्र रोहिताश्व के 
ररोद रताश्वाऽ द इषव मतिस्‌ । | शोभायमान ये, माता को इस भकार सी जाते 
हस्तेन वस्माकपषेन्‌ काकपक्षधरः शिशुः ॥५८॥| हु देखकर अपने दाथसे उसका वख पकड़लिया॥ 
राजपल्युवाच रानी वोली- 
ंचाय्य सुच तावन्मां यावरपश्याम्यहं शिथम्‌। | न स लोढो, खमे चोड़ो पी देर 
व .1+५.९।\। म अपने चच्ये को टेखलं ! इसक्रादशैन फिर दुलभ 
ठु भिष्यति ।५९॥] हयो जायगा ॥ ५६॥ ह वतत ! सुमतो देखो.ठगदारी 
पश्येहि वत्स मामेवं मातरं दास्यतां गताम्‌ । माता चव दासी होगङई है ।, है राजपुत्र ! .मुभको फ) 
मां म! स्पाक्षी राजपुत्र असपृश्याहं तबाधुना॥६०।॥| दोडो, चव मै तुम्हारे येग्य॒ नदी (५ द ५ 
तरह कहकर माता के फिर खीचे जाने पर श्रौर 
ततः स वलः सहसा ददा कृष्टान्तु मातस्य्‌ । | शाने वदृने पर वह वाल उदधिग्न होकर श, मा 
समभ्यधावदम्बेति स्दन सास्राविलेक्षणः ॥६१॥| इस प्रकार रुदन करता ह्या पदे भाया ॥६१॥ 


~ यथपि उख खरीदार ब्राह्मण ने उस अति हुए चचचे 
दिन १ पटा ध 
तमागतं हिनः क्रोधादवालमभ्याहनत्‌ पदा । कोलातसेमायापर्तुफिर भो उसने भामां : 


वदंस्तथापि सोऽमवेति नेवाघ्ंचत मातरम्‌ ॥६२।॥ कहते हय पीके भागना न चोडा ॥६२॥ 


राजपत्न्युवाच रानी वाली-- 
 भ्रषादं छर मे नाथ क्रीणीषेषुव बालकम्‌ । दे महाराज ¦ मेरे ऊपर छपा करके इस वालक : ` 


| : भवतो धिननं ग-चीर खयर लीभिये । यथपि श्रापने सुभको 
 क्रीतापि नाहं मवत विनैनं काथ्यसाधिका ॥६३॥ | खरीद लिया दै परन्तु इस चालक फे विना मै नाप 


इतयं ममासपमाग्यायाः भरसादसुशखो मव । | के कायं को भली घकार न कर सकगी ॥ ६३॥ , 


: म्रा संयोजय धारन वतेनेव पयस्िनीम्‌ नीम । इस धकार मुभ अ्रभागेनी पर चया करके गाय से । 
मां संयोजय वा १ ष स्वनीम्‌ ॥६४॥ दय पीते इय चदे को लग न कीजिये + द४॥ 


{ ब्राह्मण वोक्ला- 
१ शृद्यतां वित्तमेतत्‌ ते दीयतां वालको मम वित्त लेकर इस वालक को भी सुभे दीजिभे ! 
दीपुसोधम्मेशाचहेः कृतमेव हि वेतनम्‌ । .. व के क्ञाताश्यों ४ 9 
लक्षं कोरिमृर्थतथा परैः ॥६१।| को ुत्रसहित लेना चाष्टिये।सौःदज्ञारःलाख, करोड 
शत॒ स क रः ॥8 या र अधिक जो चाष्टिये सो ले लीजिये ॥ 
४ पक्ती । 
. ~ . तस्य तद्वित्तं बहुध्वोत्तरपटे ततः । उसी भकार उस वालकति कीमत भी.राजाके 


1 


# 
॥। 


द 
$ 


1 


( स्यवंशमसूतोऽ्यं सुङ्मारकरागुलिः । 


भ०८ ५ माकेण्देयपुराण ३९ 


भगृह्य वाल्लकं मात्रा सरैकस्थमबन्धयत्‌ ॥ चरमे वांघदी रौर मादाके साथ वालकको लेकर 
नीयमानौ ठु तौ टा मायात स पाथिवुः। | चाल 1 छो स भर ली 
॥ ष्णं पल पुचको लेजाते हप देखा । दुःखसे ्रातै होकर 
सुदु # १ = भ (4 
विरालाप ४ खरता पुन; पुनः९७।| बड विलाप करने लगा तथा वार-चार गम श्वास 
यान वायु चादित्यो न्दुनं च पएथ्जनः । लेने लगा ॥६७॥ जिस रानी को पवन, सू, चंद्रमा 
दृष्टवन्तः पुरा पत्नीं सेयं दासीत्वमागता ॥६८।॥| या किसी भी इतर भदुप्यो ने न देखाथा च चाज 
दासीपन को प्राप्त दुरे ॥६८॥ श्रौर सूयव शमे उत्पन्न 
क्रयं पि एटि यह सुकुमार वालक भी विक गया । मुभ दुमति 
११ विक्रयं बालो धिङ्मामस्तु सदुममतिम्‌६६। को धिर ॥६६॥ हा भिये हा वत्स सुमजैखे 
हा भ्रिये हा शिशो पत्य ममानाय्येस्य टुनयः । | द्र चीर न्यायी की पेसीं दुरवस्था में भप्त होने 


दैवाधीनां दशां प्राप्रोन मृतोऽसि तथापि धिक्‌७ ०\।| पर मी मत्पर नहीं होती है। सुभे धिक्तारहैं ॥७०॥ 
पक्षिण उचुः प श 
तं वलो रहः घ॒ मजी । ध 
दिभिसतं „० ॥ < ५ 

गेदादिभिसतगेसतावादाय त्वरान्वितः ॥७१॥ गया ॥७१ ॥ इतने भै ही विश्वामित्र ने बां 
विश्वामिनरस्ततः पराप गृपं वित्तमयाचत्‌ । श्राकर राजा घे दक्तिणा मांगी । दसिथन्द्रते भी 
तस्मै समर्पयामास हरिधनद्रोऽपि तद्धनम्‌ ॥७२॥ वद व । दे दिया ॥५७२॥ क के 

तद्वित विकने से शोक मे इवे हप यजा खे उस थोड़े धन 
तद्वित स्तोकमालोक्य दारषिक्रयसम्भवम्‌ । | दो देखकर विश्वामिन नै पित होकर कहा॥७३॥ 
शोकाभिभूतं राजानं पितः कौशिकोऽत्रवीत्‌ ॥७२।। हे राजन्‌! यदि तु. मेरी इतनी द यक दरण 


षत्रनन्धो ममेमां तं सदृशीं यज्ञदक्षिणाम्‌ । । समता दै तो मेरे घभाव को देख ॥ ७४॥ तपसे 
ओ शुम भ उप्एता है उसको, मेरे शद्ध ब्राह्मणत्व 


मन्यसे यदि तत्‌ क्षिमं पश्य वं मे वलं 
श दि तत्‌ किरं पश्य लवं मे वलं परम्‌ ७४॥ को, मरे शुद्ध रौर उग्र पभाव को तथा मेरे खा- 


४ 


` तपसोऽत्र सुतस्य ब्राह्मण्यस्यामलस्य च । | ध्याय को देख ॥ ७५॥ 
मलमभावस्य चोग्रस्य शद्धस्याध्ययनस्य च ॥७१५॥| हरिन्द्र वोले-- . ,. 
हरिश्चन्द्र उवाच हे भगवन्‌ ¦ शीर भी दगा, थोड़ा समय श्रौर 


न्यां दास्यामि मगवन्‌ कालः कथिसमतीक्ष्यताम्‌ । | ठहरिथे । पत्नी श्नौर पुज को वैच का, रव मेरे 
सास्मतं नास्ति विक्रीता पत्नी पुत्रश्च वालकः॥७६। पास कचं नदीं दै ॥७६॥ 


[* [> [ १ पोल 
विश्वामित्र उवाच विश्वाभि बोले-- 
1 हे राजन्‌ ¡ इस समय दिन का चौथा भाग दै 


| चतुभागः स्थितो योऽयं दिवसस्य नराधिप । | धक समास होने क वद मदर किसी समय 
एष एष प्रतीक्ष्यो मे वक्तव्यं नोत्तर तया ॥७७]॥ की प्रतीका न करूंगा ॥ ७७॥ 


। पत्तिण उचुः पक्षी त ह (र 
निष्टं निघ्रं चः राजा हस्िन्द्रं से इस प्रकार निर शरोर 
तमेचछकता राजे निष्टं नष णं कचः । निर्दयतापूरौ बचन कहकर तथा उस धनको लेकर 


तदादाप धनं तूणं पितः कौशिको ययो ॥७८॥ विश्बामिन्न जी क्रोधित होकर चले गये ॥ ७८॥ 
७ 8 शसो ^ निश्वामिन करे जाने पर राजा भय शरीर चिता के 


विश्वामित्रे सते राजा भयशोकान्धिमध्यगः | | सागर मँ निमग्न दोकर नीचे को घुस करको वेड 
शवे तथा सव वात भली भांति सोचकर ऊचे 


“सर्वाकारं तरिनिशचित्य भवाचोचेरथोयुखः ॥७६॥| स्वर खे बोले ॥ ७६॥ यदि 1 को 

मेष्येण मानवः श्रावश्यकतादो तो वद्‌ वोले शौर सुभे अज संध्या 
-विक्रतेन यो ही मया शात से पदिलेदी शीधतापूर्वक लेले, मे विकले की इच्दा 
स त्रधीतु त्वरायुक्तो यावत्‌ तपति भास्कर; ॥८०॥।।.क्ररता ह ॥ ८०॥ उसी खमय शीधदी धर्मं चांडाल 


1 
५ 
४ 


३४ 


प्रथाजगाम त्रितो धम॑श्ण्डालरूपधरक्‌ । 


दुर्गन्धो धिकृतो रक्षः मधुलो दन्तुरो धृणी॥८१ 

कृष्णो लम्बोदरः पिङ्ग-रुकषक्षः परुषाक्षरः । 

गृहीतपक्षषुज् शवमास्येरलंृतः ॥८२॥ 

कपाहस्तो दीर्घास्यो भैरबोऽतिवदन्‌ शुहुः 

श्वगणाभिषठतो घीयो यष्टिस्तो निराकृति; ॥८२॥ 
प्वरदाल उवाच 

श्रमी त्या शीघ्र कथयस्वात्मवेतनम्‌ । 

स्तोकेन बहुना घापि येन वै लस्यते भवान्‌ ॥८४॥ 

पक्लिण उचुः 

तं तादेशमथालक्ष्य क्ररदष्टिं सनिष्टुरम्‌ । 

वदन्तमतिदुःशीलं कस्त्वमित्याह पार्थिव; ॥८५। 
श्यरडालं उवाचं । 

चणडालोऽमिहास्यातः मधीरेति पुरोत्तमे । 

वि्यातो वध्यवधको गृतकम्बलहारकः ॥८६॥ 
हरिश्न्द्र उवाच 

नाहं चरडालदासत्वमिच्छेयं सुषिगर्हितम्‌ । 

घरं शापाभ्निना दग न चडालवशं गतः 

पक्षिणः ` 
तस्येवं बदतः मापनो विश्वामितरस्तपोनिधिः 
कोपामषेविषताक्ष; पाह चेदं नराधिपम्‌ 


विश्वामित्र उवाच 
चण्डालोऽ्यभनस्पं ते दातुं पित्तमुपस्थितः 


` कस्मान्न दीयते मदयमशेषा यतदक्षिणा 

। ॥ि हरिश्चन्द्र उवाच 
भगवन्‌ सूव्यवशोत्थमात्मानें वेचि कौशिक । 
कथं चण्डालदासत्वं गमिष्ये पित्तकायुकः 

न ` विश्वामित्र उवाच , `: 
यदि चणएढालेषित्तं त्वमात्मविक्रयनं मम 1 ` 
न प्रदास्यसि कालेन शप्स्यामि त्वामसंशयम्‌॥६१। 

दरिशनद्रस्ततो राजा चिन्तावस्थितजीव्रितः । ` 
. बदन्‌ पादषेनगाह विहलः 


॥८७॥ 


॥८८॥) 


~~ 


। ८६॥ 


॥६०॥ 


माकरुडेयपुराणं 


अण 


“का रूप धर कर श्राय । चारडालके प्रत्येक अङ्गसे 


दर्गन्ध श्मारदीथी तथा उस धृशित मटष्यके वड़े २. 
दाँत श्नौर भूं थी ॥ ८९ ॥ काला रङ्ग, लम्वा पेट, 
पीली शौर रूखी शाखं, बहुत से पक्चियो को साथ 
लिये हण तथा युरडों की माला पिने हुए ॥ ८२॥ 
हाथ मे खत भुण्डं लिये हुए, भयानक श॒च्द कता 
हुश्रा, बहुत से कत्ता से धिरा इं तथा दस्र ` 
हाथ मे लारी लिये हुए. बद श्राया [प्रा 
चचारडाल वोला- 

मै तेरा प्राकर, श्रपना मूल्य शीघ कहो, थोडे 
या श्रधिक मूल्य जितनेमे भी तुम पराप्त दोसको ॥ 
क्ती लोग घोले~- । 

उसको इस तरह कूर, निष्ठुर चौर दुःशील 
देखकर राजा ने कटा कि तू कौन हे १।८५॥ 
व्वाएडाल बोला-- । 

मँ चारडाल है रीर पृथ्वी पर म रहता है । मैः 
वध्य जीन का वध करता द ओौर मुरः फो कम्बल 
भीेताह॥ ८६॥ 
हरि्नदर बोले- । 

` मे चारडाल के निन्दनीय दासंत्व मे जने की 

इच्छा नदीं करता ह । चाराडाल के यश॒ मे जानेषे 9 


शाप की अग्नि मे दग्ध होना रच्छ है ॥५८७॥ 
पत्ती वोक्े- 

जिख समथ राजा दस्थिन्द्र यह कह रहे थे 
उसी समय क्रोध श्रौर ईयां से श्रं विगाड़े इषः 
तपस्वी विश्वामिज वदाँ आकर राजासे यदह बोले॥ 
विश्वामित्र बोले- । 

यह घारडाल तुश्दे पञुर धन देने के लिये 
उपस्थित ह, सिये मुभे चाङ्गी यक्घ-दक्तिणा क्यों 
नहीं देते दो १॥८& ॥ . 
दस्थिन्द्र बोजे 

हे भगवन्‌ ! दे विश्वामि्जी ¡ म जानता ` है 
कि गै स्ूरयवंशोत्यन्न ह । धन कीं कार्मना फे लिये 
किंस भकार चण्डाल का दास वनुं १॥ ६०॥ 
चिश्वामिच वोल्ते- । 

. यदि तुम चारडाल से अपना मूल्य लेकर 
मुः न , दोगे तो तुमको निस्संदेह इस समयं 
मे शाप दूंगा ॥ ६१॥ 
पच्ती चोले- 

` उससमय राजादरि्वनदर घोर चितामे निमग्न 
दोग । “कृषा कीजे" इस मकार कहते हप 


॥६ २ व्याङ्ुल होकर उसने बिश्वामिव्रक् चरण पकङ्क्तिये 


भ्र 


माकंरुढेयपुराख ३५ 


हरिशन्द उवाच 


दासोऽसमयार्तोऽस्मि भीतोस्मि लद्क्त विरपतः | 


हरिशन्द्र वो्ते- । 
दे वहमपि ! मे दुखी है श्रापका दासर्ह 
श्रापसे डरता ह .तथा श्रापका विशे रूप से 


कर भसादं विरे कषटश्वण्डालसङ्करः ॥६३॥| भक । छपा कीजिये श्र चागडाल के संस्ैरुषी 


भवेयं वित्तरेपेण स््वकरम्मकरो बशः । 


. तवैव एनिशादं ल ॒भेष्यरिचि्ाजुवततेकः ॥६४। 


विश्वामिनज उवाच । 
यदि प्रेष्यो भम भवान्‌ चणए्डाज्ञाय ततो मेया । 


दासमाव मचुपराप्नो दत्तो विचचाव्वदेन यै ॥६५॥| चाडाल को अ्ुंद 


पक्तिण उचुः 
एवघ्क्तं तदा तेन श्वपाको हएमानसः। 


विश्वासित्राथ तद्रव्यं दत्वा वहुध्वा मरेधरम्‌॥६६॥ 


दण्डमहारसम्धरान्तमतीव व्याकुलेन्द्िय्‌ । 
इष्वन्धुवियोगात्तंमनयभ्निजपत्तनम्‌ 


हरिथन्दरस्ततो राना वसंधणएडालपत्तने । 
भातमध्याहसमये सायज्चैतदगायत 


+ वाला दीनथुखी श्य वालं दीनग्ुखं पुरः । 


मां स्मरत्यसुखापिष्टा मोचयिष्यति नौ तृपः॥६६॥ 


उपा्तवि्तो विभाय दक्वा वित्तमतोऽधिकम्‌ । 


नसा भां गृगशावा्षी वेत्ति णपतरं कृतम्‌ ॥१००॥ 


रज्यनाशः सुदृत्यागो भाय्याततिनयविक्रयः | 


प्राप्न चरडाल्लता चेयमहो दुःखपरम्परा ॥१०१॥ 


एवं स तिसन्‌ नित्यं सस्मार दयितं सुतम्‌ । 


भार्य्यान्वात्मसमाविषं हृतसव्वंस् ्रातु२॥१०२॥ 


क्स्यचिरथ कालस्य मृतचेलाप्दारकः । 


न गक 


, चरएडलिनादुरिष्श्च मृतचे्ापहारिणा । 


शवागमनमन्विच्छनिह तिष्ठ दिवानिशम्‌ ॥१०४॥ 


हृदं राङ्ञेऽपि देयज्व पद्भागन्तु शबं मति । 


त्रयस्तु मम मागाः स्यु भागौ तव वेतनम्‌ ॥१०५॥ 


इति प्रतिसमादिष्टो जगाम शवमन्दिरम्‌ । 


दिशन्मुदक्षिणां यत्राराणस्यां स्थितं तदा ॥१०६॥ 


गमशान्‌ धोरसंनादं भिबाशतसमाुलम्‌ । 


। ६७॥ 


॥६८॥ 


हरिथन्द्रोऽमवद्राजा श्मशाने तद्वशानुगः ` १०३॥ 


कषर से वचाय ॥६२॥ हे सुनिवर ! आपका जो घन 
मेरी ओर शेप है उसके कारण मँ .श्चपके वश मे 
होकर श्रापका सव कायं आपकी आज्ञाुसार दिल 
लगाकर करू गा ॥ ६४॥ " 


विश्वामिनजी वोले-. 
यदि तुम मेरी आज्ञा मानते हो तो मैने तुमको 


४५ 


द्‌ द्रव्य फे वदले मेँ दिया ॥६९५॥ 
पकती वोले- । | 
विश्वामित्र के पेखा फदने पर चाएडाल बहुतः 
प्रसन्न हुता श्नौर उसने विश्वामित्र को वह्‌ धन 
देकर राजा को वाँध लिया ॥ ६६॥ चार्डाल के 
डरडे की चोट से गम्भीर, ्रत्यन्तं विदल तथा 
भाई-वन्धुश्रों के वियोग से दुः्ली पेखे राजा को 
बह चाएडा्न पने घर ले गया ॥ ६७ ॥ तव राजा 
हरिश्चन्द्र चारडाल के गृह मे रहने लगे । प्रातः, 
मध्याह्न तथा संध्या समय राजा इख प्रकारः गायन 
करते थे ॥ ६८॥ बह दीन पुल चाली मेस पत्नी 
दीन मुल बाले पुव को देखकर मुभे स्मरण करती 
होगी ्रौर सोचती दोगीकि राजा हमको ह्ुडावेगे 
॥&६ ॥ जो धन मने शच्रपने को वेचक्रर भौर अधिक 
ब्राह्मण को दिया है उसको बह भगशावकनयनीं 
नदीं जानती है, इसक्िये वह सुमे पाष सममरदी 
होगी ॥\००॥ श्रा ! यह महान्‌ दुःख ह कि सज्य 
का नाश, भि छा त्याग, पल्वी छोर पुत्र का 
विक्रय ज्र श्रन्त भै चारडालता ॥ १०१॥ सीं 
तरद वह पत्नी श्नौरः भुत का नित्य स्मरण करते 
रहते धे तथा सर्वैस हरण दो जाने के कारण 
्गेशित ये ॥ १०२॥ छं काल व्यतीत होने पर 
सतक के ऊपर का वख लाने के लिये त ने 
राजा को कटा ॥ १०६ ॥ तक्र पर से वख ने 
बाल्ञे उख चाण्डाल ने राजा को चदेश किया किः 
भरत्येक आते इषः सुद को देखो ओर श्मशान मेँ 
रात दिन रदो ॥१०४॥ उस से चां दिस्सा यहाँ 
के रजा का दै, तीन दिसते मेरे मागके दै तथा दो 
दिसते तुम्दारे वेतन के ६॥१०५॥ दस प्रकार श्रा 
देश पाक राजा काशी की दक्षिण दंशा की श्योर. 
जद स्मशान था गये ॥१०६॥ उस स्मशान मे , 
शब्द होता था तथा सैकड़ों सियार वर्ध रते थे, 


३६ माकेएडेयएुराण ०८ 


शबमौलिरमाकीं श ५ 
शवमोलिसमाकौणं दुग्धं वहुधुमकम्‌ ।१०७।| धी तथा वहु धुरा उट रा था ॥ ९०७॥ पिगराच 


प्शिच-भत-येताल-डाकिनी-यक्षसडक्ुलम्‌ । | भूत. वेतालः डाकिनी, यकत, गिद्ध, सियार ञ्जौर 
2 छ न्तो से वह जगह व्याप्त थी ॥ १०८ ॥ दृङयों के 
ृभरगोमाधुसङ्कीएं श्वन्द परिवारितम्‌ ॥१०८॥| ठेर से कथा दु्मन्ध॒से वह स्थान पूर था । 


चारो श्नोर मुद पड़े हुए ये, वहत इ्गन्धि श्या रही 


श्रस्थिसंधातसङ्धीएं सदादुर्गन्धसंङलम्‌ । | अनेकों सुदो के वन्धु वान्धचों के कररकन्दन से - 


नानागृतसुहाद्‌-रोद्रकोलादलादुतम्‌ 1 १०६।॥| चह स्थान भयंकर ओर कोलाटलबुक्तथा [६०६ ह 1 


पुत्र, दा मित. दा बन्धू, ठ! राता, न्स, मेरीपिया 

हा पुत्र मित्र हा न्धो भ्रातवत् भिया मे! | हा व त ति 
हा प्ते भगिनि सातहां मातल पितामह ॥११०॥| रादि ॥ ६१० ॥ हा माताम, हा पितामह, डा पौव 
मातामह पितिः पौत्र क गतोऽस्येहि वान्धद । | कँ यये १ इस अ) वाले की क 
इत्येवं वदतां यत्र ध्वनिः संभ ते वहम सदेव नाई देती थीं ॥ १११ ॥ मस चौ 
४ स ५ मज के जलने से उत्पन्न द्र छन, दनी आवाज्ञ 
स्वलन्मंस.चसा-मेदच् सच्छमितरलम्‌ ११२ | से चह स्थान व्याप्त था 1११२ अधजल्ते श्रतदेद 
अद्ध दग्धाः शवा, श्यामा विकसडन्तपंक्तयः | | शयामवसं होकर तथा दतं कीप॑क्तियां दिखतिदुर 
हशन्तीवाण्निमध्यस्थाः कायस्येयं दशा खिति११३' | अग्नि सं पड़ इ पेसे मलम दोते थे मानों स 
रहे है ॥११२॥ ब्छ पर ग्नि मे चर-वर शब्द 

अग्तेधट्चयशब्यो ` वयसामस्थपंक्तिपु ह्येता था. कौर की पक्तियां हडिडयों पर वैरी 
| इड थी, चर्ध-चान्धचों के ठन. क्रा शब्द तथा 


वान्धषाक्रन्दशन्दथं पुकसेषु प्रहपंलः ॥ ११४१ पक्स डोमों ऋ पसश्षता ऋ रस्य दिखाई ठेचाथा. 


गायतां भूत-वेताल-पिशाचव-रसाम्‌ ॥ ॥ ११७ 1 छर अत. {पराचि चता सर राच 


॥ कि 


के फुरडं ॐ गत्ने वजाने के घोर शब्दस व जगह ‡ 


श्रयते सुमहान्‌ योर करपन्त व निःखनः ।॥११४।॥ यलयकाल के समान्‌ मयान माल्म होती थी , 


1 ११५ ॥ रत्खो के ठेर स्थानों पर पड़ हुए काले 


महामहिषकारीष-गोशश्द्राशिसडङ्कलम्‌ । मेसो के समान समालम होते थे, उन्म से उडी ह्रै. 


। भस्मं इड्यं के ठेर पर चेटती थी जिखसे वे देर ` 


दुतथमस्तहट सास्थिमिर्बतः ।\ ११६! भ? 
ते अ चतं मतेः १९६ | प्ैताकार मालुम होते थे 1 १९६॥ नेक प्रकार 


नानोपटारसग्दीप-काकषिक्षकालिकम्‌ । ने की चीज, मालाओं च दीपकां को कौर 
शरनेकशब्दवहुलं श्सशानं नरायते ।\११७॥ चीर फाड़ कर उलट थे तथा वहु - 
समद्विररििः सियासत ¡ घकार के = स्मशान यर्हित हो रहाथा॥११७ 
नादितं # | अग्नयो से पूरः अद्ुम सिया मीपर सेने की 
भीपणरावगहरम्‌ 
नादि गम्‌ | । आवाज से यु तथा मनो के रोने पीने कौ 
भूय भयस्यप्युप्सज्ञच्म श [ आवाज्ञो खे उछ स्थान मै भय को भय लगता था 


रसशानसाक्रन्दविरादरार्णम्‌ ।११८]। | 1 १६८ ॥ वद राजञा बदँ सकर दुःख ज्ौर शोक 


राना तत्र सम्भा टुःसितः शोचनोधतः ! | से कूढता धः“ जह्यजी ¦ मेरे सेजक, मन्त्री, ‹ 


त गतम्‌११६. सस लोस तथा राज्य कहां रये ९॥ ११६॥ हा 
हा सृत्यामन्विणो पिपाः क तद्राज्यं विषे गतम्‌११६| सैन्य चा पुज ! ठम धी सुः मागे को विभ्वामिन्ं 


दा शन्येपुत्र दावा मां स्यक्ला मन्दभग्यकम्‌ । | ऋ दोय से दोड़ कर कटां गये १॥ १२० ॥ इस 
विखामित्रस्य दोषेण गता; त्रापि ते मम 1१२०}. पकार चिन्तायुक्त चौर केष्टे तथा सव अलं अ 
इत्येव चिन्तयंस्तनर खणडालाक्त पचः पुचः मालयरतः अर स्खलछापच ह {जचक्ते पसे चह यजा 


मलिनो सषस्वोङगः केशवान्‌ गन्धवान्‌ ध्वजी १२१। पप स्य से इगेन्वु उस चारडाल की आज्ञा 
जँ तत्पर रदते थे 1 १२९1 लङटी धारण किये 


४१ 


~. कालकं धावेशापि ततस्ततः ) वद .कालक्े समान इधर उधर भागते थे श्स 


| 


` श्ात्मानं स ददशथ पुकसीग्भसम्भवम्‌ , १३० 
-तुत्रस्थथाप्यसौ गजा सोऽचिन्तयदिदं तदा । 


अन्द .. ` ाक॑रुडेयपुराण 2७ 


अस्मिन्‌ एव इद मूल्यं माप भरा्स्यामि चाप्युत १२२॥ कका यद मूल्य हदा इतनामिला इतना श्र हो 

५ व आदि ॥१२२॥ इसमं इतना मेरा, इतना राजा काः 

षदं मम ददं रक्षे पख्ययण्डालके चिद्‌ । १ चारडाल का, यद सोचते हण भ्रौर 

॥ भागते हए राजा को एेसा माहनुम होता था मानें 

हति धावन्‌ दिशो गजा जीचन्‌ योन्यन्तरं गतः १२३॥ 1 = 
जीरंकर्सु्रन्थि-कृतकन्थापरिगरहः । 


जीते जी प्रेत वन गचा ह ॥ १२२॥ श्रनेकों शरेगरियों 
क 

से धक्त यना कपड़ा शिर तथा शरीर म धारण 
किये दष्ये तश्राचिताकी भरम मुख, भुजा श्रौ 


५ -चिताभस्मरनोलिप्-एखवाहृदयाटिद्कः ॥ १२४॥| उदर एर लगी हु थी ॥ १२८ ॥ दाथ पाँच की 


नानामेदो-वसा-मज्न-लिपतपाणयङ्गुलि; श्वसन्‌ । | धंशलियों मं मेद, वसा मचा दरादि लिपी रहती 
द्‌ ॥ यु शरी ्नौर नाना ्रकारके पिंडारिक्र ही उनके भोजन 


तानाशवोदनकृता-दारतृतिषरायणः ॥१२५॥ की सामध्र शरी ॥१२९॥ बहाँ की पड़ी मिस ,ज र , 
तदीयमालयसंश्ष-कृतमस्तकमणए्डनः 1 ही श्रपने मस्तक को सजा लेते थे तशा. गत दिन , 


५ किसी समय भी नीद न द्याती थीश्चौर चारवार 
न रात्रौ न दिवा रेते हा हेति भवदन्‌ गुहु १२६॥ ्ा' हा" णेसी श्वास लिया करते ये ॥९२६॥ इसी : 
वं हादशमासास्त॒ नीताः शतसमोर्माः । 


रकार वारह महीने सौः परं के वरावर वीते । च 

बन्धय दिन वन्धु वान्धवों के वियोग से इभी वह ~= 

सं कदाचिन्तरपश्रषठः श्रान्तो वन्धुषियोगवान्‌॥।१२७॥| राजा व स्थान पर वैड गया ॥ १२७! 

रकषङ्गो निष्ट सुप एव निश्च श्रौर रूखे शरीर वाला वद राजा निद्रा ५. 

निद्राभिभूते साहो निश ष १ सताया इुश्ा सो गया । सोते टी उसने चड़ 
तत्रापि शयनीये स॒ दएटवानदशतं मदत्‌ ॥१२८॥ 

-शमशानाभ्यासयोगेन दषस्य बलवत्तया । 

ग्न्यदेहेन दत्वा त॒ गुरे गुरुदक्षिणाम्‌ ॥१२६॥ 


द्द्धत खम्न देखा ॥ १८ ॥ मने दृखरे देह मे' ग 
शुरू की युखूदक्षिणा नदी दी इसी कारण-से ~व 
तदा द्वादश वर्पाणि दुःखदानानु निष्कृतिः । 


ने ममे वल पूवक स्मशान घास कराया है ॥ १२ 
फिर इसी प्रकार दुःख पूर्वक वार वप न्त 
दने पर श्रपने को डोमिनी के ग्म से उत्पत घ: 
. देखा ॥१२०॥ उस जगह स्थित दुष राजा ने ¢ 
सोचा करि यदि इस गभं से निकल तो, स्रूव॒दान 
€... (स ध ^ 
वरी धम फर गा ॥{३१॥ इसके वाद खप्न मे देवा कि 
च्कान्तमात्री भ्मकरोभ्यह्‌ 4 
हता निप दि दानधम्म नि {२५॥ ब पैदा होकर डोम का वालक होगया दहै श्चौर 
भरनन्तर स॒ नातस्तु तदा पुकसवालकः । | स्मशान म मूनक सम्बन्धी काम करता है ॥१२/ 
एमशानमृतसंस्कार-करणेु सदोच्रतः ॥१३२॥ फिर सातवें वधं स्मशान मेँ किसी निधन 
भे तु समे य्य श्मशानेःथ मृतो एरिजः। | कै सृत ध अ व 
र शा देखा ॥१३६॥ उनसे कर माँगने पर वे क्तेषा १ 
्रानीतो बन्धुभिर स्तेन तत्राधनो गुणी ॥१३३॥ त 4० वितति 
मूर्यार्थिना त तेनापि परिभूता ५ । श्राति बालसी था वोंले ॥१३५॥ हे पापकम ५९ 
` उचते ब्राह्मणास्तत्र विश्वामित्रस्य चेष्टितम्‌ १३४॥| वाले पापी मञप्य त .दस पापिष् 1 
त याण््टमद्यमं $ ; कयो करता है, चिश्वामित्रकेशपदसेितो.. 
कर्मं पपिकरारफ | | क्या करत € ५ 
पापिष्ुमश्मं कम्मं इरः व , दर्शिनं से डोम हुच्या ॥ १३५ ॥ बाह्मण के % ' 
हर्थिनद्ः पुर राना विश्वामित्रण पुक्सः ॥१२५॥ ही कारण से तेरे पुर का नाशा होकर तू ६. 
व्राह्मणसवापनाशनात्‌। | दशा को पचा ¦ च्योंकि तृ व भी नदी मानत्‌ 
(४ 1 स॒ शृतो रूपा तदा ।।९२६॥ है इसलिये ठमे.टम भी शाप देते है ॥ १३६॥ ५ 
१ ध नराधम ! तू अभी घोर नरक को जा।* इस 
गच्छ॒ त्वं नरकं घोरमधनेय नरधम । | क कटे जते दी खप्नावस्था मै पड़े हृष .4 
दसयुक्तमात्रे वचने स्वसस्थः स दृपस्तदा ॥६ ३७।॥ने उस समय ॥ १३७॥ भयानक यमदूत को ६ 


२ ३४ | 
३८ ाकरुढेयाण अ८ 


> भयावहान्‌। | मे पाश लिये इए, तथा च्रपने.को उनके द्वारा चल 
पाशहस्तान्‌ मयावहान्‌ । | +, (ल व निष्यो 
श्रपश्यटूयमदृतान्‌ व पाश | पूर्वक वाधिकर लेजाते हु देखा 1६३८ उन निद 


तै ंदीतमातसानं नीयमानं तदा वलात्‌ ॥५६८॥ यमदूत को देखकर डर से शा माता हा पिताः 
पश्यति स्प यृशं खिन्नो हा मातः पितर्य मे । | चिल्ला हुता बह राजा तेल के एड म डाल 
एवंबादी स नरके कैलद्रोए्यां निपातितः ॥१३६॥| दिया गया ॥१३६॥ मच्यो से पया इत्र, तीद्ण 


वसः पाव्यमानस्त शुरधाराभिर्यथः | | धार बलि शख श्रादि से युक्त अन्धकार पूरं"उस 
।। ९.१ २१ कुरड & 

ने तमसि दुःखाः पूयशोणितभोननः ॥१४०॥| इष्ड १ बद इल से पीडित हा पड़ है शौर 
| प पीव श्रौर रुधिर उसके भोजन हैँ ॥१४०॥ सात वषं 


4 ¢ 
सपतयपं परतात्मानं पुकसत्रे दंशं ह । | तक वह यूत डोम देह दिनःदिन नरक मे .जलाया 
दिनं दिन्तु नरके दहते प्रच्यतेऽन्यतः ॥१४१।॥| च पचाया जाता था 1 ९४१॥ कमी उराया जाता 
खित कषोभ्यतेऽ्यतर मायते पा्यतेःन्यतः। | था, कभी छेदा जाता था, कभी मारा श्रौरः कभी 


सीयते । काटा जाता था। कभी जाया जातां श्रीर कमी 
स्यते ्येऽनत् शीतबाताहतोऽ्त॥ ठरडी हवाश्रो से ठि्राया जाता था ॥१४२॥ नरकं 


एकं दिनं वर्षशत-भमाणं नरके भवत्‌ । |मेण्कदिन सौ वपं के समान इचा । सौ वर्ष॑तक 
तथा वर्षशतं तत्र श्रावितं नरके भटः ॥१४६॥| उस नरक मे यमदूत की यातनायं सदी ॥ १४३ ॥ 


ततो निपातितो भूमौ विष्ठा एवा व्यजायत | | फिर भूमि प्र गिर कर भरपने को विषा खाने बाले 
च ॥ -शक्कर श्रौर वात्त श्रादि खाने वाले तते की योनि 
ब्न्ताशौ शीतदग्थमासमात शृतो पि सः ॥१४४॥| इ 10 


प्रथापश्यत्‌ खरं देहं हस्तिनं षानरं पथम्‌ । | फिर श्रपते को गधा, हाथी, बन्दर, वकरा, विडाल 
छागं विदलं कङ्क गामि पक्षिणं कृमिम्‌॥१४१।॥| कोच र कड कौ योनियां मे देखा ॥ १४५॥ 
मत्यं कूम्मं बरादश्च श्वाषिधं इटं शुकम्‌ । | म्ली, कुदा, शकरः श्वानः सुखौ, तोता, मैना, 
शारिका स्ावराश्चेव सरयमन्यांध देहिनः ॥१४६॥ दृकादिक शौर सप फी योनियो मे ॥१७६। श्पने 
दिवस दिवसे जन्म भािनः पराणिनस्तदा । को दिन-दिन पराशियों की दे में पड़ा हा देखा, 
वकत दिदं प्श दुभ्व के सन्ताप से एक एक दिन वषं के समान 
भपश्यहदुभलसन्त्‌। ।दन वषशतं तथा ॥ १४५७॥| व्यतीत होता था ॥ १४७॥ इस धकार दुष्ट योनियों 
एवं वपशतं पू गतं॒तत्र योनिषु । | मे जन्म तेते लेते सौ व॑ व्यतीत होति शौर रपत 
अपश्यच कदाचिद्‌ स राना ततखढुलोद्वम्‌ १४८॥| को फिर सूरयवंश मे उत्प होते देखा ॥९४८॥ वद्यं 
तत्र स्थितस्य तस्यापिरान्यं चूतेन हारितम्‌ | | इख प्रकार स्थित होने के वाद देखा किं चुम 
माया हूत चुत स चैकादौ वनं गत॥१४६।|| रव्य, खी रर पुन को हार कए अकत वनः को 
त्रापश्यत्‌ स पिं व्यादितास्यं भयावहम्‌ | | गया है। १४६ ॥ फिर देखा क एक भयानक सिह 
विमकषयिषुमायातं शरमेण समन्वितम्‌ ॥१५०॥ परभ सदित 1 दे ॥ ६५०॥ 
मक्ितः सोऽ ९ शोचितु; जव चह भायां के शोक मे कह रहा थाके 

उनम भक्षितः सोऽपि भाग्य धवः । | शे! मुम भती को छो षर श्ान कांग! 
¶ रृन्ये क गतास्यच मामिहापास्य टुःसितम्‌१५१॥ उस समय सि मे उसे खा लिया ॥ १५१॥ र - 
सपर्यत पुनरेवापि भाग्या सा सहपत्रकाम्‌] | पुत्र सहित श्रपनी खी को देखा जो डु उसी 
यस तवं हरिन ठं च तेन तव पभो ॥११२॥| यह दरद थी किदे नाथ ! दमने चखा क्यों 
हरते शोच्यत भा्ो मायया शैव्या सह्‌ | | वेला ?॥ १५२॥ आपके खी शौर ज इधर उधर 
म नापदयत्‌ एुनरपि धावमानः पुनः पुनः ॥१५३॥ ग पित कया शराय नदी दैवते ॥९५३। 
यापयत नरि खरगस्यः स॒ नराभिषः| | पिर उस रज नेमं से देखा कि को व्यति 


तौ वल पूवक उस दीन श्रौर वस्रविदीना खी कौ 
, यते पुक्तकेशी सा दीना िषसना वलात्‌ १५४॥ शे पकड़ कर लिये जाता है ॥ १५४ ॥ वह ह्ययं 


# १ 


~ 


अ०८ ' माक॑रडेयपुराण | ३९ 


“____--~----------~--------------------~------------------------------------------ ~ 


-~--~---~---~ 


क | | दय करती हुदै तथा रुमे वचाश्रोः यह शब्द्‌ 
हादावाक्यंभयुशवन्ती र । करती हृ जारी ह श्नौर फिर देखा कि बां धर्म 
ञ्रथापश्यत्‌ पुनस्तत्र धम्मराजस्य शासनात्‌ १५५।॥ राज की आज्ञा से ॥ १५५॥ श्रन्तरित्त से आवाज्ञ 
श्ाक्रन्दन्त्यन्तरी्स्था आगच्छेह नराधिप। तराई चिः दे राजा ! इधर श्राश्रो, विश्वामित्र कहते 
विसवामितरेण विङ्गप्तो यमो राज॑स्तवार्थतः ॥१५६॥ दकि यमराज मको बलाते द ॥१५६॥ इस प्रकार 
ति कटे जाने पर नागपाश से वाँधकर राजा को वल 
इत्युक्त्वा सपपाशस्त तीयते बलवद्विथः । पूवैक लेजाया गया । बिश्वदेचां ने कदा किं इसकी 
्राद्धदेवेन कथितं विश्वामित्रस्य चेष्टितम्‌ ।१५७॥| यद दशा विश्वामित्रके कारण दै ॥ १५७॥ वटीं 


नथम्ोत्या व्यबद्ं ९ पर उनकी दशा धिष्वामित्रने शाप देकर सराव 
तत्रापि तस्य विङृतिनाधरम्मत्था व्यवदध त । करद श्रौरः फिर उसकी बह सव हालत जो शुज्ञर 


एताः सव्या दशास्तस्य याः सम्ने सम्पदिताः१५८ सदी थी खष्न मे दिलाई दौ ॥ ६५८ ॥ उसको बे 
सर्वास्तास्तेन सम्भक्ता यावदपि द्वादश । | सव भोगते हषः वार बप॑ व्तीत्‌ हयः तिस पी : 


९ > बह फिर यमदूतों द्वारा यमराज के पास ले जाया 
ध ६ (= [ [१३ ध 
तरतीति द्वादशे वप, नीयमानो भटगलात्‌ ॥१५६॥ गया ॥ १५६ ॥ वहाँ उसने यमराजको देखा जिसने 


यमं सोऽपश्यदाकारादुवाच च नराधिपम्‌ । | का दे राजन्‌ ! मदात्मा मिश्वामिच् के कोप कौ 
विश्वामित्रस्य कोपोऽयं दर्मिबाय्यो महात्मनः १६०॥| कोई निवारण नदीं करसकता।९६०॥ वह्‌ बिश्व 
पुत्रस्य ते भृतयुमपि भदास्यति स कौशिकः । मिज तेरे पुत्रकी स्यु काभी कारण दोगा । अरव 


¦ मालपं लोकं द; श्च तू मचप्यलोक को जा शौर शेष दुःख को भोग । ` 
गच्छं त्व मादुप लोकं दुःखोप ~ वै। । समय बीतने पर हे यजन्‌ ! तेय कस्या होगा ॥ 


गतस्य तत्र राले शरयस्तव भविष्यति ॥१६१॥| ख्न मं इसी तर वार्‌ वष तक दुः भोगे 
वयत दवादश वपे दुःखस्यान्ते नराधिपः । | के वाद्‌ बद राजा यमदूत दारा स्वगं से नीचे, ` 


यमदूत ¦ ||१६२॥| भिस दिया गया ॥ १६२ ॥ फिर यमलोक से गिरते 
अन्तरकषाच पतितो विषो व | ध के भय से शख खुल गै श्र दोश मे श्नि पर 
पतितो यमलोकाच्च विशुद्धो भयसम्ध्रमात्‌ सोचने लगा कि मेने स्वण्नमे वडा कष्ट पाया॥९६३॥. 


रहो कष्टमिति ध्यात्वा क्ते ्षारावसेवनम्‌ ।।१६३।॥ स्वप्न मेने जो महान्‌ दुभ देखा उसका अन्त ४ 
स्यप्ने दुखं मटर यस्यान्तो नोपलभ्यते | नहीं है । जो कुच मेने स्वप्नमे देखा ह बह मुभे. : 


वार € €. पडेगा उसने धि 
- द्वादशा समाः॥१६४॥| वार्ड वप पन्त भोगना पड़ेगा ॥१६॥ फिर उसने! ; 
स्प्न इष्टमया यतत विं चमेद्ा उख स्थान के डोमों से स्वप्नका सव हाल ककर; ` 


गतेतयपच्चत्‌ तत्रस्थान्‌ पुकसांस्त॒ स सम्भ्रमात्‌। | पूया तो उनमे से कच ने कदा कि ये सव निसी| . 
नेत्यचः केचित्‌ तत्रस्था एवमेवापरे, वरन्‌ ॥१६५॥| दूसरे के साथ दोगा ॥१६॥ यह खुनकर उस राजा 


‡ ने दुःखित होकर देवताश की शरणली श्रौर कहा .: 
1 दह त रना प कि देवता लोग मेरी खरी रव्या व वालक 


[न 
स्वस्ति इन्त मे देवाः शेव्याया बालस्य च कल्याण करं ॥ १६६॥ हे महान्‌ धम्म † ्रापको- , 
नमो र्य महते नमः कृष्णाय वेधसे । | नमस्कार है ओर श्रीकष्एच्् को भी जो परम 
परावराय शुद्धाय पुराणायाच्ययाय च ॥१६७॥ रे, शुध, पुराण श्नौर शरव्यय द नमस्कार दै ॥ , 


+ ह बृदस्पति ! दे इन्द्र ! आपको नमस्कार है । - ८ 
नमो स्पते तुभ्यं नमस्ते वासाय च । | कहकर वद राजा ोम-कमे प संलग्न दोग ; 


ुकसकम्ेणि॥|१६९८। | १६ र फिर स्थति न्ट कर मलिन, जिल जटिल ^ 
1 0 = ह तथा करौ दाथ मे लिये हप व्या्लसा| ` 
शवानां भूष्यकरणे पुननषटस्ूतियथा । | म्णन त + पर ६६॥ 


+ बद राजा मुदौं पर कर वसूल करता धा ॥ ५६६ 1. 
मिनो जटः ष्णो लट विहतो चपः॥५९९॥ फिर पु श्रीर भायोको विस्मरण कर शरीर... ~ 


नेव पुत्रो न भायां तु तस्य वै स्पृतिगोचरे। हीनता के कारण राज्यपाट को भी भूलकर बह ` 
नपरेताहो राज्यनागाद्‌ रमशाने निवसंसतदा १७०॥ स्मान म रने लगा ॥१०॥ उल =" `: 


1 


५ ~ -* चब न 


। 

+ 
| 
च 
४ 
भ 
५ 
] 


४० माक॑ण्ठेयपुराण श्र ८ 
----------------------------- 
स्वसुतं तमादाय लापिनी । ४ = 
स नरेन्रस्य सर्पदष् हि बालकम्‌ ॥१७१॥| "= ठ म्‌ कीसी दाह दाहक करने को 
स ¢ श्रई ॥ १७१ ॥ वह कृशाङ्गी, विवर, वेचैन श्रर 
कशा विषणा विमनाः पांश्वस्तशिरोरुहा ॥१७२।॥| चह कदती हई राई ॥ १७२॥ बह कट्‌ रही थी, दे 


राज वालं लं पश्य सोमं महीतले । ` | यजन्‌! शरान एवो षर पड़ ह श्रपने पुजको तुभ 
व ह नदीं देखते हो तओ दैववश सर्पं के कारने से च्ल 


हुए पुत्र को जिसको कर्प ने काटाःथा.लेकर . 


१ (१ द्ष् ७ | | . 
रममाणं पुरा दष्टं पष्ाहिना मृतम्‌ ॥१५२॥| को प्रात दश्यह ॥९७२॥ वह यज्ञा उस खी के रुदन 


ट £ $ 
तस्या विलावशब्दं तमाकण्य स॒ नराधिपः । | के शब्द को सुनकर शी मृतक का कर च वख 
जगाम लरितोऽ्चेति भविता मृतकम्बलः ॥१७४॥ लेने को बहौ गयां ॥ १७४ ॥ उस्र राजा. ने रोती 
सतां सेरदरीं मायौ नाभ्यनानानत पार्थिवः। | इट उस अपनी खी को जिसकी शङ्ग चिर वियोग 


चरवाससन्त् ९ श्मौर दुःख से वदल गई थी न पदिचाना ॥ १७५॥ 
पसः मेषाबलाम्‌ ।.१७५॥ ५ जिसके पिते 
चिरबार पुनाता लान्‌ शरीर वह रानी भी उस राजा को जिसके परिस 


सापि तं चस्केशन्तं पुरा दषटरा जटालकम्‌ । _ | केश थे न्नर अव जटाये थीं श्नौर जो अव खुले . 


नाभ्यजानान्दरपुता शुष्कषटक्षोपमं दपम्‌ ॥१७६॥ छृक्त के समाने क्षीर टोगया था न `पटिचान सकी' 
ती त + ॥ १७६ ॥ फिर उस राजां ने खर्प के विपसे पीडित. 
सोऽपि कृष्णे बालं शृष्ाशीविषपीडितम्‌ । काले कपड़े मेँ लिपटे हप उस वालकको राजोचित 
नरेन्लक्षणोपेतं चिन्तामाप नरेश्वरः ॥१७७॥ लक्णो से उक्त देखक्रर सोचना शरू क्रिया ॥१७७॥ 


ध ध “खहा ! बड़े कष की वात है, यह किस कुल का 
अरहो कष्टः नरेन्द्रस्य कस्याप्येष इले शिष्यः । वालक है जिसको निर्दयी काल ने अपना त्रासं . 


{जातो नीतः कृतान्तेन कामध्याशां दुरात्मना १७८।|| बनाया" ॥ १७८ ॥ यह देखकर सोचने लगा-कि. 


एवं दष्टा हि मे बालं मातुरुतसङ्गशायिनम्‌ | | मेरा कमलनेन रोदिताश्व भी इसी भकार भाताकीौ' 


मभ्याम ोहिताशोऽन्नलोचनः १७६॥ गोद मे रदता था ओर जो इस समय दूसरे कं 
सतिमभ्यागतो बालो रोहिताधोजनलौ त्रभ्यागत है ॥ १७६ ॥ फिर सोचा कि मेरे पुज की 


सोऽभ्येताभेव मे त्स वयोऽ्वस्थायुपागतः । | गक्ल शौर श्रवस्था भी फेस ही है, सम्भव दै 
पीतो यदि न घोरेण कृतान्तेनात्मनो वशम्‌॥१८०॥| निर्दयी काल ने मेरे लङ्क को दी उडा जिया दो ॥ 
राजपलन्युवाच रानी वोली-- | 


( ं मदत्‌ दे पु! ये महान भौन क्रिस पाप से 
ब्रत कस्य पापस्य अपध्यानादिदं मह्‌ । पु ! ये मद्‌ 1 
{ त्र ५ करः रहे हो १ हमारे ऊपर तो फेखा घोर कष्ट या. 


‡लमापतितं घोरं यस्यान्तो नोपलभ्यते ।।१८१॥| है कि भिसका अन्त ही नहीं मिलता है ॥ १८१ ॥ 


(= द थ [5 
1 साथ राजन्‌ भवता मामनाश्वास्य दुःखिताम्‌ । | € राजय! हा नप्थ । सुः इख्या को चोड कर 


गपि सन्तिषठता स्थाने विश्रब्धं स्थीयते फथम्‌१८२॥॥| च्ाश्वासन बयो नदीं देते हो १॥ १८२।-हे विधाता 


किस स्थान मे वैठेदो ? सुको आकर श्राप. 


= षि) 


[ष मी 


व्यनाशः सुदत्यागो भाररपातनययिक्रयः । | यजय नाश, वन्ु-बान्यवों का नियोग, खी च्रौर 


पु का विक्रय ! राजर्षिं हरिशन्र को किस पकार 


रि « श्वर र! वि धो कृतं त्या 14 ॥ म. “ च 
रिथनरस्य राजैः किं विषौ न कृतं स्वया॥।१८३ वमने पेखा कर दिया ॥ १८३॥ उसका यह. वचन 


ति तस्या वचः श्रुत्वा राजा खस्थानतश्च्छुतः । | चुनकर श्रौर च्रपनी खी को पहिचान कर राजञा-ने' 


्यमिह्ञाय दयितां पुत्रश्च निषनं गतम्‌ ।॥१८४॥| सममा कि पु भी तयु दोग शलौर उसी, जगह 
ष्ट शैन्येथमेषा हि स॒बाललोऽयमितीरयन्‌ः। | "गर पड़ा ॥९८४॥ @ गव्ये ! यद मदान्‌ दुः्व है 
रोद दुःखसन्तसो मूच्छोममिजगाम च . १८५।॥| क ९ भी मर गया ।* यद कहकर रोता इ 
रा च तं रत्यभिह्ञाय तामवस्थारुपागतम्‌ । | ब रानी भी उसको पदिचान करः तथा उसकी 

~~, निषयातातां निश्चेष्टा प्रणीवले ,१८९। बद, दा देलक डः से सूचित दोकरषथवी पर 
~+ ५. +. 1 1 4 ६.५ 


दुभ्ं स संक होकर वद मूर्धत दो गया 1८५ | 


 अद्गमत्यज्गसम्भूतो मनोहृदयनन्दनः । 


> 
1 
==. 


अन्८ माकर्डेयपुराण ४१ 


चेतः सम्भाष्य रानेन््ो राजपत्नी च तौ समम्‌ | | भिर पढ़ी ॥ ध८६॥ दोश मे शराने पर त्रे रना -. 
रानी संताप श्रौर शोक के भार से पीडति ८ ०५ 


बिलेपतु; सुसन्तक्तौ शोकभारावपीदितौ ॥ | विलाप करने लगे ॥ १८७॥ 


राजोचाच राजा वोल्ते- 
हा वत्स सुकुमारं ते स्क्षिमरूनापिकालकम्‌ हा वत्स | तेरे सुकुमार शरीर, नेज, भोँद १.१ 
र मे | श्नौर केशों को तथा दीन अख को देखकर ५“ 


पश्यतो मे शुखं दीनं हदयं कं न दीय्यंते ॥१८८॥ छाती क्योँ नीं फटती ? ॥ १८८ ॥ “तात” “तातः 


` तात ततिति मधुरं श्वाणं स्वयमागतम्‌ | पेली मीठी बाणी से बोलता दुरा अव कीन मेरी 


उपगु वदिष्ये कं त वत्वेति सौहृदात्‌ ॥१८६॥ व व ध 


कस्य जानुमणीतेन -षिङ्गिन क्षितिरेणुना। | किसके शरीर की रेणु मेर वस ब श्ज्ञौको मलिन 
-ममोत्तरीययुत्सङ्ग तथाङ्ग मलमेष्यति ॥१६०।|| करेगी ? ॥ १६० ॥ श्रपने अङ्ग त्य् से उत्पन्न 
तथा मेरे मन श्रौर हृदयको आनन्द देनेवाला मुभ 
कषा दुष्ट पिता द्वासा मेस पुत्र साधारण बस्तु की तर 
० मक्गीतो येन धस्तुबत्‌" १६१॥| वेच दिया गया ॥१६९॥ श्नौर श्रशेष राज्य, साधन, 
हत्वा राज्यमोपं मे ससाधनधनं महत्‌ । | धन हरण करके भी निर्दयी दैव ने मेरे पुजरको सं 
दवाहिना दृशंसेन दष्टो मे तनयस्ततः ॥१६२॥| वनकर काट खाया ॥ १६२ ॥ ५५ मै व सपं 
अहं॑दैषादिदष्स्य॒पूव्स्याननपदनम्‌ । | से काट ह कमलरूपी सुख वाते यन क प रद 
र जोकि विष से रृष्णवणं हो रा है ॥ ६१३॥ 
निरीक्षच्पि घोरेण विपेणन्धृतोऽ्ुना ॥१६२॥| यद ककर उसने आं भे शस्‌ मरकर 
एवुक्तवा तमादाय बालकं वाष्पगदरद्‌;। | उस वालक को छाती से लगाया श्र भूं से. 
परिष्वज्य च निश्चेष्टो मूर्च्छया निपात इ।१६४॥ अचेत दोकर भूमि पर गिर द्र ॥ १९५॥ = 
9 १; पी भर पति मल देत भ 
श्रयं स॒ परुषव्याघ्रः र खरस पति मालूम होते दै, मेर ' ॥ 
२ ५ सरशोपलकषयते। राजा दस्थिन्द्र जो बिद्धानों के भनके चन्द्रमा ठै 


विदरज्जनमनशन्दरो हरिनद्रो न संशयः ॥१६५॥ दी दै, इसमे संशय दी १६५॥ क ही म 
तङ्गा ्रग्रतोऽ्योगुसं तोते के खमान नाके श्नौर दः फूल , की ' 
१ ९: गता । | ऊली के समान दै । मेरे पति पखिद्ध श्ओोर महान्‌ | 
दन्ता युङृलरस्याः ख्यातकीत्तमहात्मनः॥१६६।॥ श्रत्मा वालि द ॥ १६६॥ वद 1 समय | 
श्मणानमागतः कस्मादचप येप सं \ स्मशान मे कैसे श्राय ? वह पुत्र शोक का भूलकर 
श्रपहाय पच्रशोकं सा $ पतितं 1 | । & गिरे हप उन अपने पति को देखने लगी ॥ १६७॥ 
8 ९६७ स्वामी शौर पु्के शोक से पीडित भय से युक्त 
भृश तरिरिमिता दीना भन पुत्राधिपीडिता । | दो उसने अपने पति की भीषण यातना को देखा 


, वीक्षन्तौ सा ततोऽपश्यद्रभच्ु दण्ठं जुगुप्सितम्‌ १६८॥| ॥१६८॥ वह विशाल नेत्र वाली यद सोचकर कि 


7 


पवपाकादमतो मोहं जगामायतलोचना । त २ धू | 
भाष्य चेतय शनकैः सगद्दमभापत ॥१६६।| बोली ॥ १६६ ॥ दे दैव | तेरी ल दया (रता ) | 
धिक्‌ सां दैषात्िकरणं निम्म॑य्यादं गुप्तम्‌ | | को ८ ५ इस देवता व | 
मो नीती राना श्वपाक \|| अमर्यादित दौकर चारुडालपन 
1 ष 1 स ग ॥ राज्य नाश, वन्धु-चान्धवों का विषो, | 
राञ्यनाशं सुहृत्त्यागं भा््या-तनयविक्रयम्‌ । | खी श्र पुत्र कां विक्रय, इन सव वातो के होते, 
भापयिलापि नो ुक्तथर्डालोऽयं कृतो दषः २०१॥| हण इसको न छोड़ा शरीर चाणएडाल ्ना दिया ॥ 
हा राजन्‌ मतसन्तापाभिल्यं मां परणीतलात्‌ । | 2 सजन पृथ्वी पर'पड़ी हई सङ्कट को प्रात सु 


, ४२ ण माकंर्डेयपुराण ॥ अ० 


युच्यते ॥२०२। को श्राप ठाकर पलक पर कयो नदीं लते श्रीर 
(त्व ता कि | से वोलते है २०२ ये विधिकी कैसी वामता 
नाद्य पश्यामि ते च्छं भृङ्गारमथवा पू श्राज मै तुम्दारे पाख चलुज, -चम॒र, पंख 


चामरं व्यननश्चापि कोऽयं बिधिषिपय्ययः।।२०२॥ श्रादि कुल भी नदीं देखती ह ॥२०२॥ जिसके श्रागे 
यस्याग्रे नतः पूर्वं राजानो शरृत्यतां गताः। | श्रे पदे रजा लोग सेवकत्व को. भप्त हो 
खोचसीयैरक्वन्त नीरजस्कं महीतलम्‌ ॥२०४ | श्रपने उत्तरीय बसँ से मागं की धूलि साफ़ करते 


४ ५ थे ॥ २०४ ॥ वह राजा इस घोर स्मशान मे जहां 
सोऽयं  कपालसंलमन-घटीषटनिरन्तरे । कपाल, सतकों के वदन, निर्माल्य सूत्र, केश, शरादिः | 


गृतनिभ्मासयसूत्ान्तगृढकेरे सदारुणे ॥२०५। | ह ॥ २०५॥ श्र जहाँ रुधिर श्रौर वसा से सूते 
वसानिस्यन्दसंशष्क-महीपुटकमर्डिते । | इए दोनों, सुर्यो की राख श्रौर श्रधजली इडां 


श्रौर मजा के ठेर से भीषरखता छास्टी दै ॥२न्६ 
भस्माङ्गारा्दग्धास्थि-मल्नसष््टभीषणे ॥२०६॥ त 


रभ-गमायुनादातत-नषुदरिदज्गम । | ॐ भीषण नाद से श्रातं दोरा श्रौर जहाँ चिता- 
चिताधूमाततिरूवा नीलीढृतदिगन्तरे ॥२०५७॥| ओं के धँ से दिशं काली दोरदी है ॥ २०७॥ 
कुणपास्वादनयुदा सम्महृष्टनिशाचरे । | ज्यौ रक्तस लोग सदौ को खाकर उनन्मत्त होरदै 


चरत्यमेध्ये राजेन्द्रः र्मशाने दुःखपीदितः ॥२०८॥| ई रेते स्मशान मे दुःख से पीडितं यहं राजा रहता 
भरतव रनः लाने सीरत ॥२०८ है ॥ २०८ ॥ यदह कहकर रानी राजा के करट से 


एववा समारछषय करटं रो दरपात्मनां । | लिपट गह श्रीर श्रातं बाणी ते शोक समुदधमे इवी 
फष्टशोकशताधारा विललापात्तया गिरा ॥२०६॥ हई विलाप करने लगी ॥ २०६॥ 

सजपल्युचच नी बोली- 
रजन्‌ स्वरोऽथ तथ्यं घा यदेतन्मन्यते भवान्‌। हे.राजन्‌ ! यं स्वप्न है थवा तथ्य, श्रापका 


क्या मत है ? क्या सुभको मोद दोगयद ? दे महा 
तत्‌ कथ्यतां महाभाग मने वै शृदते मम ॥२१०॥ चाहु ! मुभासे सव हाल किये ॥ २१० ॥ श्रगर यह 


तदेवं पमं = ठीक पेखा ही है तो हे धमक ! धर्म अथवा बाह्मण 
धम्परत्न धम्त्‌ 
यच तदेवं धम्मक्ग नास्ति धम्मं सहायता । ग्नि की पूजा व पालन मे ऊ तत्व नदीं 


तथैव ॒भिमदेवादिपूजने पालने शवः ॥२११॥ है ।॥२९९॥ यदि धर्म दी नही है. तो सत्य, शील 


नास्ति धर्म्म कृतः सत्यमाज्जवं चान्रृशंसता। | श्रौर दथा भी कटां है जो श्राप . सयीसे. धर्मात्मा 
॥ गि जिसने राज्य तक दान कर दिया उनकी पेसीं 
यत्र त्वं म्म॑परमः खराब्यादवरोपितः ॥२१२॥| दथा है॥ २९२॥ | 


पक्षिण ऊचुः ~ | | 
। ॥ चोले-- । 
इति तस्या वचः शरुत्वा निश्वस्योष्णं सगद्गदम्‌ । इस प्रकार उसके वचन सुनकर गद्गद दोकर 
कथयामास तन्व्या तथा प्ता श्वपाकता ! २१३| यजाने गमं सांस ली शरीर जिस प्रकार चांडालता 


को प्राप्त किया बद कह सुनाया ॥ २१३ ॥ श्रौर 
रदित्वा सापि सुचिरं निश्वस्याष्णश्च दुःखिता: | अपने पुत्र के मरने से इुःखित रानी ने भी खव ) 


स्वपुत्रमरणं भीरूयथाृत्तं न्यवेदयत्‌ ॥२१४॥| रोते इण तथा दुःखित दोकर गम श्वास लेते इए | 
शरुत्वा राजा तथा वाक्यं निपपात महीतले! | अपना इत्तातं खनाया ॥ २१४] राजा उसके वचन 


शृतस्य पुत्रस्य तदा जिया लिलिदैन्पुखम्‌।।२१५॥ 9 1 ० 
जोवाच 


धी । राजा चोला-- 
भरिये न रोचये दीघं शालं केशयुपासितुम्‌ । हे भिये ! मरे दुभाग्य को देखो मै दीं कालसे 


केशो मे पड़ा 
नात्मायत्तथ तन्वङ्गि पश्य मे मन्दमाग्यताम्‌॥ २१६॥ नहीं होवा ॥ व । श्रव. ये सच इक सहन 


चारडाल की द्ाज्ञा विना लिये ह श्रग्नि मेँ 
जलता ह तो फिर दृसरे जन्म म भी चारडल की 
दासता करनी होगी ॥ २१७ ॥ तथा नरक मे जाकर 
की का भोजन करना दोगा श्रौर वैतरणी नदी 
वैतरण्यां महापूय-चसाखक-सनायुपिच्विते ॥२१८॥ म रदकर मास, मजा 1 
८ दोगा ॥ २९८॥ तथा श्रसिपत्र नामक चन मे जदं 
# असिपत्रवने प्राप्य च्छेदं प्राप्स्यामि दारुणम्‌ । ० ष है जाना पड़ेगा श्रौर रौरव परं 
+ बहारौखसेरवौ महा सौरव नरको मे पर्हुचकर धोर दुःख उशना 

तापं भाष्स्यामि वा माप्य महारौरसरौ ॥२१६॥| पड़ेगा ॥ २१६॥ षस दुभ्ल क व मे इवकंर 


मग्नस्य दुःलमलञथौ पारः माणवियोननम्‌ | | मरने तो भ्ाणु छना उत्त दै, फेला भी 
विचार करता ह कारण कि वंश चलाने 


एकोऽपि वालको याऽयमासीदशकरः सुतः॥२२०॥ एक पुत्र था वह भी ॥ २२०॥ वल ०१५ 
< नः # जल के चेग म इव गया अथाः 
५ द वाम्बुेगेन 1 सोऽपि बलीयसा । | सर्पं के काटने से मर गया । अव यै दुस्म॑ति स्वं 
कवं प्राणान्‌ बिषशवामि परायततौऽस्मि र्गतः २२१| नरक का विचारः करके भायोंको करय नी चछोडता 
श्रवा नासिना | ह ?॥ २२१॥ तथा यह भी विचार करता हं किं 
र तिना लिटि नर पापमवेक्षते । | दुभ्व से पीड़ित मजुप्य पाप को नदीं देखता दै । 
तिथ्यक्तवे नास्ति तदृदुःखं नासिपत्रवने तथा २२२॥ ध योनि ध्रीर 6 चनमेभी इतना दुख 
वैतरण्यां इतस्तादख्याददशं पुत्र नहीं हे ॥ २२२ ॥ श्रथना वैतरणी मे भी इतना दुख 
साज दशं पत्रनिप्लये । | कं है जितना कि धु के वियोग भ दै  इ्सिये 
ऽहं सुतशरीरेए दीप्यमाने हुताशने ॥२२२॥ इग शरीर मेँ श्रम्नि लगाते समय ॥ २१३ ॥ उस 
१ तन्ङ्धि वः ग्नि मे गिरपड़ंगा । दे छन्द्र शरीर बाली ! मेरी 
निपतिष्यामि नञि पन्त्य इषं मम । | श्रियो को चमा करना । मेद तुमको आका दै 
्लङाता च गच्छ तवं विमवेश्म शुचिस्मिते |२२४॥| कि त॒म विप ॐ घर जश्नो ॥ ९९५॥ हे कोमलाङ्गी । 
मम बाकयश्च त्वद्धि निवोधादतमानसा । | मन ल मर वचनो को शुनो, यदि तुमने दान 
यदि दत्तं यदि हुतं गुरो यदि तोपिताः ॥२२५॥ 
परत्र सङ्गमो भूयात्‌ पुत्रेण सह च स्वया । 


हवन किया श्नौर शु व्राह्मण को संतुष्ट किया तो 
॥२२९॥ परलोके मेरा, वम्दाया यर पुचका सङ्गम 
इह लोके $तस्त्येतदभपिष्यति ममेङ्गितम्‌ ॥२२६॥ 
त्वया सह मम श्रेयो गमनं पुतरमा्से । 


हयो जावेगा इस लोक मे तो मेरो इच्छा के श्रचु- 
यन्मया हसता किश्िद्रहस्ये वा शुचिस्मिते ॥२२७॥ 


सार कुद भी न दोगा ॥ २२६॥ पुज के माग पर्दी 
तम्द र सुमे जाना रेष है श्रौर हे पवि मुख 

-रश्वीलक्तं तत्‌ सत्वं क्षन्तव्यं मम याचतः । 
.} रानप्लीतिं गर्वेण नाव्य; स ते दविजः॥२२९८॥ 


वाली ! यद्या एकान्तम जोक मैने॥२२अ॥श्रसुचित 
वात तुमसे कटी टो बह खव मेरी याचना करनेसे 
सर््वगरत्नेन श [9 
त्नेन ते तोष्यः स््ामिदेवतवच्छुमे ॥२२६॥ 
राजपत्न्युवाच 


तमा करना, तथा कभी राजपत्नी होने के गवं में 
ब्रह्मण की अवक्षा न करना ॥रेर८ ॥ सव मकारः से 
श्रपने स्वामी उस बाह्मण को सेवा से सन्तुष्ट 
करना ्ादिये ॥२२६॥ । 
ग्रहमप्यत्र राजे दीप्यमाने हुताशने । 
दुःलमारासहाचे सह यास्यामि बै लया॥२२०॥ 
0 ५ ६८ > रोगे प चचन 
सगं स्ह यु्व या नेरक को भोगे । रजा ने उसके ` यह चन 
ष सर्गश्च नरक सैवायाहि येद्छव ह । यि शदे पत्ते! ची उम्दा 
भुरा राजा वतोवाच एवमस्तु पतिव्रते ॥२२१॥। इच्छ टो" ॥ २२९ ॥ । 


चणएडालेनानसुङ्गातः भरवेकषये जवलनं यदि | 
चण्डालदासतां यास्ये पुनरप्यन्यजन्मनि ॥२१७॥ 
नरके च पतिष्यामि कीटकः कृमिभोजनः । 


रानी बोली- । 
हे राजर्षिं | तरै भी म्नि पज्वलित ह्येते दुख 


भारको न सद सकने ङे कार्ण श्रापके साथ 
[1 4 श 
जलंमी ॥ २३०॥ वहा पर साय ही हम जोग सगं 


४४ माकैरुडेयपुराण ञ्म०८ ` 
-------------------------------------~ 
पक्र उचुः | पी वोल्ते- - | 
ठतः कृता चितां राजा आरोप्य तनयं खक्‌ । फिर सजा ने चित्ता वनाकर श्रपने पुज्को उस 


पया स्वितथासौ बदवाञ्जलिपुरस्तदा पर रक्खा श्रौर रानी खदित दाथ जोड्कर 
= दं २। । 
भाग्या इष्ट ुरस्तद! ॥२२ 1२२२ जड चेतन के हृदय मे वासकरने परमात्ा, 


चिन्तयन्‌ परमात्सानमीशं नारायणं हरिम्‌! | का जे ह्वर, नाराय, हरि, बासुदेव श्र देवेश्वर , 
हृ्कोररुहासीनं शसदेवं॒दयुरेश्वरम्‌ ॥२३३।॥ है स्मरण किया ॥ २२३ ॥ जन्म मरण से रदित, 
अनादिनिधनं ब्रह्मं कृष्णं पीताम्बरं शुभम्‌ । | पीताम्बर्धारी, परब्रह्म, परमेश्वर का त्यान्‌ .करतं 
तस्य चिन्तयमानस्य सव्य देवाः सवासवाः २२४॥ इण न्दर खष्दित॒ सव दवता ॥ २२४ ॥ धम 


धस्पं भरसुखतः कला समाजग्धुस्खरान्विता को रासे कर्के जल्द कहा माये श्मौरः सव वरटा 
आगत्य स्वैभोडसे मो भो राजन्‌ शरु ममो२२५॥ आकर यो्ञे, हे राजद ¡ तुम निर्दोष दो" ॥२२५॥ 
गत्व ्षन्वमादुस्त भा भ रजिन दुवा ९५८५ तुम्दारे ध्यान करने से सव देता आये दै 1 यद 


तष चिन्तयमानस्य सपे देवाः समागताः । | सान्ताव्‌ व्रह्मा है, तथा स्वयं भगवान्‌ घम भी 
रवं पितामहः घा्षाद्ुम्मे् भगवान्‌ स्वयस्‌॥।२३६।} उपस्थित हे ¶रद६॥ विश्वदेवो सखद्दित साध्य, पनन 
पाध्याघ विश्वे सस्तो लोकयालाः सवाहनाः | | चारणो सहित लोकपाल, नाग, चहस्पति सहित 


खिद्धं नाय, हद्वगख ज्ौर अण्विनी कुमार ॥ २२७ ॥ 
नागाः षिद्धाः सगन्धन्वां सद्ाश्चेव तथाश्िनो २२७ यह वथा अन्य व्व से न्नर विश्वामित्र भी यदं 


एते चाल्ये च उहवो विश्वामितरस्तयेव च ।॥२३८॥ मौजूद दै ॥ रू ॥ 


धस्मृउवाच घर्भरज बोले- । क 
मा राजन्‌ साहसं कार्षीधम्मऽं तरादुपागतः । ! ड राजन्‌ ! ठेखा खादस मतकरो, म ध्म तुम्दारे 
तितिकष-दम-सतवाचेः सगुः परोषित ` पास आयः ह । तुमने सुमे तितिक्तादम आदि शुरो 
5 ¦पर्तिषितः।२३६॥ से सुण किया द ॥ २२६॥ 
र इन्द्र बाला-- 
हरिथनदर महाभाग पापः शक्तोऽस्मि तेऽन्तिकम्‌ ; डे मदाभाग हरिन ! ज इन्द्र॒ चुम्डारे पास 


छया, तमन छपे पुत्र 
खया समायपत्रेए भिता लोकाः सनातना॥ २४०। | लोन न ड 8 व न 


आरोह मिदिवं राजन भार््यापत्रसमन्वितः | | अपनी खी व पु के सदत स्वम को चलो, तुमने, 


अपने शभ कमा से जिसको प्राप्त क्रिया है बह 
सट्यप्तं नरैर्येनितमात्मीयकम्पभिः ॥२४१॥ दृ ऋ दरम ड 1२४१ ॥ 


प्ति ऊ पती वोले-- । 
तताऽयतसय वषमण्मृत्युविनाशनम्‌ ॥ | पतिर इन्द्र ने खुख पूर्वक श्रत जो सत्यु का 
इन्रः भाख्नदकाशाचितास्थानगतः भदः ॥२४२॥॥ नाक है करा से चिता के मध्य भै चिडका 


पुष्पवषेश्च सुमदेवदुन्दुभिनिसखनम्‌ दभिनि्वनमू | [1२७२ ॥ तव पुष्प वपा हई तथा महान्‌ दुन्दुभी 
ततस्ततो वतमाने समाजे देवसंङृले ॥२७३।। नाद हुता ! उख समय देवतान के इस खमारोद ` 


समुत्तस्थौ ततः पुत्रो रहस्वस्य महात्मन; ! | मे ॥ २४३ ॥ उ महात्मा रज्ञा का पुत्र खस्थ, 
पुङमारतचुः सुस्थः भसतचरेन्धरिवमानघः २४४1 भसन्न चित शौर उङमारदोकरजीवित्‌ हो उडा॥ 
ततो राना हरिजनः परिष्वज्य सूतं क्षणात्‌ । फिर राजा हरिशचन्द्र ने अपने पुज को छाती से 


(- 8 क दिव्यसास्यास्बरान्ितः त्रयस्य 4 स] 

व्समाय्यैःस भ्रिया युक्तो दिन्वसाल्यवास्वरान्वितः स ते ज र चर , 
सम्पद्य सगल सद्ाच्ला म्‌ जान सम्परुखं . 

# | | च 

रुस्थः सम्पूणद्दयो खदा प्रमया युतः । खसयतः शरोर हदय स आनन्द आ किया} लल 

भूव तवृप्षणादिनद्रो भूयश्चनमभायत ।२४६॥| समय इन्द ह । 

्एमास्यैस्तं सपुत्र पराप्स्यसे सद्रतिं पराम्‌) इन्दर न उससे का ॥ २७६ ॥ हे मदाभागः ! 
ड प्रम्‌ । । चम अपने श्म कमो के कारण पने पुन श्र दी 


> 4 ~ 


० 


देवराज नमस्तुभ्यं बाक्यशवैतननिवोध मे । 


4 वुस्यमेभि्महापापं भक्तत्यागऽपयुदाहतम्‌ | 


~~ 


भ्र ८ माकंरुडेयपुराण ` प 


न 


सहित स्वर्ग लोक को चलकर खद्गति को प्राप्त 
दोच्यो ॥ २७७ ॥ , 
हरिश्चन्द्र चोल्ते-- . 

हे देदराज ! स्वामी श्वपच की आज्ञा विना 


उसका निशादर करकेे स्वर्गको न जाड गा॥२४०॥ 
धर्मगाज चोक्े-- । 
क 
तमने मेरी मायासे इस प्रकार कष्ट पाया है । 


मैने दीडाम होकर तुमकोचांडाल यनायाथा ॥२४६॥ 
इन्द्र ने कहा- 
_ दे दरिचन्दजी ! थ्वी प्र समस्त मदुष्य 
जिस खगं के लिये प्राथना करते उस पुरयग्छोक 
स्थान को तुम चलो ॥ २५० ॥ 
दरिधन्द्र वोले-- । 

हे देवराज } आपको नमस्कार है, इस मेरे 
वचन को श्राप सुनिये । चकि आपकी मेरे ऊपर 
छपा है इखल्िये विनय पूरवंक कहता द ॥ २५१ ॥ 
अयोध्या नगरः निवासी मेरे विरह की श्म्नि में 
जल रदे है, उन लोगों को फेसी दशा मे चोड़करः 
नै किस तरह स्वर्ग को जाऊ ॥ २५२॥ जो पाप 
ह हत्या, श दत्य, ग वध, जी वध, आदिका 
है वैखा ही पाप भक्त को त्यागने मे है ॥२५२॥ सेवा 
करने बाले भक्तों को चनौर देखे हपट खख को छोड़ 
कर नदेखे सुख की शरोर जाना उचित नदीं है 
इसलिये दे इन्द्र ! राप स्वर्गं को जाये ॥ २५४॥ 
हे खरेन्ध ! यदि वे खच स्वर्गं को साथ २ चलं तो 
मै भी जाञंगः नन्यथा उनके साथनरक को भी 
जाने को उद्यत हं ॥ २५५ ॥ 
इन्द्र बोले-- 

उन लोगे वहत से पाप श्रौर पुथ अलग 
श्रलग ह । तुम उनके साथ भोगों को भोगते इण 
किख प्रकार खरग प्राप्त कर खकोगे ! ॥ २५६ ॥ 
इरिथन्द्र बोले-- 

हे इन्द्र ! भजाच्नों के द्रव्ये राज्य भोगा तथा 
मदा यज्ञ श्रादि खक कयि ॥ २५७ ॥ चकि 
उनके प्रभाव से अ्रथांत्‌ उनके कारण से यज्ञादिक 
का अनुष्ठान हु्रा अतः वे भी उपकार के भागी है, 
खगं की इच्छा से उनका साथ न दछोडंगा ॥ २४८॥ 
इसलिये हे दनेश ¦ मेरा जो छट श्रयष्ठान, दानः 
प 6 ५ > पि - यज्ञ, जप का पुरय है बह खव मेरा.भजा के साथ 
द्तमषटमथो नपत सामान्यं तसतदस्त्‌ नः ॥९५९॥| है। मो त वरह या पुव भल जो 
बहुकालोपमोग्यं हि फलं यन्मम कम्पैः । | क भी हो वह आपकी रासे मजएजनों के सा 
तदस्त दिनमप्येकं तै! समं लस्मसादतः ॥२६०]॥ दी दोना चाये ॥ २६० ॥ 


समारोह महाभाग निजानां कम्मण फले; ॥२४५७॥ 
इरिश्चन्द्रं उदाच 
देवराजानलुङ्गातः स्वामिना श्वपचेन वै । 


ग्रगत्वा सिष्छृतिं तस्य नारोक््येऽं सुरालयम्‌॥२४८॥ 
धरम उदाच 


त्सैनं भाविनं हेशमवगम्यात्ममायया । 
श्रातमा श्वपाकतां नीतो दर्शितं तत्सपुकसं॥२४६॥ 
इन्द्रं उत्र्च 
भर्ते यत्‌ परं स्थानं ` समस्तमेुनेभुव । 
तदारोह हरिशन्द्र स्थानं पुस्यद़ृतां रणाम्‌ *२५०॥ 
हरिश्चन्द्र उवाच 


भसादसुष्ुखं यत्‌ त्वां बवीमिभश्रयान्वितः।।२५१॥ 
मच्छोकमग्नमनसः कोशलानगरे जनाः । 


तिष्ठन्ति तानपोदयाय कथं यास्ाम्यहंदिवम्‌॥२५२॥ 
हत्या युरोधाती गोवध; स्त्रीषधस्तथा । 


अनन्तं भक्तमत्याञ्यमदुष्टं स्यजतः; सखम्‌ । 
नेह नात्र पश्यामि तस्माच्छक्र दिवं वरन ॥२५४१ 
यदि ते सदिताः स्वगे मया यान्ति सुरेश्वर । 
ततोऽहमपि यास्यामि नरकं वापि तैः सह ॥२५५॥ 
^ इन्द्र उवाच 
बहूनि पुण्यपापानि तेषां भिन्नानि वै पृथक्‌ 
कथं सह्ातभोग्यं तं भूयः स्वगग मवाप्स्यसि॥२५६॥ 
, दरेश्चन्द्र उव्राच 
शक्र युद्वे दषो राज्य प्रभावेण कुटुम्बिनाम्‌ । 
यजते च महायतैः कम्मं पौत्तं करोति च ॥२५७॥ 
तंच. तेषां भरमावेण मथा सव्व॑मतुष्ित्‌ । 


उपकातृन्‌ न सनये तानहं सगंलिप्सया५२५८॥ 
तस्यादूयन्ममः देवेश किञ्चिदस्ति सुषेष्ठितस्‌। 


४६ माकंर्डेयपुराण श्र०्८ 


2 
-~-~--- => 


------------------~_~__~_~~_ {` 


पक्षिण उचुः पकती चोले-- इ 
एवं भग्रिष्यतीलयुक्तवा शक्रस्िशवनेश्वरः । “इसी भकार होगा" यद्‌ कहकर तरिसुवनयति 
मस्नचेता धर्म्म विश्वामित्रश्च गाधिजः ॥२६१ बद, घनं र गाधि पुन विन्धभिन असन चिच 
वानो ससो | हए ॥ २६१ ॥ देवताश्नों शरीर उनके श्रधिपति इन्द्र - 
पेमान खगलोकान्दीतलम्‌ । | ने लोकों पर दया करके करो बिमान स्वं घे 
वकार देव देवेश लोकासुग्रह कारिणा ॥२६२॥॥| पृरथ्वीतल तक जोड़ दिये ॥ २६२ ॥ श्रीर नगर "मँ 
लला तु नगरं स्वै चातुवएया्रमेषतं । | जाकर सव चारों ्राश्रमो म रढने वाली परजा फो . 
रिथनरस्य निकटे मोबाच विबुधाधिपः २६३॥| राजा दर्दर के निकर इहच करके इन्द्र बोले 
गच्छत जनाः शीघ्र स्वर्गलोकं सुदुसभं । | ॥२६२॥ “दे भजाजनो } जो स्वलोक ऋर्यन्त दी 
भादातमा्ं सवे युष्ाभिरेव च ॥२६४॥ दुलभ है उखको श्राप सव लोग धर्म के वल से 
प ५ ४ भ चलि २६९॥ करोड विमानो को स्वरसे. पृथ्वी 
वेमानकोिसंवाध मन्तरिप्षं महीतलं । | तक लगा करः अयोध्या निवासियों से स्वर्गं चलने 
एृत्वायोध्याजनं पराह दिवमारुदयतामिति ॥२६५॥ को इन्द्रदेव ने कहा ॥२६५॥ 

पक्तिण ऊचुः पक्त वोल्े- , 
[दिनद्रस्य चः भत्वा भीत्या तस्य च भूपतेः । इन्द्र के वचन सुनकर राजा दिन्द्र ने प्रेम 


महातपा; पूर्वक अपने पुत्र रोहिताश् को ` बुलाया ॥ २६६ ॥ 
पानीय रोदिताश्वञ्च षिश्वामित्रो महातपाः २६६।॥| रय अना त त अवं 
प्रयोध्याख्ये पुरे र्य सोऽभ्यसिञ्चन्ृपात्मनम्‌। | श्नौर इन्र सदित राजा ने श्रपने भिय पुत्र रोषि. 
वश्च एनिभिः सिद्धं रमिषिच्य तराधिप्‌ ।॥२९७ | ताश्व को दिया ॥ २६७ ॥ उस समय व भजाजन 
एङ्ञा सह तदा सर्व्वे हष्टपुष्टुहज्जनाः । स र ५ क ५२ 
ह, वको के सहित राजा के साथ स्वर्गं को च 
त्रमतयदारास्ते दिवमारुरहूनेनाः ॥२९८॥| ॥ २८८ ॥ कतरा क व्रिमान से इ वि 
परदे षदे बिमानात्‌ ते विभानमगसन्‌ नराः| | पर प्रजाजन जा रहे थे श्रौर उनके साथ असन्न 
तदा सम्भूतहर्पोऽसौ हरिश्चन्द्रश्च पार्थिवः, २६६॥ दोकरः राजा हरिश्चन्द्र भी ॥ रद ॥ बह राजा 
| विमानैः स महीपतिः हरिश्ंद्र अतुल विमानोके साथ स्वगं द्ारपर प्च 
पम्पराण्य भृतिमतुलां मानः स महपत्‌ः | जहाँ पर सखव मकान जवादिरात. के वने हए ये 
आसरा्वक्रे पुराकारे वभभाकारसंटते ।२७०॥ व (8 व खगे मे श्राया इमा 
लोकं खकर दैत्यां के आचाय, सव शाख्रों के तत्व को 
ततस्तस्यदविमालोक्य लो रोना शा ( ' | नल क उल. पास स्वम 
दत्याचार्थ्यो महाभागः सन्वेशास्राथतत्ववित्‌२७१। मे गये ॥ २७१॥ 
शुक्र उवाच शक्र वोक्ते- 0, 
श्रो तितिक्षामाहात्म्यमहो दानफलं महत्‌ । |, अरहा ! तितिक्ता शोर दान का महान्‌ 
। क है जिससे राजा हरिश्चन्द्र नगर सहित 
यदागतो हरिश्चन्द्रः पुरीजबेनद्रत्वमाकषवान्‌॥२७२ ||| स्वर्ग को चले गये ॥ २७२ ॥ 
। „ , पञ षह | 
तत्‌ ते सच्वंमाख्यातं हरिश्चन्द्रपियेष्टितम्‌ । डे जेमिनिजी ¡ इस प्रकार हमने राजा दग्धं 
ह ॥ की कथा ्ापसे कदी । इसको जो सुनता है बट 
6 शृणोति 9 मते महत्‌॥२७२॥| ली भी मदान्‌ सुख को भा करता है ॥ २७२ 
त्राथी लभते पुत्रं सुखार्थी सुखमाप्ठु यात्‌ । पुज की कामना स चाला. पुत्र ल हः 
वर्य्या्थी भा प्ुयातु भारय ल. खख कं वादा करने बाला सुख पातादहे, खीकी 
ल ४ इच्छा करने वाला खी ओर राज्य की श्च्छा करने: 
सज्यमाष्ठुयात्‌ ॥२७४।॥ बाला रज्य को पाता ह ॥ २७६ ॥ उसकी संभराम. 


, अ०.६ माकैणडेयुराए ` ४७ 


-------- 
संग्रामे पिजयस्तस्य न च स्यान्नारकी गतिः। ५ ५ द श्र उसकी नारकी गति नही 
अतः परं कथाशेष; भ्ूयतां युनिस्म ॥२७५॥| मौ हे जेनिनिरी 1 ५६ र 


विपाको राजसूयस्य प्रथिमीनयकारकः । यज्ञ का फल नी ६ का देने बाला 
सनि हे उसी प्रकार सारस श्रौर बगुले की लङ का 
तद्विषाकनिमित्तञ्च शवक महत्‌ ॥२७६॥| भी महान्‌ फल दै ॥ २७६॥ जो विश्वामित्र शौर 


| विश्वामित्र वशिष्ठाभ्यां शापदोषादभूत्ततः॥२७७॥ वशिष्टमे शापक्े दोष से श्रापस मे हर ॥२७७॥ 
| इति श्रीमाकेण्डेयपुराण में हरिश्चन्द्र उपाख्यान नाम -का आवां अध्याय समाप्त । 


. -- ®9-०५€4-- 
नवां अध्याय | 
पक्षिण उचुः पत्ती बो्ते - । 
राल्यच्युते हरिश्चन्द्र गते च त्रिदशालयम्‌ । राज्यवच्युत दोकषर राजा हरिश्चन्द्र के स्वर 


॥ प्चनेपर उनके.परम तेजस्वी पुरोदित श्रीवशिष्टजी 
निश्चक्राम \महातेजा जल्षवासात्‌ पुरोहितः ॥ १॥ जलवास से निकले ॥ १॥ मुनि वशिष्ठजी ` खङ्करप 


वशिष्ठो दादशाब्दान्ते गङ्गापस्यषितो युनि; । | के कारण ग्ाजक्त मे वारह चं रढने के वाद्‌ 


चाहर निकले श्नीर उन्दने विश्वामित्र की सव 
शुश्राव च समस्तन्तु पिश्वाभित्रविचेष्टितम्‌ ॥ २॥ लोचषादीः हवी ॥ २१. की दि 


हरिश्चनरस्य नाशल्च रात्श्चोदारकम्मंणः । | राज्य का नाश, उनका चाडाल होना तथा उनकी 
„८ चणडालसम्पयोगल्च भाया -तनयगिक्रयम्‌ ॥ ३ खी शोर पुज का विक्रय श्रादि वातं खनीं ॥२॥ 
स श्रुला उमहाभांगः ्रीतिमानवनीपतौ 1 | श साज सा कोम मे विलं 


कोपं विश्व [मिन 

चकार कोपं तेजस्वी विश्वामितरपूपिं भति ॥ ४॥| करके ध विश्वा | केभ्रति ष 
चशिष्ठ उवाच वशिष्ठ वोले-- ति 

मम पुत्रशतं तेन विश्वामित्रेण धारितम्‌ । दे विभ्वामित्र ! तुमने मेरे सौ पुज का वध 


| । किया था उस खमय भी सुभे इतना क्रोध न हरा 
तत्रापि नाभवत्‌ ऋोधस्ताटशो याटशोऽमे ॥ ५॥ था जितना श्राज है ॥५॥ भने खना किं राजा 


श्रता नराधिपमिमं स्वराज्यादवगोपितम्‌ । | इरिग्चनदर न घमं के शये श्चपना राज्य भी छोड़ 
ॐ ॥ ¡॑देवत्ाह्मणपून दिया, पेसे महात्मा, महाभाग, देव-बाह्मणु-पूजकः 
महात्सान महाम एपूलकम्‌ ॥ ९ ॥ ॥ ६॥ ओरौर सत्यवान्‌, कमा करने वले, शत्रु 
यस्मात्‌ स सत्यवाक्‌ शान्तः शत्रावपि तरिमत्सरः। | से भी वैर भाव नदी जिनको रेखे, निष्पाप, धमा 
अनागार्यैव धर्म्मात्मा श्रभरमत्तो मदाश्रयः ॥ ७॥|| त्मा, निरभिमानी, मेरे भक्त राजा को ॥७॥ पल्ली, 


नीभृत्यपुत्रसत॒ † दशां चप्‌; | . | पत्र श्रौर सेवक सष्ित दस दशा फो पर्चा दिया 
६ भापितोज्यां दर्णा चपः । तथा उसका राज्य हरण करके वहुत व्याकुल किया 


स राज्याच्च्यावितोऽनेन बहुश्च सिसी ८ ।| ॥ ८॥ सिये इात्म, ब्रेषी, यजो को 
तस्माहदुरातमा ब्रहमद्धट्‌ भङ्गानामवरोपितः। | न्ट करते वाला मूढ़ विश्वामिन मेरे शापदं वयुले 


` भच्छापोपहतो मृद्‌; घ॒ वकत्वमवाप्स्यति ॥ & ॥ के शरीर को पास दो ॥ ६॥ | 
; 7७ + जव विश्वामिच्न ने वशिष्टजी का शाप ना 
ला शापं महातेन मिरवामित्ऽप सौति तव रोध करके वशिष्जी से कहा कि.मेरे शापसे" 


त्वमप्यादिरभवरसवेति , रतिशापमयच्छत्‌ ॥१०॥ तुभ भी ससस हो जाश्नो ॥ १०॥ अपस के शाप 


छ 


माक॑रदैयपुराण 


० ञ्च च्‌ † & 


श 
अन्योऽन्यशापात्‌ तौ भरा्षौ तिर्यक परमच्‌ ती। | से महा तेजस्वी निष्ट तथा कौशिक विश्वामि्र 


वशिष्टः स महातेजा पिश्वामित्रश्च फोशिकः ।॥११॥ 


ञरन्यजातिसमायोगं गतावध्यमितौनसो । 
युयुधातेऽतिसंरव्धौ महावलपरक्रमां ॥१२॥ 


अरहरन्तौ भयं तीव्र भजानां च्क्रतुस्तदा । 
विधूय पक्षाणि वको रक्तोदटताकिराहनत्‌ ॥१३। 
ग्रां सोऽष्युनतग्रीयो वकं पटभ्यामत।इयत्‌ । 
तयोः पक्षानिलापास्ताः भरपेतुर्गिरयो यवि ॥१४॥ 
गिरिपपाताभिदता चकम्पे च वसुन्धरा | 
मा कम्पमाना जलधीलुहरत्ावंश्वकार च ॥१५॥ 
लनाम॒सैकया््वेन पातालगमनोन्पुखी । 
केधिद्धिरिनिपातेन केविदम्भोधिवारिण ॥१६।॥} 
केचिन्मदीषञ्चलनात्‌ परययुः पाणिनः क्षयम्‌ । 

इति सव्यं परित्रस्तं हाहाभूतमचेतनम्‌ ॥१५७॥ 
जगदासीत्‌ सुसम्प्रानतं प्यस्तक्षितिमण्डलम्‌ । 

हा वत्स हा कान्त शिशो प्रयाघ्रषोऽस्मि संस्थितः१ 
हा भिये कन्त शैलोऽयं पतत्याशु पलायताम्‌ | 
इत्याङ्लीशचते लेके | सन्व्रासथिघ्ुखे तदा ॥१६॥ 
सुरैः परितः र्ैरानगाम पितामहः । 
पल्युधाच च विश्वेशस्तावुभावतिकोपितौ ॥२०॥ 
युद्ध वां पिरमस्वेतल्लोकाः स्वास्थ्य बरनन्तु च । 
भृएवन्तावपि तौ वाक्यं ह्मणोऽव्यक्तनन्मनः।२१॥ 
केषासर्षसमाविष्टौ युयुधाते न तस्थतुः | 
ततः पितामहो देषस्तं द्म लोक्यम्‌ ॥२२' 
तयोश्च हितमन्विच्छन्‌ तिय्यैगावमपाजुदत्‌ ॥२३॥ 
ततस्तौ पूववदेहस्थौ पराह देवः प्रनापएतिः । 
वयुदस्ते तामसे भवे वशिष्ठ-कौशिकषेभो ॥२४॥ 
जरि वत्सं वशिष्ठ लं त्वञ्च कोशिक सत्तम ¦ ` 
तामसं भावमाभित्य दैहगयुद्ध चिकीर्षितम्‌ ॥२५॥ 
राजछूयधिपाकोाऽ्यं हरिश्चन्द्रस्य भूपते; । 
युवयेर्विग्रहश्चायं पृथिवी क्षयकारक; ।२६॥ 
न चापि कौशिकश्र्टस्तस्य रात्नोऽपराध्यते । 
स्वग॑माषिकरो ब्रहमनुपकारणदे स्थितः ॥२७ 

~ कत्तारो. कामक्रोधवशं गतौ ।.. 


ने परती का स्वरूप धारण किया -1 ११॥ दखसी ` 
योनि में जाने परः भी परम तेजस्वी वे दोनों महा. - 
वली श्मौर पराक्रमी परस्परः युद्ध करने लगे ॥ १२॥ 
आपस मे एक दुसरे पर भरहर करते इष सफेद 
पंख वाले वगुला ने लाल आँख करके वार किया 
1 १३॥ सारस ने भी लम्बी गर्दन करके वगु को 
पेये से मारा, उनके पंखों की हवा सते पटाड्‌ उड्‌ 
कर प्थ्वीपर गिरतेथे ॥९४॥ पटाडके गिरनेसे भूमि 
कम्पित होग्ई । पृथ्वीके कम्पित होने से समुद्धफी 
तरङ्गं मे उथल-पाथल होगई ॥ १५॥ पृथ्नी शक 
अङ्गं से पाताल जाने को उत्छुक दोग । कुष्ठ लोग 
पाङ के गिरने से, छद समुद्र के जलल से ॥ १६ ॥ 
इ लोग भूकस्पसे नाशको प्ा्षहुए । इसी पकार 
सव लोग भयभीतः हो पृथ्वीतल्ल पर हादाकार कर 
रहे थे ॥ १७॥ पृथ्वीमरडल पर जगत्‌ भरमे मूर्त 
से होकर लोग दा वत्स, . हा कान्त, दा, शिषः 
आदि कहते थे } कुद कहते थे कि दम जाते हे ॥ 
दा भिय, हा कान्त यद पर्व॑त गिरता यहं कंकर 
जल्दी भागतेहुष लोग भयसे व्याकुल होकर एकं 
दूसरेसे भिमुख होगये॥९श।उखसमय सव देवतानं 
सहित बह्याजी वदाँ आये श्नौर उन वि्वेशजी ने ` 
उन दोनों क्रोधित हए ऋषियों से कटा ॥२०॥ अव ` 
आप लोग युद्ध बन्द कीजिये जिससे संसार भैः 
उख शाम्ति हो / अभ्यक्त जन्मा, पितामह ब्रह्माजी 
के वाक्य सुनने पर भी ॥२९॥ कोध श्नौर ई्यां से 
वे लोय आसि विगाडते इष युद्ध करते टी रटे 1 
किर पितामह बह्माजी ने लोक का नाश देखकर ॥ 
तथा उन दोनों का हित विचार कर उनके पत्ती- 
माच को दरण कर लिया ॥ २३॥ फिर जापति - 
बह्माजी ने तामसी भाव को द्ोड़कर पूरवैवत्‌ सप. 
पाये इष उन दोनों बि श्नौर विश्वाभि पियो. 
के प्रतिं कठा ॥ २४ ॥ हे पुज वरिष्ठ च विश्वामित्र! 
मने अपने मदत्व को छोड़कर श्नौर ताससी भाव ` 
का आभ्रयलेकर इस कार युद्ध क्रिया ॥२९॥ क्या 
सजा द््नद्र क राजसूय यज्ञ का यद फल होना 
चाद्ये कि आप ल्लोगों के -पारस्परिक युद्धः से 
पृथ्वी कां नाश होजाय १॥ २६॥. ह बशिष्टजीः! . 
विंश्वामिजने राजा हरिश्चन्द्र 
राध नहीं किया दै, व गोद र 

जो उन सवनं ही किया. 
द जो उन स्वगं कौ भाति करा है ॥ २७॥ कामं 
चीर कोध तपे विध्न उपस्थित करते.दै, श्सलिये 


६ १० ७ ` मार्करडयपुराण ४६ 


परित्यजत भद मो ब्रह्म हि भचुरं -वलम्‌ ।(२८॥! इख भ्रमङ्गलकारी कोध.को, छोडो । तपसा ब्राह्म 
का वल ह ॥र८॥ ब्रह्माजी के पेता कंहने परर चे 


। एवयक्तौ ततस्तेन लज्नितौ तावुभावपि | । दोनों वहतः ललित हप श्मौर पक दूसरे फी स्मा 
पषमयामासतुः भरत्या परिष्वज्य परस्परम्‌ ॥२६। क्‌ कि पूवकं मिल गये ॥ २६॥ इसके श्रनन्त्र 

= + 6 ञं निनं = से पूि ब्रह्मो लोक 
तवः नयमान ब्रा लोकं निन यवो। | न पणो 

वशिष्टोऽगयात्मनः स्थानं कौशिकोऽपि स्वमाश्रमम्‌] थम को गये ॥३०॥ इस भकार सारस शौर 
एतदाह्िवकं युद्ध हरिश्चनद्रकथां तथा । | बगुते की लड़ाई तथा दरिद्र को कथा को जो 
रथमि्य्तये र्यः सम्पद्‌ रोपयन्ति चै ये३१॥| क कमे अथवा भली मनर उरे) ३१) 

` तैषां पापापनोदन्ु श्रतं < उनके पापों का नाश होगा तथा इनके कंथा सुन 
र पापापनोदन्तु रुतं ह्यव करिष्यति। , | कर जो कोई व्यक्ति कायं करेगा उसको ` कोई 
न चेष विष्नकाय्यांशि मृषिष्यन्ति कदाचन ॥२२॥| विष्न उपस्थित न होगे ॥२२॥ 


इति श्रीमाक॑र्डेवपुराण मे आदौ कक युद्धम ताँ अध्याय समरप । 
~ अवे क | 


दसवां अष्याय 
। जैमिनिरुवाच ` जैमिनिजी बोले . ० 
संशयं द्विनशादृदूलाः भन्ूत॒ मम पृच्छतः । हे पकतिराज | जो सुभे संशय दै उसको भी मै 
आपिमौवःतिमावौ भूतानां त्र ससित ॥ ॥ पवा हंसे ष्वा जो जनभमो 
५... ९ स्थितिदे॥शासो यह जीर किसभकार उत्यब दोतेषि 

कथं ज्ञायते जनतः कथं भा स मिवदध॑ते। , | (छिस तष्ट बद बृ है, ल तरद बद. उद 
कथं वेदृरमध्यस्यसितषटस्ङ्गनिपीडित;ः ॥ २॥ पीड़ा स्ता हशर ठदरता है ! ॥२॥ द्रं से 
निष्करान्िशुदरात्‌ पराप्य कथंवा दृद्धिगच्छति । किस भकार वार्‌ होकर चृद्धिको मरातत दोता ध 
उततरान्तिकाले च कथंत्िदभावेन निबुवयते | ३ ॥ ट ते बादर ने ॐ समय ब्रह कस भानं; 

स्थित होता है ॥ २ ॥ श्रपने सुरत बु दुष्ठत का 
छता पृतस्तथाश्नाति उभे सुङतदुष्छे । पल किंस अकार पाता है तथा मरने के वाद व॒द 
कथं ते च तथा तस्य फलं सम्पादयन्त्मुत ॥ ४ किंस प्रकार भोग करता दै १ ॥४॥ सखरीके गमंशय ` 
कथं न जीय्यैते तत्र पिर्दीकृत इवाशये । | मै पिरडी के समान रहने वाला यद छोयाप्तो 
स्फेष्ठ यत्र जीय्यन्ते मुक्तानि सुगुरूष्थि ॥ | जीव स्री के कोठ र कथो नदीं जल जाता जिसमे 


भक्ष्याशि यत्र ने जन्तुनीरययते कथमसपकः ॥ ५ ॥| अति कठिन वस्ते" मी पच जाती है१॥५॥ इस 
लिप सुभकोः ककर संदेह रदित कृर दीजिये, 


॥ एतः /-1 न सन्दहे | वर्म तम्‌ = 
एतन्मे नूत सकलं सन्देहेक्तिषिवभ्नितम्‌ । | कारण कविय बिपय गापत दै शौर श्लकःवावतः 
` तदेतद्‌ परमं युद्धं यत्र बु्न्ति जन्तवः ॥ ६ ॥ लोगा जम्‌ म है ॥ ६॥ 
. , पतिणञ्बुः पत्ती बोले- 
परश्नभारोऽयमतुलस्खयास्मासु निवेशितः । हे जैमिनि ऋषि ! श्रापने इं भशन कषा श्रतुलं | 


दुभाव्यः सर्वभूतानां भावाभावसमाभितः ।। ७॥|| मार दम्‌ पर रख दिया है । य्‌ भ्न भावं शरोर | 
। + शरमाव के संरक्त तथा दुभा दै ॥9॥ दे महाभाग | 


तं शन मामा य्था माह पितु य = छा सुपति नप्र व हे पकात मै, 
ब्राह्मणि मागंषः करिचित्‌ पुत्तमाह महामतिः): । विद्धान्‌ यु वंशी त्राह का अद्रूषं प्र पुर 


८ 
५९५५ 


9६ । माकेर्डेयपुराश .. > अ० १० 


सुमति नाम बाला था । पिता ने उसका यज्ञोपवीत 
संस्कार करणया 1 ६1 पिता ने अपने पुत्र से कटा, 
"हे सुमति ! कम पूर्वक वेदों को पटो श्रौर गु 
क्म सेवा में रहकर भिक्त मांयकर भोजन किया 
कसो 1१० ॥ इसके वादे ग्रहस्थ धमं म परविष् 
होकर उत्तम यज्ञो को करते हषं पुने उत्पन्न करो 
प्रौर फिर उस्के.वाद वनदास यरद करो ॥ -११॥ 
पिर वार्षस्थ म जाकर सन्यास अहर कसे । 
इससे ब्रह्न मे पहुचोगे जां जाकर .शोक रहित 
दोजाश्रोगे ॥ १२॥ . ` 


पदी वोल्े- । 

` इख रकार वहुत ङ समरभाये जने पर भी 
वह अङ्‌ पुत्र छऊुद्ध न बोला । पितानेभी धीति 
पूकेक वार वार कटा ॥ १३॥ पुव-स्तेह से मीठे २ 
श्रक्तरों मे पिता के वहत वार कहने पर स॒मतिर्देस 
कर यह वोला 1१७ हे तात ! श्रापने जो श्रभी 
उपदेश किया है इसका भने वहत श्भ्याख किया 
है । इसी मकार शिल्प विध्या श्रादि अन्य' शासं 
का भी श्रध्ययन किया है ॥ ९५॥ मेरे स्थति परल 
पर हजारो जन्मो का चृतन्त शङ्कित है ! निर्वेद ` 
शरीर परितोष आदि क्ञानभी सुभे भास है 1२६ सुमे, 
श्रनेकों शबः मि श्रौर सी यादिकोंकाबियोग तथा ; 
सयोग भाप हु श्रौर श्रनेकों पिता.तथा माताये 
भी हई ॥ ९७1 मेने इजाये दी वरह के दुख तथा 
सुखो का श्रनुभव किया हे । तथा अनेकं पक्रारके 
चन्धु तथा पिता मेरे हए ह ॥ ९८ ॥ ्रनेकः लिया 


गभं मे जिनमे विष्ठा श्नौर सूत्र भयाद रहा 
हं तथा खसो रोग श्रौर पीड्य सुशको इई १६६] 
जितने भी डुः्ल सेने वाल्य, यौवन रः चदं 
अवस्थाश्नो मे उदाये है वे सव सुखे याद है ॥रगा 


बाह्मण, सषतिय, वेश्यः शुद्र, पश, कीट, सुग तथा 
पक्ति की अनेक योदियो में उत्प हु) २९॥ 
तथा राजसेवको ओर वलशाली राजान्न के घरमे 
मेरा जन्म हु । अन्त मे अवमे अपके घरमे 
जन्मा ह ॥ २२ ॥ मै वहुत से सनुष्य¡ की दासतामे 
रहा हं खरौर इखी प्रकार वहुतों का स्वामी ! मै कभी 
धनी दुमा चरर कभी दरिद्री 1२२ कमी मैने मारां 
है श्नौर कितनी ही वार ॐ दूखसो से मारा गया ह 
कभी सुमे दुखसे ञे दान दिया है शौर कमी मेने 
इखरो को दान दिया है ॥ २७॥ पिता, माता, मित्र, 


भाई, सी से कितनी, वार संतु शमा ह रौरं 


कृतोपनयनं शान्तं सुमतिं भड्रूपरिणम्‌ ॥ ६ ॥ 
वेदातधीष्व सुमते. यथालुक्रममादितः । 
गुर्भरषणे व्यग्रो मे्ान्नकृतमोजनः ॥१०॥ 
तत्ता गारहस्थ्यमास्थाय चेष्टा यज्ञानसुत्तमान्‌ । 
इषुत्पादयापत्यमाश्येया अनं ततः ॥११॥ 
वनस्थश्च तता पत्य  परिवाडनिष्परिग्रहः 
एवमप्स्यसि तदुच्ह्म यत्र गत्वा न शेचसि \१२॥ 
पए सु 
इत्येषुक्तो बहुशो भजदत्वान्ाह किंचन । ` 
पितापि तं सुबहशः पाह भरत्या पुनः पुनः ॥१३२॥ 
इति पित्रा सुतस्नेदात्‌ पलेमि सधुराक्षरम्‌ । 
स चायमानो बहुशः परहस्येदसथात्रवीत्‌ ।१४॥ 
तातेतद्रहुशोऽभ्यस्तं यद्‌ त्यायोपदिश्यते । 
तथैवान्यानि शस्ाणि शिल्पानि विविधानि च १५ 
जन्सनामयुतं साग्रं सम स्मृतिपथं गतम्‌ । 
निर्वदाः परितोषश्च क्षयदृद्धथ दये रताः ॥१६॥ 
शपुमि्रक्लत्राणं पियोसाः सङ्गमास्तथा | 
सातरे षिविधा दृष्टाः पितरो षिषिधास्तथा ॥ १७1] 
असुमृतानि सौर्यनि दुःखानि च सहस्रशः 
बान्धवा वहवः प्रावा; पितरश्च पृथणिधाः ॥१८॥ 
विण्मूत्रपिच्छले श्नीणं तथा काष्ठे मयोपितेय्‌ । 
पीदाश्च सुशं पाठा रोगाणाञ्च सहस्रशः ॥१६॥ 
गभदु;खान्यनेकानि बालत्वे वौबने तथा । 
हृदधतायां तथाप्तानि तानि सव्वाणि संस्मरे ॥२०॥ 
त्राह्मणशषत्रिय-विशां शूद्राणान्चापि योनिषु । 
पुनश्च पशुकोयनां सृगाणासथ पक्षिणाम्‌ ॥२१ 
तथेव राजभृत्यानां रइाञ्याहवशालिनाम्‌ । 
सथुत्प्ोऽस्मि गेहेषु तथेव तव वेश्मनि ॥२२॥ 
सत्यतां दासताञ्चेव गतोऽस्मि वहुशो णाम्‌ ! 
` स्वामित्वमीश्वरत्वंच दरिद्रत्वं तथा गतः ॥२३॥ 
हतं मया इतश्चान्येहेतं मे घातितं तथा । 
द्त्तं ममान्यैरन्येभ्यो मया दत्तमनेकशः ॥२४॥ 
“ -माद-सद्दमारकलत्रादिङतेन च - 


श्र० १० ‡ माकंरदेयपुराण । ५१ 


तु्टोऽस्त्‌ तथा दैन्यमश्रुषौताननो गतः ॥२५ कभी-कभी इनके वियोगं मे रेया ह ॥२५॥ हे तात. 
इस प्रकार इस संसार चक्र से कष्ट पैक भ्रमण 

ऽ 
एवं संसारचकरऽस्मिन भ्रमता तात सङ्कटे । | करतेकरते सुमे यह कान जो भोति का 


्ञानमेतन्मया पपं मोक्षसम्माधनिकारकम्‌ ॥२६॥| साधन है मिला ॥२६॥ उस ज्ञान फे ` कारण मु 


विहते यत्र सर्वबोऽयगृग्यशचः सामसंकितः वे न कलाप क सामवेद, युवद 
ह त्रि तास अच्छा चह लगता ह्‌. ॥ २७॥ मुश््को 
याकलापौ विगुणो न सम्यक्‌ अतिभाति मे।।२७॥ वेद से क्या थो अत 


तस्मदुत्यंनवोधस्य वेदैः किं मे प्रयोजनम्‌ । | गया है श्रौर मै शुरु के ज्ञान से ठतत. हा निरमि 
गुरुविज्ञनतप्रस्यं निरीहस्य सदात्मनः ॥२८॥॥| लाषी तथा ्रत्मन्ञानी हँ ॥ २८॥ छः भकारे की 


पटपकारक्रिया-दुःख-सुख-र्ष-रसैथ यत्‌ । | किया डल, खख, हप, रसः ण इन सव से पर 
परब्रह्म पद्‌ को प्राप्त करूंगा ॥ २६॥ रस, दष, 


युश वरवनतत्रह्म तत्‌ भाप्स्यामि परं पदम्‌॥२६॥| भय, इदे, रोध, राम ्ौर जरा से व्याल 


रस-हप-भयोदधेग-करोधामषं-नरातुराम्‌ । | मण्य शत पाश मे वंधे बा नौर शग के 
विङ्गातां श्वमृगग्राहिनसं । समान दे ॥२०॥ इसलिये मे इस रकार दुःख उत्पन्न 
चिङातां रवमूगग्राहि संयपाशरताृलाम्‌ ॥२०॥ करने वाली सन्तति को पेदा न कर परम पद कोः 


तर्माटूयास्यम्यहं तात त्यक्तयेमां टुःखसन्ततिम्‌ । | जाऊंगा । तीनों वेदों दवारा कदे हद धरमरूपी 
धर्म का च्रवलम्बन करने के वरावर पाप चौर 


यीषम्ममधम्माव्यं किम्पाकफलसननिमम्‌ ॥२१॥| कौन खा ह १ ॥ २१॥ 


पत्तिण ऊचु पत्ती बोले- 
तस्य -तदहटचनं श्रुत्वा हपविस्मयगद्रदम्‌ | उखका बट वचन सुनकर हषं जौर आश्चर्य 
से गदुगद होकर ग्निना ने प्रसन्न होकर अपने. 
(पिता माह .महाभागः स्वसुतं हटमानसः ॥३२ | पुत्र से पृचा ॥ ३९॥ 
पितोवाच पिता बोले 
किमेतहदसे वत्स कुतस्ते ज्ञानसम्भवः; । । . . दै बत्स ! य त॒म क्या कहते हो, तुमको ज्ञान: 


कैसे दुश्रा ? कटां तम्दारी पुरानी जडता 
पेल ते जता पू्वमिदानीचच भवुद्धता । २३॥ कटां यदह विकसित ज्ञान १।३३॥ क्या किसी सुनि 


विन्दु शापविकारोऽयं यनिदेवकृतस्तव । | या देवता के शापक कारण ये विकार्था ! तुम्हारा 


य॑त्‌ ते बानं तिरोभूतमाविरभावस्ुपागतम्‌ ।३४॥| विपा ह्या कान अव किस भकार भ्रणर हा । ॥ 
हे वत्स ! मै वम्दास पूरं दृत्तान्त सव ॒सनना ` 


भोतुमिच्छोमि तव्‌ सनव परं कोवलं हि मे। रं । भुभे ्रत्यन्त कौतूढल हे, . तुम सव - 

सव्वं, तटूब्रूहि मेः वत्स यथा: त्तं पुरा तव ॥२५॥॥| दाल कटो ॥३५॥ ` । 
पुत्र उवाच पुत्र बोला- 

तात यथा इतं - । . हे तात } सुनियि कि जिख प्रकार. मेय सुख 

शृणु इतं ममेदं सुखदुःखदम्‌ । | वा 


५ यशवाहमासमन्यस्मिन्‌ जन्मन्यस्मतपरन्तु यत्‌ ॥२६॥ परथन्त सुभे स्मरणे सहा ॥ २६ ॥ ग धाचीन काल मे ` 
अहमासं. पुरा विभो न्यस्तात्मा परमात्मनि! | परमात्मा मे लीन एक बाह्मण था जो शरात्म-लान के. 


ञ्रात्मवि्याविचारेषु परं निष्ठुपागतः ।॥(२७।॥ निरन्तर विचार से परम निष्ठा को पर्त हुशया॥३अ 
निरन्तर योगयुक्त तथा योग का ्रभ्यास 


सततं योगयुक्तस्य सतताभ्याससङ्गमात्‌ । खत्सङ्ग मे रहने से, श्रचछी परति व विचारविधि ` 
सत्संयोगात्‌ स्वस्मभावाद्धिचारविधिशोधनात्‌।२८।॥| शोधन से ॥ ३८॥ सुमे परह्य मे परम प्रीति हरै 

मेव श्नौर मै उसफे साथ संलग्न होगया । इसफे वाद्‌ 
सि तिममासीहयुञतः सदा। न श्राचार्य॑त्न को प्राप्त कर शिष्यो के सन्देहा का 


चान्राय्यताश्च सम्प्राप; शिष्यसन्देदहूतमः ॥२६॥ निष्रृत्ति कणे ला ॥२६॥ फि९ इक्‌ क(ल व्यत 


4.८8 
५१ न 


५९ माकंण्डेपुराण भ्म» १३ ` 
= 

; काज्े रेकान्तिकटुपागतः ! ` | होने पर अज्ञानता के कारण मेय सात्विकी भावे 
जरे त विपन्रथ॒भरमादत ॥४०।॥| निकल गया १ मो को भास दोषा सृत्य कै 
अ्ानृष्टसद्‌ । वश इतरा ॥४० च्रनेक जन्मों की वाते सुभे योद, 
उत्कान्तिकालादारभ्य स्मृतिलोपो ने मेऽभवत्‌ । | किसकिस जन्म मे कितते-कितने वपं जीयित 
यावदब्दं गतंयैव जन्मनां स्पृतिमागतम्‌ ॥४१॥ रा चंड शुभो स्मरण है ॥ ४१॥ दे तात ¡ उसी 
पूव्वाभ्यासेन तेनैव सोऽ तात जितेन्द्रियः । पूर्वं के अभ्यास से मँ जितेन्द्रिय ह ओर इस तरद 


यिष्यामि द „_ __ , „| "यत्ने केरना चादता्ं कि जिससे मुभे फिर श्रक्षान 
यतिष्यामि तया कतु न मनिष्ये वथा पुनः ॥४९॥| न हो ॥४॥ मरे कान के दान काफल यदीह कि 


शानदानफलं यं तचज्नािस्मरणं , मम । | मुम सव जन्मो का चरतान्त स्मरण दै । पेसी 
न देतत्‌ भ्यते तात बरथीयरममाभितैरेः ॥४३।| स्थिति जयी धरम भे शराभरित ममु को भास नदी 
सोऽं ए्ाममादेव निष्ठामधषपाभितः । | ३५५२ मे ॐ आम के कार्‌ येना 
रकान्तिलयपागम्य यतिष्यम्यातमीसषरो ।१४४॥ धरम भाप है चौर धव मै पकान्ते वाख कर श्रपनी 
| त त सायकं 0 मोक् का यत्न करूंगा ॥४४॥ इसलिये हे मह्याभाग ! 
तदुनरहि लं महाभाग य॑ ते सांशयिकं हृदि । लो ठ लद संय हो उसे कटो, उसकी निदत्त 
एतावतापि ते भरीति्ुत्पायाद्रए्यमाप्तुयाम्‌ ॥४५।॥| कर मे अरपिके ऋण से शुक्त हो जाऊ गा ॥ ४५॥ ` 
पर्िण उखः पदी बोहे-- , , | ध 
श त दे जेमिनिजी { जो पश्च अपने दमसे पूद्धे हं 
पिता प्राहं तवं; पत्रं शरद्धत्‌ तस्य तदच; । | वेदी भन्न पितोने उस अपने पुसे शद्धापूैक पूय॥ 
भता यद्वयं पृष्टाः संसारप्ररणाश्रयम्‌ ॥४९॥॥| पुज वोला- | 
पुत्र उवाच 1 तत्व को मैने प्मरचुभव द 
॥ 0 उसको सुनिये । यह संसारचक्रं वड़ा जरै इस 
शर रात यथी तत्वमतुमूतं मया्यडत्‌। | मे किसी की स्थिति नदे चरथान्‌ इस संसार 
संसारवक्रमनरं॑स्थितियर्य न वियते ॥४७॥| सव चक्रवत्‌ मते ह ॥७९॥ हे पिता आपकी 
सोऽहं वदामि ते सव्वं तवैवासुज्ञया पितः। श्राहञासे उस सध इत्तान्त को .उत्पत्ति.के, समय 
उ्राम्तिकालादारभ्य यथा नान्धो बदिष्यति॥४८।॥| से मर्ण पर्यन्त करा कि जिस भकार कोई दसरा 
न कट सकेगा ॥ ४८'॥ शरीर मै स्थित उष्मा तीर 
उष्मा कुपितः काये तीत्रवायुसमीरितः। वायु से पर इ कुपित 'दोकर ममे स्थानो "को 
भिनत्ति मम्भस्यानानि दीप्यमानो निरिन्धनः।॥४६॥| कादती है शौर विना ईधन ॐ ही श्रन्ति ज्वलित 
उदानो नाम ॒पवनस्ततश्रोद्ध॒भ्रवत्तैते। । फरती द ॥ ४६॥ उर्दान नाम की वाणु जो क 
्कतानामम्युक्ष्याणामथोगतिनिरोष्च्‌ ॥५०॥ खाया या पिया जाता द ऽते नीचे की ओर ते 


9 ^ 4 भोजने ध 
जाती है ॥ ५०॥ अन्न ्नौर जल जो करि भोजने 
तत येनाम्बुदानानि कतान्यन्नरपास्तथा । होतः पान त पवा जता ह शठे त्ये 


दत्ताः स तस्य आहादमापदि प्रतिपद्यते ॥५१॥| श्रह्ाद हो जाता है ॥ ५१॥ जो मजुष्य अद्धा से 
्रन्नानि येन दत्तानि श्रद्धापूतेन चेतसा । ५ चित्त दोक र न त टै वदं 
` >< 5 ॐ मरने पर विना अन्न कभी दक्षि को माप्त होतादे।॥ 

सोऽपि ृतषिमवातोति मिनाप्यन्नेन च ६ ॥ ५२॥ जो मढ नदी.बोलते है; जो किंसीका अपकार नी 
, येनादतानि नेक्तानि मीतिभेदंः छतो न च। | करते, जो श्रास्तिक श्र श्रद्धावान्‌ ह वे सुसाूर्वक 

परास्तिकः ्रदधानश्च स सुखं भ्युशच्छति | सो दते है १ ४३॥ ज लोग बराह्मण न्रीर 

देवत्रा्यएपूजा यां ये रता नालुसूयवः 1 -की पूजा कंते द, किसी कीं निन्दा नदीं 
, श्वा वदान्या दीमन्तस्ते नरा! युखंगृत्यवः ॥५४।॥ ह सात्विक तथा उचित भाव करने वले है, 
` यो न कामाच संरम्भा दं पाद्मीधुलछमनेत्‌। | > .भ्ठमान सुण स चय का, मात करते हं ॥ 
व जो लोग प॑ने स्वां के तिथे धर्थको नदीं छोडुते 
“` ५: < साम्यशचः स सुखं मृत्युमृच्छति ॥५१।॥ है, निंस्कयरः दै. उचित कमी कने ल तने 


. + ~ 


क» १० , माद॑र्डेयपुराण ‡ ५३ 


----~-------------------~------------------------- ---------------<--<=---------------- 
वारिदायिनो दाहं भुधाश्चानन्नदायिनः। वे सुख पूर्वक मरते द ॥ ५५॥ जो लोग प्यासे को 


शे पानी च्रौर भूखे को श्रनन देते. है उनको सय के 

भप्लुबन्ति नाकाले तस्मिन्‌ ृत्यवुपस्थिते॥५६॥ वाद र रर पानी मिता हैः ॥४६॥ जो सोग 
शीतं जयन्तीन्धनदास्ताप॑चन्दनदायिनः | | जाडं म ईधन देते ह उनको मरते समय टरडनंहीं 
# वेदनां कणं ये चालुदेभकारिणः लगती है तथा जो लोग चन्दन देते है उनको उस 
भारा पेदनां कं ये चाजुद्र गकारिणः ।५७॥ । सम्रय गमी नदीं लगती है ॥ ५७॥ जो मोह श्रौर 
मोदाङ्ञानमदातारः प्राप्लुनिति महदधयम्‌ । | श्कान क्षलति दै वे दुष्ट मलुप्य उग्र वेदनाश्रों से 
पेदनाभिरुदग्रामिः भषीच्यन्तेप्थमा नगः ॥१८॥ ४ हप महान्‌ मय ध दत द।५८॥ 
४ जो भंडी गवादी देता दै, भट बोलता है, श्रनुचित 

कूटसाक्षी मृपावादौ यथासद्चशास्त ८ 1 | श्रादेश फरता है, तथा वेद की निन्दा करे बात् 
ते मोहगृत्यवः सरं तथा वेद्िमिन्दकाः ।॥५६॥ | लोग ये सव तय॒काल मे मूचछागरसत होते द।५६॥ 
परिभीपणाः पूतिगन्धा; कृटपुद्वरषाणयः । | णे मलयो के लिये यमराज के भयानक, दुगैन्ध- 
युक्त, हाथ मं मुंदगर लिये हुए तथा दु्त्मा दृत 

सरागच्छन्ति दुरात्मानो यमस्य पुरुषास्तदा ।।६०॥ शाते है ॥६०॥ उन दतां को शाते हण देखकर च 


प्रापे दकपयं तेषु जायते तस्य वेपथुः । | मद्य कंपने लगता दै तथा भै, माता, पिता, 


्रन्दत्यविरते सोऽय श्राठ-मातृ-सुतानय ।६१॥ पत्र ्रादि फो सम्बोधन कर रोता है ॥ ६१ ॥ उस 


४ समय दे तात ! वह मरप्य"विक्तिप्त फी ` तरह श्रस्त 
सास्य वागस्फुटा तात एकवणा विभाव्यते । | न्यस्त घोलने लगता दै, उसकी दृष्टि चक्षर खा 
दृष्टि भ्राम्यते घ्रासाच्छासाच्छुप्यतयथाननम्‌ ६२॥| जाती दे तथा.उसद श्वास श्र शुंट खल जाता 


ड्द ध॒ ष है ॥ ६२ ॥ ऊं वास केता ह्या, दष्ट भंग होकर 
प्वर्वासानित १ याऽ + ध देता 
दष्ववासान्वितः सोऽयदृिद्गसमन्वितः । प्रीर वेदना से युक्त बह मलष्य शरीर त्याग देता 


.. ततः स वेदनाग्षटसतच्छरीरं विषुवति ॥६३॥| ॥६३॥ शीर घायु क साथ उसी हालत भे दूसरे 


घाययग्रसारी तदरूपं ॑देहमन्यत्‌ पपदते । | शरीर म जो विना मा चाप क उत्पन्न हा है ~ 
^. ९ मावृ्पस्यमम्‌ कर्मजन्य यातना भोगने फे लिये दै जाता दै । ^ ^ 
तत्कम्मने बातनाय न मृदपतूसम्भवभर्‌ 1 | श्रवस्या श्रौर उधर उसकी पद्िले शरीर मेँ थ 
तलमाएवयोऽरस्या-संस्ानः प्रागमवें यया ॥६४।| उसे शस शरीर मे भी मालुम 0 है ॥६५ ६ ` 
0 =, श्रनन्तर यमदूत उसे शीघ् कथिन पाशोसे च , ' 
ततरो दूतो यमस्याश्च पारावधाति दारणः । | इष्ड स मरा इरा ददिव शा की श्रो 
दण्ठमहारसम्धान्तं कप॑ते दक्षिणां दिशम्‌ ॥६१॥| जाता जो मागे कुश, 1 पा 
४ वापाये प्राण श्रादिसषृणं है तथा जिसमे कीं ॐ 
इश कण्टक षस्मीक 1 । | व्रसती है श्रौर जो कीं शरग्निलरडों से ५८५ 
तथा प्रदीप्रज्वल्तने फचिच्छुभरशतोकतरे ।॥६६॥| हो ग्दा दे ॥ ६९ ॥ कीं सूयं की ` , ` < 
मदीपषादित्यते दपा क्थमिः "तपन है तथा उसकी किरणों से शरीर जलता .. 
१५५५९ च॒ दधमने तदंशमिः | फेखे माम से यमदृत मदप्य को घसीयते.हुए ^ 
कृष्यते यमदूतेथाधिवस्नादमीपणैः ॥६७।॥| भयानक दुःख शब्द कटते हप ज्ञे जाते है ॥६७. 
पिकनममारसतषसिं $) इस भकार यमदूतौ का घसीरा इश्रा तथा ~` > , 
पेरिभक्ष्यमाणः रिवाशतः। गीढ्ं क्राजो मार्म.मे पड़ते टै लाया इद्रा,. ' - 
प्रयाति दारणे मर्गे एापकम्मां यमक्षयम्‌ ॥६८॥ | पापी मद्य कठिन मागं व त पनु 
च्नोपानसदातास ‡ दनी, भूता, वख, श्र श्रादिकर दान क वार 
छ्रापानः य च पञ्चमद ७ । म्य सुख पूर्वक उत्तम मागे से जाते ह ॥ ६६। 
ते यानित मञुजा मागं तं सुन तथात्रदाः ॥९६। उसी प्रकार केश पाता श्रा, परवश श्ौर पाप < 
एवं केशानङ्कमवन्नवशः पापपीदितः । | डुःखित्त बह म्प्य घारदवे दिन -यमपुरी.*को ` 


नीयते द्वादशाहेन धमैरानपुरं , नरः ।॥७०॥। जाया जाता दै ॥ ७०॥ 


५४ 


._ ~--~~~----------------------------------------------------------------------- ~ 


साक॑रुटेयपुराण 


शभ १०५ 


कलेवरे दह्यमाने महान्तं . दाहगृच्छति । 
ताड्यमाने तथेवाक्तिं चि्माने च दारणम्‌ ॥७१। 
छियमाने चिरतरं नन्ुदुःखमवाप्ुते । 
घेन कम्मैविपाकेण देहान्तरगतोऽपि सन्‌ ॥७२॥ 
तत्र अ्रद्रान्थवास्तोयं प्रयच्छन्ति तिलः सह । 
यच्च पिं प्रयच्छन्ति नीयमानस्तदश्ुते ॥७२॥ 
लाभ्यङ्गो वान्थवानामङ्गसंबाहनश्च यत्‌ । 
पेन चाप्याय्यते जन्तु्यचाश्नन्ति च बान्धवाः।।७४॥ 
श पहिमेर्नासयन्तं 4 ० शमासोति (> 
मौ स््रपदविमनात्यन्तं छ वान्धवः | 
शनं दददिमथ तथा जन्तुराप्याय्यते मृतः ॥७१५। 
तीयभानः सकं गेहं द्वादशाहं स पश्यति । 
उयभुङक्ते तथा दत्तं तोयपिर्डादिकं शुषि ॥७६॥ 
प्रदशादहात्‌ परं घोरमायसं भीषणाकृतिम्‌ । 
[म्यं परयत्यथो जन्तुः कृष्यमाणः पुरं ततः॥७७। 


तमत्रोऽतिरक्ताक्षं भिन्नाञ्ञनचयपभम्‌ । 
त्यु कालान्तकादीनां मध्ये पश्यतिवै यमम्‌॥७८॥ 
्कणलवदनं भ्रकृटीदारुणाङ़ृतिम्‌ । 
चेरूपेर्मपणोवक्रे् तं व्याधिशतेः मशम्‌ ॥७६॥ 
दण्डासक्तं महाबाहुं पाशदस्तं सुभैरवम्‌ । 


तन्निर्दिष्टां ततो याति गतिं जन्तु शभाश्भाम्‌॥८०॥ 
परे कटसी तु याति यथानरृतो नरः। 
तस्य सरूपं गदतो रौरवस्य निशामय ॥८१ 
पोजनानां सहस ढे रोरवौ हि ममाणतः | 
नदुमत्रममाणश्च ततः श्वभ्रः सुदुस्तरः ॥८२॥ 
[त्राङ्गास्चयोपेतं कृतञ्च धरणीसमम्‌ । 
माञ्वरयमानस्तीव्र ख तापिताङ्भारभमिणा ॥८३॥ 
{न्सध्ये पापकम्माणं विञ्चन्ति थमासुगाः 

प्र दद्यमानस्तीव्र ण ॒वहिना तत्र धावति ॥८४॥ 
।द पदे च पादोऽस्य शीर्यते जीर्यते पुनः । 
प्होरत्रेणोद्धरणं॒पादन्यासंच गच्छति ।॥८५॥ 
{वविं सहस्रयुत्तीरणे ग्रोजनानां वियुच्यते । 
तोज्यं पापशुदधयथं तादृडनिरयमृच्छति ॥८६॥ 


‡ 


मं अत्यन्त दाह होता है तथा पीट रीर छेदे जाने 
के कारण उखका शरीर आतं हो जाता दै ॥ ७१॥ 
अपने कर्म के फल से जीव अनेक दुःख पाता है 
तथा दुखी योनि मेँ प्रवेश करता है ॥ ७२॥ उस 
समय उसके जो भाई वन्धु तिलो के साथ जल 
ठान करते हँ ओर पिंड देते है बह उसको प्राप्त 
होवा है ॥७३॥ श्रौर भी वीन्धव जो तेल लगाते दं 
द्रौर स्नान कराते श्रौर जो खाते है बह सव 
उसको श्रा दोता है मौर इससे उसको आनन्द 
मिलता है ॥ ७४ ॥ भाई वन्धु भूमि पर सोकर जो 
तकलीफ उटाते दँ तथा दानादिक करते ह उससे 
उस स्तक पाणी को श्रानन्द मिलता दै ॥ ७५॥ 
यमदूत के साथ जाता हु वह वार दिन तक 
श्रपने धर को देखता ह श्रौर उसके निमित्त दिये 
हए पिण्ड ओौर जल को भक्षण करता .है' ॥ ७६ ॥ 
चार दिन के वाद्‌ बह घोर श्रीर भयानकः आर्ति 
बाला यमदूत उस नीचे सुख द्यि इए भासी को 
यमपुरी को ले जाता है ॥ ७७ ॥ क्तणमात्र म वह 
यमराज को देखता है जिखकी लाल-लाल श्रखिं 
है, जिसकी कान्ति काजल के.ठेर के समानहै नौर 
जो काल, सत्यु ज्रौर श्नन्तक आदिकं के वीच 
वेडा द्रा हे ॥ ७८ ॥ जिसका सुख दतोके कारण 
कराल हे श्रौर जिसकी भो भयानक हैँ भरौर जो 
विरूपः, भीयस्‌, वक्र तथा अनेक व्याधिर्यो से चारों 
श्रोर से धिया हा वैठा है ॥ ७६॥ श्नौर जिसके 
दाथ मं दरड दै, जिसकी युजायें वड़ी वडी है, 
जिसके हाथ मे पाश है श्रौर जो भयानक दै. पेसे 
यमराज के अ्रदेशानुखार वह जीव शुम चौरः 
अशुभ गति को भराप्त होता है ॥८०॥ जो मनुष्य 
ठी गवाही देता दहै या मिथ्या भापस करता दै 
उसको रौरव नरक प्रात होता है, अव उस रौरव 
नरक का हाल सुनिये ॥८१॥ रौर नरक का 
विस्तार दो सदस योजन दै शौर जाँघ तक उस 
की जमीन गहरी हे ॥ ८२॥ वह प्रथ्वी ङ्कारो से 
भरी इ हे रौर तीवरूप से तस हुई जलती रहती 
हे ॥८३॥ यमदूत लोग पापी फो उख रौरव के वीच 
मै उल देते है च्रीर बह पापी तीच श्रभ्नि से 
जलता इद्रा इधर उधर दौङ्ताहै ॥८४॥ पदपद्‌ पर 


| उसका पौँव गल गलकरः गिरवा दै तथा दिन रात 


इसी प्रकार गल गल करः वह फिर टीकर दो जाता 
है ॥ इसीपक्छर सखो योजन बह फिर्ता रहताै, 
इसके चाद यसदूत उसे पापं शुद्धि के. निमित्त . 
नरक का भोग कराने के वास्ते ले -जाते ह ॥ ८६ ॥ . 


'अ० ११ माकीरुडेयपुराण ५१ 


ततः सरववैषु निस्तीणैः पाषी तिव्य॑क्त्मशुते। | इ सव नरकं से निकल र 
ह दरमि-कीर- < पदे मशकादिषु ॥८७ ^ पक, छमि, कीट, पतङ्ग कत्ता श्रीर मच्छरो 

कट-पतज्ग प्वापदे काद योनि मरे जातां है ८७ न्नर हाथी, वृत्त, गाय 
गत्वा गनहुमाचिपु गोष्वश्वेषु तथव च । | शौर घोडे. इत्यादि तथा श्न्य पापगुक्त ुःखद 
अन्यासु चैव पापासु दुःखदासु च योनिषु ८८.॥ योनियँ मै जाता है ॥=८॥ फिर मचुष्यं योनि मे 
` मलुष॑भराप्यङ्ृव्नो चा इतस्सितो वामनोऽपिवा । | मात दोक ङरूप, कवश्, चाडाल, डोम आदि 


॥ ति गर्हित योनियं मै जन्म पाता है ॥८६॥ पाप का 
{ चण्डालपुकसादयछु नरा योनिषु नायते. | श 
` अवशिष्टेन परपिन पुण्येन च समन्ितः। | कतनिय, वैश्य, शद्ध रादि योनिर्यो मे जन्म लेता दै 


ततथारोहणीं ातिं शु्रवैश-दृपादिकाम्‌ ॥६०॥| ॥ ६०॥ इसके वाद कमी बाहार श्रं देवता ॐ 
विप्रदेवेन्द्रतांचापि कदाचिदवरोहणीम्‌ । घर मे जन्म क्तेता दै 1 यद ृत्तान्त उन पापियों का 


पिं ॥ है जो नरको मे गिरते हें ॥६१ ॥ जिख पकार पुरय 
एवन्तु णो नरकेषु पतन्त्यधः ॥६६। श्रात्मा ज्लोग यमपुरी को जाकर धर्मराज की ्ा्ञा 


यथां पुण्यकृतो यान्ति तन्मे निगदतः श्रृणु । | से पुरय गति को प्रा होते ह बद सुनो ॥ ६२॥ 

` ते यमेन विनिर्िष्ं यान्ति पुण्यां गतिं नरा५॥६२।| गन्धर्वौ के गायन सुल 8 छव चे 
भारा, भ्रटत्ताप्रसांगणाः , तथा हारः नृषुरकेमा भासे युक्त 

1 मगीतगन्धव्वगणाः ६ । । व 
हारनूपरमाधु्य-शोभितान्युततमानि च ॥६२॥| माला से भूषित होकर स्वर्गं को जाते दै, फिर 
प्रयान्त्या षिमानानि नानादिग्यसरगुज्ज्वललाः। | बां से पृथवी पर ्राकर राजान्नं या श्नन्य महा- 
तस्माच प्रच्युता राज्ञामन्येषांच महात्मनाम्‌ ।।६४॥ स्माशन के ॥ ९ ॥ ल मे उत्पन्न होकर सदुदृत्ति 


जायन्ते च इते तत्र शदृहतपरिपरकषाः। | # पलक दो दी श्े अशये मोग बो 
[स्ततो यान्त्य ९ कर पुनः स्वगं को जाते हे ॥ ५॥ इस भकार 
८ मोगान्‌ म्भाप्लुबन्स्ततो यान््यु्वमन्यथा ॥| जीव थवी प्रात दै शरीर फिर स्वम को जते 


ˆ अवरोहणीच शम्पाप्य पूर्व्ववहयान्ति मानवाः! | । हे पिता ! मैने बह सव इृचतान्त श्राप से कडा 


त स , जन्यते । कि जिस तरद जीव को सुख श्रौर दुःख होता ह 
एतत्‌ ते सव्वमाख्यातं यथा जन्तु श्व जिस थकार जीव गभ में पात होता है वह 


प्रतः शृद्युष्व विप्रे यथा गभं प्रपद्यते ॥६६॥ वृत्तान्त सुनिये ॥ ६६॥ 
हति श्रीमकंर्ठेयषुराण मँ पिता-पुत्र सम्बाद (१) नामक दसवां अध्याय समाप 


-- स~ €> -- 
ग्यारह्षां अष्यासे 
पु्र उवाच पुत्र (सुमति) ने कडा-- व 
(( , निषेकं मानवं ल्लीणां वीजं प्राप रजस्यथ । जिस समय पुरुष का वीयं खी के रज. ₹ 


` | मिलता है उसी समय स्वगं अथना नरक से वः 
बिषुक्तमात्रो नरकात्‌ स्वगाद्रापि भपबयते ॥ १ ॥| जीव श्याकर उस भविष्ट दो जाता दै ॥ १॥ 


तेनाभिभृत तत्‌ स्थैययं याति वीनद्वयं पितः}, | पिता ! कद्‌ रन चौर वीयं इटा होकर स्थि 
कललं बुदुयुदत्वं ततः पेशिखमेष च ॥ २॥ होता ह श्रीर फिर डवल कर बुलवुले के सदः 


+ वीजं > होकर पिंड वन जाता है ॥ २॥ जिस तर खेतर 
प । | श्रदुर उत्प होता है उसी तरह वीयं के पि : 
शानां तथोत्तिः पंचानामद्मागशः " २ अदर निकलता रीर इ विपे ते पाच भा 


| होकर पाँच अङ्ग उत्प होते दै ॥३॥ फिर उपा 


. ५६ भाक॑रुठेययुराण श्र° ११ 
22222 
र १ -प्रणानि च । | अंणुली, नेत्र, नासिका, कान, श्नौर नख श्रादि 
५ यद्गुलौ त्र नासास्य | उत्पन्न होते है ॥ ४॥ इसके वाद त्रचा श्रौर उसमें 


अरोहं पन्त चङ्ग भ्यस्‌ तेभ्यो नलादिकम्‌ ४ ^ सेमर श्रादि उत्पन्न होते ह नौर फिर शिर के याल 
खचि रोमाणि जायन्ते केशाश्ैव ततः परम्‌ । । देते है । फि८ जिस प्रकार जीव वदता टै उसी 
समं सर्दधिमायाति पेनैबोद्धवकोषकम्‌ ॥ ५ ॥ भकार खौ का उर भी वदता दै॥ ५॥ नारियल 


के फल के समान वह जीव खी के.उदरः मं . नीचे 
नारिकेलफलं यदत्‌ सपं ददिच्ति । मुख कयि हुए वद्धि को प्रात दोता है ॥ -६॥ उस 


तद्वत्‌भयास्यपौ दि सकोषोऽथो खः स्थितः॥ ६ ॥| की दोनों जंघाये पश्वो ॐ साथ. रती द शरो 
¢ 

९ 1 | | वोनों हाथ जघ श्रौर पावे के वीच मे रदकर 

तले ठ नाश्व्यं करौ न्यस्य स दध त वृते है । शरंगूढी ऊपर की शरोर ' रहता दै शरीर 

अगुठौ चोपरि न्यस्तो जान्वोरप्े तथांगुली ॥ ७ शरं लियां जंघा से श्रागेकी श्रोर निकली रदती 

है ॥ ७॥ उसी प्रकार जातु की पीठ पर उसकी 

नाुपृ्ठे तथा नेते जालुमध्ये च नासिका । | श्चि रहती है श्नौर जिं के मध्य मे उसकी 

रिफिचौ पाष्णिद्वयस्थे च वाहन वहिःस्थिते। ८ ॥| नासिका होती है, दोनों भुजाय पार्श्वो से सटी 

गदि ननः खग्मसंस्थितः रहती हं ॥ ८ ॥ खली के गभे मे स्थित जीव इस 

एवं दद्धि करमाहयाति न्तुः तः। , | प्रकारः चरद्धि को भाल दोता है | श्रौर भी जन्तु 


ञ्जः लन्तोर्यथा सूं $ जिस रूपके होते है उसी प्रकार उनकी स्थिति 
न्थसत््वोदरे रूपं तथा स्थितिः ॥ ६ ॥ होती दै ॥ ६॥ कटिन श्रग्नि के साथ रहतां श्ना 


ठः याति शक्तपीतेन जीवति। | जो खी खाती"या पीती दै वही वट जीवे खाता 
काटिन्थमग्निना याति युक्त न 


युणयापुरयाश्रयमयी स्थितिज॑न्तोस्तथोदरे ॥१०॥.का फल भोगना पडता दै ॥ १०॥ रीर आप्यायनी 


नादी चाप्यायनी नाम नाभ्यां तस्य निबध्यते। व व र 1 
“ [4 निबद्धोपनायते भ १ ति त 
सीणां तथान्त्शुपिरे सा निबद्धोपजायते ५११. | नौर विया नी २ 


क।मन्तिशुक्तपीतानि स्रीणां गर्भोद्रे यथा। | दै उसी भश्नार जीव यी धमता टता दै ौर खी 
तैराप्यायितदेहोऽ्सौ नन्हदिषय ।१२ | के खाये दी उसकी मी वृद्धि होती दै .॥ १२॥ 
तैरप्यायिपदेहोऽषौ छदविपति वे ॥१२ य 
सप्तीस्तस्य परान्त्यस्यवहयः संपारभूमयः.। | जन्मो की स्र दुनियाँ शरोर भूमिय का -स्मरण 
ततो निर्गदमायाति पीड्यमान इतस्ततः ॥१३ | रता है ॥ १२॥ इस गर्भ से मुक्तं देते हयी फिर 
नैवं करिष्यामि शुक्तमात्र इहोदत्‌। रेसा कोहै कायं नदीं करूंगा श्नौर वही यत्न 


६ ४ करू गा जसे इस गभं मे पुनः न श्राना पड़े ॥ 
रथा तथा यतिष्यामि गभ नाप््याम्बहं यथा ॥१४॥ यद चिन्ता करता श्रा ज्नौर सकर जन्मों का 


इति चिन्तयते स्मृत्वा जन्मदुःखशपानि वै। | स्मरण कर जे कुज दैवगति रथव कमं फल से 
यानि पृत्वानुभृतानि दैवमतानि यानि बै ॥१५।॥ इरा उसा उसको ज्ञान ठोजाता है. ॥ १५॥ फिर 
ततः कालक्रमाञ्जन्तुः परिवत्तत्यधोधुखः ।' | काल के क्रम से बह नीचे मुख करिया हच्मा- जीव 


नवमे ' या दसं महीने को प्राप्त दोता हैः ॥ १६॥ 
नवमे दशमे वापि मासि सञ्जायते यतः ॥१६॥| उसके निकलने की इच्छा होने पर पाजापत्य की 


निष्काम्यमाणो वतिन. मनापत्येन पीड्यते । ` | पेस्णा से बापु उसो निकालती है श्रौर व॒ 
निष्क म्यते च विलपन्‌ हदि दुःखनिषीडितः ।१७।॥| निकल कर पीडित इदमा विलाप करता है ॥ १७॥ 
निष्कान्तशोदरान्मृच्चीमसद्यं प्रतिषचते | | उदर से निंकलते दी वह श्रसदय मून को भरा 


भरामोति चेतनांचासौ बायुस्पशंसमन्वितः ॥१८॥ स त 


-तुतस्तं बेष्णवी माया सम्कन्दति मोहिनी । | माया जो मोदिनीदे उसको आच्छादित कर देती 


०११ ८ ` माकेर्टेयपुराण ८४ 


. श्रौर उससे विमोदित हो जने से उसका 
0 सका क्षान 
विमोदितात्मासौ व्ञानभरंशमवाप्तुते ॥१६॥ नष्ट दो जातादे॥ १६॥ क्षान ष्ठ हो जाने पर 


्रषट्ञानी बालभावं ततो जन्तुः प्रप्यते | ` जीव घालमाव को प्राप्त दोता है छीर फिर कमार 
ततः कौमारफावस्थां यौवनं इद्धतामपि ॥२०॥ श्रवस्था, यौवन श्रौर दधता फो ॥ २५ वद मरता ` 
एनश्च मरणं तदष्नन्म वाक्त मानवः । | दशनौ भिर जन्म पाता दै । इसी भकार संसार 


[तवां ~ चक्र मे मदुप्य रदा के समानं ऊपर नीचे घूमता 
ततः ऽस्मिन्‌ भ्राम्यते घटिगन््रवत्‌ ॥२१॥॥ रहता हे ॥ २१॥ कमी वह स्वगं अ शरीर फमी 


कदाचिद्‌ सगमामोति कदाचिभिरयं नर; । | नस्क मे जाता दै । शौर कमी नरक म तथा कभी 
नरकचेवे स्रगच कदाचिच मतोऽष्जुते ॥२२॥ व जीता च्रीर मरता ५ ॥ कभी = 
कदाचिदत्रव पुनर्जतः खं ~ पृथ्वी पर शरीर त्याग छर श्रपने कर्मानुसार दू 
कदाचिद्रव एुननातः सवं कम्म सोऽश्ुते । जन्म मे जाता है नौर कभी श्रपने कमं का भोग 
कदाचिदुभुक्तकम्मां च यृतः सवश्पेन गच्छति ॥२३॥| करके थोड़े दी काल भै सत्यु पाता षै ॥ २३॥ द 


कदाचिद =, पिताजी ! कमी शम श्रौर कमी धश्ुम कमं करने, 
दाद ठतो नायते श॒माशभे। से प्रारव्ध वश जीच जीता श्रौर मरता है शरीर 


खलेफि नरके चैव युक्तभायो द्विजोत्तम ॥२४॥| कमो का फल भोगता इचा कभी स्वगं धीर कमी . 
नरक को जाता दै ॥ २७ ॥ हे पिता | नरके मदयन्‌ 


नरकेषु भहददुःखमेतदयत्‌ स्रगवासिनः। डुभखो को देखकर स्वर्गवासी प्रसक्न होते रौर 
दृश्यन्ते तात मोदन्ते पात्यमानाश्च नारका; ॥२५॥| नारकी दुःखित दते दै ॥ २५॥ जो लोग स्वग मे' 
सर्गेऽपि दुःखमतुलं  यदारोहणकालतः । | जते है उनको भी श्रतल दुभ इस चिन्तामे दोदा . 


 परिष्यामीत्येतन्मनसि वर्तते ॥२६॥ द कि कीं हम भी इस प्रग्निमं न गिर ॥ २६॥ 
न म्ये ह (4 नारकी लोगो को देखकर मदान्‌ दुःख को माप्त 
॥ भहददुःखमवाप्यते | | देते ह जीर दिन रात यही सो्वते दै करि करटी 
एतां ` तिमहं गन्तेतयहर्निशमनि तः ॥२७ । हमारी भी यद गति न हो जाय ॥ २७॥ उस जीय 
गर्भवासे महद्दुःखं जायमानस्य योनितः । | को भम श ध से ५ कर, याल्यावस्या , 

मथवा था दश्खहे दुःख [1 २० ]} ` 
जातस्य बालभावे च इधते दुःखमेव च ॥२८॥| थवा बहा, श | 
कोषसम्ब्दं यौवने ध काम, ब्रोध, श्या आदि से भौवन म भी भ्रति 
कमेष्यां कोधसम्न्धं यौवने चातिदुसहम्‌ । | दुःख हे यदे म भी प्रायः दख ही, दुःख दै, 
टुःखभाया दृद्धता च मरणे दुःखषुत्तमम्‌ ॥२६. | इससे मरण का ५ व ॥ (५ 
= +, . । यमदू तों दाय धसीटे जाकर नर म गिरेः ८ , ` 
कृष्यमाणस्य याम्ये नरकेषु च परात्यतः। ` । वमत जनम लेकर मरते ह श्रौर नरका भे: 
पुनश गों जन्माथ मरणं न॒रकस्तथा ॥१०॥| जाते है ॥ ३९ ॥ सी भांति इख | 1 
; यंसार्चद्गै घटियन््रत्‌ घरीयन्न की तरह जीव प्रकृति कं चन प 
४ 1 नन्तो पदिन्‌ । चधा दुमा घूमता फिरता दै ॥ ३१॥ दे पिताजी | 
भ्राम्यन्ते भाकृतेवन्धेवदध्वा वध्यन्ति चासङर्‌२१॥ यदय पर संख 1 भी व ५ ध | 
~ , सैकडध इभ्व लगे र्दवे ६! ध चके ` 
नास्ति तात सुखं किञ्चिदत्र दुःखशताङले । किय मलल करने बाला सँ यौ घम का पालन ` 


तस्मान्मोक्षाय यतता कथं सेव्या मया अ्रयी॥२२॥ क्या कर १॥ ३२ ॥ 


इति श्रीमाकरडेयपुराण मे पिता-त्र सम्बाद्‌ (२) नासका ग्यारहवां श्र्याय समाप्त । 
| ~ ">< 


१८ माकंरटेयपुराए अ० १२ 


 भारहवां भष्याय 
। पितोवाच पिता वोक्े- . (ि १ 
साघु बत्य त्वयाख्यातं संसारगहनं परम्‌ । हे साधु पुर ! तुमने क्ञान-धदानरूपी माफल 


न ४ देकर इख गहन वन रूपी संसार्‌ का वर्णन 
हानपदोनसम्भूतं समाश्रित्य महाफलम्‌ ॥ १ ॥| किया ॥१॥ हे मदामते ! जिस तरह क उसी 
नरकाः से रौरवस्तथ तरह अनेक नरक हैँ । सिस तरह तुमने रोर का 
५ व | वशेन किया उसी. तरह विस्तार पूर्वक सच नर कों 
-वरितास्तात्‌ समाचक्ष्व पिस्तरेण सदहामते ॥.२ का दृ्ान्त रन करो ॥ २॥ 

॥ पुज उवाच पुत्र वोला- ह 
।सैरषस्ते समाख्यातः थमं नरको मया । प्रथम नरक रीरव हे जिसका हाल मने ठमसे 


(व : पित! ¦ वर्णन किया । हे पिता ! चच महा रौरव नर का 
॥५ आ वरन उुनिये ॥३॥ वेह चारो तरफ़ से वारह 


योजनानां सदस्ाणि स्र पंच समन्तत; । हल्ञार थोजन है, उसकी भूमि तवि की दै. श्नौरः 


त्र ताम्रमयी भृमिरधस्तस्य हुताशनः ॥ ४।| उसके नीचे श्रग्नि दै ॥ ४ ॥ उसके ताप से पसव 
| ९ दिशायं तप हैं रौर उदयकालके चन्द्रमाके समान 
रतापतप्ता सव्वाशा प्रोचदिन्दुसममभा । | जिसकी ज्योति दै बट दरशन शौर स्पशोषि के 
विमात्यपिमहारीद्रा दशनस्पशनादिषु ॥ ५॥| लिये महा भयानक दै ॥ ५॥ उसी नरक के वीचमं 
तस्यां द्धः कराभ्याश्चपटूभ्याज्चैव यमातुैः। | यमदूत दाथ श्नौर पांव वोँधकर पापियो को डाल 


पापङ्न्मध्ये ; स॒ गच्छति ॥ ६ ५ देते ह शरीर वह पापी उसे गिरकर लोरखतादं ॥६॥ 
ष्यते पापडृन्सध्ये जुटान; स॒ गच्छति ॥ ६ स 


(1 ९०. € कोलकं ४५ शकर 
काके कोल्ड थिकंमशकरतया = । | निद शारि उस मान र कीसनवीच कर खे 
भकष्यमाफस्तथा शभू तं भागँ विद्यते ॥ ७॥ ह ॥७॥ बद पापी पीडित होकर फिर वाप, मा, 
दद्मानः पितमातभरतिस्तातेति चाह्लः । भै, तात च्रादि को पुकारताहै ओौर उद्विग्न दोता 


वद्त्यसङृदुष्ठिणनो न॒ शाम्तिमधिगच्छति ॥ ८ ।|| इअ कदं शान्ति नदी पाता हे ॥८॥ सदस वर्धो 


५ दतिक्रान्तं तक दुश्ट-वुद्धि लोग पाप करने के कारण कष्ट भोग 
एवं तस्मानरमोषो वाप्यते । कर उससे मुक्त होते है ॥ ६॥ समी अकार तम 


वरपायुतायुते | ५ 1 दष्ुद्धिमि ६ 
; पापं यैः कृतं दु्ुद्धिभिः ॥ & ॥| नाम का दूसरा नरक हे जो ,मदा रौरव नरक से 
तथान्यस्तु तमो नाम सोऽतिशीतः खभावतः। | से भी अधिक दी है, स्वाभाविकतया जहां बहुत 
महारोरववदरयस्तया स॒ठमसा शृतः ॥१०॥ छर पी 1 
॥ 
शीतात्त स्तत्र तास्त धावन्तो नरास्तमसि दारुणे । | दारुण न्यकार म मारते ह शौरे पक दूसरे से 
परस्परं समासाद्य परिरभ्याश्रयन्ति च ॥११॥| लिपट कर श्राध्रय की तलाश मे भ्रमणे करते ह ॥ 


दन्तास्तषाज्व भज्यन्ते शीतार्तिपरिकम्पिताः | शीत से ्रातं होकर कोँपते-हुष उनके दांत ट्ट 


जाते ह, भूख शरीर प्यास्त से व्याङ्कुल होकर अनेकं ` 


५ = वान्येऽ््युपद्रवा ११ व ति ॐ+ > 
 पुच-खामवलास्तिव _ तथबान्यञ्युष्रनाः ।।१२॥| उपरो से युक्त होते दै ॥ १२] वाश्रं से उद्‌ २ 
। हिमखण्डवहो वायुर्भिनत्यस्थीनि दारुणः 1 | कर हिमखरड उनकी डय को तोडते है रौर 


न व) भल से पीडित होकर वे पने शरीर से गिरे हषः 
| तस्माद्शरुन्ति एपान्विताः ॥१३। ओर जूत को खाते है ॥३॥ परस्पर समागम 
लेलिहमाना ॒भ्नाम्यन्ते परस्परसमागमे । | मे पापी लोग प दूसरे को शीर चायते है, इस 


| एवं तत्रापि सुमहान्‌ हेशस्तमसि मानवैः ।|१९॥॥ भकार उस महान्‌ अन्धकार मे पापी लोग मदान्‌. 


भ, 


: ५ - जह्मणशरष्ट॒याबदूदुष्छृतसंक्षयः । ` का चेय नदीं होता तचत बद नरकमे रहता है । 


~ 


| क पाते है ॥१७॥ हे पिता ! जवतक जीवके दुष्त , ' 


अ १२ ।  भकैरडेयपुरोण 


नि्न्तन इति ख्यातस्ततोऽन्यो नरकोत्तमः ।१५ ` सके अतिरिक्तं निङृन्तन नाम . का दूसरा नरक है 
तस्मिन्‌ कुलालचक्राणि भराम्यन्त्यविरतं पितः। य 1 की र 


तेष्वारोप्य निकृत्यन्ते कालघेण मानवाः ॥१६॥ काल सू्रसे काया जावा है ॥ १६ ॥ हे दविजसत्तम ! 
यमदृत लोग कालसूत्र श्रंगुली मेँ लपेट कर उससे 
प्रालुगायुलिस्थन वत भापादतलमस्तकभू । पापियों को पांस से भस्तक तक काट डाल है, 
न. चेषां शो जायते द्विनसत्तस ॥१५७॥| लेकिन फिर भी उम पापिो की शत्य नदीं £ ` 
चित्नानि तेषां एतशः. खण्डान्येकयं वरजन्ति च| | ॥ १७॥ उनके शरीरो के सकद खरड हो जाते है 
| वर्पसहस्रारि पि यिलक्षर 

एवं वर्षसहस्राणि चिन्ते पापकम्मिणः ॥१८॥| शौर वे खण्ड धनः मिलकर पक हो जते है, शस 
तावदयावदरोष स ४ प्रकार वे पापी हजारो वपं तक छदे जाते है ॥ जब 
। वै तत्पापं हि कषयं गतम्‌ । | तका उनके पा य होकर निष नीं दोजते 
अभिष्य नरकं शरुष्व गदतो मम्‌ ॥१६ तय तक उनको उस नरक रदा पता दै । अव 
त्रस्थनाकेदुःसमसहमलुभूयते | ८, | मँ अप्रतिष्ठ नाम नरक का दाल कता ह. उसको 

- तान्येव ततर चक्राणि घटीयन्त्राणि चान्यते; ॥२०॥| उनिये ॥ १९॥ उस्म रहकर नारकी लोग .. भर 
। भल का श्रद्धमव करते दै । उसी मे चक्र श्रीर 
दुःखस्य हेतुभूतानि पापकृतां णाम्‌ | | सरे टीयन्बर स्थित दै ॥ २०॥ यापी लोग दुः 
चक्रेष्वारोपिताः केचिदभाम्यन्ते तत्र मानवाः ॥२१॥| पाने के हेतु चक्र पर पडा कर घुमा जाते है॥२; 
` यावद्षसहस्लाणि न तेपां जव तक हज्ञार वषं पर नदीं होते तव तक गक 
स्ञाणि न तेषां स्थितिरन्तरा । | वही कि अीयत्य ते जि 


घटीयन्त्रेषु चैवान्यो वद्धस्तोये यथा घटी | जलका कलश वधा जाता दैवे वाँधे जते 


` भ 


भ्राम्यन्ते भानवा रक्तयुद्विगरन्तः पुनः पुनः। | ॥२२॥ उन भयुष्योकि धृमते-धूमते खधिर „ -~. 
^ _ तैः ( लगता है, श्रो से उनद्ध सुखं चीडाया जाता ~ 
दुःखानि ते पराप्नुवन्ति यान्यसद्यानि जन्तुभिः। | उन जीवों दवारा जो श्रखह्य दुःख द वे भोगे जति 


सिपत्रयनं नाम नरकं शरण चापरम्‌ ॥२४॥| ६ । अव श्रसिप्न वन नामक न्य नरक का ९.६ 

व = __ „~, `| खनये ॥ २४॥ सहस्र योजन जिसका विस्तार दै, 
योजनानां सस्र व । | शरीर जिसकी थ्व. से मजवसितदै रौर. 
तपाः सूस्यकरशण्डयः सुदारुणः ॥२५॥| भरचरड खयं की किरण से दारुण ह ॥२५॥ ध 
भपत्म्ति सदा तत्र प्राणिनो नरकौकसः. | लोग सदा पेसे नरक मे गि जते. दे ्रोर-उ् 


- ७: 3 + ६॥ के मध्य मे जो वन है उसमे पत्ते.तलवार की. `. 
न्पध्ये परिभाव्यते | ५ ५ १५ तलवास {1 ५9. 
तन्मध्ये च बनं रस्यं स्तिश्धपत्रं 8 ॥२ तेद ह ॥ २६। द द्विजसखचम ¡ बा तस 


पत्राणि तत्र सङ्गानां फलानि दिनसत्तम । | पते श्नौर फल है रर बह बड़े-बड़े बलेवाम्‌ छतत. ` 
एेवानश्च तत्र सवलाः स्यनन्त्यधुतशोभिताः ॥२७॥ शुरुड ॐ गुड, भृकते रहते है ॥ २७॥ जो बडे : . . 


महावक्त्रा महाद्रा व्याघ्रा हव भयानकाः । | वाले दै श्र जिते डे न द ५ 
लोग्य शिशिरच्छायमग्रतः समान भयानक ह । उस वनकी छाया को + . 
ततस्तदनमालोक्य , शिभिरच्चायमप्रतः ॥२८।| गीत 0 वी 


. :पयान्ति भाणिनस्ततर .तीनददपरिीडिताः । | प्रास -से दुःखित शोकर शा भाता ! हापिता! 


हा मातहां वात इति कन्दन्तेऽतीव दुःखिताः ९६॥॥ श्रादि कहकर विलाप करते हए अति दुःखी द्‌: 
| ` है ॥२६॥ अग्नि से भूमि के जलती रढने के कारण 


दह्यमानादिश्ुगला धरणीस्थेन वहिन । ` प 

हे ९ ॥ । ९ भ जलते ने 91 

तेषं गतानां तत्रासिपन्रपाती समीरण; ॥२०॥ वय र जलवे 41 तथा र व 
५० ~“ „^, | वारो की तरह चोड लगती दे. ॥.२०॥ पत्ता % । 


क~~ ~ 


प्रवाति तेन पात्यन्ते तेषां खदंगान्थोपरि ।. | ऊपर से गिरना तलवास की तर्द दोतादै, ५. ` 


ततः पतन्ति ते भूमौ ` स्लत्पावकसश्चये ॥२१॥ चे पृथ्यीःपर अग्नि के देर की तरं निरते है ॥२१ 


` ई मकरेण ४ अ 
----------------------------------------------~ 

व्यप्ासेषमदीतले | जीवो जिह्वा चाहर निकल श्राने के कारण घे 
सेलिदमान 99 क पृथी को चायते से मालुम होते दै, कत्ते शीष 
सारमेयास्ततः शीघधर' शातयन्ति शरीरतः ॥२२॥| दी उनके शीर से लिपट जाते द ॥२२॥ उनके 
तेषासङ्कानि सूदतामनेकान्यतिभीषणाः ! | च्ञ री यद दशा दने के कारण वे रोते 1 हे 


असिं चैतत कर्षित तात ! श्रसिपत्र वन का हाल मैने तुमसे वयान 
घनं तात सयेतत्‌ कीरिं तव ॥२२॥| किया ॥ ३३ ॥ श्रव उससे भौ परम भीषर तकु. 


अतः प्रं भीमतरं त्कृम्पं निवोध मे) नामक्त नरक का हाल सुनिये । तङ्घम्भ फे चासो 
समन्ततस्तपषकुम्भा वदहिस्बालासमादृताः ।॥२४॥ त श की त है ॥ ३४ व र 

व्वलदम्निचयोदृ््तैलायशर्णपूरिता पपरिताः इर ग्नि, गमं तेल श्रौर वाल्‌ से पूणं है 1 । 
ल्वलदग्नि त = दमोयखाः नीचे सुख किये हए पापकर्म मचप्योँ को यमदूत 
तेषु दुष्कृतकम्पांणो याम्यः खधामुसाः ।२५॥| फक देते द ॥ २५॥ वहां उनके शरीर के शरक का 
क्षाथ्यन्ते विस्फुराद्वाच-गलन्सनज्जनलाविलाः । | क्वाय बन जाता है ओर शरीरं गत मन्वा श्रीर 


विभीपरैः जल जलता है 1 उनके कपाल, नेच श्रौर श्स्थियों 
स्ुरकपाललनरास्थ च्छियमाना २॥२९॥ को बड़े-बड़े भयानक ॥ ३६ ॥ गिद्ध उपाड़कर छोड़ 


शैरत्याव्य सुच्यन्ते पुनस्तेष्वेव वेगितैः । देते हैँ फिर उनको उसी दशा मे करके यमदूत 
पुकःसिमपिमायन्ते तैलनैक्यं वरजन्ति च ॥२७]/ लोग उन खौलते तेल मे डाल देते हँ ॥ ३७॥ स 
गतैः सिरोगव-लादूःयोर-लगसिभिः । ` से उनका शिर, गात्र, स्नायु, मांस, त्वचा श्रीर 
तेः -त्वगस्थिमिः । | शस्यया दरवीमूत हो जाती दै 1 फिर यमदूत लोग 
ततो याम्यैनरराशच दव्न्यां धषटनषष्िताः ॥३८॥॥ दाथ मे शवा लेकर उनको उलट-पलट करते है ॥ 


ते भहा । | इसी धकार खोलते हप तेल के वत्तकुम्भमें पापियों 
कृतावतते महातेले मध्यन्ते पापकस्मिणः । क्ते मथते है 1 हे पिता } यह भेन श्रापसे त्षकुम्म ` 


एष ते पिस्तरेणोक्तस्तपङ्म्भो सया पितः ॥३६॥| नासक नरक का घर्ख॑न विस्तार पूर्वक कटा ॥ २६॥ ' 


इति भीमाक॑र्डेयपुराणमे पिता-पुत्र संवादके अंतर रौरवादिनरकाख्यान नासं बारहवा अध्यांय समा 
- स्थत -4ड-- । | 


तेरट्वां अध्याय 


पुत्र ( खुमति ) ने कहा- । 

इससे सातवें ज्म मे मे वैश्य कल मे उत्पन्न 
इश्मा था । पानी पीने को जाती हु गाय को मेने 
रोका था ॥ १॥ उस पाप कर्म के फलखरूप दारुण 


पु उघाच 
अहु वैशयङले जातो जन्मन्यस्मात्तु सप्तमे । 
समतीते गवां रोधं निपाते कृतवान्‌ पुरा ॥ १॥ 


विपाकात्‌ कम्मणएस्तस्य नरकं भ्रृशदारुणम्‌। | नरक मे सुखे जाना पड़ा जद करि ग्निकी शिखाय 
सम्माप्तोऽप्िशिखाघोरमयोगुखसगाङलम्‌ ॥ २ ॥ तथा घोर लेटे के सुख वाले पकती भरे हृष थे ॥२॥ 


यनपदाला्माोदपत्‌ ॥ | 6 
विशस्यसानदुष्कम्मि-तननिपातराडलम्‌ ॥ २ ॥ था शौर उनके विलाप करते की ष्वनि होस्दीधीः 


पात्यमानस्य मे तत्र साग्रं षतं गतम्‌ । | ॥३॥ चां पर गिरकरः सुभे सौ बं कठिन ताप 


तप्त होते हषः तथा प्याख की 
महातापाततितषस्य दष्णादाहान्वितस्य च ॥ ४ ।|| घयतीत दोगय॥ ४॥ सके वाद्‌ भ 
ततराहाद्करः सथः पवनः सुखशीतलः । | म्भ मे डाला गया, वम पर आनन्दः श्रौर ` खख 


करम्भ-गालुकाङुम्भ-मध्यस्थो मे समागतः ।। ४ देने वाली व १ रदी थी ॥ ५ ॥ उसफे 
स्पशस प) 
-सत्सम्पकोदशेषाणा नामवहयातना णाम्‌ । नारकी लोगों को यातना नदीं होती थी । 


जिस भकार खगेनासियों को खर्गमे निदृत्ति होती 


॥ 1 हि | 


 अहारान यथात्थ त्वं तथैतन्रात्र संशयः । 


श्र माकंण्डेयपुराण ६१ 


~~ 


| भको विस्मय इुत्रा कि मुभे 
परिमेतदिति चाहाद-बिस्तारस्तिमितेकषणैः। | ४ डा क मु इस भकार शआह्नाद 
दष्ठमस्माभिरासन्ं नररत्नमनुत्तमम्‌ ॥ ७ ॥| नर-रत्न को मेने देखा ॥ ७॥ उसके श्रागे ए यम- 


-निमभ दूत हाथ मे घोर दरड लिये इए श्रौर वन्न की सी 
ल्प ` घ १ नि, ॥ [* 
अ पुरुषो धीरो दण्टहस्तो । | रान्ति वाला यह कता दुरा जारहा था ,कि मार्ग 


. पुरतो दशंयन्‌ मार्गमित एटीतिवागथ ॥ ८ | यह दै इधर ्राइये ॥८॥ उस समय वद पुरपः 


रुपः स तदा दृष्र॒ यातनाशतसंृलम्‌ । को सैकड़ों यातनाश्नो से व्या रख 


द रप र श्रौर दया से युक्त होकर उस यमृत से 
नरं पराह तं याम्यं किङ्रं कृग्यान्वितः ॥ ६ ॥ यड वो्ला॥ ६ ॥ 


पुरुषवाच पुरुप बोला-~ 
भो याम्य पुरुपाचक्ष किं मया दुष्कृतं कृतम्‌ । हे यमदृत ! सुफसे कौनसा पाप हुश्रा है जिस. 


यातनामीमं प्राप्तो - से इख यातना-गर्हिंत दारुण नरकको मेँ प्राप्त हुता 

येनेदं यातनाभीमं ापतोऽस्मि नरकं १९ ह ॥ १० ॥ मै राजा जनक के कुल मे बिपश्िति 
विपश्चिदित्ि विख्यातो भनकानामहं इले । | नान भख्यात था, म सदैव सेवकोंका पालने करता 
जातो विदेहविषये सम्यख्मन्‌जपालकः ॥११॥| था ॥६१॥ मेने वहुतसे र किये शौर धर्मपू्वक 
यतये । क 0 पृथ्वी का पालन किया । मैने कभी संग्राम मं पीड 
येयं हुभिधम्मेतः पराक्तिता मी । नहीं दिखला चौरन कभी किसी चतिथि कों 
नोत्छष्टश्यैव संग्रामो नातिथिर्विुखो गतः ॥१२॥ विमुख किया ॥ १२॥ पिद देव, ऋषि श्नौर सेवेकों 


श्मादि का ैने कभी अपकार नदीं किया श्रौर मैने 
पिवृदवुपिभृत्याथ न चापचरिता मया । | कथ परली श्रथवा रे के चन भी द्द्वा नही 


- . ता सहा च न मया परस्ीविमवादिपु ॥१३॥| की ॥ १३॥ परवकाल मेँ पितरं श्रौर तिथिकाल मे 
` पर्न्वकालेष॒॒पितरस्तिथिकालेष॒॒देवताः। | देवता मुय के पास दस तरद आरति ह जित 


। सिव तरह गाय श्रपने वड को दध पिलाने के लिये 
पुरुषं स्वयमायान्ति निपानमिव धेनवः ॥१४॥ आती है ॥ १४॥ जिन गृरस्थियो के घर से यह 


यतस्ते विगुखा यान्ति निश्वस्य गरहमेधिनः। | विमुख दोकर लोट ते हं उन मचुप्यों का क्रिया 


तस्माद पवय मौ द्वति नतः ॥११५॥ दात यल रधम न गाता 
पित्निश्वासविध्वस्त' सप्तजन्मार्ित शुभम्‌। | किया षा गकं न्ट दोजाताद जीर देवतां के 
त्रिजन्मममवं ५.२. हन्सयसं नैराश्य स न्धह मणुष्य का तीन जन्म का 
सममव दवो निश्वासो  नत्यसंशयम्‌ ॥१६॥ बेमब नष हो जता दै ॥९६। इसलिमे प्र देवताओं 
तस्मादेव च क च नित्यमेव दिताऽभवम्‌ । श्नौर पितरों की सदैव पूजा किया करता था, फिर 
सोऽ्दं कथमिमं प्राप्तो सरकं भृशदारुणम्‌ ॥ भी सुमे यह दारुए-नरकः किंसग्रकार मिला १।१७॥ 


, इति श्रीमार्करडेयपुराण मे वैश्यराज-यमघुरुप संवाद नाम तेरहवाँ अध्याय समक्ष। _ 


1. / प 
चौदह्वों अध्याय 
पुत्र उवाच पत्र वोला-- _ | | 
इति पृष्टस्तदा ते शृएवतां नो महात्मना । | राजा विपश्चिति के पून यमदूत ने जो 
उवाच पुरषो याभ्योथोरोऽपि प्रखतं बच ॥ १ ॥, थयपि भयानक था मधुर चासी स कदय ॥६॥ 


यमदूत वोला-- 


[प 
यमकिङ्कर उवाच 1 
भि हे महाराज ¡ जो कृच आ्रापने कहा उसमे 


६२ माकण्डेयघुराण श्रः १४ 
~~~ ~ -~- ~ । 
|} संशय नीं ! परन्तु थोड़े किये ्रापके पाप कां 

किन्तु स्वद्पं कृत पाप भवता स्मास्यमि तत्‌ ॥ २ स्मरण दिलाता ह ॥ २॥ पूर्वकाल मे श्रापकी स्री 
नाम नामतः । ` पीवरी नामक जो विदभराजाकी पुज शरी ऋतुमती 

वदभी तवया र धीक नामना हर श्र श्रापने तुधम होने के दाद उदे प्रसङ्ग - 
क्रूतुमत्या ऋतुवन्ध्यस्त्वया तस्या; कृत, एर }र।} से उंचित्त रक्त ॥३॥ तश्रा दृसखरी सीसे जो 
॥ ए केकयराजकी पु्ीथी श्रौर जिसका नाम सुशोभना 
पुशषोभनायां केकेरयामासक्तेन ततो भवान्‌ | ¦ था श्रापते कामासक्त होकर भूस करिया । पदिली 
खरी की ऋतुमती होने का श्रापने तिरस्कार क्रिया 

ऋतव्यतिक्रमाद्‌ भाप्तो नरक घोरमीदशम्‌ ॥ ४। इसक्तिये श्रापको यद घोर नरकः भा हव्या ॥४॥ 
जिस प्रकार होमकाल में ग्नि श्यति की इच्छा 

लञेमकाले यथा पहिराज्यपातमवेकषते । स 
तौ भनापतिस्तदवदरीनपातमवेक्षते ॥ ५॥| की योनि के देचता प्रजापति श्रतुकाल मे वीय्य- 
प्रि की इच्छु रसते द ॥ ५॥ रंसलिये ऋतुमती 

यत्तयुटटङ्प्य धर्मात्मा कासेखासक्तिमान्‌ भवेत्‌ ! | सरी को छोड़कर ओ धत्मा ज्लोग काममे ्रासक्त 


होकर न्य स्री घे भोग करते हँ तै पितर्रण 
स॒ त॒ फियादृणात्‌ पापमवाप्य नरकं पतेत्‌ “ ६ ॥| रूपी पाय से नरक म गिरते ह॑ ॥ ६॥ `हे यजन्‌ ! 


एतावदेव ते पापं नान्यत्‌ किञ्चन विद्यते} | ०५ व ८ व रव 
। 1 ॥ खरग 

तदेहि गच्छ ४ पार्थिव ॥ ७।!| को चलो ॥७॥ 

राजोवाच राजा वोला-- ` 

यास्यामि देवाजुचर यत्र चं मां नयिष्यसि । हे देवदूत ५4 मुस जे चलोगे वहाँ टी 
मे जाड गा । लेकिन जो वात मे पृष्ट उसका तुम 
पिचित्‌ पृच्छामि तन्मे तवं पथावद्वकतुमहमि ॥ ८ ॥ यथावत्‌ उत्तर देने को समर्थं हयो [र ॥ ये कौप जो 
वन्नतुण्डास्त्मी काका; पुंसां नयनहारिणः ७ इन १ की श्राखों.को 
॥ तदरदेषा हि र्‌ {फर उन लो के नेच पतं वैसे 
पुनः पुनश्च नेत्राणि ठ भवन्ति हि ॥ & ॥ दीदो जातेदै॥ ६ ॥इनल्लोगों ने णेसा कौनसा 
पि कम्प कृतवन्तश्च कथयैतञ्यगु्सितम्‌ । | कर्भ किया हे कि जिससे कौण्‌ इनकी जीभ को 


हरन्तयेषां तथा जिहां जायमानां एुननबाम्‌ ॥१०॥ स रेह क कदिये ॥ १० ॥ किंसलिये 

करेवा प्ये कत्वेतेऽरिहःसिताः अति दुःखित होकर करयत्र की मार से पीडित 
करपत्रेण ४ अ ऽतिदुःखिताः । जाते हैँ शौर ये गर्म वालु श्नौर सौलते इ 
करम्भवाज्ुकास्वेते पच्यन्ते तेलगोचराः ॥११। तेल मे क्यों पकाये जाते ह ?॥ ११॥ शरीर किये 


~ 3 सिरा क किस थकरार इन सुख नीचे किये इश को उनके 

‡ खगश््चत चधा = ` न 3 ॐ 
1 खगेचते कृष्यन्ते किंषि । द । शरीर सहित सीच-लीचकर परीलोगखा रेह 
विश्िषटदेद्रवन्धासि-महारावविराविणः ॥१२।॥ ओर वे भीपण॒ नाद कर रदे द ॥ १२ इन लोगों ने 
ञअयशवश्वनिपातेन सब्वाद्क्षतदुःखिताः | कोनःसा निष्ट कया है जो पक्ियों की चोचं 
विरजसं स्यानेिधं नः से इनका सारा शरीर चत-विक्तत दो रहा है श्नौर 
नेषएटकत्ता निशं नरा; ।१.३।॥ दिन-एत जिनके शरीर से रुधिर वहता है ॥ १३॥ 
एताधान्याश दृश्यन्ते यातनाः पापकम्मिणाम्‌ | र्ती न कीच व यातनायं दिलाई 
येन_ कम्मीषिपाकेण तन्ममारेषतो बद ¦ १४॥| मस पतय उ ॥९४॥१ पर ल £ व 

यमकिङ्कर उवाच 


। ` | यमदूत वोक्ञा-- 
यन्मां पृच्छसि भूपा पापकम्मफलोदयमू ४ हे राजन्‌ ¡ यदि आप सुमसे पापकर्म के फलोः 


तत्‌ तें सम्मव्यामि संक्षेपेण यथातथम्‌ ॥१५।॥ य को पूचते है तो मँ उसको संप भे. बरुन 


ग्र° १४. माकंणेयषुराण. ` , ६ 
व 
पुणयापणये हि षरषः पर्यायेण समश्रुते । | करूंगा ॥ ६५॥ मलयो -फो पुर श्रीर पाप 
युञ्जत क्षयं याति पापं पुण्यमथापि वा ॥! २ व ॥ से ४ 
४ य प दीते दें ॥१६॥ 
न तु भोगाहते पुं किंचिद्र फपं मानवम्‌। मानकर पाष हो या पुय भोग से दी चथ =. 
पापकं वा पुनात्या क्षयो मोगात्‌ परजायते ॥१७१ भाष दोते ह अर्थाव्‌ भोगे से दी कते ह ॥ १७॥ 
परित्यजति भोगाश्च पुण्यापुण्ये निवोध मे । | पाप चोर परय भोग से दी चुते दै फेसा समभो 


। लशं जिस प्रकार दुभिक्त से दुभि, ङ्श से केश शरीर 
दभिश्दव दुभिकषं शात्‌ व ॥१८॥| भव से भय ॥९८॥ दरिद्री व पापी आदमी मरमेपर 
मृतेभ्यः भ्रगृता यान्ति दरिद्राः पापकम्मिणः। भी मरता है श्रौर पापकर्म बन्धन से जीव नाना 


गति नानाषिधां यान्ति जन्तवः कम्म॑बन्धनात्‌॥१६॥| भकार की गतियो को थाप तेह ॥९९॥ शौर धुय 
उत्सवादुत्सवं यान्ति स्वर्गात्‌ खगं सुखाद्‌ सुखम्‌ । | ्रास्मा लोग जो श्रद्धावान्‌, शान्त श्रीर धनदाता हैँ 


। । उत्सव से उत्सन्न, खं से खगै, श्रौर खख से सुख 
श्रद्धधानाश्च शान्ता धनदाः श्मकारिणः ॥२०॥ को पात करते ई २०॥ पापी दग हाथी, ग्या, 


व्यालङ्घज्ञरदुरगाणि १ न 
5 सप चौरमयाणि तु) | इग, सप श्नौर चोर केमयसे हत होकर फिर 
दताः पापेन गच्छन्ति पाप्निः किमतः परम्‌ ॥२१॥| पाप दी मे भचृत्त होते टै ॥२९॥ पुरयात्मा जोग सब 
सुगन्धिमाल्य-चहस्र-साधुयानासनाशनाः । | लोगों से वन्दित होकर छगन्धि, माला, अच्छे २ 


, =, ९ वस्र, मोजन श्रौर पान से युक्त पुरयमा्गं में 
सदयमानाः सदा यान्ति पृएयः ुएयाय्वीचयपि॥२९॥| निचे ह ॥२२॥ जनौर अनेक शत जन्मा सधित 


अनेकशतसाहस्जन्मसंचयसश्चितम्‌ । | पुय श्रौर पाप मलुष्यौ को क्रमशः खख श्नीर दुख , 
पुण्यापुएयं वणां तद्त्‌ सुखदुःखाङ्रोद्ववम्‌ ॥२३।॥ का कारण होता है ॥ २६॥ दे राजन्‌ ! जिस प्रकार 


यथा वीजं हि मूपाल प्रयांसि समवेक्षते | ् जल की 1 र ् उसी 1 पुरय 
ए्वाणुस्ये तया कालदेशन्यकर््थकारकम्‌ ।(२४॥| सवतः है ॥ २७१ कमीनकनी चोडा पप कर 


स्वद्ं पापं कृतं पुंसा देशकालोपपादितम्‌ । | मलष्य देश, काल ॐ श्रयुखार श्रथिक कष्ट पाता दै 
पादन्यासकृतं दुःखं कण्टकोत्यं भयच्डति ।२५।|| जिस भरकार्‌ मागं रके इष कोटे से कंटकजन्य 
तत्‌ भंभूततरं स्थलं . शूलकीलकसम्भवम्‌ | | दः होता है ॥२९॥ मागं मे काय रखने बले को ` 
५ क, । श्ल श्रौर कील का दुःख होत ह श्रौर उसको 
दुःखं यच्छति तद्वच शिरोरोगादिं दुःसहम्‌ । ९६ सदैव दुःसह शिर रोग रहता है ॥२६॥ जो श्रपथ्य ` 
अपथ्याशनशीतोष्ण-्रमतापादिकारकम्‌ । | शीत, उष्ण, श्रम रादि पीड़ा पचात है उसको 
तथान्योजन्यमपेक्षन्ते पापानि फलसङ्गमे ॥२७।॥ भी श्यपने पाप का फल मिलता है ॥२७ ॥ स तरद | 


] दीर्धतेगादिषिक्रियाम्‌ | | के महान्‌ पा दी भेगों र विका को इत्यन्न ` 
एवं महान्ति एापानि दीमैरोगादिविक्रिाम्‌ । = | दी 1 


तदन्चसाधिृच्छासि-वन्धनदफलाय वै ॥२८॥ केक हो जाते दहै ॥ २८॥ एसी प्रकार थोडा सा 
स्वस्यं पुण्यं शुभं शन्धं हेलया सम्भयच्छति । | पुरय भी शुभ कारक होता दै, जैसे यदि खेल मै ` 
सपं वाप्ययवा शृष्दं रसं रूपमथापि वा ॥२६॥| भी कोई गन्ध, स्पशं, शब्द, र श्रथवा रूप देता , 


§ है ॥ २६॥ तो बह वहत दिन तक श्रत्यन्त सुख 
चिरादगुस्तरं तद्न्महान्तमपि कालजम्‌ । व 


एवश्च सुखदुःखानि एुण्यापुण्योदवानि वै ॥२०। | ल उततर होता है ॥ २० ॥ शनक जनो मे उतय्न + 
धुञ्ञानोऽनेकसंसारसम्मवानीह तिष्टति । | पाय या पुरय का फल जो श्वान श्रथवा श्र्ञान से , * 
जाति देशावरुद्धानि श्वानाङ्नानफलानि च ॥२१।॥| उत्पन्न दोता दै ॥३९॥ चद चात्मा करे साथ रता है , 
तिष्टन्ति तत्न युक्तानि लिङ्कमात्रेण चात्मनि! | मुष्य ॐ शरीर खे, मन से, वचन से उसका को 
वपुपा मनसा वाचा न कदाचित्‌ फचि्नरः ॥३२॥ सस्वन्ध नदीं ॥ ३९ ॥ किये हए पाप या पुर, के 


= 
५. 


छ. `` माकंर्डेयपुराण | श्र° १४ 
=-= । 
्रहव्वेन्‌ पापकं कम्प पुण्यं वाप्यवति्ठते ! | कर्म से मनुष्य क्रमशः दुःख शौर सुख पाताैारेशा 


पदयत्‌ भ्रोति पुरषो दुःखं सुखस्यापि शा ॥२३॥ चित्त को चिज्घते करने बाता श्रौर सुख तथा दुख 
्भूतमथवा स्वस्य॑ विक्रियाकारि चतसः | कतो देते बाला यदी परय श्रौर पाप हे ॥३४ ॥ जिस 
तावता तस्व पुं बा पापं वाप्यथ चेतरत्‌ ॥३४।\ भक्तार भोजन की चस्तु खाने से धटती है उसी 
उपभोगाद्‌ क्षयं याति ज्यमानमिवाशनम्‌ । | अच्छर महापाप नित्य-अति यातनायं भोगने से - 
एवमेते महायापं॑ यातनाभिरदर्भिशम्‌ *३५॥ रते हँ ॥३९॥ जिस रकार पापी लोग इस ` 


रोर नरके दुः्वभोग र्दे है उसी प्रकार हे 
्षपयन्ति नरा घोरं॑नरकान्तर्विवसिनः राजन्‌ ! पुर्वात्मा लोग स्वगं में देवताश्नों के साथ 


॥ 
तयेव राजन्‌ पुएवानि स्व्गलोकेऽमरः सह ।\२६। , 1 २४ ॥ ओर गन्धव, सिद्ध, ऋप्सराश्मों के साध 
गन्य््वसिद्धाप्रसां गीवा त्पुजदे ! | गत आदि सुखो भोगकर परयो 6 भोगते 

शुभाश्यभम्‌ ॥२७॥ दै तथा. इसने बाद चे देव मदुप्य परिया 
देवल मातुपत रतिव्क्ते च शुमा ५ 7 योनि मे ते ह ॥ २३७] हे राजन्‌ ! मैने आपसे 
पुण्यपापाद्रवे भरन्त सुखदुःखाप्लक्षणम्‌ | 


पुर्य ओर पापों की उत्पत्ति ओर सुख तथा दुःख 
यत्‌ पृच्छति मां रानन्‌ यातनाः पाप्कम्मिणम्‌। क भोय का वर्यीन किया! तथा श्रापते जो पापियों 


ऊन केनेति पाणेन तत्‌ ते वक्ष्याम्यशेषतः ।।३८॥| की यातना के विपय में पृदा कि क्सि पाप से 
दूत चक्षषा दाः परदारा नराधमैः! । कौन यातना मिलती हे बह भी निभ्सेप वताता ॥ 


¡ जो याधम दृसरे की खी को ऊुदष्टि से देखते दे 
मानसेन च दुष्ठेन परदव्यश्च सस्र ।।२६॥, रौर वेहमानी से दृसरे का धन हरण करने की 
वजतुण्डाः खगास्तेषां हरन्त्येते विलोचने । | इच्छा करते है 1३९॥ उन लोगों की शरस को वन्न 


पुनः पुनश्च सम्भृतिरश्षणोरेषां भवस्यथ्‌ 1४ ०।\ के समान ज़ी चोचे पत्ती निकाल सेतेदै च्चौर 
 याबदोऽकषिनिमेबास्त पापमेभिदृभिः इतम्‌ | फिर रखी ही हो जाती दै ॥४०॥ म्य लेय 


जितने पल आंखें से पाप करते हँ उतनेदी खटस्न 
ताबरहषसहक्षाणि नेत्रां भरामुचन्त्युत । ४१} थं नक्तो उपेच्ध ने डः रहता टे ॥४१॥ जो 


अयच्छाद्धोपदेशस्व येदत्ता यश्व मन्तिताः। ¦ ललोय असत्य शाख का उपदेश चहे वैरियों को 
सुस्यगष्टेविनाशाय रिपूणामपि मानवः ॥४२॥ नाग्त करने के लिये दी क्यो न देते है रौर असत्‌ 
यः शाचछमन्यया भोक्तं यैरसदागुदाहता । | मन्् दते.€ ॥ ४२॥ ज लोग शस का उस्या अथ 


चतलाते दे, तथा भर चोलते हैँ ओर वेद, देवता, 
बेददेबह्टनातीना गुरोनिन्दा च यः कृता ॥४३॥ द्विजातियों चा गुरू की निन्दा करते है ॥ ४३ ॥ उन 


हरन्ति तेषां जिङह्ठाथ जायमानाः पुनः; पुनः} | की जीय को वार.दार वन्न की सी चच बाले 
तावतो वत्सरान वजतुण्डाः सदारुणः ॥४४] | मयानक परती निकाल जेते हैँ 8 जो ल्लोग मित्रो 
मित्रभेद त्या प्तरि पुत्रस्य स्वजनस्य च} | ने, पिता पुत्र मे, जने मे, यलक्त्ता च उपाध्याय 
: याञ्योणध्याययोर्मात्रा सुतस्य खहचारिणः ॥४५।( मे, माता श्नौर पुन म तथा सहचारियो मे ॥ ४५॥ 
, भार्स्यापत्योश्च ये केचिभेदं चक्रनराधमाः! | जर खी पुर्पमे मेद करते ह वे हे राजन्‌ 
- त इमे पश्य पाच्यन्ते करपत्रेण पार्थिव ॥\४६।| उधर देखिये करपत्र से मारे जारहे हँ ॥ ४६॥ जो 
परोपतापका ये उ ये चाहादनिषेधकाः लेग दृखरे को कोधित करते है, मस्ता का 
1 तालन्तानिलस्यान-चन्दसोशीरहारिणः | निपेष करते ह, ताङ्‌ के पसे, चन्दन शरीर सकी 


1 ४ चोरी करते ह ॥ ४७1 तथा जो साघु मदात्मा 
। प्राणान्तिकं ददुस्तपमदुष्टानाश्च येऽधमाः ! को खन्ताप देते दह चे पापी इस ग्म वालु मे पड़े 
करम्भवालुकासंस्यास्त इमे पापभाशिनः ॥४८॥ हप द 1४४ जो त्लेय किखी ॐ यँ दसरे नि 


(शक्त श्रान्तु योऽ्यस्य नरोऽनरेन निमन्वितः। । मन्नितं मनुष्य की जमद शराद अथवा वसी देव 


त 11 


प्र० १४ € ` भाक॑णेयपराणः ९१ 


~~~ - ~~ --~---~ 
देष षेप्यथवां फिये.स द्विधा कृष्यते सगः ॥४६।| कायं इत्यादि मेँ भोजन करतः उनको पदी दुक 
मम्मांणि यमस्तु साधूनामसद्राभूरिकरन्तति । ` | इकडे कर 1 जे ५ सत्‌ वात ध 
। गास्वषन्त्वारिता र , कर साधु. लोगों के मम॑स्थान को श्राघात पर 
अ संगासिनयनारिवाः ॥५५०॥| है उनके व्तस्थल पर चढ़कर पक्षी उनका भासं 
ए; करत च पशन्यमन्यवागन्यथामतिः । . | ला रदे ह जिससे उनको घोर कष्ट होरदा हे ॥५०। 
पाठ्यतेदि द्विषा जिह तस्येत्थं निशित पुरः" ५१ व व मूटी चुगली ह है उनकी जीभ 
“ माता-पित्ोगरूणाश्च येऽहं चत्रुद्धताः। | वैज इतयं से काटी जाती दै ॥५१॥ जो लोग 
। म (त उद्धत दोकर माता, पिता श्रौर रुकी श्वक्षाकरते 
तड्मे 1 मच्जन्त्यधोधुखाः; ॥५२॥ ह वे नीचे सलि ह मलः सूज शीर पीव 
देवतातिथिभूः षु . भृत्ेष्भ्यागतेषु च । | गतं मे पडे हु दै ॥ २। जो लोग देवता, अतिधि,: 
अरक्तवत्सु येऽश्नन्ति तद्वत्‌ पित्रमिपक्षषु ॥५३ शरभ्यागत श्रौर उसी, प्रकार (द छलौर 
दृष्टास्ते पूयनिर्य्यास-धुजः सूचीुलास्व पे। ¦ पक्षियों को भूखा रखकर खयं खालते है ॥५२॥ उन 
जायन्त. गिरिवरः पश्यैते यादथा नराः ॥५४॥ < 1 
४ | सुख ख सा है जिससे वे पीव भक्षण करते, है ॥ 
एकपक्तथा तु ये. विममयपेतरवणेनम्‌ । | भीर जो लोग ब्राहमण तथा इतरवरौ ब्ति.को पक 
विषमं भोजयन्तीह विद्यनस्त ह्मे यथा ॥५५॥॥ प॑क्तिमे विषम रूपसे भोजन कराते वे मल भोजने 


एकसाथमयातं ये निःस्मर्याथिनं भरम्‌। | 1 6 


भासय सवानमश्नन्ति त इमे शेपमभोनिनः॥५६॥ चे ही लोग सपार श्नौर थू का भोजन करते द ॥ 
गो्राह्मणाप्नयः रपट येरुच्वष्टेनरेश्र । पजन गो, बराह्मण शीर गनि -को -जो. सोग 
तेषागेतेऽभिङ्कम्मेष लेलिन्त्याहिताः करा (॥५७॥ मढ दाथ से चते हं उनके ध गिम भं . ` 
धैनदुवारका ॥ वैरच्छिष्ैतु कामदः । ` | रे ॥ ५७॥ जो सोग मठे संह से सयं, 
ता । यास्यै | ८ चन्द्रमा व तारागणं को देखते द उन्दी 'लेोगों की 
या रनर न्यस्तो षिः समेष्यते ॥५८॥ श्लो मे यमवूत अग्नि मोकते है ॥५८॥ जो लोग 
गावोऽश्निनननी विभो शयेषठभराता पिता खसा । | गाय, चदनि, माता, श्व ष्ठ भार, ध वदिन 
यामयो शुरो शद्धा ै समास्तु पदा भिः ।॥५६॥ शर.भ्रथवा बनो को पचसे स्पशो करते ६।५९॥ 
बद्धाडधयस्ते भ नगरीमितः | | लोग ज्ञ अभ्निसे तस ह लेक जली 
< ५ न वंधे इ दै, वे लोग अङ्गारो के देर के मध्य मं 
शर्गाराशिमध्यस्थास्तिष्न्त्यानालुदादिनः ।६०॥ ठे इ द तथा उनकी जिं जल र्डी ह ॥ ६०॥ । 
पायसं कृशरं छागो देवान्नानि च यानि वै! | जिन लोगों ने दृध, खिचड़ी, छाग ब देवान्न फो ` 


यैर विना संस्कार कयि दी लाया दै उन (५ 
वा 8 1 ता श्रं ॥६१॥ उनको पृथ्वीपर गिरा-गिया कर दक्षिण 


। निपातिता शष्ट | शः दिशा मै कार कर यमदूत दाया उनके भस्तको से 
सन्दशेः पश्य कृष्यन्ते | तत्‌, ॥६२॥| निकाली जादी है ॥६२ ॥ गुरु, देवता, दिजातियोँ 
गुरु-देष-हविजातीनां वेदानाश्च नराधमेः। | की ह ५० क उसं १ 

का जो पापी श्रभिनन्दन ॥ ६३ ॥ उनलोगों `, 

५ 4 ॥ ॥ के कान मे अश्न से तपाई हई लोदे की कील को 

क नितप्‌ पन" मः ' यमदूत लोग धुमाते दँ जिससे. वे पापी विज्ञाप, ' 
करेषु भन्ते याम्या विलपतामपि ॥९४॥| करते द ॥ च ॥ जो लोग कोथ शरीर लोतो वशी. 
यैः पादेवव्भोको-देवालय-समाः शमाः । , | भूत होकर देवः रामो क स्थान बु सत्समागमः 
श्वत विध्वंसमानीताः क्रोधलोभालुयिमि६५॥| उपद्रव करते ह ॥६५॥ उन लोगोकि शरीरो से यमः. 
तेषामतः शितैः, शतै्हर्विलंपता लनः । ;.| इत मालो शौर असं दास चको भरल फते 


६६ न भाकेरशेयपुराण : श्र १४ 


[थक्‌ र्वन्ति वै याम्याः शरीरादतिदाख्णः॥६६॥ दै जिससे ते धोर विललाप करते द ॥ ६६॥ जो सो. 


५ गो, बाह्मण के मार्गं मे थवा सर्वं की. शरोर मुह 
त्राह्णाकंमागे सतु येऽ्वमेहम्ति मानवा करे मलमूत्र त्याग करते है उन लोगो की श्रातो 
पेषामेतानि इष्यन्ते गुदेनान्त्राणि बायसंः ॥६७॥॥ को-कीय गुदा मार्थं से वीचते है ॥६७॥ जो. मचुष्य 


इत्वा कन्यां यत्र कस्मै द्वितीयाय प्रयच्छति । पक कमे कन्या ० उसे व सर व साथ 
्षारनदयां प्रवाहये ] | विवाहित करताहै उसके नेक कड करके क्षार. 

स सवं नकथा च्छः षा नदी मे वहा दिये जाते हैँ ॥ ६८ ॥ श्रपने पोपण॒ के \ 
` | लिये लिये ज व्यक्ति पुनःसेवक, छी, तथा वन्धुजगं को ., 
पुत्र-भृत्य-कलव्रादि-बन्धुवगमकिञ्चनम्‌ ` ॥६६॥| त्यागं देता हे ॥ ६६ ॥ श्रथवा दुभित्त के उरते पेल 


स्रपोषणपरो यस्तु परित्यजति मानवः 


दुर्भ सम्भ्रमे वापि सोऽप्येवं यमिङ्करे; । | करता है उसके सुख मे यमदूत लोग.उसीका मांस 
उत्छृत्य दत्तानि खे स्रमांसान्यश्ते रुधा ॥७०॥|-काट कर डालते हैँ रौर उसकी चधा शांति करते 
शरणागतान्‌ य्त्यनति लोमादुपजीषिनः । | को त्यागं देता छै बह भी यमदूतौ. रा शी 
सोऽ्ष्येवं यन्प्रपीडाभिः पीड्यते यमकिङ्रेः ॥७१॥| प्रकार की यन््रणाश्ं सै पीडिते किया जाता है ॥ 


जो मधुष्य श्रपने जन्म का संचित सुत वेच ` देते 
तं य भयच्छन्ि यक्ननप छतं नराः 1 | हक उसी भकार पतय मै-पीसा दादि जि 


है उनको । 
ते पिष्यन्ते शिलापेपे्येते पापकभ्मिणः ` ॥७२॥ प्रकार ये पापी पीसे जारे है ॥ ७॥ जो किखीके 


सङ्कल्प के वाधक दोते है उनके सम्प अङ 

जते ह ्रौरः वे मद्य कीडो, विच्छ, कौश्रो श्रौरं 
उल्ल द्वीराः दिनःयात खयि जाते हे ॥२॥ दिनम 
मेथुन करने बाज्ते तथा परस्री गमन. करने बलि 


न्यास्ापहारिणो बद्धाः सव्वंगोत्रेषु बन्धने; 
कृमि इधिक-काकोलेमृज्यन्तेऽर्मिशं नराः ॥७३॥ 
्षतक्षामास्वटपतण्िह्वा-तालवो वेदनातुराः 

दिवामेुनिनः पाणः परदारमुनश्च ये. ॥७४॥ 


तथैव कण्टकेदर्धैरायसेः पश्य शाठमलिम्‌ । |-जिसमे लोर फे बड़े-बड़े, कोटे लगे है इ शरीर 
प्ररोपिता षिभिच्नाज्गाः पभूताखकसरवाविल्लाः॥७४ | के अङ्ग सरकरः भित्र भिघ्न.टोजातेदे जिससे रुधिर 

+, “| चता हे ॥७५॥ हे पुरुपसिह ! देखिये, किख तरह 
सूषायामपि पश्यान्‌ नाश्यमानान्‌ यभाजुगेः । `| परह खो चने बलि. यमदता न 
पुरुषैः पुरुषव्याघ्र परदारावमर्षिणः | व ४ प 


५ ॥ दो रहे दे ॥ ७६॥ उपाध्याथ को नीचे विटाकर. जो 
उपाध्यायमधः कला स्तब्धो योऽध्ययनं नर, } ` (भचुष्य ऊपर वैटकर श्रध्ययन करतारैउसके शिर 


ग्रहति शिपमथवा सोऽ्येवं शिरसा शिलाम्‌।॥७७)]| शिला रक्खी इड दे 1७७] चह यमके भागंमे पीडति 
विभ्रत्‌ डेशमवाप्नोति जनमार्गेऽतिपीडितः। ` होकर. घूमता दुरा क्तेशको पाकर स्षधा श्रौर . भिर 


पर शिला के भारसे पीडति दो रा दै ॥७८॥ जो 
तप्षामोऽहिशं भारषीडाव्ययितमस्तकः ॥७८।|| जोग जलम मूत्र, खंखार या विष्ठा त्याग करते हें 


व येरुत्छ्टानि वारिणि । | वेदी म ष्म श्रीर स ५५५ 
त इमे शछेष्मविरमूश्-दुगन्धं नरकं. गताः ॥|७६।।| नरक स पड इ द ॥७६॥ (जन 

परस्परन्च मांसानि, मक्षयन्ति क्षधान्विताः ! ` ५ र र ए 
 शुक्त' सात्तिथ्यपिधिना पूर्वैमेभिः परस्परम्‌ ।॥८०।। 

, अपविद्धास्त - येवेदा वहयशाहिताभनिभिः । - `` 
त इमे शेलगङग्रात्र पात्यन्तेऽधः पुनः पुनः॥८१॥ 
¦ युनभृपतयो जीण यावञ्जीवन्ति ये नरा; 
इमे ृमिखम।पनां भश्यन्तेऽर पिवीलिकैः ॥८२॥ 


यदं जीवित. रहतेहैःतवतक छृमि होकर मक्लियों 
को खे ईै। =८२॥ जो. लोगं पतिता दिया हु 


गि 
॥ 


॥ ७० ॥ जे व्यक्ति लोभसे शरणागतहुए भिक्ञेको - 


पापी भूख प्यास से जीम बाहर निक तलु की । 
वेदना से व्याङ्ल हो रे ह ॥७४॥ सेमलके वृ्तसे : 


मांस भक्षण कररदे ह ॥८०॥ जो लोग वेदकी विधि . 
कै प्रतिकूल श्रि मे श्राहुति देते दँ वे यद वारं २. 
पाड की चोटी -से नीचे गिरये जते हैँ ॥ ८१॥ 
फिर हे .राजन्‌ ¡ बे मनुष्य. जव . तक . जीरं होकर ` 


~~ 


पश्यतो भत्यवगंस्य मित्राणामतियेश्तथा । 


५ {अ०.१४ ` भादरडेयपुराण | „ ६७ 


पतितमतिग्रहादानाहुयननाननित्यसेवनात्‌ - .1. ; | दाने.लेते है तथा नित्य उसको सेवते ् पत्थर 


पापाणमध्यकीटतवं नरः सततमश्रुते ॥८३॥ के अन्दर कीड़ा वनकर रदते दै ॥ २॥ (ज लोग 
स र द्मतिधथिर्यो को 1 हष 

उनके सामने शकेल दीः मिटाईै' खतः है तरे हाँ 
एको मिष्टान्ुगूयडमतेन्यलदङ्गारसञ्चयम्‌ ॥८४॥, जलते हृष श्रज्ञारो को भक्तण करते है ॥५७॥ जिन 


, हकैमयङ्करेः, पृष्ठ ` ` नित्यमस्योपथज्यते। ` लोगों ने पूवं जन्म मे भां खाया है यहां उनकी 


पृष्ठमांसं घपेतेन- यतो लोकस्य भक्षितम्‌ ॥८१५॥ पीठ का मांस भयङ्कर भेदे नित्य खारहे ह ॥५५९॥ 


 अर््रोऽथ वधि मूको भरम्यतेऽवं षषातुरः ।  † जो दतच्न लोग उपकारी. लोगं के.भति अकतक्च 


हप है वे यदय अन्धे, वदिरे श्रौर गृगे होकर भूख 
अृतज्ञोऽधमः पुंसायुपकारेषु वत्तताम्‌ ॥८६॥ से व्याङुल इधर उधर धूम रदे दै ॥ ८६.॥ यदः 
श्यं कृतघ्नो मित्राणामपकारी सुदुम्मंतिः शुनमेटा, मित्रौ का बुरा करने बाला, - दुर्बुद्धि त्त- 


, तक््म्भे निपतति ततो यास्यति पेषणम्‌ ।*८७॥| कुम्भ भ डाला जाता है ॥ ८७ ॥ -इसपे वाद तप्त 
-करम्भवालुकां तस्मात्‌ ततो यन्तावपीडनम्‌ । ;, 


वाल भे, फिर यन्तं मे पेरा जाता है । तथा इसके 
शछ्मनन्तर श्रसिपन्र वन की पीड़ा प्राप्त करता इमा 
्रसिपत्रवनं तस्मात्‌ करपत्रेए पाटनम्‌ ॥८८।॥| करप द्वारा पीटा जाता. है ॥ ८८ ॥ कालसूत्र से 
कालसूत्रे तथा च्छेदमनेकाश्चैव यातनाः; । ` | भी नारकी काटे जाते दै । इसके, वाद्‌ यद्‌. कौनसे 
प्राप्य निष्कृतिमेतस्मान्न पेबि कथमेष्यति ॥८६॥|| कष्ट पवेगे १ ५ ८६॥(जो 
ब्राह्मण्‌ श्राद्ध कापर रते दं 

श्राद्धसङ्गतिनो विपा; सम्ुतत्य परस्परम्‌ । | तथा रादजीवी बिभो के साथ ही रहते द उनके 
दृष्टा हि निःखतं फेनं सर्वा्धभ्यः पिवन्ति बै ॥६०॥ अङ्गो म इट सपा का बिष डाला जाता दै ॥ ९०॥ 
जो सोना चुराता है, ब्राह्मण को मारता है, शव 

एुवणंस्तेयी पिपरघः रापी गुरुतल्पगः पीता है, अथवा शुरू की खी क 
के सव लोग ऊपर च र 

अथथोट्भ्न्य दीम देहमानाः समन्ततः ॥६१॥ पती श्राग मे भोके जते हं ॥ ६१ ॥ ये लोग 
तिष्ठन्स्यग्दसहस्राणि सवहूनि ततः पुन, पकं हज्ञार बषं तक नरक मं रह कर फिर भानव 
9 ॥ शरीर मे श्राते है सीर कुष, जय आदि रोर्गा“से 
जायन्ते मानवाः दष्ट्षयरोगादिचिहिताः ॥६२॥ पीडित होते ३ ॥ ६२॥ हे राजन्‌ ? मेर कर: य 
एताः. पुनश्च नरकं पुनलाताश्च तादशम्‌ । 4 त शाट ह श्नौर ह क । 
प्रकारः , 
व्याधिमूृच्छन्ति कसपान्तपरिमाणं नराधिप । ६२५ तक ६ इ य ख ॥ ६३ ॥ गौ कोः भारवे । 


गोघ्नो न्यूनतरं याति नरफेऽथ ग्रिजन्मनि । जाले तथा भ्रनेकों अन्य पापी भी सव मिर्वय दी 


तथोपपातकानाञ्च सर्व्देपामिति निश्चयः ॥६४॥ नरक को जाते दं ॥ ९४ ॥ फिर नरक से च्युत होने 
फ वाद जिस-जिस योनि मे पापी लोग ` अपने 


| 1 यानि विहितपातकेः पापं कमं के ्रचुखार्जातटह उसका चरणन करता 
. श्रयन्ति योनिनातानि तन्मे निगदतः शृणु । ६५ ह, आप निय ॥ ६५॥ | 


इति श्रीमाक॑रुडेयधुराण. मे पिताुत्र सम्बाद के अन्तग॑त यमर्किकर संवाद्‌ नाम , = | 
नौदहवाँ श्रष्याय सम, । , -;: | | 
~ ष्यक ~; ; - 


५६ 


॥ ६८ “` माकंरडेयपुराण । :.*अ०-१५ । | 
पवां अध्याय | 


पतितात्‌ भति्याथं खरयोनिं वनेदिद्रनः । जो विथ पतित से दान जेता है चं गदे की 
| योनि मे जाता दै तथा पातकी का यक करानेवाला' 
भरकात्‌ पतितस्तु कृमिः पतितयानकः ॥ १॥| नरक से चुखने ॐ वाद र काजन्म ०५ ॥ 

। $ जो बाह्मण उपाध्याय का निरादर करता टै वहम 
उपाध्यायन्यलीकत्तु कला श्वा भवति विनः | क्ता वनता है तथा जो को मनसे श्रथवा वासी । 
तज्जायां मनसा वाञ्छन्‌ तदुद्रन्यश्ाप्यसशयम्‌ ॥२॥ म खी श्रौर धन.की र करता दै | 

र जनतः प्ोधाप्यदमानकः र पिता का अपमान करता दै बद गदे का 
गभो -नायते जन्तुः पित्रोधाप्यवमानकः ब. थ्य पाता है तथा जो भलुं मतता पिमो ए 
भातापितरावाक्रश्य शारिका सभ्पनायते । ३ ।| देता है वह मैना.का जनप धारण करता दै ॥२॥ 

व ब ` कोर भाद की खी काश्रपमान करता. है वद 
श्रातुष्पल्यवमन्ता च केपातत्वं भप ह होता है 1 उसी को पीड परुचाता 
तामेव पीडयित्वा तु छच्छपत्वं पपद्यते ॥ ४॥| दै बह कच्छप होता दै ॥७॥ जो ली श्क्ञान के 

९ व निषेवते | `` |-श्रपने पति को डुःख देती है श्रौर उसको श्रपना 
भतं पिण्डमुपाचन्‌ यस्तदिष्टं॑न निषेव क 
४ जायते वानरौ शृत ।। ५ ॥|| इ नही मानती नह ख्य पाकर वानर दोजाती दे 
सोऽपि मोहसमापमो जायते १ त | ॥५॥ जो मदुष्य सङ्कल्प करने मे वाधक होता है 
न्यासापहतां नरकाषि्क्तो जायते छमिः। | वद नरक भोगने फे वाद कीड़ा वनतां है तथा जो 
असूयक नरकान्ुक्तो भवति राक्षसः ॥ ६ ॥| निन्द दता दै बह नरक पर न के बादर 


ध की योनि मेँ जाता है ॥ ६॥ चिश्वास्धाती भदुष्य 
बिश्वासहन्ता च नरो भीनयोनौ प्रजायते । मचल की योनि मे जाताहै शौर जो'मलम्य धान्य, 


धान्ययवास्तिलानसांपानतत्थानसपांणान्‌ ७।॥॥| जौ, तिल, उ, र्थी, सरसो, चना ॥७॥ श्रीर 
कलायान्‌ कलमान्‌ धुद्गान गोधूमानतसीस्तथा । | कला, कलाबिन्द्‌, मूग, ण्ह, लसी श्रथवा श्रन्य 
शस्यान्यानि षा हृत्वा मोहाल्नन्तुरवेतनः । ८ ॥ न्ना को अक्ञानयुक्त होकर चुराता है ॥ ८.॥ बह , 


| । नेबले का सा श्रौर चृ के शरीरके समान होजाता 
सञ्ञायते महावक्त्रो मूषिको बमुसन्निभः। है । तथा जो परली ममन करतां है ` बह भयानक 


परदाराभिमषात्त टको घोरोऽभिनायते ॥ & ॥ मेदा दोता है ॥ ६॥ तथा इसके आद कृत्ता, 
श्वा शृगालो वको शधो व्याद्ः कङ्कस्तथा क्रमात्‌ । | सियार, वणल, गिद्ध रौर कौपं की योनि मेँ कम 
रातय दुनवद्ध्यो धर्थयति पात्‌] | से जाला द। ज मरं व की ४ से 
ुोषिलत्यमाप्नोति ॐ ४ मैथुन करता है बह नरक याद्‌ कोयल , 
४ घ चापि नरकाच्चयुतः। १०॥| वनता दै ॥ १०॥ जे पापी श्रपने मित्र, र श्रथ . 
सचिरमाय्यो गुरोभाय्यां रानमास्याज पापृ्त्‌ | | राजा की खी से मोरा करता है बह कामयुक्त पापी 
मधयित्वा कामात्मा शृकरो जायते नरः ॥११॥| खजर की योनि भे जाता द ॥ ११॥ यक्ष दान 


न-विवाहानीं भषेत्‌ मिः विनाहं आदि मे विघ्न डालने बाला कीड़ा होजावा ; 
यजञदान-विवाहातं विघ्कतां भवेत्‌ मिः । | ह तथा कन्था का व 


पुनदाता च कन्याया; . कृभिरेबोपनायते ॥१२।दोता है ॥ १२॥ जो मद्य : देवता, पितसें श्रौर 
.देवता-पिद-विपाणामदच्चा. योऽन्नमशूुते । | बाह्मण को दिये विना खयं र्न साता बद नरक 

भुक्तो नरकात्‌ सोऽति वायसः सम्भनायते ॥१३॥ भोगने के बाद कौश्मा बनतो है ॥ १६॥ जो कोर 

वयष्ं पिठृसमं वापि -आातरं योऽ्वमन्य॑ते 1 ` ५ भाकाजो पिता स समान दे अनादर करता 

नरकात्‌ सोऽपि विभ्रष्ट क्रौञ्चयोनौ भनायते।।१४।| है नो वी से ४ । 
`श्रभ ब्राह्मणीं गत्वा इृभियोनो भणायते । | इमि योनि मे जाता है । तथा उससे सन्तति वेदा 


[अरर १५ . -माफएडेयपुराण ५.६६ 


-तस्यामपत्यघुत्पा्य काष्ठान्तः कीटको भवेत्‌ ॥१४।॥ करने पर तो काट.के अन्दर का कीड़ा होता है॥ 
; भको मदगुश्ए्डालघ ्रनायते। व त २ शीर च५.: 
श्रङतज्लो (4 पुंसां $ मनुष्य अमरतज्ञ ९. -. 
ष । सा विषक्तो नरकान्नरः ॥१६॥ है नरक भोगने के चाद ॥ १६॥ वद गने, % ~ 
तपनः छमिकः कीटः, पत्ञो दथिकस्तथा । | पतङ्ग विच्‌, मडली, कौमा, कलु श्र <` 
मत्सयस्तु षायसः कूम्मः पुक्षसो जायते तत॥१७।| वनता हे ॥ १७॥ शद्ञविहीन पुरुष को . - 
वां पः ला अर साये करो | | मत जाता दि तथा खी शरोर 
किः लीवधकत च बालहन्ता च नायते ॥१८' | भारो चर स शा 0 शा 0 
भोजनं चोरयित्वा त॒ मक्षिका जायते नरः । 
तत्राप्यस्ति विरोषो बै भोजनस्य शृरुष्व तत्‌ ॥१६। 


मोजन को चुराने वाला मक्ली बनता है. _: 
इसके श्रतिरिक्त ओजन चुरानेबालि की गति .~{ `. 
6 शन्न (१ चुराने श नरक २ ५.4 
् ( की योनि मे जाता है तथा तिलं श्च । 
जायत नरकच््च्युत्‌ 1 (^ ‡ 
त हत्वा ठु -५ ध्री को चुराने वाला नेवला तथा चकरे का 1 
; धतं हृत्वा च नकलः काको मद्शुरजामिषम्‌। चुराने बाला कौञ्मा वनता है । मखली का ` 
मल्स्वमासाह्‌ काकः श्येनो मर्गामिषापह्‌।२१।| उने बाला कौञ्ा तथा मांस को मागमे ही ८ 
कर लेनेवाला बाज्ञ पक्ती होता है ॥२६॥ ददी ~ 
बरीचीकाकस्ल्पटते लवणे दधनि क्रिमिः । | नमक रने वाले क्रमः की र विच्छ 
चोरयिला पथापि बलाका सम्भनायते ॥२२॥ योन म जते दै र द१ को जरान बा 3. 
यस चोरयते लं हैलपायी स नायते वनते द ॥ २२॥ ओ दर्प तेल चुराता है बह ०. 
, यस्तु चोरयते तलं तेलपायी स जाय | होता है । मधु के चुराने बाला मनुष्य भक्ली `: - 
` “मधु हृता नरो दंशः परं हत्वा पिपीलिकः ॥२२॥ पु को छाने बाला पिपीलिका की योनि मे ~ 
चोरयिता त॒ निष्पावा जायते गोलकः । हे ॥२३1 सुने इष न्न को चुराने बाला गोलक 
रथित्वा तु निष्पावान्‌ जायते गाल" चरम जन्म जेता तशा यज्ञाननका चोर तीतर " . 
श्रावं चोरयित्वा तु तित्तिरित्वमवाप्ठुयात्‌ ॥२४ हे ॥२७॥ जो पापी लोहा चरातादै तेद्‌ कौशा ट. 
` श्रयो हला. पापातमा वायसः सम्यनायते। | £ सि का शा 1 
ते कस्ये च हारीतः कपोतो रप्यभाजने ॥२५॥ के वतंन चुराने वाला कवृतर की योनि मे जाता ६ 
हतै कास्य च हरतिः क सोने के वर्तन को शुराकर मनुष्य छृमि योनि ‡ 
हृत्वा तु काञ्चनं भारं कृमियोनौ भ्रनायते । | जाता है तथा पत वख का रण करने वाला कर 
पत्रोणं चारयित्वा तु क्रकरत्ञ्च गच्छति ॥२६॥| कय का शरीर धारण करता है ॥२९६॥ कौपेय - 
कापास कौपेये ` हत बसेऽभिनायते । का चोर जुलाहा द्रोता है तथा १ 
&। दु जाय बाला जहाँ कत न हों पेते बन मतोतेका `^ 
कूले शा्विके पापो हते चेवाशके शकः ॥२७।॥| धारय॒ करता ॥ २७ ॥ इसी प्रकार वकरी _ ` 
 तमैवानायिकं १.4 सेड्‌ के रोम का वख उरे वाला.वालबर -के 
तु हूत्वा वं क्षौम॑ंच जायते । | जन्म रेत तथा कपास स जायि ५ 
 कार्यासिके हते करौन्यो { बकस्तथा हरण करनेवाला क्च अर वल्कल वसखको <. - 
दहत ञ्चो वासके हत्‌! ॥२८॥ वाला ग्गुला होता & ॥२८ ॥ भोर पंख चुरान च.. 
मयुर वणंकान्‌ हत्वा शाकपत्रच जायते । | शाकपत्र दोता द श्रौर लाल बखर का '८- - 
जीयज्जीवकतां याति र्तवलखाप्नरः । २६॥| चकवा चकै का शरीर 1 है ॥ २६॥ शम गन् 
ुचछन्दरिः शान्‌ गन्धान वासो हृता शो भवेत्‌ । | से वासा हा कपड़ा चुरान वाला छचृदर च 
रि ध , # ४ त ५ खरगेश होता है तथा शपफ़ताल्‌ का फल -~ 
षणटः फलापहर्णत्‌ कष्टस्य धूणकीटक; । ९०, | बाला काट का.कीड़ा श्नौर घुन.दोता दे ॥३०॥ <; 
पुष्पपह्बरिद्रश्व , पदु्यानापहुन्‌ः चरते वाला वरि शौर बान ताने वाला , 


(3६ माकर्डेयपुराण । ० १४ 

\ ~~ -- - - -------------- 6 ----------------------------------------------------~ 

होता है । शाक चराने बाले को टारेल पकी श्रौर 

हारीतस्तोयहस्तां $ 

शाकहत्त च ह च चातकः ॥२१। जल चुराने यले को पीदा ५ योनि मिलती है ॥ 

. गलरा सैरादीन सुदारुणान्‌। | जमीन का दरण करनेवाला रोरवादि दाख्ण नरकों 

हतौ नरकान गला तै द । मे जाकर ए, गुटम,लता, वल्लि, त्वकषसरार श्रादि 

तृश-युरम-लता-वहि-तकूसारतरुतां कमात्‌ । | छच-शरीरों मे करम से जाता टै तथा इसके वादं 

कै तवः द्ध सद्धं या खोटे शरीर बाला दोकर. वह. ममुष्य 

माप्य क्षीणासपपापसतु नरो भवति यै तः ॥२२ | यनि पर आ 4 दै ॥ इ२॥ कमि, कीट, पतङ्ग व ¦ 
; पतङ्गोऽथ पक्षी तोयचरो मृगः इसके चाद पत्ती, जलचर, ग शाय की यानि 

हृषिः कीटः पतङगोऽ पष | पटुःचकर फिर चाण्डाल श्रौर डोम श्रादिकी निदित 

गोत्वं प्राप्य च चर्डल-पुकसादि शुगु्सितम्‌॥२३।॥ येनिथों मे. चता दै ॥ २३ ॥` बद लला, श्रन्धा, 


विरा, की रौर त्य येग से पीडित देता दै । 
गन्धो विरः यक्ष्मणा च मधीद्तः । दथा मुद, श्रं श्रौर गुदा श्रादि.के रोगोंसे दुली 


एखरोगा्षिरोगेश्च शुदरोभेश्च वाध्यते ॥३४।| रहता दै ॥३४॥ तथा चद श्र कर धातु्तय ॐ 
अपस्मारी च भवति शूद्रतवंच स॒ गच्छति ॥३५॥ रोग से पीड़ित श्ता दै ॥ ३५॥ गाय श्रौर सेशं 


चुराने वालो की दशा फा क्रम भी इसी भकार है 
एष एव कमो च्छो गोवणांपहारिणाम्‌ । विदा के हरण करने व्राज्े तथा श्रदृङ्कार बश शुर 


विद्यापहारिणएश्चोग्रा निष्करयम्रंशिना गुरोः ॥३६।॥ का श्रपमान करने बाले ॥ ३६॥ तथा जो पुरूय 
जायामन्यस्य पुरुष; पारक्यां प्रतिपादयन्‌ । अपनी खी की तरह परकीया को रखता रै वद 


चरक मे यातनाश्रं का खटकर परता फे प्रप्त 
पराप्नोति षणढतां मृढो यातनाभ्यः परिच्युतः ॥२७। हता हे।२७॥ जे मनुष्य श्रि सै विना समिधा क 
यः करोति नरो हैममसमिद्धं विभावसो । | हवन करता है वह रजी से दुभ्ती । 
\ \ सं्रनायते|३८]॥॥ रदता हे तथा उसके भन्दाच्चि जाती रे ॥ ३८ ॥ 
शो + | | दृखरे की निन्दा, गुनमेयापन, दुतरेके चिद्धान्वेपण 
-: । करना, निष्टुरता, निदंयता, दसरे की छी का सेवन 
ेषयुययुः निष एत्वन्च परदारोपसेवनम्‌ ॥३६॥| ॥२६॥ दृसरं का स्वत्व दरस, अशद्धता, देवता 
प्ररस्वहरणाशतेचं देवतानान्व इत्सना। | ऊी निन्दा, कीर्तिं शून्यता, मनुष्यों को ठगना, तथा 
निकृत्या वंचनं णां काषरयंच तृणां वधः ॥४०।॥| भनुप्य घरात ॥४०॥ तथा जे निषिद्ध कार्य है उनमें 


खल रहलाः.इन ल्ल्णासें शक्त जां भनप्य द 
यानिच मरतिषिदानि तलिच सन्ता । उका नरक सखे आया दुखा समना चाहिये ।२॥. 


उपलक्ष्याणि जानीयान्ुक्तानां नरकादनु ॥४१॥| जो सव जी पर दथा चनौर परलाक ॐ लिये 
वा मूर संवादः परलोकपतिक्रिया | क जीवों के हित के निमित्त सत्य 
त्यं मवहितायोिदभामाण्यद् कटने ताले हं शरोर वेद का पमाण' दिखाने बालत है 
सतय त ॥४२॥| [४ जे युरुढेवता, क्षियो रौर सिद्धौवः पूजनं 
गरु-देध्पि-सिदर्षिपूजनं साधुसङ्गमः । | रःते है तथा स्ाधुओं की सङ्गति क्रते है.जौर , 
समि । जो अच्छे कमं का प्रभ्यास, शरीर बुद्धजना से , 

सतज्रियाभ्यसनं ति इये परितः ॥४३॥| वती करने बालि है तथा परिडतं है ॥ ४३॥ अथवा | 


अन्यानि चैव सद्ध्पै-क्रियामतानि यानि च | | अन्य सत्य घम की नियाच्रों मे -तत्पर है, पेसे - 


लच्त्णा- से युक्त पुरयात्मा लोगो को खगंच्युत' 
प्गच्युतानां लिङ्गानि पुरुषाणामुपापिनाम्‌ ॥४४॥ समभना. चाहिये ॥५४॥ हे राजन्‌ ¡ भने. आपको 
एतदुटेशतो राजन्‌ भवतः कथितं मया ! ` 


श्रपने कमे का फल भोगनेवाले पापियोँ श्र पुरय 
ृष्ठकम्मेफलमोक्तुणां पुण्यानां पापिनां तथा ॥४५।॥| बानो का चृत्तान्त वणंन किया ॥ ४५॥ श्पंने बह ` 


पुदे्न्यत्र -गच्ामो इटं सव्वं  तयाधरुना 1 ` । सव यदय पर - चरितं होते देखा, मव श्रिये ` 


श्र° ११ - माकंरटेयपुराण ७१ 


लया चो हि, नरकस्तदेहन्यत्न गेमयताम्‌.॥४६॥ 
' पुत्र उवाच. ` ` `: 
ततस्तमग्रतः कृत्वा स `राजा गन्तुयु्यतः 
ततश्च . सर्वरुतकरष्ट यातनास्थायिभिने मि 
भसादः हरु भूषेति तिष्ट॒॒तोवन्ुहू तकम्‌ । 
त्वदद्वसङ्गी पयनो मनो हादयते हिनः ॥४८॥ 
परितापश्च ग्रेभ्यः पीदावाधाश्च कृत्स्नशः 
श्रपहन्तिं नरघ्याघ्र दयां इर महीयते ॥४६॥ 


एतच्छत्वा पचर्तेपां तं याम्यपुस्षं गरष 
पप्रच्छ कथमेतेषामाहादो मयिं तिष्ठति ॥५०॥ 


श्मन्यत्रं चलं । प्रापने नरक देख लिया, श्व 
दृसरी जगह चलिये ॥०६॥ ` । 
पुत्र (सुमति) ने क्य-- , ,. 

हे पिता | जव राजा विपश्चिति यमदूत को 
श्रागे कर्के चक्ते तव नरक की घोर यातनाश्रों म. 
पड़ हण लोगों ने उनसे फा ॥ ४७॥ हे यजन्‌ ! 
छपा करः पक घड़ी ्ौर खद्रिथे । श्रापके शरीरसे 
लगकर पवन.जो हमारे पास श्राती है उखसे दभः 
क्ये श्राह्वाद द्योता हे ॥ ४८॥ हमारे शङ्खौ को जो 
ताप, पीडा च्रौर बाधा होती दै उसको . यद हवा 
समूल न्ट करती हे । रतः हे नर व्याघ्र | हेम परः 
छपा कीजिये ॥ ४६॥ राजा ने उन नारकियोका यद 
वचन सुनकर उस यमदूत से पृ्ा कि मेरे घ्टरने 
से दन त्नोगों फो पसन्रता क्यो दोती टै ॥ ५०॥ 
म॑ने कौनसा पेसा महान्‌ पुरय कम किया है किं 


रि मया क्त्‌ पुण्यं मर्यंसोके महत्‌ कृतम्‌ ।. | जिससे इन लोगो को शख प्रकारं श्रानन्द्-बपां हये ` 
प्राहाददायिनी दृष्टि्यैनेयं तदुदीरय ॥५१॥॥रदी है, सु्से ठम कटो ॥ ५१॥ 
यमपुरप उवाच ` | यमपुरुप बोला- 


हे राजन्‌ | तुमने पिते, देवतान, तिथियों 
शौर छभ्यागतों को पदटिले भोजन कराकर श्रव 
शि ्रन्न से पने शरीरः को पाला है तथा दसी 
प्रकार ्रापका चित्त श्भ्यागत कीं सेवा मे संलग्न 
रहा है ॥५२॥ इसी से श्रापके शरीर के संसर्गं से 
, वागु सुखदायिनी दोग दै श्रौर इन पापियों को 
दस समय कोई यातना चदं मालुम होरदी है॥५२॥ 
श्रापने जो अश्वमेध श्रादि श्रनेक यक्त विधिवत्‌ 

श्यलिये श्रापके दशन से यमदूतौ के न्व 

शाल, ्रच्ि श्रौर कौर ॥५४॥ जो पीड़ा श्रौर छेदन 
छ्यादि महान्‌ दुवो के दैत है, टे राजन्‌ | वै ्रापके 
तेज से हत दहौकर कोमलताको प्राप्त दोहे है।५५॥ 
राजा वोला-- 

मेरे मत से खरग श्रथवा ब्रह्मलोक मे वह सुख 
नहीं दै जो दुःखित जीवो की रक्षा करने मे है॥ 
यदि इनके समीप मेर रटनेसे इनको यातनायं नदीं 
खताती हतो मै यदा दी चल ष्टोकर नके 
कल्याण फे लिये स्थिर रहेगा ॥ ५७.॥ 
यमदूत वोला-- 


पिव्रदेवातिथिपरैन्य-शिष्टेनान्नेन ते - तदु 


पुष्टिमभ्यागता यस्मात्‌ तदरतंच मनो यतः ॥५२॥ 
ततस्तदवात्रसंसमौ प्रषनो हाददायकः। 
पापकर््मङृतो राजम्‌ यातना न भवाधते ॥५२॥ 
श्रश्वमेधादयो यज्गास्तवयेष्टा ` विधिवटुयतः 
ततस्तवहरानाहयाम्या यन्त्रशख्राभ्निवायसा; ॥५४॥ 
पीदन-च्छेद्‌-दाहादि-महाटुःखस्य तवः 


मृदुत्वमागता राजन्‌ तेनसापहतास्तव ॥५५॥ 
रजोवाच 


न स्वग ब्रह्मलोके घा ते सुखं पराप्यते नरः 
यदा्चजन्तुनिरव्वाण-दनोत्थमिति मे मतिः ॥५६॥ 
यदि मत्सन्निायेतान्‌ यातना न भरवाधते । 
ततो भद्रुखा्राहं स्थास्ये स्थाणुरिवाचलः ॥५७॥ 


त पते संचित किये हण पुरथों 
एटि रानन्‌ मगच्छामे। निनपुण्यसमन्जितान्‌। |, त 1 
शडक् न पापकम्मणाम्‌||५८।| यातना भोयने दोमिये 1४॥ 


रजा बोल्ला- 
हे यमदूत ! जवं तक ये लोग दुःखी रगे तव 
त्ते नी जाणा मेरे सान्निष्यसे इन नारः 


तस्मान तावहुयास्यामि यावदेते सुदुःखिताः । 
 मरपमिवानात्‌ सुखिने। मधन्ति नरकौकसः ॥५६॥ 


७२ माकररेयपुराण श्० १५ 


1 ासवाययवयायानररिकवहदयायादयक्याध्यतयछडयका 


जीयनं प क्रियो को सुख मिलताहै।\५६॥ उस मसु्यके जीवन 
धिक्‌ तस्य जीवनं पुंसः शरणा्थिनमातुरम्‌ । | को धिलार ह जो शरणाय शातं मडुष्य की रक्षा - 


सात्तसनुगृष्ठाति र वैरिपक्षमपि |, 
साससनगृष्ठाति पे धरषम्‌ ।}६०]॥| नदीं करता है  निश्वय दी र्यागत वैरी की भी 

9 < र्ता करनी उचित है ॥ ६० ॥ इस लोक मे श्रथवा 
यन्न-दान-तपांसीह परत्र च न भूतये । परलोक मे यक्ष, दान, तप शादि का इतना पुय 


९ नहीं होता जितना कि श्रातं मयुप्य के परित्राण में 
भवन्ति तस्य यस्यात्त-परित्राणे न मानसम्‌ । होता है ॥ ६१ ॥ जिख भवुप्य का ` हदय चालक, 


नरस्य यस्य कठिनं सना बलातुरादिषु } | दुःखीजनो तथा दद्धं के प्रति कोर है उसको मै 
दद्धेषु च स तं मन्ये सान्‌षं राक्षसो हि सः ।॥६२॥ महप्य नदीं मानता, बद तो वस्तुतः रात्तसदै॥६२। 


एतेषां सम्रिकर्ात्‌ तु यचभिपरितापनम्‌ । | इन लो ॐ पास रने से जो शभनजन्य सन्ताप 


व ५ है बह तथा नरक की दुगैन्धि शरोर अन्य नारकीय 
न्धजं वापि दुःखं नरक्सम्भवम्‌ ॥६२॥ दुः ॥६ चथा, प्यास शरादि डम्व जो मूं को 


ुलिपासामवं दुःखं यच्च मूष्छीपदं सहत्‌ ! ¦ देने बाले है इन दुख से इन लोगो की र्ता करने 
एतेषां ्राणएदानन्तु मन्ये स्वग॑सुखात्‌ प्रम्‌ ॥६४।॥ को मे ख्गीय ख से अधिक समता हं ॥ ६४॥ 
मेरे द्वारा जो ये दुःखी लोग उख पतिहै तो मेने 


भ्रापसयन्स्या्ता यदि सुखं बहवो दुःखिते सयि। ¦ ज्या दुख गही पाया १ अतः तै यही ष्टगा हुम 
किसु पा सया नस्याद्‌ तस्माद्‌ तं वरन माचिरम्‌ ९१ शीघ्र जाको 1 ९५॥ 
यमपुरुप उवाच यमपुरूष वोला-- 

एष धम्मे शक्र त्वां नेतुं सपागतौ । ;. श्रापको तेने के लिये धमे रौर इन्र आरदे हं 
हे रजन्‌ ! श्रापका कर्तव्य यहो से चलने का है 

अवश्यमस्पद्वन्तव्यं तस्मात्‌ पार्थिव गम्यताम्‌॥।६६।॥ श्रतः श्राप श्रव चत्त ॥ चद ॥ 

धस्य उवाचं ¦ धमराज चोल 
नयामि तवामहं खगं त्वया सम्यगुपासितः उमे मेरौ अच्छी भक्ञर उपासना की दै श्रत 


तुमको सम॑ मे जे जाऊंगा । श्स चिमानपर चद्‌ 
विमातमेतदारुद्य भा पिल्लम्बस्वं गस्यताम्‌ | 1६७] कर श्राप शीध स्तं षो वचलिये ] ६७ ॥ 
राजोवाच राजा चोला-- 
नरके मानवा धम्प॑पीड्यन्ते सहस्रशः! : ` दे धमराज } नरक में पीडित हुय दज्ञारो लोग 
नि | इखित होकर सुभ से “धादिः जाहि" कहते हं 
जहति चातता; ्रन्दन्तिमासतो न जनाम्यहम्‌।६८। || रतः स न जाऊंगा ॥ ६८ ॥ 
इम्द्र उवाच दन्द बोलते 
: कस्मेणा नरकमािरेतेषां पापकर्मिणाम्‌ । इन पापियों को इनङे करमो के कारण नरकं की 


। इडे । हे राजन्‌ } आ्रापको पुरयोंका फल 
` स्वभस्त्वयापि गन्तव्यो चप पुण्येन कम्मणा }}६६।॥ पनित लिये स्वम को जाना चाद्ये 1 ६६॥ 


राजोवाच राजा वोला-- 
यदि जानामिधम्मं खं खं वा शक्र शचीपते । हे धर्मराज ! यदि श्राप ्रथवा शचीके स्बामी 
सम यावतत्‌ प्रमाणन्तु शुभे तद्रक्तुमहः 1}७०।॥ इन्द्र मेरे पुरायोके प्रमाणएक्ते जानते छ तो किये ॥ 
धस्भ॑डवाच धमे वोद्ा-- 
¦ अभ्बिन्दवो यथाम्भोधौ यथावा दिषि तारकाः जिस भरकर समुद्र के जल कण, श्राकाश में 


यथा वा वषैतो धारा गज्यां सिकता यथा तारागरुभ्वरखती इर धारये, गङ्गाजीकी चाल ॥9६॥ 


असंख्येया सहारान यथा बिन्द्रादयो ह्यपाम्‌! | ठग हे महाराज ! जिस प्रकार जल के विन्दु 
असंख्य होते ह, उसी 
4 हवा तवापि एुरयस्य संख्या सैवोपपयते ॥७२॥ द संव अलं मर स दारे पवा 


र॑ १६ १० माकैस्डेयपुराण ७४ 


~---~---~--~--------------------------~--------------------------------------------~----~~- ~ 


तण = ज = > = 


तदेव -शतसादस्न संख्यागुपगतं तवं ॥७२ 11 हजार पुरयं क्षय दोगये ॥ ७३॥ इस कारण दे 
तदच्च त्वं शृपश्रष्ठ॒तद्वोक्तुममरालयम्‌। | राजन्‌ ! श्राप खम का उपमोग करनेः फो चलो । 


एतेऽपि पापं नरके क्षपयन्तु स्वकम्मंजम्‌ ॥७४॥ नौर इन पापियों को श्रषने कर्मका फल्‌.भोगनेदो॥, 


राजोचाच राजा बोला- । 
कथं स्पृहां फरिष्यन्ति मत्सम्पकैषु मानवाः | यदि भेरे दासा इनको सुख न दोगा तो मन्य 
यदि मत्सन्निधावेषामकतपो नोपजायते ॥७५। क्यो सुखा से. लाभकी इच्छा करगे! ॥ ७५ दे देव. 
तस्पद्रयत्‌ सुकृतं फिचिन्ममास्ति बरिदशाधिष | ( राज ! इसलिये मेस जो ङु भी पुरय दो उससे 
तेन युच्यन्तु नरकात्‌ पापिन यातनां सता ॥७६॥| थे यातना पाते हुए पापी मुक्त हो जोय ॥ ५६॥ 


एन्द्र उवाच इन्द्र बोकल्ञे- । । 
एवमूटृध्चतर्‌ स्थानं त्वयाबाप्ं महीपते | हे राजन ! इससे भी उच्छ स्थान तुमको 
एतांग नरकात्‌ पश्य विगुक्तान्‌ पापकारिणः ॥७७॥| मिला शौर देखो, थे पापीमी नरकसे मुक होगे ॥ 
पुत्र उवाच पुत्र वोला- व 

ततोऽपतत्‌ पृष्पदष्टस्तस्योपरि महीपतेः । इसके वाद उसके ऊपर पुष्पत्रपां दोने लगी. 


विमानश्चाधिसेप्येनं स्वर्लोकमनयद्धरिः ॥७८॥| श्रौर॒षिमान मे वैडाकर खयं विष्एुमगवान्‌ 


अदन्ान्ये च ये तत्र यातनाभ्यः परिचछुताः । | रजा निप्िति को स्वगं म गये ॥ ५॥ म ओर, ¦ 


सक्मफलनिर्ि ह दुसरे यादना पानेचाले नारकियों ते वहम से मुक्त. 
तनि ततो जात्यन्तरं गता; ॥७६॥| दक ्रपेनमपते कमांठसार जन्न्वर भँ वैण 


व ~ ~~~ ~ --- ~~ ~ - - 
्ुकम्पामिमामच ` नाखेषिह॒क्चतः। | इन नारक्यां पर छपा कएने से तुम्हारे पक्सौ - 


एवमेते समाख्याता नरका दविजसत्तम । | किया ॥ ७६॥ इख प्रकार मैने नरकोका बर्शनकियां' ` 


येन येन च पापेन यां यां योनिषपैति वै ॥८०॥| तथा ये मी बताया कि किसकिस. पाप से .जीव 


त सासवा ४ कौन-कीनसी योनि मे जाता दै ॥८०॥ जो ङ 
तत्‌ तत्‌ सव्वं समास्यातं यया. मया पुरा। | ईनि पिले दा था बट सव यतादियः, पूवा मव 


पुरालुमवनं स्ानमवाप्याधितथं तव। । जन्य श्नान जो कुद था श्रापसे कहा । अव दे महो- 


श्रतेः प्रं महाभाग किमन्यत्‌ कथयामि ते ॥८१ ! भाग ! श्रपसे श्रौर क्या कर १।८१॥ 
इति श्रीमारकरुदेय० मे पिता-पुत्र सम्बाद्‌ फे ्न्तगंतमेश्यराज का स्वगेगमन नामका पन्द्रह ० सु०. 
-- »-:० "<€ 
` प्तोलहवां थध्याय | 
, पितोषाच पिता बोले- ४ ध र 
कथितं मे त्वया वत्स संसारस्य व्यवरिथतम्‌ | हे वत्स ! तुमने सुमसे संसारक व्यवस्थाकर् 
स्व॑रूपमतिहैयस्य धटदीयन्व्रवदन्ययम्‌ ॥ १ तथा इसका अति घृणित घटीयन्म का सा श 
तदेवमेतदखित्तं ` मयावगतमीदशम्‌ । मी वताया ॥ १॥ बह सव मेने खव. समभा लिय 
किं मया वद क्चन्यमेवमस्मिन्‌ व्यवस्थिते ॥ २॥ £ न मे क्या कतव्य दै सो कदो ॥ ९॥ 
` पुत्र उवाचं पुवं वोला- ध 
४ हधास्यविशङ्कितः । ह तात! यदि. श्रापको मेरे बचन म भदा द 
यदि सदचनं तत श्र ; लो वातः ककर वारस्य मे भ 


{क 


तत्‌ परिन्यस्य मास्यं चानभरस्थपरो भव ॥ २॥| कीजिये ॥ ३॥ रीर रसकं विधिवत्‌ अचषठान 
तमलुष्ठाय ` `विधिवहुविहायापरिपरिप्रह्‌ 1 `| कीजिये दौर श्नमि का खंयमःचोडकर श्रपनेरमेटी 


१) मफैएडेयपुराणः “ अशशद. . 


। निहो निनि दा ध्यान कीजिये तथा निद्धन्ध रदकर 
पतन्या्तानमाधाय निद्र निर्गः ॥ ४॥ त व 
कान्तराशी वश्यात्मा भव ॒भिक्षरतन्दरितः । | पनी आत्मा को चर मं फलिग श्रौर नितेन््िय 
` म्मिस्नित ् होकर भिक्तुक चनिये । तथा वाद्य संसगं से श्रलग 
त्र योगपसो भूता काह्स्पशवाञ्जतः ॥ ५ ।॥| रक्रर योगी हौ जादये ॥ ४॥ इकर वाद श्रापको 
त; भाप्स्यसि तं योगं दुःखसयोगभेषजम्‌ | | ्ावागमन की पयि स्वरूप योगकी मापि दोगी 

६ वह्‌ योग सुक्ति का दु. असुपम, श्रवर्सनीय तथा ` 


क्तिरैतुमनो पम्यमनाख्येयमसङ्किनय्‌ 
पद । श्रलन् है तथा जिसके ्रतापसे फिर संसारम शरान 
त्संयोगाच्न ते योगो भूयो भूतेभेविष्यति ॥ ६ ।| का संयोग नदीं दता द ॥ ६॥ 
पितोवाच पिता बो्ते- 


{त्व योगं ममाचक्ष्व ुक्तिहेतुमतः परम्‌ । 


९ 4 स्यर ५) क्रु 
तैः एुनर्भतो नेग वंन कीजिये जिसे मुभ फिर इस दभ का 
मेन भूतैः एुनमूतो नेदगूुःखमवा्याम्‌ ॥ ७ अलमृव नदो ॥8॥ जिल र च सासारिक- 
त्रासक्तिपरस्यात्मा मम॒संसारवन्धनः । | वन्वनों मे न पस्‌ शौर मेय आ्ास्मा श्रासक्ति से. 
मैति योगमयोगेऽपि तं योगमधुना वद ॥८ ।!| परे टो जाय ॥ = ॥ संसार॒रूपी सूर्यं से मेय मन 
पंसारादित्यतापात्ति-मिप्लुष्यरेहमानसम्‌ । श्रौर शरीर तत्त हो रहा है, बह्यकञान शुक्त शीतल 


्रह्ान्ुशीरेन [यवासो जल रूपी अपने बचनों से इसको शीतल कंरो॥ ६॥ ` 
रहमह्ानाम्बुशीतेन सिंच मां वाक्यवारिणा ॥ ६ ॥| जअवि्ारुपी काले खाप ने शका है शौर जल 


अथिधाङ्कष्णसरणए दष्टं तद्धिषपीडितम्‌। | के विपसे म पीडितः सुम मरे इषं को श्रपने 


प्वाक्यागृतपानेन मां जीवय पुनय तम्‌ ।।१०॥| वचनरूपी अदत से पुनः जीवित करो ॥ १०॥ 
पुत्र, द्यी, धर, खेत की ममता रूपी जंजीर में 


पतरदारह.्र-ममत्ननिगङार्ितम्‌ “ 1 | जकड़ा हरा हं ठुम सद्धाचयुक्त विक्ञान उन्पश्च कर 
भां मेचयेष्सद्वाव-वि्नानोदधानंस्त्वरन्‌ ॥११॥ युको बुद्ा्यो ॥ १९॥ 

पुर उवाच पुत्र वोला-- 
शृणु तात यथा यागो दत्तात्रेयेण धीमता | हे पिता ¦ जो लोग प्राचीन काल मे अलकं के 


ठि पूचने पर वुद्धिशाली दचात्रेयजी ने सम्यक्‌ भकार 
अरलकाय पुरा भोक्त; सम्यक्‌ पृष्टेन विस्तरात्‌ *१२॥| से विस्तार पूरक वरथंन किया दै वह सुनिये ॥९२ 


पितोवाच पिता वोक्ते- । 
दत्तात्रेयः तः कस्य कथं घा योगगक्तवान्‌ | दत्ताय किसके पु ध्र, उन्न कौनसा योग 
न 7 यमं चरन किया श्नौर मदयाभान श्ल जिन्न योग 
कालका महाभागो यो योगं परिपृष्टवान्‌ ।।१३॥ पृचछा वे कौन-ये १॥ ९३॥ | 
पुत्र उवाच पुज बोला- 
कौशिके ब्राह्मणः कथित्‌ पतिष्ठानेऽभवत्‌ पुरे। भाचीन काल मे कोई कौशिक नाम बाद्यस॒ था 


सोऽन्यजन्मकृतैः पापैः दृष्ठरोगातुरोऽभवत्‌ १४॥ जो पूरं जन्म मँ किये पापक कारण कोद दोगया 
त वापि मिवादचयत्‌ 1९७ उक्षकी खी उस रोगी पति को ही .देवताके 
तं तथा व्याधितं भाय्या पतिं देव 1 | समान पूजती थी श्रौर उसके चरण धोकर . खान 
पादाभ्यज्गा्गसंबाह-स्नानाच्यादनभोजनेः ॥१५।। कराती, वस्रपदिनाती श्नौर भोजन कराती थी॥१५॥ 
ेष्म-मू्-परीषाखक्‌.अयादक्षालनेन च । | वड्‌ खी अपने पति की खार, मूल, विषा शरौर 

तवैवोपारेण ~ रुधिर धोकर साफ़ करती तथा उसका उपचार 
रदश्चेवोपचारेण प्रियसम्भाषणेन . च ।\१६।] कर्ती इ मीठी वासी से संमापण करती थी १६। 


स तया पूर्यमानाऽपि सदातीव विनीठया | | बड निष्ठुर उस विनय-शीला से श्चति न्रतापू्वक 


| गीपणरोपलानियल यति निषु ` पूजित टोकर भी अत्यन्त क्रोध से उसको भला 
-अतीपतीवकोपत्वादि ४ ` ॥ १७] इरा कता र्डता था ॥ ९७॥ इसपर भी उसकी 


. चा 
५ 


` राजमार्ग भियं भनु भ्िकीर्णनतीद्विनाङ्गना । 


, . पादावमर्पणात्‌ करुद्धौ माएडव्यस्तमुवाच ह ।२८॥ 


कथं सु खदिथदं संव्वं न गच्छेत्‌ संक्षयं जगत्‌ ॥३३॥ 


` ° १६ माकेण्डेयपुराण ७१ 
तयापि मणता भार्यां तममन्यत देवतम्‌ । । खी उसको दैवता के समान समती ओर उस 
तं तथाप्यतिवीभत्यं सर्वश्ष्ठममन्यत ॥१८॥ व र र दी स्वेष्ठ मानती ॥ व 

अचकमणशीलेोऽ द्िनचसः ले हीने पर भी चह ब्राह्मण पक वार खरी 
त स कदाचिदद्िजात्तमः त ॥:, तो वि उमे उसके घर पहंचादो ॥१। जिल 
पाह भाय्यां नयस्तरेति चं मां तस्या निवेशनम्‌॥ १६॥| बेश्या को श्राज मने सजा के दरवार भ जाते हषः 
या सा वैश्या मया दृटा राजमागे होपिता। | देखा ह, हे धम को जानने वाली ] उस ९ 
तां मां भापय धम्मे सेव मे हदि व्चते ॥२०॥| पा यमे परटुचा दे, बद मेर हृदयम बस गई दे ॥ 
रातिश्वेयपागता उस खीको मेने पात्तःकाल देखा था श्रौर श्रव 

टा घ््योदये वाला ातरिश्चेययुपागता । ` | राभि होगे । उसको दे इतनी देर होन परमौ 
दशनानन्तरं र ॥ मे हृदयान्नापस॒पति ॥२१।॥| वद मेरे हदय से नदी निकलती ५।२१॥ यदि बह 
यदिसा प पीनश्रोणिपयोधरा | त ० ध 

नोपूहति तन्वज्गी ६ | स्तनं ६; ग महति मर स॒त्य ज 

भामः कामो महुष्याणां ५ र व भरू ६) ॥२२॥ कामदेवे का माम मुष्योके लिये वड़ा कठिन 
+ छष्याणब्हाःमाध्यत चसा | | है। उख महप्य ने खी से बहुत पार्थना की श्रौर 

ममाशक्तिश्च गमने संहृलं मतिमति मे ॥२२॥| कटा कि भुम म चलने की शक्ति नदीं है ससे मँ 

तत्‌ तदा वचनं श्रुत्वा भततुः कापातुरस्य सा। व्याकुल हं ॥ २२॥ कामातुर पने स्वामी के वचन 

तत्पत्नी स्कृलोतना महाभागा पतिता ॥२४॥| खुनकर उस भाग्यवती, ये्ठ कल म उत्पन्न होने 

गादुं परिकरं वदरध्वा शुसकमादाय चाधिकम्‌| 

स्कन्धे भत्तारमादाय जगाम मृदुगामिनी ।२५॥ 

निशि मेषास्ृते व्योम्नि चलद्धिुसदर्भिते । 


वाली, पतिता खी ने ॥२७॥ अपनी कमर कसकरः 
कन्धे पर कपड़ा रक्ला श्रौर उसपर श्रपने स्वामी 
को विराकरः वह धीरे-धीरे चलने लगी ॥ २५॥ 
श्रंधेरी रात्रि थी, श्राकाश में विजली चमक रदी 
शी, चौर बराह्मरी साज्यमागं से श्रपने परिय खामी 
क्रो लिये जारदी थी ॥२६॥ सास्ते म एक शली थी 
जिसपर चोरी की श्राशङ्का म माएडव्य सुनि को 
चढ़ा दिया गया था श्रौर जहाँ कि वे मुनि अपने, 
दुख से श्तं हो रहे थे। वह ब्राह्मण्‌ ॥ २७॥ 
कौशिक श्रपनी खी के कन्थे पर चदा इुश्रा चला ` 
जाता शा कि उसके पौव लगने से मारडग्य मुनि 
क्रोधित हो ये बोलते ॥ २८॥ जिसने अपने पाव से| 
इस शूली को दिला कर मुभे दुःखित कर इस ` 
देशा मे पहुःचाया है बह पापी नराधम ॥२९॥ सूय. 
दय होने पर श्रवश्य प्राण त्थागेमा, इसमे संशय 
नदीं ! बह सूयं को देखते दी न्ट टो जायगा ॥३०॥ 
उसकी शची ने उस अति कठिन शाप को सुनकर 
दुःख से कदा कि सूयं उदय को भरा न डो ` ॥३९॥ 
इसके वाद सुरथं के न निकलनेके कारण चारों श्रोर 
हुत दिन तक राति दी रदी इससे देवतागण्‌ 
भयभीत इष ॥ ३२ ॥ स्वाध्याय, षयूकम, स्वधा, 
स्वादा प्रादि सव रूट गये । तथा यद सोचनेलगे 
किं थे जगत्‌ इस तरह से कैसे चलेगा ।३२॥ यदि 
दिन, रात्रि की व्यवस्था न रहेगी तो मास - ~ 
चतु किस भकार दगे श्रौर बिना इस के उत्त 
रायण श्नौर दक्तिणायण का क्रान किंस प्रकार से 


पथि शूले तथा मोतमचौरं चौरशङ्कया । 
माणएडन्यमतिदुःखात्तमन्धकारेऽ्य स द्विनः ॥२७॥ 
पलनीस्कन्धे समारूदश्चालयामास कौशिकः । 


येनाहमेवमत्यथं दुःखितश्चालितः पदा । 
दशां कष्टापसुपाक्ठः स पापारमा नराधमः ।॥२६॥ 
स््योदयेध्शः पराशोर्विमोक्षयति न संशयः । 
भारकरालोकनादेव स विनाशमवाप्स्यति ॥२०॥ 
तस्य भाय्यां ततः श्रुत्वा तं शापमतिदारुणम्‌ । 
भोवाच व्यथिता सूर्य्यो सैबोदययुपैष्यति ॥२१। 
.ततः सूयोदयाभावादभवत्‌ सन्तता निशा । 
वहून्यहःपमाणानि ततो देवा भयं ययुः ॥३२॥ 
निःसवाध्यायवपटुकतार-स्वधास््ाहाविषम्नितम्‌ । 


अहोरातरव्यवरथाया . विना मास्तु सं्षयः। 
तत्स॑क्षयान्न . त्वयने . ज्ञायेते. .दक्षिणोत्रे ॥२४॥ 


७३ 


मा्॑डेवुरण 


अर १६ 


~ --~-- 


विना चायनविन्नानाद्‌ ऋतः संवत्सरः इतः! । 
संवत्यरं धिना चान्यद कालज्ञनं भ्रदत्तेते : २ ॥\ 
पतिव्रताया चसा नो्रच्छंति दिवां 
चर्योदयं विना नेव स्वानदानाडिकाः व द९॥ 
नमेविहरण्येव क्ेत्वभावर कस्यते ! । 
नवाप्यायनमस्माकं विना होमेन जायते ॥२७६ 
कचसाप्यायिता 


सत््ययद्भासेयथाचितः । 
ट्या तानयुगरहीमो मत्यारशस्वादिसिद्धये ।र411 
निष्यटिताखोषथीषएु सत्यां यह्यंनन्ति नः । 
तषा वच भच्च्यादः दान्‌ 


77; 


~ 


ङ्ादिपएलित्यः 1३६) 
षो हि वषास व्यं स्त्याथोदध पदर्षिसः 

तोचचषय हि उयं हदिविषसा मानवाः ॥४०१। 
ये नास्पाकं प्रयच्छन्ति नितयरसिचिरीः क्रियः) 
तुभागं दुरात्मानः स्यञ्वान्नन्ति लेलुपाः .४१। 
विनाशाय वयं तेवं तोयषव्याधिमास्न्‌ 1 
किति सन्द्षयामः पापनासप्कारिराम्‌ ॥४२॥ 
दृतोचादिश्ययेन तेषां दुष्टरतक्भ्मिखम्‌ ) 
उपप्रगो भ्रचचतन्तं प्रणाव दुदार्णाः ॥४३ 
पीसविलला तु यद्र शेदसात्मनः 


तलस्मन्‌ =, नद 
च च्म, 


य तलस्मन्‌ ४ 
परवान्‌ वं लोकान्‌ विदयाम महात्सनाम्‌ा 


9 न 


भ 


क 7 


1 


तन्नास्ति सव॑भेवेतदिनेषां व्युष्ितंस्ित्तिम्‌ ! | 
कथं सु विनसगः स्यादन्योऽन्यमवदन्‌ सराः ॥४९॥ 
तेषामेव समेतानां यहन्ुच्छि्तिशङ्किनाम्‌ । | 
द्वानां पनं भुत्वा प्राह देदः प्रजपतिः 11४६! 
तेनः पर तेनैव त्मा उ तस्या] | 
पशास्यतऽ्मरास्तस्माच्छराध्वं इचनं मम 1७७ 


पतिव्रताया माहारम्याचोद्रच्छंति दिवाकरः ! 

नस्य चन्दयाद्ातियत्यानं अवतां त्था 1४८]! 

तस्सान्‌ पि्रतासतरैरसुगयां सचश्चस्सनमू ¦ 

मसद्रय्त ३ पत्त भानास्दयकास्यया 1€; 
पु उच्य 


तः सा भरस्ादिता चत्वा हषं दियताभिहि ! 


(90 -नोत 


| 


अयाचन्त दिनं देका भवदिति चया उत 


{ 
। 
4 
। 
॥ + 


दया : एटा 
ससर 
सेना डान एङ दरह प्रसलत इया ४३४१४ 


यदि पत्तन क वदन स स्ध्ं नदा (न्क्लम त्र [॥ 


् 


यन च् चन जाने 3) मीर चदु-' 
क्वि प्रार्‌ मातम दोगा श्र सन्वत्छर क. 


दतादक च्य (च्ल, 


[क 


सूयादवक् वदो च्वानः ठष्ल 

प्रकार देत एद विना रि के यज्ञ का अभावे 
दिखाई उता हं त्था विना यज्ञ, दोपादि के इम 
ल्येन = ठपि जिस प्रज्यर देरी? ४५३७} हम 
लोग च्यःद्दित यद्ध माग मलुष्यो से पाकर बृष्टि 
करते ड निरे कि मलुष्यो के लिय अश्न शमादि 
उत्पत द्यत दै ।३८॥ चङ करने बलति मदुष्यों ऊँ 
चयि दछौप्थियां उन्न होती है इन भी यज्ञादि 
३ पलित देकर म स मदुष्योमी मनोक्तमना पसं कर्ते 
ड 1२६ हम रीदे दी उर वराते ह श्नौर नचुष्यं 
यर की शोर) छनज्ल च्व कस्ते न्नर . 
मदष्यं हविष्यान्न छी ? ४० ४ उो इष्टता चित्यः 


4 
2 
 . 


रेयचक "न्ध्या करक हमक 
त्प्ना लोमी स्व्य हा उख्य : 2 
पापियों क हम दखेखार मं सयं, असि, 
ञयदि दे हारान्‌ कर देते है ¶४४ छन्सिन 
उन पापया का चद्व रसखान 


सप 


4 1 
101 
८) 


4 
३५ 


नि 
~= 
चदे १ द्व्‌ 


४: 
7 
4 
+ 


1 


„(+ „| 
=> 1 
५ 
५ 


21८ 
1 ४ 
# 11, 


ति #&, 11" 
| 


%. 
„ ५ 
२ 
91 


#0/? 


9 इसलिये 


४: 
1 0 
दा 
4 
[न 
| 
23) 
| 0" ८1 


| 
1 


21 


1 
५५१. 
41 


^ ८ 
[। 
# ६ 
1 | | 
21 
¢ 
| 


| 


न 
| 
॥)# 


(| 
॥ 


‰ 
12. 
। 
(4 
६7 
4 

> 


जाती दै १५४२१. 


०.१६ माकरएटेयषुराण ` ७ 


भि माना 


~~~ 


श्नसयोचाच ` श्रनुसूया बोली ~- | 
पतिव्रताया माहात्म्यं न हीयेत फथन्त्विति । दे देबताश्रो ! पतिव्रता का माहास्म्य किसी 


सम्मान्य तस्मात्‌ तां साध्वीमहःसक्ष्याम्यहसुराः५१। मकार मिथ्या नहीं हो सकता इसतिये उस सती 
को सम्मानित करके उससे क्षमान-दान कराञंगी.॥ 


यथा एनरदोरातरसथानछपनायत | | सिसे शुनः हिन शौर रावि पूर्वम शो शौर ज 

यथा च तस्याः स्वपतिन साध्वचा नाशमेष्यति ५२।॥ साध्वीका पति मी नाश को न धान ठो ॥५२॥ ` 
॥ व पुर उवाच ४ सुमति वोला- 

एवयुक्त्वा सुरांस्तस्या गत्वा सा मन्दिरं शुभा। उनके यह कहने पर देवता लोग श्रनुखया को 


क सश लेकर उखे स्थान पर गये श्रौर उससे उस 


च्रचखयोचाच श्रनखुया वोली- 
कचितनन्दपि फरयाणि स्वभन युखदशेनात्‌ । हे कल्यासी ! तुम अपने स्वामी ॐ सुखका 


कलि < दशेन करके श्रानन्द करटी दो तथा छन्य सव 
सितदवभ्यो मनयरेऽभयमिकं पतिम्‌ ॥४४ देवताश्रोँ से पति को श्रधिक मानती दो ॥ ४ ॥ 


५ [१ मैने भ्त 
। भत श॒श्रुपरणादेव मया प्राप्ठं महत्‌ फलम्‌ । | मैने भी स्वामी की सेवा से महान्‌ सुख प्राप्त करिया 
(६ हे (धि सिद्ध 6 
सर्व्वकामफलावाक्षया पत्युहाः परिवरिताः ॥१५॥| दै. मेरी सव कामनाये सिदध इ शरीर कमी दुत 
ति ५ ॥ नहीं हु ॥ ५५॥ हे सनी ! मनुष्यको सदैव पाच 
पश्चणानि मनुष्येण साध्वि देयानि सच्वंदा । | ऋ देने के लिये तत्पर रहना चादिये । इसलिथे 
तथात्मवणंधरम्मण कर्तव्यो धनसंचयः ॥५६' | अपने वसं फे च्रनुसार धम रूपी धन का सश्चय 


प्राशा्थस्ततः पत्र विनियेज्य पिधाततः } करना चाहिये [दा चन पराप्त कर्के विधि विधान 
सहित सत्पात्र को दान करना चाये शरीर सरैव 


४ सत्याञ्जव-त गद ५ 
^ सत्याज्जेव-तपोदानेदयायुक्तो भवेत्‌ सदा ॥५७॥ सत्य. विनय,तप, दान श्रौर दथा पृक्त रहनाचादिये 


क रिया शास्मि रागद्ेपकिवम्जिताः। ॥ ५७ ॥ सवः क्रियाय राग श्रौर देष से रदित हो 
कत्तेन्या श्चन्पह्‌ं श्रद्धा-पुरस्कारेण शक्तितः । ५८॥॥| कर शास्र की विधि के श्रच्चसार करनी चादिये, 
स्वजातिपिहितानेव लोकानाभोति मानवः । | तथा खदा शरीर. पुरस्कार सदत शक्तपूरवंकं सवं 


छरेन की सेवा करनी चादिथे ॥ ५८॥ हे स्त्री ! श्रत्यं॑त 
हेन महता साधि भाजापत्यादिकान्‌ ्रमात्‌॥५६॥ ज्ञेय से लोग स्वजाति क॑ नौर भाजापत्यादि ब्रत 


खियस्त्वेवं समस्तस्य नरैदु;खान्जितस्य वै। | करने हुण लोकों को भरा करते है ॥ ५६॥ मनुष्यो ` 


पुण्यस्याद्धापहारिण्यः पतिशभुपयेव हि ॥६०॥ द्वार 1 र किये ध उस समस्त | 
सीणां परय भे खियां पति की .सेवा करनेके कारण प्राधा 
नास्ति सीणां एथगुयज्ो न श्राद्ध नपयुपोषितम्‌। माग पाती है ॥६०॥ सियोके लिये प्रथक्‌ यञ, क्ञान 


भनु शभूपयैवेतान्‌ ोकानिषटान्‌ गन्ति हि ॥६१॥ श्रा शीर उपवास इ भी नही है! तो पति ; 
तस्मात साध्वि महाभागे पतिशश्रुषणं प्रति। | सेवा क्ती दु निष्ठ लोकों को जाती है ॥६१॥ , 


ति ) [9 ्, #9 क व~ | ध्ी 1 ति ९। ५ ५ 
त्वया मतिः सदा कार्य्या यतो भत्ता परा गतिः ।॥६२॥| इसलिये हे सौभाग्यवती साध्वी ! पति की ` 
खशा अपनी वुद्धि रक्लो, क्योकि -खीके लिथे. ˆ ~. 


| ष द्‌ १ ४ 
स ऽ ५ ही परम गति दे ६२॥ जो कुल देवताश { , - 
इच्याद्वत्ताभ्यच्नं सत्कियातः। , | श्नौर ्रतिथियों की सेवा करके पति पुय . । 
तस्याप्यद्ध फेवलानन्यचित्ता है उखका श्राधा खी केवल पतिका अनन्य चतन, ; 
नारी ङ्क्त भ्त श॒भ्रुपयैव ६३१ | श्र सेवा करने से पाती है ॥६३॥ ॥ 

पुत्र उवाच पुरुष बोलला _  : 
उसका यह वचन नकर श्रौर श्राद्र सतिः 


तस्यास्तद्वचनं शरुत्वा भतिषृख्य तथादरात्‌ । | पूजा करके वह्‌ पतिनता ब्राह्मणी अनरि-ऋषि की' ` 
्युवाचाजिपतमी तामनुसूयामिदं क्च; ॥६४॥॥ खी श्रतखया के.भति यह चचन बोली ॥ ४ ॥. 


७८ माक॑रुडेयपुराण ०१६ | 
धन्यास्मचनुग्दीतासिमि देवैथाप्यवलोकिता | | कल्यारि धन्य जे १ श्रनुगदीत की 
= | वद्धयसे पुनः ॥६५ गई तथा मँ देवताश्च का दशन पाया । इससे 
क र मरी श्रद्धा ये चरधि हुई है ॥६५॥ मे आनती ह कि 
नानाम्यतमर नारीणां कापित्‌पतिंसमा गतिः। | इस लोग शौर परलोक सियो की गति पति 
तत्मीतिीपकाराय इह लोके प्रत्र च ॥६६॥ रम श्नौर उसकी सेवा दी दै ॥६६॥ हे यशस्विनी ! 
पतिपसादादिह च भेत्य चैवं यश्थिनि। | पति कीङृपा से ही श्रौर उसको देवता समभने 
> | सेदी श्री इस लोक रौर परलोक मं सुख पाती । 
नारी सुखमवाभरोति नाय्यां भर्ता हि देवता ॥६७] ॥९७॥ हे सोमावती सण पाती 
सा छं बहि महामागे मचाया मम मन्दिरम्‌] | स्थान पर आहो सो कदो । द राये ! जो ङक 
आर्याया यन्मया काय्यं तथार्य्येणपि वा श्मे॥ एमे क्न्य है बह तुम शुभसे कलो ॥९८॥ 
अयुसूयोवाच 


अनुसूया योल्ती-- 
एते देवाः सहेन्द्रेण माणुपागभ्य दुःखिताः । 


इन्द्र के सष्ित ये देवतागण शति दुखित हो. 
कर मेरे पास भये श्रौर कहने लगे .कि तुम्हारे 
वचन के कारण दी सुर्योदय नदीं होता है कि 
जिससे आन्दिक सव कम नट हो रे है ॥ ६६॥ 
ये देवता लोग इस वात की याचना करते है कि 
दिन नौर रानि करम पूर्वक होते स्दैश्रौर मै भी 
अहं तदथमायाता शृु॒चैतद्वचो मम ॥७०।| यही अभिलाया लेकर ज ह । मेरे इस वचन को ` 


उनिये ॥७०॥ दिन न निकलने से समस्त यज्ञकर्म 
दिनाभावात्‌ समस्तानाममाबो यागकम्पणाम्‌। का अमाव दै जित शरभाव द कारु हिद 
तदभावात्‌ सुराः पुष्ट नोपयान्ति तपस्विनि ॥७१॥| की पुटि नटीं होती दै १६०४ दिलिके नाशद्ोने से 
५ पि सव शुभ करमो का नाशन होगया है । . शभ कर्मो के ५. 
सणच्छेदादुच्छे [1 कम्मणाम्‌ | ० [अ ध ५ ५ 
व ॥७२।॥| नष होने से अ्ननाढृटि दोग है जिससे कि संसार ` 
त्‌ खमिच्चसि चेदेतत्‌ नगदुद्धतुमापदः । 


नाग करी चोर उन्मुख है ॥ ७२॥ टे साध्वी ! . इख 
जगत्‌ का आपत्ति से उद्धार कर इसकी रक्ञाकरो, 
[1] ४४ ¢ + 
पसीद साधि लोकानां पूर्व॑वद्ततां रषिः ॥७३॥ 
। ब्राह्मर युच्च । 


श्रापके प्रसन्न होनेसे सूयं पूर्ववत्‌ उदय होमे ॥७३॥ 
पराणडव्येन महाभागे शमनो मत्त ममेश्वर । 


ब्राह्मणी बाली-- 
दे सोभाग्यवती } मारडव्य षि ने मेरे पति- ` 
योदये विनाशं तं पाप्स्यसीत्यतिमन्युना ॥७४॥ 
अरयुखूयोवाच 


देव को शापदियाहैकि सूर्योदय होते ही तू नाश 
पदि घा रोचते भद्रे ततस्त्वद्बनादहम्‌ । 


को प्राप्त होगा ॥७४ ॥ 
अनुसूया वाली- 

रोमि पूवदेहं मर्तारश्च नवं तव ॥७५॥ 

पया हि सव्वंथा सीणां माहात्म्यं बरशिनि। 


दे दरे ! यदि उम्हारी देसी ही अभिलाषा 
तो लम्हारी इच्छानुसार तुम्हारे स्वामी कौ पूववत्‌ 
(तिव्रतानामाराध्यमिति सम्मानयामि ते ॥७६॥ 
-* ` पुत्र उवाचं । 


दे कर दूगी ॥७५॥ हे खुन्दर वरशुतराली ! मै सर्वथा ` 
खियों के माहात्म्य को जानती हं । भे तुमको पति. . 7 
नतां ढारा आराधित होने योग्य मानती ह।७६॥ 
चेत्युक्ते तया. सय्यैमाजहाव तपस्विनी । 
्नुसूयाघ्यमुचम्य दशरात्रे तदा निशि ॥७७॥ 
९ का था ॥ ७७ ॥ इसके अनन्तर लाल -के 
वस्वान्‌ भगवान्‌ फुषटुपलारुणाङतिः । = ~" ` शसक अनन्तर लाल कमल. के 
तो वि # ६ र | - स्मान कान्ति वाजे सूय. भगवान शैलराज उदया- .. 
र्4ष्मः ५" ` ९९९; ` =+, । ॥७८॥ ' चल पर रषिमरडल से परगर हुप ॥ ७८ ॥ 


त्द्राक्यापास्तसत्कम्म-दिननक्तं निरूपणा; &8॥ 
याचन्तेऽहनिश संस्थां यथावदषिखरिडिताम्‌ । 


ने दवन करके अर्ध्यं देकर सूयं को . भराम किया 


प 


सुमति वेला-- ` 
जव तक दस रानि के बरावर समय व्यत्तीते . हो* 


अनुया इस भकार कहनेपर उस तपस्विनी 


श्र १६ माकंर्टेयपुराण ७६ 


न~~ ~ ~"" ~~~ ----------------------- -----~------~-- 


------------~~. 


; प्राणे सूयं क प्रगट दोते दी उस बाह्यणए का पति भ्राण्‌- 
समनन्तरमेवास्या भत्ता ¦ भां न्यैयुख्यत । ति नि 
पपात च महीपृष्ठे पतन्तं जशहे ख सा ॥७६॥॥| हुए को खरी ने मदम उ लिया ॥ ७६॥ 


। श्ञुसयोवाच श्ननपूया वोली-- 
न विषादस्त्वया भरे फततव्यः पश्य मे वलम्‌ । दे भदे! दमशोक न करो श्रौर मेरे उस बलको 


वि देलो जो मेने चिरकाल तक पति की सेवा श्रौर 
1 परिछभुषयावठ पप" 1 चिरेण ते ॥८ . तपस्या करके प्रास कियादहै॥८०॥ जो मैने रूप, 
यथा भतत समं नान्यमपशयं पुरूपं कषित्‌। | शील, उदि ध्रथवा श्रञ माधुयं श्रादि भूषणं से 


; भ्या वाडमाधु््यादिभूषणेः॥८ कभी किसी दूसरे पुरुप को पति रूप से न देखा 
6 र ७ तो ॥८१॥ उस सत्य से यह विप व्याधिःरहित 


५५१०५. । होकर जीवित होजवे श्रौर वा होकर सैकडँ 
भराम जीवितं भार्यासहायः शरदां शतम्‌ ॥८२।॥ वषं तक श्रपनी खी की सहायता करे ॥८२॥ यदि 


यथा भतः समं नान्यमहं परयामि दैवतम्‌ । | मँ अपने पति फे समान किसी शरन्य दैवता को न 
तेन सत्येन पिपरोऽयं पुनर्जीवत्वनामयः ॥८३। ॥ मानती होऊ तो उस सत्य से यह व्राह्मण पुनर्ज 


६ ९ ४ | तरिते होकर श्रारोग्यता को पराप्त हो ॥ ८३॥ यदि 
कस्मंणा मनसा वाचा भततृराराथनं परति । | मेरा उ्चम नित्य मनसा, वाचा, कर्मणा पति के 
यथा ममोचमो नित्यं तथायं जीवतां द्विजः ॥८४॥| ्राराधनके निमित्त तो यह बाह्मण जीविन होजाय। 


पुत्र उवाच सुमति वाला-- 
ततो विभः सथुततस्थौ व्याधिष्ुक्तः पुनयवा । श्रयुपूया के इस प्रकार कने पर बह बराह्मण 


| व्याधिसुक्त होकर जीवित दोगया रौर युबा होकर 
स्वमाभिमांसयन्‌ वेश्म शन्दारक इवाजरः ॥८५ श्रपनी श्राभा से घर को पभकाशित करने लगा तथा 


पहधिववायादिनिखन । देवता की भांति श्रजर दोगया ॥ ८५॥ इसके वाद 
.“ ततोऽपतत्‌ दुष्यृषटदववायादि निस्वनः । देवता लोग पुष्ृष्टि करके वाय श्रादि का शब्द 
लेभिरे च शरदं देवा श्रलुसूयामथानुबन्‌ ॥८६॥| करने लगे श्र भसन्र दो श्रलुसुयासे कहने लगे ॥ 

देवा उचुः देवता वोले-- वीव 
९ ९ महत्‌ हे कल्याणि ! चकि तुमने देवतां का महान्‌ 
शि देवकाय्यं महत्‌ $ृतम्‌। 0 क 
घरं हणीष्व करपाणि देव हत्‌ छप्‌ कायं विया इसलिये देवता तुम्द बर देना चाहते 
त्वया यस्मात्‌ ततो देवा वरदास्ते तपस्िनि ॥८७।॥ है । हे तपस्विनि ! अपनी इच्छाजसार वर मांगो ॥ 

- श्रनुसूयोवाच न व श 

पितामहपुरोगमाः । यदि पितामह शौर दैवतालोगा मेरेऊपर प्रसन्न 
यदि देवाः प्रस्ना मे ध हैँ रीर बर देना चादतेदै अथवा सुमे बरकेःयोग्य 
, बदा बरयोप्या च यदहं भवतां मता ॥८८॥| सममत है तो {६ । हा विष्णु शीर शिवं मेर 
तरल ्रस्वष्णु- ‡ | “| पुत्र कलायं ओर मै अपने पति के सदितः योग 
तदान मम पुव तङ विष-मदश्वराः। | इ पा हो जञेश से मुक्त दो जाऊ ॥,८६॥ 
. यगज्च भायां भत सहिता छेशणुक्तये ॥८६॥| शरचसूया फे यद वचन खुनकर ब्रहम, विषु श्रौर 


शिवं श्रादिक देवता लोग “५ १, 
एवमस्तिति तां देवा ब्रह्म-विष्णु-शिवादयः। | चोर व र 
प्रोक्त्वा जग्ुयैथान्यायमुमान्य तपस्विनीम्‌॥।६०॥| के. पने-शरपने स्थानों को चले ॥६०॥ 


इति श्रीमाकर्डेयषुराणमे पिता-पुत्र संबादके श्॑तर पतिव्रता वर-भाप्ति नामं सोलह अध्याय समाप 
--स्क श्छ ` हि 


सत्रहशं अध्याय 
(सुमति) ने कटा-- 


बहुत समय व्यतीत होने पर भगवान्‌, श्रतरि नेः 
श्रपनी खी ्रचुसूया को देखा ॥:॥ खुन्दर श्रनि ` 
-वाली, सवाद खन्दश ऋरत॑मती दोकर स्नान विये ‰- 
हृष उस श्रनिन्दित खी कोः देखकर .श्रत्रि भनि । 
सकाम दोगये ॥ २॥ अञुसूया के देखकर मुनि को 
` इतना श्रधिक कामविकार उत्पन्न हुश्च किवे वड 
वेग से उद्धव श्वास लेनेलगे ॥२॥ उस समय रजो 
गरुण प्रर्त जो ब्रह्माजी द उनके शरीर की शुक्ल - 
च्राभा चारों ्चोर फैल कर उन्मास्प से दशं 
दिशा्रौँ को प्रकाशित करने लगी ॥ ४ ॥ नर्याजी 
का वह तेज श्रि सुनि का मानस पुत्र सोम कटः 
लाया जो सव जीर्वोकां श्राधार तथा श्रायुर्वल दै ॥ ` 
संतोयुण से युक्त विष्णु भगवान भी सन्तुष्र-दोकर 
दत्तात्रेय सप से श्यति मुनि के शरीर से उत्पन्न 
हप ॥६॥ दत्तात्रेय फे चिपय म यद पसिः है कि 
विष्णु भगवान्‌ टी ने दत्तात्रेय का" श्रवरतार लेकर 
श्रनसुया का स्तन पिया घौर अत्रि क्रपिके दितीय , 
पुज कटलाये ॥91 करुद्ध होकर जो दुवांसाजी सातवें `+ 
दिन दीं ्रपनी माता के उदर सें निकल आर्ये धे “ 
उसका कारण यट था किं हैदयराज कार्तवीर्य ने 
श्ननुसूयाको बहुत भय दिखरायाथा श्रौर स उद्धत 
श्रपराध को ॥ ८ ॥ देखकर श्ग्रिजी.करुदध हप श्रौर 
शीब्रदी दैहयराज करा बध करनेके लिये गभाोवस्था 
के दुल मं भी दुःख प्राप्त कर कोधसे शक्त ॥ ६॥ 
महादेवजी के श्रंश॒रूप, तमोगुण से संयुक्त दुवासा 
ऋपि उत्पन्न हष । इस प्रकार असया. के ब्रह्मा; 
विष्ण श्रौर भिवजी पुर रूष से उत्प हण ॥ १४॥ - 
५ देवतां के वरदान के कारण ब्रह्माजी चन्द्रमा. 
विष्णु दन्ता्रेय रौर शङ्करजी दुर्वासा रूप से हष॥ 
चन्द्रमा अपनी शीतल किरणो से आकाशम स्थित 
दोकर भी सदेव श्रौषधियों रौर मनुण्योका पालन 
करते दै, रतः वे बरह्माका धंश ॥१२॥ दत्तात्रेयजी 
दुं शरौर दैत्यो का नाश करने तथा सजनो पर . 
दया, छृपा करने के कारण विष्णुरे श्रंश है ॥ १३॥ 
त्रीर भगवान्‌ जन्मा दुर्वासा ऋषि जो . शरीर, 
“नेत्र, मन, वचन श्रादि मे बड़े उद्धत है श्चौरे जो 
च्रभिमानियों का नाश करने बाले है उनको सबका 
अंश समना चादिये॥ १४॥ फिर चन्द्रमा कोः 
सोमत्व भदान कर श्रनि भगवान्‌ ने उसको पजा. 


पुत्र उवाच 

ततः काले वहत्िथे द्वितीयो बरह्मणः सुतः । 
स्वभाय्यीं भगवानत्रिरसुयामयश्यत ॥ १॥ 
ऋतुरनातां सुचाव्वजगी लोभनीयोत्तमाकृतिम्‌ । 
सकामो मनसा भेजे स ुनिस्तामनिन्दिताम्‌ ॥ २ 
तस्याभिध्यायतस्तान्तु विकारो योऽन्धनायत 
तमेबोवाह पवनस्तिस्थोद्धश्च वेगवान ॥ २॥ 
बरह्मरूपश्च शुङ्काभं पतमानं समन्ततः । 
सोमरूपं रजोेतं दिशस्तं जगहुदंश ॥ ४॥ 

स सोसो मानसो जल्न तस्यातरेः भजापतेः | 

पुत्रः समस्तस्वानामायुराधार एव॒ च ॥ ५॥ 

तषे विष्ण॒ना जज्ञे दतताप्रेयो महात्मना । 
स्वशरीरात्‌ सुतपा सत्वोद्रक्तो द्विनोत्तसः , ६। 
दत्तात्रेय इति ख्यातः सेल्नुसूयास्तन पपौ । 
निष्णुरेवायतीरणौऽसौ दवितीयोऽ्वे एुतोऽभबद्‌। ७॥ 
सघ्ाहात्‌ प्रच्युतो मातुर्दरात्‌ कुपितो यत्त; । . 
हेहयनद्युषादृतमपराध्यन्तयुद्धतम्‌ ॥८॥ 
ा्ौ हृपितः सो दग्धुकामः स हैहयम्‌ । 
गर्भवासमदहायासदुःखामरषसमन्वित्तः ॥ ६॥ 
दुववासास्तमरद्ितो रंश समजायत । 
 इतित्रनरयं “तस्यीः. जज्ञे प्रहमेशवेष्णवम्‌ ॥१०॥ 

' सेमे तरहमामवद्िदत्रेया व्यनायत | 

दुता; शङ्करो जे" परदानादिवौकसाम्‌ ॥११॥ 

। सोमः स्वररिमभिः शीतर्वीरुधौपधिमानवान्‌ । 

¢ च्राप्याययन्‌ सदा स्मे वतते स प्रजापति; ।१२॥ 
, दत्तात्रेयः ` प्रजां पाति दुषटदैत्यनिवहेणाप्‌ | 

? शिष्टाुपरदद्ष्वेति शेयथांशः स वैष्णवः ॥१२॥ 

३ निरदहत्यवमन्तारं ` दु्व्वासा , भगवानजः । 

९ रौद्रं समाश्रित्य वयु ङमनावाग्मिरुद्रतः १४॥ 

२ सेमल भगवानग्निः पुनशक्रे प्रजापतिः| 


ज =-= ~~-- ~~ --- 


, ०१७ १ भावरय्ाण <! 


दतग्रेयाऽपि बिषयान्‌ योग्या शुने हरि॥१५॥ पति किया शौर दत्तात्रेय विषयों से युक्त योग मँ 
2 तत व , स्थित हृष ॥ १५ ॥ दुबांसाने भाता, पिता का त्याग 
रव्बासाः पितरं हित्वा मातरश्वो्तमं घ्तम्‌ । ञ्‌ सन्यास वत को श्रहण्‌ या श्रौर 
उन्मतताख्यं समाधित्य परिविाम मेदिनीम्‌ ॥ उन्मत्त कौ तरह पृथ्वी पर धमण करनेक्गे ॥९६॥ 

य पखिमराम भे दनम्‌ ९९॥ एक दिन योगी दत्ता्रेयजी शुनि कुमारो का साथ 
मुनिपुत्रो योमी दत्ताप्रयेऽ्प्यसद्विताम्‌। | चोढने के लिये पथः तालाव पर उनम साथ स्नान 

८ श्रेभीष्स्यमानः सरसि निममज्ज चिरं भय; ॥१७॥ व 1 व र र 
४ ९ धिप . मार भी -उनका 

तथापि, तं॑महात्मानमतीम परियद्शनम्‌ । | श्रत्न्त भिय दर्न पान ॐ तिये तालाय बिनारे 


तत्य गुनं हृमारास्ते सरसस्तीरमाभिताः ॥ | पर खड़े दी रदे॥१॥ सौ दिन्य वर्पो ॐ पू दोने 
दिव्ये वर्शते पूर यदा ते न स्यजन्ति तम्‌ । | पर भी उन्दने उनको न छोड़ा शरौर भोति पूवक 
तलीत्ा सरसस्तस्य एनिमारकाः॥१९।| सव न मा ताला भ शर पर र्‌े 
दिव्याम्बरधरां ,+ 18. ३ च श्रर 
ततो ५ चास्पीननितम्बिनीम्‌ । | जये शौर स्तन सन्दर थे भेसी रखी गरो सिये ष 
 नारीमादाय कट्याणीुत्ततार नलानपुनिः ॥२०॥ दन्तागरेयजी जलसे निकले ॥२०॥ उन्होने सोचा षि 
स्ीपननिकरपाटियदेते परित्यक्ष्यन्ति मामितति। | मेरे पास स्री को देखकर ये सुनि मार सुभको 
एनिषुत्रास्ततोऽसङ्गी स्थास्यामीति विचिन्तयन्‌ २१ चड़ जयने जीर पिर भयहा पडा २१। 
थापि तं नि ह फिर भी मुनि कमाये ने छऋपि दत्तात्रेय का -सङ्ग 
तथापि तं मुनिरुता न त्यजन्ति यदा एनम्‌ । | न छोड़ा इसपर उन्दने बदँ उस सरी, के खाथ 
ततः सह तया नार्यां स्पानमथापिवत्‌ ॥२२॥ 0 करना १५६. कर दिया ॥२२॥ जव दत्ता- 
+ ९ + यजी उस शनी के साथ मधयपान कर गीतवा् 
एुरापानरतं॑तेन तत्यजुस्ततः । | शादि प सत हु तो भोग.संसरग से दूषित होने के 
~" भीतत्राध्ादिवनिता-भोगसंसगदूपितम्‌ । | कारण तथा श्रासव शादि ५८ निकारयुकत दोने 
मन्यमाना महात्मानं पीतासप-सविक्रियम्‌ ॥२३॥ क कारण. सुनिकमार उनको चोड ` गये ॥ २३५] 
ष ७ | योगीश दोने के कारण वारणी पीते मी वे, दोष 
नावाप दोषं योगीशो वारुणीं स पिषन्नपि } | को प्राप्न हृषः जिख प्रकार कि सयक किरण शच 
ि न्म श्रौर ्रशुद्ध दोनों स्थानं पर व्यात्त होती दुह भी 
* शन्तावसायिवेश्मान्तमातरिश्वा षसननिव ॥२४॥ दोप फो पातत नदी होती क ॥ २४॥ । 
मदिरा पीते दुष भी खरी सित तपस्या करनेलगे । ` 

एं पवन सपतीकसतपसतपे सयोगपित्‌। | गोमी लोग युति कौ आनलाः करते 

` येगीधरश्िन्त्यमानो योगिभिगुक्तिकादटिक्षभिः२५ || ईश्वरानन्द म निमग्न रहते द ॥ २५॥ ` „ 


` इते श्ीमाकरडेयपुराण मे पिता-पुत्र सम्बादान्तगंत दततात्रेयोदतति नाम सतरह्ां अध्यायः पर्मुप) 


। प-कर , १ 
च अटारह्ां अप्याय 
। ' पचर उवाच. ` ` | सुमति वोला- । ५, ५७ व 
कस्यवि्तथ कालस्य कृतधी्यात्मजोऽन्छनः। | , छदं समय चीतन पर राजा तवीरव,के. स्वं 


तवीय हिव । हितैः सोक पहने पर उसके पुत्र श्रजुन ने मन्तिर्यो, 
कृतवीर्य दिवं याते मन्तिभिः सषुरोहितेः ॥ १ ुरोदितों ॥ ६॥ रीर नगरनिवासिर्ो से. जो कि 


पौरेधात्माभिपेकाथं .समाहूतोऽ्रवीदिदम्‌ । उसके सज्यामिषेक के लिये पकभनिव दं थे, कंदी । 
` नाहं राज्यं करिष्यामि मन्त्रिणो नरोत्तम | |.नि मै.यते,गाज्य को जिसका पमि ग ध | 
यं ते शं तदनिभादन्‌ षां य ॥| कर भिमं क चूल श ज १ 


(५ 
॥ 


मादररयषटराश ` अन १८ 


पएणएयारां उदरं चायं शष्यलच 


द्वायेरक्षिभिभें रक्षित्रे याहि दस्युतः 1३1 


५ 


द्रयादीतायरेषसं उणिनो 


इएत्तिविनालाय ठदाहथोरथम्सिणः ॥ ९। 


विगलरः 


१ से दूरे त्न रा पाल ऋरता वृत्त्यन्तरड्त्ति 

यच्न्येः पाल्यते लोकरूहत्यन्तरसंधितः कते ह रौर दलि का छा माग अण कर यदि 
(9 क, 

गषत = दलिषडभा्मं => दपठेनरवे पजाच्यंरच्छानक्मं ता दह्‌ (च्य दहा नरक्गासा 
गरृक्ठो बलिषड्भागं द्ष्दन्नको धुक्‌ 1६1 - ~ ~ ष 

नरपतिं ~ राः द ःखवेतनम्‌ दुम्‌ ॥९॥ हेता हे ६1 प्रज की र्ता क्तरना रजा काम 

र्पप्‌ द राह ध्व दत्तम्‌ ! ड, यडि चारः की दारी च्दिखेप्रजाकी रान 

श्रक्तयौरदशौव्यं तदेनं सयतभवेत्‌ ॥ ७! इडं ते दष राको ह्येता है ॥७॥ इखल्यि मे 

~ [द पस्य 1 दभिहवित भ यो प्रिपन => 

तस्माहयदि तपस्तप्त्वा भप्स्ये योगिदमीप्ितम्‌ | | स ध 

ध चरू रय जेस सुन्स्वेम प्ता पादन कम प्क चकः 

एव; पालरसासथ्य-यक्त एं महापतिः 1८) वंत ता दे खसान सामर्थ्यं पारदे ८}यदि 


चिल्वां श्द्मान्यस्वटमेवदविसतयुत्ः टमेवद्धिसंयुतः 1 
भदिष्ये नात्सार्रं ङ्रिष्ये = च ^ 
पतो भदिष्ये नात्मानं करिष्ये पापभागिन्‌ ।! ६ 11 का भनी नं बलया 1 ६॥ 


पुन्न उदाचं 
स्य तन्निययं हाता सन्निमध्यसि 


परतां 


{द५प 


उतरत्‌ } 


मो नान महाुदधरंनिशरेषठो दयोऽ्िगः ।९०। 


ब्‌ कत्तुक्ममस्त्व राज्यं सम्यङ्‌  गरस्रापतुम्‌ | 
कषण 
तिः शररुष्व से दच्च रष्व ख॒ ट्त १९ 
{तात मल्लभागं सद्दरोलती इवाभवम्‌ | 


[साराय भूपाल्त पाति यो युवच्छयम्‌ ॥१२। 


पष्क सहभावं सन्त्रे सचटारच्य्‌ 


चब्छारद्च - नगदटुटरव रषप्ताखे 


सह्ठद ॥९१३॥ 


साद्य सहसक्षः ९, भ्रपुतान्‌ पदसात्मनः } 


[ भे 


प्त इरात्मभिरत्य॑जेयानं च दितेः सुतान्‌ 1१९१ 


ह्यमारपिततो ४ व म 
्यमारपयठो ददेचतातयः भदाष्वाच्‌ ! 
ण्यन्वापहूतं देत्यरिनततं भाष रक्तवः ॥९५। 


{१६ "<न 


नानां दानवानाञ्च युद्धमारस्तीत्र सदाल्सस्‌ | 


=| 9 


( 
० 
9 


५ 


| 


स्म्‌ 


+ 21 ‰, 1 भ 


न 
| 
॥, 


|, 
{ 

ध 1 
९ 


च्म 


4 

# {4 ५ 

८ 
| 

„५ 

44 


८4 
०⁄4 ५ 


भ्रखन्पन्न पत्त सला कू दुक्त धथ्वां ता प्क 
सज 


रह दा राव्य करगा अन्यया मे पाप 


# 


उसके इख निश्चय क लाच कर मन्व के ५ 


चीच में वैडे इष्ट सह्य वुद्धिमान्‌, युनिभेष्ट वयोबड 
६ ऋषि येते} १०1; टे राञ्द ! यदि आपको 
अक्र 


भली अन्तर दी राल्य.भाखत करने कय इच्छादैते 
५ क द 

मेरे को सुनकर तदनखार काये करो १९१॥ 
सदहाभागः दन्छानेवयी पक ॐगी वनाकर निवास 


राजस्‌ ! तुम उनकी जो तीना ल्क 
करते है जाङ्नर राधना क्रो 1 ९२॥ 
येएणयुकः 


4 41 
य 
1» 1 


जा छ्तत्या थे संहारा } २७१ 


गकर पकार पतापवान्‌ द्ताञ्ेयती दी देव- ` ` 


तायं ने ्रायघना की चौर किस मकार इन्धने . 


=, दस्य णे 


{ देत्यः का सारकः प्ति कचा पर्श 

¡ € ° 1 

{ सयं चसल्-- 

॥ देवत्तं ञ्मौर = दैत्ये < 

वदाः च र दत्यश्क 7 चड्ा मखे यु द्या 


उनापष्ते इच्छ थे } ९६) उनके परसपर यद्ध को 


श्०१८ ` ` माकरटेयपुराण ` ८३ 


ततो देवाः पराभूता दैत्या पि्जयनोऽभवन्‌ ॥१ ॥ मे दलता का पराजय अौर दैत्यो की विजय इ 
विपरचिततषुखैदषा दानवैसते पराजिताः । | विप्रचित्ति रादि भख देवगरा दैत्योसि पराभित 

| दोकर पलंगयन कर गये श्रौर विजय के विषय मे 
पलायनङ्ृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जये ॥१८॥ निरुत्सादित दौगये ॥ १८॥ श्रौर वै घरदस्पतिजी 


दस्पतिपुपागम्य दैत्यसैन्यवपेष्सवः । 


फे पास जहां वालसिल्यादि तथा अन्य ऋषि भैडे 
हुए थे, दैत्यों की सेना के नाश की रभिलापा से 


अमन्त्रयन्त सरिता वाल्िखिस्यस्तथर्पिभिः ॥१६॥ पटे ॥ १६॥ 
वृहस्पतिरुवाच उृदस्पतिजी वेले-- 


महात्मा त्रि के प्न तपोधन दत्तात्रेयजी का 


तिरतं सन्तोपि श्राचरण यथपि कुत्सित मालुम हेता है, परन्तु 
विङृताचरणं भक्त्या सन्तोषयितुमहंथ ॥२०॥ उनो त अ ९ 


सवो दैस्यविनाशाय षरदो दास्यते बम्‌ । | कैतयोके विनाशक लिये वरदानेगे उसी से देवता 


ततो हनिष्यथ सुरा सहिता देत्यदानवान्‌ ॥२१॥॥| लेग दैत्यो शौर दानवो का वध करेगे ॥ २९॥ 
४ गर्ग उवाच गग वेले- 


इत्युक्तास्ते तदा जखर्द्ता्रेयाभमं सुराः । उनसे चट षदे जाने पर चै वेबगया दत्ताजयके 
्ु 7 जचद # श्रा्रमपर गये श्नौर चदा उन महात्माके ल्मीजी 


दद्शुश्च महात्मानं तं ते स्या समन्वितम्‌ ॥२२॥॥| के साथ व ॥ २२॥ वे सुनि 4 
उद्रीयमानं गन्धैः „ लीन हा रहे थे श्रौर गन्धर्वगण बँ गान कर रदे 
उद्रीयमानं गन्धर्वः ुरापानरतं शनिमू्‌ । थे । देवतानं ने दहां जाकर अपने पयोजन का 


ते तस्य गत्वा मरणतिमवदन्‌ साध्यसाधनम्‌ ॥२३॥ साधने के किये मणाम किया ॥२६॥ श्रौर बहुत ` 


॥ मोज्यस्नगादिकम्‌ भ्रकार से स्तुतिकी तथा सच्छ, मोज्य, माला आदि 
१ स्तवन्चोपनह्‌ भ । | मेड कीं । देवता जाग उनके जाने के साथ चलते 
तिषठन्तमलुतिषठन्ति यान्तं यान्ति दिवौकसः । | थे न्नर उनके वैते दी ैढ जाते थे । देवतान न 
आआराधयामासुरथःस्थितास्तिष्ठन्तमासने ॥२४॥ 


उनके शरासन के नीचे वैठकर आराधना की ॥२७॥. : 
स प्राह प्रणतान्‌ देवान्‌ दत्तात्रेयः किमिष्यते | 


दन्ता्रेयजी ने पभरणाम करते हप देवतार्थं से कटा, 
“श्राप जागो ते जे मुभ उन्मत्त की इतनी सेवाकी , 
मत्तो भवद्नियेनेयं शुषा क्रियते मम ॥२५) 
देचा उचुः 


है सा सुभे क्रया चाहते हो १॥ ९५॥ 
दानवैमुनिशाददल नम्भायंभूवादिकम्‌ । 


देवता वेले- 9 
हे सुनिशाटुंल ! जम्म शरीर भूभुबादिक याक्तसों 
हतं मेलोक्यमक्रम्य क्रतुभागाश् कृतश; ॥२६॥ 
तदप करु दद्धि तं परित्राणाय नोऽनय । 


ने तीनों ज्ञो पर आक्रमण करके हमारा सम्पू 
यज्ञ भाग हरण कर लिया है ॥२६॥ हे निष्पाप ! - 
श्राप हमारी र्ता के निमित्त उसको वध करने ` 
का उपाय फीजिये, जिससे कि हम रपी द्यासे. 
त्वत्मसादादभीम्स्यामः घनः प्रां वि फिष्पम्‌॥ २७) | पुनः श्रपना भाग प्राप्त कर ॥ २७ ॥ 

। दत्तात्रेय उबाच दन्तात्रेय वेले- = ॥ 
मयासक्तोऽषच्छिष्ठो न चैवाहं नितेन्द्ियः । नै खरापान मे रत तथा भंडा खने वाला ह 
कथमिच्छय मत्तोऽपि देवाः शनरुषराभवम्‌ ॥२८॥ 

। देवा उचुः देवता स ५ स 

स्रं नगनाथ ' न स्तेपस्तव वि्ते। हे जगत्‌ के स्वामी ! श्राप निष्पाप तथा ॥ि 
ध है, विचा शरीर क्ञान के पवेश से आ्रापका अन्तः 
वियाक्षालनशुद्धान्त्िरिषकञानदीपिते -॥२९॥ करण शद है ॥ २६॥ 


दत्तात्रेयं महात्मानमषेः पत्रं तपोधनम्‌ । 


* "न ~ 
ल * 


तथा सै जितेन्द्रिय भी नटीं ह! दे देवताश्नो! ¦ 
सुभ उन्मत्त से किख भ्रकार शतु के विनाश की 
इच्छा रखते हो ?।२८॥ | 


ध माकंर्ठैयषुराण अन १८ 


दत्त्नेव उवाच › दत्ताञेय बरो्ते-- हि 
संयटीन ॥ डे वतारे ¦ चह सत्यदहेकिमे ॥ 
पत्यभेतद्‌ सुरा विया ममास्ति समदनः! ¦ _ दे देवत्य : चह सत्य है कि भरे पास सम 
योषितः पङ्गादह्युच्िष्ठतां गतः ३ षि ची ध्वे हे, परन्त इख न्त्री के सद्से मे उच्छ 
0; ताततयेनोयतेषितः 9 | शता चते प्रापद्वैदिणा खी सम्मरोग दोपे मे 
दरीदम्भोगोदि दोषाय सातत्येनोपसेवितः 1 |! सेत्रा कवि जनि के योन्य ल्द द 1 यह बचन 
एवसुक्तास्तत देवाः एुलवंचनसननुवन्‌ ११२ ९॥ खुनजर क्षिर देवताच ने ये याच्य के १३९ 
देवा उचुः | देचता वेल्े- | ५ 
त्रनयेवं जगन्माता दष्यते ड चिभरतर ¦ गरे जयत की मातां निदो जिस 
व्ररथेयं द्विजश्रेष्ठं जगन्माता न दुष्यते) 1 


| 
८. 
3: 1; 


# य -मक्ार कि दयं ऋ क्रिरे त्राह्मर ओर चाडाल 
यथं्ुमाल्ला सुय्यस्य दविज-चाख्डालसङ्धिनी २३२ | पर यक खाय पड़ती हं ॥ २२१ 


एवसुक्तस्ततो देवेदं्रेयोऽत्रवीदिदम्‌ ! |. इख अकार क जाने पर उचेवजी सकर 
¦ उनतञ्मिः खं वाल कि ह दचताच्मय . अषद्‌ श्रप 
महस्य व्रिदशान्‌ सव्यान्‌ यच्च द्ववत सतम्‌ ५२२) लो्यो का यदी सत है तो ।य्य टे भरष्ट देवतान्नो ' 
तदाहुयारान्‌ सर्व्वान्‌ युद्धाय सुरसत्तमाः! | उव रो चे खदध ॐ क्वि यदं दुला लाश्चो 
इहारयतत मटदप्िमेचरं मा यिलस्बत 1२४1 + छर उनका ५ मर इयर करा 1२81 
मददटिपातहुतश््‌ यक्नीरवलतेनसः 1 ५ 
दन स ¢ वं | चीर हो जवे करोर सुरे देखने सेवे नाशको 
येन नाश॒मलेषास्ते भयान्ति मम दशनात्‌ ॥२५।। आघ दने  २४॥ 
यम॑ उत्ाच | गै याले- । 
ठस्य तद्वनं श्रुता दवेदंत्वा महावत्ताः । | ठन्तगेय के चद्‌ वचन नक्र देवताश ने९। 
आनाय समा जववलान कपा ॥३९॥| 1 व 
त हन्यचना दत्तचदचा शत्र भयाठुमः | ¦ कातर दोर उचा्रेय के च्रप्मम म शरणार्थी हे 
दत्चा्रेयाश्रमं लखुः स्रमेताः शरणार्थिनः ॥२७। | कर चये ॥ २७॥ देत्य ओौर देचता लोग 
तमेव विवि्ुदत्याः कालयन्तो दिवौकसः | उत्त्वे के दिक परह तो राकस ने व 
द्ध महात्मानं दन्तावरेवं महाबलम्‌ ॥३८ डी च क ध ध 


चामयखेद्ितामिष्टामदेपजगतां समाम्‌ । उन्कीखलीक्ेजो चन्दधमाक्ने समान सुखे बाती 
भास्यव्वाच्व सुचाच्वद्गा लस्मीसिन्दुनिमानचाम्‌२&! ओर स्ह उन्दी थी देखा 1 २९1 उनकी अरिं 


नीलोदयलामस्वनां पीनश्नोणिपयोधराम्‌ । 


शथैयोधिशतोषताय धे ते मीदी चरी वोलतीं चियोचिष्त 
गदन्ती सधुरां भाषां सचैर्योपिद्रररौः क ~ ८ 1 (क 
दन्तं सधु भ्‌ ॥ गुखयताग्र्‌ 12 ॥ ख्व खुं चे कत थीं पना. दैत्य लोन उस खी 


ते ती दृद्रागतो दस्याः चामिल्लाषा सनाभय 
मेव्रच्छतं भ्यान्सनश्रा योडमातरः \४१। 
1 यर्वा दवान्‌ खयं तान्तु दरकामा हतैनसः! 


ऋ पपन दन्तः रसक्तास्त ततोञ्त्रदन्‌ 1४२) 


स्तर त्नमतन्‌ चलच्यि पार्‌ नां याद्‌ च भवट्‌। 


दतटच्यन्वत, सन्त इति "1 भावितं (1 1४२ | 
तस्माद सव्वं सयुतस्िप्य शिविकायां सरईनाः | 
आनोप्य स्वमधिष्ठानं चयाय इति नियिताः 1४४ 11; इस भज्रार क्सो ने निश्च क्रिया ए) 


----- न ०० भु 


को देखन्तर ' मुक्त दोर्ये ौर उसको भा 
त्यी चअतुरत्पःमे चेय च्छो खोने लगे 1४२॥ 
देवताच को द्ोडक्रर वे वेजहीन होकर उस ख 


(८41 ^ / | 
2 | 2 \ 


कर 


1 


५५ 


हरर करने ऋ इच्छा कूरतेलगे श्नौर उस पाप. 
प्येतकर अपर मे बोत्ते !७ग्दा तीन लोकों भं ` 
! चह खी रत्न खार ख्य दै, यदि यह दमासै हे ` 
जादच्य्‌ 


॥ 


जाय तो दम कृताथ ह्ोजाेगे ! यही हमारे मन . 
¦ ऋ भावना दे ॥७३॥ च्छल्यि हम सव्डससखी - 
¦ चे पालक्री पर वैडाकर अपने स्यान. ले चल . ( 


श्र° १८ साकरुडेयपुरांण ८५ 


| गमं उवाच गम बल्ते- 
साुरागास्ततस्ते तु पोक्ताशेत्थं परर.रम्‌ । आपस मै इस तरह एक दृसरेसे कटक दैत्य 


तस्यतां योपितां साध्वीं समुत्क्षिप्य स्मरार्ता ४१। उस साध्वी खोको कामदेचके वशीभूत हो लेश्राये 
शिविकायां समारोप्य सरिता दैत्यदानवाः। | ॥५५॥ श्रौर उसको पालकी भे वैटाकर खव दैत्य व 


शिरः शिविकां ययुः दानव उस पालकीको शिरपर रखकर श्रपने स्थान 
शिविकां तवा सवस्थानाभिुखं ययुः॥४९॥| की शरोर चले ॥४द॥। फिर दत्तात्रेय ने सकर देव- 


दत्ताननेयस्ततो देवान्‌ बिहस्येदमथानवीव्‌ । | ताँ से कावद कल्याकारीहै कि लब हत्य 
दिष्टया बद्ध दैत्यानामेषा ल्मी; शिरोगता। |ॐ थिर पर गह । ये सात स्थान तक दीक रतीहै 
सप्त स्थानान्यतिक्रान्ता नयमन्यमष्यति ॥४७।॥| शौर नवे स्थान पर टूखरे को भा होती है" ।॥४७॥ 
देवा अः देवता घोल्े- 
फथयस्व जगन्नाथ केषु स्थानेष्ववस्थितो । हे जगत के 1 ये तो किये कि किनि 
॥ स्थानों पर लद्पी पुरुपोको ऋया-क्या फ़ल अच्छा 
एुरुषस्य फलं फं वा भरयच्छत्यथ नश्यति ॥४८॥ या बुरा देती है १॥ ४८॥ 


दन्तात्रेय उलाच दत्तात्रेय वाले- । 
शरणां पदे स्थिता लक्षमीर्निलयं सम्भयच्छति । जग लघ्मी महप्य के पाँवपर रहती है तो उस 


॥ | = मदष्य के धर धन श्चाता है श्नौर जव कमर पर 
सक््नोश संस्थिता वस्त्रं तथा नानाविधं चु॥9६॥|| स्थित रदती दै तो नाना भकार के चख श्चीर श्रा. 
भूप मिलते द ॥ ४६ ॥ जव युय स्थानों मँ रहती 
कल्रश्च गुहयसंस्था क्रोदस्थापत्यदायिनी ! | दै तो खो प्राति होती श्नोर गोदरे दो तो संतान 
६ भप्त होती हे । मनुष्यो के दयो मे स्थित दोकर 
मनोरथान्‌ पूरयति पुरुपाणां हृदि स्थिता, ५० ये उनके मनोरथो को पूरं करती है ॥ ५० ॥ यादि 
लक्ष्मीलंक्ष्मी 9 पी धन्त नौ के म ॥ 
वतां करटभूषणम्‌। | सदमी धनवान क कए मे भेष्ठ कड करा भूषर . 
ू ५ 1 क होजावे तो भाई, बन्धुः खी तथा पुरवासियों से । 
अभीष्वन्धुदारेथ तथाश्लेषं प्रवासिभिः ॥५१॥| भी 0 दै ॥५१॥ जव ये सुख पर स्थित 
सषातुवाक्यल्लावण्यमाज्ञामयितथां तथा । होती है तो खुन्दर घाक्य, लाबएय, कतित्व रादि | 
खसंस्या कवितवच यच्छत्युदधिसम्भवा प्रदान करती है ॥५२॥ शरोर जव ये शिरपर जाती | 
भुलसंस्या कवित्व्च यच्छतुदधिसम्भवा ॥५२।॥| तो ये उसको दोडूकर दृसरे का श्राय लेती ह । | 
शिसेगता सन्त्यजति ततोऽन्यं याति चाश्रयम्‌। | चकि ५ केशिर ० है ध व 
सयं = र ॥| अभी छोड़ देगी ॥५८३ इसलिये तुम अपने अख 
सेयं शिरोगता र साम्मतम्‌ ५ | जी रद को मारो भरी. 
मष्हयाल्ञाणि वध्यन्तां तस्माटते सुरारयः । | इश्िपात स थ लोग निस्तेज दोगये है रीर परी ` 


न भेतव्यं सृशज्चैते मया निस्तेजसः कृताः । | इरण करे दोप से इनके पुरय दग्य जरर ये पराक्रम 
परदारावमर्पाश्च दग्धपुएया रताजसः ॥५४॥| दीन दोगये दं ॥५४॥ द 
रगं उवाच गर्गं वेे-- 
विविधैर । १ विविध पकार फे अखं से देवताओं 
€ >>. #५ ) । तव प्कानच्‌ क, १ नोगों ५:41 
ततस्त १ दैत्यौ का वध किया चोर लच्मी भी उन लोगों के 


स्या रिनेशरिति नःश्रुतम्‌ ५१ शिर से श्रलग दोकर छन्तर््यान दोगई ॥ ५५॥ 
मू समया समाक्रान्ता तिनु रुवम्‌ फिर लबदमीजी भरकर होकर महामुनि दत्ताघ्रेयजी : 


के पाख गः जिनकी करि दैत्यों के नाश होने 
के कारण भसनत्र चित्त से देवता लोग स्तुति इर 
रहे थे ॥ ५६ ॥ त्ब खव देवता लोम विद्र 


लक्ष्मीोतत्य सम्बाक्ठा दत्तात्रेयं महाडुनिम्‌ । 
` स्तूधमाना सरै सवरदत्यनाशान्धुदान्वितेः ॥५६॥ 


.८६ माकैरुटेयपुराण त्र०. १६. 


ततो देवा ठाघरेयं सनीपिरम्‌ | दत्ताय को णाम करके स्वगं को ग्येश्रौर . 
1 १ पूर्वत्‌ मय रहित द्येकर रने लगे ॥ ५७ ॥ इस . 


नात्तपृष्ठमसुमाह । स १ किये हे यजन ! चदि तुम भी श्रतु रेध्वयं को . ` 
तथा त्वमपि रजन यदीच्छसि यथेष्छितम्‌ । | पराव करने ऋ अभिलापा स्लते हयो ठो सुनि दता 
मर्तुमेश्वव्येमतुलं तृणएमाराधयस्व तम्‌ ॥५८॥॥ च्रेच की सेवा कसे 

इति श्रायाकण्डेयपुराण म मयं वाक्य नाम अररहवा अत्याय समपि 1 


~ध 
दन्नीपवों 
उन्नीसयां अध्याय 
यु उवाच † सुमति बोले 
सथे्वचनं श्रता कार्चवीरययो नरेश्वरः! ।  गनैजी के चह वचन सुनकर राजा कातजीयं 


चर्ुन भगवान्‌ दत्ताय के श्राश्रम को गये च्रौर 
दतताव्रयभमं गता त भक्त्या ससुपूजयत्‌ १।॥ च्य जाकर उनकी भक्ति पृक पूजा की 1९॥ मामे 
की कान इत्यादिको व्रण सम्वाहन इत्याद करक 
` पादसंवाहनाच न॒ मध्वावराहरणेन च। इरण करने लगे श्रौरः उनके ल्लिये माला, चन्दन, 
सकचन्दनादिगन्धाग्बु-फलाच्यानयनेन च ॥ २॥ जल, फल अटि लान लयं ॥ = ॥ तवा अन्न आद 
। ¡ साधना खे सत्कार कर उनका भरा भसाद खानं 
; तथनन्ठाधचस्स्य उच्छि्टापोहनेन च| लगे । इससे सन्तु दोकर सुनि ने उख राजा से 
परव युतिभुये तद्वाच तयेव सः ॥२ र कठा श फिर जिस प्रकार थत्चीन काल मे उन्टों 
| ने देवतां से कहा था किं मै मचपान आदि से 
ययेवोक्ताः पुरा दैवा म्भोगादिङत्सनस्‌ । | कुत्सित है स काकि त जो मेरे 
इसके भोग से कुत्सित दो र्हा दह ॥४॥ 

री चेयं मम पाश्दस्यत्येतद्रोगा ङत्सितम्‌ ॥ ४ ॥ व 
सदैवाहं न मामेचुपयोदधं खमहसि । | सेवा करने ॐ योग्य नदीं हो, मै तुम्हार उपकार 


‡ करने म असमथ तुम शक्ति-सखम्पन्न की 
अशक्तमुयकाराय शक्तमाराधयस्च भोः॥ ४॥ वा नरो न ५ । 


2.2 उत्व 
सुमत वाल्-- 
तेनैवमुक्तो मुनिना स्पृता गगेवेचश्च तत्‌ 1 कर्तनी अजुन ने गग ऋपि के वचनो का 
व स्मरण करके दत्ताेयजी को प्रणाम किया अर 
प्रत्युवाच भ्रणस्यन ्याड्छुनस्तद्‌ | यह चचन वोल्ते ॥ ६ ॥ 
अआज्जुन उदाच सजन ब्राह्ते- 
कि मुं मोहयसे देव खां मायां समुगभितः टे ठेव ¦! आप सुक अच्वे हृष रो अपनी माया 


श्ननधस्त्वं॑तथेवेयं दवी सन्वेभवारणिः 11 ७ ।॥| से क्या मोदित करते है.? आप तथा ये खतरैजगत्‌ 
इत्युक्तः भीतिमान्‌ देवस्ततस्तं भत्युबाच ह ! | को त्यम करने चगल देन निष्पाप दै 151 अजुन 


क्र हने दक्र 
कार्तवीर्यं महाभागं वशीडतमरीवलम्‌ ॥ ८ ॥| नोते पे कढन पर दतातेय भख दोकर्‌ उससे 
ख] महाभाग करतवय , तुमने सुको पृथ्वी 
घरं इृणीष्व गुह्य मे यत्‌ लया समुदीरितम्‌ । तल पर बशीभूत र लियः दै" ॥ ८॥ द राजन्‌ 
तेन तुष्टिः परा जात्न तय्यव मम पार्थिवं ; & ||| चकर तुमने मेरे गु तत्व का वरन कर दिया इस . 


पे च मां पूलयिष्यन्ति गन्यमाल्याहिभिनेराः क चे मे तुमसे परम पसव, तुम चर मांगो 1 ६॥ 
ंसमबरोषारव, मिठाननवान्यसयुतः ॥१०।| सम सुक 1 
1 व स = मासः सद्य, सष्ान्न दे उपासे को ठेते 


माकरडेयषुराण 


मायभनोरमैवीणा-वेु-शं खादिभिस्तथा ॥११॥ जो मनोरम जीण, वेर शंस, बाच, गीत दि से 
| मेरा सत्कार करते दं ॥ ११॥ उनको ओ पुत्र, खी 


तेषामहं परं ष्ट पुत्रदारधनादिकम्‌ । | घन श्रादि से परम संतोष भदान करता ह श्र 
भरदास्याम्यवधातञ्च इनिष्याम्यवमन्यताम्‌ . १२।॥| उनके वैरियों का नाश करता हं ॥ १२॥ क्योकि 
स॒ त्वं वरय भद्र ते वरं यन्मनसेप्ितम्‌। | मन ७ र त ~ इसलिये 
 प्रसादसुञ्ुखस्तेऽहं गुद्यनामप्रकोत्तनात्‌ ॥१२॥ प ल्या किणि मी ॥ १३॥ ५२ ४ 
कार्तवीर्यं उवाच कात॑वीयं बोले 

यदि देव भ्रस्तं तत्‌ भयच्चद्धिएु्तमाम्‌ । हे देव ! यदि श्राप सुक पर प्रसन्न है तो सुभ 
-यया प्रजाः पालये्टं न चाधम्भमवापतुयामू ॥१४॥ 1 
प्रालुसरणे ज्ञानमभतिद्वन्तां रणे । दृसरोकी रच्ता करनेमे तथा समरमे मेरी समानता 
सहस्रमप्तुमिच्छामि बाहूनां लघुतागुणम्‌ ॥१५। कोई न कर सके । मेरी वलवती प्कसदसख भुजाय 
शरसङ्घा गतयः सन्त॒॒शेलाकाशाम्बु-भूमिषु । | दो ॥९५॥ यदि मे श्रकेला पत, आकाश्‌, समुद्र, 
पातालेषु च सर्वेषु वधशवाप्यधिकान्नरात्‌ ॥१६। | {ड व त जाऊ तो बहां 
तथोन्मागमतस्य चास्त॒॒सन्मागदेशकः 1 
सन्तु मेऽतिथयः छाघ्या वित्तदाने तथाक्षये ॥१७॥ 

अनष्ट्रन्यता रषे ममाुस्मरणेन च। 


ष्वलने वालो का मं उत्तम पथ-प्रदशकः दों श्रौर 
मुभे तिथियों को पालन करने तथा दान देने 
त्वयि भक्तिर्ममेवास्तु नित्यमनव्यभिचारिणी ॥१८ 
` दत्तात्रेय उवाच 


की क्षमता दो ॥ १७॥ मेरे राष्र मे कभीधघनका 
नत्र ते कीर्सिताः सव्य तान्‌ वरान्‌ समवाप्स्यसि । 


नाशन हो शौर श्राप मे मेरी शद्ध भक्ति टो ॥१८॥ 
दन्ता्ेयजी बोले 

मलसादाचच भपिता चक्रवत्तीं त्वमीश्वरः ॥१६॥ 

जड उव 


जो कु तुमने वरदान भगे है ते'तुमको सब 
प्राप्त होगे,मेरी पासे तुम चक्रवती राजा होगे ॥ 
सुमति वेले- 

प्रणिपत्य ततस्तस्मै दत्तात्रेयाय सोऽन्जेनः वह सजा अञ्जन उस समय दन्ताय को 
 श्रानाय्य भरती सम्यगमिषेकमणदएत ॥२०॥| णान क आये शर बं आकर साः 
आगताश्चापि गन्धर्वस्तथा चाप्सरसां वराः । न वि 
क्रषयोऽय बरिष्ाच्या सेव्याः पव्बेतास्तथा ॥२१॥| श्रादिक पि तथा मेर आदिक पवत ॥२९ ॥ गङ्गा 
गङ्ञाद्याश्च तथा नयः सयुद्रा जलसंहताः । | दिक नदिय, जलप्‌ सागर प्लन्त श्रादि इक, 
्ायाश्च तथा दृक्ष देवा परै वासवादयः ॥२२।॥| तथा ब ्आादि देवता लोग ॥ २९ ॥ तथा वासुकिं 
वासुकिमयुखा नागा अभिेका्थ॑मागताः । | पल नाग, चात 1 वी स शिः 

, ता््याधाः पक्षिणश्चैव पौरजानपदास्तथा ॥२२॥| दानय कौ छपा से सव का यथोचित सत्कार 
सम्भाराः सम्भूताः सन्ये दत्तात्रयपरसादत, इमा श्रौ शभ लश्च मे देव ब्राह्मणो के साथः॥२५॥ 
ग्रथ सज्ञखना लग्नाः देवैब्रह्यादिमिः सह ॥२४ | दत्तात्रेय खरूप श्रीनारायण ने समुद्रौ, नदियों 
नारायरोनाभिषिक्तो द्ता्रयस्वरूपिणा । श्नौर ऋषियों की सष्टायता से अज्ञेन का अभिषेक 


अण १६ ८७ 


वासी लोग श्र्ुन के शभिपेका्थं श्राये ॥ २३॥ 
सयुर नदीम ऋषिभिः सोऽभिषेचितः किया जो कि अधमं का विनाश श्रौर धमकी 


श्रधम्मस्य विनाशा धम्म॑संरक्षणाय च ॥२५॥ 


द्राघोषयामास तदा स्थितो राज्ये.स हैहयः 


स्थापना करने के हेतु था ॥ २५॥ तव देंहयराज 
श्र्जन ने श्रपने राज्य में स्थित दो यह धोपसा की 


| 
कि हमने श्री दचा्रेयकी छपा से श्रतुल ऋद्धि 


दततात्रेयात्‌ परागृद्धिमेवाप्यातिबलान्वितः ॥२६॥ तथां बल भाक्त किया है ॥२६॥ श्राज से पीठे भेर 


८८ माकण्डेयपुराण अ० १६ ` 


चन्न -------------------------------~------------------~- ~ 


्ममृति यः शसं मामृते न्यो श्रहीष्यत्ति। | ्रतिरिक्त जो को शख रहण करेगा बह चोर, 
हन्तव्य; स मया दस्युः पररहिसारतोऽपि बा । | श्नौर जो कोई किंसीकी हिसा करेगा बह मेरे दवार 

{ धरढन धको भ्रास्तहोगा ॥२७॥ इस श्रदेशके होने पर उस ` 
इत्यात्मे न ॒तदर् कथिदायुधश्टडनरः कवा त 


: तरतेः पुरुषव्याघ्र वभुवोरुःराक्रमम्‌ ॥२८॥|| ओौर समस्त पृथ्वी मे'कार्तवीरयञुन ही पराक्रम 
¦ स॒ एव प्रामपालोऽभृत्‌ परश॒पालः स एव च । 


शील पुरुपसिह दपः ॥२८॥. बह दी प्राम, पष, खेत ` 


¦ पत्रपालः स एवासीष्िजातीनाञ्च रक्षिता ॥२६॥| रौर द्विजातियोके रक्तकहुष ॥२६॥ उन्होने तपसियों 


तपस्विनां पालयिता साथपालस्तु सो ऽभवत्‌ । 


तथा प्रजाके धनके रक्तक दोकर चोर,स्प,श्र्ि,शस 


` दस्यु-्पालामि-शस्ादि-मयेष्वन्धौ निमञ्जताम्‌।३०| आदि के भयसे सवको सुक्त करदिथा ॥ ३०॥ जो 


अन्यासु चैव भ्ानामापत्ु॒परवीरहा । | लोग ्राप्तिमे पड़ते उनकी याद्‌ करते ही ` उनका 


| स एव संस्मृतः सयः सद्रुदतांभवन्दरसाम्‌ । ।३१॥ उद्धार करदिया करते थे ॥२९॥ उदस्तं राजा के रस्य 
, अनषट्रव्यता चासीत्‌ तस्मिन्‌ शासति पार्थिवे । 


मे दरिद्रता नदीं थी। उसने वहुत से यज्ञो के 
समाप्त होने पर बाह्मणेको दक्षिणा दिलवाई ॥३२॥ 
उसने तपस्यायं कीं ओर युद्धम करतव दिखलाये 
उख बुद्धिमान्‌ की सदधि देखकर श्रङ्खिया ऋषि ने 
कदा ॥३३॥ कोद सजा लोग कार्तवीय-की गति.को 


। तेष नीं प्चंगे कि जिनके समान यज्ञ, दान, तप, में 
यह्दनिस्तपोभिवां संग्रामे चातिचेषितः ॥३४॥ को नि हि ॥२७॥ जिस तिथिको ठत राले दता 


दत्ता्ेयादिने यस्मिन्‌ स प्रापि ' रेश्वरः तरेयजी से सथरदि पाई थी उस तिथि को वह सदा 

तस्मिंस्तस्मिन्‌ दिने यागं दत्तात्रेयस्य सोऽकरोत्‌२५॥ दत्तात्रेयजी का यञ कियो करता शा ॥ ३४ ॥ उसीः 
तत्रेव. च भरनाः सन्वास्तस्मिनहनि भूपतेः । दिन श्रपने राजाकी सश्द्धि देखकर सव परजा जन 

तस्यद्धिं परमां दृष्टा यामं चक्रः समाधिना ॥२६॥| भी यज्ञ श्रादि करते थे ॥ ३६॥ इस पकार मदात्मा 

इत्येतत्‌ तस्य माहात्म्यं दत्तात्रेथस्य धीमतः दत्तात्रेय करा जोकि धीमान्‌ खयं विष्णु, चराचर'के 

विष्णोधराचरगुरोरनन्तस्य महात्मनः ॥२७।॥॥/ २ श्नौर अनन्त है, मादात्म्य है ॥ २७॥ चे शाङ्ग 

आरदुमावाः पुराणेए कथ्यन्ते शाङ्गधन्विनः । . | पाणि" व व गदा 

ञरनन्तस्याथमेयस्य शंख-चक्र-गदामृतः ॥२८॥ त द स 

एतस्य परमं रूपं यथ्िन्तयत्ति मानवः | 


1 काजो मनुष्य ध्यान करता है वद सुखी होकर 
ष युली स च संसारात्‌ सथुतीर्णोऽचिराद्धवेत्‌३६॥| शीघ्र ही संसार से पार दोजाना दै ॥३९॥ जिन्दोन 
सदेब वैष्णवानाश्च भक्तयाहं सुलमोऽस्मि भोः । 


ख्यं रेखा का है किं मै वैष्णवों को भक्ति दारा 
येवं थस्य वै वाचस कथं नाभयेज्जनः ।॥४०॥ अति खुल तो फिर लोग क्यों न उनका श्राध्रय 
अ्रधम्भैस्य विनाशाय धम्माचाराथमेव च । 


जे ॥४०॥ वे श्रध का नाश करके धर्म की स्थापनां 
करनेवलि 

ञअरनादिनिधनो देवः करोति स्थिति-पालनम्‌ ॥४१॥ करमते ठ तथा सदधि की स्थिति, पान शौर 

तथेव जन्म चाख्यातमलक . कथयामि ते। 


संहार करते हैँ ओर ्ननादि है ॥४५९॥ इसी.अकार 
तरथा च. योगः कथितो दन्तात्रेयेण तस्य वै। 


पेदभक्त, जपि, महात्मा अलक के जन्मकी कथा. - 

कता द्वं किं जिनसे दत्तात्रेय ने योग कां वर्णन 
पिवृभक्तस्य रानर्षरलकस्य ` महात्मनः ॥४२॥ | किया है ॥ ४२ । 
इति श्रीमाकण्डेयषुराण में दतातरेयीय करण नाम उन्नी शरध्याय समा्च | ' 


तेनेष्टं बहुमिर्यैः समा्षवरदक्षिणैः ॥२२॥ 
तेनैव च तपस्तमं संग्रमेष्वभिचेष्टितम्‌ । 
तस्यद्धिमतिमानञ्च दृष्ट्रा पराहाङ्गिरा युनिः॥२२॥ 
न. नूनं कारचवीय्यंस्य गतिं यास्यन्ति पार्थिवाः । 


~~ ~~ 


५.अ०,२० , १२ माक्णडेश्रपुराण ८६ 


बीपषां अध्याय ` 
` , ङ्‌ उवाच ` * खमंति ( जड्पुतर ) वोले-- ` 
 पा्बभूव महाबीयैः शनुनिन्नाम पार्थिवः । |. दे पिता ! भ्ाचीन काल मे पक मदा लर्‌ 


| ` सजा शुजित्‌ नाम का था कि जिसके यक्ष में 

तुतीष यस्य यक्ते सोमाबाप्त्या पुरन्दरः ॥' १॥ स्वथं इन्द्र ने सोमरसं पान किया था ॥ १॥ उसका 
महावीय | त पुज वद्धा बलवान शरीर , शवुश्रौ क्रा मर्दन करने 

तस्यात्मनो ग वभूवारिग्िदारणः। | व्राला था । छदि, बिम शीर सनद म बह 


वदधि-बक्म-ावस्वरश्ा्विभि; समः ॥ २॥ करमर बरदस्पति, इनदर शरीर श्गिवनी इभार क 
समान था॥२॥ बह राजपुत्र नित्य ही समन 


नवयो-द्धि ~स (भ) पिक्रमः -येिते म # र भसं ४ 
५ 1 १ । श्रचस्था, बुद्धि श्रौर विक्रम बाते रजङुभारो से 
सृपपुत्रो दृषसुतेर्मित्यमास्ते समाहतः ॥ ३ ॥. धिरा गदता था ॥३॥ वै ज्लोग कथी शाख के विचार 
कदाचिच्यास्रसम्भार-विवेकटृतनिश्चयः । | मे, कभी काव्यं चचाम, कमी ाने-वजने श्रौर खेल 


कदाचित्‌ कव्यसंलाप-गीत-नाटकसम्मवै; ॥ ४ ॥ न | स ध ये ॥४॥ तथाच 
8 | ग कमी चौपड, कभी हथियारों की प्क, कभी 
तथेवाकषषिनोदैशच शस्ासचविनयेषु च । हाथियों की लड़ा तथा कभी रथो के चरभ्यास में 


योग्यानिथद्धनागाग्वसयन्दनाभ्यासतत्परः ॥ ५॥| उत्पर रदा करते धे ॥ ५॥ वद राजकुमार रंजश्रों 
रेमे रेनपु्रोऽषौ सरेनद्रतनयेः सह । के व के साथ व प्रकारः व उसीमुकार , 
ययैव हि दिवा तद ¦ रात्रि मे श्रनिन्द पूरवंकं खमय व्य । करता था । 
तात र व ॥९॥ ॥ ६॥ उन क्रीड़ा कएने वालों भँ बदँ ओर भी | 

6 ज-ूप-विशा सुता; । | ब्राह्मो, राजान्नं शौर वैश्यो के समान-श्रवस्या ' 
समानवयतसः प्रीत्या रन्तुमायान्त्यनेकशः ॥ ७॥| वाले लके धीतिपूर्ैक श्राति थे ॥ ७ ॥ छख संमय 
कस्यचित्वथ कालस्य नागसोकान्महीतलम्‌ । | व्यतीत होने पर पाताल लीक से अश्वतरः नामकं , 


कुमारावागतौ नागौ पुत्रावश्वतरस्य तु ॥ ८ ॥॥ नग के दो पुत्र नागछुमार शृथ्वी तल परथायेषा 
भतिच्छनौ तिदो वै दोनो ब्राह्मण ॐ से रुप व्राले, तरुण श्रौर देखने । 


हसतः ९ #५। िजन्मभि ६ + । | खुन्दर नागङ्मार यजछ्कमाों तथा न्य द्विजा- 
व ६ ०, ; ॥ & ॥| तियो के पुरो के साथ ` सम्मिक्तित टोगये ॥ ६ 
विनोदेर्धिविषेस्तत्र तस्थतुः भ्रीतिसंयुतो । वदँ पर इस प्रकार सव राजकुमार तथा उन | 
सर्वे च ते दपसुतास्ते † सतार साथी बाह्मणों चनौर पश्यो श्रादिके पुत्र प्रीति पूवक 
न जतौ जहिं दवाः ॥१०॥ नाना ग्रकार के विनोद मे सत रहते थे ॥ १९॥ तरै ` 
च ५. # स्नानसंबाहनादिकम्‌ । दोनों नागङुमार भी स्नान, चान, वख, छुगन्ध 
वखगन्धानुसयुक्ता चक्रुमागथुभिक्रियाम्‌ ॥११॥| तथा भोजन रादि पक साथ उनके सहित ह । 
्रहनयहन्यन्‌राप्ते तौ च॒ नागङमारकौ । | कप्तेये॥१९॥दिन्ति पिन 0 
। र श्मानन्द से उस राजकुमार के पास श्रते.थ्‌॥ १२॥ , 
भआज॑मतुमेदा युक्तौ भीत्या घलोमेदीपतेः ॥१२॥|| विनोद, हास्य शौर विविध -बातौलाप दते देत 


स च ताभ्यां दृपसुतः षरं निन्शणमाप्तवान्‌। | पक दिन राजङुमार का उन नागपुर से वियोग ` 
विनोदैरविषिपैहास्य-संलापादिभिरेव च ॥१३॥ द्ोगया ॥९२्‌ परन्तु उसने उन दोनो के विन्न: 
विना तभ्यो न वु्ने न सरली न पौ मधु । . | खाया, न पिया श्रौर न खान किया ! तथां न धूमे 
न रराम न जग्राह शाक्ागयात्मगुणंद्ध ये ॥१४॥|| शौर न अपनी उन्नति के निमित्त शीस की चर्चा 
रसातले च तौ रात्रिं बिना तेन महात्मना । | ही की ॥९४। पाताल मै भी वे दोन नागपुत् उसके 
निश्वासपरमो नीत्वा जग्मतुस्तं दिने दिने ॥१५॥॥ विना दिनरात उडी श्वास कतिया कर्ते थे॥९५॥ 


६ 


श्रथ कालिन महता पिता पुत्रावपृच्छत । 
अर्यलोके परा भीतिर्भवतोः केन पुत्रको ॥१६॥ 
ह्रौ न चापि पाताले बहूनि दिवसानि मे। 


 . ा्डयषुयण 


कृ समय व्यतीत होने पर पिता ने. श्रधने दोनों | 


प्र से पर्छ, “ दे एवो ! ठम्डारी. मत्येलोकं मे 


चहुत दिनं से देखताह कि तुम क्ञोग दिन रात 


दिवा रजन्यामेवोभों पश्यामि प्रियदशनो ॥१७॥| मत्यं लोक का ही स्याल रखते टो" ॥१७॥ 


अड उच्च . 
इति पित्रा खयं पृष्टौ परणिपत्य कृताञ्जली । 
्तयुचतुहाभागावुरगाधिपतेः सतो ॥१८॥ 
पुत्रावचतु 


पत्र; शतरनितस्तांत नस्ना ख्यात त्वजः । 
रूपवानाज्जवोपेतः शरो मानी पियंवदः ॥१६॥ 
्नापृष्टकथो वागी पिदटान्‌ मैत्रो गुणाकरः 
मान्यमानयिता धीमान्‌ हीमान्‌ विनयभूषणः॥२०॥ 


तस्योप्वारसम्पीति-सम्भोगापहूरं मनः । 
 भागलोफे शपो लोके न रतिं विन्दते पितः ॥२१॥ 
तद्वियोगेन नस्तात निशा पातालशीतल्ला । ` 


प्रितापाय तत्ङ्गादाह्ादाय रविर्दिवा ।२२॥ 
| पितोवाच 

त्र; एर्यव्तो धन्यः घ यस्यैवं भवद्धिपैः । 
परोक्षस्यापि शुणिभिः क्रियते गुणकीर्तनम्‌ ॥२३॥ 
सन्ति शास्नषिदोऽशीलाः सन्ति सूखा; सुशीलिनः 
शास्शीलसमं मन्ये पुत्रौ धन्यतरन्तु तम्‌ ॥२४॥ 
यस्य मित्रगुणान्‌ मित्राण्यमित्रा पराक्रमम्‌। 
कथयन्ति सदा सत्सु पुत्रवास्तेन वे पिता ॥२५॥ 
तस्योपकारिणः कचिदरवहभ्याममिवाच्छितम्‌ | 
किथिन्निष्पादितं वत्सौ परितोषाय चेतसः 
प धन्यो जीवितं तस्य तस्य जन्भ सुजन्मनः । 
यस्यार्थिनो ने विगुखा मित्रा न च दुबल २७॥ 

४ मदृशहे यद्‌ खुबणादि रत्नं वाहनमासनम्‌ । 

१ यच्चान्यत्‌ भीतये तस्य तेयमविशङ्कया ॥२८॥ 

1 धिक्‌ तस्य जीवितं पुसो मित्राणायुपक्रारिणाम्‌। 

? भतिरूपमङ्ववन्‌ यो . जीवामीत्यवगच्छति ।२६॥ 
उपकार -सुददगे योऽपकारश्च शत्रृषु । 


खुमति वेोले- ` 
इस प्रकार पिता के पृद्धुने पर वे दोनो महाः 


भाग नागराज से इस प्रकार बोले ॥ १८॥ 


पुत्र वेला-- 
हे पिताजी ! श्रजित नाम के राजाकागुत्र 
ऋतध्वज रूपवान्‌, गुणवान्‌ वीर, प्रति्ायुक्त तथा 
मधुरभाषी हे ॥ १६॥ बह विना पूषधी वात का 
यतने वाला, विद्वान, मिथतारुक्तनगएव्रान.चअदद्कार 
रदित, दसस का मानः कणने बाला, विद्यावान्‌ 
लज्जञावान्‌ ब विनय भूषण दैः ॥ २० ॥ उसके स्वः 
हार, प्रेम श्रौर उसके साथ चिदार करने से माय 
मन उसमे श्रटक रा है तथा हे पिता ! हम लोगों ` 
को चिना उसके नागलोक श्रौर' भूलोकः श्रच्छा नदीं 
लगता है ॥ २९ ॥ दे तात ! उसके. विना हमको 
पाताल शीतल नदीं लगता श्रौर उसके सङ्गमे 
हमको इतनी प्रसन्नता होती है जिननी दिन को 
सूयं से ॥ २२॥ 
पिता वेले-- - 
वह सजपुत्र धन्य हे करि डिसका गुण कीतेन 
श्राप लोग परोक्त मे भी कर रदे है ॥२२॥ दे पु ! 
जो शाख को जानकर निःशील्ल दो उखसे सुशील ` 
मुखं अच्ादै, क्योकि शास्र ओर शीलको मै समान 


मानता ह ॥२७ बही पिता पुत्रवान्‌. है कि जिसका ` 


पु श्रपने मित्रके गुशो श्रौर पराक्रम की यथार्थ 
प्रशंसा करता है ॥ २५॥ यदि उसके उपकार करने 
की तम्हारी इच्छा है तो वह कार्यं कमे जिससे 


“तम्हारे शरीर उसके मन करो संतोप हो ॥२६॥ उसी - 


का जीवन धन्य है चौर उसी का जीवन सफल है 


जिसके यहाँ याचक. बिभुख नदीं जति श्रौर जो 


भित्र के लिए दुर्बल न हो ॥२७॥ इसलिये हे पुत्रो | 
मेरेधरमेजो च सवर्णः; रत्न, वाहन, ्रंखन ` 
श्रादि थवा श्रौर मी जो है बह तम निश्ङ्ग 
दयोकरः प्रीति पूवक उसे दो ॥ २८॥ उसके . जीवन 
को धिक्कार है जो. अपने भित्र के उपकारीको 
दोन देने मे बाघा उपस्थित करवा ` है ॥ २६ ॥ जो 
लोग.मिघ्रों का उपकार करते .है तथा शरश को 
भी ्रपकार न कर उपकार करते. है वे.बादरसे कीं ` 


। रखी प्रीति किस प्रकार हई ॥ १६ ॥ मे पातालम 


५ 


ध्र २० माकंएडेयपुराण ६१ 


पो पर्ति भाः पाहस्तसयेच्यन्त तरह. जो दर .अगह वरस्ते. है .तथा -वे-सदा 

दृमेो त च्छनत सदोन्नतिम्‌ २० उञिभील दयि ह ॥ १० `" “भाज 
= भ पुत्राच्च पुत्र वोत ५ 

किं तस्य कृतङ्रुत्यस्य कतत' शक्येत केनचित्‌ | हे पिता} उन छृता्थीं का कोई कया उपकारं 

यस्य सर्वारथिनो गेहे सर्वकामैः सदार्थिताः।३१॥. उर सकता है कि मिनके घर समू श्रथ लोग 


सदैव सये कामनाशः को प्रास्त दोते दै ॥ ३१ ॥ जो 
यानि रत्नानि तदुगेहे पाताले तानि न; कतः रत्न, ब्राहन, आसन, यान, भूषण वख , उनके धर 


ˆ बाहनासनयानानि . भृषरान्यम्बराणि च ॥३२॥ है, वे पाताल मे करीं नहीं है ॥ २२॥ श्नीर निन्ान 
पिङगानं तत्र यश्चास्ति तदन्यत्र न विद्यते । | जो उनफे यदयं है वह कीं दूसरी जगह नदी है । 
महानामप्यसौ तात ॒र््न्देहहू्मः ॥२३॥ दे धित 8 | 
एकं तस्यास्ति कक्तेन्यमसाध्यं तच नो मतम्‌। परन्तु वेट प्रसाध्य है पेखा इमारा.मतहै ¡ भगवान्‌ 

. हिरण्यगभ-गोषिन्द-शब्वांदीनीश्वराइते ॥२४॥ गोविन्दकी पाके विना वह पूरा होना कदन है ॥ 


तथापिश्रोतुमिच्छमि तस्य यत्‌ काय्ययुत्तमय्‌) 1 
असाध्यमथवा साध्यं किं वासाध्यं पिपथिताम्‌ ३५। श्रथवा कणस्य दो ॥२४॥ जो लोग दद॑ 
देवत्वममरेशत्वं ` तपूज्यत्वज्च मानवाः । | ति ६ ३ अगवाद्धितं पाक्त पाकर चत्व शौर 
प्रयान्ति वाञ्छितं धान्यदृददं ये व्यवसायिनः ।२६॥ इन्द्रत्न को भास होकर पूजित होते है ॥ ३६॥ 
नापितं न चागम्यं नामाप्यं दिषि चेद वा । | उचमी रौर जितेन्द्रिय लोगों को उद्योग के आगे 
उद्यतानां मदुष्याणां यतचित्तन्द्ियात्मनाम्‌ ॥२७॥ स्वभ शौर पाताल ङ भी नदीं है ॥ ७॥ जाती 
योजनानां सदश्चाणि ब्रनन्‌ याति पिपीलिकः ह चीरी भी ससं थोजन जा सकती है ज्र न 
ग्रगच्छन्‌ वैनतेयोऽपि पादमेकं न गच्छति ।२८।॥ जाते हप गर्ड़जी एक पग भी नदीं चल सकते ॥ 
भ्रयुक्तानां मनुष्याणां गम्यागम्यं न विचते। | श्युक्त भसुप्यों के लिये गस्य श्रगम्य ङ नदीं है, | 
भूतलं क च धौव स्थानं यत्‌ पा्ठवान्‌ धुवः। | कडा पृथ्वी चनौर कां वैककरट, जिसे उत्तानपाद 
उत्तानपाददपतेः पुत्रः सन्‌ भूगिगोचरः ॥३६॥/ राजा के पुत्र धुव न पाया, € ॥३६॥ इसलिये हे | 
तत्‌ कथ्यतां महाभाग कार्यवान्‌ येन पुत्रको । | बो ! बतास्नो बह ऋय कौनसा दै जिससे बह ' 
स भृपालसुतेः साधूर्येनानरए्यं भवेत याम्‌ ।॥४०॥ राज्छमार तुम्हारा ऋणी दोजाय ॥४०॥ 

 पुत्राब्ततु पच बोले- 
तेनाख्यातमिदं तात पू्व्यहृतं महात्मना । ` हे तात | उस महात्मा सदृतताली राज 


कुमार की कमारावस्था का एक इत्तांत सुनिये ॥ 
कौमारे यथा तस्य त्तं सदृहृ्तशालिन; ॥४१॥ वि 


तन्तु शबरुनितं तात पूष्वं कशचिदिद्टनोत्तमः । ` ' ब्राहमणं जिनका नाम गालव था, पकः उत्तम घोडा 
गालवोऽम्पागमद्धीमान्‌ शीता तुरगोत्तमम्‌॥॥४२॥| तिये हए आये ॥ ४॥ शौर उन्दने राजा से कटा, 
भस्युषाचः च राजानं ` सषुपेत्या्रमं मम । | “हे जन्‌ | मेरे शराश्म पर प्कःअधम पापी दैत्य 
कोऽपि दैतयाधमो सजन विषवंसयति पाप ॥४२॥| कर उपाधि कर] दै, ॥४३। द सिद, शयी 
त्तदरपं समास्थाय सिदेम-वनचारिणाम्‌ । तथा श्न्य टे प॒ व जङ्गली जानवरों का रूप 
ग्रनयेषाञ्चारयकायानामहर्मिशमकारणात्‌ नक 
समाभिष्यानधुकतस्य “ भौन्तपतस्यः ` च |". । धिस्य, याक अथवा मौननती लोगों ॐ. काः 


क्व _____„ क माकंण्देयपुराण अरर 


[1 


----------------------- र लिखते मेरे मनरो दुव होता ~ 
ता करोति वघ्ानि यया चित मे मनः ।॥४५॥| १. अण मीय दी शरपनी कोचािसे ८५ 
५ ५ _-> ~ [श ययपि मै शीव दी ' भरिसे उस 
द 8 «+ तथापि हे ; 
८ कोपाभनिना सयः समर्थस्त्वं षयं नं ठ । | को भस्म कर सकता ह ऽथापि हे राजन्‌ ! यु 
दुःला्नितस्य तपरो व्ययमिच्छामि पाथिब ॥४ | दु से रसित किथे हयं तथ को सरी करने. की 
` एकदा तु भया राजन्नतिनि्विएवेतसा । ' | शल्या व हे जन्‌ णक व अतिखिन्न 
ततहेशितेन 4 चिन्त टोकर पडा हुशा य देखतां था कं बह स्स 
1 व | किथर से आता ड छर क्या करता है 199} उस 
त्‌ स^ ध समय श्राकाश से यद अश्व उतसा श्रौर श्राकाश- 
वाक्‌ चाश्रीरिणी प्राह नरनाथ शरण ता्‌ ॥४८॥| बारी भी हुईं जिसे दे राजन्‌! राप खुनिये ॥४८॥ . 
अशान्तः सकलं भूमेवेलयं तुरगोत्तमः । | यह उततप भोड़ा विना परिश्रमके दी समस्त पृथ्वी ' 
समर्थः क्रानतुमर्ेण तवायं परतियादितः ॥४६॥ की परिक्रमा रने को.खम है श्रौरः इते तमको 
। सुर्य ने प्रदान किया हे ॥ ४९] इसवग गति पातान्त 


पाताल्ास्बरतोयेदु गतिः प तभ नदी कती ४ 
। व चास्य < 4 तिः | श्माकाश जल आदिमे भी नही ₹ हे श्रौर यद 
समस्तदिषु व 9... पव्वेतेष्वपि ॥१०।॥| सव दिशात्रो म जाता इदा पहा पर भी नदीं 
यतो भवलयं सर्मशरान्तोऽयं चरिष्यति । | सकता ह ॥ ५०॥ कथोकि यद्‌ समस्त भूमरडल पर. 


०५ 


अतः दुबलयो नाम्ना ख्यातिं लोके भयास्यति।।५९॥) ञअविभोन्त टोकर भ्रमण दस 0 | 
~ श्यत्यहर्मिशं ५ $ ॥ कुकव्लयाश्च क्ते नाम से जगत्‌ {वस्यात 1 ॥ 
` हिश्यः पापो ५ 4 दानवाधमः । हे विप्रवर 1 जो नीच दैत्य तमको दिन सत, 
तमप्येनं समारह्य॒द्विजभर हनिष्यति ॥५२॥ द्ेशित. करता है रसको.दस रोदे पर बैठकर ह 
शुनिताम मृालस्तस्य पुत्र ऋतध्वजः! | मारेगा जो 1४ राजा एनुजित का पुन ऋतन्नज 
भ्राप्यैतदश्वरत्ज्च रूयातिमेतेन यास्यति ॥५ ३।॥ ३, बह इख शरश्वरल्लको श्रोत कर ख्याति पविगा ॥, 
सों लं खमलुप्रा्स्तपसो विघकारिणएम्‌ ।  इसरयि मै लमहर पस आया ह । दे राजन | तुम 
६ निवारय मुपल भागास यतिर्यतः ॥५४ घरतापशन्‌ दो, तप मे विध्न के कारण का तन 
निवारय भूपाल भागमाहपपतयतः ॥ निवास्य को ॥ ५४॥ इसलिये इस शअश्वरत्न को 
तदेतदश्वरत्नं॑ते मया भूष न्विदितम्‌ । | म लम देता द अपने पु कते श्ज्ञा दो जिसे 
पत्रसाक्षापएय तथा यथा ६ न लुप्यते ॥५५। धम की रक्ता हो" ॥५५॥ रजा ते उसके यष्ट वचनं , 
ख तस्य वचनाद्राजा तं | । | सुनकर. मङ्गल सुहत मे ऋतध्वज को श्रश्व पर 
व भ ¢ -सवार कसया ॥५६॥ न्नौर उसको धमता गालव 
छमेषयत धर्मात्मा गालवेन समं तदा । | के साय ज दिया । बड़ सुनि भी उसको क्तेकर 
खमाश्रमपदं सोऽपि तमादाय ययो इनिः ॥५७॥ अपते आधम को ्ये॥४७॥ ` ~ ` 
इति श्रीमारुडेय० मँ ङुवलयाश्च नामका वीवो अध्याय समाप्त 
-- >< ष 


इकीसवां अध्याय - ऋ 4 
पितोवाच  , | श्रश्बतर न्यगराज बोले-- „ ~ ५ 
गालवेन समं गत्वा दृपपत्रण तन यत्‌ । हे.पुत्नो ! गालवकर साथ जाकर राजङुमार ने 


| ~ ॐ 8 ५ ‰~ ५ कयि +^ 
{ तं तत्‌ कथ्यतां पुत्रौ विचित्रा युवयोः कथा) १ ॥ जो विचित्र काय किये उनको श्रप-कदिये ॥१॥ 
( पुत्र १ 


पुज्ाचूचकुः पु (क । (1 
स॒ गालवाश्रमे रम्ये तिष्ठन्‌ भुपालनन्दनः ।  . बह राजङ्कमार गालव ऋषिके स्मणीक श्राम्‌ 
2 ध मै इहर गया श्रौर वहाँ उसने ब्रह्मषियो ` ॥ 
# 1 + विने ब्रह्मषियों के (<| 
. ९. भन्‌ चकार. ब्रह्मवादिनाम्‌ | २॥। विभ्ना को शान्त्‌. किया ॥२॥ 1 


वीरं इवलयाश्वं तं घषन्तं गालवाश्रमे । उस नीच दैत्य ने श्रपने मद के नशे भ यह न 
मदाबेलेपापहतो ` नाजानादानवाधमः "३। जाना कि राज्मार -ङुवलयाभ्व गालव ऋषि 
ततस्तं गालवं विधं सन्ध्योपासनततपरम्‌ । क दै॥२॥ व बह 
शौकरं भधषयितुरागतम्‌ ॥ ४ ।॥| रत गालव ऋषि को स्वक नो 9 
एनिशिष्येरोलष् शीप्रमारदय तं .हयम्‌ । | सनि-रिष्यों के वताने पर बह राजकुमार शीधही 
 अन्वेधावद्वरादं॑तं चरपपुत्रः शरासनी ॥ ५॥| घोड़े पर चढ़कर धरनुप वार्‌ लेकर उस शकर कीः 
ग्राजघान च वाणेन चनद्राद्धाकारवर्चसा | | तरफ़ दौडे॥ ५॥ श्रौर शरद चन्द्रमा के ्राकारका 
- आकृष्य बलवधापं चारुचि्रोपशोमितम्‌ ॥ ६॥| जो तीच्य बाण था बद खन्द धनुष पर श्टाकर 
नाराचाभिहतः शीघ्रमातमव्राणपरो शृगः। | 0 ५ 
गिरिपादपसम्बाधां सोऽयक्रामन्महाटवीम्‌ ॥ ७।॥ <, शत 1 

६ से ग्क्त महावन की श्रोर भागा ॥ ७॥ वह राजपुत्र 
1 ठरगोऽ्ौ  मनोनवः। | भौ पिता ॐ ्रवशानूलार उस धोड़े पर जो. मनक 
चोदितो ५  पितुरादेशकारिणा ॥ ८ ।।| समान बेग बाला था. उस शक्र ॐ पीछे शीधता 
दतिक्रम्याथ वेगेन भाजनानि सहक्तशः। | से भागा ॥ ८॥ बह शकर वेग से भोगकर सदस 
धरण्यां विद्ते गर्ते निपपात लेघुक्रमः; ॥ & ॥| योजन गहरे एक गर्त मे पृथ्वी के अन्दर धुसगया । 
तस्यानन्तरभेवाश सोऽप्यश्वी वपते; सुतः । |॥ श उसी समय बह च्रभ्वारोही राजकुमार भी 
निपपात महागत्ते तिमिरौधसमा्ते ॥१०।॥| श्रम्धकार से युक्त उस गर्त म उसके पी गया ॥ 
ततो नादृश्यत मृगः घ तस्मिन्‌ रानघुुना । | रजकमार ने पाताल भे पर्ैचकर पकाश तो देखा ¦ 
भरकाशश्च स पातालमपश्यत्‌ तत्‌ नापि तम्‌ ॥११॥| परन्ठ॒ उस शकर रूपी शिकार को न देखा ॥ ११॥ 
ततोऽपश्यत्‌ स॒ सौवणे-भासादशतसंकुलम्‌ | | उनदनि वा छवरका एक खुन्दर महल जो रुर 


ॐ , 1 
पुरं प्राकारशोभितम्‌ ॥१२॥| ॐ सदश था देखा ॥१२॥ बरहा प्ुचकर उस नगरम | 
स ५५ उन्दोनि किंसी मनुष्य को नहीं देखा वरन्‌. धूमती 


तत्‌ भविश्य स नापश्यत्‌ तव किशर पर । हई एक स्री पर उनकी दृष्टि पदी॥१२॥ जव उस खी 
भ्रमता च ततो दृष्टा तत्न योपित्‌ त्ररान्विता ॥१३।५ से उसने पृछा कित्‌ कौनदै,कल से राई ? तोउसने | 


सा पृष्टा तेन तन्वङ्गी. परस्थिता केनकस्य वा। | इच क त दिया वरन्‌ महल य च 
= नदरी चद्गहं ॥१४५॥ वंह याजकमार डेको 
नोवाच कित्‌ भासादमारुरोह च मापिनी १७॥| रथव श्रयं से वित दो निक 


सोऽम्यश्वमेकतो बहृष्वा तामेवातुखसार बै । | उसके ष हो सिया ॥९५॥ बहाँ उसने, सोने क 
विस्मयोवूुहनयनो निःशङ्क दरपतेः सुतः ॥१५॥| एक विशाल पलङ्ग पर वैटी इई रती के समान, 


ततोऽप्यत्‌ सुिस्तीरै पर्य स््वकाज्चने। | कामुक पक कन्या फो देखा (४ 
निषण्णां कन्यकायेका + .9 ^| के समान सुख बाली, सुन्दर मोहो खे युक्त ˆ . ' 
निषण्णां कः कामयुक्ता रतीमिव । १६॥| उम स्तन बाली थी । उल होड लाल, शरीर 


विसपष्टन्दुषुखी षभ पीनश्रोणिप्योधर म्‌ खुन्दर श्रौर खं नील कमल के समान थीं ॥१७॥ 
विम्बाधरौष्ठी तन्बद्गी नीलोत्पलविलोचनाम्‌ ।॥१७।॥| उस सके नख ओर श्रंगुलियां लास कमलकर | ५ 
सनस मच । । व 
करोर सुदशनां नीलय्षमस्विरालकाम्‌ ॥१८॥ व व 

तां टा. चारसव्वाङ्गीमनङ्गाङ्गलतामिव । . | घुन्दरी को कंदपैलता की तर देखकर उस राज, : 
सोऽन्य पार्थिषसुतसता  रसात्ेवताम्‌ ॥१६॥ मार ने उसको रसपतल की दैनी समना ॥.१६॥ , 


६४. माकेण्डेयपुराण | श्र०-२१ 
न श मी उस राजछ्मार फे धरः बाले वाल; 
पा च श्घ तं बाला नील्कञ्वितूद्ध जम्‌। | वद वाला २ 3 
गीनोरसन्धवाहं तममंस्तमदनं . शुभा ॥२०॥: सुन्दर ज कन्थे, वाहु रौर कामदेव (म 
उत्तस्थौ च -महामागा वितक्षोममवाप्य सा । | रूप को देखकर ॥२०॥ पलङ्ग से उदी शर चित्त भे 
लल्नापिस्मयदैन्याना सयस्तन्वी वशं गता ॥२१॥॥| क्षोभ को धात्र लजा, विस्मय' शादि से ` शिर. 
क ¢ वा गनत वं _ - . | नीवा कर उसके वशीयूद्‌ दोग ॥ २६॥ ये दे्रता,. 
ऽयं देवो दु यक्षो वा नवच्चा गोरगोऽपि वा|, ; यत्त, गन्धर्व, नाग, विद्याधरं अथवा कोई पुरय-. 
विचाधरो घा सम्प रुयरतिनरः वान्‌ मुषयहै जो यय राद देखा बहे विचार 
एवं विचिन्त्य बहुधा निरस्य च महीतले । .. लगी ॥२२॥ पेखा वहत सोच विचौर करके ` श्वास ` 
उप्थिश्य तते भेजे सा मृच्छ मदिरा ॥२३ || लेकर वह पृथ्वीतलतपर वैठकर मृषि गई ।२॥ 
षोऽपि कामशराघातमवाप्य चतः इतः । | वट राजकुमार भी कामवार से पीद्ित होकर ` 
तां समाश्वसियामास न मतन्यमिति नुषन्‌ ॥२४॥| श्नौर उसको श्राश्नासन देकर कहने लगा कि मत 
षा च स्लीया तदा इषा पूव्व तेन महात्मना] ` | डय ॥२५॥ बह उस खी को मूरचिदयुत ` देखकर पते 
तालहनतसुपादाय ` प्यवीनयदाङ्ला ˆ २४|| से उसकी हवा करने लगा ॥२५॥ बहुत तरह से 
परमार्वास्य तदा पृष्ट तेन सम्मोहकारणम्‌ | ` | श्राश्वासन देकर राजकुमार ने उससे मूच्छ का , 
िचि्ठञ्नान्विता बाला सव्यं ससू न्यवेदयत्‌ २६॥ कारण पूता परन्तु उस खी की लज न ग परन्तु 
पा चास्मे कथयामास दरपपुत्राय विस्तरात्‌ ।'` | श्रपनी सखीको उसने सव हाल वतादियारदाफिर 
प्रहस्य कारणं सव्यं तदशंनसमुदधवम्‌ । | सलीने रजंङकमार को विस्तार पूवेक उस मूर्च्छाका 
पथा तया समास्यातं तद्ृत्तान्तज्च भाषिनी॥२७॥| कारण बताया जो कि उसके दनसे हुई थी ॥२७॥ ` 
वश्वावसुरिति सयात दिपि गन्धन्येराट्‌ भमो। |, स्वगं मँ विश्वाशं नामके गभ्य्ौकां रजा था 
स्येयमात्मना सुभरनाम्ना ख्याता मदालसा ॥२८॥ ५ कौ त्री हे ॥रन॥ `. 
(केतोः सुतशोग्र दानवेऽरिविदारणः । लाम पातालकेतु है जो 4 र 
तालकेतुर्धिस्यातः पातालान्तरसं्रयः ॥२६॥| अन्दर रहता दै ॥२६॥ बह पातालकेतु उद्यान मेँ से , 
नेयमु्ानगता कृतवा .मायां तमोसयीम्‌ । | जरपनी माया दवारा अधेरा करफे स वाला को ले. ` 
स्य मया हीना बाला नीता दुरात्मना ॥३०॥ 1 ० को र 
प्ागामिन्यां त्रयेदः रः 2 
1.11 
पीते ५, - वेद 8 . कु दिन व्यतीत 
अतीते च दिने बालामात्मव्यापादनो्ताम्‌ | , | होने पर यद कल्या द्रात्मयातं करने को कतयार इ 
भरमि; भाह नायं त्वं मास्यते दानवाधमः ॥२३२।|| परनव सुरमि ने रा कि ये नोच .गाक्षस ठुभंको , 
। भ्यलोकमलुप् य॒ एनं छेत्स्यते शरैः \ . नदीं पामेगा ॥३२ ॥ इसको मर्त्यलोके को$ व्यक्ति 


. | बा से वेधित करेगा श्रौर वही शौच हे मष्टा. ` 
| ता ते भत्ता महाभागे चिरेण सबिष्यति ॥३३॥ सगे ! तेरा सामी होगा ॥२२॥ भी द = 
ताहचासयाः ससी नामनं डएलेति मनखिनी । . | जर कुरडल मेरा नपर ६1 मै विध्य की यदी रं 
ता विन्ध्यवतः पत्नी वीरपष्करमालिनः ।॥२४॥| वीर पुष्करा ` की वधू है ॥ २० ॥ पने स्वमी '` 
। ते. मेरे शुम्भेन तीयात्‌ ताीरथमूनुबता । | के शम्ब दारा मरे जने पर पर वा 
व 4 यमुतुत्रता | शम्भ दया मारे जान पर्‌ मं परलोक बनाने क्े ' 

. दिन्यया गत्या परलोका्गुधता ॥२५।॥ किये तीर्थो मे मणःकप्ती हः ॥२५.॥ दुष्र-पात्तलः, 


+ ~ 


 तेंचाहं तत्त्वतोऽन्तिष्य त्वरिता समुपागता | 


" श्र० २१ माकीएडेयपुराण ६५ 


पतारषेतटुटात्मा धारां "वपुरास्थितः! | फेठ को जिसने शकर का रूप. धारण क्रिया -था 
केनापि षिदधो घाणेन गनीनां ज्राणकारणात्‌ ॥३६॥| सी ने मलयो की रता करते हण वारा से वेणा 
7 1३ व्र रां चमी चाया था श्रौर यह स 
देकिग्रिसीने उसे काण से छेदा टै ॥२७॥ दको 
सत्यमेव स केनापि तादितो . दानवाधमः ॥३७);| जो मृच्छ हुई उसका कारण सुनो । तुश्दरे दशन 
हयच मूर्छामगमत्‌ कारण यत्‌ शृुष्व तेत्‌ | भत्रसेदी इसे कन्या को प्रीति उत्पल दो गहै दै॥ 


श्राप देच धृत्न के समान सुन्दर घाणी श्रादि 
त्यि प्रीतिमती वाला दशंनाढेव मानद ॥३८॥ स 


देवपुत्रोपमे चारूबाक्यादिगुणएशालिनि । पुस की होगी जिसने कि गाक्सको छदा ३।३६६॥ 
भाय्यां चान्यस्य पिहिता येन विद्धः स दानयः॥३६॥| इस कारण से इसको यद मदान्‌ दुःख ह्रै श्रौर 
एतस्माद्‌ ऋरणान्मोहं महान्तमियमागता । | जव तक यह जीवित रेगी तव तक शसं दुःख से 


पीडित रहेगी ॥ ४०॥ तुम्हारे ति इसके हृदयमम 
यावज्जीवंच तन्वङ्गी दुःखमेवोपमे्षयते ॥४०॥ म ४ ति व 


त्यस्या हृदयं रागि भक्ता चान्यो भविप्यत्ति। | जीवित रहेगी तव तक यह दुःख रदेगा, कारण 
यावज्जीवमते दुःखं सुरभ्या नान्यथा वचः । ४१।॥ सुरभि का यद बचन अन्यथा नदीं दो सकता॥४१॥ 
अहं त्वस्याश्रभौ प्रीत्या दुःखिताव्र समागता।. | दे थमो ! मै इखकी भीति मे डुःखित दृह चां पर , 
यतो पिरेपो नैवास्ति खसस्रीभनिजदेदयोः ॥४२॥ पदी ह ।तपनी जर इसकी ददम फोर ब्न्तरनदी 


मेपाभिमतं वीरं समभती ह ॥ ४२॥ जच इस शुन्दरी को यथेष्ट | 
वपा वीरं पतिमाभरोतति शोभना । बर मिल जाय तव म निश्चिन्त मनसे तप करू ॥ 


[| ४] व्यलीकेन 
ततस्तपस्त्वह श्या निर चेतसा ॥४२॥ हे महामते ¡ श्राप कौन दै, ओर किख लिये याँ 
तन्तु कोषा किमयं घा सप्मापोऽत्र महामते। | श्रयिदै! र दैत्य, गन्धर्वै, नाग, किन्नर 

देवो दैत्यो ल गन्धन्वेः पन्नगः किन्नसेऽपिवा | द्रादि म से कौन है १ ॥ ४४॥ यद्यं पर मयुप्य की 

वोद श श चेदडमाुपं यु गति नहीं वै शौर न श्यापकी मलुप्यो की सी देद्‌ 
0 ड | ही है! जिस तरह मैने सच-सखय दाल कटा है 
तत्तमाख्याहि कथितं यरथंवावितथं मया ॥४१५॥ उसी तरह श्राप भी किये ॥ ४५॥ 

कुचल्लयाश्व उचानच कचलयाण्व चोप ~ 


यन्मां एच्छसि धर्म्मे कस्त्वं फ वा समागतः। हे धर्मे ! शद्ध मति बाली ! थदि तुम मुभसे 
क पृ्ती हो कि म कौन हँ शौर यहाँ क्यो श्राया 
तच्टखय्वासलमरहगः कथयाम्यादितस्तम ॥४६॥ तो सनो, मर द्दिसेदीकटता ह 1४६॥ मे राजा 


राह शत्रनितः पुत्रः पत्राः सम्भेपितः शुभे! | शरुजित का पुतर्ट छोर पिता का मेजा ह्र, 
र / मुनियोकी सक्ता करताना गालव ऋषिक ्राध्रम 
वयतो मम रप्ाञ्च मुनीनां धम्भचारिणाम्‌। | करते हप सुभे शकर रूप से कोह व्यक्ति विष्न 


५ ¢ ॥ 
मया स विदधौ वाणेन चन्राद्धाकारचसा । - ` | श्रौर वह शीघ्रता से भागा श्रौर मे उसके षी 
श्पक्रान्तोऽपतिवैेन तमस्मयपुगतो ही ॥४६॥| घोडे पर चट्‌ कर वड़ा ॥ ४६॥ ब्रह सहसरा णक 
पपात सहया गत स॒ क्रोडोऽभ्वश्च मामकः । ¦ | कुण्ड में गिरा न्रीर मै भी धोड़े पर चढ़ा दुध्रा 


द ; परस्व उसके पीपी उसी गतम गिर पड़ा रौर शरधेरे 
सेमद्वं समासदस्तमस्येकः परिमम्न्‌ ॥५०॥ म घूमने लगा ॥ ५० ॥ थोड़ी देर बाद जव अकामा 


परकाशमासादितवान्‌ दृटा ` च -भवती मया । , | मिला तो भरने तुमको देखा श्रीर तुमसे शश्च 
पृथा चन मे .रफिचिद्रवत्या दत्तयुत्तरम्‌ ॥५१॥/ किया परन्तु आपने. उत्तर न दिया ॥५९॥. प्ति 


4 ९ __ माकंण्डेयुराण र :अ०.२१ 
= | । ------------ 1 उ पास उत्तम मयने शायां पी पी नै इस उत्तम भवन मै श्यं । .: 
तान्चैवनुनिषटोऽहमिम देव ध ५२।॥ जो कू सत्य था बह मैने कह दिया । न मे देव ह. , 
इत्येतत्‌ कथितं ५२५ द्वा न्नौर न दानव ॥५२॥ दे प्रसन्न मुखं बाली ! मन. , 
न्‌ पक्नगो न गन्धन्वः किमो वा चिस्मिः । | नागै, न गन्धर्व शरीर न क्रि्नरह। हे करडले! ` 
समस्ताः पूञयपक्षा च देवाद्या मम्‌ कण्ठलं । | समस्त देवो को पूजने वाला मै मलुप्य ह, समै 
मलुष्योऽस्मि विशङ्कातेन करस॑व्यात्रं कचित्‌॥॥५२॥ तुमको कोई संदेह नरी करना चादिये ॥५२॥ `` ¦, | 

पुत्ातरचतः । वोले- 4 
ततः प्रहृष्टा सा कन्या सखीबदनघुत्तमम्‌ । वह कन्या यजच्ुमार क! यद चचन सुनकर!" 
ज्जाजडं वीक्षमाणा किंचिन्नोवाच भाविनी ॥५९॥ मसन्न इई ओर पनी संका सुन्दर सुखं देखने, 

। युनरष्येनां मलुवाच ह । लगी परन्तु लजावश कुच न बोली ॥ ५९ ॥ बह, , 
सा सखी पुनर्यन रहा ध सखी. फिर प्रसन्न दयोकरः उससे सुरमि के कथाः “- 
यथावत्‌ कथितं तेन सुरभ्या वचनानुगे ॥१५॥| लुसार कटने लगी ।५५॥ ` क 
। कुरुडलोचाच कुरडला वोली-- प 
वीर सत्यमसन्दिशध भवतायिहितं वचः) | ध } श्रापका कडा ५५ निस्संदेह र । 
ह नगै | सत्य है । इसका हृदय अव क न्य पुरूष की `, 
नान्यत्र हदयन्तवस्या दषा स्यैययं यास्यति ॥५६ देखकर स्थिरता को श्रा न होगा ॥ ५६ ॥. इसकी 
चनसेवाधिका कान्तिः सषठुपैति रविं प्रभा । त 4 ननौर सयं ॐ + 
तिर र इसका रेश्व्य॑ धन्य है । इसके ¶ श्नौर . 
भतिधन्य भरति क्ान्विरभ्येति चोत्तमम्‌ ॥५७॥ शाम्ति उत्तम ह ॥५अ वद पापी नीच दैत्य तुमरे 
लयैव विदधोऽषन्दिश्वं स पापो दानवाधमः । ध ही ५ क व हे । वा गायो 
। । ण्या कटेमी ॥६८॥ 
सुरभिः सागवां माता कथं मिथ्या बदि्यति+५८॥ न ह 0 
तद्येयं स भाग्या च लवस्य समेत्य बै । | दै वीर ! श्रव वह कायै करो जिससे तथिव“ 
कु बीर यत्‌ कार्यं बिधिनेव समाहितम्‌ ।।५६॥| चिवा हो जावे ॥ ५६॥ + 

पुत्ावृचतुः पुत्रं बोले- | क 
परवानहमित्याह राजपुत्रः स॒तां पितः । दे ध 6 ने का क) त यदी. 

ति ३ चाहता + 4 गद्धाय. 

- ताजुदरहे कथं बालां तन्नियोगादते समाम्‌ ॥६०]॥| अना जन्य व ए अ 
भा मा वदेडक्‌ सेत्यां देवकन्येयथुद्ह । | इस देवकन्या का विवाह विधि पूर्वक करो, पेखा ` 
तथेल्युक्तेन तेनेव सङ्घम्योदटादिकं तदा ॥६१॥॥ ₹र्डला ने कदा ॥६१॥ उसने तुभ्बुद नामक उसके ` 
सा च तं चिन्तयामास तुभ तद्लेगुरुम्‌। | द को स्मरणः करियाजो किं समिधा चनौर कृश 

चापि ततृ्षणात्‌ माप्त परीतसमिक्ुशः ॥६२॥ लिये इष एक च मे दी प्राकर उपस्थित होगया, 
स चाप ततत्तपतर रेल ॥| मदालसा की भरीति से शरोर कुरुडला के गौरव से. 
मदालसायाः सम्भीत्या दुएलागौरवेण च । | उसने असनि भरज्वलित कर शौर मन्त्र से हवन र: 

, प्रञ्वारय पावकं हुत्वा मन्तिवित्‌ कृतसङ्गलाम्‌ &२। मङ्गल काय किया ॥ ६२ ॥ उसने वेद की विधि के ‹ 
दैवाहिकपिधि कन्यां प्रतिपाद्य यथागतम्‌ । , | च्रवुखार कन्या का निवाह कर दिया श्र फिर 
जगाम ठपसे धीमान्‌ स्वमाभ्रमपदं तदा ।६४॥॥| वप फरेके लिये शपते श्राश्नमको चला गया ॥६५॥ ` 
सा चाह तां सीं बालां कताथास्मि वरानने । | ससी मदालसां से वोली, “हे सुन्दर, मुल ` 

, संयुक्तामयुनाः श्रा तवामहं रूपशालिनीम्‌ ।॥६५॥ ५ रूपन्ती का इनसे व देल. 

स्यो = घ यै छृताथै दुर" ॥६५॥ अच मँ निर्विंशन मन . 

ऽ्टमतलं॒निव्यैलीफेन चेतसा । . | से श दर यैनं ३ 

~" ९... च - मनि हषी, यथा॥६६॥ ते शे पो नो घो यल ध | 

५ से श्प पां करो धो डाली ॥ द ॥-श्रौर चैने 


्र०२१ १३ माकरेयपुराए | &७ 


~~~ 


तथ्वाह राजपुत्रं सा पमरभरयावतता तदा । | कौ श्च्छा से तथा सदसा ऊ स्वेद भ. विल 


गन्तकामा निजससी-सेहविहटयमापिणी ॥६७॥|| दोकर राजकुमारके भति पिनयपू्ैक कने लमी॥ , 


ग फुणडलोचाच कणडला त | ". न । 
पभिरप्यमित्मह छ्नाप पुर्पों मे कानवान्‌ दै, आपको कोई उप- 

५ नोपदेशो भुवह! देण नदीं देः सकता । भै तो खी, फिर कसि ` 
दातव्यः वियुत श्वीभिरतो नोपदिशामि ते ॥ प्रकारः श्रापक्रो उपदेश दे सकती ह ॥ देत ॥ किन्तु . 


१५००. 


¢ दे शधो के नाश करने बलति ! इस सुन्दर 
मिन्त्स्यास्तुमध्यायाः स्नेहाङृष्टेन चैतसा। | ॐ स्नेह से मेरा ५ ५ ॥ि & रय 
त्वया विश्रम्मिता चासि स्मारयाम्परिप्रूदने ॥६६ ध व ५ कराती व ॥ 0 को 
७ € श्वाय क सदा काभस्णपोप्रण शरोर स्ता 
भक्त्या रक्षिन्या च भाय, हि पतिन सदा । करे । धमै, श्रथ श्नौर काम की सिद्धिम खी पति 
धभ्मार्थकामसंसिद्धयं भाव्या भदसष्टायिनी ॥७०॥| की सदायकः सोती दै ॥ ७०॥ जव चत्री शरौर पुरुप 
यदा भाय च भ्त च परस्परशातुगौ । | ण्ण इ धत € हः भथै र 

५ {जया सद्धतम्‌ काम इन तीनों को प्राप्त करते ह ॥७६॥ हे प्रमो 

५ ८. याणामपि सद्वतग्‌ ॥७१।| भाया थो दोरकर पुरुप किसी प्रकार ` धरम, थं 
कथं भाग्पापृतते धस्यसथ या पुरपः प्रभो | | प्रथत काम की सिद्धि नही कर सकता, कारण 
भ्रा्ोति काममथवा तस्यां तितयमादितम्‌ ॥७२॥| तीनों खी श्र पुरुप के सदयो े दीति ई ॥४२। 
तदथ मर्चरमृते भावा वा एसी भकार भाया भी पत्ति के विना परमाथ सार्धेन 
तेथव भत्तारृत भाय्या धम्मादसाधने | | मे शसम, कारणधम, श्रथै शौर फाम दाम्पत्य 
त समर्था त्रियगोऽयं दाम्पत्यं समुपाभ्ितः ॥७२॥| जीवन मे ही संध सकते दं ॥ ७३॥ दे राजङमार 


देवृता-पिद्-भृत्यानामतिीना दवता, पिनर, शाठ्त्रम॑ तथा श्रतिथियां का 
कमा ५ सार पुरषं स्री के विना नहीं फरसक्ता टै ॥७४॥ 


न पभ; शयते कतत मायया दृपात्मन ॥७४।| यद सलु धनोपानैन कर घर म ठे भी रवि तो 


=^ 


भप्नोऽपि चार्थो भुैरानीतोऽपि निं शृहम्‌। | विना खी फे घट पय को धराप्त होतादि, दमी पकार 
यमेति बिना भासीं कमाययसं्रपेऽपि या ॥७१॥| चदि सी द हो तो भौ धन नाश को मात दता 
। कासि भत्प्णोपरायत है ॥७४॥ यदि उनकी च्छा नयी टो तो दाम्पत्य 
कामस्तु तेत्य नः त्यक्षणोपलक्यते । | श्म का श्रवलम्बन करने से घम श्रादिक तीनों 
दम्पत्योः सहरममेए प्रयीधस्ममवाम्चयात्‌ ॥७६।| पराथ प्रनयनत त दिखाई न ( ॥ (७ | 
रा, यैरतिथीन र + प्रकारः पु से पिता, ्रन्नसश्च ग श्र 
पिन पु्रस्तथ॑वान-साधनरतिथीन्‌ नरः । | पूजा स देवता भरसच्हते है, उसी भकार सावी 


ूलामिरमरंसद्त्‌ साध्वीं मायं नरोऽ्यति ॥७७॥| सी से परप ्रसप दोता दै ॥७७॥ खि मी पति 


पि विना भ्रौ धम्मैकामार्थसन्ततति;। | के चिना धर्म, श्रथ, काम श्रौर सन्तान 0 
च्िया्ापि पिना भचर धम्मेकामाथसन्तत्िः। कि य जवन भे ही 


नव रिय दामपत्यमधिगच्छति ॥५८॥| प्रात्त टोते हैः ॥ ७८॥ थे वाते पन श्राप दोनकि लिये 
ए्तन्पपाक्त युत्रयोगस्यामि च्यु यथेप्पितम्‌ | करी ध, छव न श्रपनी श्या सेजादीःरहं । चम 
यदधः मनया सार्धं धनुत्रखायुपा ।॥७६।| सके साथ धननानः पत्रवान देकर छती रदो ॥ 
परावृतः पुत्र वोले- 6 व 

छख तं ल इतना कहकर वद छुए्डला अपनी खी से 

युक्ता सा परिष्वज्य ससस तं नमस्य च। | ्रालि्न करके तथा राजकुमार `क नमसकार 
जगाम .दविव्यया गत्या यथामिप्रेतमात्मनः ॥८० कारक दिष्य गति से श्रपनी शछालसर चली गहं 
। ध | 1२०} "चह. राजा शचुजित का पुन भी. मरलसा 

सोऽप पतितः, पुत्रस्तामाप्तेप्य तरङ्गम्‌ । . | को प्रथ पर दाकर प्रवाल से जनेः की इछा 


&८ मारस्यषएराण ` भर०२१ 


निगन्तुकामः पातालाष्िह्ातो दयुसम्भवैः ।८१।| करने लमा श्रौर इस वातको दानवोने जोनलियां 


| ० 


ततस्तैः सहसो फिर उन लोगो ने सहसा कोलाहल मचाया कि 
^ सं दियते हतेऽ वै) यष्ट उस कन्यारत्न को जिसको पातालकेतु स्वं 


कन्यारत्नं ५५४ दिवः पातालकेठ॒ना ॥८२॥ से लाया था किये जाता ह ॥ ८२॥ फिर परि, 
ततः परिष-निरखिंश-गदा-शुल-शरायुधस्‌ । | खड्ग, गदा, शल, वाण्‌ शौर राधो को. जकर 
दानवानां वलं भराप्तं सह परातालकेतुना ॥८३॥| दानवो की पक प्रज पातालकेतुके साथ शराडी) 


तिषठ तिष्ठेति जपन्तस्ते तदा दानवोत्तमाः। | वे भयल दैत्य “उर, उदर” ध कदने लगे श्रौर 
[= उन्न रजकः [र शलो य । 
श्ववस्तया शत्षपनन्दनम्‌ ॥८४॥ उन्टोनि राजकुमार पंर अणो रर. श्लों की- षां 


की ॥ ८७ ॥ फिर वलवान्‌ शत्रुजित के पुज . ने 
स च शतरुनितः त्स्तदस्चाएयतिवीययैवान्‌ } | चारों के उस जाल को कौवूदल मात्र से सते 
चिच्छेद शरजालेन प्रहसन्निव लीलया ्‌ दु काट दिवा ॥ ५ रौर च 1 
णेन पातालतलमसिशक््यषटिशायकेः क था । 
छै त वलररोत्करै = 0 चिच्च होकर ऋतध्वज के वाणो से अच्डादितदहो 
ध 1 ४ राया ॥८द फिर उस राजकुमार ने दानवो मे भनि 
ततोऽ त्वषटूमादाय चिप मरति दानवान्‌ । | वार को छोड़ा जिससे त लव दैत्य पातालकेतु के 
तेत ते 1 सव्व सह पातालकतुना ॥८७]॥ साथ ॥*७॥ तीन ज्वाला से टह के सहित द्श्धं 
ऽदालामालातितीव्रं स स्फुटदस्थिचयाः कृताः । । होगे श्रौर कु उस रचि के डर से स्मुददौ मे 
निर्या कापिलं तेजः समासाय ब सागराः ॥८८॥| घुस गये ॥ ८८ ॥ फिर वहः घोडे पर सवार राल- 
ततः स राजपत्रोऽश्वी निहत्यासुरसत्तमान्‌ । | कुमार खव राक्तसोंको मारकर उस सीरतन सहित 
स्ीरत्नेन ससं तेन समागच्छत्‌ पितुः पुरम्‌ ॥८६॥ अपने पिता के नगर मे आया ॥ ८६॥. बँ उने 
भणिपत्य च तत्‌ स्वस तु ष्रि न्यवेदयत्‌ । पिता को रणम कर खव चृत्तान्त ` पाताल भँ जनि 


< श्नौर ुरडला आदि को देखने का उनको सुनो 
पातालगमन्ैव इर्डलायाश्च दशंनम्‌ ।६०) दिया ॥६ना तथा मदालसा की पराति, दानवो के 


तदवन्मदालसामापिं दानकेधापि सङ्गरम्‌ । साथ युद्ध उनका अख दारा वध तथा पुनः 
वधश्च तेषामस्रेण . पुनरागमनं तथा ॥६१॥| बापिख आना आदि सव दृक्तान्त नाया ॥ ६१॥ 
इति शरुत्वा पिता तस्य॒ चरितं चारुचेतसः। | पिता ने भी उसके इख तेजखी चरिज को सुनकर 
भ्ीतिसानभवचेदं परिष्वज्याह चात्मजम्‌ ॥६२॥ स्र दो पुज को छाती से लगाया ॥ ६२॥ तु 
सत्पात्रेण खया पुत्र तारितोऽं महात्मना । | उपा श्र महान्‌ आत्मा बलि पु्से मँ तर गया 


ुनयखाता येन सद्धम्भचारिलः तुमने सद्धमे में भतत, भय से डरे हुए सुनियों की 

ह स पासं एनः ॥६९। रक्ता व ॥६३॥ जो ख्याति मेरे पूजें 44 भ्रा्तकी 
¦ ] ए पुनः । उसको मेने वदाया 1 परन्तु हे बीर ! तुमने उसको 
पराक्रमवता बीर त्वया तद्रहुलीकृतम्‌ ॥६४॥| भी शरपने पराक्रम से अधिकः कर दिया है ॥ ६४॥ 
यदुपाततं यशः पि्ा धनं वीय्य॑मथापि वा | | जिस व्यक्ति ने अपने पिता के संचित क्ये इष 


त्र हापयते यस्तु स॒ नरो मध्यम्‌; सयत; ॥६५। धन, दल तथा यश को उसी भकार रक्खा वह 
रदीवयद्धिकं यस्तु एनत्‌ म व ॥६१ मप्य मध्यम कदलाता हे ॥ ६५ ॥ उसके यश को 
उनरन्यत्‌ स्वशक्तितः । | जिसने अपनी शक्तिसे वद्या उसको विद्धान्‌ लोग 


निष्पादयति तं भराजा; मवदन्ति नरोत्तमम्‌ |॥६६।॥| नरोत्तम कहते ह ॥ 8६ ॥ जो पुज श्रपने पिता के 

यः पत्रा सथुपात्तानि धनवीव्यंयशांसि वै । .. | शर्भित धन, चल श्चौर यश को कम करता है उस ` 
न्यूनतां नयति प्रहञास्तमाहुः पुरुषाधमम्‌ ॥६७।| को.क्ानी लोग थम कडते ह ॥ ९७ ॥ जिस तरह 
त ब्राह्मएव्राणं कृतमासीहयथा खया । मैने बाह्मण की रक्ता की उसी वरह तुमने भी की, , 


प्रण २२ माकर्रेयष्राण ` ६६ 


पातालगमनं यश्च॒ यासुरविनाशनम्‌ । ! परन्तु पातालम जाकर श्रसुरो का नाश करना ` 


एतदप्यधिकं ॥ तमने श्रधिक क्रिया, इसलिये हे त्स ! त॒म घरेठ 
एतदप्यधिकं वत्स तेन त्वं पुरुषोत्तमः ॥६८॥ पुरुष हो ॥ ६८ ॥ इसलिये हे पुत्र ! तम धन्य टो, 


तदधन्योऽप्यथ बाल स्वमहमेव गुणाधिकम्‌ | ठम्दारे श्स ण से मेरे यश फी इद्धि हद, . श्रीरे ` 

ं पत्रमीदशं तम्दारे जेसे पुत्र को पाकर भे -छाष्य तथा पूर्य ` 
तां एत्रमीदशं पाप्य श्ाध्यः पुए्यपतामपि ॥६६॥ | शील दोगया ॥ ६६॥ वह मलुष्य शुके होने ही 

ने स पुत्रतां परीतिं मन्ये प्रामोति मानवः} | से ह नह पा सम कि न बुद्धि ` 
पुत्रेण नात्तिशयितो यः ; कान श्चौर विक्रम को पुत्र ने न बढ़ाया दय ' ॥१००॥ 
धिगृजनम तस्य यः पित्रा ५०० ^ | चमक धि है हिः जरेत मौ 
क " ० ख्याति को न बढ़ाया । जो पिता श्रपते पुत्रसे 
यः पुत्रात्‌ ख्यातिमभ्येति तस्य जन्म ुनन्मनः १०१ ख्याति को प्रात करता है उखका जन्भ सफल है॥ 
६ जो मयुष्य ्रपने किये इण कमो से स्याति फो 
आत्मना ज्ञायते धन्यो मध्यः पिद्पितामहः । | पातत करता है चद भेष ह, मध्वम बह है जो पितो 


ते ४१ 
मादृपसेण मात्रा च स्यातिमेपि नराधमः ॥१०२॥ ५५५ व ६ व ५ 


धनपीस्यैस्तं पिवद्धः पाता है ॥ १०२ ॥ एसलिये. हे पुञ्च | धन श्रौर घल 
ध श्व ध विषद्ध स सतेन च।. को वड़ाता हरा तु सुख से रह श्रौर शस गन्धर्व ; 
गन्धव्वेतनया चेयं मा त्वया पे वियुज्यताम्‌। ।१०२॥ पुनी 1 वियोग न हो ॥ ध ॥ इख , 
वमिं ; पनः प्रन प्रकार पिता कः नषु नाणी से पुत्रका; 
इति पिता न भिक्त छनः पुन; । | सत्कार किया र उसको आलिङ्गन कर भायां, 
परिष्वस्य स्वमावासं सभाय्यः स विसर्जितः १०४॥ क श्रपने रदने 9 म त (0 ॥; 
ष्म्मेत्र पिः वद श्रपनी सरी के साथ श्रपने पिता के नगर 
स तया भाय्यंया सादं रमे तर पठः परे । भै रमण करता रदा तथा श्रनेक चार, उन शरीर ` 
न्ये च तथोधान-चन-पव्वतसायुपु ॥१०५॥॥ पाड पर भी बिहार करता रहा ॥ १ ५९। रौर 
वह सुन्दरी मदालसा भी सास श्वसुर को नित्य ¦ 
पवभु.अ्वशुर्योः पादौ मणिपत्य च सा शुभा । यातःकाल भरणाम करके अपने पति के साथ शर | 
मातः भरातस्तव्तेन सह रेमे सुमध्यमा । १०६॥ उधर विचस्ती रदी ॥ १०६॥ | 


इति श्रीमाकंर्डेयुराणमे वलयाश्च से मदालसा परिणयन नाम इकीसर्वां अ° समाष् । । | 


~= पन - ८ == 
` बाहेसवां अध्याय 
४3 ाद्चलु । नागपुर वो्ते- 
\ ततः काले बहुतिथे गते राजा पनः इतम्‌ |` वहत कातल व्यतीत होने पर रोजा ने फिर 


॥ श्रपने पुत्र से कहा किं शीघ्र जाकर ब्राह्मणों की 
माह गच्छाष् विभाणं त्राणाय चर मेदिनीम्‌ ॥ १॥ रा नमित र्व पर श्नमरण करो ॥ १॥ नित्य 


^~ अश्वमेनं समार्य प्रातः भरातदिने दिने । भ्रति इस धोड़े पर वैठकर ब्राह्मणो को तलाश कर `, 
अवाधा द्विजषल्यानामन्े्टन्या सदैव हि ॥ २॥ के देखो कि उनको फो वाधा तो नदीं है ॥२॥ 
` दुष्ट ताः सन्ति शतशो दानवाः पापयोनयः) | पापयोनि सेव दैत्य है उनसे सुनियो को कोई 
तेभ्यो न स्याहयथा बाधा पुनीनां तवं तथा रं ५२] बाधा न हो पेस्रा उपाय के ॥३॥ उस ाजङुमार 
स ययोक्तस्ततः पित्रा तथा चक दपात्मनः। , । ने वैसा दी.किया जैसा कि उसके पिता न भदे 


^ 44 


१० © 


परिक्रम्य महीं स्वौ ववन्दे चरणी पितिः ॥ ४। 
अहन्यहन्यसुप्राप्ने पएष्वाह्ञं॒शरपनन्दनः । 
ततश शेषं दिवसं तया रेमे सुमध्यमा ॥५॥ 
एकदा तु॒॑चरन्‌ सोऽथ ददश यषुनाते । 
पातालकेतोरतुजं तासकेतुं कृताश्रमम्‌ ॥ ६ ॥ 
मायावी दानवः सोऽथ यनिरूपं समास्थितः 
स॒भराह राजपुत्रं तं॒पृच्धवैरमनुस्मरन्‌ ॥ ७॥ 
राजपुत्र त्रीमि तवां तत्‌ रुष्व यदीच्छसि । 
न च ते प्राथनामङ्गः काय्य सत्यपरतिश्रष ॥८॥ 
-यक्षये यज्ञेन धम्माय कत्तेव्या्च तयथेष्टयः 
-चितयस्तत्र कत्तव्या नास्ति मे दक्षिणा यतः ॥६॥ 
तिः प्रयच्छ मे वीर हिरण्याय खभुपणम्‌ । 


यदेतत्‌ कण्ठलग्नं ते रष चेमं ममाश्रमम्‌ 
1, र्ता करो ॥ १० ॥ जव कि मै जल के श्रन्दर जलो 


यावदन्त्जले देवं परुं यादसां पतिम्‌ । 
वैदिकैरवारोन्तरैः भनानां पृष्टिेत्केः ॥११॥ 
श्रभिष्टय चरायुक्तः समभ्येमीति वादिनम्‌ । 
तं प्रणम्य ततः भरादात्‌ स तस्मे कण्ठमुपणय्‌।१२॥ 
थाह चैनं भवान्‌ यातु निर्व्यलीकेन चेतसा 
स्थास्यामि तावदत्रैव तवा्मसमीपतः ॥१३॥ 
तवादेशान्मदाभाय ` यावदागमनं तव । 

न तेजन कथिदावाधां करिष्यति मपि स्थिते । 
विश्रन्धशात्वरन्‌ त्रह्न्‌ रष्व त्वं मनोगतम्‌ ॥१४॥ 

पुन्ान्रचतः 
एवमुक्तस्ततस्तेन स॒ ममज्ज नदीजले । 
ररक्ष सोऽपि तस्यैव मायापिहितमाश्रमय्‌ः॥१५॥ 
गत्वा जलाशयात्‌ तस्मात्‌ तालकेतु तत्यरम्‌। 
सदालसायाः प्त्यक्षमन्येषाञ्चतदुक्तयान्‌ ॥१६॥ 
तालकेतुरुवाच क 

वीरः वलयाश्षोऽौ ममाश्रमसमीपतः । 
केनापि दुष्टैत्येन इव्वंन र्ता तपस्विनाम्‌ ॥१७॥ 
युध्यसानी यथाशक्ति निध्नन्‌ बरह्मद्विषो युधि। 
माया माभ्चित्य पापेन भिन्नः शलेन वक्षसि ॥१८४, 
भियम्राणेन तेनेदं दत्तं मे. कशएटभूषणम्‌ । 


५. 
~ 
>~ 


४ 
॥ माकरुवयेुसण क ०४३ ० = 


४०२२ 


कियाथा ! वह छव पृथ्वीं की परिक्रमा करफे 
पिता के चरणों मेँ नमस्कार करताथा॥ ४॥ नित्य 
प्रति वह राजछुमार पहन मे श्रमण करता तथौ 
शेष दिन मदालसा के साथ व्यतीत कर्ता था ॥ 
पक वारः उसने धूर मते इए यमुना तट पर पातालं 
केत के भार तालकेठ को देखा जिसने क्रि वेदीं 
पर घ्याश्चम वना लिया था ॥६॥ बह. मायाची 


.दा्ञव मुनि का रूप धारण कयि हप था । श्रपने 


पुराने वैर धो स्मरण करके. चह राजकुमार से 


| बोला ॥ ७॥ हे राजकुमार | यदि त्री इच्चाहो 
तो जो कहता हं बह करो ! मे सत्य क्ता 


वुम्दारी प्रार्थना व्यर्थं न जायेगी ॥८॥ धम की 
सिद्धिकेलियिजो य्न होता है उसको म करना 
चादता हँ परन्तु उसकी दक्तिणा मेरे पास नहीं है 
॥ ६॥ हे वीर | इसलिये दचतिणा के निमित्त श्रपने 
गते का श्राभूषण सको दो श्रौर मेरे श्राश्नम.ङी 


के स्वामी वरुण देवता को वैदिक चारण मन्त्र से 
परजा के हिताथे ॥११॥ शीघ्रता से पूजँ इस भकार 


| सनि रूपी.रा्चख के कहने प्र राजकुमार ने श्रे 


कठ कां श्राभूषण उसको. देकर प्रणामकतियां १२ 
शरीर वोजा कि श्राप निर्चिष्न चित्त से जाद्रये, जव 
तक्‌ मै यहाँ दी श्रापके श्राधम के समीप ठदरगा 


१२ ॥ हे महाभाग ! ` ओपकी श्रान्नाचुसार मेरे 


यहाँ ररते से शापके लौटने तक कोह बाधा न 


होगी । हे बहन्‌ ] इस बात -पर विश्वास करके 


जो आपके मन मे हे वदे शीघ्र कीजिये ॥ १४॥ 


पुज वोल्ले- 


उसके एेसा कने पर वह सुनि नदी के जल 
मुख गया शरीर वह राजछ्कमार उस मायायुक्त 


द्याश्रम की र्ता करने क्षगां ॥१५॥ पिर बह ताल- 


केतु जले से निकल कर मदालसा व शनन्य धर के 


लोगों के पास पर्टचकरः इस पकार कटने लगा ॥. \ 
तालकेत॒ बोला- 


मेरे श्रा्रंम के पास तपखियों की रक्ता करते ` 


इय वीर इबलयाश्व.का किसी षट दैत्य से ॥९७॥ - 
| यशाशक्ति घोर युद्ध ` इमा परन्तु उस मायावी 


राच्चस ने पाप से एक शूल राजङमार-की छाती मँ 
मारा ॥ १८ ॥ मरते समय उस राजंकृमार ने शयने ` 


| कंरठ का यद आभूषर युके दिया तथां शद्ध श्नौर . 
५५.५५ ` स वने ` श्रतापसेः ॥१६॥ तपसियो से 'उस बन मे उसने श्रक्िसंसकार 


` ्र० २९ पीकिरवेयुरोषु , व | ५१ 


छृतात्तहं पाशब्दो वे त्रस्तः | ५ ९॥ उसने षड तशा भ्र्रपू 
श सधां 

नीतः सोऽश्च तेनैव दानधेन दुरात्मना ॥२०॥| घोडे को भौ दम ० ॥ बह सस 

एतन्मया वृशंसेन इष्टं॑दुष्कृतकारिणा । रत्य मुभ निर्द॑यी ने श्रपनी श्रांखों से देखा 


हैः । श्रव उसके वाद की जो क्रिया है वह आप 
कीजिये ॥ २१॥ श्रव हृदय भँ धैर्यं धारण कीजिये 
तथा इरू करखद्यर को लीजिये । हम तपखियों का 
सुव से कोई काम नदीं है ॥ २२॥ 
नाग-पुत्र वोले 

यद ककर श्रौर उस श्राभुपण को धूंथ्वी पर 
रखकर वह चला गया श्नौर जो लोग वहां वैठे ह 
ध बद शोक स श्रातं हो मूर्धत दोकर गिर पड़े 
1२३ ॥ फिर च्चणमें ही दोश में श्राकर सय रनिं 
चसि की खियाँ, राजपत्नी शौर राजा दभ्सी 
होकर चिलाप करने लगे ॥ २४॥ मदालसाने भी 
उस गले के श्राभूपर को देखकर श्रौर श्रपने पतिं 
के मरण को सुनकर तत्काल श्रपने प्राणो को होड 
दिया ॥ ५॥ इसके श्रनन्तर नगर निवासियो के 
घरमे भी मदान्‌ र्दन इश्रा श्रौर जिस प्रकार 
राजा के मदलमें शोक श्रा उसी प्रकार सर्व॑ज शोक 
दा गया ॥ ८६ ॥ प्ति-वियोग मे मदालसा का 
मरण देखकर खस्थ मन होकर राजा परजाजनों 
से योते ॥२७॥ श्राप लोग न रोवे, मै देखता ह 
कि मेरा, आपका तथ इसी प्रकार संसार के सेव 
सम्बन्ध अनिश्चित श्रौर निःसार है ॥२८॥ मै किंस 
का शोक करू, पुत्र का श्चथवा पु-वधूका.? मेँ 
तो दोनों को श्रशोचनीय समश्षकर शअपने'को 
छदां मानता ह ॥ २९॥ मेरी सेवा करते हष `श्नीर 
मेरी श्राज्ञा त ब्राह्मणों की सत्ता मे तत्पर होकर | 
मेरे पुत्र ने त्यु पाई, इसलिये कया वह शोक 
फरने योग्य दै ? जो देह किं निश्चय नाशवानर्‌ है 
वह यदि ब्राह्मणों के निमित्त मेर पुने लोदी तो 
निश्चय दी कल्याणकारी हुआ ॥ २१ ॥ ` ओ्रौर `यद्‌ 
उत्तम दुल म॑ उत्पन्न, स्वामी म रत, जो पति को 
दी ्रनन्य देवता समभती थी ेसी ५. . 


यद्रौनन्तरं त्यं क्रियतां तदफालिकम्‌ ॥२१॥ 
, हृदयाश्वासनज्चेतहेश्यतां कण्ठभूषणम्‌ । 


`` नास्माकं हि सुवर्णेन छत्यमस्ति तपस्िनाम्‌॥२२॥ 
पुावृच 

यक्तयत्छन्य तदुभूमौ स जगाम यथागतम्‌। 
निपपात जनः सोऽय शोकार्तो मूर्ययातुरः ॥२३॥ 
तक्षणात्‌ चेतनां पराप्य सर्वास्ता वृष्योपिततः। 
राजपल्याश्च राजा स॒विलेपुरतिदुःखिताः ॥२४, 
मदाक्तसा तु तदृदृष्रा तदीयं कएठमुपणम्‌ । 
तत्यानाशु भियान्‌ भाणान्‌ शरुत्वा च निहतं पतिम्‌ २५ 
ततस्तथा महा्रन्दः पराणां भवनेष्वभूत्‌। 
यथैथ॒तस्य तपतेः स्वगेहे समवत्तत ।॥२६॥ 

.... राजा च तां मृं षट पिना भरा मदालसाम्‌। 

ˆ प्रत्युवाच जनं सव्वं चिगृष्य सुस्थमानसः ॥२७ 
न रोदितव्यं पष्यामि भवतामत्मनस्तथा । 
स्वैपामेव संचिन्त्य सम्यन्धानामनित्यताम्‌ ॥२८॥ 
किं टु शोचामि तनयं किं यु शोचाम्यहं स्तुषाम्‌। 
विमृष्य छृतढृत्यत्वान्मन्येऽ्शोच्यावभावपि ॥२६॥ 
मच्छुशरपुपढचनादद्विनरक्षणतत्यरः । 
भ्रष्ठ मे थः सुतो मत्यं कथं शोच्यः स धीमताम्‌३०। 
श्रवश्यं याति यदहं तदिद्यनानां ईते यदि । 
मम पुत्रेण सन्त्यक्त नन्वभ्युदथकारि तत्‌ ।॥२१॥ 
दयश्च सकुलोतपन्ना भततर्मयवमचु्रता । 
कयं लुशोच्या नारीणां भर्सुरन्यन्न दैवतम्‌ ॥३२॥ क दै 

` अस्माकं वान्धवानाश्च तथान्येषां दयावताम्‌ । स्ता त स व 

` शोच्या देषा भवेदेवं यदि भ्रां वियोगिनी ॥२३३।॥ जाती ॥३३॥ इख माविनी का बुद्धिमानों .को मरक 
या हु मं शुखा ततू्षणादेव मारविती । | न क चा इवि सम ॥ खन 
भत्तार्मनयंतियं न शोच्यातो पिपधिताम्‌ ॥२३७।॥| खी १. चाये जो विमिली होमः 
ताः शोक्या या बियोभिन्यो न शोच्या या शृताः सट । दो ।सकिर्विपस 0 0 


-.१०२्‌ माकंशदेयपुराण .  अभ्.२२. ` 
क 


| १ । | दोग हो उसका सोच नीं करना चादिये 1 इस 
भरर्धियोगस्त्वनया नालुभूतः कृत्गया ॥२५।॥ को धन्य दै, कारण इसने पतिके'वियोग'का श्रु - 
४ (हि भव ही नदीं किया ॥.२३५॥ खामी इस लोक, तथा 
दातारं स्वंसौख्यानामिह चात्र चोभयोः । | परलोक मे सव खख का देने बाला दै । बह सी 
लोकय; का हि मरतां नारी सन्येत मालुषम्‌।।३६॥ क्था जो पति को साधारण मदुण्य समभे ॥ २६॥ 
ध सेयं ना र ` | अपने पुज का भुभको तथा उसकी माता को शोक 
नासौ शच्या न चैवेयं नाहं तज्जननी न च । | नदीं करना चाद्ये । इसने तो ब्राह्मणों की रक्ता मे 
त्यजता जाह्मणारथाय भाणान्‌ सव्व स्मतारिताः२७॥| भरण त्याग कर हम सबको तारः दिया दे ॥.२७॥ 
वा सतं हामि; उस म॒हामति मेरे पुत्र ने मेरे घमं तथा बराह्मणा की 
[.1;111 भ्रमं धम्मस्य गतस हि भ्‌ | र्ता के निमित्त उस देह कोत्यागा दहे , जिसे. कि 
आदरएयमरध॑यक्तस्य स्यागादेहस्य मे सुतः ॥३८॥| काल हर समय श्राधा सुख मे रखता ॥ ॥ र ॥ 
सतीं मश वैमल्यं शौरमातमनः। ` मेरे वंश मे माता का सतीत्व भी निर्मल है किं 
मातुः सतीत्वं मश मस्य त्मनः। | जिसके शूरवीर पुत्र ने संग्राममे भाणो को चोड 
संग्रमे सन्त्यजन्‌ भराणान्‌ नात्यनदिद्नरकषणे।।३६॥| दिया परन्तु बाहमयोकी रक्ता करना न छोड़ा ॥३६॥ 


फुजादचतः ^ नागपुर बोकज्ते-- ६० 
ततः वलयाश्वस्य माता भत्तुरनन्तरम्‌ । फिर पति के वाद्‌ कुबलयाश्व की माता पुत्र 
॥ ॥ का मरण सुनकर श्पने पति की शरोर देख 
रुत पुत्रवधं तादक्‌ भाह दृषटरा तु तं पतिम्‌ ॥४०॥| कर बोली ॥ ४०॥ ध 
मातोवाच माता बोली- ८ 4 
नमेमात्रान मे स्ल्ञा मापा भीतिचदशी । हे राजन्‌ न तो मेरी माता शौर न मेरी सांस 


4 दी ने इतना यश पाया जितना कि ने मुनियों की 
श्रुत्वा धुनिपरित्रणे हतं पुत्रं यथा मया ॥४१॥| रक्ता करते सपण ष षे सरथ श खुनकरी 
शोचतां बान्धवानां य निश्वसन्तोऽतिदुःखिता;ः। | पाया ॥४१॥ शोक तो उन पुं के लिये करना 
शोचतां बान्धवानां ये निशवसन्तोऽतिदुःखि . | चाद्ये जो रोग से हुखित होकर भरते ह, पेसे 
मियन्ते व्याधिना .हिषटास्तेषां माता थापना ४२॥ पो की माता का सन्तान्‌ उत्पन्न कंरना बथा ही 
संग्रामे युध्यमाना येऽभीता गोद्धिनरकषणे | , | दै।७२॥ सं्ाम मे युद्ध करता हुमा जो निडर हो 
शस्र्िपन्ते ¦ ॥४३ कर गो बाह्मण की रक्ता के निमित्त तीक्ण शख .से 
अर्थिनां मित्रवगंस्य विद्धिषाश्च पराख्पुखम्‌ | ` | बले श्रपने मि तथा वैरि को भी विख. न 
५ लं } | ऋरे, पेते चीर पुत्र से पिता पुत्रवान्‌ तथा भता 
यो .नःयाति परिता तेनु माता च वीरः ॥४४॥| पुज्चती दोती है ॥४४॥ भरस्व भे जो लिय 
गभद्धेशः छियो मन्ये साफल्यं भजनते तदा । क वह ५ सफल होती द जवकि. 
स (ति युद्ध मे उनके पु शन्न॒ को जीते श्रथत्रा , रणस्थल 
यदारिषिजयी वा स्यात्‌ संग्रामे बा हत सुतः ॥४५। 1 
, पत्रावृचतुः नागपुज वोल्ते-- ६, 8 
ततः स राजा संस्कारं पुत्रपत्नीमलम्भयत्‌ । ` फिर राजा शनुज्ञितने श्रपनी पुत्रवधू मदालसा 
निर्ग ¦ यदक्‌ का सत-संस्कारः विःया तथा नगर से बाहर.जाक्र 
१ वहि सातो दौ वाय चोदक््‌॥४९॥| लान व नि 
तालकेठुथ॒ निशम्य तथव ॒यञुनाजलात्‌ । ` | तालकेत ने भी उसी थमुना जल से निकल कर 
राजपुत्रयुवाचेदं परणयान्मधुरं वचः ॥४७॥| रज्छमार खे विनय पूर्वक य व ॥ 
गच्छः - रा  . - | ॥ ४७ ॥ हें राजङ्कमार | तम जाओ, तमसे मे कतः 
18: पालुपुत्र । त 
४ । श 6 ( र व |“ | छ्य इर, श्नौर तुम्दारे यहाँ ्चचल होकर रहने 
-काय्य चिराभिपिति सच्यत्राषचले स्थिते ॥४८॥ से भेरी पुरनी मनोवा पूं इई ॥४८॥ : `, । 


५... 


चिन्तयामास सा वाला मां श्रुता निधनं गतम्‌ । 


अ० २ , ` माकंण्डेयभुराण १०३ 
--------------------------~--- ~~ । 
वारुणं यद्रकाय्येन्व जलेशस्य महात्मनः । ०५ का वारुण-यक्च जिखको कि करने 

| सव्व यन्पमादीदगी री श्रभिलाषा थी, तुम्दासी छपा से वह मैने 
1 सन्वं प्पितम्‌ ।४६॥ गूं किया ॥ ४६॥ ट जभार दस्य 
भणिपत्य स तं भरायाद्राजपुक्छः पुरं पितुः । | करके तथा श्चपने घोड़े पर चकर ओ कि येग मे 


तमेवा गरङ्‌श्रौर घायु षे पिताके 
समार तमेवार्वं .पर्णनिलमिक्रमम्‌ ॥५०॥ शर < ज ,; समान शा अपने पिताक नगर 


इति श्रीमकंरटेयपुराण मे मदात्ससा-वियोग नाम बाईसवां श्रध्याय समाघ्र । 


"--@ञ4ड=~ 
तेहसवां भ्याय 
पषराब्रचतुः नागपुर वोकते-- ध 
स राजणुत्ः सम्भाप्य वेगादात्मपुरं ततः । व र ता स १९११ वि 


तथा मदालसा को देखने की इच्छा से शीध दी 
पित्रोषिवन्दिषुः पादौ दिदशुश्च मदालसाम्‌ । १॥ पते नगर मँ श्राया ॥९॥ उसने देखा कि नगर के 


६ पुरः निवासी उद्धि्न हो रहे है तथा उनके" सुख पर 
ददशं नन्दि पहर ध । | बिपाद के चिह ह । परम्तु रजज्कमार को देखकर 
पुनश्च विस्मिताकारं प्रहृष्टवदन ततः ॥ २॥| वे प्रसन्न-ुख दोगये ॥ २॥ लोग क दूसरे से 


। दिय तिवादिनप्‌ आंखों मै वातं कर रटे थे शरीर “कल्याणा हो 
अन्युू्नयन दिया नम्‌। | “क्यास हो" देखा कद रदे थे । मे णक दूसरे से 
परिष्वजन्तमन्योन्यमतिकोतूहलान्वितम्‌ ॥ ३ \| मिलकर कौतूदलवश हो रे थे 2 ते राजकुमार 


“५ चिरं नीबोरुकर्याण हतास्ते परिपन्थिनः । | से जते धे क ठम्‌ चरन रदो तथा हाय 


कल्याण हो । ठम्दारे श्नु का नाश ष्टो । पिता 

पित्रोः भरह्वादय मनस्तथास्माकमकण्टकम्‌ ॥ ४ ॥| को प्रसन्न करे दमको निष्करटक कीजिये ॥ ४॥ 
इस प्रकार कते इषः नगर निवासी उनको रभि, 

इत्येषंषादिभिः पौरेः पुरः पृष्टे च संृतः। | षी तथा चारों रोर से घेरे हण थे शरीर वह सव 
॥ € को तत्र श्रानन्दित करता हुश्ा पिताकेषरको 
ततक्षणमभवानन्द्‌ः भ्रषिवेश पितु हम्‌ ॥ ५ ॥| गया ॥ ५॥ उसको पिता, माता तथा न्य ांधवोौ 
पिता च तं परिष्वज्य माता चान्ये च बान्धवाः। | ने छाती ध लगाया श्नौर चिरंजीव व य 
॥ कल्यार हो श्स प्रकार कहकर शआ्मशीर्वाद दिया 
चिरं नीवेति रट्याणीददुस्तस्म तदारिषः ॥ ६ ॥६॥ इसके वाद बड माम करे पिता से पून 
भणिपत्य तत; सोऽथ किमेतदिति विरिमतः। | लगा कि यह उदासी क्यो छाई ह दै १ पिता ने 
पमच् पितरं तात सोऽस्मै सम्यक्‌ तदुक्तवान्‌।। ७ ॥| उसको भली भति खव वात वतलाई ॥७॥ च 
सीतां हवये ५ श्रपनी प्रारोश्वरी पत्नी भदालसा का मरण सुनकर 

स भाय्यां तां मृता रुत्व हृदयेषटं मदालसाम्‌। * | तथा माता पिता शौर नगरवासियों को देखकर 
पितरो च पुरो रषटर लल्जाशोकान्िमध्यगः; ॥ < ॥| लला श्रौर शोक के सागर मे इव गया ॥ ८ ॥ वह 
सोन्यने लगा कि उस साध्वी = मेख के 
४ ए ] पते त्याग दिया, 
तत्यान नीनितं साध्वी धिदा नष्ुरमानसम्‌*६॥ 1 करई कमेर 
टृशंसोऽहमनार्योऽदं विना तां मृगलोचनाम्‌ । | हीर स सृगनयनीके क मरे लिगेश्रयने 
मत्कृते निधनं माक्ष यज्जीवाम्यतिनिषरं एः ।।१०।॥| भराणोको त्यागदिया मेरा जीवित रहना अति निषु स॒ 


ुनः स चिन्तयामास|परिसंस्तभ्य मानसम्‌ । | ३।१०॥ वह सोचता हा कमी अपने मनको भ्देवा 


१०४ 'माककरुडेययुराण ०. २३ 


` तरिं मयोपकृतं तस्याः श्ाघ्यमेतन्ु योपिताम्‌॥१२। 


नौर कमी मोहवश दोकरः आतुरता से लम्बी २ 


मोहोद्रममषास्याश निशवस्योच्छवस्य चातुरः॥११।| भवा क्तेता ॥ र 


तेति सा तन्निमित्त त्यजाभि यदि ओचरितम्‌। | मै भी पने पराणो का त्याग करता द तो इससे 
। उसका कुछ उपकार न दोगा श्रौर इससे चखियों मे 
कु प्रशंसा भी न होगी ॥१२॥ यदि दीन होकर 


` यदि रोदिमि वा दीनो हा भियेति बदन यहुः। | "रा पिय, हा पिये" कंह कर रोता ह्रै तो इसमे 
. तथाप्यश्छाघ्यमेतन्नौ गयं हि पुरुषाः शिल ॥१३॥ मेरी प्रशंसा नदं है कारणम पुरुष हँ ॥ १३॥ 


स त्वतः । यद्धि द्ःख से म जड अथवा दीन हो जा च्रीर 
अय शोकनड़ दीनो ना हीनो मर्ता श्रीदीन होकर मलिन दो जाडं तो शप्त दाय 


विपक्षस्य भविष्यामि ततः परिभवास्पदम्‌ ॥१४॥| द्वाया जागा ॥ २९ ॥ शचशरों ऋ नागरा तथा 
मयारिशातनं काय्य राद्गः शुभ्रषणं पितुः राज्ञाजो पिता है उनकी सेवां मुभको करना 


जीवितं तस्य चायततं सन्त्याज्यं तत्‌ कथं मया॥११५।॥| चे । । उनके जीते व ५७३ 
किन्नर मन्ये कर्चव्यस्त्यागो भोगस्य योपितः। | *स जाड ॥९५॥ "कन्तु अन्य ॥ 
। त्याग को भै श्रपना कतव्य मानता ह, यथपि उसे 


प चापि नोपकाराय तन्वङ्ग्याः किन्तु सर्व्वथा॥१९॥| खन्द का मै इससे कोई उपकार नदीं कर शा 


[1 1 ४9 4 ¢ 
प्रया वृशस्यं कत्तेव्यं नपकराय्येपकारि च) ॥ १६॥ नै बड़ा कर ह, उपकारी न होकर मे अपः 
हं ~ ॥ कारी ह) जिसने भेर लिये पाणो को छोड़ दिया 
पा मदथऽ्त्यजत्‌ प्राणांसतदथ्समिदं मम ॥१७॥| उस लिये ये मेरे राण भी चच्छं है ॥ २७॥ 


पुनावृत्वतुः नागपुर वोले- 
एति त्वा मतिं सोऽथ निष्पायोदकदानिकमू। यद मत स्थिर करके उसने मदालसा को 
्रियाश्वानन्तरं कृत्वा प्सयुवाच ऋतध्वजः ॥१८॥ 1 निक 
पएतभ्वजं उवा ऋतध्वज वोक्- . 
पदि सा मम्‌ तन्वङ्गी न स्याद्राय्या मदालसा । ` यदि इस जन्म मे खन्दरी मदालसा मेरी खी 


परस्मिन जन्मनि नान्या मे भवित्री सहवारिणी १६॥ न व अव कोड दूसरीखी मे ५ नकरूगा 
॥१९] म यह सत्य प्रतिज्ञा करता रं कि उस सण. 
तारयत गृगसावक्षिा गन्धेन्वृत्तनयामहम्‌ । नयनी, गन्धर्व-कन्या मदालसा के मरने के वाद भँ 


न भोक्ष्ये योषितं काञ्िदिति शत्यं मयोदिरम्‌।।२०॥ श्रव किसी दूखसै खी से भोग न करूया ॥ २०॥ 


सद्धम्भचारिणीं पत्नीं तां क्तवा गजगामिनीम्‌! | सश्धरमिणी, गजगामिनी उख पत्नी कों , छोडकर 
नम्‌ श्वम किसी खीको श्र्गीकार न करूंगा, यह 


काच्िन्नहगीकरिष्याभी्येतत सतयं योदितम्‌॥२ १।॥| म सत्य कहता ह ॥२१॥ 
पुराद्गचतुः नागपन वोज्ञे- 
परित्यज्य च स्ीभोगान्‌ तात सन्यीस्तया विना। मदालसा के न रहने पर उस शीलसम्पन्नं 
~; _ ~ राजकुमार ने स्री-भोग तथा समान च्रवस्था वालों 
करीड्ास्ते घम्‌ तुर्येवयस्येः शीलसम्पदा । ।२९२॥ के साथ खेलन कूद आदि सच छोड़ दिया ॥ २२॥ 
एतत्‌ तस्य परं काथ्यं तात तद्‌ तेन शक्यते | : | दे पिता { उसके इस गुरुतर कार्यं को कौन करने 


को समथ है । इस दुष्पराप्य कायं को ईश्वर ङे 
कतमत्यथदुष्माप्यमीश्वसः = चिमृतेतरे; ॥२३॥ श्रतिरिक कौन कर सकता दै १।२२॥ 


जद उवाच खमति वेत्े-- 
इति बाग तयोः; शरुत्वा विमषमगम्‌ पिता उन पुत्रो से इस वात को `खुनकर नागराज् 


पिय चाह उनके पिता को इससे क्रोध इञा ओर ' उन्हे 
ष्य चाह तौ भुल नागराट्‌ अहसभिव ॥२४॥ सुसकरते इ शरपे"लदको से कम ॥ २५ “र 


~ 
न 


ह _ 


कम्मएयुद्मशदयोगहान्या हानिस्ततः परम्‌ ॥२५ 
भ्ारभेत नरः कम्मे . स्वपौरुषमहापयन्‌ ] 
निष्पत्तिः कम्मेणो दैवे पौरषे च व्यवस्थिता 


: तस्मादहं तथा यत्नं करिष्ये पु्रकाषितः 


तपशचय्या समास्थाय यथ॑तत्‌ साध्यते चिरात्‌ ।२७)) 
जड उचा 


एवभुक्त्वा स नागेन्द्रः प्लप्षावतरणं गिरेः । 


` तीय हिमवतो गला तपस्तेपे सदुश्रम्‌ ॥२८॥ 


„~~ ~ 


` सोमसंस्था 


तुष्टाव गीर्भिथ ततस्तत्र देवीं सरस्वतीम्‌ । 

तन्मना नियताहारो भूत्वा त्रिसवनाप्लुतः ।२६ 
 श्रश्वतरः उवाच 

जगद्धा्रीमहं देवीमारिरापयिषु;ः शमाम्‌ । 

स्तोष्ये प्रणम्य शिरसा ब्रह्मयोनि सरसखतीम्‌॥२०॥ 


` सदसहेवि यत्‌ फिथिन्मोक्षवचाथ॑यत्‌ पदम्‌ | 


त॑त्‌ सव्वं त्वय्यसंोगं योगवदेषि संस्थितम्‌ ॥३१ 


“ त्वमक्षरं परं देमि यत्रे सन्षे प्रतिष्ठिम्‌ । 


शरक्षरं परमं देवि संस्थितं परमाणुवत्‌ ॥२२॥ 
क्षरं परमं व्रह्म पिश्वन्वैतत्‌ क्षरात्मकम्‌ । 
दारृए्यमस्थितो वह्िभीमाश्च परमाणवः ३३ 
तथा त्वयि स्थितं ब्रह्म नगेदमशेषतः 
श्रकराराक्षरसंस्थानं यत्त देवि स्थिरास्थिरम्‌ ॥३४॥ 
तत्र मात्रात्रयं सव्वमसिति यवि नास्ति च। 
प्रयो सोकाल्नयो वेदास्नविध पावकचयम्‌ ॥२१५॥ 
प्रीणि ज्योति पर्णा प्रयो पर्म्मागमस्तथा । 
त्रयो गुणाश्चयः शब्दास्रयो बेदास्तंयाश्रमाः ॥२६॥ 
प्रयः कालास्तथावस्थाः पितरोऽ्र्गिशादयः 


अम १४ माकंएहेयपुराण १५५ 
का न == > = 
 - नागराडश्वतर उवाचं नागराज श्रश्वतर चोल्ते- 
यद्यशक्यमिति ब्ञात्वा न रिष्यन्ति मानवाः यदि लोग यद मानकर कि थद काम करने मै 


हम श्रसमर्थं है कायंदीन करं तो उनके कर्मका 
उद्योग दिन पर दिन कम दोगा ॥ २५॥ इसलिये 
मनुष्य अपने पौठप के श्रत्तसरि कर्म करे क्योकि 
पौरष से दी कर्मं की निष्पत्ति व्यवस्थित दी गै 
दै ॥२६॥ हे पुरो | इसक्तिये मै तप मे स्थित होकर 
फेला यतन फरूगा कि जिससे ये कायं शीध दी 
सिद्ध हो जाय ॥ २७॥ 
जड़ ( सुमति ) ने कदा- 
नागराज श्रश्वतर यद छने फे वाद्‌ प्लत 

पर्वत से उत्तर कर हिमालय पर्व॑त के तीर्थं पर जा 
कठिन तपस्या करने लगे ॥ २८ ॥ शीर स्तुति, 
भरा्थना रादि चे बदँ देवी सरस्वती को संतुप 
किया श्चौर श्रपना मन उनके चरणों मे लगाकर 


.नियगरित श्राहार करना श्रारस्भ किया ॥२६॥ 


श्मए्वतर नागराज वोले- 

. म जगत की माता शुभ देवी की श्राराधना 
करता टँ रौर अह्ययोनि सरस्वती को शिरसे 
प्रणाम कर उनकी स्तुति करता ह ॥३०॥ दे देवि ! 
सत्‌, ्रसत्‌, मोक्त, श्र्धं संयोगश्चौर योग जो कचं 
है वह खव श्चापसे दी स्थित है ॥ २१॥ टे दैति! 
छप परम श्रक्तर है जिसमे सवं खष्िमात्र स्थित 
है नौर है देवि ! उस परम श्रक्तर म संसार पर 
मारुत्‌ स्थित ह ॥२२॥ रौर श्रत्तर बह्म श्रौर क्षर , 
विश्च मे श्राप उसी प्रकार स्थित ह जिस प्रकार 
फा म शधि श्रौर पृथ्वी मे रेणु ॥३३॥ तथा इखी 
तरह श्रापमे ब्रह्म श्नौर सम्पू जगत्‌ भी स्थितै । . 
श्रापमे दी श्रोकार भी स्थित हे तथी श्ापदी चले 
शरीर ्रचल दै ॥२७॥ हे देवि ! सीन मात्रा श्राप 
ही है] तथा तीन लोक, तीन वेद, तीन विया 
प्रौर तीन अनि ॥ २५॥ तीन ज्योतिष, तीन वर्ण, | 
धर्मशाख, तीन गुर, सीन शब्द, बेद तथा ्ाश्नस 
॥३९६॥ तीन काल तथा अवस्थाय, पितर तथा दिग 
रान्नि छरीर तीन मातायं । है देवि खर्खती } अषप 


एतन्मध्रात्रयं देवि तव रूपं सरस्वति ॥२७॥ का दी रूप दं ॥ ३७॥ विभिन्न दभिरयोके लिये 


विभिनेदर्धिनामाया ब्रह्मणा हि सनातनाः 
“पस्था पाकसंस्थाश सप्त या\॥३८॥ 
तास्वदृश्वारणादिवि क्रियन्ते ` ब्रह्मादिभिः । ` 


श्राप श्राय, जह्य श्रीर सनातनं । चन्द्रमा, दयि 

द्भौर पाक श्रादि जेः सात उद्धारण ॥ ३८ ॥ ब्रह्म 
वादियों द्वार किये जाते दै बह सव आपषद्ीहं | 

श्रापका स्थान अनिश्चित है तथा घाप श्रद्धात्र 


अनिर्देश्यं तथा चान्यदद्ध म्राम्धितं परमं ॥२६॥ से युक तथा सखे पर दै ॥३६॥ शाप विकाररदित 


१०६ , ` मागषण .; व्रर्‌ ~. 


स दहै । अतः नै 
परिणामविदर््जितम्‌ ! !-धक्तय, दिव्य ओर परिणाम रदि 

भ्विकाय्यक्षयं द्यं परिणाम मयोदितम्‌ म्‌ | | श्रापके इस परम .रूप का बरन नहीं .कर. सकता; . 

तवैतत्‌ परमं पं यन्न शक्यं मयादतुम्‌ ¦ छरगर मेरी जिह च होढ तककरेदातोभीमें पसा 

न चास्येन च तज्निहा-ताम्रोष्ठादिमिरुच्यते.॥४०॥ करने मे रसम ह ॥४०।४्द्‌/ बसु;बह्या. चंदमा 


हनद्रोऽपि वसवो ब्रह्मा चन्द्रक ज्योतिरेव. च! | सर्व, ज्योति भी ५ दी ५८ । समस नि 

.‰ विश्वासं विश्वेशं ॥४१।॥ का स्थान श्राप मे हे, आप विश्वरूप, विश्वेश 
विश्वासं विश्वस बिष परमेश्वरम्‌ । + परमेश्वर हे ॥४९॥ सांख्य, वेदात शरीर वेदों 
सांख्यपेदान्तवादोक्तं बहुशासास्थिरोकृतम्‌ की.शाखाश्रःनेः यह स्थिर किथाःहै। श्राप शादि । 
प्रनादिमध्यनिधनं सदसन्न सदेव यत्‌ ॥४२॥|.मध्य श्लौर न्त से रदित है श्रौर.. जिस भकार 
एकन्तवनेकं नाप्येकं भवमेदसमाश्चितम्‌ । श्राप सत्‌ से र 1 ध ष ॥ 
विगुखाभयम्‌४३| आप्र णक. तथा है श्रौर एकः नदीं भीष 
व | ॥ संसार का चेद पमे श्चाधित दहै! श्राप श्रवणै- 
सुखासुखं सहासौख्य-र्पं त्वयि विभाव्यते ।*४४॥ 


'नीय-हं तथा षटेगण, चासो-चयं च्रौरः -त्रिरुशःसे 
युक्त है ॥ ४२॥ श्राप नाना शक्ति से संपन्न तथा 


एवं देपि त्वया व्याप्तं सकलं निष्फलंच यत्‌ । | पक १ ५ ननोर -मदा- 

यैतावस्थितं ~ ते व्यवस्थितम्‌ ॥९१५।। खख. च्राषदद.का स्प ञ्रापमट स्थित ह. ॥.४७ ॥ ह्‌ 

या पिननि वते ` | देवि ! संपृणं खि श्राप ही मे व्याप्त है तथा श्रपि 
८ 


छद्वैत हैं श्र दैत-की व्यवस्थाभी ्ापमेंदीहै 
॥ ४५॥ जो श्रथ, नित्यः, . अनित्य, स्थूल, सूम - 
, [-श्ति खद्म शरादिः या जो.कुलु पृथ्वी म श्रथवा ) 
तेषां तेषां तत्त एवोपलब्धिः ॥४६॥` | श्राकाश मै दै .उसकी उत्पत्ति श्राप दी से दै .॥४ 
` यच्चामृत्त यच्च मृत्त समस्त “| -जो कच-मूक्त, असूरे, समस्त अथवा सव मतो । 
यद्रा भतेष्वेकमेकच किंचित्‌ । मे एक शीर नेक है रौर जो ` च्ाक्राश, पाताल, 
यदिन्यसति श्मातले खेऽन्यतो वा | श्नौरः पृण्वीः्रादि है अथवा खरः-छीर ` व्यञ्जन इस. 
त्वत्सम्बन्धं त्वतस्वरव्यज्ञनश ॥४७॥ | सवका .शापसे संबन्धः दै ॥ ४७.॥ इस प्रकार स्तुति, 
`एवं स्तुता तदा देवी विष्णोजि्ा सरस्वती.। ` -|-किि जाने -पर विष्य की जिहा देवी सरखती 
भस्युवाच सृहास्मानं नागमश्वतरं ततः ॥४८॥ महात्मा नागराज श्रश्वतर से बोलीं ॥४८॥ 
सरस्नत्युवाच , [-खर्लती वोली- 
षरं ते कम्बल्रातः पयच्याम्युरमापिष । हं कस्बलके धता नागराज ¦ तुम्दारकल्याण 


हो । जो कद्ध तुम्हारी ्रमिलापा है वह मागो, मैं 
, तदुच्यतां प्रदास्यामि यत्‌ ते मनसि वर्तते ।४६॥| तुमको वरः गी ॥७६॥ । 
अश्वतर उवाच 


| अश्वतर .चल-- 
सहायं देहि देवि त्वं पूल्वं कम्बलमेव मे । 


.. | , -हे देवि } जिख. प्रकार तुमने पिले कम्बल.को (9 
खहायता दी थी उसीपरकार मेरी भी सहायता कसे 
-समस्तस्यरसम्बन्धुभयोः सम्पयच्डं च ॥५०॥ 
सरस्वतःबाच 


सुको सम्पू स्वर न्रोर संम्बन्धों का -ज्ञान 
सप्त स्रा ग्रमरागाः सप्र पन्नगसत्तम | 


म्रदान करो ॥ ५०॥ 
गीतकानि च सप्तव तावरीधापि मूच्यैनाः.॥५१। 


सरस्वती. बोली-- 
हे नार'राज ! सातो स्वर, सातो राम, सग, ,, 
-वालाभेकोनचाशत्‌ त्तथा ्रमत्रयंच यद्‌ । 


ये वा स्थला ये च सुष्मातिधुश्माः 
ये वा भूमौ येऽन्तरी्ेऽन्यतो षा 


सातो गीत श्रौर खातों मूर्छना ॥ ४१ ॥ उन॑चास 
 ¡ ताल, तीन प्राम, जैसे कि कम्बल को. पपर है. बेसे 


अश्र माकैरेयधुीणः १०७. 


एतत्‌ सव्वं मवान्‌ माता कम्बल तथानघ ॥५२।॥| दी तमको दगे.॥ ५२॥ है नागराज ! मेरे भसादसे 
ज्ञास्यसे. मत्सदिन भुञगेन्धापरं तथा। | ठमको चारों पद, तीनों ताल तथा तीनों लयो का 
चतुर्यिधं पदं तालं त्रिपकारं लयत्रयम्‌ ॥५३॥| भी कोन प्रात दोगा ॥४२ दे नागराज ! तीन यति ` 
यतित्रियं तथा तो मया दत्तं चतुध्विधम्‌। | शरीर चासो प्रोटक भी मैने ठुमको दिये, तथा मेर 
एतद्भवान्‌ भ्मसादात्‌ पन्नगनद्ापरंच यद्‌ ५॥४४।|| साद से श्रौर भीः ॥ ५४ ॥ इसके ` अनन्तर -जो 
रस्यान्तगंतमायत्तं स्वरव्यञ्चनसम्मितम्‌ । | स्वर शरीर व्यंजन का चिस्तार, दै तथा जिसको 
तदशेषं मया. दत्त भवतः . कम्बलस्य च ।।५५।| मने तमार भाई कम्बल को दिया दै ब तुद 
तया नान्यस्य भूलोक पाताले चापि पञचग | | माल दो ॥५५॥ तथा शस गान-निवा भँ जिस 
भरोत मबन्ती च सर्व्यास्य भिष्यत; | | भकार त॒म टोनो भा भ्रष्ठ होगे उसप्कार भूलोक, , 
पातात देवलोके च भृतो चैव पौ ॥४६।| पालः स्वं तथा नागलोक भे कोह इस न 


होगा ॥ ५६॥ 
1 . | सुमति ( जड्पुचर ) वोले- 
इत्युक्तवा सा. तदा देवी सव्वंनिंहा सरखतीं। ` | यह ककर वह सर्वजिहया सरस्वती शीभ्र ही ` 


नमामाद्‌शन सथो नागस्य कमलेक्षणा ॥५७।॥ कमल-नयन नागराज मेँ प्रवेश करगैः ॥ ५७॥ वै । 
तयोश्च तद्यथा भ्रात्रोः सव्येमनाय॒त । | दोनो भा््मी पदे, ताल श्रौर स्वर आदिक बिधान 
विज्ञानमयो रपय पदतालस्वरादिकम्‌ मे सर्वशरष्ठ इप ॥५०॥ फिर कैलाश पर्वत पर स्थित 
केलासशेलेन्द्र-शिखरस्थितमीश्वरम्‌ । | भददेवजी की सतों.गीतो' के ` साथ जो तन्त्री 
{गतकः सक्तमिर्नागौ तनत्रीलयसमन्वितौ ॥५६॥| शौर लय से युक्त थे, दोनों नागो ने ॥ ५६॥ काम 
~रिरिधंयिष देवमनङ्गङ्गहरं हरम्‌ । | न्वी हर की श्राराधना की श्नौर पातःकाल'टुपहर 
प्रचक्रतुः ` पर्‌ यलनघ्ुभौ संहतवाकलौ । प्रौर सन्ध्या के समय तत्पर रहकर परम यत्न से 
भ्ातर्मिशायां मध्याः सन्ध्ययोश्चापि तत्परौ (॥६०॥ दों ने'शिवः को पूजा ॥६०॥,उन दोनों के वत 
तयोः-काल्तेन -मर्हता स्तयमानो हषध्यज, कालःतक स्तुति करने पर महादेवजी उनफे शीतः | 

तुतोष गीतदेष्तौ च भश ग ग्रद्यतां वरः ॥६१॥| बाय से सन्ठे् कर घोले कि मुभसे वर व्रहण 
तवः ` परणम्याशखतरः कम्बलेन समं तदा | | करो ॥६९॥ त नागज 2 कस्वल मे 
यन्मह नील्लकरट, उमापति महा प्रणामकर कदां 
व 4 ॥ ६२.॥ ह देवदेव ! हे त्रिलोचन ! यदि श्राप हम 
दोनो पर प्रसन्न है तो जो हमारी इच्छा है मको 
ठतो यथाभिलपितं. वरमेनं भयच्यं नौ ॥६२।| जर दीजिये ॥ ६३॥ ह देव ¡ ुबलयाश्व की पतनी 
` प्रेता व (न नि ९ मदालसा की मृत्यु | है, उसी क 

बाली शीध मेरे एक पुजी हो ॥ ६६ ॥ वह 
जातिरमरा यथा पूल्वं तद्वत्कान्तिसमन्विता । | धोमिनी श्रथवा योगमाता जो भी थी, उसी 
योगिनीं योगमाता च महगेहेः जायतां -म ।६५॥ कान्ति ओर प मे.मेरे घर मे धगट दोव ॥६९॥ 
। महादेव उवाच ` ` | महादेव वोक्ते- 

यथोक्तः पञ्नगभरष्ठ. सरन्वमेतद्रविष्यति । हे नागराजं ! जो छ ठमने कदा षट मेरे 
मलतसादीदशषन्दग्थं ` शृणु चेदं यजङ्गम ॥६९।॥ प्रसाद से निश्चयदी होगा तथा हे संज ! नो 
शद्ध तु पमलुमापि मध्यमं ` पिण्डमात्मना । ' ।॥ ६६॥ दे नागराज । भाद के दिन मध्यम पिटको 


१०८ माकर्ठेयषुराण ` अर्र्२. ` 


~ -~----~~-----------~- --- 


-----------~--~~--~~------~-----------~------- ~~ 


भक्षयेयाः फणिभेष्ठ शचि; भयतमानसः ॥६७ इ मन से भक कर लेना ॥ ६७॥ , 
[द वाते ह तुम्हार मध्यम फणर उसास्प 

भेक्िते तु ततस्तस्मिन्‌ भवतो मध्यमात्‌एणात्‌। | त 
¡ स॒ुलत्स्यति कल्याणी तथारूपा यथा सृता ।६८}\ थी ॥ द ॥ इस च्रमिलापा को ध्यान मे रखकर 
कामश्वेमममिष्याय रु त्वं पिदितपेणम्‌ 1 | ठम पिताक तपेणक्सो ते उसी क्षण सुम्दारे 
ततक्षणदे प सा सुभः श्वसतो मध्यमात्‌ फणात्‌। | म्यम.फण से भ्वास लेते टी वह्‌ छन्दरी लिस 


रूप मे सत मदालसा थी उत्पन्न होगी ॥ ६६ ॥ यह 
ससुपत्स्यति कस्याणी तथारूण यथा मृता ।॥६६॥ लक वै दोनो महदिव थाम करे संप 


` एतच्छरत्वा ततस्तौ तु भणिपत्य सहेशषरम्‌ । | हो रखातल को दले गये ॥७०॥ तथा उन कम्बल ` 
। रसातलं पुनः पक्षौ परितोषसमन्थितो ।७०।॥ ॐ छोटे भाई नागराज अश्वतर ने श्रद्ध क्षिया 
` तथा च तवान्‌ श्राद्‌ घ नागः कम्बत्तासुजः छोर मध्यम पिगको उसी भरक्तार भक्तर करलिया 


प ॥ जिस प्रकार शिवजी मे कुहा था 1७१ ॥ तथा उस 
परडस्च मध्यमं तद्दुययाबदुपञक्तवान्‌ ।॥७९॥ का ध्यान किया, सिर चह भदालेसा फे समानं 


तश्वापि ध्यायतः कामं ततः सा तमुमध्यसा । | छन्दसे शीश दी उनके मध्यम फण से श्वास तेत 
जते निश्वसतः सदयस्तद्रूपा सध्यमात्‌ फएणात्‌)७२। हौ गट दोग ॥७२। उन नागराज ने किसी से 
न चापि कथयामास कस्यचित्‌ घ भुजङ्गमः श्स दात को न कहा श्नौर उस छन्द्रीको गुप रूप 
अन्तं ह त सुदतीं सीभिगपमयारथत्‌ ७३1! से अन्तेःषुर भे स्क्खा ऽद वे दोनो नागपुर नित्य 
तौ चातुदिनमागस्य पुत्रौ नागप्तेः सुखम्‌ । ¦ पति वदाँ जाकर ऋतभ्वज के साथ देवतां फी 
छतध्वजेत सहितौ चिक्ीडातेऽमरापिव ।७४।' तरद कीड़ा करते थे [ऽछा एक दिन उन नागराज 
एकदा तु सुतौ पाह नागराजो शुदान्वितः। । व ल 
यन्या पूल्वगुक्तन्तु करियते फ न तत्‌ तथा ॥७१। कयो न किया ७॥ हे पुत्रो ! अपने उपकारी उख , 
स राजपुत्रो बुषयोरुपकारी ममान्तिकम्‌ । । राजङ्कभार को मेरे पास क्यो नदीं लये, पेते .मानः 
कस्मास्नानीयते वत्सादपकाराय मानद; ॥७६॥ देने बाले का उपकार करना चाहिये ॥७६॥ पिताके 
एवशु्तौ ततस्तेन पि स्नेहयता हु सौ । | सनद पूवक पसा पठने पर चे दों अपने मिञ 
नगर को गये रौर उसे साथ खेल कुर्‌ करने 

गता तस्य पुरं सख्यु रेमाते तेन धीमता ॥७७] 


लगे ॥७७॥ किर उन्दने ऊद कथान्तर करके 
वलयाश्वं तौ इत्वा 1 कथान्तरम्‌ । | कुवलयाश्व से पेम पूर्वक शरपने घर. चलने को 


अनूतां भणयोपेतं स्वगेहगमनं भति ७८! कहा ॥७८ ॥ इसपर उस राजकुमार ने उन दोनेंसे 
तावाह रपपु््रोऽसौ नन्विदं भतोहस्‌ । | कद किं यह धर भी निश्चय ही आपका. है तया 
न-चाहनःपादि यन्मदीयं तदेव वाम्‌ ॥७६।| धन. बाहन, व दि जो ङ मेरे दै वे श्रापके 
यनु वा वाज्यं दातुं धनं रतनसयापि घा] | ठौ ८ ।७६॥ दे नागऽनो ! जो इ श्राप धन्‌, रल 
तदीयतां द्विजखुतौ यदि ओं प्रणयो मयि ॥८०॥ आदि देन्य चाहं चह यदि छाप सुभसे प्रेम करते } 
एतावताहं दैषेन दञ्ितोऽस्मि दरात्मना ] डेतो दीज्यि्णा सुक दुरत्माको देवने हताः 


वञ्चित रका 
यद्भवदथां ममत्वं सौ मीये करियते शदे ॥८१॥ वश्चिते रक्खा के श्मपक्ती मेरे घर पर भमतानं 


यदि वां मसिं कःस्यमतुगाहोऽस्म वा यदि। इहे ४२६॥ यदि श्राप फेसा कार्य करके जो भुभको 
व भिय हो सुफे श्सुग्रदीतत करना चाहते तो मेरे 
कायोक्मदोयं समत्वमञुकरम्यताम्‌ ।८२ | घर प्रौर धन कते छपना समिय 1८२ ॥ आपका 
युबयोयन्मदीयं तन्मामकं चुवयोः स्वकम्‌ । | घर मेया ह रोर मेसा आपका ह नाष! ह 
एतत्‌ सत्यं विजानीतं युवां भाणा परिराः ॥८३।१ सत्य जानिये कि आप मेरे पराण है १८३ ॥ रे नाग . 


न 9 
म ण १४५० ५.० ०० 
111 ~ ~ ० 


` श्रम्द. ` मादैरढेयपुराण च 


५ १९६ 
प~~ ~ 


ननैव : विमिन्नायं वक्तव्यं द्िनसततमौ | | धुरो! श्रव फिर पेसी मेद की वात भ कदय । 
मल्मसादपयौ भीत्या शापितो हृदयेन मे ॥८४॥ मेया हमसे त्यन्त मरम है श्रौर तुम मेरे ह्य मे 


| कतः सूेहा्षदनौ ताभौ नागनन्दनौ ! रते दो ॥ ८४ ॥ यह सुनकर वे नागपुर स्नेह से 


धिः ५ पुलकित हो गये श्चौर राजङ्कमार से कद्ध मेमपूरं 
उचतुतर पतेः पुचं चत्‌प्रणयकोप्तिं ॥८५।॥ सोप से वोलते ॥९॥ हे ऋतचष्ज ! जो छु पते 


०, ॥ न सन्देहो यथैवाहं भवारिद्रम्‌ । कहा है दस्मे सन्देद नदीं है । यदीवात हमारे मन 
। ॥। तथव चास्मन्मनसि नत्र चिन्त्वमतोऽन्यथा ॥८६॥ मे है तथा श्रौर छुद् चिन्ता भी नदीं ह ॥ २६॥ 


४ 


है 


८ 


~4 


। प्राकठ् गोमती पुण्यां निर्गम्य नगराद्रहिः ६ १॥ 


किन्त्वावयोः सयं पित्रा भौक्तमतन्महात्मना। | किन्तु हमारे महात्मा पितां बे स्वयं वास्वार कहा 
द्रष्टं इवलयाश्वं तमिच्ामीति पुनः पुनः ८७।। है कि मेँ कवलया्व को देखना चाहता दं ॥ ८७॥ 
ततः हवलयाश्बोऽौ समुत्थाय वरासनात्‌ | | इसपर वलयाश्च सिहासनसे उदा श्रौर यद क 


भमकरोद्वि । कर कि पिताजी ने मुभे याद कियाद, उसने पृथ्वी 
यथाह तातेति वदन्‌ मरणाममकरादवि ॥८८॥ पर्‌ मुक्त कर प्रणाम किया नम 
छबलयाश्व उवाच छुवलयाश्व वोले- 


धन्योऽ्धमतिषुरयोऽं कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया । | ` मेँ धन्य हँ तथा मेरे समान दूखरा पुर्यवान्‌ 


` यद्‌ तातो माममि्रष्टुं करोति भ्रण मनः ।॥८६।, कौन है जो कि तात न सुभे दैखने की शठी की 


४ है ॥८६॥ ्सलिये उच्यि, मै श्रापक्रे साथ पैदल दी 
तदुत्तष्टत॒ गच्छामस्तामा्नां क्षणमप्यहम्‌ । चलृगा 1 मै उनकी आक्षा का उर्लंघन क्त भर भी 


नातिकरन्तुमिहैच्छामि पद्भ्यां तस्व शपाम्यहम्‌ ६०|| नहीं करना चाहता ॥ ६० ॥ 


व ज्‌ ( छुमति ) वोले-- 
“ एवयुक्त्वा ययौ सोऽथ सह ताभ्यां ठृपात्मनः। यद कहकर वह राकुमार उनके ` साथ चला 


श्रौर पिले दी नगर के वाहर पुरयवती 
॥ गोमन नदी पर पर्चा ॥ €१॥ वे नागपुत्र राज- 
मेने च राजयुत्रोऽसौ पारे तस्यास्तयोगहम्‌॥६२| पार गये ॥६२॥ उस याजङरुमार को वे दोनों पाताल 
ततश्वाकृष्य पातालं ताभ्यां नीतो दृपात्मनः। | मेले र यर ध ० 
॥ । चोभौ < = गपु क्म देखा कि ड 
पाताले ददे चोभौ स पर्मारकौ । |च» र उन सपो > = 
. ध धकाश॒ दो रदा है शरीर उनमे सर्पो के से लच्तरा 
फणामणिकृतोद््ोतौ व्यक्तसखस्तिकलक्षणा। ६२ व्यक्त दो र्ट हं ॥६३॥ उन खुन्दर स्वरूप नाला को 
विलोक्य तौ सुरूाङ्खो धिस्मयोतेफुष्टलोचनः। देखकर राजकुमार के नेव विस्मय से विकसित 
विहस्य चाव्रवीत्‌ भेम्णा साधु मो द्विनसत्तमो।।६४। होगये श्रौर बह परमसं 1 
व दितिरं पै सव द्रा ॥ ६७ ॥ उन द पज 
क्थयामासहुस्तौ च॒ पितरं पननश्रम्‌ । | अवतर अपन षिता से लो गान्व ्ीर चेता 
शान्तमश्वतरं नाम माननीय दिवाकाम्‌ ` ६५। | से भौ मान्य थे कह दिया ॥ ६५॥ तव राजकुमार 
रमणीयं ततोऽश्यत्‌ पातातं स॒ वरपातमन;। | ने पाताल को छरा, तरण श्रौर इद्ध सर्पो से 
८ ¢ न [9 0 = र~-उधर 
कुमरिस्तस् द रुसेर्पशोभितम्‌  ॥६६॥ व 4 ठ 
८ ~ ध करती इह नाग सरा । उन 
तथैव नागकन्याभिः. ्रीन्तीभिरितस्ततः ८ य छल पीर दार स तद योमिव इ 
चार्कुएडलदारामिस्तारभिगगनं यथा. 1६५। रहे थे जिद प्रकार आकाशम तारागण ६७1 क 
गीतशबदैस्थान्यत्र बीणाःवेशुखनाजुगः । | गोत, कीं वीरा, वे श्रादि ॐ शबद से युक 
मृदङ्ग -पएवातोच' , हासिवेदमशवाक्लम्‌ । ६८॥ मूदद्च, पणव शादि वाद्यो की ध्वनि से --4. 
वीक्षमाणः स पातालं ययौ भरचुभितः सुतः । . । भर्येक़ ब, ॥ खद शनृनित्‌ कापु; ~, = 


१६२. ` ` माक॑र्डेयषुराण ` ` अरः 


। न पावाल मे देखता हुद्मा अपने मित्रं नायपुत्रों के 
ह्‌ ताभ्याममाशभ्या पन्ननाभ्यपि।रन्द्म, साथ चला जावा था ॥ ६६ ॥ फिर उन सवने नाग. 
तः प्रविश्य ते सर्व्व नागराजनिवेशनम्‌ 1 | राज के महल मे पवेश क्रिया श्रौर वदाँ -मदात्मा . 


अशत = 


मह्‌ रभाधिपतिं स्थितस्‌ ।१० ०] नागेन्द्र अश्वतर क वैटा इशथ्रा देखा ॥ ९०० ते 
द्यस्तं ` महत्यनषुरः सू व 


रव्यमास्यास्बरधरं मसणिङ्ण्डलभूषणम्‌ । पटने हुए धे, श्रौर उनके दार इस तरह शोभित 
वच्छघुक्ताफललता-हःरिहारोपशोभितम्‌ ोपशोभम्‌ 1१०१] दे रदे थ जसे लता चल छेत्त म मुक्ताफल 1?य्दा 

वे नागराज सोने के मयूराखन पर चै हु थेःउख 
युरिणं महाभागमासन सव्यकच्विन । | सिदाखन मे मि, भगे श्नौर वैद्यो कां जाल 


(तिविद्रमतैदम्य-नाल्ञन्तरितरूपके ॥१०२।॥ पुरा ह्र था ॥ २०२ ॥ दोनें नागपुतरों ने रजकू- 


मार से कहा किं दमारे पिता यदी द वथा श्रपनेः 
¡ ताभ्यां द्ितस्तस्य तारोऽस्माकमसाविति । पिता से निचेदन श्रिया क्रि यही बीर. क वलयाश्च. 


}रः इवलयाश्वोऽयं पित्रे चासौ निवेदितः १०२।| है ॥ १०३॥ फिर ऋतध्वज ने नागराज के चरणों 
ती ननाम चरणौ नागेद्धस्य ऋतध्वजः ] | मे प्रणाम क्रिया ओर नागराज ने उसे उ्ाकर 

दं नागीन्धः परिषस्वजे ।।१०४।| उसका गाढ़ आलिङ्गन क्लिया ॥*९०६॥ नागराजं ने' 
इतयाप्य्‌ चलदवादं नाग" 4 ॥ स उसक्ते मस्तक को संघकर अभीर्वादः दिया कि 
धि चेनयुपाध्राय चिरं जीवेत्युवराच स चिरक्नीव रहो तथा तुम त्रपने शवरश्चों को मारकर 
त्हतासित्रवगय पित्रोः शभ्रुषणं इर ।॥१०५.५ पिता की सेवा क्यो ॥ १०५॥ हे चत्स ! तुमको 
त्व धन्यस्य कथ्यन्ते परोक्षस्यापिते गुणाः 


धन्य है, तुम्हारे साधारण यणे कोवुम्दारे पी ` 

४ ]| मेरे लङ्क ने सुस बताया हे ॥ १०६॥ तुम्हारी मन 
वतो मम छाभ्यामसामान्या निवेदितः अ 
वमेवानेन वद्धा मनोबाक्षायचेष्टितेः । | णुरियों का जीवने दी भशेखनीय है रीर. गु- 


दितं गुणिनः ध्यं जीवन्नेव मृतोश्युएः।॥१०७।| दीनं का जीवन खत क समान ईं ॥ १०७ ॥ गुरुः , 
ध । वान्‌ पूत्र माता पिता को निर्चिन्त कर देता ह 

एरोबान्‌ नि ति पिः शत्रणां हृूदयञ्वरम्‌। तथा शन॒श्चों के हदय मे ज्वर के समानं दे. वहं ` 
लातत 5 | विर अपनी म्ताई करता हच्ा वृद्धजनो. मे विश्वास 

सोत्यातमहितं हव्य विश्वासश्च मदाजने॥१ | उत्पन्न करता है ॥ १०८॥ देव,- पितर, ब्राह्मण्‌, 

वताः पितरो विप्रा मिवरार्थिविकक्लादथः। अभ्यागतं ओर दुःखी आदि तथा.माई, बन्धु उस 

(न्थवाशच तथेच्छन्ति जीवितं गुणिनधिरम्‌।१०६॥ 

रिवादनिदृत्तानां द्गते दयावताम्‌ । 


गुशी का चिरकाल तक जीवनं चाहते है ॥ १०६ ॥ 
श्रोर जिनव्न श्पथाद्‌ नदीं हे तथा- जो ` दःखितो. 
(णिनां सफलं जन्म संथितानां विष्द्रतेः ॥११०॥ 
ज्‌ उवाच 


-पर दया.करते दै, फेस युशियों का.वियत्ति म॑॑पड़े ˆ 
लोगो की खाया कने के कारण जन्म, 
सफल ई ॥ १९१० ॥ 
छ जड़ ( खुमति ) बोले- 

उक्त्वा स॒ तं वीरं पुखादिदमयथात्रवीत्‌ । 

जां इवलयाश्वस्य कत्ंकामो युजङ्गमः ॥१११।/. 

पानादिकक्रमं ढता स्वमेव यथाक्रमम | 
धुंपनादिसम्भोगमाहारंघ यथम्तितप्‌ ॥११२॥ 


चद नागराज उस चीर कूबरलयाश्व से यद ` 
ककर पने पुरो से चले कि कुवलयाश्व की ` 

पूला करो ॥ ११९२ ॥ क्रम से. ल्ानादिं करके सवं 

लोग मधुपान श्रादि भोगयुक्तं भोजन केरो ॥ ११२॥ 
मुः इुवलयाश्वेन  हदयोत्छवभतया । प्र खन्न चित्त दोकरः कुवल्लयाश्न की असंन्नता - 
धया खरपक कालं स्थास्यामो हचेतसः॥११३।॥.ॐ क्तिये कु काल चैकर वात्तचीत करेगे 1११३. 
मेने च तन्मनी वचः शू्ुनितः सुतः ! ` ` । शतुजितःके पुः ऋतध्वज ने भी ` जिस भकार ` 
0 वि 


~~~ 


~ ~ ~~~ 9० 


स ~> स 
--------------~-----~ = ~~~  @ च्छो ऋ ~ 


- ~भ्र०-२४ 


तथा चकार -वृपतिः पननगानययुदारथीः 
समेत्य ` तेरात्मजः-भूपनन्दै 
महोरगाणामपिषएः स सतथवाक्‌ । 
.यदान्वितोऽानि मधनि चात्मवान्‌ 


, माकैर्टेयपुसण 


॥११४॥ नागराज ने कदा भान.ज्तिया ॥ ११४ ॥ फिर सत्य 


. › १११ 


भ 


वादी नागराज ने श्चपने पुत्रों. राजकुमार फे 
साथ गरसभ्नचित्त दोकर -धरन्नो श्रौर मघु्योंका 


यथोपयोगं शुन ..सः भोगथुक ॥१११॥ ए्व्छाछसार भोजन किया ॥९९५॥ 


इति श्रीमकिण्डेयपुराण में मदालपोयाख्यान नाम तेस अ्रष्याय समाप । 
।  , ओक्य 


चोवीपँ अध्याय 


जड उवच ` 
कृताहारं महारमानमधिपं पवनाशिनाम्‌ । 


उपासान्वक्रिरे पुत्रौ भृपालदनयस्तथा ॥ १॥ 


:कथाभिरनुरूपाभिः स महात्मा यनङ्गमः। 
प्रीति सञ्जनयामास पूत्रसख्युरुवाच च ॥ २। 
वि भद्र सुखं ब्रूहि `गेहमभ्यागतस्य यत्‌ । 
न्िव्ययुत्यजाशङ्कां पितरीव युतो मयि ॥२॥ 


(तं बा सुवणं वा वलं बाहनमासनम्‌ | 
इद्वाभिमतमत्यथं दुर्लभं तदरृुष्व माम्‌ ॥ ४॥ 
छुबल्लयाश्व उवाच 
त्व॒प्रसादाद्रगवन्‌ सुवणादि हे मम । 
परितुरस्ति ममाद्यापि न फिचित्‌ काय्यंमीदशम्‌ ॥५॥ 
तरते वरषसदश्नाणि शासीमां वसुन्धराम्‌ । : 
यंव त्यि पातालं न.मे याचनीन्धुखं मनः ॥ ६ ॥ 
| स्वर्या सुपण्याश्चः येपां पितरि जीवति । 
णएकोरिसमं वित्तं ताखटयाद्धित्तकोप्डि ॥ ७॥ 
भेत्राणि. ठल्यशिष्ठानि तद्वहेदमनामयम्‌ । | 
अनिता धियते वित्तं यौनं किन नारित मे ॥ < ॥ 
रस्ये णां थाचूनामवं जायते मनः । | 
- सत्यरेपे कथं पाचनां मम निष्ठा करिष्यति ॥'& ॥ 
“यैनं चिन्त्यं धनं किञ्चिन्मम गेहेऽस्ति नास्ति वा। 
पिव्राहतरुच्चायां संशिताः धखिनो हिते ॥१०॥ 
येतु बार्यद्‌मशरत्येव विना पितरा इृडुम्बिनः 


, जड़ ( सुमति ) धते “ 


जव राजङ्कमार, नागराज श्रौर -उनके दोनों 
एत्न भोजन कर चुके तो नागपुत्र धीर रजङ्कमार 
नागराज की सेवा फरने लगे ॥ १ ॥ महात्मा नाग- 
राजने राज्छुमार के स्वरूप के श्रनुसार कथार्ये 
कहकर प्रीति उत्पन्न फी श्नौर च्रपने पूधोके मिष 
राजकुमार से कटां ,॥ २॥ तुम्हाय कल्याणद, 


। यद तुम्दारा घर है. तुम हमारे -श्तिथिद्ो । जो 


कु तुम्दारी इच्छा दो निःशङ्क -दोकर `को, मै 

य पक पुत्र के पिता की भाति करगां ॥ २॥ 
चयाँदी, सोना, वसु, बान, ध्रासन च्रथवा `जो 
कोह दलेभ वरतु तुम्हे "च्छित दो बह मुभंखे 


मागो ॥४॥ ; .. 


कुवलयाश्व वोले- । 
हे भगवन्‌ । पकी. कृपा : ते -सोना- इत्यापि 
र घर पर भी मौजूद है । मेरे पिता .मौजुद दै। 
पेखा ओह कायं सुमे श्रापसे नदीं है ॥५॥ मेरे 
पिता पकर दज्ञार वपं से दस पृथ्धी का राज्य करते 
हैं श्रीर इसी प्रकार श्राप पाताल मेँ ।. इस कारण 
मेरे मन मै कोई अ्रमिलाा नदीं ह ॥-६ ॥ - जिनके 
पिता जीवित है ते बड़ पुरयवान्‌ है, करोड तर्द 
के धन य बावस्था रूपी धनके यागे तरवत्‌ &६।\७॥ 
मरे मित्रभी शिष्ट तथां मेरा देह भी आरोग्य है 
क्या मै पनी युवानस्था के वल से धन प्राप्त नदीं 
कर सकताहु॥८॥ धनके-न होने परभी लोग 
भिक्ञा मांगने का मम नहीं रखते दै फिरमे श्रशेष 
धन होने पर ब्रिख तरह याचना करू ॥ ६॥ -जो 
मरप्य ये वाते न चिचार कर कि.उनंके घरमे घन 
ह या नदीं च्षपने पिता की भुजा की छाया मे रहते 
ट वे.दी सुखी ई ॥ १०॥ जो लोग वाल्यावस्थाःसे 


;!। ही पिद्रदीन. दो जाते द उनको.इस ख, `का! 


११२ | मारडेयषुराण ` सबन्धः 


# = स । स्वादन नदीं द्योता है, श्नर उनको मै श्रभागा 
ते सुखास्वादविभ्रसान्मनः त्रैव पञ्चिताः \;११॥ दा ह ॥११॥ हम लोग श्रापकी रपा से च्रपने ` 
तद्रयं लससदेन धनरतमादिसंचयान्‌! | पिदा ऊ सञ्चित धन, रत्न, मोती आदिकं म से 


नत्यमर्थिनाभ १२ | नित्य जरूरतमन्द याचको को देते द ॥ ९२॥ मेरे 
प्तिक्तान्‌ भयच्यामः कामो नित्यमर्िचाम्‌ १२ | मुकर की मणि के श्रापक्रे चरणों से लगने से तथा 


तत्‌ सर्वमिह सम्पा्षं यदद्युगलं तव । | मेरे श्रद्ध मे आपकी चर्रधलि ॐ स्पश होने 


मचडामणिना सृष्टं यचाद्गस्पशंम'प्रवान्‌ ॥१२ | सुभे सव कृद पराप्त दोगया ॥२३॥ ५ 
जङ्‌ उवाचं जङ्‌ ( सुमति ) बौले- ५ 
इयेवं प्रतं वाक्ययुक्तः ` पन्नगसत्तमः । यह मधुर वातां खनकर नागराज अपने पु्ोके. 
प्राह राजसुतं भीत्या पुत्रयोरूपकारिणएम्‌ ।॥ १४ | उपकारी राजकुमारसे पेम पूरक बोले ॥१४॥ 
नाग उवाच नागसयज वोल्े- 
यदि रत्नसुवरणांदि मतोयप्तुं न ते मनः। श्रगर तुम्हारा मन समसे . रत्न .खुवशं यादि 


माँगनेकानदींहैतो जो कचु अन्य चस्तु की 
यदन्यन्मनपः भव्ये तदहि त्वं ददाम्यहम्‌ ॥१५॥ इच्छा दो वह मुभसे कदो भै बही दंगा ॥ १५॥ 
कवलयाश्च उवाच कवबलयाश्व वोत्ते- 
-भगवस्वस्मसादेन भार्वितस्य ग्रहे मम। हे भगवच्‌ ! ्रापकी रपा से मेरे घर पर सेव 
सर्वमस्ति परेषेण सम्पा तव दर्शनात्‌ ५१६॥ कु है तथा श्चापके दशन से चीर विशेष रूप से 
सव छु मिल गया ॥ १६॥ मे छतरृत्य है, श्रौर 
छृतछृत्येस्मि चेतेन सफलं नौषितज्च मे । | मेरा जीवन सफल ह क्योकि मेते स्य ` होकर 
यदङ्कसंश्ुषमितस्तव देवस्य मसुषः ॥१७।॥ आप जसे देवता का संसर्म परा क्षिया ॥ १७॥ हे 
भमोत्तमाङ्गे तसादरजप्ता यदिहास्प्दम्‌ । | नागराज ! मेरे रङ्ग मे जो आपङे चरणों की धूलिं) 
छतं तेनैव न प्रं किं मथा पन्नगोश्वर ॥१ लगी उससे मुभे, क्या पातत नदीं हु्ा ॥४८ ॥ यदि 
यदि त्रवश्यं दातव्यो वरो मम॒ यथेप्ितः। | राप मेरी इ्छा ॐ ्लुद्खल वर देना दी चाहते 
तत्युए्यम्पसंस्कारो हृदयान्मा व्यपैतु मे ॥१६॥| तो मेरे हृदय से पूर्य संस्कार कमी नए न टो ॥ 
सुवमणिरत्नादि बादनं शदमासनम्‌ | | उवं, मि, ररन, बाहन्‌, गृह, प्रासन, सयां 
 -चियोऽ्च तनं पुत्रा चारमासालु सेएनम्‌ ।२०॥| रन, पानः पुज तथा छन्दर मालाय श्रौर चन्दन 
एते च विविधा! कामा गीतषाद्यादिकंच यत्‌ | 1 २० ॥ इन सवको तथा विधिधं प्रकार के गीतः 
सववमेतन्मम मतं॑एलं पुरएयघनसतेः ॥२१।। व व ध ह 
~ म्ष्यकोच कि पुरयरूपा 
तस्मान्नरेण तन्मलसेके यलनः कृतात्मना । | कच को सावधानी स वत । , वयसि 
फन्ध; पुण्यसक्तानां न ििदृशवि दुलंमय्‌॥२२ | संसार मे कोड कायं दुलभ नदीं दै ॥ २९॥ 
अश्वतर उचाचं नागराज श्रश्वतर बोक्े- 
एवं भविष्यति भाङ्ग तव धम्मश्रिता मतिः । हे पाक्ञ } यदी दोगा, तुम्ारी बुद्धि घममें 
सत्यञ्चैतत्‌ फलं सव्यं धम्मस्येक्तं यथा खया॥२३ ५४. न ५ मण । 
 ठयाप्यवशयं मदृगहमागतेन लोधन । | तु भरर प शराय हो इसरिये ज कव तमद 
्र् यन्पलुषे लोके दुष्यं भवतो मतम्‌ ॥२४॥ मनुष्यलोक भ दुष्पाप्य दो वद सुमे माम ॥२७॥ 
जड उवाच जङ्‌ ( सुमति ) 
¦ तस्यतद्वचनं शरुल्ला स -तद्‌ा शरुपनन्दनः । उसके दन वचनो को नकर चह राजकुमार , 
` “~ :: च्रे ` प्ेश्वरपुत्रयोः ॥२५॥| नागघुों ॐ युख' की श्रोर देखने. लगा ` ॥ २५ ॥ 


' अ०.२४ १५ भाकरडेयपुराण . . ११३ 


-----------------------_--------- 
ततस्तौ भरणिपत्योभौ राजपुक्छ्रस्य यन्मतम्‌ | फिर उन दोनों नागघुचों ने पणम करफे जो कु 
पिः सम । राजकुमार के मन मेँ था वह खच रपष्टवया पिता 
तत्‌ पितु; सकलं वीरो कथयामासतुः स्फुटम्‌ ॥२६॥ के सन्मुख निवेदन कर दिया ॥२६॥ ` 
` . पावर्तत नागपुत्र योज्ते- 
ततोऽस्य पनी दयिता श्र्वेमं विनिपातितम्‌ । इसकी भिय पत्नी ने किसी दुठत्मा, दान. के 


विश्वास दिल्लने पर कफि राजकुमार की सृत्य दोगरई 
, अत्यजद्‌ प्राणन्‌ ज्या २ 
यितान्‌ विमलन्या दुरात्मना ॥२७] है अपने परिय पाणो को त्याग दिया ॥ २७ ॥ किंसी 


केनापि छतवैरेण दानपेन बुद्धिना । दुवुद्धि दानच ने जो वैर रखता था पेसा किया, 
गन्धन्बराजस्य सुता नाम्ना ख्याता मदालसा २८।॥ तथा इसकी पत्नी गन्धर्वकन्या मदालसा थी ॥२८॥ 


कृत्ञोऽयं ततस्तात भतिङगां कृतयानिमाम्‌ । | मदालसा क धरति ₹तङ्क होकर इस राजङकमारं ने 


९ यि प्रतिज्ञाकी कि मदालसाको छोडकर दूसरी खी प्रण 
नान्पा | वित्री घज्जं #१ ष 1 ५ 
न्या माय्यां भवित्रीति वन्जयित्वा मदालसाम्‌ २६] न कर्मा ॥२९॥ हे तात | यद वीर ऋतध्वज उस 


द्रष्टुं तां चारृपव्वा्गीमयं वीर छतध्वनः । | चन्द्री को देखना चाहता है, शतः पेखा उपाय 
तात वाञ्छति यद्येतत्‌ क्रियते ततर्‌ कृतं भयेत्‌ ॥२०॥| कीजिये जिससे यद कायं सिदध दो ॥ ३०॥ - 
अश्वतर उवाच शछ्मष्वतर नागरयज चौले 
भूतर्वियोगिनो योगस्तादशैरेव ताद्शः । वैसे दी बिथोगियों को मिला देना किन दै । 
व यह खप्न अथवा रा्तसी माया केः विना किस 
कथमेतद्विना स्वम मायां वा शम्बरोदिताम्‌॥२१॥| प्रकार सम्भव हे 9 ३१॥ 
जड़ उच जड़ ( खमति ) बोले- 
भरणिपस्य शंगेशं पुत्रः शृत्ुजितस्ततः । शजजित के पुत्र छतध्वज्ञ ने मदात्मा नागः 


पर्युवाच महात्मानं परमलल्नासमन्वितः ॥२२॥ सज को भराम कर भेम श्नीर लजा से युक्त दो 
कदा ॥३२॥ हे तात | यदि श्राप भायामयी मदालः 


` मायामयीमप्यधुना मम॒तात मदालसाम्‌। | साका भी दर्ैन वराद तो मेरे अपर श्रापका वदा 
यदि दशय ते मन्ये परं कृतमयुग्रहम्‌ ॥२२॥| बदा ्ुब्रह होया ॥ ३६ ॥ 
श्मश्वत्तर उत्ाच नागराज अश्वतरः बोले 4 
तस्मात्‌ पश्येह वत्स त्वं मायाञ्चेदुदरष्टुमिच्छसि हे वत्स ¡ अगर तुम माया कोद्य देखना 
० ध ॥ | चाहते हो तो पेखा दी करूंगा, केयोकरि आभ्यां 
 अञुग्राहयो भवान्‌ गेहं बालोऽप्यभ्यागतो गुरुः २७॥| वालक को शुरु दी मानना चाये ॥ ३४॥ 
जड़ उवाच जड़ ( सुमति ) श स । १ 
ञ्नानयामास नागेन्द्रो शरहयुप्रां मदालसाम्‌ । फिर नागराज धर मँ चिपी इहै मदालसा 
जे श्राये श्रौर रजक्कुमार को मोह मै उतने फे 
तेषां सम्मोहनाथांय जजस्प च ततः स्फुटम्‌ *२५॥ हये कर दिवा वि यद्‌ मायामयी द ॥ २५॥ शरीर 
दशयामास चतदा राजपुत्राय ता शुभाय । | उस शमे को राजयुर को दिखला दिया शरीर पूरा 
सेयं न वेति ते भाय्यां राजपुत्र मदालसा ॥३६॥| कि हे राजकुमार ! यद तुम्हारी खरी मदालसा दै 


स शृ त तदा तन्वीं तहक्षणाद्धिगतत्रपः या नदीं ॥ २६॥ व क दी र 
४ राजङ्कमार लजना छोडकर “ " यह क 
भियेति तामभिषखं यौ. घाचदीरयन्‌ । | हृष उवी शोर चते । सपर श्रयत नागराज 
निवारयामास च तं नागः सोऽश्वतरस्तवरन्‌ ॥२७।| ने उनको शीघ्रता पूर्वक रोका ॥ २७॥ 
श्चश्वतर उवाच नागराज श्रश्वतर वोले- 
मायेयं पुतन मा स्माक्षीः प्रागेव कथितं तव । ६ हे पुत्र । 1 व दियाथा 
+ यदह माया न 1 यद स्पशं 
शन्तदधोनयुपेत्याश् “ माया संस्पशनादिभिः ॥३८॥ करते ही चन्तर््यान दो जानेगी #द८ ॥ इसपर वहः ` 


ततः पपात.मेदिन्धां स त॒ भूच्छौपरिप्लुतः । ` | राजकुमार दा परिये" पेखा कदकर तदो पृथ्वी ` 


११४ माकएदेयघुराण । ` अ० २१ 


स 
ह्य भियेति ददन सोऽय चिन्व्वासासर याविनीस्‌३६]] पर ष्यिर पड़ा श्रौर चह छन्दस भी सोचने लरि ॥ 


शरहो सेदयेऽस्व दृपतेगमोरय्यचलं सनः | अद्या { इत राज्डम्यर ऋ र मेरे क 
येनायं परातनोऽसखां विन शद्धेण पातिः ४०।| द पलन्द टो चअसेक्मं शुच कने गिखयाहे वे श्रा 
= विना सख ॐ लने दी सिर पडे ॥४० पृथ्वी, जन्त, 


मायेति दर्शिता तेन मिथ्या भयेति यद्‌ स्फुटम्‌ । दा छक्ास्त ते उत्पन्न इई युको इन्टोने 
वायम्युतजत्रां भूमराक्तक्षस्य च चवा 9 १ खाया की सदालखा समभ लिया हे 1४६ 
जड उवाच | जङ्‌ ( उमते ) बोल- 
ततः इवलयाश्वं तं समाश्वास्य नज्म॑ः | । इसके चनन्तर्‌ नासाज ने इवलयाभ्वको चैयं 
कथयामास तत्‌ सच्चं मृतसञ्जीदनादिकम्‌ ॥४२। । देकर मदःलद्छा ऊ सजीवनाष्दे क पूरी कथा कह 
तत पहः परिलभ्य कान्तां | खना ॥ ४२्‌॥ फिर साजङ्मार शपनी खी को परा 
| 


णम्य नामं निनगाम सोऽय | कर वड़े पसनन हण } वे न्राज को अरणाम कर 

सुशेममानः खपुरं तमश्व- श्रपने घोड़े पर चदकर मदालसा के साथ छपे 

सार्च सञ्चिन्ठितिमभ्यपेतम्‌ ॥४२॥ श्नोमायमान यर को चले ॥४२॥ 

इति श्वीसाकर्डेवएुराण मं मदालसा-मा्ति नाम्‌ चावीस्वां अध्याय समप्र । 
~ य~ | 
प्चीसगं छष्याय्‌ . | 
जड उवाच {.जड़ (छमति ) वोले- । ॥ 

श्ारास्यं सपुरं सोऽप पित्रोः सर्व्वमरेषत! ! । उस राजङ्कमार ने पते नगर से श्राकर अपने 


| भादा पिता से लिख अक्रार दत मदालसा को पुनः 

यथा प्रप्चा एचद् 1 ~ व 
च व 9. , रा क्रिया खव चृक्तान्त पू्ण॑तया कद खुनाया 1९] 
ननाम सा च चरखा श्वनरू-श्वद्स्याः सुभा । उस कल्यसी ने श्रपने सास भ्वखर के चरणो मँ 
सवजनञ्च ययाप्व्यं बन्दनाश्छंपणादिभिः 1 २ ॥, श्लिर नवाया तथा अपे खजनों को भी छोटे बड़े 
` पूनयामास तन्वद्धी यथान्यायं चयादयः ! ! ऊ अनुस्वार छालिङ्गन अथवा थाम दिया ॥२॥ 
द उरु खुन्दर ने न्याय वथा अवस्था के ्रयुखार ` 

= सारं प्रे 

ततरो होतसनो नह पारां चव ध युर ॥ २ ॥ सदय द्र किया तथा उस समय उल नगरे 
च्छतध्वन्च सुचिरं क्वा स्य छुमभ्यवा । , | वडा महोत्सव हव्या ॥ ३॥ त्वज ने भी उस 
सिभरेषु च्‌ शला निस्नगापुलिनयु च] ! खन्दरी के स्याथ चह्त काल तक सरना, पद्ाड्पर 
काननेषु च रग्येु तयेवोपवनेष च }] % || रदिवो, वनं टा उपबनों मँ चिह्र किया ॥४॥ 
पुण्यक्षयं बान्दमाना सापि कामोपमोगतः । 1 


तित स्थानों मं जने की च्च्छा स्वती श्नौर राज्मार 
सह्‌ गन्तन र्य रस्य्द्ध भृरिप्‌ 8 ३), श्वी [= <] साथ रमरीक्त स्थानें समस करते [शा 


0 


ततः कालेन सहता शत्रुन सिद ! | कतिर बहत काल व्यतीत दयौने पर या शिव 
सम्यक्‌ मशास्य वसुथां ऋालधस्प॑शुपेयिवान ॥ & ॥ च्य का सम्यक शासन करदे देवलोक को शये 
तत, परसि महात्मान युत्र त्य ऋतथ्वनम्‌ } | पद! ठव रजा ने उसके पुत्र महात्मा ऋतध्वज करा करा 
अभ्यपिज्चिन्त रानानयुदाराचारदश्ितम्‌ 11७! जो उदार छर खस्दर आचरण वाला था, राल्या- ` 
सस्यक्र्‌ पालयतस्तस्य प्रलाः पुम्रानिवरषान्‌ 1 | भिपेक किया ¶ञ) उस्ने भी प्रजा क्लां पचन्ते समान 


“~ दाल्वा, -सज्ञक इत्रः भरयमजस्तत; ।। ८ ।\. पालन क्िवा तथा मदालखाने अयम पुचको उत्यत्न 


॥1 


-अ० २१ 


भावैरटेयषुराण 


११५ 


~ 


तस्य चक्रे पिता नाम चिक्रान्त इति धीमदः । 


तपस्तेन वै भृत्या हास च मदालसा ॥ € 


सा वै मदालसा पुत्रं बालषुत्ानशाथिनम्‌ । 
उष्ठापनच्छलेनाहं 
शद्धोऽसि रे ताते न तेऽस्ति नाम छृतं हि ते 
कस्पतयाधुनेव । पश्चात्मकं देदमिदं तवैतन्नेवास्य 
तवं रोदिपि कस्य हेतोः ॥११॥ 

न घा मवान्‌ रोदिति वै स्वजन्मा शब्दोऽयमा- 
साद्य मदीशसवुम्‌ । परिकरपयमाना बिषिधा 
गुणक्तेश्युणाथ भोता; सकलेन्दरयेषु ॥१२॥ 
` भूतानि भूते, परिदुव्बलानि इदि समायान्ति 
यथेह पुंसः । श्रन्नाम्युदानादिभिरेव कस्य न 

तेऽस्ति दृद्धिनं च तेऽस्ति हानिः ॥१२॥ 
त्वं कन्दुके शीय्यैमाशे निनेऽस्मिंस्तसिमश् 
देहे मूढतां मा वरनेथा! । शुमामेः कम्प्थि्देह- 
मेतन्मदादिमूढे; कञ्चुकस्तेऽपि नद्धः ।॥१४॥ 

तातेति किचित्‌ तसयेति िंविदम्वेति ईदिचिदयि 
तेति किंचित्‌ । ममेति पिचिन्न ममेति रिचि 
त्वं भृतसष्घ वहु सानयेथाः ॥११५॥ 

दुःखानि दुःखोपशमाय भोगान्‌ खाय 
जानाति विमृद्चेताः । तान्येव दुःखानि एनः 
उंलानि जानात्यविहवान्‌ सुषिमूद्चेताः ॥१६॥ 

हासोऽस्थिसन्दशनमक्ियुग्ममद्युज्य्यलं तज्जन- 
मङ्गनायाः ।. चादि पीनं पिशितं घनं तत्‌ स्थानं 
रत कि नरकं न योपित्‌ 1१७1 

यानं क्षितं यानगतश्चं देहं देहेऽपि चान्यः 


पुरुप निविष्टः । मृमलधुद्धिनं तथा यथा स्वे 
देरैऽतिमाघ्रं वत मृदेषा ॥१८॥ 


रदमानमविखरम्‌ , ॥१०॥ 


किथा ॥८॥। उलका नाम धीमान्‌ ऋतष्वजने विक्रांत 
रक्ला जिससे खवलोग सन्तुष्ट हुण, परन्तु मदाल 

सा ने इसका उपटास किया ॥६॥ मदालसां चालक 

से जो उसकी गोद मे पड़ासेरहा था बहलाने के 
वदान कमे लगी ॥१०॥ हे तात ! तु शुद्ध है, तेसा 
कोई नाम नदीं है । चकि तूमे पश्चात्मक देह धार्‌ 
किया है इसलिये तेण नाम करिपत किया गया है 

तू किंसतिये सोता है ॥ ११॥ श्रथवा यों कना 
चादिये क्षि तुम रोते श्री नदीं दो, यद रेने का 
शब्द खयं ही उत्पत होता है । सम्पूणं इन्द्रियो के 
जो गुण श्वशुर है वे भी तम्दारे सद्कस्प से दी दै 
॥१२॥ मनुष्यो का शरीर अन्न जलत आदि खाने पीने 
से वृता श्रौर पेखा न फरने से घटता है । परन्तु 
इनसे न तो तुम्दारी बृद्धि दै र न दानि ॥ १३॥ 


इस रचे हु अपने शीर मे भूढता मत करो, .य , 


देह माभ कमौ का फल है तथा मदादि मूढ 
तन्नौ सेर्वधा हा है ॥ ९४॥ यद तात है, यद 
पुज दै, यह माता है, यह खी है, यह मेया है श्रीर 
यद मेय नदीं है इस भूतस्य को भी ठम बहुत 
भानते दहो ॥१५॥ मूख लोग इभो को श्रौर दुःखो 
का माश करने बलि मोग को सुख जानते दहै । 
वास्तव म उसी एक वस्तु को ्रक्षानी लोग दुःखं 
शौर छख कट देते दै ॥१९६॥ सियो की टैसीमे जो 
दांत दिखाई देते है वे नरक की ह्धियां है भौर 
उनकी दोनो खें पेसीं है मानो सूट जनों को 
निपेध कर्ती है नौर उनके स्तन ज है ते नरके 
मांस ह 1 इश प्रकार लियो के रति का स्थान क्या 
नरक नदीं है १॥ \७॥ वाहन परथ्यी पर दै चौर 
चान शरीर मे दै । इस देह भं भी दसय पुरुष 
स्निविष्ट है परन्व॒ जैसी श्चपते शयीर मे ममता है 


। चैसी दूसरे मे नष है श्नौर यदी मूता है ॥१म॥ 


इति भ्रीमाकंर्ठेय० मे मदालसोपाख्यान नामका ष्वीसवा अध्याय समाप्त । 
-- 1० -€4--- ॥ 


 उव्बीसवां अध्याय्‌ 


अड उवच 
वद्धंमानं सुतं खा तु राजपत्नी दिने दिने । 


जड ( छमति ) बोल्े-- 
जैसे-२ बद वालक वढतागया मदालसा उसको 


तप्ठापादिनाः. बोधमनयन्निम्मैमात्मकमू्‌ | १ ॥/ बदलानेके वाने निमेमा्मक उपदेश करती शी॥१॥ 


१९६ 


भकएदैयपुरासं 


चे २६ < 


न~~ 


यथायथं वहनं त्तमे यथा सेमे सति पितु; 
तथा तथात्मवोधंच सोऽवाप सातृभापितेः 
इत्यं तया स॒॒तनयो जन्मपभृति बोधितः 


स्योःज्यों रखने वल थाप च्या पिता ने उसको . 
| २ || व्यावहारिक छान दिवा परन्तु उसने भाती वातों 


आत्सवोघध को प्राप्त किया ॥ २॥ इस भकार वह 
पुच जन्म से ही मातासे ज्ञान धातत कर एृदस्याश्चम ` 


चकार न सतिं भाहञो माहैस्थ्यं पति निस्ममः॥ २॥॥ से तरि्ुख लोकर विर होगया ॥३॥ फिर मदा 


द्वितीयोऽस्याः सुतो जज्ञे तस्य नासाकरोद्‌ पिता। 
पुबाहुस्यमिद्युक्ते सा जहास मदालसा ॥ ४ 
तमप्येवं यथापूष्वै बालयुष्टापवादिनी । 
पराह वास्याद्‌ स चराय तथा वध महामतिः | ५॥ 
तृतीयं तनयं जातं स राजा श॒नुमहनम्‌ । 
यदाह तेन सा पुभरजहासातिचिरं पुनः ॥ ६॥ 
तथै सोऽपि तन्वङ्या बालत्वादववोधितः । 
क्रियाशकार निष्कामो न फिचिद्पकारकम्‌ ।॥ ७॥ 
चतर्थस्य सुतस्याय चिकीर्ुनाम भूमिपः । 
ददशं तां शुभाचारामीसद्धासां मदालसाम्‌ | 
तामाह राना हसतीं किञ्ित्‌ कौरूहान्वितः।। ८ ॥ 
राजोवाच 
क्रियमाणे सङृनास्नि कथ्यतां हास्यकारणम्‌ ! 
विकरान्तथ सुबाहु तथान्यः शत्रसहेनः | ६ ॥ 
शोभनानीति नामानि सया सन्ये कृतानि वै 


का दसरा पुत्र उत्पन्न हुश्ा, उसका नाम पिता ने 
सवाह रङ्खा इसपर भी वह देसी ॥ ४॥ .उसको 
भी चह पदिक्ते की तरद्‌ कटललानेके वहानेसे उपदेश 
करतीं जिससे बह भी वास्यावस्था से दी कान 
प्राप्त कर्ता इता ज्ञानवान्‌ हयो निर्मम दोगया ॥ ५॥ 
जव मदालसा के तीसरा पुज उत्यन्न श्रा तव 
राजा ने उसका नाम श्रमदेन रक्ला उस समय 
भी उख सन्दयी को देखी श्रागरे ॥ £ ॥ उसको भी 
सखन्दरी मदालसा ने बाल्यावस्था से वोध कराया 
जिससे वहभी निष्काम द्येकर चिरतं होगया श्रौर 
किसी उपकार का न रहा ॥ ७1 जव चौरे पुत्रं का. 
नाम सजा सखस दी चादता था तो उसने युमा 
चरण वाली मदालसा को कु भुस्कराते इय देखा 
इसपर यजा ने कुवृहलयुक्त दोकर सुस्कराती इई 
उसस्रीसे कटार] 
राजा बोला-- 


इन नामों के रक्ते जनेमे तुम अपनी दसी 
का कारण वताच्यो ! विक्रान्त, सुवाहु श्रोर शु 
€ नने श्सवीयें चबियों 
मर्दन 1६] ये मेने सन्दरनाम श्रवीसें शरीर 


योग्यानि क्षदरवन्धनां शौय्यांयोपयुतामि च |१०॥|| ॐ योग्य समकर रक्खे॥ ९०॥ हे भद्रे ! यदि ये 


असन्त्येतानि चेदधुद्रे यदि ते मनसि स्थितस्‌ । 


नाम तुम्हारे मनके श्रञुखार नदी है तो इस चौथे 


तदस्य क्रियतां नास चतुधस्य सुतस्य मे 1 ११।॥ लड़के का नाम वु्दीं रक्लो ॥९९॥ 


मदालसोवाच 
मयाद्धी मवत, कस्यां महाराज वथात्य मद्‌ ॥ 


मदावस्प वोल्ली- 
हे महाराज ! श्रापकी राता कामे अवश््यदी 


तथा नाम इरिष्यासि चतुरस्य सुतस्य ते ॥१२॥ पालन करं मी श्नौर च्रापके इस चीयै पुज का नाम 


श्रलकं इति धम्मङ्नः ख्यातिं ल्लोके प्रयास्यति 
कनीयानेष ते पुत्रो मतिमांश भविष्यति \१२॥ 
तच्छत्वा नाम पुत्रस्य ठत स॒त्रा महीपतिः । 


म दी रक्खृगी ॥२] श्रापके इस छोटे .पुच्रका नाम 
मेने अलके रक्खा । ये धमता सम्पू लोके 
विख्यात होया श्रौर वडा विद्धान्‌ दोगा ॥ ६ 

माता के र्खे इट श्चलकः इस श्रसम्बद्ध नामको 


अलक रत्यसस्बद्ध पहस्येदमथान्वीत्‌.।\१४।॥| सुनकर राजा कच हैसकर योते ॥ १४॥ 


राजौद्रल्व 
भवत्या यदिदं नाम सरप्रस्य कतं शभे । 


किमीदशमसस्बद्धमयः कोऽस्य मदालसे ॥१५॥ 


सदादस्सेवाच 
कर्पतेयं महाराज कृता खा व्यवहारिक ।. 


राजा बोले- | 
हे शमे मदालसे ! मेरे पुज का तुमने यद क्या 

्रसम्भवसा नाम रका इसका क्या अर्थे?।६५। 
मदालखा वोल्ली-~- ` . -- “ ~ 
- दे महाराज! इस प्रकार नाम की कयना. कर .. 


अ० ९६ माकरुडेयपुराण | ११७ 
स 


सक्तानां तथा नाम्नां शृणु भूष निरताम्‌ ॥१६॥] लेना प्क व्यवदार की सी वात दै । हे रजन्‌] 
५, श्राप श्रपने रके हुए नामों की निरर्थकता को भी 


ˆ वदन्ति पुरुषाः परज्ञा व्यापिनं पुरूपं यतः । सुनिये ॥ १६॥ विद्धान्‌ लोग पुरुपको व्यापी कदते 
क्रान्तिश्च गतिरुदिष्टा दैशाद्ेशान्तसन्तु या ॥ || है, करति उख वस्तु को कते है जो देश-देशान्तरं 


स्वगो न प्रयातीति व्या देहैश्वरो यत; । | मे गति रखती दै क श्वर पुरय व्यापक 
होने के कारण कदं नदीं जाता, शतः मेरे मत से 


[््) ¢ 

ततो विक्रान्तस्य मता समं निरधक्रा ॥१८॥ विक्रान्त नाम विव्छृल निरर्थक है ॥९८ हे रजम्‌ । 
पुवाहुरिति या संज्ञा तान्यस्य सुतस्य ते| |ओ तुमने सुबाहु" दूसरे पु का नाम रका बृ 
निरथां साप्यमरतलात्‌ पुरुषस्य महीपते ॥१६। | भी १ दे 1 मान नदीं दे॥ 

४ (व शरोर तीसरे पुत्र का नामं जो श्रापते शरभुम्देनः 
व यत्‌ छत नाम रतीयस्यारिमद नः । | सकला वह भी निर्थकदै, इसका भी कारण सुनिये 
मन्य तदप्यप्तस्द्ध शृणु चाप्यत्र कारम्‌ ॥२०॥| ॥ 7० ॥ दे राजन्‌ ! जव एक दी पुदय लव शरीरो 
एक एषे शरीरेषु सर्वेषु पुरुषो यदा। | मँ विद्यमान है तो इस संसार मे उसका कौन शच 


तदास्य रानन्‌ कः शः को वा मिमिदैषयते ॥२९॥ शरीर कीन मित दै १॥२१॥ शरीरो से शरीरो का 


भपेभतानि इर ् नाश होता है, जिसका शरीर दी नदीं है उसका, 
भूतानि शन्ते अमृतां शृते कथम्‌ । | किस पकार या होगा १ बह पुरुप क्रोध आादिसे 


क्रोधादीनां पृथग्मावात्‌ कलपनेयं निरर्थका ॥२२॥ भी थक दै, इसलिये यद कल्पना दी निरथैक दै ॥ 
यदि संव्यवदाराथंमसन्नाम॒प्रकसधते | .| यदि श्सपर भी श्रापके रक्ते हए, नाम सार्थकं 


प्रर व्यावहारिकि है तो फिर श्रलक नाम मेदी - 


कस्मादलकाख्ये भ ४ 
ठ (६. 

नाम्नि भवतो मतम्‌ ॥२३॥ व (| 
क व । जङ्‌ ( सुमति ) वोले- 
'एवयक्तस्तया पथु मिष्या स महीपतिः । बह राजा मदालसाकी यह वातः सुनकर कहने 
तथेत्याह महाधुद्धिदयितां तथ्यवादिनीम्‌ ॥२४।॥ लगा, “दे प्रिये! जो इ तमने कहा वह सचटै॥२७॥ 
तञ्चापि सा सुतं भूया पूर्न्वसुतांस्तथा । फिर मदालसा | भी पदिले पभ की 

५ तरह श्रात्मन्ञान देने लगी, इस पर राजा ऋतध्वज 
भोवाच वोधनननं ताषुवाच स पार्थिवः ॥२५॥| = 50 ष 


राजोवाच राजा बोले- 
करोपि किमिदं मूढे ममाभावाय सन्तते | दे मूख ।यह क्या करतीदै १ श्रव श्रागे संतति 


दुषटावबोधदानेन यथापूव्यं सुतेषु मे ॥२६॥| का माच दै श्रीर्‌ तृ इस पुत्र को भी पिते पुरो 


यदि ते मलियं काय्यै यदि ग्रां कयो मम। | की तट चैराग्य सिखलाती दै ॥ २६॥ यदि तु. मेर 
कटने को मानकर वहे कायं करना चाहती दै जो 


देनं ५ स स्नियोनय ॥२७।| मुश्प्कों प्रिय है तो इसको प्रवृति मागम लगा॥२७॥ 
कम्भमागेः सच्छे नयं देवि गमिष्यति । हे देवि! कर्ममा कानाश कसनेषे पितयं की 
पितृपिण्डनित्तिथ नैवं साध्वि भविष्यति ॥२८॥ व ५ 9७ नहीं ५ ॥ र १ 
देवलो ; + पेतर देवलोक मेँ स्थित हँ तथा जो तिर्यक 
पितरो व हिच््ममागताः | मै भप्त होगे दँ ्रथवा जो मद्य योनि या भूतो 
तदन्मुष्यतां याता भूतव च संस्थिताः ॥२६॥| भर स्थित द ॥ २६॥ तथा ज पितर पुरय, पाप, भूख 
सणुए्यानसपुष्यांश शुदकषामान्‌ ररुपरिप्लुतान्‌ । | अथवा प्यास से युक्त है उनको भलुष्य पिड' शौर 
पिण्डदानेन नरः करववस्थितः । | जल से स 
(१ तारश्च भा ० ५ $ 
। सदाप्याययते | तहु बातिथीनपि ॥२०)॥| मध्य पितर, मेत, भूं, हमक, छृमि, कीट शरदि 
देवेमसुष्यः पितमिः भेतेभू तैः समगुदयकेः । | मद्यो को आीवद दते हं जिससे व का 
वथोभिः कृमिकीरैध . नर॒एवोपजीन्यते ॥२१।॥| जीवन वदता है ॥ ३१॥ दे'छन्द । इसत छल 


& ह 


माकंरदेयएुराण 


अ २७ 


तस्माद्‌ तत्ङ्धि पुत्रं मे यत्‌ काय्यं ्षत्रयोनिभिः 


पेहिकायुष्मिकफलं तत्‌ सम्यक्‌ मतिपादय ॥२२॥ 


तेनैवयुक्ता सा भत्रं वरनारी मदा्ता। 
ग्रलकं नाम 
पत्र वद्ध स्व॒ मद्रत्तमनो नन्दय कम्मभिः। 


पुत्र को क्तन्नियोचित कम वताश्रो जिससे इस 
लोक शौर परलोक का फल प्राप्त हो ॥३२ अपने 
स्वामी से इस भकारः कटे जाने पर सुन्दरी मदाल- 


तनयुवाचोष्टाप्वादिनी ॥३३॥ स्य उस अलक नाम पने पुत्र से कहनेलगी ।२२॥ 


हे पुत्र | चिरंजीव रहो, मिनो का उपकार श्नीर 


मिभराणाषुपकाराय दुहदां नाशनाय च शुरो का नाश दि क्म से मेरे खामीके हदय | 


धन्योऽसिरे यो वसुधामशत्रुरेकधिरं पालयितासि 
पत्र । तस्पालनादस्तु सखोपभोगो धम्माद्‌ फलं 
प्राप्स्यसि चापरत्वम्‌ ॥२५॥ 

धराससन्‌ पव्वेसु तपयेथाः समीहितं बन्धुषु 
पूरयेथाः। हितं परस्मं हदि चिन्तयेथा म॒नः 
परसीष निवत्तयेथा; ॥२६॥ ` 
यज्ञेरनेनेर्विवुधाननसमयेर्दिनान्‌ प्रीणय संभि- 
तां । खियथ कमेरतुसैधिराय युद्धे श्वारी- 
स्तोषयितासि वीर ॥३७॥ 

बाल्लो मनो नन्दय बान्धवानां युरोस्तथाज्ञाकरणैः 
हमारः ! सीणां युवा सक्छलमुषणानां इद्धो 
वने वत्स वनेचराणाम्‌ ॥२८॥ 

राज्यं व्यन्‌ युद्दो . नन्दयेथाः सधुन्‌ 
रकषस्तात यततेयजेयाः। दुष्टान्‌ निघठन्‌ पैरिखधानि- 
सध्ये गोविप्राथं बत्स मृत्युं वरनेयाः ॥३६॥ 


को श्रानन्दे पर्हैचा्रो ॥२४॥ हे पुत्र ! तू धन्य है, त्‌ 
शतररदित होकर पृध्वी का पालन कर । उसके 
पालन से तू खुखोपभोग कर तथा धर्म खे श्रमरत्व 
प्राप्त कर ॥ ३५॥ पवौ पर ब्राह्मणं को ठत करो 
माईै, वन्धुरो की इच्छा पूरं कसे, ` सदैव दृखसें 
का हित-चिन्तन करो शरीर परलियो मे कभी मन 
न लगाश्नो ॥ ३६ ॥ तथा श्नेक यज्ञो से देवताश्रों 
को, धन से ब्राह्मण को, सियो को काम से तथा 
श॒चरुञ्रौ को युद्ध से भसन्न रसो ॥ २॥ वाल्यावस्था 


म भाई वन्धुरो को प्रसन्न रखो । ऊुमारावस्था मे 


आ्ञाकारिता से गुरु को, युवावस्थामें च्छे कुलं 
की चियों को नौर चृद्धाचस्था म बनवासियो को 
खुख प्टुचाश्रो ॥ ८ हे वात ! तुम राज्य करते दपः 
मिं को प्रसन्न करना, साधु की रक्षा फरते 
हप यज्ञ करना, दृष्ट रौर शबचचञ्मों का नाश करके 
अश्वमेध यज्ञ करना तथा गो ब्राह्मण के सिये सत्यु 
से भी मयनं करना ॥३६॥ 


इति श्रीमाकण्डेययुराणसं पुत्राजुशाखन (१) नाम छन्वीस्वा अ° समप्त | 
-- सय - वर 


सत्ताईसवां अध्याय 


जड़ उच्च 
पुवयुद्धाप्यमानस्त॒ स तु मात्रा दिने दिने । 


वद्धे वयसा बालो षुदध्या चालकसंकञितः ॥ १॥ 


स॒ कोभारकमासाय्य शतध्वनयुतस्ततः । 


छतोपनयनः भ्राङ्गः परणिपत्याह मातरम्‌ ॥ २॥ 


अदरक उवाच्च्‌ 
मया यद्त्र कततव्यमेहिकाडुष्बिकाय बै । ` 


सखाय -बद्‌. तत्‌ सन्वं भभ्रयावनतस्य मे । २ ॥ छल 


^ न ~~~ 


जड़ ( मति ) बोल्ले~~ - ५ 
इस भकार माता नित्य-प्रति उस .वालक को 

वहलाती जर शिक्ता देती । वह अलक नाम वाला ` 
वालक बाल्यावस्था से वड़ा दोना शरू.इश्रा ॥ १॥ 
ऋतध्वज के उस पु ने जवं ऊुमाराचस्था पाप 
कीं तव उसका यज्ञोपवीत संस्कार हुमा श्रौर बह 
अपनी माता को प्रणाम कर वोलला ॥ २॥ 

लकं बोला- । 


खमे जो ङ इस संसार मे अथवा परलोकर्मे 
के देतु कततन्य है उस सबको सुखे कटो ॥ 


। 


¢ रिते तं ९ ४) (२ 
# सव्वं मरुतेन महात्मना । | सव पर बजय प्रात की । यह सव सोचकर राजा 


, श्र० २७ , माक॑र्देयपुराण ११६ 


मदालसोवाच मदालसा वोली- ध 


हे बरस | राज्याभिषेक होनेपर राजाका कर्तव्य? 
बलस .राज्येऽभिषिक्तेन भनारज्ञनमादितः है कि धर्मपू्वक निर्विरोध भजाका पालन करे ॥७॥ 


कत्तन्यमविरोषेन सखधम्मरस्य महीभता | ४। सात धातुञ्रं के मूल को हरण करतेवाज्ञे व्यसनं 
व्यसनानि परित्यज्य स्र मललहराणि वै । ` | को दछोडकर अपने श्रापको शतरश्रौ से चचाना 


आतमा रिपुभ्यः संरश्यो वहि मात्‌॥ ५। चाहिये तथा भन्नियों के सहयोग से कार्यं करना 
त्मारिषु स्यो घहिमन्तपिनिगमात्‌ न 


अष्टधा नाशमाभोति सचक्रा स्यन्दनाद्यथा । | उत्तम होता है उसी भकार मन्त्यां की सलाद से 
तथा राजाप्यसन्दिश्धं वहिमन्त्रविनिगेमात्‌ ॥ 8 ॥| राजा मी निस्सन्देह सुरक्चित रदतादै ॥६॥ मंत्रियों 
द्टदुष्टंधर जानीयादमात्यानरिदोपतः । इध श्र सजञनों कौ पदिचान रखनी चोदय 


सरेश्चरास्तथा शमोरन्वेष्टव्याः प्रयत्नतः ।। ७ ॥| तथा शुं केमि्ोँकी भी यत्नपूवेक | निगाह 
रखनी चाहिये ॥ ७॥ राज्ञा को चाद्टिये कि अपने 


विश्वासो न तु कततग्यो रामाय । | मिनो, भई वन्धु भौ विष्वास न करे शरीर 
काय्येयोगादमित्रेऽपि विश्वसीत नराधिप; ॥ ८ ॥| यदि मौना हो तो तुका भी ्रिश्वाल करते ॥०॥ 
स्थानषृद्िक्षयज्ञन षाद्गुए्यशुणिनात्मना । | सजाको चादि कि चुः शुरो ्र्ुसार रदे तथा 


भवितव्यं नरेन्रण + स्थान शौर हानि, लाम का ज्ञान रक्ले श्रौर कभी 
भवितन्यं॑नरेद्ण न फामवशवतिनः ॥ ६ ॥ कामके बीमूत न हयो ॥ ६॥ राजां पिले श्चपने 


रागात्मा मन्विणश्चैव ततो भृत्या महीभृता । जश्च फिर पि सवो तथा 

मेयाश्चानन्तरं ६ 6 उसकं वाद्‌ भजा व कर. श्र शचा 

मेयाश्चानन्तरं ५ पिरुष्येत ततोऽरिभिः ॥१०॥ ३ तिर क १९ को न क व 
क ता € वह ठ स 

धस्त्वेतानयिभित्यंव वैरिणो विजिगीषते । ४ 

पोऽजितात्मा जितामात्यः शब्रव्गेण वाध्यते॥११॥| जीता इया है वह शघरश्रँ दाया वध को प्राप्त दोगा 


॥१९॥ हे पुत्र | इसलिये जाको चाये कि पिले 
पस्मात्र्‌ कामादयः, पूल्व जया, पुत्र महीना । कामादिक को जीते उनको तने से निश्य जय 


तज्जये हि जयोऽवश्यं राजा नश्यति तेनितः॥१२॥ प्रात होगी श्रौर उनको म जीतने से ना को भ्रा 


= होता है ॥ १२॥ काम, कोध, लोभ, मद्‌, मान तथा 
फ़ामः क्रोधश्च लोभश्च मदो मानस्तथेव च। 1 


दश्च श्रवो हयं ते विनाशाय महीगृताम्‌ ॥९२॥ है ॥ १३॥ यद स्मरण करके कि काम से राजा पाड 
करामपरसक्तमात्मानं स्मृत्वा पाणडु निपातितम्‌। | का पतन श्रा शौर क्रोध से अनुहाद का पु 


निवर्तयेत्‌ तथा ` ्रोधादचुहादं इतार्मजम्‌ ॥१४॥| मास गया काम श्रर कोध को छोदृदेना चादिये 
प्रं तथा तो रं द्िनैहतम्‌। |॥९४॥ लोभ से राजा पुरूरवा मरा, मद के कारण 
हत्त तथा जाभान्सदाद् ए 1दनहतव्‌ राजा बेशु ब्रह्मणे से शपित होकर मरा । भान से 


मानादनायुषापत्रं बतं दरात्‌ पुरलयम्‌ ॥१५।| चनायुप का पन वलि श्रौर है से पुरश्नय मारे 


५ 


गये ॥१५॥ इन खवको जीतकर महात्मा मरत ने 


स्मृत्वा षिवज्जेयेदेतान्‌ दोषान्‌ स्वीयान्‌ महीपतिः।|| को वादये कि अपतेको इन सव दोपोंसे वचावि ॥ 
काक-कोफिल-भृद्गाणां मृग-व्यास-शिखण्डिनाम्‌। | श्रौर राजा को चाये कि काक, कोकिल, भौंरा, 


+ ॥१७।|| दिरन, सर्प, मोर, दंस, छुक्छुट थर लोह शाट 
ईस इदुटःतोदाना रिषत कु ो ५ । क ष्रि सं शतत भह करे ॥ १७॥ यजां नि 


कीटकस्य क्रियां $्याहुविपकषे सलुजेश्वरः पक्षियों से कीट की तरह काम निकाले तथा राजा 
चेष्टां पिषीलिकानाश्च काले भूपः भदशयेत्‌ ॥१८॥ को चाद्ये कि पनी चे चीरी की तरह सके 


हेयाभिविश्ठुलिङ्गानां ीजवेष्टा च शाक्मलेः । । ॥९० अन्नि के कण श्र शारमलि धृक के वीजकी 


` १२० | माकेरटेयबुराण ० २७ 


1 अपनी चेष्ठा रक्ते श्रौर नीति फे लिये चन्द्र 
चनद्रमूय्यखसूपेस नीत्वथ॒परयवाक्िता ।*१६॥। सकी चर प्रवी पर देखता रडे ॥१६॥ वन्धकी 
वन्यकीपवरशरभ-शलिकाग्विणीस्वनात्‌ । | तरीः कमल, पतद्धा, शलिच्छ, रर््रिरी, तथा इसी 
५ 8 क त ध ¦ प्रकार भ्बलेकी ल्मी के स्त्नसेराजा को बुद्धि 
प्रङ्गा व्र्पय ॥२{॥ तधा पतः 1२०) ग्रह॒ करनी वच द्धििं ॥ २० ॥ श्छ; सूर्य, , यम्‌, 
शक्राक-यम-सोमानां तद्दायोर्महीपतिः ) चन्द्रमा ओर वायु इन प्रच रूपां करो सजा परजा- , 
7 पालन क समय धारण करे २१॥ जिन्त रकार इन्द {. 
पाणि पच्ठ श्वतं मदीपालनकम्पणि ॥२१॥) चार मीने जल वरस कर पृथ्वी का पालन कसते ^ 
यथेन्द्रधतरो भासान्‌ तोयोत्सर्गेण भगतम्‌ । | दै उसी तरड याजा को चाद्ये करि यजा क्रो श्चन 
» १ वि हिरम न 3 करे 22 [प प्रकारं ह 
आप्वाययेद्‌ तथा लोकं पएरिदारमंहीपतिः ॥२२॥॥ शच ल दत ऋ ॥ = ल शार ख आ 


^ मीने अपनी किरणों चे जल का शोषय करता है 
मासानष्टौ यथा शरच्यस्तोयं दरति रमभः ! | उसी धकार राजा सद्म उपायों से थजा खे कर 
चक्षमेणेवाभ्युपायेन पया शल्कादिकं वपः ॥२३।॥ वद्दल == ॥ २ ॥ जिस थक्रार्‌ समय श्रानं परः 
मियय ते नियन्ति यमराज श्रच्छघुरे को देखतं दं उसी धकार राजा 
यथा यमः बरियद्र्ये पराह्नकरालं नियच्छति} ' को चादिये करि खन क घति मिय शरीर इक 
तया भियापिये राजा दुष्टे समो भवेद्‌ २९} भति चपरय हो ॥ २९ ॥ जिस प्रकार परणं चन्द्रमा 
व ४ ४ ` को देखकर मदुप्य प्रसन्न होते उसी प्रकार यजा ` 
पृरन्दुमालोक्य यथा भ्रीतिमान्‌ जायते नरः : को चन्द्रमा करै समान बहो कां क्ररना उचित ह 
1 ४ £ { जिससे परजा ४४ ~ ~ 
एवं यतर भाः सर्वा निट तास्तच्ठशित्रतम्‌ २५८ निस्से भना को खल दो ॥ २४ ॥ निस तरद वायु 
व § ` सव राशियों मे य्॒तरूप से वहत्री है उसी तरह 
स्तः सवभूतेषु निगृदृधरते यथा । यजा चादिये कि यु्चसे दारा नगरनिवासियों 
एवं वरपशवरेारः पौरामात्यादिवनधुषु ॥२६॥' तथा माई ए स (जिल 
लभर ^ ५ : मन लोभ, काम, चर अथं से नदीं ले जाया जाता ' 
1 द्म च कपद्रा रथ्या वस्व मातक्तप्र्‌ । ह वह यजा जिस चक्र एक अन्धा, वच्चे दाय 
ध ५ “1 = लया ङ. € _ + 2 > ॥ 
यथान्यैः कल्यत त्स च्र राना स्वग॑मृच्छवि 1२७] च जाया जाता इः खगं का चला जावा है ॥ २७॥ 
उलग्रादिरो मृदान सयर्मालतो नयान्‌ , जो मढ मदुप्यं ्रपने धम को छोड कर कुमाय पर ` 
॥ रोति ध ९ स ६ नसन्‌। ; चलते ई उनको जो राजा अपने धरम मे लगाता दै 
य; करोति निने म्प्र स राना स्वगंशृच्छति ॥२८॥. बद भौ खम को जाता ह ॥ २८1 हे वत्सः} जिस 
र ४4 ५. [> (3 । 
बरमा न सीदन्त य्व राज्ये तवाश्मा;। =: ॐ यन्य भ बराम्‌ म दास नदीं होत ६ 
। व ~ ` ह इनन संसार व परल) म सुख पाता द ॥२६॥ 
सुख ५८ पयह त श्र प्न . न ह ®, २, जिसे # ५ (~ (^ 
एतद्रा पर छरत्य त्थतत्‌ सिद्धिकारकम्‌ । | हो 1 जो इद्धो कारा क्रि गया दो उसको 
सखययस्मस्वापन्‌ वरणा चास्यतं यत्‌ इुयुद्धिभिः॥ ३०; | निबार॒ करक च्चपने धम को स्थापन कर ॥ ३०॥ 
श व प्रजा का पालन करने चे दी यजा छतच्ृत्य होता ; 
। ततान मदीपतिः। | है। मजाके भली मक्र पालन से जो पुर्य : 
सम्यक्‌ पालयिता भागं धम्पस्या्ोति यत्नतः ३१ देता है उसका भाग राजा को प्राप्न दोता है ॥३९॥ 
१ १ £ इख श्रक्रार चारों वरो करी रक्ता करदा हु राज ` 
राजा चातुव्स्यस्य रक्षणे (न मे ह „~ 
एवं वो वत्तते व 1 |स लोक च इन्तो भे सुख पूवक चिदा 
स सुखी विहरत्येष श॒करस्यंति सलोकताम्‌ ३२॥॥ करता दै ॥ २२॥ ० 


१९ £ ० = ॐ = ^ सत्तर | ~ । | 
इति श्रीमाङ्र्डेयपुराण भे पुत्रालुभासन (२) नाम सतासो अध्याय समा्ष ।' : - 


- ` = वदु. , 


अ्० २८ १६ ^ मङ्रस्ठेयपुराण न ष ` "१२१ 


अटारसवां अध्याय. ~ अ 


६ जड उवाच अड वोला- । ( 
तन्मातुवेचनं श्रुत्वा सोऽ्लरको मातरं पुनः) ह के उस त ९ । र 
पमच्छ वणंध्मीथ धम्मं ये चाभरमेषु च ॥ १ = 

` श्रलक उवाच शरलकं वोला-- क 
कथितोऽयं महाभागे राञ्यतन्त्राथितस्वया । |. दे मदामागे } ाज्यतन्ब सम्बन्धी धर्म श्नापने 
५ रतं (1 £. घर्मको + 4 
धम्म तमहमिच्छामि धतुं वर्णाश्रमात्मकम्‌ ।| २॥| कदा, श्रव मर बणोशरम धरमको छनन चातः ह ॥ 
मदालसोचाच मदालसा वो्ी-- भो < 
६ ॥ ठान, अध्ययन श्रोर यक्ष माह्यण फे यह तीन 
दा {4 ८ व्रह्धिणस्य त्रिधा # £ + - ८ तिम [५ 
नमध्ययनं यन्नो ब्राहमणस्य त्रपा मतः| धर्म है चौथा नहीं । श्रापत्ति के विना यद धमं 


नान्यश्चतर्थो धर्मोऽस्ति धम्मस्तस्यापदं पिना ॥२॥ ह ॥2] शद यज्ञ कराना, पदाना शरीर धवित्र दान 
याजनाध्यापने शुद्धे त्था पतप्रतिग्रहः। | केना यद तीन भकार की. जीविका ब्राह्मण. की 


एषा सम्यक समाख्याता चिपिधा चास्य जीविका ४ घतलाई जाती £ ॥ ४॥ भ देना, पटना श्रौर यन्न 
= छि करना क्षननिय का भी यदह तीन प्रकारका धर्म कहा 

दानप्र # ्षभ्रियस्या स्पा 

ानमध्ययनं यहः कषनरियस्या्ययं त्रिणा | है । पृथ्वी की रक्ता ओर शख से जीवन-नि्वाद 


परमः गो्त कते रा शाजीयव जीविका ४॥| यद उसकी जीविका दै ॥.५॥ वान, अधयन शरीर 
दानमध्ययनं यत्नो वैश्यस्यापि चरिैव सः। | यतत वैश्य का भी यह तीन भकार का धमं हे तथा 


वाणिल्यं पायास्यश्च कृपिश्चैवास्य जीषिका'६ ॥| वारिज्य, पषटपालन प्रौर छृपि उसकी जीविका है 
५१ । ॥६। दान, यक्च पव दविजाति्यो की शश्रुषा ये श्र 


दानं यतोऽ शुभ्रा दविजातीनां त्रिधा मया । | का तीन शकार का धरे शरीर, शिटप कम, द्विजो 
व्याख्यातः शुद्रधम्मोऽपि जीविका कास्कम्मं च॥७।॥| की सेवा शौर पोयस, खरीदना श्रौर -वेचना, यह 
तद्रिदवनापिुभुषा पोषणं क्रय-विक्रयौ । | ट्र की श्राजीविका है । ये बरशेधमं मने कदे, श्व 


व्ीथमास्तिमे भक्ताः भयन्तां चा्माथयाः॥८॥| ्ा्रम-धम को खनो ॥९-८॥ मद्यं श्रपने 
वर्ण॑धरमं से चट न होकर दी सिद्धि रोघ करतादै, 


५ संसिद्धि ५\ 

स्ववगयममात्‌ = १ च्युतः । | निषिद्ध श्माचरण करने से मने पर नरक मे जाता 
प्रयाति नरकं भेर्य भरतिषिद्धनिपेवणात्‌ ॥ ६ ॥| ३ ॥ ६॥ हे पुत्र 1 जव तक द्विजाति का उपनयन 
यावन नोपनयनं क्रियते वै द्विजन्मनः। | नद्योतव त चे, श श्रौर 
कामचेषटोक्तिभध्यश्च तावद्भवति पुत्रक ॥१०॥ भक्तश कर सकते € ॥६०॥ परु उपनयन क वा 
> धनयनः 4 द्मचारी गरो २। ६ श्रची तरद्‌ ब्रह्मचारी रहकर युर के धर मे .रहना 
त ८ | | चाये द्य पर जो उसका धम दै बह गै कहती 
वेद्‌ एत्र च धर्मोऽस्य कथ्यते तं धिवोध मे॥११। ह, खनो ॥९९॥ खाध्यायः श्ननिवन, लान, भिचा 
स्वाध्यायोऽ्याधि््रषा स्नानं भिक्षाटनं तथा| | के लिये मण्‌ णं मित्ताभे ८ हद अन्न र 
गरोियेय॒तचान्मलुङ्ातेन र्दा ।\१२॥ युके सिये निषदनं कर उन जा स कामो 
ग्रसे; कर्म + लाना ॥ १२॥ युर के कायम संलग्न रना! उन 
गुरोः कम्मणि सोद्योग; सम्यक्‌ भीत्युपपादनम्‌ । | पसनन करना तथा उनके वुलाने पर पकाः चित्तं 
तेनाहूतः पेचैव ततरो नान्यमानसः ।१३॥| दोकर तत्परता से पना ॥ १२ ॥ पक त भवा 
एवं द्रौ सकलान्‌ वापि वेदान्‌ भाष्य गुरो समूलं दौ को शख्सुख से पाकरः उनकी भरा 
मदत नद्या दिया गुखः रतः ९४॥| मया कर यु वि 

र. 1 र यृदस्ध्य होने का अभ्रिलापी गदुस्थाभ्रम मे जीवि 
गाहस्थ्याश्रमकामस्तु शहस्थाश्रममावसेत्‌ ! . | च्रथवा श्यनी इ्वजुसार चतुथं वानप्रस्थ श्रा्रम 


` वानमस्थाथ्मं वापि चतु्शेच्छयात्मनः ॥१५॥ मे.भविषट दो ॥ १५॥ श्रवा वदी शुर करे. घर. परः 


(~ - 


अर ~ 


` रऽ २८ 


. साकेर्डेयपुराण ` 


¦ निवासत करे, गुर के न रहने पर उनके पुत्रमे श्रौर 
तत्रव वा गुरोगेदै व पुत्र के भी न दने पर उनके शिष्य मै निरभिमान 
गुरोरभावे तुते तच्छिष्ये तत्सुतं धिना ॥९६॥ होकर भक्ति श्नौर खेवा करता हुघा भदचर्धाथत 


शुभ्र र्मिरभिमानों , ्रह्यचव्याश्रमः पसव । । मेरे । इसके शन्त छ्ध्यथन समाप्त कर -वहां 


१५२ क, 


उपात्तस्ततस्तस्माटुग्रहस्थाश्रमकाभ्यथा -॥१५७। से गदस्था्म .कौ इच्छा से ॥ १६-१७ ॥ भिन्न 
गोघ्न मँ चैदां इई, सेग रदित, स्ियोचित चिल से 
्मपने सदश खी को गृहस्थाश्रम के लिये व्याहेः॥ 
श्रपने कार्यं से चन पाकर पितरः देवता श्रं 
अतिथिथों फो भक्तिपूवेक - प्रसन्न करता इश्राः आ 
श्रित का पोषण करे ॥१६॥ शक्ति के श्रुलार श्न 
दान के द्वारा नीकसे फो पुत्‌, जाति वान्धव, दीन, 
न्ध, पतितो एवं पक्तियोंका पोषण करे ॥२०ा षष्ट 
श्नोर ऋतुकाल में छी धशवद्ध करना गृदस्थका धमं 
है, उसे "वाहये किं यथा सम्भव पश्चयक्षं को न 
छोड ॥२१॥ पने वैभव पै अचु सारः पुरुष खयं 
पितर, देवता, तिथि श्रौर जाति वान्धवों के 
भोजन से श्रवशिष्ट श्रघ्न को _्रालन्दिति होकर 
श्रपने सेवको के साथ सोजन करे ॥ २२॥ गरदस्थं 
आश्रम का यह घमं मैने सं्ेपसे कदा, अव चान- 
प्रस्थ के.ध्मं को कहती हनो ॥ २२॥ बुद्धिमान्‌ 
पुरुष श्रपनी सन्तान एवं देह की छृडता ' को देख ` 
कर अपनी शुद्धि के लिये वानप्रस्थ आश्वम में जवि 
॥२॥ चां चन की सामभ्रियों का उपमोग तथा; 
तपस्या के दारा अपना शौोषर्‌, - पृथ्यी मे शयन; 
बरह्मच शौर पितरः, देवता श्रौर तिथियों .की 
क्रियायं ॥२५॥ दोम, तीनो बार खनान, जय शरीर. 
वल्कल धारणःयोगाभ्याख एवं खदा जङ्गली जीवों . 
से स्नेहं ॥२६॥ यह ` रव पाप की शुद्धि फेत्तिये ` 
श्रपना उपकार करने वाला वानप्रस्थं - श्रानम दै, 
श्यतपएव भिल्लुक के लिये यह अन्तिम है ॥२७॥ ` 
चतुथ श्माश्रम का स्वरूप मुभसे खनो, जेसा किं 
इसका स्वरूप धर्मात्मा महत्माश्मो ने वतलाया है ॥ 
समस्त धिषयों का परित्याग, बह्यच्य, क्रोध का 
अभावे, जितेन्द्रियता, एक स्थान पर बहुत दिन 
तक न रहना ॥ २६॥ भित्ता मे भिज्ञ इए. रन्न से. 
पक वार भोजनं करना, भोजनको सिद्ध न करन, ' 
श्त्मक्ञान को पाप्त करमे की _ इच्छा, आत्मा काः 
श्रवलोकन ॥ २० ॥ चौथे भाश्रम मे यह ध्म हे लो. 
कि मेने तुमसे कदा, अदः अन्य बरं शौर श्रा्रमों 


के साम्य धर्म को सुभसे सुनो ॥ ३१॥ सत्थ, ` 


ततोऽसमानर्षडिलां तस्यां भा्यामरोगिरीम्‌। 
उद्वरन्यायतोऽनयज्घं  शहस्थाभमकारणात्‌ ॥१८ 
खकर्स्मणा घनं लब्ध्वा पितृदेवातिथींस्तथा । 
सम्य सभ्भीणएयन्‌ भक्त्या पोषयेचाधितांस्तथा १६ 
भृत्यात्सनान्‌ नामयोऽथ दीनान्धपतितानपि । 
यथारशक्त्यान्नदानेन वयांसि पशवस्तथा ॥२०॥ 
एष धम्मो ग्रदस्थस्य ऋतावभिगसस्तथा 
पंचयज्ञविधानन्तु यथाशक्त्या न हापयेत्‌ ॥२१॥ 
पित-देवातिथि-जञाति-धक्तरेषं स्वयं नरः । 
धुज्ीत च समं भ्येयेथाधिभेवमाहतः ॥२२॥ 
एष तृहेशतः भक्तो गरदस्थस्याश्रमो मया । 
वानप्रस्थस्य धम्मं ते कथयाम्यवधाय्येतास्‌ ॥२३ 
श्रपत्यसन्ततिं दष्ट भानो देहस्य चानतिम्‌ । 
वानमस्थाशमं गच्छेदात्मनः शुद्धिकारणाप्‌ ।२४॥ 
तत्रारण्योपभोग तपोमिधाड्कषंणम्‌ । 
भूमौ श्या ब्रह्मचय्यं पिददेवातिथिक्रिया ॥२५॥ 
होमलिपवणरनानं जटाव्रकलधारणम्‌ । 
योगाभ्यासः सदा चेव वन्यस्नेहनिषेवणम्‌ ।२६॥ 
इत्येष  पापशुद्धवथमात्सनशोपकारकः । 
वानपस्थाश्रमस्तस्माद्विक्षोस्तु चरभोऽपरः ॥२७॥ 
चतुथैस्य स्वरुपन्तु श्रुयतामाभ्रमस्य मे । 

यः स्वधर््मोऽस्य धम्म; पोक्तस्तात महात्ममिः२८ 
सव्वेसङ्परित्यागो तब्रह्मचस्यैमकोपिता | 
यतेन्द्ियतवमावासे नेकस्मिन्‌ घसतिर्रम्‌ ॥२६ 
श्ननारम्यस्तथाहारो भेध्यान्नेनैककालिना । 
आआत्सङ्ञानाववोषेच्छा तथा चात्मावलोकनम्‌।।३० 
चेतुं तवाश्रमे धर्म्मो मयायं ते निवेदितः 
सामान्यमन्थयणानामाभमाणाञ्च मे शृ ॥३१॥ 
सत्यं शोचमर्हिसा च अनसूया तथा क्षमा | 


पतिता, अर्हिसा, डादं न करना, शन्ति.श्रकरता, 


मरादृशंस्यमकरपए्यं सन्तोपश्चा्मो गणः ॥२२॥| परता का श्रभावं, श्राढवां सन्तोष-हे ॥२२॥ 


अ० २६ | माकंएडेययुरा | १२३ 
-------------------~------___ 


` ---------~-------------------------------------- 


१ ५ ~ ~~ ~~ 
एते संकषपतः भोक्ता धर्म्मा वर्णाश्रमेषु ते । | ये सपेय से वशं श्रीर श्रामो के धरम तुमसे 
एतेषु च स्वधर्ममषु सयेषु तिष्ठेत्‌ समन्ततः ॥२३। ४ व वा 4 सव लोन > १६२ 

: | पुरुप श्प | के घमं कों 
1 धम्मं स्पबरणाभमसंहितम्‌ । | श्रन्यथा ग 1 
नर॑ऽन्यथा परवत्तत स दएल्यो भूभृतो भवेत्‌ ॥३४।१ चाहिये ॥ ३८॥ जो म्य अपे धर्मको त्यागकर 


। ये च स्वधम्मसन्यागात्‌ पापं इव्वनति मानवाः] | पाप किया उनकी ल वले राजा 
“ । फ सफपस्त यञ्च ९ + 
न 


तस्माद्राजा प्रयत्नेन सर्व्वे वर्णा; स्वधर्मतः । | से अन्यथा त व 
† प्व्चन्तो दरड दना च उन्हे श्रपने- 
न्तोऽन्यथा दएव्याः स्थाप्या स्वकम्मसु३ ६। लगाना चाहिये ॥ २६॥ ~ 


दति श्रीमाकरुडेय० भे पिता-पुत्र संवादके पुत्ाचुशासनमे मदालसा चाक्य नाम २८ अ० समा । 
"8 । 


उनतीष्वों अष्याय 


१ लकं उवाच / , श्रलकं क त 
काय्य पुरुपाणाभ्च प्यमरवतच्चता ग्रदस्थ धमं फे पालन करने वा क 
यत्‌ कव्य पृर्ुपाणाञ्च गादस्म्यमरुबचताय्‌ । [ह तर वित्तेन करने त 


वन्धग्च स्यादकरणे क्रियया यस्य चोच्छति।१॥ स उक्षति रोती है ॥ १॥ परमै रने चते मदप्य 
उपकाराय यन्दरणां यच्च षञ्ञ्यं शह सत्ता | को जो हे य्य बस ह उसे भदु्यो को 


यथा च क्रियते तन्मे यथात्‌ पृच्छतो बद ॥ २॥ क $ सिय शवा सुमे यथाव किये, 


» मदालसोवाच सदाकल्षसा वोर्ल-- 


वत्स गारहरथ्यमादाय नरः स्वमिदं नगत्‌ | 8 वत्स ।गृदस्थ छ समं गद 
लोकांश्च जयल्यश्ति8 | का पोपर्‌ करता दै, वद 
यावि तन रोक स जयत्पमिवाज्छतरान॥२॥ लोको छो भरा्त करता है ॥२॥ पित्रीश्वर, सनि, 


पितरो शुनयोः देवा भूतानि मदुनास्तथा ! | देवता, भूत, मलप्य, कमि, कीट, पतद्, पती, प, 


कृमि-करीर-पतद्खाश्च वयांसि प्शषोस्स॒सः ॥ ४। नौर श्रषुर व ॥४॥ र चष त 
हस्थपनीवन्ति ततस्तप्निं भयान्तिचं। | दी जोवित रते दै तथा दक्षि को प्रात हाते ह 
1 ४ सथ गृदस्थ के मुख की शरोर ताकतेदं कि वह हमें 


एषन्वास्य नरीतनं अपि नो दासयतीतिवं ॥\॥ कव दगा ॥ ५ ॥ हे वत्स 1. तीनों वेदो के अनुसार 
सववसापारभू ५ धसतीमयी | गृदस्थ सवका श्राधारमृत श्रौर कामधेदु के समान - 
यस्यां भतिष्ठितं धि्वं षिश्वदेतुश्च या मता ॥ ६॥ है जिसपर भि स्पूं संसार पतिष्ित दै तथा जो 


वः (प्‌ - ¢ ~ ॐ गृहरः ् कामधेनु 
ऋकषृषठासौ यद्ध्या सामेवक्लरिरेधसया | | विष्व का कार्ण द ॥ ६॥ इस एृटस्थरूपी कयमधेद्‌ 
1 #ै कीं पीट पर्वे है तथा इसी प्रकार मध्य शरीर 


॥ पूतेपि 4 “ 
इष्टप्तवपाणा च , सधत्ततनूरहा ॥ (द ॥ ययुरैद, मुख सामवेद, शिर एथ्वी, यज्ञ सींग शौर 
शन्तिपुष्टिशन्भूवा = वणयादमतिष्ठिता ।` ' | साधुखुक्त सेम ह ॥७॥ शान्ति इसकी गोवर शौर 


श्राजीन्यमाना जगतां साक्ष्या नोपवीयते ॥ ८ ॥-पुि इसका भूर है तथा वशं इसका चरम दै यद 
स्याहाकारखथाकासौ षपदकारय्व शवक 1 ` | अकतय शरोर जगतत को ओविते करने वाली दै ॥ ८॥ 
= हे लकं { खादाकार, स्वधा्वार, वषंयूकार, तथा 


हन्तकारस्तथा , चान्यसतस्यास्तनचु्यम्‌ ॥ ६ ॥ हन्तकार इस गाय फे चार स्तव है ॥ ६॥ स्वाहा- 
स्माहाकारं स्तनं देवाः पितरच खधामय॒षू। : | कार स्तन को देषा, स्वधाकारः को नर न्प 


मुनयश्च वषट्कार देवभतसुरेतराः 1१०1१ रपद्कार को सुनि लोन पति हँ 


१२४ माकंर्ठेवपुराणं | श्र २६ 


इन्कार मदुष्याश्च पिवान्तं सतत स्वनम्‌ । ध खरस २ 1 १० 

दच्तक्छर पा द 
एवमाप्यायचत्येप वत्स ॒धेयुखयामया ॥११।, तीर्न चेद तरयी चेर 
तेादुच्छेदकत्त च यो नरोऽत्यन्तपापए्कृद्‌ ! ! जो मखन्व येसी ज्वमचेड यसु की उप्ता कर्ता है बद 
स॒ तमस्यन्धतामिस् तामि च निमज्जति ॥१२।॥ पाष जन्यक्तार प्रसं नरका 


1 देवताच्नो ते पूजित 
य्रृचंसा मानक धतु स्वंदत्संरसरादिभिः पालता ड चह उचित ऋाल में चमं चे जाता ४, 
पाययत्युचिते काले स॒स्वगावेपयवते ।१३॥; इत्ति दे पन ! जलण्य 


तस्मात्‌ पुत्र मदष्येर देव्षि-पिव्-मनवाः । | दिन श्रे शरीर की भांति देवता, पि, पितर, 


भूतानि चातुदिवसं पोष्याणि स्वतुयंया ।१४॥| मन्य ओर भृतो जन पोयरा करे 1 ९४ ॥ अत्वे 
तस्माद्‌ स्नातः शुचिमा देवर्पिपिदतपंणम्‌ ! | च्नान कर पाज इकर सावधाना स समन पर 


दाहितः जल से देवता, ऋपिः पितर श्नौर प्रजापति का 
परनायतेस्तयंवाद्धिः काले इच्याव्‌ च्‌ 5 ॥१५। तपर करे ॥ ९५॥ मलुषय पष्य, न्ध शौर धूप से 


छुसनोगन्यधूुपे्च देव॒नभ्यच्च्यं मानवाः ५ | देवतान चो पूजकर अचि मे होम करे चौर वलि- 
ततोऽनेस्तपणं इव्याचेयाश्च उलयस्तया ॥ १६१५ दन देवे ॥ १६॥ धर के वीच में जल्ला के क्तिये 


| 

^ 

2 5 
3, 4 

| 
५, 

५ 

| 

4 : 


~ ५८८००००५ 


बरदयणे ग्रहस्य त रिश्चेदेवेभ्य एव च 1- | जर दिष्वेदेवों को वलि देषे तथा पूर्वोत्तर दिखा 
यन्वन्तरिं सबुदधश्य म्युदीच्यां बसि कियद्‌ ॥१७॥॥| मं धन्वंतरि के उदेश्य से वलति देवे ॥ ९७॥ पूर्व 
र्यां शक्राय याम्यायां यमाय वलिमाहरेद्‌। ध नदर े लिये, उक्सा म यमराज के लिये 
मरीच्य बलायाय सोमायोततस्तो उलिम्‌ ॥१८।॥ वत्ति देने । पश््िममं ब को शौर जरम सोम 


@ो वलि देते ॥९=॥ धर क दरवाजे प्र धाताश्रौर \ 
दवरादाघ्रे वित्रे च बिं वारे शस्य तु! | विधाता को व्तिदान देवे तथा अर्यमा को. चर ' 


अय्यम्णेऽथ हिदंयाटग्रहेभ्य्थ समन्ततः 11१ ६॥ के बाहर चारं ओर बलिदान उेना चादिये {९९ 
नक्तशवरेभ्यो भूतेभ्यो व्िमाकाशतो हरेद्‌ । | राख चौर धतो को आका मेँ वक्ति देवे. तथा 


, पिणं निर्वपेवैव दक्षिणामिषटुसस्थितः ।1२०॥ चहस्थी तत्पर च्रौर खातधान चित्त होकर दक्चिरा 


. शृहस्यस्तत्ययं भूत्वा सुसमाहितमानसः 


क्य ओर सुख करङ़ पितरों को वल्लि देवे ! इसके 
अनन्तर जल लंकर उन-उचं देचताय्ा का उदस्य 
ततस्तोयुपादाय तष्वेवाचमनाय व ॥२१।|| जरे जाचमन के लिचि पूर्वो स्यानेमे जजल-छोडे 
स्याति निष्पत्‌ भ्ष्तास्ता उद्य देवताः! | ४ भकारः गृहपति पवित्र दयोकर घर मे यह . वलि 
= ॥ ०, २९. २५ ॥ पिर भूर्तोकी दृति के लिये 
ग्रहवति . गृहपतिः शुचिः 1२२ 
एव गृहच. छता धह चुप शचः ॥२२' खम्मानपूवेक उत्छर्नं करे तथा न्तो, श्वपचो शौर 
्ाप्यायनाय भूताना इयदतछवसादरात्‌ ] पिया के लवि पृथ्वी नी मे वलि दे ॥२३॥ इसको 
गवस्यथ शवपचस्यश्च वयाभ्वथावपटूशुि 1२३; | चेज्छदेच कमं कहते है यद सन्त्य अर आतःकाल 
= ५ क्या जाता ॐ 
व 
इसके वाद्‌ आचमन करके दार ऋ श्नोर देखे्थ) 
सराचन्य ५ दारवरसाकिनम्‌। य र ५ द 
आचम्य च ततः इव्यदुाजञ ॥२४; | सुते के आ मान ये भोजनकरे शरीर उस समय 
एहचस्यषटमंमणदी्योऽप्यविधिभवेह्‌ । | यदि कोई अतिथि अजाय दो उको भी शर्नं 
अिधथि ततर सस्प्रा्टमनाद् नादकेनर च ।२१५१ श्रोर जल दान क्रे 1 २५८ ॥ श्चपनीं सक्ति के अदुः, 


> 
# 


ध 


` सुम्पूलयेदयवाश्क्ति गन्युष्पादिभिस्तथा ! | सपर गन्ध, पुष्पादि से उसकी पूना करे तथा यदिः 


९ न मितमतिथं इव्यानेकगरसनिवासिनम्‌ ॥२६॥ शरदि पने ग्राम ऋ स्ठने वाला या मित्र नी 
` ` -अहात्कृत्तनामानं ` तत्त्लसमुपस्वितव्‌ 


तो सी उखका खत्ार करना चाहिये "1 दद 
उस समय उपास्थत होने चाल, जिसका नमिः 


० २६. माक॑एडेयपुराए १२५ 


छले इत्यादि कात न ो पेखा भूखा, थका भागते शान्तं याचमोनमि्नम्‌ | इत शादि वात न शो येल मूख, थका, 
मागता हुश्च, निर्न दस भकार फे प्राहम्‌ 
को श्रतिथि कटा हे बह चुद्धिमानं से. शक्ति फे 
सारः पूर्य ` दै ॥ २७॥ परिडत को चादि पि 
र ्रतिथि से गो, चरण्‌ श्रौर स्वाध्याय को भीन 
शोभना लवं मन्येत भनापतिम्‌ ॥२८।. पचे शरीर बद घुन्दर दो या ङरूप उसो ब्रह्माजी 
नित्यं हि स्थितो यस्मात्‌ तस्मादतिधिुच्यते। २ र त नित्य न 
व 
व त चयेदश्दामौ ॥२६. | शदस्थी ऋण से सक्त दो जाता है ॥ २६ ॥ उसको 
त, युक्त स्वय किखिषथुडनरः | भोजन न कराकर जो मयुण्य स्वयं भोजन करतेता 
स पाप केबलं थुडकते पुरीषश्वान्यजन्मनि ॥३०॥ = बट पापी है श्नौर बह ध म ष्ठा 
अरतिविथैस्य भश ग्रहात्‌ भविनिवरतते। | श जिसके घर से शरतिथि निराश हो 
7 = वह अपन 
च दता दुष्कृत तस्मे एुणएयमादाय गच्छति ॥२१॥| कर उस पुय ले त 8। ध 
अप्यम्युशाकदानेन यद्राप्यश्चाति स स्वयम्‌। | शरः श्रादि जो कु स्वयं साय उसी से मनुष्यको 
पूजयेत्‌ तु नरः शक्त्या तनवातिथिमादरात्‌ ॥२२॥ चदय कि शप ति र अ्ुलार ऋ्षठथि, की 
. 9 पूजा करे ॥ २२॥ शौर श्राद्ध के दिन पितो : 
+ दकेन ् द्ध के दिनं पित्तरोका 
्ययााहरहः श्राद्धमनाचं नोदकेन च । | उदेश्य करके श्रन् श्नौर जल दानकरे श्रौर ब्राहमणो 
पितृलुदिश्य विप्रश्च भोजयेद्धिममेव घा ।३३।॥ को भोजन करावे ॥३२॥ जो छु अघ्न चचे उसे 
अन्न्यग्ं तदुद्य घ्रा्णायोपपादयेत्‌ । | ब्राहमण को देदे तथा परिवाजक या ब्रह्मचाशे . जो 
भिषा याचतां दयात्‌ पराद्वहचारिणाम्‌३४॥| भि माता इमा शवे उसको दे ॥ २०॥ क्‌ 
रासममाणा भा स्याद प्रासचतुषयम्‌ । | था ०. 
¡ चं ह मू तथा चार ग्र को श्रेष्ठ ब्राह्मण दन्तकार -फटते दै 
अग्रं चतुगुणं भहृदन्तकार द्विजोत्तमा; ॥२५।॥| ॥ ३५ ॥- पनी शक्ति के अनुसार हन्तकार श्र 
भोजनं हन्तकारं षा अग्रं भि्तामथापिं वा । | श्रथवा मार्‌ व दि विन 
अदचचा तु न मोक्तव्यं यथाविभवमात्मनः ॥२६।॥| सवथ न ला ॥ तथ ॥ अतिथि, भियजरनो, सना 
पनयिलातियीनिषन्‌ । तियो, बन्धुश्रों तथा याचकः को सम्मानित करये 
व । | व्याङ्घलो, बालको, दृध चौर ्रातुशों को भोजने 
कलाम्‌ वालदृद्धं् भोजयेच्वातुरांस्तथा ॥२७॥| करावे ॥ २७॥ तथा श्रपनी सामथ्यं के श्रनुसार 
वाञ्छते धुतयरीतात्मा यचान्योऽत्नमकिश्चनः। त (४ [व को भोजन 
ुटुम्बिना भोजनीयंः समथं - | कराते ॥ २८॥ जो सजातीय ्रपने धनवान्‌ जारि 
गां ५ व सति ॥२८॥।| बलि ॐ पास श्राकर भी कष्ट पाता है तो फिः 
तिमा या ङ सीदति । | जिल पाप को बह दुःखी पुरुष .करता है. वद पाए 
सीदता चत्‌ कृतं तेन तत्‌ पापं स समश्रुते \।२६॥ धनवान को लंग जाता है ॥३६॥ सायंकाल की जे 
सायशचैव तरिधिः काथ्य सयो तत्र चातिथिम्‌ । ६ 3 स 
ध -भोजतैः श्रतिथि आरावे उसको सुय॑बत्‌ समभे श्रौर उर 
ूनयेत यथाशक्ति , शयनासन भोजन; ॥४०।| ॐ सोने, वने र मोग फ धारक वन 
एवष्ुददतस्तात भारस्थ्य मारमाहितम्‌ | | करे ॥४०॥ टे श्रलकं !.यद भार ग्रहस्थों के. उपः 
बन्धु बिधाता देवाश्च पितरश्च महपयः ॥४१॥| रका गया. ! ज इसको धारण कसते द उनरं 
भरेयोऽभिवर्षिणः सन्न तथैवातिथिबान्धवाः । 
पशुपक्षिगणास्तषठा ये चान्ये सृष््मकीटका; 1४९ 
गाथाश्चात्र. महाभाग स्वयमत्रिणायतः। 


शुयुतुमागतं शान्तं याचमानमकिञ्चनम्‌ । 
ब्राह्मणं पाहुरतिथि स पूज्यः शक्तितो दुपैः ॥२७ 
न पृच्छदरो्रचरणं स्वाध्यायश्वापि पणितः । 


ब्रह्माजी, देवता, पिठगण, महर्पि॥४१॥ तथा अतिरि 
` भाई, वन्धु, पय, पक्षी श्रौर कीर सव प्रसन्न द. 
ह तथा उनके कट्या की कामना करते है ॥ ४२. 


हे महाभागी' पुत्र. । यहाँ ` छनि, सुनि र ने-<न 


क ` 
0 १ 0 


१२६ माकंण्डेयपुराण श्र० ३० 


वियोगिना 
-~----^ 


.ताः शृणु महभाम धाथमसंस्थितः, ५ 
ताः भृरप महामाग एहस्थाभमसंस्थित सुनो ॥.४३ ॥ श्रपनी शक्ति के श्चुसार गृदस्थी 


॥४३॥ गरदस्थियां के लिये एक गाथा कदी है उसको तुम ` 


देवान्‌ पितर ातिथीश्च तद्वत्‌ सम्पूज्यं बान्धवान्‌ | | देवताश, पितरो रौर उसी प्रकार वान्धनो,. ¦ 


ह्ातीस्तथा शुरूध्चेव प्रस्थो पिभवे सति ॥४४।॥| सजातियों तथा शुरु की पूजा करके ॥ ४४॥ छुततो, 


[१ (> श्रा न, 
। चेभ्यश्चवयोभ्यग्चायपेृ्वि। | डोम्‌ ओर परियो शादि को भोजन करा, इसी. 
० ध 9; को वेश्वदैवकमे कहते है इसको दिनम तथा.सायं- 


श्वदेवं न्भ £ र 
मै हि 9 दिने ४१ जालं ॐ समथ रला चादिये ॥ ४५॥ मांस, अन्न, 
मसिमन्त तुथा `शुक ग्रहे य्चोपसाधितम्‌ । शाक या अन्य जो कु वस्तु घरपर हो उसको `, 


नचतत्‌ स्पयसेशचीयाद्विधिवचन्न निवपेत्‌ ॥४६॥| उपरोक्त लोगोको रपि करिये विना सवयं न लाये॥ 
इति श्रीमाकर्डेयषुराण में मदालसोपदेशं नाम र€गोँ अध्याय समाप्त । | 
-- > 32: ६९ -- ५ 


तीको अध्या 
1 । मदालसा षोती-- 6 रः 
नमि [] निः ् तिक पुनर [चचधात्प त्यक्ष 

४ निस्यतैमित्तिकं तथा । दे पुन । खस्थ के क कम अथ 
नित्य न तन ४ प्रक ॥ १॥ ( १) नित्य (२) नैमित्तिक (३) नित्य नैमित्तिक 
स्थस्य त्रिधा कम्म तन्निशामय पुरक को शुनो 1 १॥ पञ्चयज्ञ के श्राश्ित जो कम॑ है.उन 
पञ्चयङ्ञाधितं नित्यं यदेतत्‌ कथितं तव । को नित्य कहते है ्ौर पुय-जन्म शायिके उपलकत 
तेमित्तिकं तथेवान्यत्‌ पुत्रजन्मक्रियादिकम्‌ ॥ २। मे हृष उत्सवो को नैमित्तिक कते ह ॥ २] पंडित 
नसयतैमितिवं हेय प्वभाद्धादि परिव । लोग पव श्चौर श्राद्ध श्रादि को नित्यनैमित्तिक 
नित्यनेमित्तिकं हें पत्य प्तः | | कते अव भर्ुदय रायि शराद् जो नैमितिक 
तुत्र नैमित्तिकं वक्ष्ये श्राद्धमभ्युदयं तव ॥ २ ॥ है उनको कहती हं खनो ॥३ ॥ सनुप्यों को चाये 
त्रनन्मनि यत्‌ काय्यं जातकम्म॑समं नरो; । कायं र म अतिकं व श्नुखार 
पिवाददौ स करनयसनं प कर श्रौर क्रम से विवाह आादि.भी करें ॥४॥ 
विवाहादां च कत्तव्य सव्वं सम्यक्‌ क्रमोदितम्‌ ४॥ वहाँ पर पितं को भी पूजना चाहिये जिनको 


पितरश्चात्र सम्पूज्या; स्याता नान्दी्ुखास्त ये। | नान्दी ञ्च फते दं रौर उनको दधि श्रौर यवं . 


पिएडांश्च दधिसंमिश्रान दचयाहुयवसमन्वितान्‌।॥।| मिलते ड पिएड देने चादिये .॥ ५॥ यजमान कोः 
उददुखः माडल वा यनमानः समाहितः । त क 9 दोकर वे 
वदेयमिहीनं तत्‌ च ष्यति । छे सनु रमय .चश्वदेवे कम॑ नदीं करना 
}श्वदेवविदीनं तत्‌ फेचिटि पन्त ॥ ६ चाहते ह ॥ ६॥ वहाँ पर दो बाह्मण की प्रदक्षिणां 
पमाश्चान्र द्विजाः काथ्यास्ते च पुञ्याभरदक्षिएम्‌ । | कर उनको पूजे 1 इसको नैमित्तिक ज अन्य 
एतननेमित्तिकं द्धौ तथान्यचदध देहिकम्‌ ॥ ७॥ त करते हं ॥ ७ ॥ जिस दिन जिसकी 

व | खत हो उस दिन उसका एकोदि्ट श्राद्ध, होना 
[तानि च कततव्यमेकोदिषटः शृणुष्व तत्‌ । | चाद्ये! ब पर किसी देवता का पूजन नं होना 


वहीन तथा काय्यं तथेवेकपनित्रकमू्‌ ॥ ८ ।|| चादिये तथा एक पिवरी रना चाहिये ॥८॥ ` 


, | ओर उसमे अच्चिकरण तथा श्चोवाहन भी न करना 


[| ¢ नौकरणएव््जितम्‌ 8 
4 ५ ।. | चाहिये जर जंठन के पाख पेत को फ .पिरेड. 
।तस्य॒पिण्डमेकच ` दयादुच्छष्टसन्निधा ॥ & ॥|| देना चादिये ॥ ६॥ फिर 'तिलोदक लेकर ये्गो-. 


। । , , | पवीत को दाहिनी वगल से वई वगल.मै करके 
तिलोवकचापरव्यं॑तननामसमरणान्वितम्‌ 1. - | सृतक के नाम का स्मरण करेश्नौर षे कि यहं 


. परक्षय्यमयुकस्येति स्थाने  विमविसर्ज्जने ॥ १०॥ अमुक को प्रा टो, इस प्रकार कम करते परर . 


ब्राह्म की आवश्यकता नदीं ॥ १० ॥ श्राद्ध करने , 


ˆ--------------- ~. 


1 


्र०३० मराकरुषेयपुराण १२७ 


| बाले यजमान को व्राह्मण के बिसजैन के समय 

श्रमिरम्यतामिति नरुय्रनुयुस्तेऽभिरताः स्मह । | शछ्मभिरस्यताम्‌' पेखा कनां चाहिये शरीर आयस 
„¢ [1 ० $`. _ 4 8) (] १ 

प्रतिमासं भेदेतत्‌ कार््यमवंत्सरं नरः ॥११॥ 0 1 

संषत्यरे “ भः ५ 

षा क्रियते नरः| | पिर पक वर्थ के वाद्‌ सर्पिडीकरण॒ करे उसकी . 

सपिर्डीकरणं काय्यं तस्यापि विधिरुच्यते ॥१ | विधि इस तरद कटी है ॥१२॥ वहां पर एक श्रयं 

; नरोपि हैवरहित भेकाकपयितरषम्‌ । दे श्रौर पक पबिन्री रक्ते तथा बर पर श्रधिकरण 


वी श्थचा देवताश्रो का आवाहन न करे । वहा भी 
॑ णं ` तत्र तच्चावाहनवष्ितम्‌ । | श्रपसव्य रहना चाये तथा छमयुज ब्राहमणो को 


अ्परव्यञ्च तन्नापि भोनयेदधनो द्विनान्‌ ॥१३।॥ भोजन कराना चाहिये ॥ १३॥ बह पर भति मास 
; विशेषस्तत्र चान्योऽस्ति प्रतिमासं क्रियाधिकः। | अधिक क्रिया करता जाय । उस क्रिया को भे व 


~ # वदनः कहती ह तुम एकार चित्त होकर शुनो ॥ १४॥ 
त कथ्यमानमेकाघ्ो बना मे निशामय ॥१७॥| 


तिलगन्धोदकेयक्ं ४९ पात्रचतषटयम्‌ । | हे पु { उनम तीन पात्र पितर के लिये ओर पक 
ष्यात्‌ पिटं तरितयमेकं भेतस्य पुत्रक ॥१५। पात मे के लिये सकते # व पानं के वीच 
पात्र्रये भेतपात्रमथयैज्चैव भसेचयेत्‌ । | मे भेद पाच को रके र उसको जले अय दे 
6 प्रौर श्ये समाना इत्यादि मन्ञों को जपता हु 

ये समाना इति जपन पव्ववच्छेपमाचरेत्‌ ॥१६॥ पूववत्‌ शेपो मे मी बरे ॥ १६॥ इसी भवार खि 
स्लीणामप्येवमेवेतदेकोषष्ुदाहतम्‌ | की भी एकोदिष्ट करनी चाहिये 1 यदिपत्र न दो 


+ सपिर्दीकरणं तासां पत्र तो खी का सपिडीकरण नदीं होता ॥ १७॥ च्ियों 
¦ सपि वासां शरावे न वियते ॥१५॥ का पदोदिषए भाद मति वपं करा चवादिये । लि 


५ भतिसंबत्सरंका््यमेकोषिष्टं नरः शिया! ।. | तिथि को उसकी सु दो उक्षकी क्रिया ऊपर कदे 
#. पराति यथान्यायं दणां यददिहोदितम्‌ ॥१८।॥ असार देनी चादिये ॥ १८॥ पुत्र के श्रभाव मेँ 


न सपिंड को नौर उसके भी रभाव मे सहोदक फो 
एवाभि सपिण्डास्तु तद्भवे ता क्रिया करनी चाहिये अथवा उस्तकी माताकरा सपिड 


, भातुः सपिण्डा ये च स्युये च मातुः सहोदकाः॥१६॥ उलका सोदक करे ॥९६॥ जिसके पुज न दो उस 
` इ्रेनं बिधि सस्यगघतरस्य॒सुतासुतः। | की चेटी चा वेय स विधि के सार कायै वरे 


“ ज्यर्मातामहायैवं पवि .),' श्रौर मातम की क्रिया उसकी पुरी करे श्रवा 
हृख्युमातामहायवं पुत्रिकतिनयास्तथा ॥२०॥ उन पुल ॥ २०॥ छवासु्यायर नामका जो नाना 


्रय्यायणसंहञसतु मातागह.पितामहाम। | नो कोक तिनं भम ठ 
। पूजयेयुयंथान्यायं श्राद्धं ्मिचिकरपि ॥२१॥ से पू ॥२१॥ जिसके कोन हो उसकी त्रिया उख 
` सर्वाभावे सिय: हुः सवभत साममन्दरकम्‌। | की खी करे पर्ल उसमे जेमन न पटे रौर यदि 


4 „| खीभीनदो तो उसकी क्रिया राजा उसके कुु- 
वदते च दतिः कात स्ना ॥९९ भ्वियो दवारा करदे ॥ २२ श्चथवा उसके सजातीय 


\4 कनात समयदाहााः समलाः करियाः । | | मद्यो से य श्रादि सव कियाय करदे करोमि 
“^ सत्भामेव पर्णानां बान्धवो दरपति्तः ॥२३५ जञा सव वर ॐ म्यो क वन्धु दोता दै 1२ 
एतास्ते कथिता वत्स नित्यनैमिततिकास्तथा । | मदालसा वोली “हे वत्स { इस भकार मेने तुमको 


क्रियां ¡ नित्यनैमितिीं नित्य-तैमित्तिक क्रियाय वतलाई" । भ्रव शरीर धाद्ध 
< क्रियां भराद्धा्रयामन्यां नित्यनेमित्तकींशणु॥।२४। तनय ेमिचिक बियायं खनो ॥२७॥ दशौ रयात्‌ 


दसत निमिचं वै कालश्चनयात्मकः । | मायल निमित्त दे रीर चन्द्र कालको नित्य 
नित्यतां नियतः काल स्तस्याः संद्चयस्यय \ २१५. कते उस कालकीदुरई करियायं नित्य कटलाती ९॥ 


इति शरीमा्करढयषराण भै श्रलुशासन मे नेमित्िकादि शराधकरप नामं ३० भ समाप्त । 


१२८ | मार्रुडेयुराण अ०३१. 


ध इकत्तीसवां अध्याय 
 - ~ ` भदालसोवाच | मदालसा वोली-- | 
सपिण्डीकरणाद्ध्वं पितुयंः प्रपितामहः सपिरडीकर्ण के वाद पिता फे भरपितामह 


लेपथुज के भागी ह क्योक्रि उनको पिदपिरड 
स॒ तु लेप्ुनो याति प्रु परह्पिण्डतः ॥ नहीं दिथा जाता ॥ १॥ उनसे भौ चीथे जो वृद्ध 


तेषामन्यतो. यः पुत्लेपनान्नथक्‌। प्रपितामह है वे सम्बन्धदीन दोनेके कारण भुजान 
सोऽपि सम्बन्धतो दहीनणुपमोगं भते ॥ २॥ लेप फ भोजन करने वाले है ॥२॥ पिएड सम्बन्धी 
प्ति पितामहैव तथव प्रपितामहः कद तिना नौः 
पिर्डसस्बन्थिनो हेते विञेया; पृरूपास्नयः ॥ २॥| फिर पितामह के ज पिदाम है उनम तीन तक 
लेपसम्बन्धिनश्चान्ये पिततामहपितामहात्‌ । ` | लेय सम्बन्धी है शरीर सातां यजमान भी हेष 
मरृतयुक्तास्यस्तेषां यजमानश्च सप्तमः ॥ ४॥| सम्बन्धी है ॥ ४॥ इनके ऋषि लोग सातो पौरुष 
ह्येष धनिभिः भोक्तः सम्बन्धः साषपीरुषः । | सम्बन्ध कते है श्नौर यजमान से ऊपर जितने ह 
यनमानात्‌ प्भृ्यूहध्वमनुलेपथनस्तथा ॥ ४ ॥| रे श्रजुलेप के अधिकारी ह ॥५॥ अरसु्प के भासी 
ततोभ्ये पूर््वना; स्वे ये चान्ये नरकोकसः पूर्वजो से ऊपर जितने भी पूर्वज नरक मे परापत दै 
ये च तिर्व्यक्त्वमापन्नाये च भूतादिसंस्थिताः॥ ६। रथव तियंकयोनि या भूतं योनि म स्थित है॥६॥ 
तान्‌ सर्वान यनमानो वै शरां कव्वंन्‌यथाषिधि। | दे पुत्र ! उन सवका यजमान श्राद्ध करता इशा 
समाप्याययते बत्स येन येन शृणुष्व तप्‌ ॥ ७।॥| जिस पकार दत करता है बह सुनो ॥ ७॥ शराद्के 
अ्नमकिरणं यत्‌ तु मलुश्येः क्रियते शेषि! | समय मदष्य जो श्र्न चिटकाते है उससे वे पिवर 
तेन तृष््ायान्ति ये पिशाचत्वमागताः ॥ ८ ॥ दष दोते है जो पिशाच योनि मे है ॥८॥ दे पुत्र ! 
यदम्बु स्नानवसनोतथ भूमौ पतति पुत्रक । स्नान करते समय यजमान के वख से जो जल 


| प्राक्तषा षिः पर्वी पर पड़ता दै.उससे उन पितं की दृति 
तेन ते तरुतां पा्षास्तेषां पचिः भनायते ॥ ६.॥ होती है जो चत्व क पात होते ह ॥६॥ यजमान 


यास्तु गातराभ्बुकणिकराः पतन्ति धरणीतले । | द सीर से जो जलम्कण भूमि पर मिरते ह उनसे 
ताभिरप्यायनं तेषां ये देवत्वं हले गताः ॥१०॥॥ ते पितर वृ होते ह जो देवयोनिमे स्थतः ह।१०॥ 
उदरे पिणडेषु ा्ामकणिका डवि । | पिरडको उन भं ज श्रत् उससे गिरवा उससे 
ताभिराप्यायनं पाना ये तिभ्य॑क्तं ले गताः \११' | चे पितर ठत देते दै जो तिर्यक्‌ योनिमे हे ॥९६॥ 
ये षा दग्धाः क्ते बाला! क्रियायोग्या संता; | | माजन करने से ज श्रच्न श्रौर जल गिरता है उस 
विपननास्तेऽन्नयिकिर-सम्माऽ्जननलाशिनः ॥१२॥ से वे सृत वालक ठृ देते ह जिनका संस्कार नदीं 
तेवै इश्रा था परन्तु जे क्रियायोग्य थे ॥१२ चौर श्रद्‌ 
भुक्तवा चाचामतां यच्च जलं य्रादिघ्सेचने। | म राह्मण लोग जो भोजन करके. दाथ पब धेत 
ब्राह्मणानां तथान्ये तेने तृचि भयान्ति वै ।\१३। | है उस पृथ्वी पर गिरे हुप जलसे अन्य पितर ठृ 
एवं यो यजमानस्य यश्च तेषां द्विजन्मनाम्‌ । | दोते है ॥१३॥ इस प्रकार यजमान या ब्राह्मण दाय 
पथिज्जलाच्विपेपः शबिरुच्िष्ट एव वा \.१४ ५५ जंखन तथा उनके डारा चटकाया हुमा 
& अन्न रौर जल शुद्ध. है ॥. ४.॥ हेः चत्स ¡ श्रद्ध 
नान्ये तत्कले तवर “तत्तदयोन्यन्तरं गताः । | करने वाते ऋ पितर जदा निस योनिम हयो ठ 
भरयान्त्याप्यायन वत्स सम्यङ्‌ श्राद्क्रियावताम्‌ १५ रहते ह ॥ १५॥ -अन्याय से संचित धन से जो 
ययेपाञ्नतेरथयच्छादध ` त्रियते नरैः । . | मयुप्य शराद् करते ह उससे वे पितर वप्त होते दै 

५ तेनचार्डाल-पकसायासु येनिषु-॥१६। जो चारडल-्नोर-ॐमः योनि मे है ॥९६ 


९ 


_ भण१ १७ , _ _ अर््वयषुरण ११९ अिण्ठेयुरण ` ` ११६ 


एवमाप्यायनं षत्सं ` बहूनामिह बान्धवैः । चिव े व । ग भकार श्राद्ध मे श्न श्नीर जल 

= व टकाने से भी वहतं से वन्धुश्रो कीं त्ति दती 
भा इन्वद्िरम्ु -िनदपेण जायते ॥१७।], है॥ १७॥ जौ मनुष्य भक्ति से शाक माज से. विधि 
तस्माच्छाद नरो भक्त्या शाकरपि येथाबिधि। | पूवक श्राद्ध -करता है उसके छल मे किसी फो 
कुर्वीत कव्वेत श्राद्ध इले फथिनन सीदति ॥ दुःख ५ ९ श्वम नित्य रौर नैमित्तिक 
तस्य फालानहं वषये नितयनमिनिकालमकान्‌। | सल १ जो द मवयो स विज 
| | चादिथे उनका बोध तुमको कराती ह ॥ ९६ ॥ जोः 
न चगि मि भे ॥६९॥ गनः वमद सवर मच स ज 
काम्यं शरादध मासि मास्ुहपक्षये । | दिन थंथता वा जव श्चानुसार किये जाय 


तथाषकास्वप्यवश्यमिच्याकालं निवोध मे ॥२०॥ उनको,कती ह ॥२९०॥ हे पुत्र ! उत्तम बाह्मण के 
श्राने के समय, सूर्य श्नौर चन्द्रग्रदण मै, श्रयन मे, 


विशिष्टब्ाह्मणपप्तो. ` दृर्यनदुगरणे्यने । | 
शिसंकानतौ | ` | मेष नीर तुला की रति संक्रान्ति तथा व्यतीपात 
बितर व्यतिपाते च पुत्रक ॥२१॥| योगसे भी श्राद्ध करना चादि ॥ २९॥ जहाँ भाद 
भरादददन्यसम्पाप्नौ तथा दुःखमदरशने । योग्य व्य ५ तथा दए क पर, 
& " ह्वीत चेच जन्म नक्ते च्राने पर तथा भ्रहादिकों की पीडा 
भन्मक्षग्रहपीडा्च श्राद्ध ति चच्छया ॥९२॥ उपस्थित होने पर श्राद्ध करना चादिये ॥ २९॥ 
विशिष्टः शरोतियो येगी बेद्िज्जयष्ठसामगः | र योगी, बेदक्ष) अपने से ज्येष्ठ, साम 
त्रिणाचिकेतदविमधुिसुपणंः पदङगषित्‌ ॥२३। ४५ ह १५ 
दी ऋलिगजोमाठुस्वसीयाः श्वशरस्तथा। |॥२४। धेवता, पुरोदित, जगाई, यदिन, एर 
पञ्चागरिकम्निष्ठष तपोनिष्ठोऽय मातुलः ॥२४।|| पंचाग्नि कमं म निष्ठ, तथोनिठ मामा ॥ २९२ 
-मातागिदपर्ैव॒शिष्यसम्बन्धिवान्धवाः। = | म भ क ्ो ह. स 
9 4 छ ६ । भाई बन्धु यस्व श्राद्धः मः उत्तम 
मवत \ इण नयुनश्चागेसत ॥ रोगी, ्ङ्गदीन, श्रधिकाङ्ग,ुनमंव, काना, ङुरड, 
पौनर्भवस्तथा काणः ण्डो गोलोऽथं पुत्रक ॥२६।| गोलक ॥ २६॥ मिषदरोदी, वड़े छोटे नल वाल, 


मिव्रधरक नखी छीवः श्याबदन्तो निराकृतिः] | नपसक, छष्एन्त, ऊरुप, म्यादादीन, मातापिता 
व से त्यागा इया, चुगलखोर, शराच वेचने बाला॥२७] 


मभिगास्तस्तु वातेन पिशनः सोमयिक्रयी ॥२७॥ जो कन्या में दोष लगाता है वह वैध निसने शुरु 
फन्यादूषयिता वेयो युरुित्ोस्तथोन्‌ फकः । | श्रौर पिता को ४५ दो बह, ना का 
= दनि+ छध्यापक, शता जाला, परपूवासखीका 
भूतकाध्यापकोऽभिवः परू््ापतिस्तया ॥९८॥ पति ॥२८॥ जो घेद्‌ को न साने बद, अगिन त्यागी, 
वेदोज्‌फोऽथाग्निसन्स्यागी दृपलीपतिदूपितः | | दृषलीपति शौर कमी ध -जह्मशोँ को श्रद्ध मेँ 
९ शा फितयेषपे दिना, नि्मंचित करना वित है ॥ २६॥ पदिले कषे इषः 
प वञ्जथाः फियेषु चिना; २६ उत्तम ब्राह्मणों को एक दिन पदठिले निभन्वण्‌ देकर, 
मन्त्रयेत पूवः पवोक्तान्‌ ० न्‌ द्विनसत्तमान्‌ । | ताना चोय देव कमं हो श्रथ पिढ.कमं दोनो 
दैवे नियोगे पिये च तास्तयेषोपकरपयेत्‌ ॥३०॥| मे ही ॥२०॥ जो भाद करता दै उसको चवि 
च संयतिमिर्पाव्यं यश्व श्रा . | उन ब्राह्मणों को दक्षिणा दे। ध्वाद्ध करर 
व संयरिभिमान्ं 9 करिष्य । भोजन करफे जो मनुष्य उस दिन मधुन करता है 
भाद दत्वा च भुक्त्वा च मेथुनं याभ्तुगच्छति । | उसके पितरो को उन सी परप 1 
तयोर्मासं न पक'मरीने तक सोना पडता है ॥३१॥ जग. षड २ 
पितरस्तु तस्मिन्‌. रसि शेरते ॥९।|| ध मदी सी तार भोजन कर्ता 


गता च योषितं श्राद्ध :यो भुक्ते यश्च गच्छति । ` वै अथवा राता जाता दै उसके पितर को कृं 


१३० ` । साकंरख्यषएुराण ~ श्० ३१ 


रतोमूज्रहृताहयरासतन्मासं पितरस्तयोः ॥३२।॥| सास तक रेत शरोर मुन आदि -खाना पीना पदता 


ह ॥ ३२ ॥ इसलिये विद्धान्‌ फो ्वादियै कि पिले 
तस्मान पथमं काय्यं भाञेनोपनिमन्देणम्‌ । र 


्रमाक्षौ तदिने चापि वज्ज्यां योपित्यसद्धिनः॥२२॥ न सिलले पर खीगामी ब्राह्मण दो न बुलावे ॥२॥ 
भिक्षा्थमागतान्‌ वापि काले संयमिनो यतीन्‌। | चरन्‌ भिन्ता के लिये श्राये इष यती च्रथवा संयमी 


भोजयेत्‌ भ्रणिपाताचं = को प्रणाम करके धरसन्न भन से भोजन करावे २४॥ 
यतमानसः ॥३४॥ | 
भोजयेद्‌ भरणिपाताचं : परसा यतम जिस प्रकार शङ्क प्च की श्रपे्ता शृष्एपच्त पितरो 


यथेव श्प पितृणामसितः भियः को श्रधिक प्रिय है उसी तरह पूर्वाह्न से परा 
तथापराह्ः पर्ववाहात्‌ पितणामतिरिच्यते ॥२४।॥| भी उनको धिक मिय है ॥ ३४॥ तो जे ब्राह्मण - 
सम्पज्य स्वागतेनैतानभ्युपेतान्‌ गरे द्विजान्‌। | धर पर ्रागये हों .उनक्री खगत पूजा श्चादि फरफे 


|| उनके दाथ घुला तथा उनको सन पर विवे . , 
पविव्रपाणिराचान्तानासनेषपवेशयेत्‌  ॥२६॥ । ३६॥ आर तो सि 


पिद्णमयुजः इय्यदयुमान्‌ दैव द्वनोत्तमान्‌। मै खम माजन कयना चाहिये । पित्काये मं प्क 
एकेकं वा पिदणाञ्च देवानाञ्च स्वशक्तितः ॥२७]॥| से तीन प्राह्यण तक ओौर देवकार्य मे अपनी शक्ति 
तथा मातामहानाञ्च तुल्यं बा वैश्वदेविकम्‌ । | के असार बाह्मण भोजन कराने चाहिये ॥ ३७॥ 


मानवाः३८॥ इसी तरह नाना, मामाध्रो के लिये चैथवदेय कम दँ 
पृथक्‌ तयोस्तथा चान्ये केचिदिच्छन्ति मानवाः क 


भादुसानदैवपङ्कसपानफयन्‌ इ्यादुदछुखान्‌। | रौर मामा ॐ वैश्वदेचीय फर्म पृथक्‌ २ है 
तथैव मातामहानां विधिरुक्तो मनीषिभिः ॥२६॥॥ देवताश्च के लिये सङकर पूर्व सुख शरीर पितयं के 
विष्ठरार्थ शान्‌ द्वा प्य चाध्यादिना वृधः; ! | लिये उत्तर सुख होकर करना चादिये, इसी तरद 


विद्वानों ने नाना भामाश्नो के लिये विधि की है॥ 
पवि्रकादि वं दत्वा तेभ्याभ्चुज्ञामवाप्य च ॥४ इवा सो वीये जानो सक ॐ) ति 


इ्यादावाहनं भजो देवानां मन्तो द्विः । ` | छशा दे श्न श्रय देकर पूजन करे तथा परिधा \ ` 
यवाम्भोभिस्वथा वाप्यं दत्त्वा वे वेश्वदेविकम्‌॥४१॥ श्रादि देकर उनसे शाका जे 1४०॥ पराह मन्त्रो से 
गन्धमाल्याम्बधपंच दत्वा सम्यक्‌ सदीपकम्‌! | देवताश का वाहन करे तथा यव श्रौर जल से 


भरपसव्यं पितृणाल्च सरववमेवोपकर्ययेत्‌ ।॥४२॥| अध्य देकर बरिश्वदेव को दे ॥४१॥ किर गन्ध, 
माला, जल, धूप, दीपस्य श्रपसन्य होकर सवं 


दभोश्च दविगुणान्‌ दत्त्वा तेभ्याशचज्ञमवाप्य च! | पितरो को दान करे ॥४२॥ पिर द्वियुण कुश ` 
सन्त्ेपव्वं पितृणाञ्च ईृय्यादावाहनं वधः 1४३।॥| विश्वदेव को देकर शरीर उनसे आक्ञा ज्ञेकरः मन्जों 
श्रपसन्यं तथा चाध्यं यवाथंच तथा तिल दारा पितरों का श्रावाहन करे ॥४३! हे महाभाग ! 
निष्यादयेन्महाभाग पितणां प्रीणने रतः ॥४४। फिर श्रपसव्य देकर यच श्रव! तिल का श्रध 


रि पितरों को भसन्न करने के लिये द ॥ ४४ ॥ फिर 
अभो काय्यमलुजञातः इरु्वेति रतो दविः ह्मणो से आक्षा तेकर श्रननिका्यं करे श्रौर 


जुडुयादवव्न॑षारवज्ज्यंमन्नं यथाविधि ।॥४५।| न्य्जन नमक को चछोड्‌ केवल अर्त लेकर विधि 
छरभ्रये कव्यवाहाय स्वाहेति भथमाहुतिः ।. | पूवक ॥७५॥ अनन मे कन्यवाहाय साहा" यह कट ‡ 
सोमाय वे पिरमते स्वाहेत्यन्या तथा भवेत्‌ ।४६॥| कए यथम आहुति दे ओर सोमाय वै पिठमते 


खायः एेसा कटकर इखसे श्राहुति दे 1 ४६॥ 
यमाय भेतपतये स्वाहेति त्रितयाहुततिः । यमाय पेतपतये स्वाहा" यह कह तीसयै आहुति 


हृतावशिष्टं दद्याश्च भाजनेषु द्विजन्मनाम्‌ ।॥४७।॥| रे छ्नौर आराति देकर जो श्रम शेष रदजाय उसको , 
भाजनालम्बनं त्वा दयाचान्नं यथाविधि | | गाह्य केः पा मे डाल दे ॥ ४७ ॥ तथा उस पामे 
चयासुसं षध भो इति वाच्यमनिषठुम्‌ ॥४८| र भी चन विषिषूक दे श्र बाहो से भीति 


त्वरं 3 सदत .कदे कि श्राप सख से भोजन | 
भजर ततस्तेऽपि तच्वि्ा मौनिनः सुसम्‌ ॥४९॥ उस सगय बरह्मसो को मीन व 


०.३१ माररडेयषुराण १३१ 
यद्यदिष्टतमं तेषां तत्‌ तदनमसस्वरम्‌ । . | करना चाये ॥४६॥ जो २ अनन उनको परिय हं वे 
अक्ुध्यंथ नरो दयात्‌ सम्भवेन भलोभयन्‌ ॥५०॥| दी उनको दे ओर लोभन दे देकर डलको भोजन 


रोधं जेमन््सति करावे ॥ ५०॥ सिद्धि रौर रक्ता के लिये र्तोष्न 

श जप्मन्रास्तिध. विषिरन्मदीम्‌ | | मन्व पकर सिलं को परथ्वी पर विकर दे इस 
सिद्धाथकेच रभ्रा श्राद्धं हि भ्रचुरच्डलम्‌ ॥५१।।| आराद्धको अच्छल कहते ह ॥५१॥ फिर ब्राह्मणों से . 
` पृष्टस तूप्ाः स्थ दपः स्म इतिवादिभिः। | पे कि श्राप तृप या नीं श्नर.उनके कहने पर 
र्गतो नरस्लन्नं भकिरेद्वि स्यतः ॥५२॥ कि हम तप्त होगये उनकी शक्ना लेकर श्रन्न को 


पृथ्वी पर चासं रोर चिडकं दे ॥ ५२ ॥ फिर उन 
तद्रदाचमनाथाय दयाद्‌ापः सकृद्‌ स्व्‌ । ब्राह्मणों फे दाथ घोने फे लिये जल दे मीर उनसे 


अनुन्ञांच ततः भाष्य यतवाकायमानसः; ॥५६॥| आज्ञा लेकर मन, वचन श्रौर शरीर से ॥ ५३॥ हे 


सिलेन रतोज्मेनं पिण्डान्‌ सव्येन पुत्रक । | पुत्र । तिलके साथ अन्न का पिंड उच्चिष्ट शा के 
(2. समीप पितसें के लिये रखे । ॥ 
पिदविरय, देषु दादुचषठनिषौ ॥०॥| की 


पितृतीर्थेन तोयंच दयात्‌ तेभ्य; समाहितः । | शर शंगूडे के वीच मेँ होकर जलदान करे ॥५५॥ 
पितनुदिश्य यद्भक्त्या यजमानो दपातमन ॥१५५।॥| इसी तर्द नाना मामाच्रं को विधिपूरवेक पिंड दान 


हन््ातामहानाच करे तथां गन्ध, माला श्रादि से युक्त आचमन 
त द्त्वा पिण्डान्‌ यथाविधि । शरदान करे ॥५६॥ शक्तिपूव॑क दक्षिणा देकर उनसे 


गन्धमास्यादिसंयुक्तं दद्यादाचमनं ततः ॥५६॥| 'खधा इख प्रकार कटे ्नौर उनके संतु होने पर 
द्त्वा शक्त्या छखधास्तिति तानूदेत्‌ | उनसे त मन्न पद़वावे ॥ ५७॥ ८ 
यत्युक्त्वा ७।| भद्रं वः प्रीयन्ताम्‌! इस प्रकार उन ब्राह्मणक क 
ध त ॥ पर यजमान उनसे ्राशीर्वाद की प्राथनाकरे ॥५८॥ 
तक १ ध न्‌ फिर श्रियाि' पेखा कह तथा भक्तिपू्वेक प्रणाम 
तथेति चोक्त ;- भरा्थनीयास्तदाशिपः कर उन ह्यसोको विसर्जन करे श्रौर दार तक 
विसजजयेत्‌ भियाण्युक्त्वा भणिपत्य च भक्तितः। | उनकी पचाकर उनसे शाका वापिस श्वि॥५६॥ 
श्रादवारमनुगच्छेच्चागच्छेच्चासुपरमोदितः ॥५६।| इसके वाद नित्य.निया कंरे तथा _अतिथियो को 
त्तो नित्यक्रियां ्यानिजयेस्य तथातिथीन्‌। मोजन करावे । उत्तम मनुष्य पितरों की शान्ति के 
नतयकरियां पिरेणाच कैरि लिये निस्य क्रियाय करने की इच्छा रखते हें ॥६०॥ 
रि पितृणंच केचिदिच्छन्ति सत्तमाः॥६०।॥| उस समय पित्कायं न करे शेय श्राचस्ण पूर्ववत्‌ 


न पितृणां तथेषन्ये शेपं पव्येवदाचरे करे! छ लोगों का मत है कि ्रतिथि्यो के लिये 
अ धे ॐ 1 पृथक्‌ पाक होना चाये रौर कुछ कदते है 
वही ॥ ६१ ॥ फिर यजमान उस छन्न को सेवकं 
श्रादि के साथ भोजन करे ॥६२॥ धर्मात्मा पुरुषको 


पिते के लिये इख भकार श्राद्ध करना चादिये 
इससे श्रेष्ट ब्रह्मणो की वक्ति होती है ॥ ६३ ॥ राद्ध 
मे तीन वस्तु चदड़ी पवित्र ह धेवता, तिल श्रीर 
कुत॑ भुहर्त 1 तथा क्रोध, मागं चलना चीर जख्दी 
ञे तीन वाते वर्जितदै ॥६७॥ दे पुत्र] दधमि चाँदी 
का पात्र परशस्त दोतादै इसलिये चाँदी के पाचका 
दान करना चादिये श्रथवा उसे दशन के लिये दी 
ही रखदेना चादिये ॥ ६५॥ फेस उना जाता है कि 
पितरं ने स्वधा ककर पृथध्वीको दहादै इसलिये 


पृथक पाकेन नेत्यन्ये रेचित्‌पवयंच पूर्ववत्‌ ॥६१॥ 
ततस्तदन्नं मुञ्जीत सह ,भृत्यादिभिनैरः ।६२॥ 


एवं कुन्त धस श्रादध' फियं समाहितः । 


` यथा वा द्विजषख्यानां परितोषोऽमिजायते ॥६२॥ 


रीरि शराद्धे पवित्राणि दौदिं $तप॑स्तिलाः । 


वर्ज्यानि चार्म कोपोऽध्वगसनं त्रा ॥६४॥ 


` रजतंच तथाः पात्रं शस्तं. श्राद्धेषु पुत्रक । 


रजतस्य तथां काय्यं दशनं दानमेव वा ॥६५॥ 
राजते दि स्वधा दुग्धा पितृभिः श्रयते मही । , 


तस्पात्‌ःपिदरणां रजतसभीष्टं प्रीतिवद्ध नम्‌ । 1६६] पिवसेको चाँदी भीति वद़ाने बाली श्र चरभीषठ है ॥ 
ति ीमाक॑र्डेयष्ठरणः मे अलकाुभासन मँ पार्वण श्राद्ध कड नाम दगा अध्याय समा । 


व्तीसवां भ्याय 
मदालसोवाच  .. सि ई 
छतः परं शृणष्वेमं पुत्र भक्त्या यदातम्‌ । हे व ष वि (41 
पित्णां प्रीतये यद्रा उञ्ञ्यं दाऽगरीतिकारकय्‌॥। १1 अथन्‌ा उन च पय रै उक्ष 
देने 
मासं पतिणां तिच हविप्याच्रेन. नायते । कहती. खनो ॥९। दविष्यान्न को देने से पितर 


ह 2 लोग पक महीने तक चृ रहते हैँ तथा मद्ली का 
मासद्वयं मत्स्यमांषस्त्चिं यान्ति पितामहाः ॥ २॥ मांसं देने से खे मीने तक नृत्त रहते है" ॥ २॥ 
हारिणं सासं विज्ञेय | , | पितसै की तीन महीने. की ठक्षि के लिये हिरन.क 

चीन मासान्‌ हारिणं म विज पच्य । | भांख बतलाया गया है..वथ्य स्ररगोश शा मांस 
चतुभ्मासांस्तु पुष्णाति शशस्य पिशितं पित्‌न॥.२ उनको चार महीने तक ठृत ता हे ॥२॥ परियों 
| पंच वरै | के मांस से पांच महीने तक शरोर सुञ्र के मांसं 
शां पंच वै मासान्‌ षरएमापान्‌ शुकरामिषम्‌ | ! से त व लाति 
गं सप्त वै मासानैखेयश्वाष्टमासिकीम्‌ ॥ ४॥ ष र भग के मसि ४ क तक 
करोति दक्षि जव वै र्रोर्मीसं न संशयः! गतृ रहते हं ॥४॥ (ङ्ग हिरन का 
गवयस्यामिषं ठति केति दशमाधिकीम्‌ ॥ ५।| म नौ महीने तक शीर गवय , दिन क मास्‌ 


ध ( दस महीने तक पिते. को दतं करतौ है इसमे 
तथेकादशमासास्त॒ उरभरं पिततृष्िदम्‌। | संशय. नदीं ॥५॥ उर प्रथ के मांस ; से -भ्यास्द 
, संबत्सरं तथा गव्यं पयः पायसमेव बा ॥ ६ !|-मदीने तक श्रोर गऊ कध अथवा सीर शे `प्र 
बाधीणसामिषं लौहं कालशाकं तथा मधु । || वषं तक्‌ पिट.सोगः टं रहते ट ॥॥ ध 
दौहि्राभिषमन्यच्च यच्चान्यत्‌ खङुलोद्धवैः।। ७॥ शा 

१९ ौरीयवसतय । श्रीर अन्य इुदटुम्बिय दासं -लाया हुश्रा मांस 
नन्ता वै यच्छन्ति वप्ति गौरीसुतस्तथा | ; | पितरों को व व दे पुं ओरी त 

पितं नात्र रन्दो गयाश्राद्धञ्च पुत्रक ॥ ८ ]॥| तथा गया का राद्ध पतर. को बड़ा. "चानन्द 

बाला है इसमे सन्देह तदी ॥ ८॥ धान्यो मँ भ्या- 
श्यामाक-रानश्यामाको तद्रच्चेव प्रसातिकाः ति प भोर 
नीवाराः परषलाश्चेव धान्यानां पिददृप्तये ।। & ॥ पौष्कल पितो दी दपि के लिये है ॥९॥ चौ, गह 
यव-तरीहि-सगोधूम-तिला. भद्राः ससषंपा; । तिल, भंग, सरसो, गूलर, वेर शरीर निष्पाव ` यह 
भियेङ्गवः कोविदारा निष्यावाश्वातिशोभनाः, | १०॥ सव उत्तम हं ॥१०॥ श्राद्धमे मका, राजमाष, उडद 
वर्ज्या मकटकाः श्राद्धो रानमापास्तथाणवः! (ध ध व र त 
विमूषिका मद्रा श्रादधकम्पणि मर्हिताः 1११] ९ तथा गान्ारिक, श्॑लाबू, लब्रर्‌, उसरी 
र्न शरज्जनञ्चप पलाण्डुं पिएमूलकम्‌ | | रङ्गीन.कपड़े श्रौर भत्यक्ञ लवण .॥.१३.॥ ये. सव 
करम्भं यानि चन्यानि हीनानि श्सवणतः ।१२।॥ तथा जो वासी मे अच्छा न लगता दो.वह-ाद्धभे 

गान्थारिकामलावूनि लवणयूपराणि च | | विस सी कार जो बस्तु पतित 6, गा 
आरक्ता ये च नियांसाः परस्यक्षसबणानि च ॥१ ` गई दो श्रथना पतितः दारा उपाजित धन ये. ध्रा 
भे निषिद्ध है ॥ १४ ॥ अन्याय ` से संचित श्रथवा 
वञ्ज्यान्येतानि वे श्राद्धः यत्व वाचा स शस्यते । | कन्या वेचकर भाघ किया इ्मा.धन धाद्धभं वर्जित 
यच्चौ्तोचादिना पराप्त पतिताद्यदुपाभ्नितप्‌ १४।॥ ह । दर्गधित, फेनयुक्तअथवा जिख, जगह -धोड 
याय-कन्याशलकोतयं दरवयशचातर विगर्हितम्‌ | | जल ो.उस.जगद से भातत किये हण.जलको श्राद्ध 
न्थ फेनिलज्बा्ु त्यैालहरोदकम्‌ ॥१५।| १ अयोग न = 1 

४ का । 

न लभेहृयत्रगौस्तृपत न्तं यत्वापयुपाहूतम्‌। , | जिस जलाशय का यक न ह्राद ४ जल, 


०३२ माक॑रडेयषुराण . १३ 
यच्च स्वननोत्ष' यच्चाभोज्यं निपानजम्‌॥१६॥ अमोज्य श्रीर श्रपेय जल ॥१६॥ पितरों के कार्म 
दवय सलिलं तात. सदैव पिदकम्भैणि । | धू सव जलं चित ६ । ६ (प 
| जस पशु का सुर चिरा न दो असे घोड़ी ॥ १७॥ 
मागमाविकमौन्व सव्वमेकगफच यत्‌ ॥१७॥ मैस, चमरी, कुरम्तकी व्यादीड याय श्नीर पितसेँ 
माषं चामरंचैव पन्वा गोधाप्यनिदशम्‌ ! | के किये मांग -करं लाया हुमा दध, ये सव = । 
पितराथ मे प्रयच्छसवेत्युक्तवा यश्वप्युपाहृतम्‌ । श्राद्ध कम मे प्रयोग न करने चाहिये ॥ १८॥ जान- 
वर्जनीयं सदा सद्भसतत्‌ पयः श्राद्धकमैणि।।१८॥| चरो से एण, ससी ओर अश्न से जली इर एथ्वी 


| परश्रद्धन करना चाये । श्रनि वस्तु, दुष्ट 
वर्ज्या जन्तुमती रुक्षा क्ितिःष्लुष्टा तथाभ्रिना । शब्द च्रौर दुर्गन्ध जाँ दो तथा ॥ १६॥ छल का 


अनिष्टयुष्टशब्दोग्रदुग॑न्धा चात्र कम्मणि ॥१६॥ श्रपमान करने बाले श्नौर ऊुल-घाती, नंगे श्चौर 
कलापमानकाः श्राद्धे -व्याधमोष्टिकलकाः पापी मद्यो के रहने से श्राद्ध-करम नष हो जाता 
नघा पातकिनश्वैवइन्युछथा पिट्कियाम्‌ ॥२०।| ॥ ९०॥ नल, ली, तला"; सं शीर पराम 


„` ` | स्चर तथा कृत्ते श्रौर राक्तस ये सव्‌ दर्शन मा्रसे 
ग्रपुमानपविद्धशच 'छकुटो प्रामशूककरः "1 | श्राद्धो को न्ट करः दते है ॥२९॥ इसलिये शाद 


श्वा चैर हन्ति श्राद्धानि यातुधानाश्च दशनाप्‌॥ २१॥ स्थान पर चायो तरफ तिल चिका देने चाद्ये 
तस्मात्‌ सुसंहतो दयात्‌ तिलेथावकिरन्‌ महीमू) | दे तात | श्छ भकार दोनो पदों म श्राद्ध करने से 
एवं रा भे्छ्ाद्धे ता तातोभयोरपि ॥२२॥ स्वा दती ६।२२॥ जो सतक म हो अथवा चिर 


५ काल से.रोगी हो, पतित. श्चथवा मलिन हौ 
शाषसतकसंसष्ट ` दीषैरोगिभिरेव च । श्नौर पिता, वावा श्रादि का पालन न क्रतादो ॥ 


पतितेमलिेश्चैव न पुष्णाति पितामहान्‌ ॥२३॥॥ ये सव श्रौर रजखला खीका दरशन श्राद्धमे निषिद्ध 
वर्जनीयं तथा श्राद्धे तंथोदक्याधरं दशनम्‌ । ` ध ४ श्रादिका ५ 
पृणदधौएडसमाभ्यासो श्राद्ध मे वज॑नीय है ॥ २४॥ बह वस्तु 
्यासो यजमानेन चादरात्‌ २७ याल अथवा कीड़ा पड़ गया दो, जिस पर ऊचे की 
केशकीटावपन्नंच तथा ्वभिरवेक्षितम्‌ | हष पड गह हो चासी, दुमेन्धयुक्त, वेगुन, शरव 
पूर्ति पय॒धितंचेव बात्ताक्यभिषवास्तथा ¦ | तथा वह षस्त जो कपड़े की हवा से छलाह गई 
पर्ज्जनीयानि वै श्राद्धं यच्च वखानिलाहतम्‌॥२५॥ दो व 
पित द 
शरद्धया परया दतत . पिदणां नामगोत्रतः । | करे! उस 9 
यदाहारास्तु ते जातास्तदाहारत्वमेति तत्‌ ॥२६॥ 
तस्माच्छवादववता पात्रे यच्चस्तं पितृकम्मणि । 


शस्ये पितरो की ठक्तिकी कामना करके श्राद्ध 
कम मे जो वस्त॒ व हो व 
को देनी चाषिये ॥२७॥ विपश्चित योगी लोगे 
यथावच्चैव दातव्यं पितणां रषप्तिमिच्छता ॥२७॥| पान 
| को खदैव श्राद्ध म मोजन कयना चाष्टमे । पिव 
<योिलंथ सदा श्राद्धं भोननीया विपच | गण योगाधार होत हैँ श्सक्तिये वे सदैव पूजनीयं 
योगाधारा हिःपितर्तस्मात्‌ तान्‌ पूजयेत्‌ सदा २८।॥ ॥ २८ ॥ एक दशर ब्रह्मणो से पक योगी शठ है 
` ज्राह्मणानां सह भ्यो योगी खग्राशनो यदि । | जो-यजमान को श्रौर भोजन करनेवालौ को नीक 
के खमान संखारसागर से तार देता दहै ॥२६ 
यजमानं भोय नौरिवाम्भसि तारयेत्‌ ।*२६॥| = चमन स राजा दल कर पितरो ने ओ भीः 
पित्रगाथास्तथैवात्र गीयन्ते ब्रह्मवादिभिः माये थे उसी पिद्माथा का ब्रह्मवादियो ने गाः 
या.गीताः पिभिः परव्मैलस्यासौन्महीपतेः ॥२०॥| किया दै ॥ २० ॥ हमारी सन्तति मे कव श्र कौः 
, कदा. नः सन्तता्वग्रयः कस्यचिद्धविता सुतः रेखा पुत्र होगा जो पृथ्वी पर योगी -को भोजः 
| यो .योभिभक्त्ेषान्नो भषि पिण्डं प्रदास्यति ।३१॥| कराकर पिण्डदानं करेगा ॥ २९ ॥ गयाजी मं । 
गयायामयपरापिषडं खड्गमांसं महाहवि; ।, । यान करे से, खद केःमास स, महादव्रि,( खीर 


१२४ माक॑रडयषुराण । -अ०्देद्‌ 


हताकं तिला से, कालशाकः, तिल श्नीर खिचड़ी से पक महीने 

कालशाकं तिलाव्यं वा कृसरं मासतृप्तये ॥३२ | तय, दम पितर लोग तृत होते है ॥ ३२ ॥ विश्वदेव. 
1 € [9 ॐ, ७ 

वैश्वदेवं सौम्यंच सदगमांसं परं हवि; | | कम॑ हमको भिय है तथा उत्तम वस्तु, खेड़गमांस, 

वैश्वदेवं सौम्यंच ६ परं इति | दविष्यान्न, विना सींग वलि पशं का मांस श्र 

विपाणवञ्नंयखड्गाप्त्या ्ा्प्यचाश्चुवामहे २२॥ जिस वस्तु पर स्यं का प्रका न पड़ा टो देखी 


त्रयोदश्या यथाषिषि वस्त॒यं हम साते दे ॥ २६॥ चरयोदशी' शौर मधा 
दयच्छाद्ध त्रयोदश्यां मघासु च यथाषिधि। नकत म विधिपूर्वकः माद करना चाथ. तथा 


बधुसर्फिसमायुक्त' पायसं दक्षिणायणे ॥३४॥ श्दद धौर धी मिली खीर पितस-को उस समय 


| देनी चादिये जव सूर्यं दक्षिणायण ॥३५॥ टे पुन] 
तमात्‌ सम्पूजयेद्रकत्या खपितृन पुत्र मानवः। | इसलिये मुप्य को चाहिये कि अपने पितरो को 


कामानमीप्सन्‌ सकलान्‌ पापाचचात्मविमोचनम्‌२५।| भक्तिषूवक पूजे क्योकि पेखा करने से सवं. मनोः 


` कामना पूरं होती है तथा पापों का नाश होता है 
वसुन्‌ सदरास्तथादित्यान्‌ नकषत्ग्रहतागकाः । . |॥ ३५॥ श्राद्ध से ठप होकर पिठ लोग मचुष्यों पर 


मटुष्याणां पितरः श्रद्धतर्पिताः ॥३६॥| बखर, रद, सूर्यनक्षत्र, यरद, तारागणं श्रादि को. 
गशन्वि | विद्यां स्वगं मोक्षं सुखानि चं । . | प्रसन्न कराते दै ॥२६॥ श्राद्ध सेतू दोकरं पिय 
स । चायुः बुद्धि धन, विचा, स्व, मोक्ञ ओरं श्रनेकों 
भयच्छन्तितथा राज्यं पितरः ्राद्धतूरपिताः ॥२७॥ खख तथा रान्य पिलाते ह ॥ २०।.दे.पुच } यद 
एतत्‌ ते शत्र कथितं शराद्धकम्मं यथोदितम्‌ | | ठ॒मसे भ्राद्कमं कहा । हे वत्स { अव काम्य. श्राद्ध 
काम्यानां भरूयतां वत्स ्रादधानं तिथिकीत्तनमू्‌ २८॥| का तिथि-कीतेन नो ॥दन। ˆ , ` 
इति ्रीमाकण्डेयपुराणमे शराद्धकस नाम ३ रँ भर समाप । 
| | ` नख “ ` ` 
 .तेतीपबां अध्याय | 
मदाल्तसोवाच मदालसा वोली-. ` .;. 
मतिपदा को श्राद्ध करने से 
तिपदधनलामाय द्वितीया - दविपदा | | को दपा भाड्‌ करने से धन शर दितीया 


व ड करने से दिपद्‌ कीं पाति होती .दैठतीया 
रारथिनी तृतीया तु चतुथी शनुनाशिनी '॥। १॥ मनो 


पा को परणं करने वाली ध्रौर चौथ 
शचु्यों (8 नाशं करने य ॥ १ (४ को 
ति वीक ६ श्राद्ध करने से मनुष्य लच्मी को पातां ,तथा ष्ठी 
भयं भाातिरपचस्या षष्ठयां एूल्यो भवेन्रः। को करने से पूज्य दोता ह । सप्तमी में करने. से 
गणाधिपत्य श्नौर अमी को करने से उत्तम ब्रद्धि 
पराप्त करता है ॥ २॥ नवमी को राद्ध करते से 
खी को तथा दशमी को करने से मनोकामना की 


1णापिपत्यं सप्तस्यामषटम्यां दृदधिएत्तमाम्‌ ॥ २॥ 


वयो नवम्यां मामति दशम्यां पृणंकामताम्‌ । . 

दास्तथामुयर्‌ सव्वनिकादश्यं यापर ॥ २॥| परता को पाता दै, एकाद को शरा करने सेः 
स्तथाुयात्‌ त 9 समस्त वेदोका ञान भा करता दे ॥ ३ दादगौ 

दश्यां जयलारभच्‌ रामोति पितुषूलकः |. | के दिन पितरो का पूजने बाला ` विजयी ` व 
मेषां पथं दि स त तथा प्रजा, बुद्धि, पश्च, द्धि, स्वतन्त्रता -श्नीर ' 

ना मषा पशु दध सातनंपष्ित्ताम्‌ ।। ४॥ तथा ुिक्रो पातादै ॥७] तरयोदशीको श्राद्ध करे 

)पमायुरथश्वय्य हव्वांणस्तु प्रयोदशीषू. बाला अद्धावान्‌ मचु्य दीं श्राय तथा रेवं को 

पबाभोति न सन्देहः शराद्धं शरदधापरो नरः ।॥ ५ | भा करता दै शमे संदेद नटीं ॥५॥ जो शक्ति से 


व . | सम्भव होसके उसी चरन्न से शराद्धे करना चये, . 
चा न्तन . भाद्धुसम्पत्समन्वितः |` ` । जिसके पितर युवावस्था मे अथवा -शख-के लगते 


# 


० २३४ । .माक॑रेयपुराए . १६ ५ | 


से मरगये दो उसको ॥ ६॥ उनकी तृत ॐ लिये 
्वतुर्द॑शी कैः दिन शाद्ध करना चाद्ये, जो मदुष्य 


[2 य 


युवानः पितरो यसव मृताः शसेण वा.हवाः ॥ ६ ॥ 
तेनं काय्यं चतुरेश्यां तैषां प्रीतिमभीष्प॑ता । 

श ६ _ ,, ^, ,.| पवित्र होकर यतन से श्रभावस को श्राद्ध करता है 
भाद्‌ इव्वननमाकस्या यतेन पुरषः चिः ॥ ७ ॥| ॥॥ वड मलुप्य सब कामना को तथा उत्तम 
सर्वान कामानबाभोति स्वगंश्वानन्तमश्ुते। | खगै को प्रा करता है श्ौर.मजुष्य ङत्तिका नच 


कृत्तिकासु पितुनच्च्य सखर्गमा्ति मानवः ॥ ८ ॥ मे भी पितरो को पूजकर स्वगं को जाता है ॥८॥ 
क । ॥ सन्तान की कामना करनेवाले को रोष्िणी नदते 
श्मपत्यकामो रोहिष्यां सौम्ये चौजस्वितां लभेत्‌ । । श्राद्ध श । न नक्तत्रमे भ्राद्धकरने 
भरोपमाबरच पनयसौ नाला ्लोजलिता, द्रौ म करनेवाला चीरताश्चीर 
शोय्यमादरास व षे्ादि च ॥& ॥ पुनव नक्तम करनेवाला खेत श्रादि प्राप्त करता 
पष्ट पुष्ये सदाभ्यषं शअरश्वौषाु वरान सृतान्‌। | दै ॥६॥ पुएय नघत्रमे श्राद्ध करने छे पुटि, चछेषा मे 


. क + उन्तम पुत्र, मधा में श्रेष्ठ खजन श्रौर फाल्गुनी भे 
मघो खननभैष्ठयं सौभाग्यं फरणुनीषु च ॥१०॥ सौमाग्य मिलता है ॥९०॥ उत्तरा फाल्युनीमे राद. 


प्रदोनशीलो भवति सापत्यशोत्तरासु च । प्रद मदुण्य दानशील शौर पु्रवान्‌ होता है तथा 
भरयाति श्रेष्ठतां सत्यं हस्ते शाद्धमदौ नरः ॥११॥ इस्वनक्तघभ सत्य रीर श्रेष्ठताको पातत करता है॥ 


चित्रानि श्राद्ध करे से पुरूष रूपवान्‌ होता है तथा 
रूपथुक्तशच चित्रासु ॒तयाप्यान्यवाश्रुयात्‌ । खन्तान भ्रात करता है, स्ातिमे व्यापारमेक्ताभ 


बाणिन्यलाभदा स्वातिर्विशाखा पुत्रकामदा ॥ | तथा विशाखा मे पुजलाभ होता है ॥६२॥ ्रद्यधा 


म भद्ध करने से चक्रवर्ती राजा होता है 1 ज्येष्ठा 
इवन्वभातुराधालु भन चत्वराम्‌ । मं श्राधिपत्य श्रीर भूल मे श्रारोम्य मिता ॥१३॥ 


भ्रायिप्ंच ्ये्ठासु मूले चारोग्यष्ुततमम्‌ ॥१२॥ पूरवाषाद़ मँ याि, उत्तराषाट्‌ मे शोकदीनता, 
पादु यशमा्िरूतरासु विशोकता । | श्रावण गे सुस्दर लोक श्र घनिष्ठामे श्राद्ध करने 


श्रवणे च मान्‌ लोकान्‌ धनिष्ठा धनं महत्‌।।१४॥| से घन शौर मरत्व मिलता दै ॥ १४॥ -अभिखित 
| मुह्तं मे श्राद्ध करनेसे मदष्य बे्दोका क्षाता ता 


वद्वित्वमभिनिति ` भिषविसदधिन्त॒ बास्णे! | है तथा शतभिप मे करने से वैच । पूर्वमाद्र मे 
४ श्राद्ध, करनेसे सेड्‌ वकरीरूपी धन तथा उत्तराभाद्र 

अनादरे गरौषठपदे विन्देदावास्तथोत्तरे ॥१५॥| मे मनुष्य गौ घन ४ है ॥९ थ रेवती न्त्र 
| म श्रद्ध करने से स्योना, चाँदी, श्रभ्विनी म करने 

रेवतीषु तथा दष्यमरिविनीषु दरहमान। खे घोडे श्रौर भरणी मे करने से उन्तम आयु 


श्राद्धः हव॑स्तथाभोति भरणीष्वायुरुचमम्‌ । | मिलती है इसकतिये तच्वके जानने वले लोग धी 
तस्पात्काम्यानिङ्वीत ऋपष्तेषुतत्वित्‌॥ १६।॥ नदं भ्र एड म था करते ।९६ 
इति शरीसादडेयषुराण मे काम्यभरादध फल कथन नाम का दा अध्याय समाप्त । 
वि ~~ 9०4 


चोतीसवां अध्यायः 


मदालसा बोली- - ` धिति 
मदालसोवाच , छ पुञ | गृदस्थी को चादिथे कि देवताश्रों को 


एवं -पत्र शरहस्थेन देवताः पितरस्तथा । | ह्य से, पितरौ को कल्य छे श्रीर अविधि चान्धवे 
तम्पूश्या हव्य-कव्याम्यामन्नेनातिधि-वान्धवाः।१। | आ्दिरूप मनुष्यौको र्रसे पूजे ॥ १॥ भूत, पेत, 
भूतानि स्याः सकला. पशुपक्षि पिपीलिकाः । | सेवकगण्‌, पद, पी, चींटी, भिलारी,यप्चक तथा 
पतयो याचमानाश्र ये चान्ये बसता शदे ॥.२ ॥ शोर जो घर पर सते द ॥ ९॥ उनको सदाचारी 


हि 


१६६  मकरेडेयपुराण . भरद. ` 


--  । साधु गृस्थी अश्न से पूजे 1. नित्यनौमिचिकी ्हमेधिना । | सा गरदस्थी शन्न से -पूमे 1 नित्यनैमिचतिकी " 
सदाचावता ताते साधना शरहम^वना क उलवल करो भोजना 
पापं मुटकते समुद नित्यनेमित्तिकीःक्रियाः॥२॥ बट पादै ॥३॥ 4 
ध श्रलकं उबाच श्रलकं वोला-- 1 
कथितं मे त्या मातर्नित्यं नेमित्तिकचं यत्‌ । ः हे माता | न चे -नित्य, 0 
निनेमि ॥ म्तिकंचैव | भरिषिधं = "नदः नि ९ ति 
त्तिक || ४ ||| नित्य नैमित्तिक चिंबिधात्मक. कमं कदा ॥ ४ ॥ ह 
सदाचारमहं शोतमिच्यारि क स ] | ङलनन्दिनि । मे अव पसे सदाचार को सुना {' 
एवह भ तुमच्या इसन चादता द जिसके करने से मनुष्य परलोके तथां \ . 
यत्‌ इन सुखमासोति परेद च मानव; ॥५॥| यदा खख पाता दै ॥५॥ ` ` ` : . ` 
मदालसोवाच मदालसा वोली-. त 
श्हस्येन सदा शाय्यैमाचारपरिपालनम्‌ । + को-सदैव भा का पालन करना ,. 
एखम्‌ रत्र वा चाहिये, श्राचारविदीन को यहाँ अथवा परलोक ` ` 
त व खमव्र॒ प्ख वा ॥६॥ दुख नदी है १६ जो सदाचार न उत 
` ` धूपस्य न भूतये | | करता है उसको यज्ञ, दान श्नौर तप श्चादि करे 
भवन्ति यः सदाचारं सथुछछह्य भवत्तते ॥ ७।॥ का ङ कल 1 | ५ 4 
ुर्िनदते दुराचारी पुरुप श्रायु नर्द पातै, 
चारो दि पुरषो नेहा महद्‌ । यत्न से सदाचारी रहे । सदाचार इलकच्तए का , 
कायो यत्नः सदाचारे शराचारो हन्त्यलक्षणम्‌।॥८ शन्त कर देता है ॥२॥ हे पुज ¡ उस सदाचार को . 
तस्यं स्वरूपं वक्ष्यामि सदाचारस्यपुत्रक । | रूप मै तमको वतलाती ह । तुम. उसको पकात्र . 
तन्ममैकमनाः शूला तयैव परिपालय ।॥ & ॥| चिच से नकर उसी तर पालन करो ॥६॥ ; 
त्रिक्साधने यल; करव्यो श्रहमेधिना । गृहस्थी मनुष्यको तिवर्भेका साघन 1 करना ... 
व व र चाहिये क्योकि उसके सिद्ध दोने से गृस्थी.कौ 
त्ससिद्धौ शृदस्थस्य सिद्धिर परत्र च ॥१०॥| इस लोक तथा परलोक भे सिद्धि दोती दै ॥ १०॥' - 
पादेनास्य पायं सश्वयमात्मयान्‌। | भने धन के चतथ भाग का सञ्चय परलोक. कै 
पा 8 पार इयात्‌ ४ ( करे तथ आधे से श्रपना मरण पोषण श्रौरे . 
अद्धेन चात्मम्रणं नित्यनमित्िकान्वितम्‌ ॥११।| ित्यनैमित्तिक माये करे ॥ ६९॥ शरीर पक भाग 
पादश्चात्मा्थमायस्य मूलभूतं विवद्धं येत्‌ । | को अपने तिभ रखकर उसे चढ़ि । दे पुत्र ! इस. ` 
एषमाचरतः पुत्र श्र्थैः साफत्यमहंति ॥१२॥| भकार से मयोग क्रिया हा घन सफल होता दै॥ ` 
स + इसलिये पाप की निच्त्ति के लिये स्वगं की इच्छा - . 
तदत्‌ पापनिषेधाथ ध्मः कार्यो विधिता । से ज्ञानी लोगों को धमे करना चाद्य तथा शरसी 
परतरारथं तथैवान्यः कामोऽ्यैव फलमदः ॥१३॥ मर कम 1 | 
भत्यवायभयात्‌ कम्यस्तथन्यथाविरोषवान्‌ । | शरीर ङ काय बिरोध दूर करे के तिथि है, `` 
दविधा कामोऽपि मदितद्धिवगस्यापिरोधतः ॥१४॥| यइ दोनों कायं चवं से सम्बन्धित है ॥ ९४॥. /: 
परस्पराचुवन्धांच सव्वानेतान्‌ विचिन्तयत्‌. | इन सको परम्परा अनुबन्ध न्नर बिंपरीत श्नुः † ` 
वियरीताडुवन्धाथ धरमममादीस्तान्‌ शुष मे ॥१५।॥| बन्ध समना चाये 1. अरव इन धमादिको को 


४० ‰ > 
पमो प्माुायो पमो नासाधवः । | अ मोदी भ 
' उभाभ्याञ्व द्विधा कामस्तेन ती च द्विधा पुनः १६॥| दो पकार है तथा काम से. धर्म भीः सै वरह का. -' 
चाय हूत बुध्येत धम्पां थ चापि चिन्तयेत्‌ । | ३ ॥१६॥ बह्म सुहत से उदकर धम ` श्रीर्‌ अर्थक . 
; का्यहेशंसतु तन्मूलान्‌. बेदता्थमेव च्‌ ¡ ` | चिन्तन करे तथा त जो कटिनाश्यां हौ उनक्षा ` 
भ । वदतत से वि्ैचनकरे । फिर उठकर तथा श्राच- - ` 
स्थायं तया्चरय मंडुखो नियतः शुचिः॥१७॥। मन करे पू दिशा पवित्र हकरं चैडे ॥ १७ ` ` 


---~* ~~---------------..-~ ---- 


पी ५ 


श 


| 


'भ्र०.३४ १८ -पक॑ररेयषटीण १३७ 


् १] १५५ -------------------------- <~ : परशिवि 1 सरवि व 
व्व सन्ध्यां सन्तर परिचमां सदिवाकरा्रू । | तारे दीखते भातः सध्या चौर सायंकालक्री संभ्या 


उपासीतं यथान्यायं नैना, जघयादापदि ॥१८॥ व म खले व करे तथा धिना 
अ्रहक्षलापम्तं {व वस्थयेत आपत्ति के इनको न छोडे ॥१८॥. हे पुच | 
त ध बाक्पार्यच, वज्जयत । | मिथ्या अलाप, मंम वचन, सुशाख का पठन-पाठन 
च तमसदादूमसत्सेवाञ्च , पुत्रक ॥१६॥ भय बाद्चिवाद रं दु्ौकी सेवा थे सव बरमित 
पायं भतस्तथा होमं इव्यीत नियतात्मवान्‌ | & १९६ नियतात्मा होकर मातः तथा सायंकाल 
नोदयसतमने  िसीेत पिबस्व ॥२०॥| हवन था खय शीर असत न 
देवमानं ल ठ } [समय सूयं के भतिविस्ब के न देखे ॥२०॥ बलि 
भगला दावन्‌ । सन देन सता कर भ 
ूल्वाह एव काय्य  दैवतानाञ्च पणम्‌ ॥२१।| ताँ को तपण ये काये पूर्वा मे कएने चादियेः॥ 
्ामावेसयतीरथानां , केत्राणान्वैव बत्मेनि | | गव, वास स्थान, सेतो, रास्तो त्रोर गोशाला मे 


| विरु नाहतिष्ेत न कृष्टे न च गोत्रे ॥ विष्ठा शरोर पूत त्यागने न वैडे ॥ २२॥ नङ्गी परली 
नं । । पङ यूः क्ष भ ् । त्ने ॥९२॥ कोन देखे, पने विषा शरोर भूवरको न देले, तथा 
त्र पश्येदात्मनः शकृत्‌ । | रजस्वला खी का दशन, स्पशं शरीर उससे वाता 


उदश्या दशनं सपशो वश्यं सम्भाषणं तथा.॥२३॥ लाप प क मै मूत, ॥ 
न्तु र पुरीषं षा मैथनःवा समाचरेत मेथुन न करे श्नौर जहाँ केश, भस्म शरोर `देङ्कयां 
नोपितिषठच्न्मतरे १ पतिका ४ ५ हों बह्म भी सूत्र रौर विष्ठा कण्ने के किये म वैदे 
र महन्मम कपपलका, ॥२४॥ ॥२७॥ भूसा, ्ङ्गारा, दी, सूखे ह प्रो, रस्सी 
ठुषाङ्गारस्थिशीणानि रुवसादिकानि च| | शरीर कपङ्ा ध्न सवको वुद्धिमान्‌ मचय रास्ते 
नापितिषमत्‌ तथा परागः पथि चैवं तथा भवि ॥२५॥| या पृथ्वी पसे न उवे ॥२॥ पिद, देवता म्य 
पेदे मतान तयाल्ैन्‌ । | रीर ज क थ 
छल विमतः वंद्यो भोक्त ९९॥| व त दे 
८९९ मुख दोकर पित्र चित्त से एकाग्र होकर. 
भाड्ुलोददय्ुलो वापि स्वाचान्तो वागूयतःशचिः। | दोनो छाथ जंघाशनों के.अन्दर रखकर जुष्य, करो 


ज्ीताभन्च तंधि्ो धन्तरज्जासुः सदा नरः॥२७॥| सदैव भोजन करना चादिये ॥ २७॥ विना रपभात 
उपथातादते दोषं नान्पस्योदीरये-बुयः । । धिये बुिमाच्‌ किसी दूसरे ध दोष चशंन न करे 
तथा प्रत्य सवण श्नौर घहुत ग्म श्रन्न बर्जित दै 


० ५९ क मत्युष्एमे „ पि 
्कषलवण . चञज्यमनमतयुभामेव चे ॥२८॥ ॥ २८॥ चलत दु श्र दे हष मून ओ वि 
न गच्छत च हिष्ट बै विरमूनोतसगंमातपवान्‌। । क ्ाग न रे घ्र यदि ्राचमन करन हौ तो 
इरव्वी नेव चाचामन्‌यत्‌ किंचिदपि भक्षयेत्‌॥२६॥ क ध ॥ मठ सुद होकर व ग 
उच्छ नालपेत्‌ किचित्‌ स्वाध्यायं पिवज्जयेद्‌ करे तथा भरे सुख से स्वाध्याय करना श्रद्‌ स्‌ 
१1 साध्याय ववज | ब्राह्मण, अशनि श्रौर अयने शिर को दूना वर्जित है 
गौ ब्राहमणं तथा चिं समू्दानंच न सपे्‌॥२०॥ ।२०। सुख से स्य, चनम्‌ शरीर तारो 
न च पष्यद्व मेन्दं न नक्ष्राणि कामतः | | धी देखना तथा दूसरे श्रासन नौर शथ्याप्र जाना : 
भिन्ासनं तथा शग्यां भाजरनच विवर्जयेत्‌ ॥३१॥ आदि सव निषिद्ध दै ॥३१॥ शरू का स्वागत : 
गुरूणारासनं. देयम््ुरानादिस््रतम्‌ । | रादि करके उनको असन दे तथा अरामं करके ` 


अरुत ˆ तथालापमभिवादनप्कम्‌ । | उनसे शरद वातला कर, तथा धुर का. , 
तथानगमनं इयात्‌ ' प्रतिशूलं न सेत्‌ मंन करे श्नौर उनके धतिद्रूल न चले ॥३२॥ पक्र 
कः : ` | बद ही धार्र किये इष भोजन शरीर, देवताप्रो " 


श. ~ ^ भद्धीत डवि ४ 

नेकवधव भुञीत, न छ्पदिवताच्यनम्‌ {| ऋ पूजन न कर ब्रह्मो वोम सेर लद थ 
न बाहयेद्िनान नान मेह इ्वीत ुद्धिमान्‌ ॥२२॥ श्रनि मे ममू का त्याग न करे ॥२२॥मयुष्थ छौ 
ल्लायीत न नरो तो नं ` शयीतं कदाचनं । । नदी दोर नदीन नीर सोना नदीं चाद्ये । तथा 


`. १३८ | माकर्डेयपुराण ४ अ ३४ 
पाशिभ्यष्ुमाम्यांचरण्टूयेत शिरस्तथा ।॥२४ श हाथों से त क न सुजलाना वचादिये] रेभा 
न्ामीश्यं शिरःलानं काय्यं निष्कारं नरै ना कारण शिर से वारःघार स्नानन करना 
न  श॒रास्नान काय्य निष्कारणं नरः। गित रति दाति ल रेत ची शः 
शिरःस्नातश्च तलेन नाज्ग किचिदपि सेत, ।२१५॥ मै न लगाव ॥ ३५॥ सव श्रनध्याय के श्रवसे मँ . 
श्रनध्यायेपु सर्व्वेषु स्वाध्यायंच पिवज्जयेत्‌। | स्वाध्याय वर्जित दै । वाह्यण्धि;गौ, सर्यकी शरोर 
ब्राह्मणानिल-गो-ू्यान्‌ न मेहैत कदाचन ॥३६॥| सड त 4 मूजरन ५ दिनम उत्तर 
उदङ रात्राय „ ! ` | सल श्रौर रानि मं दक्तिण मुख होकर मलमूत्र का 
सुखो दिवा त्रुतसग दक्षिणायुखः | | अ | 
भ्ाबाधासु कथाका इष्यारमूतर रीपयोः ॥९७।| करे ॥ ३७॥ गुर के दोष को न कदे, शौर यदि चे 
दुष्छृतं न गुरो्रुयात्‌ कु्ध॑चनं प्रसादयेत्‌ । | कड दोगये दों तो उनको मरन करे । तथा दूसरों ` 
परिवादं न शूयादन्येषामपि $ववताम्‌ ॥३८॥|| से की ह भी युर की निन्दा को न. सुने .॥ २८॥ 

। ब्राह्मणों को, राजा को तथा दुःख से अ्तुसे को, 
पन्था दैयो नाह्मणानां राहो दुःखातुरस्य च । | श्रौर शरपने से श्रधिक चिद्वान्‌ को, गर्भवती खी 
बि्याधिकस्य गुधिरया भाराय यवीयसः॥३६॥| को; बो से लदे इय को तथा अपने से भरष्ट -को 

नि मागं चोड दे ॥३६॥ मूक, श्रन्धे, विरे, .मतवालि 
मूकान्यवधिराणांच नमत्तकस्य च । | श्रौर बिषिसतथा पुंश्चली खी, वैरी, वालक शौर 
छंश्चस्याः कृतवेरस्य बालस्य पतितस्य च ॥४०॥ पतित के लिये भी स्ता छोड़ देन चादिये ॥५०॥ 
देवालयं चैत्यतरुं तथै । बुद्धिमान्‌ मटुष्य को चादिये कि देवालय, देवदत्तः 
थे दु^मान्‌ र 
५ वियाधिकं | ४ व गाय, श्चपने से श्रधिक विया बाले, शुर श्रं 
वि्याधिकं गुरु देव बुधः ययात्‌ पक्षिणम्‌ ।:४१॥| देवता की परिनमाकरे 1९६ जो जूता, वख, माला. 
1 धृतमन्येन धारयेत्‌] श्रादि दूसरे का पिना हुश्मा हो उसको धारण -न 
। ॥ ५ जयत्‌ ६ करे इसी भकार जनेऊ, गहने श्नौर करवा भी) 
| या करव बज्जयत्‌ ॥४२॥| दूसरे के वित ह ॥ ४२॥ चोदस, अमी शर 
च . तथाष्टम्यां - पचदर्याच पव्वंसु । | मावस तेथा श्न्य पवो पर शघो मे तेल लगाना ` 
तेलाभ्यङ्ग तथा भोगं योपितश्च पिषरर्भयेत्‌॥४२॥ व स्री के साध ४९ दै ॥ ४३॥ 
ह बुद्धिमान्‌ मनुष्य कभी वेखकर पौव श्रोर जाध न 
न कषि्ादनहृशच व कदाचन । | दिलावे तथा दोन पवो को न दिलावे श्रौर पात्र 
न चापि िक्षिपे्‌ पादो पादं पदेन नाज्रमेत्‌।॥४४॥ को परब पर न वा ॥ व ॥ म्मैस्थान मं श्राघात 
मरम्पाभिघातमाक्रोशं वैन्यं बवर्जयेत्‌ करना, चथा शप देना श्चौर चुगली करना, .यह्‌ 
। न ज्नयत्‌ । | चर्त दै दम्भ, रभिमान तथा कठोरता कभी 
दम्भाभिमानतीक्ष्णानि न कूर्व्वेति विचक्षण ४५ बुद्धिमान्‌ को करना उचित नद्यं ॥ ४५॥ मुखे, 
भृखोन्पत्तव्यनिनो षिरूपान्‌ । उन्मत्त, व्यसनी, ऊरूपः मायावी, तश्रा न्यूनाङ्ग 
स | बो । ५ मायिनस्तथा । | शौर च्रधिकाङ्ग इनको देखकर दंसना नहीं चाहिये 
न्यनाङ्ग्वाधिकाङ्गश्च नोपहासेर्विदृषयेत्‌ ।॥४६।|| तथा इनका दोप भी नदीं बताना चाहिये. ॥४६॥ 
परस्य दषं नोदयच्छेच्छक्षायं पत्र-िष्ययोः। | अपने श 1 ध शि्ता १ व 1 
पविरत्‌ पाहः = दरड नदीं देना चाद्ये तथा पाव से श्रा्नं 
नोने ५ पादेनास्य चासनम्‌ ॥४७।| घसीट कर न वैटना चाये ॥ ४७॥ खीर, खिचडी 
संयावं छृसरं_ मपि नामागपसाधयेत्‌ । | शरीर मांस श्रपते सिये ही न वनात । साकार 
पायं भरातमच भोक्तव्य कृतवा चातिथिपुजनम्‌॥४८॥ नौर पातःकाल पिले प्रतिथि का सत्कार. कर 
शड्छलोददखो पापि पागृयतो दन्तधावनम्‌ । | फिर स्वयं व स व पूं सुख. ४ 
एव्वीत.. सततं -पत्य व्ययेदव्लयवीरय; उत्तर सुख दोकर दर॑तनकरे । तथा हे वत्स 1? 
गौदकशिरा कशिः | खृष्त की दांतन का निषेधे है उस दत्त की दौँतनं 
दकता; स्वपञ्जातु न च मत्यकूशिरा नरः। | न करे ॥४६॥उत्तर श्नीर पश्चिम दिशा मे शिः 


अ० ३४ 


न तु गन्धवतीष्वप्सु स्नायीत न तथा निरि। 


उपरागे परं स्नानगृते दिनयुदाहूतम्‌ ॥५१। 
त्रपयृञ्यान्न चास्नातो गात्राए्यम्बरपाणिमिः। 
न चापि धूनयेत्‌ केशान्‌ वाससी न च धूनयेध।५२॥ 


५ नाचुलेपनमादचादस्नातः ` कर्टिचिदूधुषः 


न चापि रक्तवासाःस्याचित्रासितधरोऽपि वा ॥५३॥ 


नः च कुर््याद्विपरय्यासं वाससोर्नापि भूषणे । 


वच्चय श्च बिदशं बच्मत्यन्तोपदतंच यत्‌ 


केशकीटावपन्नंच भुण्णं श्वभिरपेकषितम्‌ । 
्रवलीदावपन्नश्च 
पृष्ठमांसं दथामांसं वच्य मांसंच पुत्रक । 


न भक्षयीत सततं प्रत्यक्षलवणानि च ॥५६॥ 


वच्य चिरोपितं त्र भवतं पय्युपितंच यत्‌] 


पिष्टशाकेश्ुपयसां विकारान्‌ दपनन्दन ॥५७॥ 


तथा मासविकाराश्च ते च वर्ज्याथिरोपिताः। 


उदयास्तमने भानोः शगरनच बिवर्जयेत्‌ ॥५८॥ 


‡^ नास्नातो नैव संविष्टो न वचेवान्यमना नरः । 


` ५ चैव शयने नो्व्याुपविषटो न शब्दवत्‌ ॥५६॥ 


न ` चेकवस्रो न वदन्‌ भरक्षताममदाय च। 


शुलीत पुरषः स्नातः सायं ्रातयेयाविषधि ॥६०॥ 


परदारा न गन्तन्याः पुरुषेण विपथिता । 


इषापूर्तायुषां `हन्त्री परदारगतिच्चणाम्‌ ॥६१॥ 


न ` दीदशमनायुप्यं लोके किंचन विद्यते । 


यादशं ` पुरुषस्येह प्रदाराभिमपंणम्‌ ॥६२॥ 


देवार्बनाधरिकार्य्याणि तथा युव्वंभिवादनम्‌ | 


, हृव्वीत -सम्यगाचम्य॒तददन्चथजिश्रियाम्‌ ॥६२॥ 


; श्रपेनाभिरगन्धाभिरद्विरच्छाभिरादराद्‌ । 


भ्राचामत्‌ पुत्र पए्याभिःमाद्ुखोदडुखोऽपि वा६४ 
अन्तन्जलादावसथादरपीकान्भूषिकस्यलात्‌ । 
कृतशौचावशिष्टा् वज्जयेत्‌ पंच वै मृदः ॥६५॥ 


-अक्षाद्यं हस्तौ पादौ च समभ्युक्ष्य समाहितः। 


अन्तञ्नीदुस्तथाचमेत्‌ तरितं पिविदपः ॥६६ 


परिमृज्य हिरास्थान्तं' खानि. मद्धानमेव च । 


भाकंररेयपुराणं 


शिरस्यगरू्यमास्थाय शयीताथ पुरन्दरम्‌ ॥१० \ कृरफे न सोवे । सोते समय शिर घरि या पूरव 


सारोद्धरणद्पित्तम्‌ ॥५१॥ 


१९६ 


दिशा मे दोना चाहिये ॥ ५०॥ दुर्गन्धि जलत मे 
तथा राधि मेँ स्नान न करना चादिये- परन्तु किसी 


के भरमेपर यौर चन्द््रहणमें राचिमें स्नान करना : 


चाये ॥५१॥ उपरोक्त दशमे श्चान करमे पर शरीर 
को पोना नहीं चादिथे । विना. खान किये वालो 


श्रीर खों को न धोना चाहिये ॥५२॥ विना सान. 
किये बुद्धिमान्‌ मुप्य चन्दन न लगाते । लाल ` 
श्रौर रज्गविरद्धा कपड़ा न पदिन ॥ ५२३॥ कोई श्रा ' 
भूपण चख के उपर न पिने तथा फटा पुराना . 
च्रीर मलीन चख पषिनन; यजित है ॥ ५४ ॥ जिस . 


बस्तु मे वाल ष कीड़े पड़ गये दो, तते की दि 
पट्‌ गहं दो, अथवा भटी वस्तु.या ` जिसका श्रक्ग 
श्रञचित तरीक्रे से निकाला गया टो उन चीज्ञौ. 
का सेवन न करे ॥ ५५॥ हे पुत्र! पीठक्रा मांस, 
वृथा मांस तथा वर्जितं मांस जीर प्रत्यक्त नोन न 
खाय ॥ ५६ ॥ हे पुत्र | वासी श्रौर वहत देर तंक 
शंधा हुआ भात न खाय । दे राजङ्कमार ! पिष, 
शाक, उख का वासी रसं सेवन न करे 1५७ पडत 
देर का खीचा इद्र मांसं का रख वर्जितहै ! सुयो 
दय श्रौर सू्थांस्त के समय न सोते ॥ ५८॥ चिना 
स्नान किये हुए, ्नन्यमनस्क वैडे हप, सोते इष, 
यिना रासन पृथ्वी पर वैढे हुए श्रौर वोलते हृष 
भोजन न करे ॥ ५६॥ पक वख पदिने तथा कोई 


देखता हो त्रो उसको वित्रा पिरे भोजन न करे। 
भरातःकाल श्रौर सायंकाल की विधिपूर्॑क सन्ध्या 


करके श्चौर स्नान करके भोजन करे ॥ ६०॥ ज्ञानी 
मनुष्य को चादिये कि दुलरेकी खी के साथ मधुन 
न करे। परली गमन से पुरय श्रौरश्ायु का क्षय. 
होता दै॥ ६१ ॥ संसार में पुरुप के लिये परस्री 
गमन के स्मान श्रायु चीण करने बाला दुसखय 
कार्यं नदीं हे ॥ ६२ देवपूजन, हवन तथा गुरं का 
श्रभितादन भली भांति आचमन करके करे तथा 
इसी पकार भोजन करे ॥ ६२३॥ फेन श्रौर दुर्गन्धि 
रदित जल को श्रादर पूर्वक क्तेकर उत्तर अथवा 


पूर्व पुरय दिशा मे भख करके आचमन करे ॥६७॥ < 


जल के भीतर की मिदी, दीमक् की लगी मिी 
तथां मृते के विल की मिध शरीर जो मिद्धी विसी 
ने दाथ धोकरः छोड़ दी हो ये पाँच परकारकी मिद्ध 
वर्सित है ॥ ६५॥ हाथ श्नौर पांव धे.कर' स्वस्थ 
चित्त हो जातु के भीतर हाथ रखकर अचमनकरे 


श्रथांद्‌ तीन था चार वेर थोड़ा पानी पिरे ॥ ६६॥. 


दो वरर मुह धोकर शिर पर पानी चिडके ररौ 


६, 


५ 
= ६ 
†\ 
५ 
५ 
| 
५ 
ट 
५ 


& 
५ 
+ 


ह्न 


-१४० माकेरेडेयपुराणं । श्र० ३४ 


पतिर होकर भली भांति आचमन कम्‌. जलल - से 
क्रियाय करे ॥द७॥ यत्नपू्ंक स्वस्थ चिन्त होकर 
देवताश्नौ, छपियों चनौर पितरोकी निरन्तर क्रियायं 
करे ॥४८ वुद्धिमान्‌ मचप्य दीक कर श्रथवा शक 
कर कपड़े. वदल्ते श्रौर श्राचमन करे. । खांसने 
जानवर के चाट लेने छीर दमन करने मे ॥*६९॥ 
गौ को स्पशे करे रौर सूयं का दर्शन करके ्राच- 
मन करे तथा ्रपना , दादिना कान दूते ॥ ७०॥ 
-अपने.वैभव के अयुसार ये सव करे ! पटिजे, काथः 
के अभाव मे.द्सरा कायं करे ओर यदिः, पदिली 
कही हुई स्थिति नहो. तो वाद मे कदी. -दृसरीं 
स्थिति के रनु सार करे॥७१ ॥ दतां कोन करः 
कटाये तथा ्रपने-शरीरपर ताडन न करे ! संध्या 
समय सोना, अध्ययन करना, तथा भोजन करना 
चर्जित है ॥७२॥ सन्ध्या समय मैथुन शौर. माम 
चलने का भी निपेध है ॥ ७२ ॥ हे तात ! पूर्वाह मे 
देवताञ्चों का तथा रपरा मेँ भक्ति प्तक पितयं 
का पूजनं करे ॥ ७४ ॥ देवता श्रौर पितरो का 
पूजन शिर से स्नान करके करे श्रीरः पूरव मुखः.या 
उत्तर सुख होकर्‌ च्ौरकर्म करावे ॥७५॥ जो कन्या 
लीन दो परन्तु रोगिखी, व्यङ्ग वचन वोलनेवाली 


सम्ययाचम्य तोयेन क्रियां व्यत वै शुचिः ॥६७॥ 
देवतानामृषीणाञ्य पितिणाश्च॑व- यत्ततः 1 
समाहितमना भूता कर््बीत. सततं नरः ॥६८। 
ष्वा लिष्ठीन्य षासश्च पररिषायाचमेरधुधः 
्षतेऽ्यलिदे बान्ते च तथा निष्ठीवनादिषु 
हुय्यादाचमनं स्पशं गोगृषटस्याकदशनम्‌ । 
र्वी तालम्बनेश्वापि दक्षिखश्रवणस्य वे ॥७०॥ 
यथाविभवतो द्य तद्‌ पएव्वाभावे ततः परम्‌ । 
, अषिद्यमाने प्यके उत्तरमाधरिरिष्यते ।७१ 
न क््यादन्तसंयषं नात्मनो देहताइनम्‌ । 


सखभाध्ययनमोज्यानि सन्ध्ययोध विवज्जयेत्‌।॥७२॥ 


' सन्ध्यायां मेथनश्चापि तथा पन्थानमेव च ।*७३।! 
पूल्वोक्ठं तात देवानां मरुष्याणाञ्य मध्यमे । 

, भक्त्या तथाप्गह्ो च दुर्व्वीत पित्पनलम्‌ ॥७४॥ 

 शिरःस्नातथ कूर्व्वति दैवं फयमथापि वा| 
भाडछसोदडप्रसो वापि श्मशरकस्यै च कारयेत्‌।७५॥ 


व्यङ्गिनीं वञ्जयेत्‌ कन्यां इुलजामपि रोगिणीम्‌ । क न 6 श 
विकृतं पिङ्गलश्चैव वाचाया सत्व॑दूपिताम्‌ ॥७६॥ बाली, न्दर नासिका व्राली, सव सुन्दर लकतरो 
सौस्यनापाश्च सव्वंलक्षणलक्षिताम्‌। | से यक्त पेसी न्या से मरष्य श्रपने कल्याण -के 


लिये विवाह करे ॥ ७७॥ पिता से सातवें ` रौर 
माता के पांचवे सम्बन्धं मे विवाह करे । श्या 
छोड़कर सत्री की र्ता करे तथा दिन-मे शयन श्नौर 
मेथुन न करे ॥ऽप दृसरों को कंश पर्हुचाने बाला 
कायं न करे तथा पश्यो फो पीडा न पर्टुचवे। 
रजस्वला खी चार रानि तक सव वर्णौ म वर्जित 
हे ॥७६॥ खी जन्म न पाचे इस विचार से रजस्वला 
से पाँचवं दिनि भी मेथुन न करे । हे पुत्र | खटी 
रात्रि को खी गसन करना चाहिये, ॥ ८०.॥ :युग्म 
रारि ल्ी गमन करने से पुत्र च्चौर अयुग्म 
कन्या उत्प होती है 1 इसलिये पुत्र की इच्छा 
“रखने वाला मयुप्य युग्म रानि मे मेथुन करे । श्स 
से पिले यानी पांच रश्चियों मे मेथुन करने से 
विघमीं जौर सन्ष्या-खमय खछीगमन करने ते षी 
लिया -तेग खे भसित पुत्र उत्पन्न होता हैः ॥ ८१-॥ 
हे पु ¡ दजामत्त.वनवाकर, बमन करके तथा. खी 
| सम्भोग करने के उपरान्त वुद्धिमान्‌ मनुष्य को 
चाद्ये कि च्रं सित स्नान करे श्रौरःइसीं तरह 


तादृशीषु कन्यां श्रेयःकामो नरः सदा ॥७७॥ 
उद्हेत्‌ पितृमात्रो्च सप्तमीं पंचमीं तथा । 

रेदारान्‌ त्यजेदीष्या. दिवा च स्वभमेथने ॥७८॥ 
परोपतापकं कम्म जन्तुपीडाश्च वन्ज॑येत्‌ । 

उदक्या सव्येवणनां वञ्ज्यां रात्रिचुष्टयम्‌ ।॥७६॥ 
सीजन्मपरिहाराथं पंचमीमपि बरज्जयेत्‌ | 
ततुः षष्वयां त्रजदरा्यां श्र्ठा युग्मासु पुत्रक ॥८०॥ 


युरमासु पत्रा जायन्ते चियो्युामु रात्रिषु 1 
तस्पदुधुग्माप पुत्रीं -पंविशेत खदा नरः | 
विधर्िणोऽदि पूर्वाख्य सन्ध्याकाले च परुडका;८१ 
्षरकम्मणि वान्ते च स्षीसम्भोगे च पुत्रक । 


° ३४ माकैरुडेयपुराण १४१ 


~ ------~----~-~---~----~---------------~-------~- 
~~-~--------~. 


के 


देव-वेद-दविजातीनां साधरुसत्यमहात्मनाग्‌ । 
गुरोः पतिव्रतानाञ्च तथा यज्यतपसिनाम्‌ ॥८३। 
परिवादं न कर्व्वति . परिहासंच पुत्रक 
क्व॑तामविनीतानां न श्रोतव्यं कथंचन ।८४॥ 
नोक्कृएशय्थासनयोर्नापषृषएटस्य चार्देत्‌ । 
न चामङ्गरयवेशः स्यान्न चामङ्गरयवाग्भवेत्‌ ॥८१५॥ 
धवलाम्बरसंवीतः सितपुष्पविभूपितः। 
नोद्धतोन्मत्तूदैथ नामिनीतेथ परितः 
गच्छेन्ये्री न चाशीलनं च चौय्यादिदूपितेः । 


वेद, बराह्मण, सत्यवादी, महात्मा, शुर, पतिव्रतां. 

यक्ञ-कर्ता, तपस्वी ॥ ८३॥ हेःपुत् ! इनकी निन्दा-; 
तथा उपहास न करे । तथा कभी इनकी निन्दाः. 
करने बालों की न खुने ॥ ८९ ॥ अपने से श्रेष्ठ तथा ` 
श्रपने से नीच, की शय्या परः न चदे । अपना. 
द्मद्गल वेम न करे तथा मङ्गल. वचन .न चोल्े ॥ . 
सफेद चख पदिने तथा श्वेत माला से अपने "कोः. 
चिभूपित करे श्नौर उद्धत, उन्मत्त, मूख, दुर्विनीतः" 
परिडव ॥८६॥ श्रीर दुध्ील, चोर, - क्षिजूलखर्च,. 
लोभी श्रौर तैरियं से मित्रता न करे ॥८७॥ 


भः र| तप >; + 
न चातिन्ययशीसैथ न लुवधैनापि वैरिभिः ॥८७॥| वन्धकी खी श्रौर उसके पति से तथा श्रतेः से 
श्रथिक वलवान्‌ श्रौर कमजोर ` से' तथा निदितं / 


न वन्थकरीभि्यं॑न्युनेवन्धकीपतिभिस्तथा । 
ष्ट १ चम ¢ [वा धि पुरुषों = (^~ । करे . मरं र सवसे । 
साद्ध न वलिभिः कुस्यान्न च न्यनिन निन्दित; ८८॥| पुरा स भी मिचता न. करे ॥ ८८॥ श्नौरं सवसरे , , 
सर्ववशङ्किभि ~ = १, डरने चाज्ञे कायर लोगों से-भी-मिच्रता नदीं'करनी 
3 च्व ‡ ॥८ [प [क र 
ह सत्वशद्धभनितय श < ५ चाहे ॥ ८६॥ साधुश्भौ, सदाचार से रहने वालो, 
र्ति पाधुमिमत्रा सदाचारावल्म्विभिः। निद्ानो, शम वचन ` चोमने वालो, सामरा 
आ्रतरपिशनैः शक्तैः करमण्ुदयोगभागिभिः॥६०॥| नौर कर्मवीर उचोमी लोगों सेः मिताः करनी 
वेदिद्रा्तस्नातैः सदासीत सदा बुधः । चाये ॥ ६०॥ १ श राजा, 
सु्दीकषित-भुषाल-स्नातक-श्वशरः सद ॥६१॥ स्नातकः, शवर, ऋष्विः इनः छो मै किसी के 
, व (ऋः नच्यपेच गृहागता । चर आने पर उनका श्रं सहित पूजन करे ॥ &१॥ 
ऋलगाट नः ड्म सत तेर े पुत्र ! वर्प दिन के वती ब्राह्मणौ का मधुपक 
० दिनान्‌ पेतान्‌ ।॥६२॥|| श्रादि से पूजन श्रपनी शक्ति के श्रवुसार करना 
दरव्ययेन्सधुपकेण यथाक्रालमतन्द्ितः । 
तिष्ठे शासने तेषा श्रेयस्कामो हिजोत्तमः । 


चादिये ॥६२ श्रपने कटयाण की कामना करने वात 

म्प्य को चाये किं उनके शासन मे रदे तथां 

न च तान्‌ विवदेद्धीमानाक्रष्टधापि मै सदा ॥६३॥ उनसे विवाद करके उनका शाप न जे ॥ ६२] श्मपने 
सम्गग्रहारच्चनं कृत्वा यथास्थानभदुक्रमात्‌। | धर मे यथास्थान देवार्च॑न.करे तथा फिर श्न्निका 
सम्पूजयेत्‌ ततो बहि दचाच्येवाहुतीः करमात्‌।।६४॥| एजन कर्‌ उस्म आहति दे ॥ ६४ ॥ पदिले आहति 
भ्थमों ब्रह्मश दात्‌ प्रजानां पतये ततः । | ब्राहमण को दै फिर को, व 
तृतीयाः क ध॒ ५।॥ छो तथा फिर कश्यप को श्राहुति दे ॥ ६५॥ पः 
कतीयाम्ेव युध्य; कर्वपाय तथाप्य्‌ ॥६५॥| तिमत रो देकर ट चलि 
ततोऽ्लुमतये दत्य दचादरषदवलि तृत 1 | प्रदान करे श्नौर प्रिर जो नित्यकर्म ियापे मैन 
र्व्वार्यातं मया यतत नित्यकम्मक्रियाविधौ।।६९।॥| पदिले कह द उनको विधिपूवैक करे ॥६६॥ सवे 
वैश्वदेव ततः कु्यादुवलयस्तत्र मे शर । = | बाद ेश्देवभमे धु र पिर चि ह 
यथास्थानविमागन्तु देवालय भ पृथक्‌ ॥६७॥ सान वबा वी चौर वायन सीन 
पञ्जन्यापोधसतरीणं दाश्च मानकं त्रयम्‌ । | को सड मे स्थित कर पूजन करे रः पूवे दिश 
वायवे च भतिदिशं दिभुभ्यः भाच्यादितः क्रमात्‌६८॥| के क्रम से प्रत्येक दिगा मं वलि देते ॥ ६८॥ तथ 
व्रह्से चान्तरीक्षाय सूर्याय च गरथाक्रमम्‌ | | यथाक्रम ब्रमः अन्तरिकल, सूर्य, विश्वेत * छर 


१४२ माकंण्डेयपुरास | ° ३४ 


न्न" ~~~ ~~~ ~~~ 


्रण्येशकषि तेभ्य एव च ।६६॥ विश्वभूतों को वलि प्रदान करे ॥ ९६॥ उपस्‌ श्रौरः , 
= ६ । । भूतपति को उत्तर दिशा में शरीर स्वधानमः थह 
। ६ "| ककर पितरोको दति दिंशामे वत्त देवे ॥१००॥ 
लधानम तीता पदभ्य्ापि दक्षिणे ॥१००॥| अपस्य होकर वत॑न मे से वे हय शर को 
्त्ापसव्यं वायव्यां यक्मेतत्तति भाजनात्‌। कर यक्तमेते' यह कहकर वायुकोण भे ' 
्रज्ायरेषमिच्छन्‌ वै तोयं दचराद्यथाविधि॥ १०१ रके रर 4 स 
पथाविधि यथान्यायं ब्राह्यणायोपपादयेत्‌ ॥१०२॥| ब्राह्मो श्नौर देवतां की जिस-जिस कर जर 
क्यात्‌ कम्मांणि तीर्थेन स्वेन स्वेन यथाविधि । | तीर्थं से पूजा की जाती दै उसी से उनको श्रष्य 
ॐ प्वादीनां न स [3 गूढे भ उत्तः 

वादीनां तथा कुययादत्रादस्येणाचमनक्ियाम्‌ १०३ आ भा व य व त 
तरो रेला प्रशं दशिशस्य ठ । =| दादे दाय की है सी से आचमन करना 
एतदत्राहम्यमिति स्यातं तीर्थमाचमनाय वै| १०४।|॥ १०४॥ तर्जनी श्ंयुली श्नौरः श्र॑मूढे के वीच का 
न्जन्यङगुष्टयोरन्तः पेयं तीर्थदाहृतम्‌ । स्थान पिदतीशथ कहलाता है उसी से नान्दी भुल. 
पणं वेन सोयादि दयाच्रान्दीुखादते ॥१०५॥| पितरों को छोड़कर अन्य, पितरो -को जल देना 
रररे तथा दैवं रेन देवक्षियाविषिः | | चाहिये ॥६०५॥ यलो क आये का आग दव 
भं कनि श 3 त तीथं कहलाता हे उसी से देवक्रिया करनी चाहिये 
पच क छिकामूले कायं न प्रजापतेः ॥१०६॥| कनिष्ठिका अंगुली की जङ्‌ प्राजापत्य तीर्थ है जिस 
एवमेभिः सदा तीथे देवानां पितृभिः सह । | से भाजापत्य कमे करना चाये ॥ १०६ 
षदा कार्याणि दुष्त नान्यतीर्थेन कर्दिचित्‌१ ०७॥ तीर्थ से देवतार्यो श्रौर पित्रो कीं , कीं 


¦ शस्तं पिच्य ैत्येण सन्य जानी चाये 1 भिन्न तीर्थो से अन्यं क्रियायं न 
हभयेणाचमनं शसं पच्य प्ण स्वेद । करनी चादिये ॥१००॥ ब्रहमतीथं सेश््ाचमन, पित. 


दवतीर्न देवानां माजापत्यं निनेन च ॥१०८॥| तीर्थ से पिदकमै, देवीं श्नीर भजापति तीर्थ से 
नान्दीभुखानां कुव्बीत भागः पिरठोदकक्रियाम्‌ | | कमशः देवकं नौर पाजञापत्यकर्म करने चाहिये ॥ 
भ्राजापत्येन तीर्थेन यश्च किंचित्‌ प्रजापतेः ॥१०६॥ उद्धिमान्‌ मलप्य नान्दीमुख पितरों की क्रिया श्रौर 


५ ः पराज्ञापत्य क्रिया प्राजापत्य तीर्थं से करे ॥ १०६॥ ` 
पुगपञ्जलमर्धिच विश्रयान्न विचक्षणः । तर तोत पतथि वि जर यह त 


रुदेवान्‌ भरति तथ न च पादौ भसास्येत्‌॥११०॥ तथा गुर श्रौर देवताश की ओर पब च पसर ॥: 
नाचक्षीत धयन्तीं गां नलं नाञ्जलिना पिवेद्‌॥१११॥ दध देती हुई गाय को न रोके श्रौरः श्र्जलि सेः 
शौचकालेषु सरेषु गुरुवे घा पुनः । | जल न पीव ॥१११॥ सव १५५ मै चावे बड़े 
न विलम्बेत शौ चाथं न शुखेनानलं धमेत्‌ ॥११२।|| द क श 
रत्र न वस्तव्यं श नास्ति चल्यम्‌। | = भ न १२॥ ३ यु जह वट 
, र तष्टयम्‌ चार न रहते द्य बँ न रहे (१) ऋणदाता (२) ` 
ऋणप्रदाता वेश्च श्रोत्रियः सजला नदी ॥११३॥| वैच (३) परिडत श्रौर (४) जल बाली नदी # ` 
नितामिव्ो चरो यत्र बलवान्‌ धर्यतरपर; | | जहाँ पर वलकरा श्रौर घ्म तत्पर राजा दो व 
त्र नित्यं वसत्‌ ाहञः कृतः कटपतौ सुखम्‌ ११४] पर इष्धमान्‌ सदैव रहे क्योकि दुष्ट राजाके राज्य . 


ध मे कां | १ जयं 1] धर्मात्मा 
त्रामटष्यो चरपतियत्र॒शस्यवती मही । व व र 
गीराः संयता यगन .सततं न्यायवर्षिनः । . | न्यायवती हो श्रौर जहौ कोम मै इषव न हो वदाँ 
भनामस्सरिणो लोकास्तत्र षासः सुखोदयः ॥११५॥ सहना खलदायकः है ॥ ११५ ॥. जां - खेत “बहुत हों 
यस्मिन्‌ कृषीवला रट मायशो नातिभोगिनः} | तथा भोगने बले कम दो, जद वत. थकारः की ` 


~ तण 
मनन -- ------ 


. अ० ३५ 


माकण्टेयपुराण 


-१४२ 


यप्रौषधान्यशेपाणि वसेत्‌ तत्र विचक्षणः ॥११६॥ 
तत्र पु न घस्तव्यं यत्ैत्‌ त्रितयं सदा । 
निगीपुः पून्येर जनश्च सततोत्सवः ॥११७॥ 
वसेन्नित्यं सुशीलेपु सहषािपु . पणिडतः। 


इत्येतत्‌ कथितं पुत्र मया ते हितकाम्यया ॥११८॥\, 


। श्रौषधियां हो चतुर मछुप्य वहाँ रहे ॥ ११६॥ ठे; 


पुत्र! जहां यदः तीन रहते शं च्य न रहे (१) 
श्रपनी जीत कीं श्च्छा रखने बाले (२) जिनसे 
पदिले शत्रुता र्दी दो (३) तथा अर्दा स्डष्य 
नित्य उत्सब्युर दों ॥ १९७.॥ ` पणिडत लोग वाँ 
टी रहे जहाँ पर रहने बले सुशील दों । हे पृन ! 
यद सव न तुम्डारे दित की इच्छा मे कटा दै ॥ 


। इति श्रीमाकैरडेयपुराण मे द्रल्काुशासन मे सदाचार्‌ नाम ३७बँ अ० सुमराप्त | । ॥ 
| ~ खक = ^> -~ । 
9 । # 
पेतीपवा अध्याय 


मदालसोवाच 

प्रतः परं शृष्व त्वं व्ज्ज्यावज्जयेपतिक्रियाम्‌ | 
भोज्यमन्नं पथ्युपितं स्नेहाक्तं चिरसम्भूतम्‌ ॥ १॥ 
रसलेहाश्वापि गोधूम-यव-गोरसपिक्रियाः । 
शशकः कच्छपो गोधा श्वावित्‌ खदगोऽथ पुत्र २॥ 
मक्षा शेते तथा चज्यौ प्रामशकरइकुटौ । 
पितद्धेवादिशेषथ श्राद्धे ब्राह्मणकाम्यया | 
ओितंचौषधारथश्च खादन्‌ मांसं न दुष्यति ॥२॥ 
शहाश्मखणैरप्याणां रणज्जूनामथ वाससाम्‌ । 
शाकमूरफलानाश्च तथा विद्षचरम्मणाम्‌ ॥ ४॥ 
मणि-वज्ञ-पवालानां तथा भुक्तफलस्य च । 
गात्राणाश्च मनुष्याणामस्युना शौचमिष्यते ॥ ५॥ 
यथायसानां तोयेन प्राणः सद्वपेणेन च । 


पस्नेदानाञ्च भाण्डानां शुद्धिरुष्ेन वारिणा | 


शूर्थान्यानिनानांच _ एपलोलखलस्य च । 
संहता्नाच षश्ाणं प्रोक्षणात्‌ संचयस्य च ॥ ७॥ 
वकलानामरेषाणामम्बुमृच्छोवमिष्यते । 
तृणकाष्टठौपधीनांच भोक्षणान्टुदधिरिष्यते ॥ ८ ॥ 
श्राविकानां समस्तानां केशानांचापि मेध्यता। 
सिद्धार्थकानां कर्केन तिलकस्केन वा पुनः॥ ६ ॥ 
साम्ना. तात भषति उपधातवतां सदा । 


तथा कार्पीसिकानाञ्च विशुद्धिजलमस्मना ॥१० 


दुरूदन्तास्थि-भृङगाणां तत्भणाच्छुद्धिरिष्यते। 


मदालसा बोली- ` । । 
दे यदकं } श्रव तुम यह सुनो कि कौनसी 
वस्तु परह करने योग्य तथा दौनसी .वस्तु वसित 
है। धी से पकी सामभ्री चाहे वद देरकी तयार 
की ड दीक्योंन दो खानी चाद्ये ॥॥ गँ जौर 
जौ के सामान धीम न सिक करः दूध मै तैयार 
कयि ग्येदोतो भी खाने योग्य ह । हे पुत्र! खर 
गोश, कडा, गोद, सादी श्र गेंडा ॥ २ ॥ इनके 
खाना चदिये। स्मर नौर मुं पितर श्रौर देव- 
ताश्मों को च्र्पितं किया दुश्मा, तथा श्राद्धमे ब्राह्मण 
ङे निमित्त का पदां नदीं खाना चादिये मन्त्रित 
श्रौर श्नौपथिरप सास खाने भ दोप नहीं है ॥३॥ 
शंख, पाषाण, सोना, चाँदी, रस्सी, कपड, शाकः 
कन्दमूलफल तथा चिना पत्ते नौर छालकी वस्तुं 
[णा मणि, वज्र, भवाल.खुत्त चथा मघुष्योकि शरीर 
जल से शुद्ध होते दहै ॥ ५॥ लद क दथियायों की 
शुद्धता जल-से तथा शान पर धिसने से दोती है । 
्ी श्नौर तेल से सने हुए वर्तनं की शुद्धि गमे जल 
से होती है ॥ ६॥ यच, धान्य, रजिन चख, मूल 
शरीर श्नोखली तथा नस यद्ट सव धोने से शद्ध 
होते है ॥ ७ ॥ सम्पूणं यल्कल घस्र जल के चट 
देने से शद्ध हौ जति दै । तथा तृण .काड श्रौर 
श्रौपधियँ मी जल से शद्ध दोती है ॥८॥ समस्त 
सेदो का उन स्वयं शद्ध है । तिलका तेल लगाकर 
स्नान करने से.भी शुद्धता दोती है ॥६॥ चोट लगे 
मदुष्यौ की शद्वि जल से तथा सूती कपड़ों की 
शुद्धि क्षार लगाकर जल से होती है ॥१०॥` लकड़ी 
त, श्रस्थि श्नौर सींग पने स्थान से दते ही 
शुद्ध होजाते है श्रौर मिही के वरतनों कौ श्द्धि 


पुनःपाकेन भारडानां पार्थिवानां च मेध्यता `| ११॥॥ इुवारा पकाने से दो जपती है ॥१९॥ भिक्ता मँ प्रात 


` १४४ साकंर्ठेयुराण अ०-३१५। 


ध । र = चस्तु, कारीगर का दाथ, यज्ञार की चीज्ञ.ञ्नौर र 
शुचिभष्यं कारुहस्तः पण्यं योषिन्युखं तथा । | खियां का सुख सदैव रुद्ध है । तथा गली से लाई 
+ हुई चीज, चंद चीज्ञ जो क्षातन दो तथा दासों 
रथ्यागतम दासबर्गादिनाहत २। ९ 
रध्यागतमनिङ्ातं दास मू ॥९ दारा लाह इद वरतु ॥ १२॥ -श्चस्छ नाम बाली 
वाकशस्तं॑विरातीतमनेकान्तरितं लषु । युत दिन कपे पुरानी, श्रन्य वस्तुश्रों के साथ लाह 
इई श्रोर छोटी वस्तु, त्यन्त परवल मुप्यं.ांलक 


अतिमभूतं वालंच शइृदातुरविचेषटतम्‌ ॥१३ | वृद शरीर दसित मलुप्य हारा किये हप काम॥९३॥ 
कम्मान्ताङ्गारशालाश्च स्तनन्धयसुताः चयः | घर, धर्मशाला तैथा स्तन पीने बाला वालक शौर 


दनिन्यथ तव पिलाने चाल खी, वदता इश्रा सुगन्धित श्रौर फेन 
श तथेवापः सवन्त्योजन्धवुदरवुदाः ॥१४॥ रहित यल यद सव द्ध ह ॥ ९४॥ पृथ्वीकी शुदि 


ते कालादाह ९ श्रच्चि से, वुद्ासे देने से, गोवर लीपने से, गोड्मे 

वशु ~: -गोक्रम 
भूमिविशुधयते क मा्ननगोकगेः से श्रथचा चिड्क्यव करने से होती दै श्रौर धर 
लेपादुष्टेखनात्‌ सेकाद् श्म संमाज्ननाचनात्‌ ॥१५॥ वुद्टार कर देदता कै पूजन करने से शुद्ध होता है॥ 
जिस बस्तु म वाल अथवा कीड़े पड़गये द, किसी 
केशकीटायपन्ने च गोधाति मक्षिकान्विते | । श्न्य पए ने संघ लिया हो श्रथवा जिसमे मक्ली 


मृदस्वरभस्मना तात भोक्षितव्यं विशुद्धये ॥१६॥॥ गिर दो उसको मि, जल या राख से साफ़ 
४ ९ शद \ ५९६ करना चादिये ॥ १६ तावा खटा से, शीसा राख 


श्रौदुम्वराणामम्लेन क्षारेण घ्रपु-सीषयोः । | से स्वच्छ दोता है । कंसा जल श्रीर सलक गृते 


ध से शुद्ध होता है श्रौर वहने वाला पदा. वहा देने 
स्माम्ुमि् कांस्यानां शद्धः पावो रवस्य च१७ | से श द्ध होता ॥ है ९७ ॥ अपवित्र चस्तु फो मिष्टी से 


गृ्तोयगः £ 
्याक्तस्य स्थापहरशेन च ] | या उखकी दुर्गन्ध दुर करके दध करे, अन्य प्रकार 
ध नेषि संगः की वस्तुर्चों को भी उसी प्रकार क हर्व्यो से तथ, 
अ तदुद्नयवंगन्धापहारतः ॥१८; | उनकी दुग॑न्ध दूर करके एद्धकरे ॥ ५८४ ॥ जो जं 
तोयं ॥ परारुतिक रूप से पुथ्वी पर स्थितहे श्रोरं एक गय 
शचि गोतृधिृत्‌ तोयं मकृतिस्थं मदीमतम्‌ । | को ठे करनेके लि पर्या ह वह पविचर है श्सी 


तथा संच चण्डाल-कम्याद(दिनिपातितम्‌ ॥१६॥| धकार चारडल ओर व्याघ्रादि दरा मारे गये 
स # ६ म्‌ ॥९६ पञुञ्रां का मांस भी पतिं हे ॥१६॥ दे तात । गली 


रण्यागतंच चेलादि तात व।ताच्छुवि स्मृतम्‌ ॥२०॥| मर पड द्या वश्च भी वायु के लगने से शुद्ध दो 


रनोऽपिरो भौ (र जाता हे ॥२०] श्रि, रि, घोड़ा, गाय," चया 


५ दषटसङ्गाददोपिणः \,२ सक्खी च्रादि यह श्रस्प्रश्य वस्त के .संसमं होने 
विषो मिकाद्याथ ॒दुषगाददोषिः ।*२१॥ पर भी दोप रष्ित है ॥२९॥ नरी श्रीर घोडे का 
अनाशवो शुखतो मेध्यौ न गोषस्सस्य चाननम्‌। | युख थध दै माव के ववे का नहीं 1 `जव तक 
॥ ए ॥ ८ वद्या इध पीता दै वड भी शुद्ध इ 1 पत्ती दवाय 
“मातुः प्रस्तवणं ` मेध्यं शनिः फलपातने । ॥१२॥ -गिरायां हु फल भी दधद ॥२य्‌॥ आसम, .शय्या } 
आसनं शयनं थानं नावः पथि तृणानि च । वाहन, नाच रौर रस्ते के तथा वाजार की 
वस्तये चन्द्रभां अर सयं की किरणो से तथा 
सोमसुय्यांुपवने!. शुध्यते तान्न पएयवत्‌ ॥२३।॥| पवन से शद्ध दोजाती है ॥ २२ ॥ -गली में चलने 


| 


। 


रथ्यावसपण-स्नान-षत्पान-म्तानकभ्मसु फिरने पर, स्नान के समय, भूख प्यासकी निवृत्ति, । 
आचामेच यथान्यायं घासो पिपरिधाय च ||२४।॥/ करने ॐ समय तथा नीय॑पात क समय कपट़ेवदल. 
सपषटानामप्यसंसगेविरण्याक्र्ईमाभ्भसाम्‌ .] र विधिपूर्वक श्ाचैमन करे ॥ २७ ॥ गली अथवरा 


कीचड़ःपानी के संसग से स्पश हुईं वस्तंमी वायु. 
शङ्कष्टरचिता्नांच मेध्यता वायुसद्गमात्‌ ॥२५।। ऊ संसर्गं मान से पवि दो जाती है य ॥ ४ 


-अ० २१ १६ । माकरुडेयपुराण , -१४५ 


भमूतोपहतादन्नादगरुदश्् सन्त्यनेत्‌ }' पने दायते तैयार की इई भोजनकी.सामभ्रमिं से 
वलं नोय ५ न । - | शरग्रभाग निकालकर शेपको ्भिमंनित करे फिर 
| व क्षे स्य था पदा २६॥ जलको सत्तिकासे स्पशकर ्राचमन करे ॥ २६॥ 
| िरात्रन्तु ` दृष्टमक्ताशिनो भवेत्‌ । श ५ इ . दूषित श्रन्न 
1 खले तो उसके दोषकी शातिकरे लियै तीन रात्रि 
अज्ञे - ्ानपृच्वन्तु तदोषोपशमेन ठ तक उपवासं करे ५२७ |एजस्वलाखी, इ चागीदड 
 उद््याश्व-भृगालादीन सूतिकान्त्यावसायिनः । | जवाली खी, चांडाल शादि तथा मुद को लेजनि 
सृष्टा स्नायीत शोचाथं तथेव भृतहारिणः ॥२८॥ 5 ६ 
षस्य घरं साधः र षु तेल णाकर खान करने ख 
नारं सस्य सरं सना शुध्यति मानः । | युद होते शौर यदि ठे न लगि तो श्राचमन 
श्राचम्येव तु निःसह गामालभ्याकमीक्ष्य वा॥२६॥ त श गायको स्पशकर खं न करे `॥ 
न॒लष्येत्‌ तथ ्ीवनोदरनानि रौर रुधिर, धूक, लखार, वमन आदिको लँधकर 
येत तबाष्ठीवनोदेनानि भ | | न चते तथा धिमान्‌ मच कमी. करम च 
नोधानादौ पिकालेषु भराह्स्िष्ठत्‌ कदाचन ॥२०. | वमीचे मे न खरे ॥ ३०॥ .मलुप्य को सिदित कम 
त चालपे्जनद्विष्टं वीरहीनां तथा च्ियम्‌ । | वाली विधवा ख्जी से वार्तालाप न करनी चादिये। 
हाद्व पादासपपि पदिः ॥२१॥ व व न 
प॑ पिण्डाननुद्धृत्य म स्नायात्र परवारिणि। | खात, गङ्घा तथा अन्य पुएववती नदियो "मे सान 


स्नायीत देवखातेषु गङ्गा-हद-सरित्यु घ ॥३२॥| न करे ॥ ३२ ॥ देवता, पिट्‌, सस्शासं तथा यत्रं 
रौर मन्त्र आदिकों फे निन्दको को स्पशं करके 


देवता-पित्र-सच्ास-यज्ञमन्तादिनिन्दकैः । ध 
0 ध दिनिनदरः । श्रथवा उनसे व्रातचीत करते पर श्रते .को खयं 
-कृत्वा तु स्पशनार्‌ शध्येतार्काविलोकनात्‌ ।३३।॥| का दयन करे शुद्ध करे ॥ ३३॥ रजखला -खी, 


अवलोक्य तथोदक्थामन््यनं परितं शवम्‌ । | घन्त्यज, पापीः -खवकः, बिधर्मी, जापेतासीः खी, 
नपुंसक, वखदटीन तथा चारडाल दिको देवकर 


मिष तिक भरडपवतान्ताव्ापिनः ।४॥ [० तथा रसू खी की सहचरी खी श्नौर परः 
सूतनिर्यवकावैव परदाररताश्च ये । | खी मे रत पुर्प को देवकर भी इसी मकार चुर 


एतदैव हि कर्तव्यं धरते शोधनमात्मनः ॥३५॥| मचष्य श्रात्म शद्धि करे ॥ ३५॥ अभोज्य; प्ररत 
| , नपसक, विर्ली, चूहा, कृचा, सु, पापी) 


चरभोध्य सूतिकः-पण्ड-मा्ज्जारासु-श्व हृकुयान्‌। | कोटी, चारडाल चनौर सुद उछाने ब्रते से यदि 
परिताचिद्धचण्डाल-मृतदारंथ धम्पंवित्‌ ॥३६।| धमता पुरुप ॥ ३६॥ चरु जाय तो स्नान करने से 
संसूरय शुध्यते स्नानादुदंकया-्ामकररौ । | शद दोता दै ली पकार रजखला की, चर च! 
तद् दतिकाशौच-दूपितान्‌ . पुरुपानपि ॥३७॥ प्रसूती के स्प -दोप से शौच करना -चािये।रेऽ 


यस्य चानुदिनं दानि निस्यस्य कर्म्मणः | | जो माह्मए को सताता है उसके धेर्म दिन्‌ 
हे, ह साधम पापी दै ।द 


यशर. बाद्मणसन््यक्तः किखिषी स नराधम॥३८॥| पर दिन व व 
८.3 ९ + ४ ठ स्‌ छोड व ॥ त 
नित्यस्य कम्पो दानि न इ्वीत कदाचन । | भीत या जनम के समय निषेधं ह ॥ ३६॥ सं 
वस्य लकरणे बन्धः ववलं तन्म ॥३६ | अथवा जन्म चे वाहमए को दश दिन, नि को 
दशाईं॑ज्राह्मणस्तिष्ेानहोमादिव्नितः.। | चार दिन शोर वैशय को यन््ह दिन, ठक सतक 
त्रियो द्ादशा्च वैश्यो मसाधमेष च ।।४०।| मानना चादिये ॥ ५०॥ स श भो पत महीने 
1 मिस्नितः ठकः शमपना कम न करके सुतक सानना। चादिये। 
सत. भूमासीत निनकममवनेञनितः । | इ अयन्तर सवक यथोचित सूय से ओ शिप 

ततः प॑र निनं कर्म इयुः 'सव्वं यथोद्वितम्‌ ।॥४१।॥ का र है करना चादिये ॥ ४९ ॥ खतकनदाद करने, 

५ # ध । 


` , १४६ आक्तरुढेयपुराण #, 11 ३५ । । | 
~~ ~ 
मेताय सलिलं देयं वहिदम्ध्वा तु मोतिकः पर सगो को चाद्ये कि पेत थो पदिले, च्रे, - 


स्वाते चौर नौवें दिन पनी द ॥ ४२१ सरोत्केः 
अ्रथेमेऽहि चतथ च सपमे नवमे तथा ।४२)) ५ 
अस्पास्थिचयनं काय्यं चतुथं गोध्रिकेदिने । चौय दिन मस्म शरीर शरसिथर्यो का सञ्चय करनय 


चाये, इस सयक खाद्‌ उनके श्रङ्ग स्पशे का ¦ 

-ऊट्ध्यं संचयात्‌ तेषामङ्गस्पशो विधीयते ॥४३।|| विधान कदा ॥४३। 4 वाद्‌ समा. . 

नोदक भी सव तरियप्यं करे ्लौर खपिड स्यशंमत्र ` 

ोदकस्ठः कताः त र्‌ः। | रं तथा.जिस गिन श्लु इदो उस दिनमा 
स्पशं एव सपिण्डानां मृताहनि तथोभयोः 

अन्वेक्गृक्षमाशल्ञ-तोयोहुवन्यन-बह्िु । 


नोदक शरीर सपि दोन -क्रियाय कर :॥ 8.॥ 
ऋप्मघाती, शख से मारा इश, जलम इवा इश्रा, 
श्च्चि से जलक्तर िधपान करके श्रथवा ऊचेसे. 
दिषपरपातादिृते भायो नाश्कयोरपि ॥९५।॥ भिरकर मरा इरा ५ # चीर .चालक, = | 
देशान्तरस्थे ६ पारनाजक नश म पर खः अथ र्नं 
छले देशान च तथा मनन्ति ते । शौच मानना चहिये तथा कद्ध लोमों क मतै 
सव्सौदमथान्येय "यहयुक्तमशौचकम्‌ ॥४६।॥| कि यह शौच तीन दिनका दोना चाये 7४दाप्क 
८ शपिर्ठानां तत । सपिडके मरने पर सरि मे से खरः श्रीर-मर 
पिण्डानां सपिण्डस्तु-पतेज्यस्मिन्‌ मृतो यदि । |-जाय तो उन्दी दिनं पिले जर पिले की 
पवाशौचसमास्यातेःका््यास्लव्र दिनः क्रियाः ७ ० व स्थ ध १५ स अकतार | 
= नो जन्मन्यपि सपिरड मे सपिरडं की (क्रिया अकार 
श एव्र भिद जन्मन्यपि हि सते । .1 समानोदफों की भी दै । श्सी.तरह जन्म का सूतक 
सपिण्डानां सपिण्डेषु यथावत्‌ सोदरेषु च \४८॥| ची माना गस हे तुके उत्यत होने पर.पित्व 
जात -पत्रे पितुः स्नानं सचेलन्तु विधीयते ॥४६॥ -वखोँ सदित स्नान करे ॥४६॥ यदमी यरि.एकका 
रनरापि यदि चान्यस्मिन्‌ नाते नायते चापः । | जनम दोनेपरः उसी ल्‌ भँ दृसरे चा जनम हो ` 
त तो दोनी दधि सांथ-२ होगी ॥ ५० ॥ ` ्राह्मणुः 
तत्रापि शद्धा पव्छनन्मवतो दिनैः ।।५०॥| चय, वैश्य शौर शद्ध का कमश्चः दस, चारहः 
द्शद्रादशमासाद माससंस्ैदिनिगतैः  । | परह दिन श्रौर एक्‌ मनेक सूतक माना गाह 
ती त न्निव चे रौर सव दर्यो के सोग विधि प्क श्रपनेःत्रपने 
वाः खाः कम्मक्रियाः इ्युः स्वे वणां यथाविधि! बरा क अ्रलसार क्रियाय सम्प्र करे ॥ ४९1 इक्र 
भेतघुदिश्य फत्तव्यमेकोद्ष्टं ततः परम्‌ | | बाद घेते ऋ उदेश्य करके पंकोदि्ट करे तग्रा 
दानानि त्रैव देयानि ब्राह्मणेभ्यो मनीषिभिः १२।। बरह्मणे श्नौर परिडतों को दान दे ॥ ५२॥ श्रक्तय 
यद्यदिषठतमं॑लोके यत्रापि दथितं शे । | एण्य ॐ इच्दा से जो डमी रच्छ चसतु संसार 
। ` मँ है श्रधया घरमे जो कुच धिय है बह रुरुवान्‌ - 
तत्तदयुएवते देयं तदेवाक्षयमिथ्ता ॥५३॥| को दे.॥५३॥ करिया ऊे दिन पूरे होने पर जल, . 
पूर्त दिषेः सुश्च सलिलं बाहनायुम्‌ | ` | सवारी शोर शख को स्पशं करे । जिस किसी के 
। ररोददरड न पः उरड दे उसे न्याय पूर्वक दरड़ दे तथा श्षपने चरे 
प्रवोददर्डो च तथा सम्यस्बरणाः कृतक्रिया ;॥५४॥ ॐ छ्रदुसार भली भांति कियाय करे ॥ ५४ ॥ अपने 
स्यणेधम्मेनिद्ुपादानं त्था क्छियाः। ` ( वरं के घमारुसार क्रियाय करे क्योंकि ये समस्त . 
य्यः समस्ताः विनः परप्रेह च भतिदाः ॥५५।| पिन क्रियाय इस. सोक श्रौर परलोक म सिद्धि 
यतव्या रमी नित्यं भवितव्यं विपथिता । | % चने वाली ६।५५ नतव नेद अथात्‌ ऋत, 
धम्मेतो धनमादाय यष्टव्यंचापि बलनतः ॥५६॥| यन जर यद प रीर निय, कम संगति 
् करे । धम से धनोपाजेन कर यत्तपूर्वक यश्ष-कर 
यद्यापि क्रतो नीता जुगम्धमित्ि पुत्र ] 1 ५६॥ हे पुत्र } चह कर्म करे जिते अपनी निन्दा 


9. (0) = ---- --- --- ------------------- ---- - ~ -------“~- 


7 १४५ 


करतः बहाने नटो )-जो कमे वड़े लोगो ने कयि है उन्दींकफो 
ततर्‌ कत्तव्यमशङ्न यन्न गोप्यं मर ध ५1 (सवेत कतो 0 35५. वतत |: तल 


एवमाचरतो वत्स पुरुषस्य गहै सतः कार श्राचरण करने से गृदस्थी पुरुष फो इस 


लोक शौर परलोक म चमः र्थं, काम की परार्िःः 
धम्मय-कामसम्मरर्भुचा परत्रेह च. शोभनम्‌ ॥५८. टोती ह ॥५८॥ 


इति श्रीमारकरटेयपुराण मे अलकालिशासन में वज्याव्य कथन नाम इध्वौँ अध्यायः सम । ` 


1.1 
चत्तीसवां घष्णाप 
, जङ्ःउवाच ` , | जङ्‌ ( खमि ) ने कटी- । 
स एवमदुशिष्टःसन्‌ मानो सम्पाप्य योवनम्‌ः। . लकं ने इसं प्रकारे श्र्पनी मातां से उपदेश 


। यह किये तथा युचावस्था अनि परं ऋतध्वज के 
चतुरे सम्य्दोरपरिग्रहम्‌ ॥ १॥ पुत्र श्रलकः ने ्रपना विचाह किया. ॥ १॥. उसने 
पत्रोधोत्पादयमास यत्ेधाप्ययनजद्धिथः णुच भीं उरनं किये तथा ' उसने बडु से 


पितुः सर्वकालेषु ` चकाराह्नानुपलनम्‌ ॥ २।। यच तिये ओर सदा अपने: पिताः राजा" तं 
ततेः- कातेन मर्हताः सम्पाप्य चरमं. वयः! | ध्वज शी चाज्ञा का पालन क्रिया ॥ २॥ फिर राजाः 
चिऽमरेक सय तस्ये राज्यः ऋध्वनः;॥ २ ॥| छतभ्वज ने बहुल काल क वाद्‌ इनस्य को 


। प्रात कर श्रपने पुत्र फो राज्य सप दिथाः ॥२॥ 
भोच्यिया संह पमप्तमो यिंयसुस्तपसे वनम्‌ । खयं उस भाग्यवान्‌ यजा ने श्रपनी सी के साथ 


अवतीर्णः महारक्षो महाभागौ महीपतिः ॥ ४ ॥ तप करने के लिये बन को जनिं की इच्छा की ॥४ः 
‰दालसा च तनं मरिद पश्चिमं वचः उस समय मदालसा श्चपने पुच से कामं शरौरःभोरं 
कामोपभोगेसंसगे प्रहानायंः रतस्य वै ॥ ५॥ के संसर्ग को छोड़ने के लिये.उपदेशं करेली] 
, . - मदालंसोवाच मदालखा वोली- ` 
यदा- दुःखस्य ते म्रियवन्धरुवियोगजम्‌ । पुः] जव तुमको भिय भा वन्धुकिःविधोर्ग 


-से, श्र याधा-से च्रथकवा घन के नाश से भ्रसह. 
शतुभापोद्धंः पापि विनाशात्मसम्मवम्‌ ; ६ "दुत छ ।६ सतम राज्य करते षं तथा "दस्यं 


भवेत तरः कव्वतो राज्यं रदधभ्यावलभ्विनः धम का श्रवलस्वन करते इण ममतां से दुःखधीः 
{खीयर्तनभती हि ` मपर्वलिम्बनो ग्रही ॥ ७॥ दो जघनो ॥9। तरव दे पुत्र | मेरीं दीहईै'्सं अरगूटी 
तदास्मात्‌ः पुत्र निष्कृष्य मद सास्गुलीयकरात्‌ । | म से पको निकाल. फर सम अक्र मे लिखे" 


वाच्यं ते शासनं पट सृष्ष्माक्षरनिवेरितम्‌ ॥ ८.।॥| इण इस श्तासंन कों त॒म पहना ॥ ८ ॥ 


` जड उवाचं | जङ( सुमति ) वोक्े- 
श्युक्धा भददौ तसमै सौधं सौ्ुलीयकेम। ` | ~ यह ककर उसको वहः सोने की. श्र॑गटीःदेदी 
+ श्धौर गृ्टस्थके योग्य उसको-आशीर्बादः दिया ॥६॥ 
प्रािषर्धीपिं या योगा पुरषंस्य गृ सतः । § ॥ अ 
तत; हवलयाश्वोऽपौ साः च देवी मदालसा । | धु को र्यः दधार तयं करने भे लियः वन को 


पत्राथदत्चाः. तद्राज्यं तपसेः काननं गर्तः ॥१०॥| चल्तेःगयेः॥ १० ॥ 


इतिः श्रीसरिण्डेयपुसाणमे 'मदीलसो पार्थान नमि ३ क्व अ० समां | 
अ" 


१४८ । मौकंरडे्यपुरोशं  अ०३७ ` 


सेतीसवां अध्याय | 
जङ्‌ उवाच | जङ्‌ ( खमति ) बोले- ` ~ 
सोऽम्यलको यथान्यायं पुत्रबन्युदिताः भरनाः। वह महात्मा अलक न्यायपूर्वक रजा को पुत्रः 
पालयामास धर्म्मात्मा स्वे स्वे कस्पणए्यवस्थिताः १। वत्‌ पालन करता था तथा सवे प्रजा श्रपने-र्‌ करम. 


< मे स्थित होकर प्रसन्न धी ॥ १॥ बह दुर को दंडः 
ष दण्डं धिषु सम्यक च परिपलनधू देता तथा सजनं का भली भकार ` पालन करता 


¢ 1 ५4 ८] 
इच्यन परां शं लेमे शयान च महामखः. २ ॥ हुआ परम श्रानन्द को प्राप्र करता था तथा वड़े २ 
अरनायन्त घुताश्रास्य महाबलपराक्रमाः । | यक्ञ किया करताथा ॥२॥ उसके महावलीःपराक्रमी, 
धर्म्मात्मानो महास्मानो यविमार्मपरिपन्थिनः: ३॥| धमात्मा, महात्मा तथा कमार्गियों को दंड देनेवाले 


घोऽयं प्पे धीम पु इण ॥ &॥ श्रलकं ने धमं से धन भप्त किया 
चकार सोऽथं धर्म्मेण न चातवान्‌ । | था चन से घनं किया । ते धन श्नीर च्म से 


तयोेनानिरोषेन शुने विषयानपि ॥ ४॥ निवोध सांसारिकः दियं का खलं भोगने लरे॥ 
। बहूनि षषाणि तस्य प्रालयतो. महीम्‌ । | इसी तरह धम, शर्थ नोर काम मे श्रासक्त हो 
थै-कामसक्तस्य जग्षुरेकमहर्यथा ॥ ५ ॥ त 8 ॥ वहत णक दिन 
रैर ४ = - । समाने व्यतीत होगये ॥ ५॥ उनको संसारक 
यं नस्य सजत ज्ञतो विषयान्‌ मयान्‌ | | छ भोगते-मोगते वैराय न इता तथा घ रर 
न चाप्यलमभ तस्य धम्मायोपौज्जनं भ्रति ॥ ६॥| धन से मी ठति न इई ॥ ६॥ उसके माई साह 
तं॑ तथां भोगसंसग-ममत्तमभितेन्द्ियम्‌ । | जो वनत्रासी ये खना किं श्रलकं सांसारिक भोगों 
सुबाहुनांम शुश्राव भाता तस्य वनेचरः ।॥७॥|| मे भमत्त रीर श्ज्निन्दिय हो रडा दै ॥७॥ ्रलकं 


; सोऽय चिरं + ,. | को किस तरह कान उत्प हो यरः खुबाहु ने वहुत 
र ुषोपथिवः सोभ्य प र । | काल तक सोवा श्रौर निशित किया कि य 
तदिभ तस्य भरेयोऽमन्यत भूत; ॥ < ॥| कोई वैरी इनसे. टके तो.इनको क्ञान हो ॥८॥ तव। 
ततः स ऋारिभूपालणदीएबलवाहनम्‌ | | बह अपने को ज्य-पलिकी इच्छा से काशीनरेश ` 
स्पराज्यं पराप्तमागच्छहुवहुशः शरणं छती ॥ & ॥| ॐ पस जो बहुत को शरण विया करते थे तथा 


सोऽपि चक्र वलोदृोगमलक भति पार्थिवः। क 0 
दत्व मेषयामास राज्यमस्मे भदीयताम्‌ ।॥१०।॥| सेना तैयार करके एक दूत को श्रलकं के पास मेज 
सोऽपि नेच्छन्‌ तदा दातुमाङगापूलवस्वधम्मेनित्‌ । | कर कदलवाया कि यह राज्य छवाको देदो ॥९०॥ 
पत्युवाच च तं दृतमलकेः काशिभूभृतः ॥११॥ धमात्मा श्रलकं ने श्ाज्ञ पूर्वक मांगने पर राज्य 
सामिवभयेत् हायन याचतां गचयगग्रनः | | नचान क क 
नाक्रन्त्या सस्मदास्यामि भयेनाखामपिक्षितिम्‌१२| राल्य मागे तो उचित । बिसी क व 
सुबाहुरपि नो याश्वां चकार मतिमांस्तदा। | मे थोड़ीसी पृथ्वी भी न दूंगा ॥९२ बुद्धिमान्््डवाह 
न धम्म क्षनियस्येति याञ्चा वी्यधनो हि स;१३।|| ने भी याचना करना उचित न .समम, कारश. 
ततः समसतसेत्येन काशीः प्रवासितः । . | चवि्.को जिसका क्न बल दै याचना करना 
आनान्तुमभ्यगदर्मलकरवं महीपतेः (॥१५॥ वनित त ५ 
अनन्तस्थ संषमभ्येत् तदनन्तरम्‌ । | लिये चले ॥ १४ ॥ इसके अनन्तर दोन सेना मे 
तेषामन्यतो समाक्रम्यानयद्वशंम्‌ ॥१५ | घोर यद्ध इत्र शरीर काशिराज ने भमन्नी सेवकः , 
अपीड्य सामन्तास्तस्य राटोपरोधनैः | त वा ५) र 
न्या दुषीलुपालांध चक्रे चाटविकान्‌ परे ॥१६॥ राज्य, धन, डग॑पाल श्रौर मलो के रक्तको को, 


श माकण्डेयपुराण १४६ 


संधि्ोपदाेन' काथिदेन) पाधा |= | १ 


साम्नैवान्यान्‌ वशं निन्ये निथृतास्तस्य येऽभवन्‌ १७॥ | क काशिराज ने मिलाकर शरप॑ने 

तत; सोऽ्ट्यवलो राजा परचकरावपीदितः। | वशम कर्‌ लिया ॥ १७॥ राजा अलक. की चोरी 
ध , सेना काशिराज की सेना से पीड उख ' 

कोपक्षयमवाणोचैः पुरश्वारुध्यतारिणा ॥१८॥ स पीडित हह ओर उस 


१ एन का खज्ञाना खाली होगया श्रौर नगर वैरी के क्रन्त 
इत्थं सम्पीड्यमानस्तु क्षीएकोपो दिने दिने । चला गया ॥ 1 भकार पीड़ित किये जनि `. 
बिपादमागात्‌ परमं व्याङ्लत्वंच चेतसः ॥१६॥ न धीरे-धौरे क्षीण होने से. शा 
श्रार्सिं † सस्मारांगुरीयकम्‌ यक्षम्‌ । त वहत च्याङ्कुल हया ॥ १६ ॥ ओर, 

सिं स परमां पराप्य तत्‌ सस्मारांगुरी न श 
यदुदिश्य पुरा भराह्‌ माता तस्य मदालसा याद श्राह जो उनकी माता मदालसा ने “उन्हे दी 
ततः स्नातः शचिभुतरा वाचयित्वा द्विजोत्तमान्‌। | धी ॥२०॥ फिर स्नान करके श्रौर पिच ' होकर उस ~ 
निष्कृष्य शासनं तस्माददसे भरस्ुदा्रम्‌ ॥२१॥| अगटी से उख पट को निकृलवा कर साफ साफ ` 


त्व लिखितं माभ्र र श्रक्रो मै बाह्मण से पठवाया ॥२१॥ फिर उन 
त्व लिखितं मात्रा वाचयामास पार्थिवः < | प वो कार 
पकाशपुलकाङ्गोऽषो महरपतूछलोचनः ॥२२॥| भसक् दोकर पुलकित दोगये ॥२२॥ संसार गे 
सङ्कः सर्व्वात्मना त्याउ्यः स चेत्‌ त्युक्त न शक्यते। स सङग ४५ चाधि नौर यदि छोडुमे 
स॒ सद्भिः सह कर्च॑व्यः सतां सङो हि मेषनमू्‌॥२३॥| को समथ न हौ तो सजनं षी सङकति . करना 
कामः स्बात्मना हयो ाह्वेच्छवयते न सः। चाये कारण साधुच्रों की सङ्गति ही श्रौपधि है 
५ ह ठु ॥२३॥ काम को सर्वथा त्याग देना . चाहिये श्रौर 
नां भति तत्‌ काय्यं सैव तस्यापि भेषजम्‌ ॥२४ | यदि उसको न त्याग सके तो सुका यत्न करना 
वाचयित्वा तु बहुशो शृणां शरेयः कथन्त्विति । ५ क्योकि सुक्ति दी काम की ध 
ते यतः ॥२५॥| उसको वचा कर तथा अपना कट्यारए चर्‌ 
। यकषयेति निधित्य साच ॥२५॥| = नन न 
तत; स साधुसम्पक चिन्तयन्‌ पृथिवीपतिः । | सत्सङ्गका विचारं किया ॥२९॥ इसके श्ननन्तर बह 
दत्ताभयं सहामागमगच्छत्‌ परमािमान्‌ ।।२६॥| राजा अरलकं साघु-सत्सङगकी इच्छा करते ष महि 
तं समेत्य महात्मानमकटमषमसद्धिनम्‌ | | दत्ताय के पास गये ॥ \६॥ उन निष्पाप श्रसङ्ग 
प्रणिपत्याभिसम्पूञ्य यथान्यायममाषत ॥(२७॥ 
ब्रह्मन्‌ कुरु पसादं मे शरणं शरणार्थिनाम्‌ । 


महात्मा दत्तात्रेय के पास पर्हुचकर श्रौर उनको 
प्रणाम करके वे न्यायपूैक बोले ॥२७॥ दे भगवन्‌ ! 
दुखाप्हारं कुरु मे दुःखाततंस्यातिकामिनः |॥२८॥ 
। दत्तात्रेय उवाच 


मेरे उपर छपा कीलिये, मै शरणार्थी ट । मे रति 
दुःखापहारसरैव करोमि तव॒ पाथिव। 


कामी घ्र डुःखी ह, मेरा डुः दरण कीजिये॥२०॥ 
दत्तात्रेय वो्े- 6 
सत्यं बरहि किमर्थं ते दुःखं तत्‌ पृथिवीपते ॥२६॥ 
| जड उवाच 


हे राजन्‌ ! मे ठम्दारा दुम दूर करने का यत्न 
करगा । सच वताश्रो तुमको यह दुःख कैसेहञ्ा॥ 
जड़ बोला-- 
त्रिविधस्यापि दुःखस्य स्थानमात्मानमेव च ॥२०॥| ।३०॥ बहव इ त ५ भ व 
सं विगष्य चिरं राजा पुनः पुनरदारथीः । | रहा शौर ्रपनी शरत्मा का विचार कह रदसकर 
्मात्मानमात्मना धीरः. प्रहस्येदमथा्रवीत्‌ ॥२१॥ यद वचन बोलला ॥ ३१॥ मे प्रथ्वी, ` जल, ज्योति; 
। नादयु्वी न घलिल्लं न ज्योतिरनिलो न च । ध श्राकाश छुद्ध भी नदीं ह परत शरीर कोद 
, नाकाय विन्दु शरीर समस्य इुलमिष्यते ॥३२॥ छल को वा सत दै ॥६९॥ दस पवस @ 


441 मीकेरढेयपुराणः . . ठ रे 

क 
तिस्कितां याति पंदेभसिन सुखाः शरीर को खख दुःख, स्युनता श्रौर इद्धि होती है| 
न्यूनातिरिक्तता याति पंचकेऽस्मिन खखालम्‌। ¦ यदि छख दख मेहो तोये जो कृसरे म भा 
यदि स्यान्मम ङि र्त्‌ स्यादः स्थेऽपि हितं भयिई३ | मौजूद हू उखं च्या नद्य हर्ता ट ॥ दे |॥ जीवे तो | 
नित्यमभतसद्रावे न्पूनाधिकेयान्नतो्ते । | नित्य ञौर निर्धिकार है श्नौर वह.उन्नति- या च्रव- ,. 


नति मेँ अंधिक न्यून नदीं होता । इसलिये ममता 
तथा. च समतात्यक्तो विरोपेणोषलभ्यतं ॥२४॥ छोडने खे विशेष लाम होता दै ॥ २६ ॥ तन्मां के 


तनसात्रापरस्थते स्मे ठतीयांशे च परश्यतः। | वीच. जो शरा खतम रूप से रथंतै,उसजीव 
तथेव भतसद्रावं शारीरं रि सुखासुखम्‌ \*२५।॥ को जिसको क्वान है उसको शरीरके दुःख यः सुख 


ट | से क्या ॥ ३५॥ दुःख श्र सुख.की स्थिति.मनमे 
मनस्यवस्थितं दुःखं यखं वा मानसच यत्‌ । (0 


यतेस्ततो.न मे दुःखं सुखं बा न हहं मनः ॥२६॥ नहीं ह इसलिये समको. दुःखसुख नीं ह ॥२६॥ 
नाहङ्कारोः न च सनो वद्धिनाहं यतस्ततः । | न मैःखचद्कार ह, न मन नर न दधि मरे श्रः 
अन्तःकरणनं दुःखं पारक्यं मम॒ तद्‌ कथम्‌ ॥२७]॥ करण मे जो दुःख है बह दसरे को दे सुभकोः बह 


न मनो यतोऽहं एथक्‌ शरीरान्मन- | किस पकार हो सकता है { ) ३७॥ न मःशरीर 
व र श्मौर न मन, मै शरीर ओर मन से अल्लग ह । इस 


संस्तथाह्‌ । तत्‌ सन्तु चेतस्यथवापि देहे खानि लिये'डख या दुःखःमन मे हो ` श्रथवा' शरीरम 
दुःखानि च किं समत्र ॥३८॥ सुमे श्छसे स्या १।३८॥ जिस राज्यकी श्मिर्लपिं 


पंचमयः स राशिः । युणषदत्या मम किं जु तत्र | ए्चतस्मय हे । शरीरके शुणोमि मेरी यदृत्ति नदीं 
तस्थः'स चार्व शरीरतोऽ्यः ॥३६॥ | हे क्योंकि शरीर मे स्थित होकर भीं उससे श्रल्लग 
भ 1 ॥ | हं ॥२९॥ जिस शरीर के दाथ ` मासे,. अस्थि; शिर 

न-यस्य दस्तादिकमप्यशेषं मासि न चास्थीनि | आदि दी अपने.नरीं है वो.उस्के-हायीः; घोडे स्य 
शिरापिभागः- । कस्तस्य नागाश्वरथादिकोषै | खज्ञाने आदि से क्या ? इस संखार भे मनुष्व "का 
स्वस्थोऽपि सम्बन्ध इहास्ति पुंसः ।४०॥ सम्बन्ध त्रिक है ॥४०॥ इसलिये न. तो. कोई मेरा 


ह शतन है ओौर न मुभको दुःख च सुख ह्रौ नगरं 
तस्माच मेऽरिन च मेऽस्ति दुःखं न भे सुखं कोप, अश्व, हाथी, खेना आदिन मेसन नं उस 


नापि पुरं न कोषः | न चाश्व-नागादि वलं न | की श्नीरन किसी श्नौरकी है"॥ ४१ ॥ जिसं रकार 
तस्य नान्यस्य वा कस्यचिद्रा मास्ति ।४१।।| आकाश घरी,घड़ श्नौर कमरडलये-एक ही तत्व 
यथाः परीम्भ कमण्टलुस्थमाकाशमेक्रं । परन्तु स्थानभेदं के कारण. अ्रलग-अलग. दिखाई. 


| ¦ पड़ता हे उसी भकार छुंवाहु, काशिराज ज्नौरं मँ 
, वहुधा चक ऽह 
हुषा हि. टम्‌ । तथा सुबाहुः स च काशिपोडदं | प्कदी ह, ` केवल शरीरो कीं भिच्ताः कांहीं 


न्ये च देहेषु शरीरभेद; ॥४२॥ | सेद टँ ॥ ४२॥ 
इति श्रीमाकण्डेय० मे पिता-पुत्र संवादम आत्म-विवेक नाम २७ अ०- समाप्त 
"ए ~ 


अइतीसवों अध्याय | 
| जङ्‌ उवाच -- जड़ ( मति ९८ बोले- ४. 9 
तात्र \ ब्राह्मण दन्ताय को रामं किया ` 
थं ततो विभ मणिपत्य स॒ पार्थिव तथा दीनतायूैक उन मदात्मा से कडा "॥९ दे ' 
परत्युवाच महात्मानं. प्रश्रयावनतो वचः \.१॥ (य भली पकार आत्मा का क्वान दै. इस: . . 
। म॒मे ऊट दुभ्खं नदींदहेः जो लोग श्रत्माको ...' 

यङ्‌ परयतो-हान्‌ मम दुःलं नं किष्वन। = | भवी व इती चा ् 
परसम्यग्दर्भिनोः मघाः सन्वदेवासुखाणवेः॥.२।॥/ केः सागर इवे - रहते दै ॥२\॥ -मयुष्योौकरौः `. 


त न श न म = 


श्र०.३८ ~ , माक्रण्डेयपुराण ` -१५१ 


यस्मिन्‌ यस्मिन्‌ समासक्ता वद्धिः पुंसः प्रजायते । | मन जिस-जिस वस्तु मे श्ासक्ति रखता है उी- 
ततस्ततः समादाय दुःखान्येव प्रयच्छति ॥ ३ । | उसी वस्तु.से उसको. दुःख आते दं :॥ ३५ -ंदि 


-माज्नारभक्षिते दुःखं यादृशं ृहडकुटे । , | पालत्‌ सभ को विली खालाय. तो.इतना दुःख द्रत 
{न॒ तादृडम्रताशल्ये. कलविङ्कऽय मूपिके ॥ ४॥| ^ जितना कि मूसे आदि.के"खाने से नही योता है 


सोऽहं न इः तोडं अन्ते परः ॥ ४॥ चू ओँ प्रति से परे ष श्स्तिये . 
। सोऽ ^ ष नली व 4 व दुभ्लदहैन ख । जो इस व 
¦ वीमृतामि्भवी भूतेः सखदुःखातमको हि सः॥ ५ ॥| रखता है वदी छती चौर दुली दै।॥५॥ ! 
। दत्तात्रेय उवाच ` -दत्तागेय वोज्े- न 
एवरमेतन्नरव्याघ्र ` यथतद्बाहूतं . त्वया । हे पुरस । यद सव इरी तरह दै जिस 


न्भ 


तरद किं तुमने कहा है । यह मेरा है यदी दुःख का 

ममेति मूलं दुःखस्य न ममेति च नितः ॥ ६॥ ल दै तथा जव'ममता नदीं रखती तवर -निद्ृतति 
। जाती है ॥६॥ मेरे परञ्च करने सेँश्दी तुमको यद 

मलखश्चादेव ते ` ज्ञानषुखन्नमिदयुत्तमम्‌ । उत्तम कषान उत्पन्न दुश्राहै जिससे स भभाव 


समेति भत्ययो येन कषः शारमलिदलवत्‌ ॥ ७॥ | अ १ दै जैसे कीरै दवा 
ध भित्यक्षरोलनरी , ` „| से उड्‌ जाती है ॥७॥ दह" च्रथात्‌ मं इसका ज्र 
हभित्य॑ङरोत्यनी ममेतिस्कन्धवान्‌ महान्‌ 1 | ह शौर भेरा" इसका वडा खनद पर रीर सेव 


ृहसेतरोचशाख्च  एतरदारादिषडवः ॥ ८ ॥| इसकी उपर की शाखायं हं तथा 6 ९.४५ ५ 
धरयधान्यमहापत्रो , तैककालमदितः पत्त द ॥ ८॥ धन-धान्य इसके बड़े-बड़े परते हे जो 

9 | दितः । | चिरकाल से दे ह दै परतर श्रौर पाप इसके 
शुएयापुरयाग्रुष्पश्च सुखटुःखमहाफलः ॥ ६ ।।| पुष्प ओर ख दुःख इसके फल है ॥६॥ मुक्तिमागं 
को रोकने वाले मू के सस्पकरूपी जलसे इसक्रा 


सभ्पर्कतेचन # र] 
£ तत्र॒ शक्तिपथव्यापी मूदृम्पकसेचनः; । | सिचन दोता है न्नीर भसे का जो छरुड हइरपर 


विधित्ाभृज्गमालाल्यो दयन्ञानमहातरुः ॥१०॥॥ बह बिधि दै'पेखा यद व 
साराध्वपरि च्छायां + रूंसाररूपी मागं मे थक कर †, इस चन्लक्री 
संसाराध्व्रपरि्ान्ता ये तच्छायां समाभरिताः । | दाया का र्य ते बे भमपूसौ शा शरीर खख 
भ्रानितज्ञानमुखाधीनास्तेषामात्यन्तिकं कतः ॥११॥| भ्व के ्राधीनं हो जाते है, व करट! 
थैस्त॒सत्सङ्गपापाण- + ॥११॥ जो मचुष्य सत्सङ्गरूपीं पत्थर -पर तेज्ञ करके 
येस्तु पाण-शितेन ममताव; । वियासपी कमर ते इस मर्तास ल्त को काट 
छिन्नो विच्ाहकुडारेण ते गतास्तेन वरस्मना ॥१२। डालते है, वे दी उस मागं त ह जो मोक्तका 
¡ शीतं हे ॥१२॥ वे ज्ञानी लोग काटे शौर धूलि . से ` रित 

भाप्य ब्रह्मवनं शीतं नीरजस्कमकण्टकम्‌ । | शीतल बहा-्ञान रूपी वने पटचकर परमनिद तति 


वन्ति परां भाङ्ञा निद ति ्तिवर्धिताः ॥१३। | को मा होते दै अर भटृत्ति . अथात्‌ श्रावागमन 
भाभरुबन्ति परां भाजा ह ॥ दृति्वागताः ॥९३। |. रि हो जति दे ॥ १३॥ हे यजन्‌! भूतेष्व 


, भूतिनद्ियभयं स्थूलं न चं राजन्‌ न चाप्यहम्‌।. | सदत जो यद स्थूल शारीर है बह न पर दं रीर न 


न तन्मात्रं मया वाच्यं ैवान्तःकरणात्मकौ ।१४।| ठम । शरीर के भीतर त्मा साकीरूप हे ॥ १४॥ 
हे राजेन्द्र । हम श्रपने म शरोर तुम मे किसको 


क्वा पश्यामि राजेन्द्र मधानमयमावयोः। | भधान समभ जव कि देवक दुख सवस, परे है, 


, परौ हिशषजनः गणालकः ॥१५॥| सस्थे यदं सव शुात्मक दै ॥ ९५॥ दे.राजनू | 
यतः परो हिवः सङ्गतो दि गुणात्मकः ॥१५।| निस कार भुनगा गूलर मै, सिरकी भूमी शीर 
मरशकफोडम्बरेपीका-घुज्ञमत्स्याम्मसां यथा । | मली जल मे रहते इष एक ठ परन्वु यथाथ म 

स ५ | . | श्रलग-ग्नलग दै, इसी प्रकार शरीर श्रौर श्रातमा 
पक्लेऽपि  पृथगमावस्तथा पेव्ात्मनोटप ॥१६॥ यक मे स्थित होते इषः मी अलग-अलग है ॥ २६॥ 


` १५२ 


। अलक उवाच 

भगवंस्वलसदेन ममापिभतयुत्तमम्‌ 
ज्ञानं प्रधानचिच्छक्ति-विवेककरमीदशम्‌ । १७॥ 
किन्त्वत्र विषयाक्रान्ते स्थेय्यैव्ं न चेतसि । 


माकंएडेययुराण 


> अ०.३६. ` 


~~न ~ 


| श्रलकं वोक्ते-- 


हे भगवन्‌ ! श्रापकी पा से सुभे चेतन . शक्ति 


विषयों मै आसक्त है श्नीर स्थिर नदीं है, इसलिये 
इख ग्रकृति रूपी मायाके बन्धनसे क्रिसं परकरार सुक्त 


न चापि वेनि भुच्येयं कथं भकृतिबन्धनात्‌ ।।१८।॥ होऊं गा यह जानना चादता है ॥ १८॥ किंस तरं 


यं न भूयां भूयश्च कथं निगेणतामियाम्‌ । 


म आवागमन से रदित टोकर निर्गतां को प्राप्त 1 


दोगा रौर किस पकार मेँ शाश्वत ब्रह्मे सीन 


कर्थंच व्रह्मणौकतवं व्रजेयं शाश्वतेन वै ॥१६॥॥ होड गा १॥ १६॥ हे भगवन ! इसलिये मँ नभ्रता 


तन्मे योगं तथा ब्रह्मन्‌ प्रणतायाभियाचते । 


पूवक धार्थना करता ह करि योग मुभे. भली प्रकार 
समाद्ये क्यःकि वुंद्धिमानों का ' सत्सङ्ग मचुष्यों 


सम्यगनहि महाप्राज्ञ सत्सद्धो ह९इन्दरणाम्‌ ।२०।॥ ऋ उपकार करने बाला है ॥ २०॥ 
इति श्रीमाकेर्डेयपुराण म पिता-पुत्र संवादम प्रन नाम का ३८वा. अध्याय समाप्त । 
-- भद:०,€<&- ५० ४ 


, उनतालीसवां अध्याय 


दन्ता्रेय उवाचं 
्ानपूर््वो वियोगो योऽ्ञानेन सह योगिनः । 
सा शक्त्न॑सणा चेवयसनेक्यं ्राकृतेगुः ॥ १ 
क्तिरयोगाव्‌ तथा योगः सम्यगृजञानान्मदीपते | 
नानं दुःखोद्धवं दुखं ममत्वासक्तचेतसाम्‌ ॥ २॥ 
तस्मात्‌ सङ्गं प्रयत्नेन बुयुक्षुः सन्त्यजेनरः | 


दत्तात्रेय योल्ते- 


५ ९ = 
न> ५ 


युक्तं उत्तम ज्ञान भाप इश्मा ॥ १७॥ किन्तुं मेसा मन ` 


ञन्नानी की सङ्कति को कान पूर्वक छोड़ देना ` 
ही मुक्ति है श्नौर प्रकृति के गुणो से श्रलंग रने , 


को बह्म से प्कता कहते हैँ ` ॥ १॥ सुकति योगसे 


होती है तथा हे राजन्‌ ! उत्तम क्ञानसे योग रोती 


है । दुःख से ज्ञान उत्पन्न होता है शौर ममत्व भ“ . 
श्रासक्ति से डुःख उत्पन्न दोता दै ` ॥ २॥ इसलिये , 


मोक्त की इच्छा. करने वाला -यत्न से संसार. का 


सङ्गाभावि ममेत्यस्याः रुयातेनिः भनायते ॥ २॥| साथ चोड दे क्योंकि सद्ग के अमाव "टी ममत ` 


निम्मैमूलंसुसायेव॒वैराग्यादोषदशेनम्‌ । 
्नानदेव च वेराग्यं ज्ञा 
तदग यत्र वसतिस्तद्रोऽं येन जीवति | 

य्क्तये. तदेयोक्तं॑ज्ञानमानमन्यथा ॥ ५॥ 


कानाश होता है ॥३॥ ममत्व न रहने से खख होता 
है तथा वैराग्य से ममत्व करा दोप मालुम होतादै 


है ॥ ४॥ घर वह ई जिसमे मनुष्य रता 


 वैराग्यू्व्वकम्‌ || ४॥| जान से वैराग्य शरोर कानं पू जन्म के ५ ति 


भोजन यह है जिससे जीवन स्थिर रदे । जिससे ` 
सक्ति होजाय वदी जञानं हैः तथा जिससे यदह बात ,, 


न हो वद शरक्ञान है ॥ ५॥ हे राजन्‌ ! पुय श्रौर 


उपभोगेन ` पुख्यानामपुष्यानाञ् पार्थिव । ` | पाप उपभोग करने से कय गो प्राप्त होते है परन्तु. ; 


कत्तन्यानांच नित्यानामकामकरणात्‌ तथा ॥ ६ ॥ 
शसंचयादपृव्वस्य क्षयात्‌ ` पृव्वािजतस्य च | 


कम्मेणो वन्धमाोति शारीरं. न युनः पुनः ॥ ७॥ 


एतत्‌ ते कथितं राजन्‌ ` योगं चेमं निषोध मे । 


यं ोप् ्रह्मणो योगी शाएवतान्नान्यतां रेत्‌ ॥८॥| = 


 "..\..प्भग जेयो योगिनां स हि दज्जयः | , 


क्म्‌ रदकर नित्य कतव्य करने... दोनों नित्य कर्तव्य करः 


~ ~ +~ 


| खयं ^ 


~ ६॥ इस ` जन्मे पाप. . 
ओर पुरयं के संचित न दने से शरोर पूव जन्म के ` ` 


पापों श्रौर पुरयो का चय दोजाने से कमं के वंधनं . . 


मे पड़कर श्वरीरको वारवार जन्म नदीं जेना पड़ता - 


1 


दै॥ ७॥ हे राजन्‌ ! तुमसे यह ` तो कहा; च्व तुर. .` 


योग खनो जिसको .पाकरः योगीलोगे. ब्रह्म एकतां .; 
प्राप्त करते हं 1 ८.1 योगियों को पहिले नात्मा, 
को.आसम दधा जीतना चाहिये क्योकि बह दुजय ` : 


> 


४ १ ५ 


, भ्राणायमेदंह्ेपान्‌ धारणामिश्च पिंखिषम्‌। 


[ऋ ) 
रि प 


त 


ग्र०३& २० माकंर्डेयपुराण १५३ 
--------------~------------------------------~-------~-------- ~~ 
ह्रीत तज्जये -यत्नं तस्योपायं-शृष्व मेः ॥ ६ । हे इसलिये उसको जीतने का.यत्न.करना चाये, 

उसके.उपाय छ ॥६॥ प्राणायाम से दोषोको, 
स नी .; | धारण से पापों को, पर्याहार से विषय को नौर 
साहा विपथान्‌ ध्यानेनानीश्वरान्‌ गुणान्‌ १०.ध्यानसे गुोफो दग्ध करे ॥१०॥ जिस तरह परवतो 
यथा प्परतधातूनां दीपा दद्न्ति,धम्यताम्‌ । की धातुश्रां का दोप श्श्नि मे जल जाता है उसी 
तथेन्द्ियृता दोषा ददन्ते भाणनिग्रहात्‌ ॥११॥| अकार प दोप शाभा से नष दो जाते 

+ + (५ रै हि 
थमं साधनं ्््यत्‌ भाणायामस्य दं ॥९१० योग कै क्षाता को पिले .भारायाम का 

लिरेषस द भाखायाम्‌, योगवित्‌ ६. साधन फरना चाहिये । पराण श्नौर श्चपान वायु के 
्रणपानलनिराधस्तु भ्राणायाम्‌ उदाहृतः ॥१२।|| सकने को धाणायाम कहते हे ॥६१॥ प्राणायाम (६) 
लधुमध्योत्तरोयाख्यः भरणायामन्षिधोदितः। | लशु (२) मध्यम श्नौर (३) उत्तरीय तीन गकार 


तस्य. परमाणं व्याम ` तदल शरृशुष्व मे ॥१३॥| की होती दे! दे श्रलकं ! अव उसके भमाण को 
वहता ह, सुनो ॥१२॥ लघु वारह माचा कां दता है 


५ 
सथुदादमम दिग ‡ मध्यमः < (~ 
लधुद्वदुममनिस्तु दगुणः स तु मः । उससे दुगना मध्यम श्रौर तिग॒ना उत्तम कटलाता 


। भरिगणाभिस्त॒ मात्राभिरुत्तमः परिकीर्षितः ॥१४॥ है ॥१४॥ लघु त्तर का उच्चारण पलक को उटाने 


निमेपोन्मेपणे मौत्रा-काललो लध्वक्षरस्तथा । | श्रीर गिराने के कलभं दी दो जाता दै, उसको 
भायाम की संख्या के लिये दवादशमातिक कदादै 


प्राणायामस्य सदह्ववाथं स्मृतो दादशमात्रिकः॥१५॥ 1 
स्वेदं वेपथुम्‌ 4 1 ९ दः १ 9 

प्रयमेन जयेत्‌ स्वेदं मध्यमेन च वेषुम्‌ | || कम्पन को तथा ठतीय से शोक को प्रमशः जीते ॥ 
विषादं हि तृतीयेन जयेदोपानजुक्मा ॥ १६।॥| जिस भ्रकार सिह, व्याघ श्रीर हाथी मनुष्यके वश 
मृदुलं सेव्यमानस्तु सिह-शादूल-हृज्ञराः | मे हो जाते द उसी प्रकार पराण योगियों के बश मे 
यथा यान्ति ठथा प्राणो वश्यो भयति योगिनः॥१७॥ च ॥ 8 भिस भर भय दो 

¡ मततं यथेच्चातो नागं ४ श्रपने बश हे ~ 
बरं मततं यधेच्चातो नागं नयति हस्तिपः। | चन्द होकर साधना से भाणो को बण मै करता 
तथव योगी खच्छन्दः प्राणं नयति साधितम्‌ ।१८'| है ॥१८॥ जिस तरद सिखाया इुश्ा सिंह सगोको 
यथा हि साधितः सिंहो मृगान्‌ हन्ति न मानवान्‌। | दी व है ४ क क 

तद्रन्िपिद्धपवनः  नदरणां | पापों को काटती ह मवुष्यां के शरीरका नदा ॥१६॥ 
त पो भव । ^ हससि योगियों को प्राणायाम म सदैव - खंलन्न 
त ॥१६॥| रना चाटिये । उसी मुक्ति देनेवालीं चार 8 
श्रूयतां मुक्तिपदं तस्यावस्थाचतुष्टयम्‌ ॥२१॥| स्थाग्यो को सुनिये ॥२०॥ हे रजन्‌ ! ( १) ४ 
धवस्तः भिस्त संवित्‌ ्रसादश्च महीपते । | ८२) पराति (३) संबित ( 8} भसा न चार 
स्वरूपं शृणु चतेपां कथ्यमानमनुक्रमात्‌ ॥२१।॥- श्रवस्या के खरूप को कम से कता ह खनो ॥ 
कम्प॑णामिष्टुष्टानां जायते फलसं्षयः । | श्रच्छे या धुरे कम के फल से चिन्त के दटाने को 
कते है ॥२२॥ इस लोक श्रौर परलोक के 


चेतसेऽपक्रषायत्वं "यत्र सा ` ध्वस्तिरुच्यते ॥२२॥ ध्वस्ति" कहते है ॥२ 
ज्लोभका तथा मोद पदा करनेवले काम का निरोध 


५५ पेहिकाष्टप्मिकान कामान्‌ लोभसेहात्मकान्‌ स्वयम रसे बत योगि की श्रि अस्था दोती दै ॥ 


निर्ध्यास्तेसदा योगी प्ा्निसा साव्वकालिशी॥२३ ्ञान दवारा श्नतीत श्रीरः श्रनागत्‌ अर्थो को ` करमशः 
श्ननीतानागतानयथान्‌ . विग्रकृष्टतियेहिवान्‌ । . | उत्तम च्रीर ्रचचितत. खमे श्र . चन्द्रमा, सूयं 


निजानातीन्दु-ुव्येकष गरहणं हानसमदा । ‡ नीर धों का ॥ २४ ॥ प्रभाव समान शमे शरोर 
| ॑ जव योगी श्स.खमान भाव को भ्राप्त होता दै तब 


तुर्यपरभार्वस्त॒ यदा योगी प्रामोति सम्पदम्‌ | . | जव च व्‌ संदित्‌ 
छ ^ मामस्य संस्थिरिः२४॥| माणायामः की संस्थित अथौत्‌ संदित्‌ अवस्था 
तदा संविदिति ख्याताप्राणायामस्य संस्थितिः ५॥ लोदी दै ॥२५॥ जिस प्राणायामसे मनः पाचों वयु, 


यान्ति भसादं येनास्य .मनः पंच च वायवः + . : । इन्दरया, इन्द्रियो ॐ श्रथ यद सब प्रसव उस , 


14 
1 


9४ नर ~» ५ 


॥४ 


` ; १५४ ४,  माकषशेपषुराण ` श्र ,: 


~. 


द 


इन्दियाणीन्द्िया्थाश्च स भसाद इति स्पत; ॥२६॥; को श्रसाद वस्था कहते है ॥ ६६॥ हे राजन्‌ | 
शृरष्व च महीपाल मराणायामस्य लक्षणम्‌ । | भ्रव योगियं फी मारायामके सचत तथां शरासनं ` 
यजतश्च सदा यागं यादृम्बदितमासनम्‌ ॥२७।| को छनिये ॥ २७॥ योग करने बाला पासन तथा 
प्मद्धासनश्वापि तथा खस्तिकमासनम्‌ । स्वस्तिक श्रासन फरक भ्रव को हृदय भ रखकर 


4 + मैरे ॥२६॥ श्रीर सम रूप से शरासन मारकर पटे 
फुता च भरणव्‌ दि [4 ४ 
अस्थाय योगं युीव छता च भरा इष्‌ ॥९ श्नौर चरणों को समेट ले तथा जांधो-को श्रागे से । 


सम, मासन भूत्वा संहत्य चरणावुभौ । | सीच ले ॥ २६॥ देखा यतन करके स्थित हो 
संहतास्यस्तथवेारू सम्यग्िष्ठभ्य चाग्रतः ॥२६॥ शुखं से लिंग शरीर अरडकोण का स्पशं न हो ' 
पाष्णिभ्यां लिङ्गहषणावस्पृशन्‌ भयत; स्थितः । | तथा थोड़ा शिर को युकावे शौर दांतों से दतां . 
किशविदु्ामितशिरा दन्तैदन्तान संसृरेत्‌ ॥२०॥ ् (० 
सम्पश्यन्‌ नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्‌। | ते तमोगुण खो शरीर सतौ से स्मो को ॥ 
रजसा तमसे इत्ति सत्वेन रसस्तथा ॥२३१।॥ अ्रच्छादित करे योग करने.बाला योगी; - निमल - 
सज्याच निम्मले तच्च स्थिते युञ्जीत योगवित्‌ । | तत्व भं स्थित होते तथा इन्द्रियो रथ से श्वयो , 
इन्द्राणीन्दरिया्ैभ्यः भाणादीन्‌ मन एव च||३२॥| को शरोर भाण श्रादि मन को ॥३२॥ रोक ध करश्रपने , 
निद समबायेन भत्याहारुक्रमेत्‌ । | ब मे करते । जिस अकार कषा अपनी १ 
॥ त्‌ से अपने सव श्रज्ञो को समेट केतादै ॥२३॥ सदैव 
यस्तु पत्याहरेत्‌ कामान्‌ सव्या्गणीष कच्चपः२२ | ्रपनी श्रात्मा मे परेम रखकर अपनी चत्मामेः ही 
सदात्मरतिरेकस्थः पश्यत्यात्मानमात्मनिः। | श्ात्माको देखे.तथा भीतरः श्नीर बाहर पवित्रकं 
स वाह्याभ्यन्तरं शौचं निष्पायाकरठनाभितः।३४॥ श्रोर कणठ से नामि तक ॥ २४॥ शरीर को पर्‌: 


हं बुद्धिमान मण्य प्राणयाम कर, यह. 
रयिला इुो देहं भत्याहारषपकरमेद्‌ । बारह प्राणायाम है इसी को धारणा-भी कहते द ॥ } 
भाणायामा दश दौ च पारणा साभिधीयते ।३५। त्वद योगी लोग योग भे. दो धारणा कते है. 
ढे धारणे स्मृते यागे यागिभिस्तत््वदृष्टिमिः । . | वथा इसी भ्रकार्‌ योग मे संल नियतात्मा. योगी - 
तथा वै येगयुक्तस्य यागिनो नियतात्मनः ॥२६॥॥| लोग भी कहते द ॥ ३६॥ उनके सव दोष नष श , 


= ~ वा जाते ह श्रौर बे स्वस्थ दोकर परब्रह्म को देखते द 
स्यं दोषाः परणश्यन्ति स्वस्थशचवोपनायुते | | तथा पारत गुण को श्रलग-अलेग जानते दै ॥२७॥ ` 


वीक्षते च परं बरह्म भराकृतांध गुणान्‌ प्रथक्‌ ॥२७॥, -आहार को जीतने वाले" तथा प्राणायाम परायण 
व्यामादिप्रमाणुंश्च॒तथात्मानमकलमषम्‌ | | योगी जिस मकार आकाश ॐ परमाु्मोको देखते . 
नतां जितां शतैयूमिमारोदेत यया गृह्‌ | | जिस मार भद्र ऋ साक अम 
ते धीसत भोम मू तेह उसी धकार योगी भूमिको पवित्रकर उसंपर , 
द्‌।पान्‌व्याधस्तथा माहेमक्रान्ताभूरनिञ्निता३६॥| वडे । विना खच्च की दै भूमि दोष,.व्याधि श्नौर 
विवद्धयति नारे तस्मादूमिमनि््जिताम्‌ । ` | मोद को ॥ २६॥ बाती दै, .श्सलिये विन शुद्ध; 
माणानाुपसंरोधात्‌ भाणायाम इति स्मतः ॥४०॥ ् इहै भूमि पर ५ न चैे। व के स 
धारणेत्युच्यते चेयं यन्यनेों ¦ को प्राणायाम कदते हें ॥४० ॥ चुकरि इससे मनको .. 
न व च पया 1 | धार्‌ किया जाता इसलिये यद धारणा कदाती 
* मतान यदक्षाप यतात्मभिः । | दै ।.जो इन्द्रियां शब्दादि .पिषयो भे भदत्त उनको . 
मत्याहियन्ते योगेन प्रत्याहारस्ततः स्मृतः ॥४१ योगी लोग योग से उन विषयों से वीच लेते दै 
1 कथित योगिभिः परमर्पिभिः । [रिय श तयार भी का है न शः 
येन व्याध्यादयो दोषा ९ ध इसका उपाय काद जिस... 
“ग्या भौ से योगियों को व्याधि दिक दोष नदीं दोते 8॥ . 
अ जिस तरह जल पीने बोले नल श्रादि यन््रसे जत. 


2 
५. न 


` सत््स्यानुपपत्तौ च देशकालं विवर्जयेत्‌ । 


` शुष्कपर्णचये नयां श्मशाने ससरीखपे | 


दशैता धारणाः प्राप्य भरा्नोतयक्षरसाम्यताम्‌॥५५। 


अ० ३६ -माकएटेयपुराण १५५ 
को खींचकर धीरे-धीरे पीते है उसी प्रकार ^ 


आपिवेचुस्तथा वायुं पिवैट्योगीः जितभमः ॥४३॥| कोम जीतकर धरिधीरे वायु चड़ानी चाय । 


भराङनाभ्यां हृदये चात्र ठतीये च तथोरसि । | पिले दोना नेवं मे, फिर नाभि, -क्तिर हदय " 
1 ह तथा फिर क्रमशः करट, सुख, नासिकाके , 
कणठे युते नासिकाग्रे नत्र-भुमध्य-मूधसु ।४४॥ तथा दोनों भौदों के वीच मे ॥ ९४॥ तथां इसके 
किच तस्मात्‌ परस्पिश्च धारणा परमा स्मता । | अपर जो धारणा है वह उक्छष्ट है, इन स्थानों मे 
|| दशो धारशाश्नों को प्राप्त कर योगी व्रहयके सामने 
0 दोजाता है ॥ ४५॥ हे राजेन्द्र ! योग की सिद्धि फे 
नाध्मातः धरुधितः श्रान्तो न च व्याङुलचेतनः। | लिये थोग करते हुए योगी लोग न वदत पो, न 
युञ्जीत योगं राजेन्द्र योगी सिहध्यथेमादतः ॥४६॥| छधा क न १ १ चित्त टो॥४६॥ 
; ९ क । ध्यान मे तत्पर देकर योगी को श्रति शीतल, 
नातिशीते क चोष्णे वैन इन्दर नानिलात्मकै । ` श्रत्यन्त गमे, जनाङल तथा वागुपूणं श्रवसो पर 
कलेष्वेतेषु युजीत न येगं ध्यानतत्परः ॥४७॥|| योग न 1 ॥ ४७ ॥ कोलादलपूौ स्थान 
जीणोष्टे चत के तथा चति शौर जन्त के समीप, पुराने मकानमें 
सशब्दाभ्रिनल्ाभ्यासे जीणगेष्ठे चतुष्पये | ति एर वौ द पका ३ तोह ती 
मै, प व सपं रहते हों य ॥४८॥ 
चैत्यवरमीकसञ्चये भयपुर स्थानम, कणे पाख तथा दीमक के वनाये 
सभये इपतीरे वा॒चेत्यबरपीक ध य| दु टीलते पर, इन सव स्थानों मेँ तत्व का जानने 
देरोष्येततेषु तक्वो योगाभ्यासं बिवज्जयेत ॥४६॥ बाला योगाभ्यास न कर ॥४६॥ जह्य पर सात्विकी 
वस्तुयें न मिलें उस देशकाल को छोड़ दे। असत्‌ 
दर्शन योग मे निषिद्ध है सकि जदा एेखा होता 


` नासतो दशनं येगे तस्मात्‌ तत्‌ परिवर्जयेत्‌ ॥५०॥| दो उस स्थान को छोड़ दे ॥ ५०॥ इन स्थानों का , 


~ 


चिखार न करफे मूढतानश ओ) मनुष्य याग करता 
है उसके लिये विध्नं से पेदा हप देषो को सुभे 


[ दोषा जायन्ते 
विघ्नाय तस्य ये दोषा ' तान्निबोध मे॥५९१॥ खनो ॥ ५१॥ वदहिरापन, जडता, स्थति का नाश, 
गुंगापन, श्रंधापन शरीर ज्वर पेस रोग उस श्रक्ञानी 


वाधि्यं जद़ता लोपः स्पतेमृकत्मन्धता । व 
जथर ; , घ्रदीदोजा र ॥ ४२ ॥ भ्रमाद्‌ 

श्च जायते सद्स्तत्तदज्ञानयामिन | यी सो तन दोनते हं उसकी भी लिकितसाह 
परमादाहुयोगिनो देषा यद्य ते स्युिकित्सितम्‌ । | योगियों का जो कर्तव्य उन दोप्र के नाश करलेका 


तेपां नाशाय कर्तव्यं योगिनां तन्निवोध मे ॥५३॥ (1 ॥ ५३॥ र त च 
ग 8 ६ ेचड़ी ) खाकर प्राणों की रक्ता करनी चाहिये, 
वात-गुरममशान्त्यथयुदावत्ते तथोदरे ॥५४॥ श्रीर उदर ोग व ॥ र ध श 
५ $ न्थ | करे, पवन शरीर वायुभ्रन्थि रोर दूर 
यवागूं वापि ध वा्ु्न्थं भतिक्षिपत्‌। समाकल भकार कट नाम महा पर्वत का भौ 
तद्वत्‌ कसे, महाशेलं स्थिरं मनसि धारयेत्‌ ॥४५।॥| स्थिर | से ०५ ॥ ५५ अ ८ दोने पर 
0 चि क र नद्ियम्‌ सरसखती श्रौर बाहेस होनेपर न्द्रयकरा ध्यान 
विधाते | बची ध वाधिषय भरणे छर श्रीर श्रगर प्यास से पड़त द्यो तो जीभ पर 
यथेवाम्रफलं ध्यायेत्‌ दष्णात्तो रसनेन्दरिये ॥५६।।| आन्रफल का ध्यान करे ॥ ५६॥ शीर 4 
यंस्मिन्‌ यस्मिन | तस्िस्तदुपकारिणीष्‌ । | रोग हो उसकी उपकारी व का ४ जेसे 
सम्‌ सप्समन्‌ एना देह त । उष्णता मे शीवल्लता श्नौर शीतल्लतासे पीडित होने 
धारयेदारणघुष्णे शीतां शीते च दाहिनीषू ॥५७॥| पर डष्णता क्र धारणा करे ॥५७॥ शिर पर काठक 
कौलं शिरति संस्थाप्य कष्ट काष्ठेन ताडयेत्‌ । । "फीस रखकर काठ से उसकी तोड़ने करे, ेखा 


देशानेताननादत्य मूदत्वाद्यो युनक्ति वै । 


१५९ माराण , - = ०४० 


=-= 
लुप्तसपते स्मृतिः सो योगिनस्तेन जायते ॥५८॥ करने से थोग की खोर हस्तिः शीभ वापिस. 


श्रा जाती है ॥५८॥ आकाश, पृथ्वी, वायु, ्र्चिको. 


यावापृथिवयौ वासय व्यापिनावपि पारयेत्‌ । | सर्वव्यापी ने क कारण धाररकर, ये श्रमाुषीय 


्रमाटुषात्‌ स्वना बाधास्त्वेताधिकित्िता;५६।| बाधां की चिकित्साये दै ॥ ५६॥ यदि येगी क ` 


घ्रमाुषं सत्वमन्तर्योगिनं भविशेदयदि। | भीतर अ्माञुपीय सत्व का भ्रवेश टोजाय तो उस 
वायभिधारसेनैनं॑देहसंस्थं भिनिरहेत्‌ ॥६०॥ को देह मे स्थित वायु श्रौर श्चि की धारणा'से 


तर ¡ योगविदा भस्म करे ॥ ६० ॥ दे राजन्‌ ¡ थोग के ्ञाताको, इस 
एवं सन्ब्ास्मना रक्ता काय्यं योगविद्‌ चरप। मरार श्रपने शरीरी रक्ता करनी चादिये क्योकि 


ध््माथ-काम-मोक्षाणां शरीरं साधनं यतः ॥६१ धम, र्थ, काम श्र मोक्त का साधन शरीर दी 

0 - से है॥ ६१ ॥ प्रदृत्ति के.लक्तो को.भरकर करनेसे 
त्लकषणार्यानाद्योगिनो विस्मयात्‌ तथा | | तथा विस्मय से यागी का ज्ञान लुप होता. है इस 
वि्ञानं धिलयं याति तस्माद्वोप्याः पत्तयः ॥६२।॥ लिये भवृच्ियों को शुप् रखना चादिये ॥ ६९॥ कम 


श्राललोस्यमारोग्यमनिष्टुरतं चलना फिरना, ए दया स्खना, शुभ गंध 

४ पुरीपर लेना, थोड़ा सूनर श्रौर विष्टाकरना, कान्ति.प्रसन्नता 
न्घ १ ८ ; ९ , १ 
॥ शमो क । खर की सौम्यता, ये याग मे पद्त्ति के प्रथम्‌ बिह 
कान्तिः प्रसादः सखरसोम्यता च दै ॥६२ जिसमें लोगों का अनुराग हो जाय, जिस 


योगप्रहृततेः भथमं हि चिषठम्‌ ॥६३॥ का पीट पी गुणगान हो तथा जिससे लोग. भय 
श्रनुरागी जनो याति परोक्षे गुणकीर्तनम्‌ | | न मानें ५ व युक्त व ध 
दवलंशषणुत्तम =) जानना चाहिये ॥ ६७॥ अत्यन्तं शोत & 
डरन हो उसको सिद्धि पराप्त दश्री दै पेसा 
न भीतिमेति चान्येभ्यस्तस्य धिद्धिरूपस्थिता ॥६५॥ समना चाये ॥ ६५॥ इ 
इति श्रीमाकर्डेयपुराण मे जदोपाख्यान भं योगाध्याय नाम र€्वँ ्र° समाप्त । ` 


कस न 
चालीसबां अध्याय 


दत्ताय वोज्ते-- 


1 


दत्तात्रेय उवाच 
उपसर्गाः परयसेन्ते दष्टे ह्यात्मनि योगिनः! 
ये तांस्ते संमवशष्यामि समासेन निवोध मे ॥ १॥ 


आते ह उनको सुभे पृथक्‌ २ सुनो ॥ ९॥ योनी 
| छच्छी-खच्छी मानवी क्रियां ` की श्रभिलाषा 


कम्पाः क्रियास्तथा कामान्‌ माुषानभिवाञ्छति | | करतां हे | सखीः दान काफल, विया, माया, व्वादी, " 


सियो दानफलं वित्रा मायां प्यं धनं दिवम्‌ ॥ २॥ सोना, धन, खगं की इच्छा ॥ २॥ देवत्व, अमरत्व, 


देवत्वममरेशत्वं रसायनचयः क्रियाः | `` ¦| रसायन क्रिया, वायु मे. उड़ना, यज्ञ, जल शरीर ४ 
मरुतखपतनं यङ्ग नलाग्न्वावेशनं तथा. | चश्ि मे प्रवेश करना, श्रद्ध श्रौर ` सव ` भकार के 

[] त ^ ~ नियसांस्त 1 नियमं . ति 0 ^+ 
श्रद्धानं खव्वंदानानां फलानि नियसांस्वथा ॥ ३॥ दानो ॐ एलं तथा नियम ॥ ३॥ तथा. उपवास यज्ञ॒ - 


 ठथोपवासात्‌ः पूर्त. देवताभ्य्चनादपि । | रौर देवतानं क पूजन सेः जो फल होतेह उनकी 


तेभ्यस्तेभ्य कम्मैभ्य उपसषटोऽभिवाञ्ति ॥ ४॥ 


,. अत्मा के जानने पर भी यगीकोजो रपस ५ 


५ 


| । न करता दे ॥४। ६ तुह चिन्त. मे उपस्थित ` . 
; ` ` ४ मनः इन्यनुप्सगाद्‌ : भञच्यते ॥.५॥, लोग वन्न जाते ह ॥१ ॥ इन उपसर्गा करो;जीवने पर. 


= + क 
४ . भकेए्ञ्यषुराण १५७ 
~~~ _ 
, ---------------_----------------- 


¦ उपसमरभितेरेभिस्पसर्गास्ततः पुनः | येगियो के दृ्छरे उपसर्ग श्त हँ जो सत्व, 
योगिनः सम्भवत्तन्ते सात्च-रानस-तामसाः ॥ ६॥| शौर तामस से उत्यन्न होते ॥६॥ प्रादिभ, शावश्‌, 
भ्रातिभः श्रावणो दैवो भ्रमावत्ती तथापरौ । | दैव, धम श्रौर श्रवत थे पाच उपसरभं योगियो के 


पश्वे योगिनां योग-विघ्राय कट्कोदयाः ॥ ७। योग मे कडु त्रिष्न डालने बलि दै ॥७ ॥ वेद, काव्य 
वेदाथाः काव्यशास्राथां विचाशिस्यान्यरेपतः । रीर शलो का अथं तथा अन्य विचयं शौर 


शिल्पकला का क्ञान यदि येगी कोहो तो. श्रातिभः 
अतिभान्ति पदस्येति मातिमः स तु योगिन; ॥ ८) उपरमं इश्या जनना चाभ ॥ ८॥ जो षव शब्दों 


शब्दाथानसिलान्‌ वेति शब्दं क्वाति चैव यत्‌। | के अथो को जाने श्रौर दज्ञारो थोजनो से तत्व को 
योजनानां सहसेभ्य; रावणः सोऽभिधीयते | & ॥| उने तो श्नाबर' उपसर्ग समभना चाये ॥ ६॥ 


समन्तादीक्षते चष्ट य यदा देवतोपमः जव देवतां की तरह रठँ दिशाच्नों मे देखने 
उपसे ` तमप्याहैवषनमत्तवदशुधाः ॥१०॥| लगे तो इस उपसगेको विदान्‌ 'दैव' कदते ।१०॥ 
भ्राम्यते यन्निरालम्बं मनो दोपेण योगिनः । | यदि योगी का मन दोषं से निराश्रय हो भ्रमण 


करनेलगे रौर खव आचार धट होजाय तो "घमः 
समस्ताचारविभरंशादभमः स परिकीर्सितः ॥११॥| पसम कहलाता ह ॥१९॥ जल क शवर कौ वरह 


श्राचत्तं इव॒तोयस्य ज्ञानावर्तो यदाङलः यदि भ्रान श्चावरृत होकर चिन्त व्याङ्कल दोन लगे 


नाशयेचित्तमावत्तं उपसग सर उच्यते ।|१२। | तो आवतं उपसग हुश्रा,जानो । यष्ट योगीके चित्त 


एतैरनापि ४ को श्र करता है ॥१२॥ इन धोर उपसर्गौ से योग 
शृतयोगास्तु , सकला दषयोनयः। रट होकर योगी चार-वार देवथानियो मे 


सौषहापोर (3 £ ॥ 
उपसगेमहाघोररावततन्ते पुनः पुनः ॥१३॥ रहता है ॥९२॥ इसलिये यागी को चादिये कि शानं 
/ प्रात्य कमव शुद्धं योगी तस्मान्मनोमयम्‌ । | दारा व्रह्म मे चित्त लगाकर परह्य का चिन्तनकर 


न्द्िय रहे तथा पृथ्वीं श्रादि सातां सद्म वारणाश्रौं 
योगयुक्तः सदा येगी लघ्वाहारो निनदः को.शिर पर धारण कर ॥ १५॥ पितो धरती को 


सूष्मास्तु धारणाः सप्त भूरा मच धारयेत्‌। ११५।) योगी धारण करे श्रौरं उसका खख पराप्त करे । 
धरित्रीं धारयेदयीगी तत्‌ सौख्यं परतिपद्यते! | श्रात्मा को पृथ्वी समभे शछ्चौर उसके वन्धन को 


आत्मानं मन्यते चोर्वी तंदुबन्धश्च नहाति स; १६॥ ४५५ ५ ॥ अ न 
१ + ५ * रतजम्ज ९ 
तथैवाप्ु रसं घुश्मं तद्रूपं तेनसि । | स्य नोर सदम धारणा दै ॥ १७॥ शौर आकाशे 


स्पशं वायौ तथा तददधिभरतस्तस्य धारणाम्‌ ।।१७ | ज सूम पदृत्ति दै तथा शब्दः करो भी ' शसं भकार 
व्योम्नः सृष्मां परहृततिञ्च शब्दं तदवज्जहाति सः १८ | जानकर छोड दे ॥ १८ ॥'जव येगी सव पारियोके 


नस्याविशते यदा । सन मे पने मन को पवेश करते ह तो - मानसी 
मनसा सन्वभूतानां मनस्य विश्‌ द्‌ व त त त 


तद्वुधुद्धिमरेषाणं सत्वानामेत्य योगवित्‌ । | बुद्धि को भा कर यागका क्ञाता उत्तम .सूदम युद्धि 
परित्यजति सम्प्राप्य ुद्धिसौकषममलुत्तमम्‌ ।२०।॥| को पाकर स्थूल वुद्धि को छोड़ देता है ॥२०॥ हे 


लष ! इन सातो स्मोको अच्छी तरद जानकर 
परित्यजति सूक्ष्माणि रप्रतेतानि योगवित्‌ । 1 


सम्यनि्नाय येऽ्लकं तस्याहततिनं विद्यते ॥२९॥ होती ॥ २९ ॥ हन धारणाघ्रों को सावो सूम जान 
एतासां धारणानान्त सक्षानां सौकष्ममात्मवान्‌। | कर जो योगी इनको छोड़ देते हँ वे .परम सिद्धि 
दृष्टम दृष्टा तत! सिद्धि स्यक्त्वा त्यक्त्वा परा ब्रनेत्‌ २२| को प्रा होते दै ॥२.२ हे राजन्‌ ¡ जिन-२ मराणियों 
यस्मिन्‌ यस्मिथ इसते.भूते रागं मरीपते । मै येगी श्रञ्वग करता है तो उन्दी २ योधियोँमे 


क 


, १५८ - माकंर्डेयपुराण | .+श्र° ४० 


मः 


तस्मसतस्मि सम्भाप्य स । रपय सं विनश्यति२३| आसक्ति ॐ कार नाश को भात होता दै ॥ २३॥ 
न समासक्ति इसलिये सूख्मं को पस मेँ श्रलग २ जानकर जो 


तस्मा्विदिला दष््माणि संसक्तान परस्परम्‌ । | गी छोड़ देता है वद परम पद को पात होता है 
परित्यजति या देही स परं प्रायात्‌ पदम्‌ ॥२७॥ ॥ २४॥ हे रजन्‌ । इन सातो सूम को जानकर 
एतान्येव त सन्धाय सपन स््माणि पार्थिव । | दी प्राशियों को विराग दोता दै श्नौर उस सद्धाब 


| ॥२१॥॥ के क्ञाता को दी सक्ति दोती है ॥ २५॥ हे राजन्‌ | 
भूतादीनां विरागो स्वकस्य छ्य जो यमीं गन्ध, ्रासक्ति आदि. मे लिप्त होताहै 


गन्धादिषु समासक्तं सम्भाप्य स विनश्यति। | बद न दोजााह श्नीर वारवार मचुप्य के शरीर 
पुनरावर्तते भृप॒ स॒ बरह्मापरमादुषम्‌ ॥२६॥| मे जन्म लेवा है ॥२६॥ हे राजन्‌ ! इन सातो धार 
स्तेता धारणा योगी समतीत्य यदिच्छति । ण्यं को जीतकस् यामी जिस सुम प्राणीमे अरवेश 


भृते याति नेर ॥२७॥| करना चाहता है उसी मे लय द जाता हे .॥ २७॥ 
व देवता, ्रञ्ुर, गन्धव चौर नाय इत्यादि के शरीरो 


तेवानामदुराणां वा गन्धरव्वोरिग-रक्षसाम्‌ । नी प 
देहेषु लयमायाति सङ्खं नाभोति च कचित्‌ ॥२८॥| मे लीन नदीं होता ॥२८॥ ्रणिमा, लथिमा, महिमा, 
श्रणिमा ज्षपिमा चेव महिमा प्रा्ठिरेव च| | भि, भराकास्य, ईैित्व श्रौर बशित्व ॥ २६॥ तथा 


भाकाभ्यंच तथेशित्वं षिञ्च तथापरम्‌ ॥२६॥| पेश्वयं इन गणरूप श्रां सिद्धियों को भा्ठकर जो 
कामना वश इनके वशीभूत नदीं दोता बह परम 


यत्र कामा्रसायिखं गुणानेतांस्तथेश्वरान । निवा व पा का ॥ 1 स त 
्ा्नोतयष्टौ नरव्याघ्र परं नि्यणसुचकान्‌ ॥२०।।| होना अरिमा कटलाती है, शीयत्व लघिमाका यण 


ष्मा सुक्पतमोऽणीयान्‌ शीधतवं लंधिमा गुणः । | है । सचसे पूजित, दाने को महिमा श्रौर जिसे पा 
हेता गगल प ए 


भाकाम्यस्य व्यापि्रादीशिखन्चेश्वरो यतः को ईशित्व कहते ह श्नौर सवको व म करे.को 
वशित्वादशिमा नाम येागिनः सप्तमो गणः । २२॥ वशिम्रा कहते हँ जो योगियों का सातां गुण दै ॥ 


यरेच्वस्थानमप्युकतं यत्र कामावशायिता । | जा इच्छा का स्थान रीर कामावाविता भी 
रेय्यकाररेरेभिर्योभिनः उसको ेश्वयं कहते है, ये ्राठ सिद्धियां येागियों 
ेएववयकारणरिर्योगिनः _भोक्तमषटपा ॥३२॥ की ह 1३२ हे सजन { परम निवाप ुक्ति का 


गुक्तिसंसुचकं :६। पर्‌ तिर्व्वाणमात्मनः सचक है,वहाँ नं जसम लेते ह न चढने ह च्मौर नं 
ततो न जायते नेव बद्धंते न विनश्यति ॥२४॥| मरते दै ॥२४॥ न.कय होते हें श्नीर न श्रन्त ` होता 


नापि क्षयमवाभ्नोति परिणामं न गच्छि | है, तथा न काटे से कटते दै, न दाह फो पात देते ` 
श्रौर न सूखते है श्रौर न पथ्चतत्वादि मे प्रप्त 


छदं छेदं तथा दाह शोषं भूरादितो न च ॥९५॥| दोते ह ॥ ३५॥ माणियँ से शकक भाप नदीं ते 
भूतवगादवाभोति शब्दाः द्वियते न च। | श्रौर शब्दो से चक्तित नही छते शौर उनके कर 
न चास्प सन्ति शब्दाचास्तदरोक्ता तेनं युज्यते॥ २६। शब्द आदि नदीं है ! यद्यपि चे शब्दो के भोक्ता है .. 


यथाहि कनकं सण्दमपदरव्यवदधिना । | गे भीःउनमे लि नी ह ॥ २६॥ जख भकार शरा 
। भूपरणादि दवभ्य शचि मेँ भज्वक्तित होकर सुवणं हीं - 


द्ग्पदोषं दवितीयेन खणएडेनेक्यं वनजेन्दरप ॥२७॥ 
रहता है श्रौर उसका दाप जल जाता है ॥२३७॥ 
न जिरोषमवासरोति तदटयोगंभरिना यत्तः इसी भकार येगी यागा मे जललकर दोष रहित . 
निदग्धदोपस्तेनेक्यं भयाति ब्रह्मणा सह ॥३८॥| दोजाते है ओर अपने सदश बह्म मे लीन जाते । 
यथाधिरप्रौ संक्षि. समानत्वमनुतनेत्‌ । हें ॥ ३८ ॥ जिस प्रकार श्रग्नि मे पकी हर अमि 


उसी धकार की हो जाती है उसी तरह येगी जहम ` 
तदार्यस्तन्सया भूतो न शेत ` विदोषतः ।॥२६॥| भर निलजर काला को भाप लो जाते ॥ ३६॥ हे ~ 


. ^^ ब्रह्मणा तद्वत्‌ माप्यकयं द्शक्रिखिपः | । राजब्‌ ! इसी प्रकार यागी पते पापो स दण्यकरः ` 


"न्न _ ५ 


पथ ` ----------- ४ ५ (| 5 
योगी याति प्थरभाव न कदाचिन्मदीपते ॥४० ॥ परत्रहम म मिलकर कभी श्रलग नदीं दाते ॥ ४०॥ 
यथा जलं गतेनैकयं नितिह्पुपगच्ति । जिस प्रकार जल जल भं मिलकर पक ह जाचा 


उसी 
तथात्र साम्यमभ्येति योगिनः परमात्मनि ॥४ १।॥ कर पक हो जाती है ॥४१॥ 


~~ स -७4द०-- 
इकतालीवां अध्याय 
श्रलकं उवाच श्रलभ॑ वोक्े-- 
-वन्‌ यागिनशय्यीं श्रोतुमिच्छामि तत्वतः । दे भगवन्‌ ! मँ 4५.५५ यागियोँ की ` चयां 
तं क नना चादता ह जो कि बह बह्लसागं मेँ 
व्त॑न्युसरन्‌ (| यागी न सीदति ॥ १ | हा योग ङ्गे को भातत नहीं दोता है ॥१॥ म 
, दत्तात्रेय उवाच र दत्ताय वोले- (१ 
मानापमानौ यावेतौ ्रीद्युदरेगकरौ चरणाम्‌ । मान श्र श्रपमान मुप्यो.क कमरणः पीति 


। ्रीर उदधेग उत्पन्न करते है, इनका विपरीत श्रथ 
तावेव विपरीता योगिनः सिद्धिकारकौ ॥२॥ समने वे यगियो को सिदध भान त अथ 


मानापमानौ यापेतौ तायेवाहूर्विपारते । | मान शीर अपमान करमशः श्रत. शौर विष है, | 


ष्यत विषमं यागी को चाये क्र श्रपमानको रसत 
अपमानाभ्यत्‌ त॒ मानस्तु विषमं मिप्‌ ॥ २॥ क वियम विष त 0 भमो प 


चश्ुःपूतं न्यसेत पादं ध्पूतं जलं पिवेत्‌ । | रके व से आत.ऊर जल पि, सत्यता 
त्यपूतां बदेद्राणीं बुद्धषतभ्च चिन्तयेत्‌ ॥ ४ वचन परते ओर बुर्का चिन्तनं करे, ॥ ४॥ 


तथ्य त प्रोत्सयेष ातिध्य समय, धाद, यज्ञ, देवयात्रा श्चौर उत्स 
अ शादय वयाघ्रोतपवेषु च । के समय योग वा जानने वाला कभी र्थ सिद्धि 
मदानन्च सिद्धय न गच्छेदयोगवित्‌ कचित्‌ ॥५॥| ॐ लिये न जाने ॥५॥ ञे के समय, जि सम 


व्यस्ते विधूमे व्यङ्गारे स्वस्मिन्‌ भुक्तवज्जने । रसो्ईनदेर्दीदो श्रथवा जव सव लोग भाजन 
श्रेत योगविदरेष्यं न तु विषयेव नित्यशः ॥ ६ ॥| फर चुके टो इन समयो मे योगी भिक्ता न मि ॥ 


यैषमवम- ६ जिससे के उसका श्रपमान न-कर सके । येगी 
यथंषमवमन्यन्ते जनाः परिभवन्ति च। को उत्तम लोगों के वताये हय माग दाष न लगा 


तथा युकतशरदयोगी सतां वत्स न दूषयन्‌ ॥ ७॥|| चर उ ण पम ॥ जें च्व 
४. चरेदश्दस्थेषु यायावरगृहेषु च| थेष्ठ हों उनसे भिक्ता ममि क्योकि दसी को पदिली 
भ्ठ ठु मथमा चेति इत्तिरस्यापदिश्यते ॥ ८ ॥ चृतति बतलाया है ॥ ८ ॥ शरत, योगी फो ' न्दी 
श्रथ नित्यं ए्दस्थेषु शालीनेषु चरेहयतिः। श्स्थों मै जाना चाद्ये जा धनी, भरद्धायान्‌, 
ति श्रदधानेषु दान्तेपु॑शोत्रियेषु महात्मसु ॥ ६ ॥ व र ४ शा &॥ ष ५ 
३ पुनथापरि अदुष्टापतितेषु च । ज स्थी इए शर्‌ पतित नः हो 
पमं धित न ॥१०॥॥| पास भी यागी जा सकता दै परन्तु हीन. वरग से 


1 यावकमेव वा । |.मि्वा मांगना नीच इति दै ॥ १०॥ यवागू, तक, 
भ्यं यवागूं तक्रं या प्रयो यावकमेव वा दूष, यावर, फल भूल वेर भौर स ॥ ९११ 


फलं मूलं भियं वा कणपिण्याक-क्तवः ॥११॥ ही शाहार दगा शर सिज 
इत्येते च शुभादारा योगिनः सिद्धिकारकः । . | इसलिये पकाय चित्त दोफर भक पूर्वक "यदी 
तत्‌ मधुजथान्मनिरभकतया परमेण समाधिना॥ १२ भोजन -करे ॥ १२॥ निष्द होकर पिला ग्रास 


१६० माकंरुडेयघुराण ५ 
~ -----न----------------------------------------------------- 


शपः पर्व सकृत्‌ भार्य तृष्णीं भूत्वा समाहितः 


हाथ मं.लेकर श्राणायनमः' -यदह कहकर उसको 
माजन कर ले, इसके प्रथम आहुति कहते हीश्या 


त | १३ 
प्राणायेति ततस्तस्य प्रथमा हाहुतिः स्थता ॥१३ श्रपानाय स्वाहा" यदह कहकर "दसरा "समानाय 
सखादा' कटकरर तीसया “उदानायं खाहाः कदकर 


श्रपानाय द्वितीया त॒ समानायेति चापरा । 
चौथा श्रौर व्यानाय स्वाहा" ककर पाँचवाँ ग्रास 
उदानाय चतुर्थी स्यादयानयिति.च पश्चमी ॥१४।॥| चाना चादिये, इनक करमशः खरी तीसरी चौथी 


पर पांचवीं आहति कहते ॥९४॥ इसी तरह ्रलगं 
¦ पथक्‌ त्वा शेषं थुज्ञीत कामतः 
माणायान, पृथक्‌ छल शेपं द्रलग प्राणायाम करके सव शन्न का साले श्रौर + 


श्रपः पुनः सकृत्‌ प्राश्यं त्राचम्य हृदयं स्पृशत्‌ १५।।; फिर दाथ धोकर जल पीवे श्रीर हदय के स्पत 
अस्तेयं ब्रह्मचय्य॑श्चं स्य गे।ऽललोभस्तथेव च । करे ॥६५॥ चारी न करना, ब्रह्मचर्य, व्याय, श्रल्ताभ 
व्रतानि पएश्च भिक्षणामरहिसापरमाणि व ॥१६॥ व त 
अक्रोधो ुरुयशरपा शौचमाहारलाणवम्‌ । सजन श्रौर नित्य खाध्याय, यहीं पाँच उनके 
नित्यस्वाध्याय इत्येते नियमा; पंच कीततिता;) नियम हे ॥ १७ ॥ जे क्ञान सारभूतं दो. नौर काथं 
सारभूतसुपासति ज्ञान यत्‌ कास्यननाषकम्‌ | का साधक दा उसकी ॥ भ 
तै येयं = क्योकि ज्ञान का वाहृल्य योग मे विष्न करने वाला 
येोर्गाः ८ 
हाना हता प योगविघ्ठकरा हि सा ॥१८॥| ता तो अती दप याने 
षदं ज्ञेयमिदं ज्ञेयमिति यस्ठृपितश्चरेत्‌ । | योग्य है, यड. जानने येग्य है इसमे फसा रटे बह 
रपि कल्पसहस्रेषु ` नैव॒केयमवाप्ुयात्‌ ।१६॥| सदस कल्प म भी कय क नदीं जान सकता दे ॥ 
ङ्ग ५ येगी के चादिये करि सङ्घ के छाड़कर, कोध करा , 
त्यक्त्ङ्गो जितक्रोधा लघ्वाहारो जितेन्ियः। चीर याड श्राद्यर करका ह, जित | 
हो शरीर शरीर के सच द्वारो का वुद्धि से -विधान 
णं #॥ 
विधाय शुद्धया | प्याने निवेशयेत्‌२०॥ ४: न). 
शून्येष्वेवावकाररेषु यद चं वनेषु च। | चादिष कि खदा पान्त से, श्रवकाशा स्थान 
नित्ययुक्तः सदा योगी ध्यानं सम्यगुपक्रमेत्‌ ॥२१॥| युफान् से जर वनँ म अच्छी तरह ध्यान करे॥ 
वाग्दण्डः कम्मदण्डशथ मनोदण्डश्च ते त्रथः एग्दर्ड, कर्मदरड न्नौर मनोदरड ये तीनों दरड 
५ - जिस येगी के नियत ह वही महायती बिदरडी हे 


यस्येते नियता दण्डाः स त्रिदण्डी महायति;॥२२॥ 


सव्वंमात्ममयं यस्य॒ सदसन्जगदीदशुम्‌ । 


गृणगुणएमयं तस्य कः पयः को दपापियः ॥२३॥ 


विशख्वद्धिः समलोष्टकाञ्चनः समस्तभूतेषु च 
तत्समाहितः । स्यानं प्ररं शाश्वतमग्ययंच परं 
हि मतवा न पुनः नायते ॥२४॥ 

वेदा; शरेष्ठाः सव्व॑यहक्रियाश्च यङ्गाञ्जप्यं 
ज्ञानमागेध ज्यात्‌ । ज्ञानाद्धचानं सङ्खरागव्यपेतं 
तस्मिन्‌ प्रापे शाश्यतस्यापल्तम्धिः ॥२१५॥ ` 
समाहिते ब्रह्मपरोऽमादी शुविस्तयैकान्तरति्ै- 


तग्र. । समासुयादयोगमिमं महात्मा पिुक्ति- 


भामोति ततः खयीगतः ॥२६॥ 


॥ २२॥ हे राजन्‌ ! सत्‌, असत्‌ तथा गुण श्नौर ` ' 
श्रशुणयक्तं इस संसार का जा येगी अपनी श्रात्मा 
मै ही निहित जानता है उसके कौन परिय चीर 
क्रौन छमिय दै १॥ २३॥ विश्चद्ध युद्धि होकर जादे 
श्नौर सेनेके जो एक्खा सममे श्चरौर खव प्राणियों 
के एक समान जाने, फेस येगी परम श्वत 
स्थान का जाच्छर पिर जन्म.नदीं लेता है ॥२४॥ वेद ` ` 
सव से श्रेष्ठ है, वेदों से यक्षक्रियाये ओ है, यके / 
जपएश्चीरजपसेज्ञानरेष्ठहै तथा क्षान से सङ्ग 
छीर राग से वर्जितं ध्यान उत्तम है जिसके 
से परब्रह्म की पासि दती है ॥२५॥ समवुद्धि, 
ब्रह्य में संलश्च, पमाद से रदित, . पवित्र, एकान्तः 
पमी, जितेन्दिय दैकर जा शैएगका श्रभ्यास करता 


-है बह हात्मा श्रपने येग के कारणमुक्तं को शास 


करता है.॥ २६ ॥ 


इति श्रीमाकण्डयपुराण में योगिचर्य्या नाम ..४ श्यो अध्याय समाप्त । 


११ 


न 


[म 


`अ०४२ २१  माणडेयपुराण १६१ 


=--------------~-------------~----~-~-----------~---------------------------- 
बयालीकषबो अष्याय 
| दत्तात्रेय उवाच दत्तात्रेय बोले- | = 
एवंयो वतते योगी सम्यगुयोगन्यवस्थितः । ओ योगी इस प्रकार योय मे स्थित रहकर ` 


चर्तन करता है वह संसार फे श्राचागमन से हयूटः , 


श ~ जन्पान्तरशतेरपि 
म स व्याद्ितुं शक्यो जन्मा ॥ १ जा 01 0 


“श्र च परमास्मानं प्रत्यक्षं ` विश्वरूपिणम्‌ | | विश्वभावन परमात्मा का भरतयन्त खरप जानकर 


विश्वपादशिगोग्रीयं विश्वेशं विश्वभावनम्‌ । २॥॥| उसकी पराति के क्लिये शति पवित्र दोकर पकाक्ञर 


तत्माप्ये महद्‌ पुण्यमोमिस्येकाक्षरं जपेत्‌ 'श्रोम्‌' का जप करे तथा उसी का अध्ययन करे 
तन्वाभ्ययनं व । श्रीर्‌ उसी के खरूप को सुने ॥३॥ श्रोरेम्‌ के , 
तददाध्ययन तस्य सखरूप शृतः परम्‌ ॥ ३॥ छकार, उकार श्नौर मकार तीन अक्र ह ताश्च ` 


सकार तथोकारो मकराक्षरत्रयम्‌ । | तीनों मात्राय सतोयुण, रजोगण, तमोयुणयकत है॥ 
एता एव चयो मात्राः साच्-राजस-तामसा-॥ ४ ॥| इसके ऊपर जो श्राधी भात्रा है वह निगु है श्नौर 


योगियों (७ पः 
नि्गणा योगिगम्पान्या चार्धमा्ोद्ध्वसंस्थिता । | योगियां को ग्यदे । वह गान्धार स्वरके धितं 
५ क होने के कारण गान्धारी कटलाती ह, शौर शिरप्र 


गान्धारीति च विहय गान्धारस्वरंभरया । | चीटी की यतिक भाति उसका मयो पर होता 


 पिषीलिकागतिस्पशं यक्ता मूर्ध लक्ष्यते| ४।| है ॥४॥ जिस तरद ओंकार शव्द के उचारण मे 
यथा भरयुक्त ओड्रः भतिनियाति मृद्धनि । 


चह श्राघी साजा शिर पर जाती हे उसी पकार 


दथोहारमयो श्मोकार्सय योगी में व्वक्तर हो जति है ॥ ६ ॥ प्राण॒ 
रमयो योगी लक्षरे सक्षरो भवेद्‌ ॥ ६॥ खपी धञुप पर श्रात्मारूपी वार को चडाकर ब्रह्म 


राणो धुः शरो दात्मा ब्रह्य वेध्यमनुत्तमम्‌ ! | रूपी लन्य को वेधे नौर जिस प्रकार चाण वेभ्य मेँ 


.शछ्रभमनत्तेन वेद्धव्यं शरवत्‌ तन्मयो भवेद्‌ ॥ ७1|| लीन दो जाता है उसी भकार श्ात्मा को बरहम म 


दरोमित्येतत्‌ अयो पेदास्रयो लोकाच्योऽपरयः। ध दै वदी तीनों वेद, 

विष्णु्द्या हर्यथ = यज॑पि ।| तीनों लोक रौर तीनों श्चश्चियां है । तथा ब्रह्माः 
पिष्णुब्रह्मा इम ऋक्सामानि पिच ॥८ ॥ विष्य, मसे शौर ऋक्‌, छाम शौर यशः भ बही 
मात्राः साद्धांच पिस्तच वि्ेयाः परमार्थतः । | है ॥ ८ ॥ चकार धी माना सदत चार माना 
त युक्तस्तु यो योगी स तष्यमदाम्मयाद्‌ 11& ॥| फा भी कदलाता दै, इससे युक्त योगी उसीमे लीन 


्रक्रारस्त्वय भूर्लोक ऽकारषोच्यते शवः । | दो जाता ५ ॥६॥ इसमे १ शौर उकारः 
म मकार सलः प्रिकस्ययते भुवर्लोक दै तथा च्यंजन सदित मकार स्व्लकि 
सन्यजञनो मकार स्जञकः परिकरपयते ॥१०॥| कदली है ॥ १०॥ पदिली मात्रा ो च्यत ओर 
वयक्ता तु मथा मात्रा द्वितीयाऽ्यक्तसङिता | | दरी को अन्यक कते दै तथा. तीसरी माजा 
मात्रा ठतीया विच्छक्तिरद्धमात्रा परं पदम्‌ ॥११।॥ चैतन्यशक्ति क परम हे स व 
श्ननेतैव कमेरंता विकेया योगभमयः। क्रम से श्न सव गो की भूमि जाननी चाद्ये, 
५ प्रोंकार के उच्चारण से समस्त सत्‌ श्रीर श्रसत्‌ 


ोभितयुारणात्‌ सव्वं शीत सदद्रेत ॥९२॥| का योध हे जाता है ॥ १२॥ पदिली मावा इस्व 
हवा तु मयमा मत्रा द्वितीया दैष्यसंयुतां। | न्नर दुखसी दी है, तीसरी मात्रा प्लुत दै श्चीर 


तूतीया चप्लुताद्धास्या वचः सा न योचरा॥१३॥ चौथी मात्रा बेन करने अ व र 
। ह्येतदकषरं  प्रमोङ्ारसंमितम्‌ ही ््तररूप श्रोकार परब्रह्म दै इसको ज मनुष्य 
द्रं. व्रह्म परमोङ्कारसंकितम्‌ । जानते या जो इसका मल भाति ध्यान करता 


यस्तु षेद नरः सम्यक्‌ तया ध्यायति वा पुनः) १४।॥ हे ॥९। बद संसारचक्र को छोडकर तीनों वंधनों 
संसारचनणुतखज्य स्यक्तत्निषिथवन्धनः ! | से सुकत दो जाता दे रौर परब्रह्म पग्मात्मा भ लीन 


` भ्रामोति बरह्मणि लयं परमे परमात्मनि ॥१५॥ दो जाता है ॥ ९५॥ फर्म बन्धन को श्रतीए शौर 


१६२ । माक॑र्डेयपुराण ४ . प्र. ४३ 


्ीएकस्पैवन्धथ भः : } - [श्रि श्रपनी सत्यु जानकर मतयु के समय जो 
। ५ स क ॥ | योग का.स्मरण करते हं बे दूसरे जम्मर्मे भी योगी 
(व ५ नय गत्वृच्छति-॥|\६॥ हौ होते है ॥१६॥ इ्सलिथे चाहे योगी सिद्ध दो 
| तस्मादसिद्धयोगेन सिद्धयोगेन घा पुनः] श्रथवानदहो उसे. श्रि को श्रवश्य जानना 
। जञेयान्यरिषटानि सदा येनोत्क्रान्तौ न सीदति ।[१७॥ चदि जिसे शतयके समय उसे कष्ट न दो॥९७। 
| इति श्रीमाक॑ण्ठेयपुराण मे यग्म श्रोकार खरूप कथन नाम का वाँ अध्याय समाप्त । . 
| ~~ > ०:"€4-~-~ 
त तेतालीसवां अध्याय 
दत्तात्रेय उवाच दत्ताघ्रेय बोते-- ॥ 
। शछरिष्टानि महाराज शरु वक्ष्यामि तानि ते । है राजन्‌ ! अवमे उन ररि को कहता 


। गोकानपृत्यं निजं जिनको फि देखकर योगी अपनी सत्यु जान तेता 
¦ येषामालोकानयतयं निजं जानाति योगिव्‌ ॥ १॥ है ॥ १॥ देवमा, श्युव, श॒क्र ` छ्रौरं अरन्धती ` ये 


देवमयं भूवं शुरं सोमच्यायामरन्धतीम्‌ । | तीन तारे शौर चन्द्रमा की. छाया जो म्य नहीं 
थो न पश्येन्न जीवेत्‌ स नरः संवत्सरात्‌ परम्‌ ॥ २॥ देख सकत है बह एक वपं के भीतर इत्य्‌ .को 
भः विभवं स्य बहि जैव प्राप्त होता हे ॥२॥ जो मवुष्य प्रातःकाल के सुयंकी 
शररिम विस्व सू्यस्य बहि चेवाशमालिनय्‌। | लाली ननौर श्रग्नि की उष्णता को न मालय करे 
ृटटरकादशमासात्‌ तु नरो नोद्वन्तु जीवति।। ३॥ बह 5 खे उपरान्त स नदीं श 
वि सक्ता ॥ २॥ जो सृचुप्य ख्नावस्था मे चमन,मूत्र 
। वानत ूत्रपरीषे च यः सण रजतं तथा । | शौर निष्ठा म सना चाँदी दे वदं दस मदीयैतक 
त्यक्षं रते स्वप्ने जीवेत्‌ स दशमासिकम्‌ ॥ ४॥| जीचित रहता दै ५५६ ॥ जो ५ स्वप्न मे भवः 
त ववनगरार पिशाच श्रादिक श्चौर गन्धर्वौ के नगर तथा 
ष य गन्धन्वनगराणि च | | क पेड आदि देखे वद नौ महीने तक जीता द ॥५॥ 
1 क्षार नव मासान्‌ स जीवति ॥ ५। जो श्रकस्मात्‌ स्थूल से छश श्रथवा छश से स्थूल 
स्थूलः कृशः एश; स्थूलो योऽकस्मादेव जायते । | हो जाते श्रौर उसकी यकृति विगड़ जावि तो उस 
भक्तेश्च निवर्तेत तस्यायुधाषटमासिकम्‌ 1 ६ ॥ की श्रायु राट महीने की दी समनी चाहिये ।६॥ 
$ 9 भतेत्‌ जिस मदप्य के पावकी ण्डीयातलुए का चि 
५ १ योम पाष्णयां पादस्याग्र च या भवत्‌) धूलि भें ्र्धित न हो वद. पुरुष सात महीने से 
, पांशफदमयोमध्ये स मासान्‌ स जीवति ॥७॥ त नहँ रंह सकता ॥9॥ गिद्ध.कवूतर, 
` ग्धः कपोतः ९ ९ उरलू, वाज्ञ अथवा काली चिद्या इनमे से 
पोष काकोल भायसो बापि ष नि। सी का गिर पर वैठना छः महीने की -श्चस्था 
कन्यादो वा खगो नीलः षणमासायुःपदशकः) ८ ॥ वतल्ञाता है ॥८॥ जिस श को कौशं शि) पंक्ति 
। उन्तीभि; पशष मारजाय रथव जिसके ऊपर धूलिकी चां अना- 
| हन्यते काकपडन्तीभिः पांशवरेण वा नरः । यास द्योजाय- अथवा जो श्रपनी ही छाया न 
¦ स्तां चायामन्यथा दृटा चतुःपश्च स जीवति ॥ & ॥| देख स ध (श त ध पा महीने 
: श्रनश्ध्र विदतं दृष्टा दक्षिणां दिशमाधिताम्‌। दि मै षिजली ० 
नः दिशा ग चमकती इह देखे अथवा राच्चिमे  .. 
रतराचिनद्रलुधापि ` जीर्ितं द्वित्रिमासिकम्‌ ॥१०॥| इन्द्रधनुष देसे वह दो या तीन महीने तक जीता ` 
: धते तले तथादरशे तोये बा नात्मनस्ततुम्‌.। | ॥१०॥ ओ मुष्य धी, वेल श्रथवा जल मे शरपना ` 
; यः परयेदशिरस्कां बा मासाद्य न जीवति॥११॥/ श्र विना शिर के देखे बह एक महीने वाद्‌ मरः. 
। यस्य बस्तसमो गन्धो ग्रे शबसमोऽपि वा} ` | आता दै ॥ ९६ दे राजन्‌ } जिस योगीं के शरीर, . 
न मे खत देह की सी दुर्गन्ध श्रातीद्यो उसका जीबन ` 
ध । * 


५ १ [कि ॥ 
^ ~-"-------~-^---. 

~ नश ~~~. 

न ४ 


1 


` श्र० ४१ माकणटेयपुराण. . १६३ 


। तस्यादध मासिकं ्ेयं योगिनो दप जीवितम्‌ ॥१२॥ भवल पन्द्रह दिन दी समभो ॥९२॥ खान करे. 
यस्य बै स्नातमाचस्य॒हादमवशुष्यते । | ५ ह ट 
५4 1 ॥ ५ - १ 
पिवतथ नलं शोपो दशाहं सोऽपि जीवति ॥१३॥ तक जीचित्त एता दै ॥९३॥ चाप से जिसके 
सम्मितो मारुतो यस्य मम्मस्थानानि छन्तति। | स्थानां 1 दयो तथाजल से ^ 
नामु्स ५ श्रवयव मालुमहो.उसकी सदय ज 
‡ हृष्यते नाम्बुसंस्पशात्‌ तस्य मृत्युरुपस्थितः 1 १४॥ द्र समनी चाहिये ॥ १४॥ जो मनुष्य स्वप्न 
ऋकष-बानरयानस्थो गायन्‌ यो दक्षिणां श्मपने को सों या वन्दरपर सखवार होकर « २ उ 
४ रयानस्यो गायन्‌ ौ दरिं विशय दक्षिण दिशा की श्नोर जाते हुए देखे उसफी `. 
सवम भ्रयाति तस्यापि न शृतः कालगृच्छति ॥१५।॥ तत्स समनी चादिये ॥ १५॥ ज भवुष्य.. ‹ 
गायन्ती मे यह देखे किं लाल श्रौर काले कपड़े पठने इ 
रष्णाम्बरथरा षती च यम्‌ । | सयां सती हुई उसो दिख विराम २. + 
दक्षिणाशां नयेन्नारी स्वप्ने साऽपि न जीवति ॥१६॥ है तो उसकी मृत्यु निकर दै ॥ १६॥ यदि स्वप्न 
४ कः ¡ महाबल कोई महा बलवान्‌ पुरुष नङ्गा, दजामत ` : « 
५ त सवणे हसमानं महाबलम्‌ । दृश्या, हसता हुश्ा नौर वकताटुश्या दिख दे ९ 
एकं संक्ष्य वसन्तं विदयान्मृद्युुपस्थितम्‌ ॥१७॥| समना चादिये कि मृत्यु भागं ॥१७॥ जो पुख 
आमस्तकतलाहयस्त॒ निमप्रं॑पङ्सागरे । | स्वप्न मे श्रपनेको शिर से पाव के तलुए तः 


- 4 | कीचड़ मँ सना हुश्रा देखे तो वह शीघ्र मरजाता 
खमन १ रसो मिते = ॥१८॥ ॥१य्॥ जो मबुष्य स्वप्न मे बाल, अङ्गारा, राख,साँ 
फेशाङ्गारांस्तथा भस्म भुजङ्गान्‌ निन्जलां नदीम्‌। | श्रथवा सूखी नदी देखे तो उसकी ग्यारह दिः 

मृत्युरेकादे मृत्यु हो जावेगी ॥ १६॥ जो मेष्य स्वप्न में शपः 
नि क = ६ ॥१६ । वात विकट, काले, दाथ मे हथियार लिरे 
: : करालिकटः हृष्ट,  पुरुपर्चताधपः । =| इण पुख्पो द्वारा पत्थरों से मारा इना देखे तो उर 
पापाशेस्तादिितः खपे सो मृत्यं समेन्नरः ॥२०॥| की सत्यु शीघ्र होती है ॥ २०॥ पर्यादय कै सम 
रय्योदये यस्य शिवा क्रोशन्ती याति सम्धुखम्‌। ५ सन्मुख व या व 
नेपरीतं सं हुई चली जाय तो उक्षकी मुत्यु जल्द | 
विपरीतं परीतं चा स सथो मृलयुृच्छति ॥२१॥| {जसको भोजन कर लेने पर भौ सुधा पाद्व कर 


यस्य वै भुक्तमात्रस्य हृदयं वाधते रुधा | | श्नौर जिसके क स धिसे.उसरक 
षध 4 मः श्ना समाप्त दयो चुकी इस संशय नी ॥२२५ 

ठ 5 ० जिसको दीपक की गन्ध न तीह श्रौर जो रात 
दीपगन्धं न यो वेत्ति ब्रस्यत्यद्वि तथा निशि। | श्नौर दिन डरता रटे श जो ध चाया को 
[ परनेवस्थं धीते गीवति दसरो के नेमे न देखे वद्‌ जीवित नहा एद 
नात्मानं परनेबस्य दीक्षतेनस ज ॥२२॥| दून २ जो श्रध रात कै समय इनदरथरप 
शक्रायुधश्चाद्धरत्रे दिवा ग्रहणं तथा। | श्नौर दिनमे तारागण देखेतो को सममना 
मन्येत संक्षीणएमाःः || चाहिये कि उसका जीवन त्तीए हो चुका दे ॥२४॥ 

टरा मन्येत संभीणमात्मनीवितमात्मनित्‌ ॥२४। विव अ चीना जाय 
नापिक्रा वक्रतामेति कणयानमनेान्नती । | श्रथवा वाये नेत्र से आख निकलते रद तो जानना 


नेत्र्च वामं स्रवति .यस्थ तस्यायुरदवतम्‌ ।२५॥ चादि कि श्रायु समाप्त हो चुकी दै ॥ २५॥ यदि 
आरक्ततामेति शसं निष्ठा बा श्यामतां यदा| | युख लाल शौर जिह काली जाय वे उलिमाय्‌ 

समभाना चादियेःकि उसकी शल्य निकट दी 
तदा ज्ञो बिनानीयान्कृतयुमासन्नमात्मनः ॥२९॥ आ पवी ॥ २६॥ जो मलय स््त म अपने को 
उष्ट-रासभयानेन यः. स्वप्ने दक्षिणां दिशम्‌ । | उड या गदे पर दिए दिशा को जाता इमा 


प्रयाति तंच जानीयात्‌ सचयोगृत्यं न संशयः ॥२७।॥ देखे तो जान ले कि उसकी सूल निस्संवेह्‌ शी 


१६४ पाकंण्ठेयपुराण  अ० ४३. 
होगी ॥२७] जो मघु्य अपने दीनों कान वन्द कर 
के च्रपनी ही ्ावाज्ञ न सुने तथा जिसकी श्रोँखों- 
की रोशनी जाती रहे चह भी जीचित नहीं रहता 
हे रन जो स्वप्न मे अपने को गर्त गिरा हश 
देखे रौर उखसे निकलने का मागे भी चन्द देसे 
तथा उस गड्ढे मँ से न उठे तो समभे कि उसके 
जीवन का अन्त श्रागया ॥२६॥ जिसकी दष्ट उलट , 
जाय ओर ते लाल-लालं होकर स्थिर न रै, 
भुख खे गमं श्वास निकले तथा नाभि खख जाय 
तो समभना चाषिये कि वह मयुष्य शरीर को 
छोडेगा ॥३०॥ जौ मनुष्य स्वप्न वे दि मे गिरे 
श्नौर उसमे से न निकले अथवा जल में इव ज्ञाय 
४ तो उसके जीवन का भी अन्त समना चाहिये ॥ 
स यृतयं सपरा्रनतु नरः भाोत्यसंशयम्‌ ॥२२ | जिसको दु भूत रान्न ्रथवा दिन ओँ मारं बह 

स्ववस्नममलं शुके रक्तं पश्यत्यथासितम्‌ । । पुरुष सातवीं राधि के श्रन्त मे निस्सन्देह मर 


यः पुमान्‌ गृर्युमासननं तस्यापि हि विनि जायगा ॥ ३२ ॥ जो सुप्य श्रपने निर्मल सफ़ेद 
 सखभाववेपरीत्यन्तु प्रकृते 6 कपड़ों को लाल या कलि देखे वह रत्यु के समीप 


रेथयन्ति मनुष्याणां सदासन्नौ यमान्तक ॥२४॥ 0 
येपां विनीतः सपतं येऽस्य पूज्यतमा सता ! | चाष्िये उसके पास यमदृत श्रापचे ॥ २४ ॥ जिन 
तानेव चावजानाति तानेष च चिनिन्द्ति ॥३५।]| म्या का विनीत दो रौर जो उसके पून्यतम हौं 
देवान्‌ नायते दान्‌ गुरून्‌ विमां निन्दति। ९००४ अ २ व प 
मातापित्रोनं स्तारं नामातृणां करोति च ॥३९॥ ज्नौर ह की निन्त र तथा त र 
योगिनां जानविदुषामन्येषाञ्च महात्मनाम्‌ ! | जमा का सत्कार न करे ॥ ३६॥ तथा योगिर्ो 
पपत ठ काते पुरुषस्तद्रितयं विचक्षरोः |२७॥|| शानि, परिडतों नौर महात्मानो का भी सत्कार 
योगिनां सततं यत्नादरि्न्यवलीपते | | न करे लो पसे र्य का समय भी श्ानी. लोग 
संवत्सरान्ते तज्जय फलदानि दिवानिशम्‌ ॥३८॥ 1 व 1 
षिलेक्या विशदा चैषां फलपंक्ति सभीषणखा। क्याकि यह दिन रानि श्रथवा वषं के शन्तम फल - 
विज्ञाय कार्यो मनसि स च कालो नरेश्वर ॥२९६॥॥| देते र पना हे ५ १ व 
9 वद्धा जख हष इसलि इकर कि अर कल 
111 
स्थाने जा 
इवारिष्टं तया योगी त्यक्त्वा मरणं भयम्‌ | | कर योगा करे जिससे उस काल का छफल उसको 
तत्स्वभाव तद्लिक्य काले यावल्युागतस्‌ ॥४१।॥ = दो 15 छिद को जातद्र ीर भरे क भव 
तस्य भागे तथेवाहो योगं यज्ञी योगवित्‌ | व 1 1 
१॥ उसके निमित्त 
¶्व।ह चापराहं च मध्याह चापि तदिने ॥४२॥ 
थन वा रजनीभागे तदरण्टं निरीक्षितम्‌ । 
तत्प ताबहूयुजाति यावत्‌ मां हि तदिनम्‌ ॥४२॥ 
ततस्त्यक्त्वा भयं सव्वं जित्वा तं कलमात्मवान्‌। 


पिधाय कणी निर्घोषं न शृणोत्यात्मसम्भवेम्‌ । 
। नश्यते चषुषोज्योतियस्य सोऽपि न जीवति ॥२८॥ 
पतता यस्य वै गत्ते स्वप्ने हारं पिषीयते । 
¦ न चोत्तिष्ठति यः श्रभ्रात्‌ तदन्तं पस्य जीपितम्‌२६!' 
उर्ध्वा च ष्टि च सम्भिष्ठा रक्ता पुनः 
` संपरिवततंमाना । सुखस्य चेष्मा शुषिरं नाभेः 
शंसन्ति पुंसमिपरं शरीरम्‌ ॥२०॥ “ˆ 
स्यप्नेऽं परविशेदुयस्तु स चनिष्केमते पुनः 
जलपवेशादपि वा तदन्तं तस्य नीषितम्‌ ॥२१॥ 
यश्चामिहन्यते दष्टभतेरत्रावथो दिवा। 


उसी दिन पूवा, अपरह श्नौरभभ्याहमे येग करे 

॥ ४२॥ ओर-यदि वद अरिष्ट रात्रिम टता दिखाहै 

दे ते जव तक वद दिन शरावे उसके पिले दी 
.योग करे ।४ इसके अनन्तर खव भय को त्याग 

कर उस काल के जेते ओर उसी स्थानम चथवां 


. अर ४ माकंरुटेयपुराण `  ,१६१ 


तग्रेवावसथे स्थित्वा यत्र षा स्थैय्येमात्मनः ॥४४।॥ इरे स्थान मे अपने मन क स्थिर करके रके ॥ 


न्नीव योगं शु को जीत कर याग करे श्नौर परमात्मा 
जीत योगं निर्नत्य त्रीन्‌ गुणान्‌ प्रमात्मनि। मे मन लगाकर चैतन्य वृत्ति को भी छोड़ दे ॥५५॥ 


तन्मयशात्मना भूत्वा विदृत्तिमपि सन्त्यनेत।।४५॥| इसपर वह योगी इन्दो से शोच श्र वुद्धि 
ततः  प्रमनिव्वांणमतीन्दियमगोचरग्‌ । | से परे जो परम निरवाणपद है उसको पाता है ॥४६॥ 
यदुद्ध यैन चाख्यातं शाक्यते तत्‌ समश्रुते ॥४६।॥ दे श्रज्लक ! हमने ये खव तुमसे यथार्थं रूपसे का 


नि 1 श्रव जिस तरह योगी को बह्म प्रप्त ह्येता है बह 
एतत्‌ न्वं समास्या तबालकं यथायै्‌ | अनो यो व शतान त 
भ्रापस्यसे येन तदुत्रहम संमेपात्‌ तनिवोध मे ॥४७\॥| कान्त मणि जल चडती है शरीर यदि किरं न 


शशाङ्कररिमि संयोगाघन्द्रकान्त्मणिः पयः । लगे ते नदी, इसी प्रकार यगिथोँ की ईपमा है ॥ 
सथुवरजति नायुक्तः सोपमा योगिनः स्पृता ॥४८॥ सयकान्त मशि सूर्य के लगने से श्रभ्नि उत्पन्न 


यचादररिम संयोगाद्॑कानतो इताशनम्‌ । करती है श्रौर न लगनेसे नही"यही उपमां योगियों 
करर „| के लिये भी है॥ ४६॥ जिस भकार चीरी, चूहा, 
आविष्करोति नैक; सन्ुपमा सापि योगिनः॥४६)। नेवला, विपकली श्नीर कपिञ्चल धर भे उसके 


पिपीतिकायु-नङल-हगीधा-कपिञ्चलाः । | स्वामी के दी समान रहते ह परन्तु उस धरके नष्ट 
वसन्ति सखामिवदेहे ध्वस्ते यान्ति ततोऽन्यतः ५०॥| चट दे जाने पर दूसमे चलति जाते है ॥५०॥ परन्तु 
। तपा जिसप्रकार उस्र धरके स्वामीको उसके दरटनेकाद्ुःख 
दुःखन्त॒ स्वामिनो ध्वंसे तस्य तेपां न कश्चन । | हयताहै उस भकार उनकोनदीं, इसी अकारे राजन्‌ | 
वेश्मनो यत्र राभेन्छ सोऽपमा योगसिद्धये ॥५१॥ त 1 ॥ चो 
्रहिकार प्यणीयसा शरीर बाली चीरी पने सुख  छम्रभाग 
पदापि ृलमेणान्यशीयवा 1 | से मिद का देर दइकट्धा करती हई मानों धामी कौ 
{केति गरद्ारचयदुपदेशः स योगिनः ॥५२॥ ज करदी हे ॥ ५२॥ यी भरम 
| -अरप्याच पत्र-पष्य- श्रादिक जिस तरद पत्ता, ठ फलसि युक्त 
प्तितुषयाध ; प्रप व व डालते है ८ देकर 
क्षं बिदयुप्यमानन्तु दष्ट सिध्यन्ति योगिनः ॥१२॥ यो 1 सिद्ध करना चाद्ये ॥५२॥ जिस्‌ 
स मकार दरिया के जे के सीगकी नोक पदे तिल 
रुरुशायविषाणाग्रमालक्ष्य॒ तिल्तकाकृतिम्‌ । | के समान वि की है ह 
९ सिद्धिमवाप्न साथ बदृती हैँ उसी प्रकार धीरे-धीरे योगी 

सह तेन बियद्ध न योगी ए“ के] रात फर ॥ ५४ ॥ जल से पूणो पात्र को शिर पर 
्रूरपादाय पात्रमारोहता शवः । | रखकर यदि कोई ध र पा 
 वितताकयोधैर्िहातं को ऊचा देखकर गमे ऊवा 

तङ्गमङ्ग ्र्वितनातं किं न योगिना ॥५५॥ वो 


सर्वस्वे जीवनायात्तं निखाते पुरूपस्य या। | बस्त निकाली जाती दै पुरुष का चित्त उसी में 
लगा रहता है, इसका तपूवक समभनाही थोगी 


(वे तं तत्तत जञाला योगिनः कत्तयता॥५६॥ की छतङृ्यता है ॥ ५९॥ षर वह है जिस प्य ` ` 
तदगृहं यग्र॒ वसतिस्तदधो्यं येन जीवति | | र्दे भोजन बं दै जिससे वह जीवितष् शौर घन्‌ ।, 


स्त ¡ ममताव ७।।| बह है जिससे खख हद फिर ममता करनेसे क्या? , 
येन सम्पयते चाथस्तत्‌ सुसं ममताव का १५१ ॥ ५७॥ जिद प्रकार वुद्धिमान्‌. जाग वाधोश्रों के 


परभ्यमिताऽपि.वैः काय्यं करोति कररैर्थेथा। | उपस्थित होने पर मी उम के नटीं चते इसी “ 
ध इदादिभियोनी पल प्रकार इन्द्ध के जीतकर थेगी लोग योग-साधन + 

` तथा बुद्धधादिभिर्योगी पारक्यः साधयेत्‌ परम्‌॥५८। | करते है ॥ ५८॥ न 
^ 9 जड़ उवाच । जड़ ( खमति ) बोले & व 
` तपत ` प्रणम्यात्रिुत्रमलकंः स॒ महीपति; । इब न्तं राजा श्रलकं दत्तानेयजी को - 


न= ~ 


ह) 


१६६ ` 


वाक्यमुदाचातिषदान्वित 
मलक उवाच 


दिष्टया दैवैरिदं व्रह्मन्‌ परामिमेवसम्भ्वम्‌ । 
उपपादितमस्युग्रं प्राणसन्देहं मयम्‌ ॥&०। 
दिष्ट्या काशिपतेभूरिवलसस्पत्परक्रसः । 


प्रश्रयावनता 


माकंर्डेयपुराण 


-श्० ४ 


11४६५ भराम कर हर्षं से विनय पूर्वक वचन वो ॥५६॥ 


च्ल वेले- 

हे भगवन्‌ ! मेरे भाग्य धन्यै किं ओ पुमे 
शति उग्र पाणो को भय देने बाला सन्देह उत्पन्न 
हइ ॥ ६० ॥ काशिराज का भ्रचुर वल्ल, सम्प 
श्रौर पराक्रम धन्य है कि जिससे कष्ट पाकरमें 


यद्च्छेदादिहायातः स युष्मतसङ्गदो मम ॥६१॥| यदं या श्रौर यापसे सत्सङ्ग हा ॥ ६९ ॥ मेरा- 


दिष्टया मन्दवलथाहं दिष्टया भृत्याश्च मे हताः 


चल धटेना, सेना श्रौर सेचको का मास जाना.कोप 
का स्तीर होना, नौर मुभ्छका भय देना ये सव 


दिष्व्या कोषः क्षयं याते दिष्व्याहं मीतिसागतः&२।॥| कल्यारकारी दी इए ॥६२॥ ये कितनी कट्याणएमयी 


दिष्य्या लत्पादयुग्तं भम ॒स्ृतिपथं गतम्‌. 


घटना है कि श्रापके चरण युगल मेरे स्यति : परल ` 
्द्धित होगये त्नौर आपने जा कुद. कटा बह 


दिष्व्या लटुक्तः स्वां मम चेतसि संस्थिता५|)६२।॥ मेरे चिच्च मे वेड गया ॥ ६३ श्रापके समागमः से 


दिष्व्या ज्ञानं ममोत्पननं मबतशच समागमात्‌ । 


जो ज्ञान सुभे द्रा तथा हे ब्रह्मन्‌ [-श्रापने जा मेरे 


भवता चैव कारुण्यं दिष्व्या ब्रह्मन्‌ कृतं मम ॥६४।॥| ऊपर कर्णा की चह. धन्य है ॥ ६४॥ पुरुष के 


` श्रनर्थोऽप्य्थतां याति पुरुषस्य शमादय । 
यथेदष्ुपकाराय व्यसनं सङ्गमात्‌. तष ॥६५॥ 
सुबाहृर्पकारी मे सु च काशिपतिः प्रभो । 
ययोः तेऽहं सम्पाको योगीश भवताऽन्तिकभ्‌)६६॥। 
सोऽहं तव॒ पसादाधि-निदग्धाङ्नानकिल्विषः 
तथा यतिष्ये येनेदृडन भूयां दुःखभाजनम्‌ ॥६७।। 
परित्यजिष्ये भाहस्थ्यमार्तिपाद्पकाननम्‌ । 
त्वत्तोऽहं समासाद्य ज्ञानदातुमेहात्मनः ॥६८॥ 
† दत्ताय उवघल्व 
गच्छ राजेन्द्र भद्रं ते यथा ते कथितं मया। 
मिम्म॑मो निरहङ्कारस्तथा . चर॒विघुक्तये ॥६६।. 
जड़ उवाच 
एवुक्तः प्रणम्येनमानगामत्रान्वितः | 
यत्र काशिपतिभ्राता सुबाहुस्य सोऽन ।७०॥ 
ुपेत्य महाबाहु सोऽलफः काशिभपतिम्‌ | 
सुवाहोरग्रतो वीरणुवाच प्रहसन्निव । ७१ 
[ज्यका काशीश भुज्यतां राज्यमूर्िजतम्‌। 


यथा वा रोचते तदत्‌ सवाह सम्पयस्यं वा॥७२॥ 
काशिराज उवाच 


फिमलक परित्यक्तं राज्यं ते संयुगं भिना । 


्षत्रियस्य न धर्म्मोभ्यं भवांश क्ष्रधम्मैषित्‌ ॥७३ 


निञ्जिततामात्यवगस्तु त्यक्तवा मरणजं भयम्‌ । 


०० 


~~ ~~ ५ ~ ० 


श्य दिन आने पर न्थ मी कल्याणकारी दोजाता 
हे जिस तरह कि आपके सङ्ग से दुख भी मेरे 
उपकार का कारण हुश्मा ॥६५॥ सुवा श्रौर काशि 

राज भी मेरे उपकारी हए कि जिनके कारण, मँ 
श्राप जसे योगीश्वर के पास श्राया ॥ ६६॥ श्रापकी 
छपा रूपी अच्चि से मेरा शरज्ञानरूपी पाप जल गया, 


“छव मे बही यन्लः करू गा कि जिससे फिर श्य तरह 


दुःख का भागी न वन्‌ ६9 श्राप जसे ज्ञान देने 
वाले महात्मा से राज्ञा लेकर गरहस्थरूषी बन को 
जा डुःखरूपी वृतो से पशं है केगा ॥६२॥ 
दत्तात्रेय चेले 

हे राजन्‌ ! जाश्मो, तम्दाया कल्याण हा । जिस 
तरह मेने तुमको वंताया है निरदङ्कार श्रौर निर्मम 
रहकर मुक्ति के लिए प्रयल्ल करो ॥ ६६ ॥ 
जङ्‌ ( मति ) वोले- ` ` 

यह कहे जाने पर उनके अरखाम करके राजा 
अलक जहाँ काशिराज श्रौर वड़े भह सखुवाहु थे 
वहां शी पडुचे ॥ ७०॥ श्नौर काशी सरेण के पाख 
पचर अलक खुवाड़.के सामने दते हणः उनसे 
वेले ॥ ७१ ॥ हे राज्य के इच्छुक काशीनरेश ¡ जीते 


इए इस रज्य के शव तुम मगो अथवा यदि 
ठम्दारी इच्छा हो तो छबाहु के देदे ॥७२॥ 
काशियज वेले 

यह राज्य तुमने विना युद करिये क्यों छाडा, 
यह च्जिय-धर्म नदीं है । श्राप ते त्षजियधमं के 
जानने वाले हैँ ॥७२॥ सेना के. हारते पर मरते का 


भय छाड़करः राजा स्वयं धयुष वाण लेकर वैरी के 


~-------~-~ ~~---~------------- 


(श्रं ०-४३ ५ भाकण्टेयपुराण ~ १६७ 


सन्दथीत शरं राना रकष्युदिश्य वैरिणम्‌ ॥७४॥| सन्धुल च्ाते है \ ७४ ॥ उ शरी. का. जीतकर 
तं जित्वा दपतिर्भोगान्‌ यथाभिलपितान्‌ षरान्‌। | थे सगो का जागते है शौर परम सिद्धिकरे लिय 


| भञ्जी परमं सिद्ध्ये यजेत च महामसेः ।।७५ ॥ जञ रादि भी करते है ॥७५॥ 


श्रलकं उवाच । श्रलकं वोले- 
एवमीदृशफं वीर ममाप्यासीन्मनः पुरा । हे बीर ¡ जख तुम कष्ते हे मेरा पिते वैखा ` 


° मयत विपरीतारथ भृगु चाप्यत्र ` कारणम्‌ ॥७६, | दी मन था पनु श्रव विपरीत दगया दै, सका 


कश्ररण ८ 
यथायं भौतिकः सस्वथान्तःकरणं दरणम्‌ । ह मल क = च 


गुणास्तु. सकलास्त्दधेषेणेव  भन्तषु ॥७७॥| अं म य मी है 1 ७७॥ परलतु उनम धुर 
चिच्यक्तिरे एवायं यदा नान्योऽस्ति कथन । | णक ही है श्नौर जव वहे पक दीह त हे काशि- 
तदा फा एते जञानानिाप्रारियु-भृत्यता ॥७८॥ राज | फिर मित, शतु, स्वामी ज्र सेनक क्या ! 


तन्या ` दुःखमासाद्य लद्वयोद्भवषु्मम्‌। | ॥५८॥ दै नरेश । तदार भयः से भँ दुःख. पाकर 
दततात्रेयपसादेन ज्ञानं पराप्तं नरेश्यर ।।७६। दचत्ेयजी पास गा शरोर उनकी कपास गह 
नितिन सवपा द्मः कान मुभे पाप्त हु्ा ॥ ७६॥ मेने सव सङ्गका छेड़ 

९ क्गमगेपतः । | कर श्मौर इन्द्रियों के जीतकर . ्रपने मनक बह्म 
मनो ब्रह्मि सन्धाय तज्जय परमो जयः ॥८०॥ लगाया है रौर यदी उक्तम व्रिजय है ॥८०॥ उसी 


संसाध्यमन्यत्‌ तस्िद्ध्ये यतः किथिन्न वियते । ४ केलि 1 शीर ० 
यह्‌ साधना ह । इ कणु सयमक प 
40 त प (1 ९॥ सिद्धि प्रप हेती है ॥ ८१॥ रतः तै तुम्हारा श्रौरः 
अं भ वेऽरिनं ममासि शत्रुः छुबाहुरेषो न | तुम भेर शतु नहीं दो शौर ये छुवाह भी मेरा श्रपः 
पमापकारी । एः मया सव्यंमिदं यथाव- | कारी नदीं दै । म इस सवको यथाथ रूपसे देखता 
दन्विष्यतां भृप रिपुत्वयान्यः ॥८२॥ 3 त क दूसराशु 
इयं स नाभितो मरोः समु्याय | चार भर हकर वोर शय ईव तरद 
हस तर्द 

ततः साहु । दिष्ट्येति तं भ्रातरमाभिनन्य | भाई का शरभिनन्दन करके काशौ नरेश के भनि 


काशीश्वरं वाक्यमिदं वभापे ॥८२॥ । | कदने लगा ॥ ८३॥ 
इति श्रीमाकंण्डयपुराणमे अरिषटकथन नास ४२ अ० समप । 
६ ख बद्ध 
` चोवालीसवां अध्याय 
छवाहुरुबाच . | छव वेलि 


ह राजन्‌ ! जिस राशय के लिपट मै ्रापकी 
यदं पादू, मं ॒शरणं मतः| | मामा था बड पूरो, व मा 
तन्मया सकलं भाप यास्यामि त्वं युखी भव ॥ १॥ ह श्राप छली दं 

काशियज उवाच काशिराज चेले 


हे सुबाहु ¡ किंस किये श्चाप मेरे पासं भधि थे 
किं निमित्तं भान्‌ पापतो निष्य्ोऽ्यध करव । ठ 


एवाहो. तन्ममाचक्षच पर कौतृहतं हि मे.॥ २॥ जो, ये बड तदल ह ॥ २॥ पदिते आपन 
समाक्रान्तमस्फैण . पित्पतामहं महद्‌ । सुभसे कटा था कि लकं ने मेरे बार्प्दादे फां 
राण्य देहीति निर्जित्य चयाहसमिदोदितः ॥ ॥ राज्य हङ्प करिया दै उसे जीतकर भ्ुभे दो 1२ 


' प्रकाश्यं मनसो गीतास्ते भात्रा नास्य पार्थ्‌ ८ । 


: ततो समया समाक्रम्य राज्यमस्पाचुजस्य ते । 


` भ्राता समायं ग्राम्येषु शक्तो भोगेषु तत्तषित्‌। 


१६८ माक॑रडेयषुराण - - अ०.४४ 


इसपर मैने तुम्हारे छोटे भाई से राज्य जीतकर 
श्रपने वशम किया अव तुम से लो. शरीर भोगो ॥ 
खुबाह वोले-- . ` ` प, ५ 
. हे काशिराज ! . जिस कारण यह उद्यमं 
करिया श्नीर आपसे कराया उसे.सुनिये ॥ ५॥ यद 
मेरा छोटा माई अलक जो तत्वज्ञ है ` सांसारिक 
भोगों म आसक्त होरा था । मेरे दो वडेभाई भी. 
पदिले मूख थे लेकिन पीये उनको वोध इश्मा ॥ द॥ 
हे राजन्‌ !.उन दोर्नोको तथामुफको माताने वाल्या ` 
चस्था सरे जव हम स्तन का दूध पीतेथे श्रौर कानों 
से चात सम्रमने लगे, उपदेश किया ॥७॥ उनदोनों 
ने श्र मेने वट पदाथ भासं किया ` जिसको सव 
कोह नहीं जानते ह नौर जिससे हृदय मे भका 
दोताहे परम्ु यह वात अ्रलकको न इई ॥॥ जिस 
भकार खाशुञरों को धन से खख की प्राति नहीं 
दोती उसी भकार हे राजन्‌ ! मको भी.धनसे दुख 
होता दै ॥६॥ हे राजन ! इस देह के सस्वन्धरूप 
भाई मे स्थित श्रारमा गृहस्थ के मोद मे रपस करं 
दुख पाता था ॥१०] इस पर मैने यह निश्चय करे 
कि इसको दुभ से वैराग्य करी भावना दोगी श्राप 
से उद्योग कराया ॥११॥ हे राजन्‌ ! ईको दुःख से 
्ान श्रौर ज्ञान से वैराग्य डा ¦ म इसी कार्य के ) 
लिये आपके पास आया .था श्नौर बह पूरा होगया 
अव ्रापका कल्याणो मे जाता हँ ॥१२॥ मदालसा ` 
के गभ मे रहकर ओर उसका दूध पीकर जिससे 
दुसरी खीका पत्र न हो वंह उपाय करना चाहता 
हं ॥९३॥ मे यह विचार कर यहाँ चाया जो । 
आपके श्राश्रय से पूणं हा अव मैं योगकी सिद्धि 
के लिये जाता द्व ॥ १४॥ हे राजम्‌ ¡ जो लोग 
सजनो, वान्धवों ओर मि्ोको उनके द्मे छोड 
दते है उनको मै खली नदीं समता हं रौर उन 
की इम्दियां सदैव विकल रती है ॥ १५॥ स्वजनों 
मिं श्रौर भाईै-बन्धुश्रों के खी होते इए जो 
मुष्य स्वयं डुःखी है उसी को धर्म, श्रथ, काम. ~ 
ओर मोत सिध दोते है उनको नदीं जो सुखी े॥ ` 
हे राजन्‌ ! आपके संसग से ने यद महान्‌ कार्यः 
करिया, आपका कल्याण हो, मै जाता ह ! अप भी 
आत्मक्ानी दो जायो ॥ १७॥ त 
काशिराज वोले- ` 
हे साधु ¡ तुमने अलक का तोःवड्ा उपकार 
किया परन्तु मेरे उपकार ॐ निमित्त छव मन क्यों 
` नदीं लगाते टो ॥ ९२ साधुशरों की सङ्गति मयुरष्यो- 


एतद्‌ ते वशमानीतं तदरश्च सकुलोचितम्‌॥ ४॥ 
खवाहुरुवाच 

काशिराज निवोध तं यदर्थमयञुचमः ] 

कृतो पया भवांवैव कारितोऽत्यन्तमुयमम्‌ ॥ ५। 


पिमूष्ौ वोधवन्तौ च भ्रातरावग्रनौ भम ॥ ६॥ 
तवोमेम च यन्मात्रा वारये स्तन्यं यथा मुखे । 

तथाववोधो विन्यस्तः कणंयोरवनीपएते ॥ ७॥ 
तयोर्मम च विहयाः षदाथां ये मता वभिः, 


यथैकसार्थयातानामेकस्सिननवसीदति | 
दुःखं भवति साधूनां तथास्माकं महीपते ॥ ६ ॥ 
गाहंस्थयमोहमापनने सीदत्यस्मिन्‌ नरेश्वर । 
सन्वन्धिन्यस्य देहस्य विभति भ्राठकस्पनाम्‌।१०॥ 
ततो. मया विनिधित्य दुःखादराग्यमावना | 
भविष्यतीत्यस्य भवानित्युदृयोगाय संभितः ।११॥ 
तदस्य दुःखाद्धेम्यं सम्बोधादवनीपते | 
सषठदभूतं कृतं काय्य भद्रं तेऽस्तु बनाम्यहम्‌ ॥१२॥ 
उष्ट्र मदालसागभे पीत्वा तस्यास्तथा स्तनम्‌ । 
नान्यनारीसुतेयातं षत्म॑यािति पार्थिव ॥१३।. 
विचाय्यं तन्मया सव्वं युष्पतसंभयपू्वकम्‌ । 
छृतं तच्चापि निष्ननं भयास्ये सिद्धये पुनः ॥१४॥ 
उगेक्यते सीदमानः स्वननो वान्धवः सुहृत । 
यैनरन्र न तान्‌ मन्ये सेन्द्रा पिकला हि ते॥ १५. 
सदि स्वने बन्धौ समर्थे योऽसीदति ! - 
धम्माथ-काम-मोकेभ्यो वाच्यास्ते तत्र न त्वसौ|१६ 
एतत्‌ लत्सङ्गमाद्‌मूप मया काय्यं महद्‌ कृतम्‌ । 
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि क्ञानभाग्भव सत्तम ॥१७॥ 
ि काशिज्ञ उवाच ` ` 
उपकारस्त्वया साधोरलकस्य तो महान्‌। 
: ५ ^. कयं न करोषि समानसम्‌ ॥१८॥ 


"व न् ---~*“-~~-- ~---- - ~. 


भ व २. 


५“ ४ 


फलदायी सतां सद्भिः सङ्गमो नाफलो यतः} 


, अ्नात्मन्पात्मनिह्नानमस्व स्वमिति महता | 
` भोऽ से्व्वगतो भूष ` लोकसंग्यवहारतः । 


“०.४४ २२ माकंरुटेयपुसण | १६६ 


॥ खदा एल देने बाली दोतीदै, बद कभी ˆ 
नहीं दोती इसलिये श्रापकी छपा से मेरी 
उन्नति इदं ॥ १६॥ प. 


तस्मात्‌ त्वत्संभ्रयाहयुक्ता मया भाक्ता सएु्रतिः।१६॥ 
खुबाइख्वाच 


क रोर भोक्त यदी ५ 
काममोक्षाख्यं । धम, छथःकाम 
धम्माभैकाममोक्षारु पुरुपाथैचतुष्टयम्‌ | धम्‌? अश्काम्‌ अर मातत यद्य चार्‌ पुरपाथं 


है जिनमें ध्म, अथ श्रीर्‌ काम 'तो श्रापके ह दी, 


(. तत्र धर्मार्थैकामास्ते घकला हीयतेऽपरः ॥२०॥| परन्ठ मोच नदीं दै॥ २०॥ उखको भी मे संमैपं मेँ 
तत्‌ ते संतो प्ये तदिहैकमनाः श्रु । 


कहता हः राप ५ चित्त होकर निये । उस 

| अ . | को सुनकर शौर आलोचना.करफे ्रपने, कल्याण 
श्रुत्वा च सम्यगालोच्य यतेथाः श्रेयसे दप ॥२१॥| के लिये यत्न कीजिये ॥२९॥ हे राजन्‌ ¡ भै हँ या 
ममेति भत्ययो भूषन का््योऽ्मिति सया । मी आम = ह मम न च 
सम्यगालोच्यधरमम्मो हि धम्मांमावे निराश्रयः॥२२॥|-ीन दो जाता दै ॥ ॥ भ कोन न जान 
पस्याहमिति संरेयमित्यासोच्य कर वादरः ओर भीतर जो ्रात्मा है उसको 
कस्य मि पमित्यालोच्य स्यात्न । ले ववो निव यासि स 
बाह्यान्तगतमालोच्यमालोच्यापररा्रिंए ॥२३॥ भ देखते ह ५ ॥ उस श्रा स जिसका 
जजर -तमविकारमवेतनम्‌ श्रादि, मध्य चौरः चन्त अव्यक्त है, जो चिकार 
व्यक्तादिषिरोन्तमटि ॥ व अ ल अन्य वथा है,जो व्यक्त श्रौर अव्यक्त तथा मै कीन 
व्यक्ताज्यक्त त्वया ज्ञेयं ज्ञाता कश्वाहमित्युत ॥२४॥॥| ह यं भी समो ॥२०॥ परी आप 
एतसिनने ५ मसिल्लं त्वया यह सममः सी कि लोकि दयापे सव छुच् जानलिया, जो 
र विन्ञाते .. विन्नात त्वया । र स तो प ३ जो 
किसी को नद्रौदै उसे अपना कदना-मूखतादै-॥ 
र द साती । घं मे स्ेव्यापी ह लेकिन _ लौकिक 
त ९ व्यवहारं सं भा पृच्धने पर यद सव मेने कहा, 
मयेदणुच्यते सव्वं त्वया पृष्टो त्रनाम्यहम्‌ ॥२६।|.श्नव म जाता ह ॥ २६॥ काशी नरेश से एस भकार 
एवमुक्त्वा ययौ धीमान्‌ सुबाहुः काशिभूमिपम्‌। | केकर विद्वान्‌ खवा चले गे शरीर कािराजमी 
५ तत्य त ययौ श्रलर्द का सस्भान कर्के पने नगरको गये ॥२७॥ 
काशिरानोऽपि सम्पूज्य सोऽलक स्वषुरं पयो॥२७॥॥ श्रलक भी अपने व्ये पुतन का राज्याभिषेक करके 
शरलरकोऽपि सुतं ज्येष्ठमभिपिच्य नराधिपम्‌ । इनि क चोड कर आत्मसिद्धि के सिये 
ह कं ८ वनको चल्ञे गये ॥ २८॥ फिर ब्र श्रलकं वृहुत काल 
चनं जगाम सन्त्यक्तव्वसङ्गः स्वसिद्धये ॥२८॥| तका निथिन्त शौर अवाध योरा करके अवल ऋद्धि 
ततः कालेन महता निन्द्यो निष्पसिगरहः। | को भ्रपत कर परम निर्वाण पद्‌ को परहवे ॥ २६॥ 

भाष्य योगद्धिमतुलतं परं मिव्यांणमा्ठवान्‌ ॥२६॥| देवता, श रीर 1 यती क 

; स्व॑ सदेवाुरमादुषम्‌ देखकर फि यदह गुणरूपी पाशीसे बधा र 

पररयन्‌ जगदिदं सव्वं सदे । न 


पारोगौएमयेवदधं॑वध्यमानश्च नित्यशः ॥३०॥ वरो क मोद मे डिल होकर इन्र ` 


ुत्ादिभरादपतरादि-घवपारकयादिभावितेः । | समान शरातं रती , दै ॥३१॥ शौर लोग 

श्ाृष्यमाणं करणैर्ुःखाच्तं भिबरदशंनम्‌ ॥२१॥| शरह्ञानरूयी कीच फंसे हुयं कि जिससे उद्धार ` 

्र्ञानपङ्कगर्भस्थमनुद्धारं महामतिः । | दोना कठिन दे तथा श्पने को उससे निकला दुरा 
र ख देखकर उन्टोने यद गीत गाया ॥३य्‌ हमारी पदिते . 


श्रामानश्च स्त्तीणं गाथामेतोमगायत । ३२॥ द स्थति यी बट्‌ कितनी कमय थी । ` 
अहो कष्टं यदस्माभिः पूल्वं राज्यमदुष्ठितम्‌। | ममे पीक कषान इश्ा कि योग की ्रपेता कोई 


इति प्थान्मया जातं योगा्रासति-परं सुखम्‌॥३३॥ दुख खल नदी ५२५। 


१७० । माकेण्डेयपुराण -अन्४१ 


जड़ उनाच , - ` 1 जङ्‌ ( छमति ) बोलते . . .  - 


„| उत्तम योगा को करो जिससे कि ब्रह्मकी पर्षि दो, 
भराप्स्यसे येन तद्य यत्र गत्वा न शोचसि ॥२४॥ उसको पाकर श्रापको कोई शोक न होगा ॥ ३९॥ 


ततोऽ्हमपि यास्यामि किं यत्त; किं जपेन मे। | अव म भी यय ४1 समे . यज्ञ र जप 2 

+ ` कया ‹ इतङ्ृत्य का चह करना चाहं = । 

छृतछ्यस्य करण , क व । नह्य की भि हो ॥ ३५॥ आपकी क्षा लेकरमे 
त्तो्ङामवाप्याहं निद नदो. निष्परिग्रहः । | निच्िन् श्र चाधा रित दोकर सक्ति के सिये 
प्रयतिष्ये तथा शक्तो यथा यास्यामि निषतिम्‌॥२६। चेष्टा कर भा जिखसे कि निदत्त को आप्त होऊं ॥ 
पक्ठिण उचुः पत्ती योले-- ` व 

एवयुक्तवा स पितरं प्राप्यानुज्ञां ततश्च सः हे जेमिनिजी { जड़ अपने पिता से यह कष्टकर 

+ श्मौर उनकी श्नाज्ञा प्राप्त कर सांसारिक बन्धन को 

त्रहयन्‌ जगाम मेधावी परित्यक्तपरिग्रहः ॥२७॥ | छोड़ यनको चलागया ॥२०॥ उसका महाुद्धिमान्‌ 


सोपि तस्य पिता तदद्‌ कमेण सुमहामति; । | पिता भी उसी तरह करम से वारपरस्थ आरा्रम मे 


ध ~ „| पर्टचकर श्नौर वादे इसमे चौथे श्रानम प्राह 
बानमस्थं समास्थाय चाभममभ्यगत्‌ ॥६८॥|॥ ६८ ॥ बढ मदन बह्म श्रपने पुसे शान भ 
तत्रात्मजं समासाय हित्वा बन्धं गुणादिकम्‌। | कर ओौर सुण श्रादिक चन्धनों को त्यागकर `परय 
भाप सिद्धि परां प्हस्तत्कालोपात्तसम्मति ॥२६।|| सिद्धि १ ॥ ३६॥ व जो 

+ „ . | ङं ्रापने हमसे पा चह दमन वस्तार पूर्तक 
एतत्‌ ते कथितं महान्‌ यतपष्ठा भवता वयम्‌ ।* | थारथरपे पको बताया, अरव आप श्र क्या 
विस्तरं यथावश्च ` किमन्यच्छोतुमिच्छसि ॥४०॥॥ खनने की इच्छा करते है १॥४८०॥ 


इति श्रीमाकंशदेय०.मँ पितारं संवादम जदरोपाख्यान नाम ४्वाँ अ० समास्‌ । 


~र ` 

पैतालीसवों अध्याय 
1 जैमिनिरुवाच - 1 जैमिनि बोे- । क 
 सम्यगेतन्ममास्यातं भवद्विर्दिजसत्तमाः। . ्े शरेष्ठ पत्तियो ! श्रापने प्रच्ति` श्रौर निचत्ति 


भत्ति निषतति द्विविधं कम्प॒॑वैदिकम्‌ । १।|| शीषर दोनों वैदिकः कमे मली मांति सुमे कदे ॥ 
अहो पितृथसादेन भवतां ज्ञानमीदशम्‌ । | भहा ! पिताकी रुपा से श्रापको इतना ज्ञान प्राप्त 
येन िर्यैक््मप्यतत्‌ माप्य भोदस्तिरस्छृतः॥ २॥| इ कि पकि-योनि मे सी ्रापने मोह को त्यागा 
घन्या भवन्तः संसिद्ध्यै मागवस्यास्यितं यतः | | > ॥॥ अपक च्य ९ जो. पदि असी 
। ४ = विषयादभतेन मोर वस्था मे अव भी स्थित हो, आपका मन विपर्यो 
भवतां भु शार्यते मनः ॥ ३॥॥| से उत्पन्न मोद से चलायमान मीं होता ॥ रद 


, दिष्टया भगवता तन माक॑रडेयेन धीमता | मेरा भाग्य धन्य है कि जो विद्धान्‌ माकीरडेयजी ने 


४ 


, भवन्तो वै समाख्याताः सव्वैसन्देहह्तमाः ॥ ४.।॥| मेरा खन्देह छुडाने के लिये ्रापको वताया ॥४॥ 


संसारेऽस्मिन्‌  सलुष्याणां भ्रमतामतिसङ्कटे ।. | षस संसार म जो सङ्कट भे पड़. इष मदुप्यौसे पूरौ 
भवद्विधः ससं सङ्घो जायते न तपखिनाम्‌ । ४ ॥ है श्राप सरीखोंकां सत्सङ्ग तपरस्वि्योको भी दुलभ 


; यद्यहं सङ्गमासाद भवद्वि्ानदष्टिभि; । | है 1५॥ यदि जै श्राप जैसे क्षानि्यो के सत्सङ्क से 
: न स्यां ढृतार्यस्तन्नूनं न मेऽन्यत्र छृतार्थता ॥ ६॥| सी छतां न होड गा तो किर सुमे कद कृतार्थता 
प्रहत च निरृते च भवतां ज्ञानकम्मेशि | / मिलेगी १ ॥६॥ भदृतति, निवृत्ति तथा जानकर म 


. श्र० ४१ | माकेर्टेयपुराण १७१ 


मतिमस्तमलां मन्ये यथा नान्यस्य कस्यचित्‌.। ७। जेसी निल ्रापकी भति दै वैसी किसी दूसरे की 
यदि त्वसुग्रहती मयि बुदधिर्दिजोत्तमाः 1 नदीं ॥७ ॥ हे शरेष्ठ पक्तियो ! यदि श्रापका श्रद्द 
भवतां तत्समार्यातुमहैतेदमशेषतः ॥८॥| सुक पर है तो पूर्णतः वताय कि ].म ॥ यदे जगत 
कथमेतत्‌ समुदं जगत्‌ स्थावरजङ्गमम्‌ । | जो स्थावर श्नौर जङ्गम से युक्त है किस परार 


कथञ्च प्रलयं काले पुनर्यास्यति सत्तमाः ॥ & ॥| उत्यन्न इया चौर भलयकाल उपर्थत, दने पर 
किस तसह न होजायगा १ ॥६] न्नर देवता.ऋषि 


कथंच वंशादवर्षि-पित्भूतादिसम्भवाः श 
व पिद्भूतादिसम्भवा । पितर ५ भूतादिक कैसे श्नौरकिस वं शरसे उत्पन्न 

न्वराण च कथं वंशामुचरितंच यत्‌ ।१०॥ दते ह नौर मनवन्तर कैसे हप तथा उनके वंशो का 
यावत्यः खष्टयश्चैव यावन्त; प्रलयास्तथा 1 |. चरित कया है १॥१०॥ ध श्नोर परलय का कालं 
यथा करपविभागथ् या च मन्वन्तरस्थिति; ॥११।|| तथा कल्यो का विभाय शरोर मम्बन्तसो की स्थिति 
९ ॥११॥ जिस भकार कि पृथी ष्ठी स्थिति है नौर 


1 ्षितिससयानं यत्‌ ममार बे डवः । उस ्रमाण॒ तथा समुद्र, नदियों चनौर चनो का 
वथास्थिताः सुद्रद्िनि्नगाः काननानि च| १२॥ बर्न ॥१२॥ श्नौर भूलोक, सर्गलोक तथा पाताल 
भूरलोकादिस्वर्लोकानां गणः परातालसंश्रयः। । भादि कौ स्थिति तथा सूर, चन्द्र, ्रदादिक, ऋक 


गतिस्तथाकंसोमादि-प्हर्ज्योतिषामपि ॥१३ | शरीर ज्योतिष की गति ॥ १३॥ इस सवको खुनना 
चाहता ह तथा पकाणंव होने पर जव खषटिका 


भोतुमिच्चाम्यहं ॥ स्वमेतदाभूतसप्लवम्‌ । = | उपसंदर दो जवा दै तव क्या ष सता है च 
उपसंहूते च यच्छेषं जगत्यस्मिन्‌ भविष्यति ॥१४॥ मी वतादये ॥१४॥ ` 

; पक्षिण उदः पी वो्ते- 

प्रभारोऽयमतुलो यस्त्वया मुनिसत्तम । दे सनिश्र् जैमिनि । वुमने हमारे ऊपर प्रश्च 


7 [- 5 
् पवक्यामस्तच्छगष्ेह जैमिने ॥१५॥| का अदल भार डाल दिया दे, ज छं तमने पूछा - 
श है उसको कहते है खुनो ॥ १५॥ जिस प्रकार करि 


माकंएडये (१ [ | 
न कथितं दुरा कटके यथा । | पदिले माकरडेयजी ने करो्ुकीसेकदाथाजो कि 
हविजपुत्राय शन्ताय वबतस्नाताय धीमते ॥१६॥| ब्राहमण के पु, शंत ओौर ती थे ॥१६॥ पक वार 


माकंण्डेयं महात्मानपुपासीनं द्विनो्मः | | व्डुत ४४ बाह्मण व के प 
क्रौष्टकिः परिपपच्छं भ्रमो ॥१७]॥| पचे शरोर बरदा पर कराुकि ने हमै पूषा जो 
कषकः परिपमच्ड यतेव एवान्‌ ष श्रापने टमसे पृछा हे ॥ १७ ॥ उनसे जो कुष प्रेम 


तस्य चाकथयत्‌ भीत्या यन्युनिभूयुनन्द्नः । | पूरक महामुनि माकरडेयजी ने का वदी हम दे 
तत्‌ ते प्रकथयिष्यासः शरु तवं द्विजसत्तम ।॥१८' | विप्रवर ¡ पसे कडते दै, खनिये `॥ १८॥ कमल- 


शिपत्य जगन्नाथं पज्ञयोनिं पितामहम्‌ । योनि ब्रह्माजी जो जगत की उत्पत्ति करते है चौर 
4 २ चिष्णु जो ष्टि का पालन करतें तथा श्ट्रं जो 


नगहुथोति स्थितं ष्टौ स्थितौ विषण्वरूपिएम्‌ | प्रलय काल मे खष्ि कान्त करते ह । इन तीनों 
प्रलये. चान्तकततारं रोद्र॑शद्रसवरूपिणम्‌ ॥१६॥| खरूपी जगत के खामी ईश्वरो णाम करके॥९६॥ 

- भाकैरडेय उवाच माक॑ण्डेयजी वोले- 1 
उलन्नमात्रस्य पुरा ब्रह्मणोऽ्यक्तजन्मनः । , भ्व्य जन्म ब्रह्माजी के उत्पन्न होते टी यद 
एराणमेतद्दाश्च एतेभ्योऽुषिनिः खता; ॥२०॥ पयण ज्र वेद उनके णले निकले ६० 1 
राणसंहिवाथकर्बहलाः परमर्षयः । | े पुराण की वतर व श 
दानां भविभागथ इृतलेम्त॒सदसशः ॥२१॥| भी सढस' ५ (य सं श उपदेश 
पमङ्ञानश्च वैराग्यमेश्व्यश्च महात्मनः! | बान, यन्य व न न ध 
स्थोपदेशरेन तिना न हि ` सिद्धं चतुष्टयम्‌ ॥९२॥ क ४ 


१७९ भाकफएदेयपराण श्र° ४१ 


पदान्‌ स्षयस्तस्माञ्जश्हुस्तस्य मानसाः । र य 
पुराणं जग्रहुधाद्या भृनयस्तस्य मानसाः ॥२२ ५ ध 
भगोः सकाशाच्व्यवनस्तनोक्तञ्च द्विजन्मनाम्‌ । | पुराया को च्यवन ऋषि से कदय श्नौर च्यवन ने 
छ्षिभिश्वापि दक्षाय भोक्तमेतन्महात्मभिः ॥२४॥॥ ऋषियों से 1 उन मदात्मा ऋपियो ते श्ये दच्च से 
दक्षेण चापि कथितमिदमासीत्‌ तदा सम । मु ॥ २४॥ व इसको ९ र 
७ कल्लयग क पापनाशक परस का च 

दतुं कथयाम्यथ किकेरमपनारानम्‌ ॥२५ | कता ई ॥९॥ ह मदामाग ! ल ने रिति 
सव्वमेतन्महाभाग भता मे समाधिना 1 _ | दन्त से खुना धा वह अथ आप मुमसे ध्यानपूरवेक 
यथाश्रुतं भया पूल्वं दक्षस्य गदतो शुने ॥२६।॥| सुनिये ॥ २६॥ जगत की उत्पत्ति के कारण्.ंजन्म 
भणिपत्य जगद्योनिमनमन्ययमाश्रयस्‌ । | ्न्यय तथा चराचर जगत को निमा करने बलि 
चराचरस्य जगतो धातारं ॒प्रमं पम्‌ ॥२७१ परम पद को भ्राम करके ॥२७॥ बहयादि पुर्पको 
ति-यसे जो उत्पत्ति, स्थिति श्नीर नाश का कारण दहै ओरौर 
बह्माणमादि रवतत स्थि ॥ स्वयंभू है जौर जिसमे खव स्थित है ॥ २८॥ उस 
यत्कारणमनोरस्यं यत्र सव्वं प्रतिष्ठितम्‌ ।२८॥॥| दिरएयगर्ं बुद्धिमान को णाम करके उत्तम भूत- 
तस्मे हिरणए्यगभाय लोकतन्त्राय धीमते । | वर्ग का वंन करता ह ॥२९॥ निसका आदि भीर 
परणम्य सम्यग्बश्यामि भूतवगेमङु्तमम्‌ ॥२६]॥ न्त महन £ ओर ओ विशेष सूप श्रौर ॥ 
महदाचं -पिरषान्तं सवैरू्यं सलक्षणम्‌ । | चोमा भच र स्य ह ॥१० जो भुयो 
प्रमाणैः प॑चमिगंम्यं स्रोतोभिः सद्विरन्वितम्‌ ॥२०।॥| से अधिष्ठित ओर नित्य हे कथा जो नित्य की 
पुरुषाधिष्ठितं नित्यमनित्यमिव च स्थितम्‌ । 
तचछयतां महाभाग परमेण समाधिना ॥३१।| कारण डते है, रोर. सत्‌ असत्‌ मय नित्या श्रौ 
प्रधानं कारण यत्तदव्यक्ताख्य महषयः । सत्मा प्रकृतिभी वरी [६२] श्चौर चह शुष, च्य 
यदाहुः प्रकृतिं सृष्ष्मां नित्यां सददात्मिकाम्‌।२२॥ ओर न्नर है तथा वह अरमरमेय रौर किसी के 
धरषमक्षस्यमनरममेयं नान्यसंश्रयम्‌ । 
गन्धरूपरसै्हीनं शब्दस्पशंषिवरजितम्‌ ॥२३॥ 
श्नायन्तं जग्हूयोनिं भ्रिगुणपभवान्ययम्‌ }. 
श्रसास्मतमविज्ञयं त्रह्मग्रे समवत्तत ॥३४॥ 

प्रलयस्य तेनेदं व्याप्तमासीदरेषतः। 
गुणसाम्यात्‌ ततस्तस्मात्‌ पेत्रह्ाधिष्ठितान्पुमे।२५॥ 

शुणमावात्‌ खल्यसानात्‌ सर्गकाले तत; पुनः। 
परधानं तत््वुदृभूतं महान्तं तत्‌ समाहणेत्‌ ।॥२६॥ 
यथा वीजं त्वचा तदवदव्यक्तेनाषतो महान्‌ । 
सात्तिको राजसशवव तामसश्च व्रिधोदितः ॥२७॥ 
ततस्तस्मादरङकारचिषिधो पै व्यजायत । 
येकारिकस्तेनसग्र भूतादिश्च घ॒ तामसः ।३८॥ 

` महता चातः सोऽपि यथाव्यक्तेन वै महान्‌। 
_ भूतादिस्तु वह्न्ारःशब्द तम्मावरकं ततः ।३६॥ 


४ 


गुणो की उत्पत्ति च्रौर नाश करने बाला है तथा 
असाम्पत ओर श्रवि्ञेय वह्‌ ब्रहम पददिले वर्तमान 
रहता है ॥ ३४ ॥ परलय होने पर वह निःशेष रूपसे 
सव मँ व्याप्त रहताहै श्नौर केनज्ञाधिष्ठित गुणो के 
साथ वदी ब्रह्म ॥३५॥ गुण भाव से उत्पन्न होकर 
खश्टिकाल्ल ते भधाव तत्वं को उत्पन्न करता है नौर 


च्रव्यक्तसे धिरा श्रै तथा बह सास्विकी, राजसी 


वह अदङ्कार भी महान्‌ से दृत है जिखं प्रकार 
किं महान्‌ अव्यक्त से धिय - डु है न्नौरं जव 


~ +~ ५ 


- | पच सप्त छषियों ने वैदोको प्रह क्रिया रौर उन 


तरह स्थित है उसको हे. महाभाग ¡ अत्यन्त ध्यान ` 
पूरवैक.खुनो ॥२१॥ उस अव्यक्त को. महिं प्रधान ` 


उसे घेर क्तेता है ॥ ३६॥ जिस अकार वीज त्वचा न॑ 
से धिसा हा द्योता दै उसी ` धकार वह मदान्‌ 


भूतादि विकारघ्रस्त दते तो शब्द तन्मा उत्प. 


श्राधित नदीं है । बह गन्ध्‌, रूप श्नौर रस से हीन. 
है तथा निशब्द शरीर स्पश से रहित है ॥३२॥ वह . 
श्रादि अन्त से रदित है, जगत का कारणहै,. तीनों - 


[ग 


श्नौर तामसी तीन पकार काहे ।रभ॥ पिर उससे. ` 
अदङ्गार, तीन मकार का उत्प होता दै, वैकारिकः . 
तेजस ओर तामस इन्दं तीनों से भूतादि है. 1३९॥ ` 


अन ४५ अन मकण १७२. । माकैरडेयपुराण १७३ 


[न्यं 


(१ 
हे ॥ २९ ॥ शब्दः तन्मना से श्राकाश शब्द 
व्‌ । 
लक्षण उत्यन्न होता है श्रौर श्काश शब्द मघ्ाको 
भूतादि आव्रृत कर लेते हँ ॥ ४०॥ उस अकाश 


ससल्न श्दुतन्मात्रादाकाशं शब्द्लकषणम्‌। 
भ्राकाशं शब्दमात्नतु भूतादिशा्णोत्‌ ततः ॥४०॥ 
स्पशतन्मत्रमेवेह जायते नात्र संशयः । | श्द्‌ मा से स्य तन्मना उतर दती दै स 
लबान्‌ नायते वाधुस्तस्य स्श्गुणो मतः । | सन्दे नदी श्र उसी स्थशं से वलवान्‌ वायु 
आकाश शन्द्मावरन्त स्पशंमा्रं समादणोत्‌ ॥४१॥ त है ॥ ४१॥ जव 
- वायुधापि विङव्वाणो सपमा सस्यं ह । | वाद निकार को भत द ती है तव रूप णत्रापेदा 
८ दोती है, वायु से ज्योति उत्पन्न होती है जिसका 
ऽ्योतिरतषयते बायोरपदर्पगुणुच्यते ।॥४२' | ण सूप द ।४य पौ मता जो वाय दै बद रप 
स्पशंमात्रस्तु वै वायु रूपमात्रं समा्टणोत्‌ । | माजा को धेरे हय है श्रौर ज्योति ॐ विकार को 
ज्योतिथापि विहव्यं रसमात्रं सज्जं ह ॥४२।॥ मा होने पर रख म्रा कौ खष्ट दोती हि॥४३ व 
सम्भवन्ति वतो हापथासन्‌ वै ता रसात्मिकाः ! रस मात्रा खे रसार्मक जो फल्ल है बह उरे 
प हे श्नौर रसमात्रा जो जल है उस पर रूपं मात्रा 
रसमात्रास्त॒ ता ह्यापो रूपमा समाृणोतु ॥७४।॥| आचरण हे ॥ ४४॥ विकार को भास होने पर जल 
आप्ापि विहुव्यत्यो गन्धमात्रं ससन्जिरे । | गन्ध मत्रा को उत्पल करता है श्नीर जव दोनों 
सङ्कतो जायते तस्माद तस्य गन्धो यणो मतः| ४१ ल श क 
तसिमस्तस्मिस्त तन्पा ९ त्र जता दै 1७५ त्न्माच्ाशका अथ सर्वे प 
ध मात्रं तेन तन्मतरता स्ता । भरत्येक सर्वमय पदार्थं की तन्मात्रा कदी । तन्मानां 
न शान्ता नापि घोरास्ते त मूदाधाविरेपतः । | कहते. ॥५६॥ अविशेय होने के-कारण तन्मात्रा न 
भूततन्ातरसरगोऽयमहङ्कारात्‌ हु तामसात्‌ ॥४७॥| शान्त है, न घोर है र न मूढ़ है । उनको भूत- 


द्‌ तन्मान्नसर्मं भी कहते है श्नौर ये तामस अहङ्कार से 
वैकारिकाददङ्काराद्‌ सतत्वो्रिक्तात्‌ ठ सस्विकात्‌ । उत्पन्न होते है ॥ ४७ ॥ सात्विक अहङ्कारके चिकार 


कारिकः स सर्गस्तु युगपत्‌ सम्पवर्त॑ते ॥४८॥| को भा होने पर वैकारिक स उत्यञ् होते ैः॥ 
ुदधन्दियाणि पञ्चेव पंच कर्मेन्द्रियाणि च । पाच क्नेन्द्ियो नौर पांच कमेन्द्ियों को देवता 


वा पैकारि लोग तैजस इन्द्रियां भी कहते है तथा इन्दी दशं 
तेलसानीन्दियाण्याहुर्देवा येकारिका। दश । | को वैकारिक मी कडा है ओर ग्यारडवे मनको भी 


एकादशं मनस्तत्र दवा. वैकारिकाः स्मृताः ।॥४६।|| देनताञं ने वैकारिक की दै ॥४६॥ कण, सचा 

ओतं लक्‌ चशुषी जिहा नासिका चैष पंचमी । | नेच, जिला धी गिक पो वो 

शब्दादीनामवाक्चयथं ञान शरास कराने के कारण कषनेन्द्ियां कटाती हं ॥ 

पादौ 1 ५ पांव, गुदा, लिगहाथ द्चीर वाणी ये पाचों करमशः 
+ 2 7 


| चलम, सल त्यागने, आनन्द भास करने, कारयकरने 
अति्विसमो दयानन्दः शिव्यं बाक्यंच कम्पं तत्‌।५१॥ 


न्नीर योने के कर्मों को करनेक्े कार्‌ कर्मन्द्रियां 
, आकाशं शब्दमात्न्त स्पर्शमात्रं समाविश्त्‌। | ६ै॥५९॥ जका शच्दमाजा मँ स्पशं मात्रा के 


निगु चा > ॥ परविष्र दोनेपर उसमेखे द्वियुशिव वागु उत्यन्न होती 
गुणो जायते यस्तस्य स्पर्शा गुणो मतः ॥५२॥| > जका शु दपं दै ॥५२॥ शबद ० 
सूपं तयैवाबिशतः, शब्दसयशगणावुभौ । | इन दोनो यों भै रूप के समाये दोन पर दृगनी। 
द्विगुणस्तु ततथा; स शब्दसशंरूपवान्‌ ॥५२॥ ननि उत्पन्न होती है जो कि शब्द स्पश प्रौर १ 
शब्द स्पध रूपंच रसमात्रं समाविशत्‌ । | युक ^ । ५६ जव शब्द स्प शरीर रूप रस > 


तसमादतुंणा दापो विह ध वेश करते हे तो रसात्मक जो जल दि, वद इ 
स्मात्र पो व्यासा रसातका॥५४।| श्रयत ख र होकर छत्र तै ॥ ८। 
शब्द्‌; स्पशं रूपंच रसो गन्ध समाविशत । 


जव श, स्पश, रूप शरोर रख गन्धे प्रवेश करं 
सज कन्येव जपादप्च्ते सदरीभिमाम्‌ ॥१५।॥ है ते गन्ध खदित ये पचा दस पृथ्वीको श्राव 


: १७४ माकरुडेयपुराण श्र ४५ 


कर लेते दै ॥५५५॥ इसी कारण ये पृथ्वी पांच शु 
से युक्त खव भूतों मै स्थूल दिखाई देती दै 1 ये 
पावो गुर शान्त, घोर, मूढ़ श्रौर विशेष कदलाते 
है ॥ ५६ ॥ प्क दुसरे मे भरवेश॒ ऋरने के करिश ये 
एक दसरे को धारण करते हं चरर परथ्वी के वीच 
मे जो मेधो से चाच्छाडित लोकालोक दै उनको , 
पराप्त करते ह ॥ ५७॥ ये निश्चित होने के कारण 
विशेष शौर इन्दियों से घ्राद्य है श्रीर आपस मँ 
एक से दूसरा गुणा क्रम पूर्वक व्रहण करता दै।५०॥ 
ये शण बड़ वलव्रान्‌ 1 भ्लग-्रलग रहकर 
$ + ।) ९ | ये प्रजा उत्पन्न करने को सदशं नदीं हे ॥ ५६॥ इन 
नावन अनाः सष्ुमपमागसय करतुः ४६|| व जो य स 


समेत्यान्योन्यसंयागमन्योन्पाभ्रयिणथ हे । | आधित है तथा ये खव मिलकर अशोष एक हो 
एकसहातचिद्वाश्च ` सम्प्राप्यक्यमशेषतः ॥६०॥| जाते है ॥ दग अव्यक्त के शरनुप्रह से पुरुषे भरवेश 
पुरुषापिष्ठितत्वाच्च अव्यक्तानुग्रहेण च । कर महदादि भिशेप रडको उत्पन्न करते ६।६१॥ 
मरहदाया विशेषान्ता द्यएटगुर्पादयन्ति ते ॥६१॥ जल के वुलबुल्ते की तरह वह अंडा च्रद्धि को पप 
जलपुदुवदवेत्‌ तत्र क्रमाद् दृद्धिमायतम्‌ । होता है । हे महाबुद्धे ! वह अरड उत्पन्न होकर 
भूतेभ्याऽर्ठं महाशुदधे इत्‌ तदुदकेशयम्‌ ॥६२॥| जल में श्यन करता है ॥ ६२॥ उसी प्राकृत ्रड 
भाृतेऽण्डे विद्धः सन्‌ केर्ञो ब्रह्मसं्ितः । | मे हमा नाम केक वदते दै, बदी बह्माशरीरी च्नौर 
स॒ वै शरीरी पथमः सं वै पुरुष उच्यते ।६३॥| मथम पस्य दै ॥ ६३॥ बही शादि कतां तथा सव 
आदिकर्ता च भूतानां घ्र्यगरे समवत्त॑त । | भूतो क पदिले वदी ब्रह्माजी विराजमान रहते है 
तेन स्वमिदं व्य्तं प्रैलोक्यं सचराचरम्‌ ॥६४॥| चोर उन्दीसे य तरलोक्य सचराचर व्यासषद४। 


मेरस्तस्यातुसम्भूतो जरायुापि पर्व॑ताः । मेख दि 1 से न ह ह: ५ 

गर्भसलिलं न उस महान्‌ अण्डे रकाजो जलल हं च 
समुद्रा गभसलिसं तस्यार्ढस्य महात्मन; ॥६१५॥| समुद्र है ॥ ६५॥ उसी श्रडेमं देवता, सुर शौर 
तस्मिन्नण्डे जगत्‌ सव्वं सदेवारुरमालुषम्‌ । 


मनुष्यं से पशं जगत हे श्र दीप, पर्वत, समुद्‌ 
द्ीपाचद्विसयुदराश्च सज्योतिलोकसंग्रहः ॥६६॥| चौर ज्योति सहित लोकों का संग्रह भीः उखीभे है 
जलानिलानलाकारेस्ततो भूतादिना वहिः । 


॥६द्‌/ जन्त, बायु.स्रन्नि, आकाश तथा भूतदि वार 
 द्शगररेदेकलेन से दश-दश गुण एक-एक होकर उस अरएडेको घे 

रतमरूटं॒दशगुणैरे्कलेन तैः पुनः ॥६७॥ व 

महता त्त्ममाणेन सरैवानेन वेष्टितः । 


लेते ६ ॥ ६७॥ वे शुण मह्तत्वं के खा पुरुष को 
ू हि धेर लेते तथा उन गुणो सहित महान्‌ अन्यक्तसे 
पास्ते यितः सर्व्वैरव्यक्तन समा्टतः ॥६८।॥ अचत होजाताहे ॥द८॥ इन सातो भाङूत आवरणे 
एभिरावरणैरण्डं सप्तभिः प्राकृते तम्‌ | च ट्‌ 
न चाच्चुत होने के कारण आटो प्रङृतियां भी इसमे 
न्यान्यमाशृत्यता अष्ट भृतयः स्थिताः ॥६६॥| स्थित द ॥ ६९ यड्‌ यकृति नित्य छै शौर उसके 
बहमाखूयः कथितो यस्ते समासा च्छयतां पुनः|७०॥| जोर उसका विस्तार पूरकं दाल, उुनिये ॥७०॥ 
पथा मो जले कविदुन्मञ्जन्‌ जलसम्भवम्‌ । | प्ख अकार कोड व्यक्ति जल म दव कर ्िर उस 
लेच किपति नद्या, स, तथृामकृत्िविदयुः । ७१|| धृति से उत्पन्न होते है ॥ ७१ ॥ अव्यक्तं को के 
{व्यक्तं त्रुदिष्टं बह्मा : षर . उच्यते 1. . । शौर ज्ह्मा को तेवक्ञ कते दँ । ये खव चेन शौर 


तस्मात्‌ पंचथुणा भूमिः स्थूला भूतेषु दश्यते । 

शान्ता घोराश्च मूदाश्च विरोपास्तेन ते स्मृताः ॥५६॥ 

। प्रस्परादुमवेशाद्धारयन्ति परस्परम्‌ । 

' भूमेरन्तस्तवमं सव्वं लोकालोकं घना्तम्‌ ॥५७॥ 
` विरेषाभैन्द्ियग्राह्या नियतत्वाच ते स्प्रता;। 


गुणं पूल्वस्य पूर्वस्य प्रासुबन्प्युत्तरो त्रम्‌ ॥५८॥ 
नानावीर्या; पृथग्भूताः सपतेते संहतिं षिना। 


से वह चरा धिरा इया है चनौर एक दूसरे से 
एषा सा -्रकृतिर्नित्या तदन्तः पुरुष सः | भीतर पुरुष विराजमान दै जिसको बह्म कहते है 
1 मे से निकले रौर जल को फे उसी पकार ब्रह्मा. 


` श्र ४६ साकंरुडेयपुराण + , १७५ 


एतत्‌ समस्तं जानीयात्‌ पेचक्षकनलक्षणम्‌ ॥७९॥ देये के सचय ॥ ७२॥ इसी ५ केवक्षाधिष्ठित 
इत्येष ॥ (4 १७ न्र्‌ ४ त भक्त सग कः ६, इसका ५ युद्धि से, नीं 
इत्येष भाङृतः सगः कषे्रकनापिष्ठिस्तु सः । ` | दोता श्नीर यद पदि विजली के समान उत्प 


रुदधिपल्वः प्रथमः प्रादुभूतस्तदिदयथा ॥७२॥ रोता दै ॥ ७३ ॥ 
इति श्रीमाकंरढेयपुराण भे ब्रह्मो्त्ति, नाम ४५वां अ० समाप्त । ` " 


न "व श न ~ 
चियालीसवां अध्याय 
मोषटुकिसुवाच ्रधकिजी वोले- । 
भगर्वंस्त्वण्डसम्भूतिययाचत्‌ कथिता मम । ह भगवन्‌ ! श्रापने ब्रह्मारड कीं उत्पत्ति शौर 


ब्रद्मारटे बरह्मणो जन्म तथा चोक्तं महात्मनः। १ ॥ हाजी क जन्म का सुखसे यथावत्‌ वर्शन किया 

एतदिच्डम्यहं धों लो भूयुदलोदधव । | ॥९॥६ श्ण च उत्प माकरी । ऋरव 

ध श्रापसे यद सुननेक्षी इच्छा करता कि प्रलयकाल 

यद्‌। च सष्टिभूतानामस्त किं जु न चास्तिवा | | फे श्रन्त म जव कि सवका उपसंहार दो जाता दै 
काले पै भ्रलयस्यान्ते सरव्व॑स्मिन्तुपसंहते ॥ २॥॥ जीनों की खट रहती दै या नदीं ॥२॥: ` 
माक॑रडेय उवाचं " | माक॑रडेयजी पोके- 1 

यदा तु परकृतौ याति लयं विश्वमिदं जगत्‌ | जव यद खष्ि भृति म लीन टो जाती है" तो 


, तदोच्यते विद्रधिः ; ष प्रात को विद्धान्‌ लोग प्रतिसश्चर कदते दै ॥ 
, तदोच्यते प्रा़ृतोभ्यं विद्भिः प्रतिसश्चरः ॥ २॥ व 


£. "बात्सन्यवस्नितेऽनयवते विकारे मतिं । =| स्थित हो जात है तव महति श्र पपं अपने २ 
कतिः पुरुषश्चैव साधरम्येणावतिषएतः ॥ ४ ॥|| धर्माडसार स्थित रो जाते ई ॥ ४॥ फिर तमोग॒ण 


। गण स्थितौ । | शौर सतोस मिलकर पक दोजाते ट तथा एके 
तदा समश्च सतश्च समत्वेन गुण स्थिती दृसखरे से न कम रते है रौर न श्रलग रहते है।१॥ 


भुद्िक्तायनूलौ रोती च परस्परम्‌ ॥ ५॥ जिस धकार तिलो भे तेल शरोर दूध मे धी रता 
तिलेषु धा यया तैत धतं पयसि वा रिथितम्‌ । | उसी पभरकार सतोगुख शौर तमोुण मे रजोगुण 


तथा तमसि सत्वे च रनोऽग्यटुखतं स्थितम्‌ ॥ ६ ॥| मिला दा र्दता द 1६ बहा की उत्पत्ति से जवे 
उत्पसिव्रह्मणो यावदायुपो दविपरा्दिकम्‌ । तक उनकी श्राय दोती दै उसको दपर कते 

ष 1 है वह परब्रह्म का णक दिन दोता है शरीर उतनी 
तावदिनं परेशस्य तत्समा संयमे निशा ॥७॥ दी ५० रत्र दोती दै ॥७॥ वद ङे 
दम्भे प्रवुद्धस्तु गदादिर्नादिमान्‌ प्रादि श्रौरः श्रनादेमान्‌, सवकं कारण, त्या- 
सनिता परः कोऽम्यपरक्रियः ॥ ८ ।| कर ॥॥ ते जगत कै खामी जख्द रहति शनौर पुर 

. अकति पुरपन्येव माधिश्याश् जगसतिः । म प्रवेश कर ज्ञाते द तथा परम योग से उनको 


्षोमयामास येगेन परेण परमेश्वरः ॥ ६ ॥ वा ह । श जरठ 
मदो नद्चीणां ५ पवन च्ौर मदनः भित करता 
यथा दो नवस्रीणां यथा या माधवानिलः। | उसी तरद बद श्र कि र लो 
अलुमिषटः ्ोमाय तथासौ येोगमूरपिमान्‌ ॥१०।॥| छोभित करवा दे ॥ ९० ॥ मधान पय ॐ तो 
` प्रपाते ब्रह्मसंहितः होने पर बह देव जिनको ब्रह्म कहते हे श्रणडकोश 
भधाने क्षोभ्यमाणे ठु स दैवो व्रह्मसंहितः। | भै स्थित दो उत्प दोते ह जिर भकार कि मैने ` 


स एव क्षीमक; पूवं स सभ्यः भते; परति; । | पुखष जो पदिते स्ोभयुक्तये अव कोभरदित दोकर 


: १७६ | माक॑रुडेयपुराण ` -आअ०.४६ 


स सङ्कोच-पिकाशाभ्यां भधानत्वेऽपि च स्थितः १२॥ र ओर ५ (1 ५ 
ध | वे ही अशुर ओौर अज होते दुष्ट जगद्‌ को उ 

सवच स भाद्योनिषोपपि रोगात्‌ | के ई र रोचक ग इषम 

शन्‌ भरवततते सगे ब्रह्य समुपाभितः ॥१२॥॥ उत्पन्न धरते मै डच्च होने के कारण बरहा कडलाते 

ब्रह्मत्वे स भनाः सृष्टा ततः स्वातिरेकवान्‌ ! | दै ॥ १३॥ चे ब्रह्मा टकर रजा की खृष्टि करते 

व छौर सतोयुण युक्त शिप्णु दयोकर वे धर्म पूर्वक 

विषणुलमेत्य धर्भेण रुते परिपालनम्‌ ॥१४॥ खृष्टि का पालन करते ह ॥१७॥ तधा फिर तमोगुण, 


ततस्तमेगुणोद्रिक्तो श्रते चाखितं जगत्‌ । | से युक्त र्द सप होकर सम्पू खषटि का खंदार 


हय वै चेद % निः करे शयन करते हं, इस भकार तीनों काल मे 
उपहस्य वे शेते वरस रिगुणोऽगुखः ॥१५॥ तीनों रुण रदे ॥ १५॥ जिस घकार किसान पदिजे 
यथा मागृल्यापकः कषे्री पालके लाबकेस्तथा ! | वोता है, फिर रक्ता करता है तथ्य व हे 
दतापायानि कारिणीम्‌। उसी भकार वरहा, विष्णु्मदेशर्ूप पुरूपको जानना 

स भ यषठदिषयलीरा ।१९॥| चास्थि ॥२९॥ बह्मा होकर लोको की खि करतें 
ब्रह्मत्वे नते लोकान्‌ सदरतवे संहरत्यपि । | नौर स्द्र होकर उनका संहार करते दँ तथा विष्णु 
विष्णव चाप्युदासीनस्तिस्रोऽवस्था; खयम्धदः होकर उनका पालन क्रते ह, यदी तीन प्रकार की 
रनो ब्रह्मा तमे शरो विष्णु सत्वं जगत्पतिः । | चचस्था र क ॥९७1 रलोयुरु रहम, त 

त्रयो देवा त्रयो गणाः ॥१८॥ शण ब्द रौर खतोयु चिष्युहे 1 इन्दं तीनो गुणे 

एत एव त्रयो एत एव वे] गुणाः ॥५८।| ज ये तीन देवता ह ॥१८॥ ये तीनें युए एक दुसरे 
अन्येन्यमियुना देते अन्योन्याश्रयिणस्तथा । | से मिले रहते तथा ए दूसरे ॐ अभित, इनक 
षणं वियोगे न शेषां न त्यजन्ति परस्परम्‌ ॥१६॥ १ नदीहोता शौर न ये क 

एव बर्मा जगलय्यो देवदेवर्चतुमपुंखः । | ॐ चोड द ॥९९॥] इस मकार जगत्‌ के श्मादिकः 

लोषखं घ्माभित्य श्यते वित देवदेव, चतमु नह्ये जो रजोगुण मे प्त होकर 
ए एव्रात्व कतम्‌ ; ॥२०॥| खष्टि की रचना करते है॥२०॥ वै ही दिरणएयगभं 
हिरष्यग्ो  देवादिरनादिरुपचारतः । | देव उपचार से सवके शादि शौर नादि है श्र 
भूप्रकणिकासंस्थो ब्रह्माग्रे समजायत ॥२१॥ उन्दी की नाभि से पदिले कमलकोश मे ब्रह्माजी 
तस्य वर्षशतं त्वेकं प्रमायुर्महात्मनः । व 0 
बादाधेशेव हि मानेन तस्व संया निवोध मे॥२२।|| ९१ च ए.उ च क य्‌ जहा मानकर 
निवेदय; अ स।*९।|| कहता खनि ॥२२॥ दस या पाच निमेषकी एक 

; काष्ठा तथा परचभरुच्यते। | का होरीदै, तीर काठ पक कला शरोर तख 
कलाश्धिशष् षे काष्ट युहूत्त विशतिः कलाः ॥२३॥ कला का प्क सुतं होत ह ॥ २३॥ तीस सुदता 
 अ्रहारा्महर्तानं रणं ्िशत्‌ तै स्यतम्‌ | णर दिन रात मलयो ऋ होता है ओर तीस दिने 
| अहोरा विशद्भिः पप्तौ लौ मास उतवते।२४।| यत त्‌ न्ह दिवम एक पत ओर दो पक्त 
6 ^ (पाः पा द मास उच्यते॥२४॥| का पक सीना दता दै ॥ २४॥ चुः महीन का पक 
; पद्मिरयनं वपं द्ऽयने दक्षिणोत्तरे! | अनयन नौर दो अयन का यक नप होता है जो 
तस्वानामहोराव्रं दिनं तत्रोत्रायणम्‌ ॥२१।| दरठिए्यसा श्र उत्तसयर प्ते अयन. है" वे ही 
दिवयेषषदरसैस्त॒ छतरतादिसंक्ितः देता ॐ मशः एक रात शौर दिने दँ ॥ २४॥ 
क श सपम्‌ । श्रव देवताश्यो के वार हङ्पर वपं के चतुय के 

घृतुयुगं दादशभिस्तद्विभगं ४ "रा > ५५०, (४ 

युगं द्ादशमिस्तद्विभागं शुष्य मे ॥२६॥ सतयुग चेतादि विभागको सुनिये ॥२ा देवताश्रो 


-चल्यारि तु सहस्ताणि वषाणां कतघुच्यते | - | के वभे ॐ भाण से चार हरर वर्पो का. सतयुग 


& 


शतानि सन्धया चत्वारि सन्ध्यांशश्च तथाविधः२७।॥| होता दै इसमे चारसौ वषे संध्या शोर इतना ही , 
। संध्यांश होता दै ॥ २७ तीन हज्ञार दन्य बषोका 
धता शरीरि सदापि दिव्याब्दानां शतत्रयम्‌.। - भेता दतो है रथा इसकी तीनसौ व॑ संभव , 
तत्सन््या तत्समा चव सन्ध्याशश्च तथाविधः|॥२८॥॥ नौर इतना-दी स्ष्यांश है ॥२८॥ `" , ` 


~ न 
“~ ”~"~--~-----~--- ~~~ 


अ०्४६ २३  माकण्डेयपुराण -१७७ 
न 


पं से ठ वर्णां दशे वया |. | हषो दिय कोद जौ 

चष सन्ध्या र्‌ सन्त 
रस्य सन्या समायाता दरे शता तद॑शक; ।२६॥ व्यतीत दोता है॥ २९॥ हे किल] उ 
कलिः सदसत दिभ्यानामन्दानां दविसत्तम । | का भरमार एकरजार दिव्यव्ं है तथा इसमे भी 
सन्ध्या सन्ध्यांशकश्चेम शतकौ सयुदाहुतौ ॥२०॥ 


सौ वर्षं सन्ध्या श्नौर सौ वर्प सन्ध्यांश दोता है ॥ 
एषा द्वादशसाहस्री युगाख्या विभिः ढता । न व 
एतत्‌ सहस्रगणितमहन्रह्यवगुदाहूतम्‌ ॥२१॥ नि 
नहो दिवसे बरहमन्‌ मनवः स्वश्चतुईश । | मजु होते ह उनका विभाग भी दज्ञार से किया 
भवन्ति भागरस्तेपां सहस" . तद्विभञ्यते ॥२२॥ 


देवाः सपः जाना हे ॥२२॥ इन्द्र सहित सच देवता, सप्तपिमत 
देवाः सपतपयः सन्ना मुस्त्छुनयो दृपाः श्रौर उनके पुत्र राजा लोगं मके साथ उत्पन्न हीते 


महुना सह छज्यन्ते संहियन्ते च पूव्ययत्‌ ॥३२॥ & था उसी प्रकार नाश को परा दोजते है ।३॥ 
चतुय॒भाण संख्याता साधिका एेकसपरतिः। द्कदत्तर चतुयंग का एक मन्वन्तर होतहैभमुप्यौ 
मन्बन्तरं तस्य संख्यां मानुपान्दर्निवोध मे ॥२४॥| के च्पसे उसका प्रमाण भुभसे सुनो ॥२०॥ दे दज 
्िएत्कोव्यसतु सम्यूणाः संख्याताः संख्यया द्विन। | सत्तम ! तीनकरोड़ सड़सठ लाख वीस हसार.व्ं 
सद्नपषटस्तथान्यानि नियुतानि च संख्यया ॥२१ | का पक मन्वन्तर भद्योके वर॑ क हिखावसे होता 
विंशतिश्च सहस्राणि कालोऽयं सापिकं बिना । | है, श्रव देवतान कै वं के.दिसाव से सुनो ॥३५ . 
एतन्यन्वन्तरं क्त दिव्यवपं्िवोध मे ॥२६॥| ॥ २६॥ आड श्नीर वावन श्रथात्‌ साठ हङ्गार देव 
अष्टौ पेषं सहस्राणि दिच्यया संरूयया युतम्‌ । ताश्रों फे बरौ फा एक मन्वन्तर होता है ॥३७॥ इस 


को ्वौदह से गणा करने पर जो समय श्राता है 
्विपश्वाशत्‌ तथान्यानि सदस्राएयपिकानि त्‌॥३७॥ 1 


चतुदशगुणो शेष कालो ब्राह्मवमदः स्मृतम्‌ । दस दिनके ्रन्तको परिडत लोग नैमित्तिक परलय 
तस्ान्ते प्रलयः भोक्तो चह्यन्‌ नैमित्तिको वृध, ३८॥| कदते है ॥ र एस दिन फे ्रन्त मे भूलोक, भुव 


भूर्लोकोऽथ शुवर्लोकः स्वर्लोकश्च विनारिनः ललक श्रौर खम॑लोक नए दोजातेहै तथा इसी तरदं 
महलोक भी नाश को प्राप्त होता है ॥ ३६ ॥ इसके 
तथा विनाशमायाति महर्लोकश्व तिष्ठति ॥२६॥ पा 


तद्ासिनोऽपि तापेन जनलोकं परयान्ति वे । | शरीर तीनों लोकों भे भरलय होने पर ब्रह्मा सव को 
एकारोवे च त्रोय ब्रह्मा खपिति वै निशि॥४० सो जाते द ॥ ४० ॥ जितना दिनदै उसी परमाशकी 


तस्मणेव सा रात्रिस्तदन्ते ख्यते एनः ब्रह्मा की रात्रि दै। ६ अन्त होने पर ब्रह्माजी 
पुनः खंष्टि की रचना करते हँ । इस भ्रकार दिन 
पवन श्रमणो वपभेकं धपतन्ु च्‌ ॥४१॥ रावि के ३६० दिन फा ब्रह्मा का एक .वपं दोता दहै 


शतं दि तस्थ वपांणां परमित्यभिधीयते । | शरीर पेते सौ वरपौ की श्रायु ब्रह्मा की `हे ॥४९१॥ 

पश्वाशद्धिस्तथा कयैः पद्ध मिति कीत्त्ेते ॥४२॥ 4 के्नसी ध परम १ ध ष 
111 कदु, 

एवमस्य पर दृध्यन्तु व्यतीतं द्विजसत्तम । व म्‌ क व 

यस्यान्तेऽभृन्महाकटयः पान्न इत्यमिविश्रुतः)॥॥४३॥| वत पद नाम. मदाकटप कते है ॥४३॥। दवितीय 

द्वितीयस्य परादृध्यस्य वर्तमानस्य वै दिन । | चराद्धं को जो चरत॑मान है चार कटप कडते है, 

वाराह इति फलपोध्यं पथमः परिकल्पितः ।४४।॥ शटी कल्यना पदिलेःदी करली गईं दे ॥०४॥ 


इति श्रीमार्करुडययुराणमे बह्याधु परमाणं नाम द्वा अध्याय समाप्त। 


१७८ | , भाकंर्ढेयपुराण  „- “अर ४७ 


सैतालीश्ब अध्याय 
करौष्टकिंरुवाच | करौषटुकिजी बो्ते- , | 


यथा ससञ्जं षे बह्मा भगवानादिदरत्‌ भ्रमाः जिख प्रकार भगवान्‌ आ्रादिकतां प्रजापति, .. 
| देवताश के पति ब्रह्मा ने प्रजाश्च को ध वह 
प्रजापतिपतिर्देवस्तन्मे विस्तरतो चद्‌ ॥ १ ॥ मुसे विस्तार पूवक किये ॥8 | । 


माकरडेय उवाच मार्करडयजी वोक्ते- 
कथयाभ्येष ते बन्‌ समञ्जे भगवान्‌ यथा । ह कौष्टकिजी ! जिस प्रकार कि लोक-कतां 


¡ नगत स्थायर-जङ्गमम्‌॥॥२॥ श्यत बहमाजी ने स्थावर श्रौर जङ्गम संसार को 
लोकडच्ाश्वतः पस्‌॥२। 
५ कत द ॥२॥ खजा चह गै श्ापसे कहता ॥२॥ पद्मकर्पके चन्त 
पञ्चावसराने प्रलये निशसुप्रोत्थितः परभुः । 


म जो प्रलय इ उसकी रात्रि की समाप्तिपर ब्रह्माः 
सत््ोप्रिक्तस्तदा बरह्मा शूल्यं लोकम्ैक्षत ॥ ३ जी सोकर उठे तो उन्होने संखारक्रो सूना देखा 
इमश्वोदाहरन्त्यत्र शोकं नारायणं प्रति । 


॥२॥ ते ह्माजी नें बरह्मखरूप, जगत्‌ की उत्पत्ति 

ललं दवं के कारण, श्रव्यय, देव नारायण 'के परति ये स्तुति 

ब्रह्मस्वरूपिणं देवं जगतः भभवाप्ययम्‌ ॥ ४॥ की ॥॥ श्चाप, नारा ज्ौर तंस जल के नाम कदे 
आपो नाश वै तनव इत्यपां नाम शुश्रुम । | णये है, जल मे .श॒यन करने के कार आपका नमि 
तासु शेते स यस्मा तेन नारायणः स्त; ॥। १ ।|| नारायस भसि दै ॥५॥ इसपर नारयण्‌.उटे भीर 


जल मे पृध्वी को इवा ष्या स्ममः कर यह. शयुः 
विबुद्धः सलिले तस्मिन्‌ विन्नायान्तगतां महीम्‌! | मान किया कि अरह्माजी कौ. उसके. उद्धारकी इच्छा 


श्रजुमानात्‌ सगुद्धारं कततकामस्तदा कितः ॥ ६1॥ है ॥६॥ उन्होने दृखरा शरीर धारणकिया चौर जिस 
अकरोत्‌ स तनूरन्या; करादिषु यथा पुरा । | तरह कि पहिले कल्पं मे भस्य शरौर . कच्छप. का 
मत्सयकम्मादिकास्तदरदाराहं वपुरास्थितः ॥७।। शरीर घ(रण किथा-था अरवकी . वार वाराह रूपं 


धारण किया ॥॥ संब स्थानों म गति ` बाले भौर 
वेद्यक्तमयं दिव्यं वेदयज्ञमयो षिभः सवके कारणभूत तथा वेद यज्ञमय परमेश्वरे यक 


रूपं छता पितेशाप्सु सब्वंगः सर्व्वसम्भवः | ८ ॥| संयुक्त वेदो का उद्धार किया श्रौर फिर घारादर्पं 
सयुदशचत्य च पातालान्ुमोच सलिले भूवम्‌ । से जल मे पवेश कर गेये ॥५॥ पाताल से पृथ्वी क्रो 


लाकर जल के उऊपर-रक्खा शरीर उस समय. जन 
ननलाकस्यितः सिदधरिचन्त्यमानो जगतपतिः॥६॥ लोक के रहने वाके सिद्धौ ने जगत्पतिका चितवन 


तस्योपरि जलोधस्य महती नौरिव स्थिता । | करिया ॥ ६॥ उस जल के उपर पृथ्वी को नौका कै 
विततल्वाद्‌ तु देहस्य न मही याति संप्लवम्‌।। १०|| समान स्थिव किया ओर कच्च रूप धारणः कर 


ततः 8 § पृथ्वी को अपने ऊपर लिया जिससे वह इव न 
रत; क्षितिं समीढत्य पृथिव्यां सोऽनङ्नरीन्‌। सके ॥१०) फिर पृथ्वी. को पक्सा करफे पृथ्नी पर 
भाक्सुग दयमाने तु तदा सवत्तकाग्निना । | पदा की रचना की, पिले सर्गम पाड संवत॑क 


तेनाभ्िना विशीर्णास्ते पव्व॑ता भुषि सर्व्शः ॥११। अधन से जलकर श्नौर खरड-खएड होकर पृथ्वी 
र. एकाणवे मग्ना पायुनापस्तु संहताः पर चासें तरफ़ फैल गये थे ॥१९॥ शरीर परलय होने 


^ पर चायु से पानी के साथ. वह गये थे, उन पाङ 
8 पत पत्रसस्ते तत्राचेलाऽमवन्‌ ॥१२॥ को जज वे पिले थे वह -वदाही रख दथा 

1 तते; कृत्वा सदीपोपशोभितम्‌ | | गया ॥९२ फिर सात दीपो मँ पृथ्वी को विभाजित 
भूराधांश्चतुरो लोकान्‌ पूष्वंत्‌ समकल्पयत्‌ १२।।| किया श्चौर पदटिते की तरह भूलोक आदि चारों 
खषटिं चिन्तयतस्तस्य करादिषु यथा पुरा । - 4 लोकों की रचनाकी ॥१३॥ जिस तरह पद्िले कपो 


अवृद्िपूल्वकस्तस्मात्‌ प्रादुभतस्तमो मयः ॥१४॥ मे खष्टि थी उसका चितवन किया श्रौर उसका 


ध ध्यान करते ही तमोमय ॥१४॥ तम, मोह, महामोह 
तमो मोहो महामोहस्तामिस्रो हन्धसंक्गितः। . .. श्रन्ध तामिख श्रर पदिलेके समान पाँच श्रविद्ायं 


-अ० ए७ माकंरदेयपुराण १७६ 


उस परमेश्वर से उत्पन्न ई ॥ १५॥ श्रौर उन्होने 
ध्यान' से पाँच भकारं के भराङृतसर्गं उत्पन्न किये । 
-जिखके बादर ओर भीतर छद प्रकाश नदीहै.रेखा 
पवैतात्मक दै ॥ १६॥ प्रथम सगं मुख्य कटलाताहै 
कारण-यद पर्वतो मे सुल्य है! इसको श्रस्राधित 
हश्रा देखकर दूखरे सगे का ॥१७॥ ब्रह्माजीने ध्यान 


. अविद्या पञ्चपूर््ैपा मादुभूता महात्मनः ॥११ 
पञ्चधावस्थितः सर्गो ध्यायतोऽरतिवोधवान्‌ | 
वहिरन्तरचापरकाशः संहतात्मा नगात्मकः ॥ १६ 
धुख्या.नगा यतश्चोक्ता भुरुयसगेस्ततस्त्वयम्‌ । 
, तं दृष्टा साधकं सगंममन्यदपरं एनः ॥ १७ 1 
; सगं तिरमकस र य्य॑क्‌ स्रोत सगं उत्पन्न हृश्रा 
तस्याभिध्यायतः सग लोतो ण | | तिष्ये काय उस सक नम नि 
यस्मात्‌ तिय्यकूपर्त्तिः सा तिय्यकस्रोतस्तः स्मृतः ॥ खरोत सर्गहा ॥१८॥ इससे तमोग॒णी, श्कषानी पथ 
पश्वादयस्ते विर्यातास्तमः पराया द्यवेदिनः । | आदिक उत्प्च हुपएट जो उल्टी राह पर चलने घाल 
उत्पथग्रादिणश्वैवं तेजाने श्ञानमानिनः ॥१६॥ व क 1 को कानी 1 ९ 
अहरः + एाविशद्विषालमका ( 6 ङ र्‌ माया चह्ाइस पकार कहं, 
ददता अहंमाना  अषटार्िगदिधात्मकाः | उनके भीतर भागे परल बे यक दूसरते आदह 
अन्त्रकाशास्ते सच्चं ्रारतास्तु परस्परम्‌ ॥२०॥ हे ॥२०॥ इस सर्गको भी श्रसाघधक जानकर ब्रह्माजी 
तमप्यसाधकं मत्वा ध्यायतताऽन्यस्ततोऽभवत्‌। | ने न्य सगं का ध्यानकिया जिससे सतोगु भुक्त 
उदधवंसोपस्द्तीयस्तु सालिकोदुध्वमयततंत ।२१।| = सगे 1 सर्ग उत्पन्न हा २९ 
_  _ _, ` | ऊध्वं सोत से उत्पन्न दोने वालों में सुख मेम वहत 
ते सुलपरीतिवहुला वहिरनतस्लनाहताः । था प्रौर बे बाहर भीतर से श्रनाघ्रृत धे तथा उनके 
भकाशा वहिरन्तश्च द्ध्वस्रोत्ः समुदवाः ॥२२॥| वारं श्नीर भीतर भकाश.भी विद्यमान था ॥ २२॥ 
त्टात्मनस्दतीयस्तु देवसगो हि स स्मृतः । | तात्मा होने के कारण यद सर्ग देवस भी क- 
तस्‌ सगव रीति ्र्मणसतदा ॥९३ लाता द, स सता बत, स ॥ 
५ = = ` ब्रह्मा न द + 
ततोऽन्यं स तदा दध्या साकं सग्ु्मम्‌ । | ध्यान किया शौर उन सत्यवादी बरह्मा के ध्यान 
तथाभिष्यायतस्तस्य सत्यामिष्यायिनस्ततः ॥२४।|| करने से ॥२४॥ ्धयकत श्रवक्‌ स्नोत साधक सगं 
भादुर्वभौ तदान्यक्तादव्बाकस्रोतस्तु साधकः | उतपन्न दा रौर चकि यद उत्तमसगं पचे उतयन् 
यस्मादर््ागव्यवर्चन्त ततोऽ्वाकूसोतसस्त ते॥२४| श श्सलिथे 2 क ^ 
४ इ ॥ इनम प्रकाश बहुत दैत परन्तु रजो. 
तेच मकाएावहुलास्तमोद्िक्ता रजोऽधिकाः ॥२६९॥ गुण श्रधिक दै ॥ २६॥ वार.बार जन्य केनेके कारण 
तस्मात्‌ ते दुःखबहुला भूयोभूयश्च कारिणः । | जिनको बहुत दुःख दोता दवै श्नौर्‌ जो बाहर भीतर 
भकाशा वहिरन्तश्च मनुष्याः साधकाश्च ते ॥२७॥| से भकाशमान्‌ दै सौ उत्पत्ति चौये म्य साधक 
पमोऽ्रहः सगः स चतुद व्यवस्थितः । 
1 र । 
विष्मैयेण सिद्धा च शान्त्या तुष्टया तथेव च२८॥ 
निद्तं वर्चमानश्च तेऽथ जानन्ति वै पुनः । 
१ स भ उत्पचि होती है वद छटा सगं है ॥२६॥ जो 
भूतादिकानां भूतानां पष्टः सग॑ः स उच्यते |॥२६।॥| फी उत्पत्ति हों 
तन्मात्रासां द्वितीयस्तु भूतसर्गः स॒ उच्यते ॥३१॥ भूतसममीं कहलातादै ॥३९॥ तीसरा सगं वैकाग्कि 


सर्ग की हु ॥२७॥ पाँचवाँ श्रलुबहसगंदै,यद चार 

प्रकार का है-( १ ) विपर्यय, (२) सिद्धि, (३) 
५ “ सव्य संमिभागरतार - दधंर उधर धुमते रहते है नौर विभागमे स्त है 
ते परिग्रहिणः स्यं संमिभागरतासतथा । | शर सरति रर इ्धील ह उनको भूवादिक 
्ैरिवष्तीयस्त॒समनियकः सतः.। ¦ | दै जिसे धन्िो की उत्पति इं दै चद पारत 
व माः 0 सम बद्िपूवैक उत्यत्न हुआ है ॥२२॥ मुख्य समं 
येषं ष्तः सगः सम्भूतो उचिपूलयः ॥९९॥ सय बक ज, :. ` 


शान्ति श्रौर (४) तष्ट ॥ ८ ॥ जो निचृत्तिश्नोर 
परन्ति का श्र्थं जानते है ओर जिनसे भूतादिकों 
वोदनाा्यशीला या भूतादिकाय ते ॥३०॥ चे गदान जो हादे नकी उतयततमथग 
भरथुमो महतः सगो विजते. ब्रह्मणस्त सः । ' | सं है शरीर तन्मा कीउलचि दूरा खं दै जो 


१८० भाएडेयषुराण 1. 


4 + नीथा है जिससे स्थावर पैदा इ है ओर पाँचवाँ 
र्यसगवतुवसतु स्या वै स्वावरा सफताः। | ति सोत लग निले तिय योनि की 


ति्यकूसोतसतु यः भोक्तसति्यगुयोन्यः स पंवम;३३ उत्पत्ति र दै ॥२ श्रौर चुडा ऊं सोत सगं है 


अ त । जिखसे देवताश्रौ की उत्पत्ति दोती दै, श्सके वाद 
ततोषटः ष्ठो तु स स्फृतः। | अर्वाक्‌ सोत सरम नाम सातवां सगं है जिससे 
ततो्वाकसरोतसां सर्गः सकषम; स त मानष; ॥३४।॥ म्यो की तत्त दोती है इसको मलुष्यसगे भी 

त 2 कहते ह ॥ २७ ॥ आटवां अयु्रहस्णं दै जिसमे 
अ्ष्टमोऽनुगरद; सेः सालतिकस्तामसश्र सः । | सात्विक श्र तामस दोनों द । इल भकार पांच 
प्ते वैकृताः सगः भाङृतास्त त्रयः स्मृताः| वैकृत श्र तीन पराकृत ये आठ सर्ग हप ॥ ३५॥ 

= _ ~ 8 । उपरोक्त ाङृत श्नौर वैर राट सगं ह तथा नां 
भरकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमः स्एतः। | कौमार सगं ह, शय भकार भरजापति के कुल 


इत्येते मे समाख्याता नव सगा; परनापतैः ॥२६॥ नौ सगं दं ॥ ३६॥ | | 
इति श्रीमाककरुडेयपुराणमे ,प्ा़तैश्ठत सगं नाम रवो अ० समापन । 


-- उछ -८द- ४ 
अढतालीसवां अध्याय 
रौषटकरिख्वाच कौषटुकिजी वोक्ते- ष्‌ 
समापत्‌ कथिता खष्टिः सम्यग्भगवता मम । हे भगवन्‌ | श्रापने खष्टि को तो विस्तारपूेक 


क मुभसे का । श्रव देवताश्नों की उत्पत्ति का हाल 

देवादीनां मवं ब्रह्मन्‌ विस्तरात्‌ तु बीहि मे॥ १ ॥| सुमे विस्तारपूर्वक यताइये ॥ ९ ॥ 
ध माकेरडेथ उवाच माक॑रडयजी बोल्ते- । 

इशला्शलेनडन्‌ भाषिता पूर्वकर्मभिः । दे ब्रहान्‌ ! पूवं जन्म मे किये हण शम कर्मो से 


(4 
सयाा या वनिका रय हताः २। म > व भु 
4 $> ॥ । ञ्ह, ! जन्म पर 
देवाचा; स्थावरान्ता भरना ब्रह्मधतुर्िधाः। पुल्ययान्‌ टी होते है ॥२॥ ३ विवर ¡ चष्ट को 


बरह्मणः इव्यैतः खष्टं नहिरे मानसास्तदा ॥ २।॥ सचते समय ब्रह्मा मे अपने मानस से देवतान से 
ततो देवासुरपिरन्‌ माञुषांश्च चतुष्टयम्‌ । | लेकर स्थावर पयत चार पकार की खष्टि रचनेकी 
सिशशुरम्भांस्येतानि सवमातमानमयुयुनत्‌ ॥ ४ ॥ इच्छा की ॥३॥ इसके अनन्तर देवता, अखुर,पितर 


शरीर मदष्य, इन चार प्रकार की खष्ठि रने की 
ुक्तासरनस्तमोमात्रा प्रिक्ताभूत्‌ मनापतेः। | इच्छा सै ब्रा ने जल दे साथ श्रपनी आत्मा.को 


क्षोजंघना 
सिषपतोन॑घनात्‌ ूल्वमयुरा जङ्विरे ततः ॥ ५॥ जोड़ दिया ॥४॥ युक्तात्मा होने पर बरह्मा की तमो- 
उत्ससनज्जं ततस्तान्तु तमोमात्रात्मिकां तनम्‌ । ध ध श्नौर उनकी जंघा से श्रछुरों 
सापविद्धा तनस्तेन स्यो की उत्पत्ति इडे ॥५॥ फिर ह्या ने उस तमोमात्रा _ 
बद्धा तनुस्तेन सयो । रतरिरजायत ॥ ६॥| युक सीर को त्यागदिथा जिससे बह शरीर किर 
अन्यां तनुशुपादाय सिरु; भीतिमोष सः! . ` | रात्रि ोगया ॥ ६॥ प 
: सपक लतो देवा धसतस्तस्व जहर ॥ ७ होगया ॥ ६ कतिर दुखा शरीर धारण , कर 
व । भीत संयुक्त खषटि रवने कौ इच्छा की तो सतेशुख 
उत्सप्तज्नं च मूतेशस्तमुं तामप्यसौ विथ; । `` | के उद्रेक से ब्रह्मा े सुख से देवतानां की खष्ट 
सा चापविद्ध दिवसं सक्वमायमजायत ॥ ८ । | इं र पिर बह्याजी ने उख शगीर को भी होड 
। क ततोऽन्यां लश्े तुम्‌ । . (५ दर सणोगुघक व ॥ 
पेतृबन्मन्य वर्तस्य ` भिर के वाद सत्वमातन युक्त दृसय शरीर धारण 
ष्टा पि ५ पितरस्तस्य नङ्गरे ॥ ६॥ किया शरीर श्रपने को पिठबत्‌ मानते ष पितरोकी 
० तामपि स भुः। की ॥९॥ पितरो की खष्टि करके प्रभु ब्रह्माजी 


"~ --~------------~~--~--~---- ==> 
"~---~ ----~---------------------------- ------- ---------------- ~ ~-~--~------------- 


र ४८ माकंर्डेयपुराण १८१ 


; - | ने उस श॒रीरको भी द्रड दिया जे दिन ध्रौर 
सा चोतूखष्टामवत्‌ सन्ध्या दिननक्तान्तरस्थिता १०॥ रानि के वीचका काल जो संध्या है वह -दोगया ॥ 


रजोमात्रास्मिकामन्यां तनु मेनेऽ्य स पथः । इ अ {9 ने 1 पृश दसस 

॥ मात्राससुदधबाः शरीर धारण निया जिससे रजोगृखटुक्त मद्ध्य 
ततो मनुष्या; सम्भूता रनोमात्ासद्धवाः 1 की 
सृष्टा मवुष्यान्‌ स विभुरुत्पसज्जं तनुं ततः। | ने उस शरीर त छोड़ दिया श्रौर चह शरीर 
६ ९ राजनि के अन्त श्रौर दिन के श्रादि का ज्योत्त्ना 

ऽहम्मखे ५ मि.दिन 

जयात्स्ना समभवत्‌ सा च नक्तान्त ४. य या९२ काल होगया ॥१२॥ हे द्विजवर ! सिःदिन, संध्या 
इ्येतास्तनवस्तस्य देवदेवस्य धीमतः। | श्नौर ज्योत्ला ( ातःकाल ) ये देवादिदेव ब्रह्माजी 
स्याता रश्यहनी चैव सन्ध्या ज्योत्स्ना च वैद्धिज १३। ऊ दी शरीर कहलाते ट ॥ १३॥ ज्योत, सन्ध्या 
श्यात्ना सन्ध्या तथेवाहः सत्वमात्ात्मकं ्यम्‌। | शोर दिन ये तीनां सतेयुणुकत तथा रान्न तमो- 


क गुरी है इसीलिये ये त्रियामिका कदलाती है ॥१४ा 
तमोमात्रात्मिका रातनः सा वे तस्मात्‌ तियामिका १४] इख कार दिन मे देवता श्नौर रानि मै शर 


तस्माहेवा दिवा रात्रावसुरास्तु बलान्विताः । | वलवान्‌ होतें तथा इसी भकार ज्योत््मे मचुप्यों 
ल्योत्स्नागमे च मनुजा सन्ध्यायां पितरस्तथा १५। श्रौर सन्ध्या मे पितरों को समना चाष्िये ॥९५॥ 


॥ अपने-तरपने समयमे ये वली होतेह शरीर निःसंदेह 
भवन्ति ब्िनोऽशृष्या विपक्षाणां न संशयः । शनो से पराजित नदीं होते, इससे उर्टाचलने 


तद्विप््ययमासा्य भयान्ति च पिपर्यैयम्‌ ॥१६॥ पर बिपरीत फल होता दै ॥ १६॥ ज्योत्ल्ा, राति, 
ज्योर्ला रात्यहनी सन्ध्या चलारययतानि पर भमोः। | दिन श्नौर खन्या ये चारों तनो यसि युक्त मथु 
्रिणोपभितानि तु ॥१७॥ बह्माजी के शरीर ह ॥ १७॥ इन चारों को उत्पन्न 

ब्रह्मणस्तु शरीराणि ५4. करने के पश्चात्‌ बह्मा ने रजोगुण श्नौर तमोगुण से 

^ चतवा्येतान्ययोतपा्य तनुमन्यां भनापति; । | यु नि म मूख ओर प्यास से पीडित दूसरा 
` रनस्तमोमयीं रात्रौ जगहे शु्ुडन्वितः ॥१८॥| शरीर धाररकिया ॥१२ उस अन्धकारमे भग्वान्‌. 


+ शरजन्मा ब्रह्माजी ने बडी भयानक दादी, मूचाली 
तदन्धकारे शुतकषामानछनदधगवाननः । चधा की उत्पत्ति की जो कि उससमृय ब्रह्माजी को 


विरूपान्‌ श्मश्रलानत्तमारब्थास्ते च तां तनय्‌॥।१६॥॥ खाने कोयत इ ॥ १६॥ जिन लोगो ने यह कहा 
१ ॥ कि रक्ता करो ब्रह्मा को मत खाश्मो चै राच्तख ` 

रक्षाम इति तेभ्योऽन्ये य उयुस्ते तु राक्षसा;ः। | कटलाये श्रौर जो यह ककर चिरलाये फ बह्मा , 

खादाम इति ये चोचुस्ते यक्षा यक्षणादद्विज ।२०। को खाजा्नो वह यक्वगण्‌ इट ॥ २०॥ फिर बयान 


॥ ¦ शीय्यर ध उसको श्रपिय भाव सेदेखा ता उनके वाल भद्‌ . 
तान्‌ दष हभियेणास्य केशाः शीय्यनत देथसः। | अ= फिर उनके शिरपर वाल नहीं य पणवी 


समारोहणटीनाय शिरसो तर्मएस्तु ते। पर गिरते ही वे वालस्तपं होगये तथा दीन उत्पत्ति । 
सर्पन्‌ षट ततः क्रोधाद्‌ क्रोधात्मानो बिनिम्ममे । | को देखकर ब्रह्माजीको क्रोध हुता नौर उनके क्रोध - 


` वरतेन कपिलेनोग्रास्ते भताः ¦ से उग्रभूत, कपिलवसविशेष मांसादारी लोग पैदा ; 
वर्णेन कपि माः पिशिताशनाः ॥२२॥| च ५५६१२ हा > वासो क ्यन करते ह ` 


ध्यायतो गां ततस्तस्य, गन्ध्वां जज्ञिरे खता; । गन्धर्व पुतो को उत्पन्न किया । चकि इनको ब्रह्मने 
जक्िरे पिबतो वचं गन्धर्वास्तेन ते स्मरतां; २३ बाणी का पान करते इए खजा धा दखलिये यद 


निषु स प्रभुः ॥२४॥ गन्धर्वं कदलाये ॥२२॥ इस रकार ब्रह्माजी ने इन । ॥ 
त क | य पमोऽ्छन्‌ । श्राट देवयोनियो की रचना की ॥२४॥ इस वाद 
ततः स्वदेदतोऽन्यानि वयां ` | श्रपने देदसे पक्षिया श्रौर पश्श्रोको उत्पन्न किया | | 


ुसतोऽजाः ससर्जाथ वक्षसथावयोऽछनत्‌ । | उन्दने सुख से वकरी, छाती चे भेदृ तथा दोनो 
गाषश्ववादराहवह्ा.पाश्वाभ्या विनिम्ममे २५॥ पाव ननोर उदर ते गाय को उत्पत क्रिया ॥२५॥ 


| १८२ माकंरुठेयपुराण -अ० ल. 
2 
„_ ~ ~~~ 

पटुभ्याञ्चाश्वानूसमातङ्गान्रासमान्छशकान्‌ भगा तथा दोनो ७ धो, ८ 

` इष्टानश्वतराशचैव नानास्पाश्च जातयः ॥२६॥ दरि" ऊ स 

न नवा रोम जहर ॥२७॥ नाना जाति कौ ॥२६॥ श्रौपधियां शौर भूलफ 
ओषध्यः फलमूलिन्या रमभ्यस्तस्य रचना श्रपने रोमं से की ॥२७॥ इख भकार पशं 
¦ एवं प्वोषधीः ष्ठा हयनचध्वरे विभुः । | शरीर श्रौपथियों की रचना करके हमा ने यज्ञ की 
तस्मादादौ तु कसपस्य ्रेतायुगञ्ुले तदा ॥२८॥| रचना की इसलिये करप के श्रादि मै धेतायुग मे 


6 यज्ञ मुख्य है ॥२८॥ गाय, चकरा, मैंसा, मेडघोडा,. 
+ वतरगदभाः ५ 
गौरो महिषो मेषः अश्वाश्वतरगतमाः । श्रश्वतर श्रौर गदहा ये सव ग्रामपशुै छव जङ्गली 


एतान्‌ ग्राम्यान्‌ पशनाहुरारण्यांश निबोध मे।॥२६।॥| पथन्नौ को खनो ॥ २६॥ श्वापद अर्थात्‌ व्याधादि, 
श्वापदं द्विखुरं हस्ती घानराः पक्षिप॑चमा; । | दौ खुर ब जसे घोडा बगैरह; हाथी श्रौर बन्दर 
ओदकाः पशवः ष्ठाः सप्तमास्तु सरीखपाः ॥३०॥ ये चारो भकार क, पांचवे पती, छठे जलचर शरीर 
वयच॑चैव मिहत साम रथन्तरम्‌ | | सातवं सपं आदि ये जङ्गली खष्टि दै ॥२०॥ गायत्री, 
९ ृचचच अत्‌ ऋभ्वेद, तरिदृत्‌, साम, रथान्तर श्रौर यज्ञोमे 'अभि- 
अगिषटोमंच यत्तानां निभ्ममे भथमान्धुलात्‌ ॥२१॥ रोम ये ब्रह्मा के पथम शख से उत्पन्न हृष ॥ २९ ॥ 
यलुषि तरेमं. छन्दः स्तोमं पंचदशं तथा । यजुर्वेद, त्रिपुभदन्द, स्तोत्र रीर पन्द्रह बृहत्साम 
ृहत्साम तथोक्तञ्च दक्षिणादखजन्ुखात्‌ ॥२२॥| ब्रह्माजी ऊे दक्षिण मुख से निकले । ३२ सामवेद, 
सामानि जगरीच्छन्दः स्तोमं पंचदशं तथा । | अगतीचन्द, तथा पन्द्रह स्तोघ, वैरूप शौर अति- 
वैरुपमतिरा्न्च निम्मसे परिचमान्ुसात्‌ ॥२३।| त ब्रह्माजी के पश्चिम सुख से उत्पन्न पः ॥ ३२॥ 
एकरविशमथरव्वाणमातय्यामाणमेव च । | इकीस अथर्वण, रस्या रुधुपदन् ननोर वैराज 
अबुष्टुभं सवेरानद्ुत्रादख्जन्युखात्‌ "॥३४।॥ को ब्रह्माजी ने श्रपने उत्तर मुख से खजा ॥ ३४॥. 
विचुताऽशनिमेषां्च रोहितेनद्रधनूपि च । | विजली, वज्र, मेघ, रोदिषी, शद्रः धष शीर 
बयांसि च ससञ्जादौ कटपस्य भगवान्‌ विभुः ॥२४॥| पचचियां को मगवान्‌ जह्याजी ने कलप के रादि मे 
उावंचानि मृतानि गात्रभ्यसस्य जिर । खजा ॥३५॥ ब्रह्माजी ने उच्चावच भूतो को पने 
५ शरीर से उत्पन्न किया तथा देवता, श्रस्ुर, पितर 

सृष्टा चतुष्टयं पूवव देवाुरपितृन्‌ भजा; ॥२६॥ 


श्लौर मयुष्य इन चारों को पिले रचा ।२६॥ इसके 
तताऽखनत्‌ स भूतानि स्थावराणि चराणि च | | श्ननन्तर स्थावर श्नौर जङ्गम प्रारियोको तथा यत्तं, 


यक्षान्‌ पिशाचान्‌ गन्धव्वीस्तथेवाप्सरसांगणान्‌॥ ३७ न श्नीर उसी प्रकार .श्रप्सरागणों 
। ध ५ रक्षांसि भ उत्पन्न क्या ।२३७। तधा नस पकश्चरः रात्तसः 
नरकि्र सि चयः गृगोरगान्‌ । यष्ट, पती, ग, खरग, श्रव्यय, मयय, स्थावर र 
अञ्यर्यंच व्यय्चव यदिदं स्थाणु जङ्गमम्‌ ॥२८॥॥| जङ्धम श्चादि की रचनाकी ॥२॥ इनम जो जिसका 
तेषां ये यानि कम्माणि मा्‌ खष्टः प्रतिपेदिरे) "1 कम पिते धा वदी खि दने पर इरा तथां वार- 
तान्येव प्रतिपद्यन्ते सज्यमानाः पुनः पुनः ॥३६॥| वार जन्म लेने पर भी वदी हरा ॥ ३६॥ दंसो 
हिलाल शक्रे पम्पधममाहतादते । | शरीर ध चदथ जर रता, रीर ५.७ 
४ ॥ न्ते ॥ । स्त्य शार भट इनक्रा परस्पर सम्बन्ध . स्थापत 
(त क तेत्‌ तस्य रोचत। ।५४०॥|हु्ा ॥४०॥ इद्दियो केशरं भूतो भे श्रौर शरीरो 
इन्दयायवु भृत्छरस्पु च सम्रभुः। | प्रसु ब्रह्माजी ने नाना पकारं का संयोग, स्थित 


* ] ष, 
भामां विनियोगंच धतिव व्यदधात्‌ सयम्‌॥४१।॥ विया ॥ ४९ ॥ बहाजी ने आदि मे ही जोकि ना 
ताम्‌ स्पच 1 दूच्यानाञ्नच्‌ भ्रपचनम्‌ । रूप तथा कर्मके भपञ्चं श्नौर देचताश्रोके चेदशब्द 
वेदशब्देभ्य एवादौ देवादीनां चकार सः ॥४२॥ अदि की रचना.की ॥ ४२॥ जो-नाम.कि ऋषियों 


ऋषीणां नामधेयानि -याथ्च दवेषु.खषटयः ।. . । ॐ परित थे तथ! जो खण देवताश की थी उसी 


२ 
"~^ 


भ्र° ४६ ~ माकण्डेयधुराण १८३ 


-------------------------~---------- 
शव्वेय्येन्ते प्रसूतानामन्येषाञ्च ददाति सः ॥४३॥॥ भकार यत्रि के चन्त होने `परं ब्रह्माजी फिर वनांते 


| ववे। ` .&॥४२॥ जिस पकार रजगला सी तुकाल मे 
यथर्ताहृत॒लिङ्गानि नानारूपाणि पथ्यये । जैसा रूप देखती है वैखा ही चालक उसके उत्पन्न 
दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु ॥४४॥| दोता ट ३ मकार युगादि मे जिसका जो भाव 
एदि था उसको ॥४४॥ उसी प्रकार ्व्यक्तजन्म ब्रह्माजी 
4 ऽञउ्यक्तजन्य ् {4 [ग्व = 
| 1 यस्तु ध बरह्मणो ५ ते याति व्यतीत होने पर ज्ञाग कर प्रत्येक कल्प 
4 पर्नव्यनत प्रबुद्धस्य करे कटपे भवन्ति ब ॥४५ | म स्वा॥४५॥ 


इति श्रीमारकर्डेयपुराण मे उष्टिकरण नाम ण८वाँ रध्याय समा । 


-->ये>ः€<,८९ - 
उनंचासवां अध्याय 
बरौटकिरुबाच  क्रौुकिं वोल्े- 
अर््वाकसरोतस्तु कथितो भवता यस्तु माषः । दे माक॑रडेयजी ! आपने मचुप्यों का अवाक्‌ 


श्रोत ती भसे का श्रव श्राप मदुष्योकी उत्पत्ति 
व्रह्मन्‌ विस्तरतो बहि व्रह्मा समखनदूयथा ॥ १॥| किस धकार हुई यद चिस्तार पूर्वक कट ॥ १॥ हे 


यथा च वर्णानखनदूयदूगुणशच महामते । | महामतिमान्‌ ¡ शरीर युर, कम, के असार जो 


यचच येपां स्मृतं कम्म विभादीनां वदस्व तत्‌ ॥२॥ ब्राहमण रादिकं के वर हु उनको भी किये ॥२] 
माकरडेय उवाच ( वोले- ५५ 


व हे सुनि { सत्यसंध ब्रह्माजी ने खषटि रचने.के 
र्मणः नतः पूव सर्याभिष्यायिनस्तथा । | समय पहिले जास खी धुरपों को अपने सुख से 
-भयुनानां सदन्तु युखात्‌ सोऽथाखजन्धुने ॥ ३ ॥| उत्पच्च किया ॥३॥ वै सव सतेगुणी इण शरीर 
जातास्ते युपपयन्ते सत्वोद्िक्ताः सचेतसः | | पने तेज से व लगे १ छती 

सदस्मन्य ्षस्तो मिथनानां ससज्जदह ॥ ||| स अन्य दार -पुरुपा को पदां कया ॥४॥ 
ने रसोदा 8 शुर श्वाय | | डे लव रोण से युक जे भोगी, आर्‌ कधी 
एनान स्वं रनसाद्रक्ताः शप्त + । | उत्पच्नहुपः तथा किर श्रपनी जंघाश्रसे दूरे दज्ञार 
नयत्‌ सहसन्तु ्नडानामूरतः पुनः ॥ ५ ॥| सी-ुलयो ॐ जो को उतयञ् किंया ॥५॥ वे सव 
रजस्तमेभ्यायुद्रिक्ता ईदाशीलास्तु ते स्मृताः । रजोगुण श्नौर तमोगुण से युक्त ध ५ 
¡सहस्रम + ध वान्‌ हप तथा इसके श्चनन्तरः ब्रह्माजीने श्रपने पेयो 
पूभ्यां सदसरमन्यच्च मिथुनानां ससज्जं ह ॥ ६ ॥ ~ ् > वौ उन्पन्न वि 
यै नीका शसभेतपः से दज्ञार खी-पुखुपों के मिथुनों को उत्पन्न किया ॥ 
उद्रि्तस्तमसा सर्व निःथीका ह्यर५चेतसः। | ते सव तमोुणर्‌ क, श्रीदीन श्रौर स्प बुद्धिबाले 
-ततः संहपंमाणास्ते दरन्ोत्पन्नास्तु प्राणिनः ॥ ७ ।| हृ । वे सच प्रसन्न चित्त प्रीर स्ी-पुरूष के जोड़े 
ववम यापि ~ सेयुनाापचत्ः से उत्पन्न इषः ष र सवको श्रापस मे मैथन से 
६ स „| , , | वड़ी प्रसन्नता है रौर उसी समय से इस कल्प 
ततःभमृति कलेऽस्मिन मिथुनानां हि सम्भवः ८ ।| र गुन खे ही दि दोतीदै॥ =॥ उस काल 
मासि मास्यात्तव यत्‌तुन तदासीत्‌ तु योषिताम्‌ । | न्नियो को ऋतकाल न दोता था श्र॑तः मैथुन करने 
तस्माद्‌ तदा न सुपु वुः सेवितेरपि मेधैः ।। & ॥| पर भी खन्तानोतपत्ति न दोती थी ॥६॥ केवल 
आयुषोऽन्ते भसूयन्ते मिथुनान्येव ताः सत्‌ ।. , | त य॒ त 
तवशरभूरि ष तिय 4 9 | वदा कसते थे श्नीर जव दी से शस कटस्य मे मेथुन 
तत्‌, शर्त कलपेऽसिन मिनानो दि स ^ से भजोत्पत्ति दोती है ॥ १० ॥ ध्यान च्रौर मन से 
ध्यानेन मनसा तासां नानां जायते सव |: | ही णक वार सन्तति उत्प दोती धी । शब्दादिक 
शरब्दादिर्विपयः शद्धः भत्येक पंचलंक्षणमू्‌ ॥११॥ | पांच लक्ए भत्येक के शद्ध थे ॥ ११ ॥ यदी प्रजा 


न्नचस्था समाप्त होते समय खी पुरुप सन्तति 


-१८४ माकंरुडेयपुराण अ० ४६ 


इत्येषा मानसी सया पच्य वै प्रजापते; । | पति व मालुम द ध 

- यैरि < उत्पन्न दुरं खष्टि सव जगतपृरं है ॥ १२॥ | 
तस्यान्वयायसम्भूता १ ध ॥ १२ तो 
सरित्सरःसयुद्रंए्व॒ सेबन्ते प ५ । | थे तथा उस युग मे जादा रौर गमी कम पडते ये 
तास्तदा शसपशीतोष्णा युगे तरिमश्चरन्ति ३१३ ॥१३॥ दे मदामति करषटुकिजी । प्रघ विषयो म उन 
त्ति स्वाभाविकीं भक्षा विषयेषु महामते । | की स्वाभाविक दति थी शरौर उनको ग को विष्न , 
न तासां भरिवातोऽस्तिन धो नापि मत्सरः॥|१४॥| था न को दे शनौ = कोई ईषया ॥९९॥ वे लोग ८ 

कतीति निता ९ \, विना घर फे दी पतों शौर समुद्रौको सेवन करते 
सेचिन्यो छनिकेतास्त॒ सव्यंशुः | | थे तथा पसन मन से इच्छा रदित विचरतेधाश्था 
ता वै निष्कामचारिण्यो नित्य शुदितमानसाः॥१५॥ इसके वाद बह्माजी ने पिशाच, सप, रक्तस, अभि. 
पिश्ाचोरग-रकषंपि तथा मत्सरिणो जनाः । | मानी चनौर हैषयांगुत लोग, प, पक्ठी, मगर, 


6 = ६ । म्ली रौर विच्छ आदि को स्वा ॥ १६॥ तथा 
पशवः परक्षिणर्चंव नक्रा मत्स्याः सरीरखपाः।१६॥ सिर श्रवारक, अण्डज शादि पथं को चेदा 


अवारका दण्डा वा ते दयधमम्पमसूतयः | क्रया । ये सव धरम, मूल, फल, पुष्य, ऋतु श्रौर 
न भूल-फल-पष्पाणि नात्तवा षत्सराणि च ॥१७॥|| चप क बिचार श्रथवा क्ञान से रदित थे ॥१७॥ उस 

५ ! छो नात्य पर्सी । खिको सव कालगे ल था, तथा धर्म श्नौर शील 
सन्वकात्तसुसखः कलत नात्य लत उस समय कु नथा, केवल समयके व्यतीत. होने 
कालेन गच्छता तेषां चित्रा सिद्धिरजायत ॥१ पर 1 1 ॥ सिद्धि ह्योत थी॥ 

च तेषां क्व उन लोगां को पूवाह श्रौर मध्याह्न म ठति नीं 
ततश्च तेषां (& मध्याह्न च विचृक्ता । दयोती थी, परन्तु जव वे लोग इच्छा करते ता उन ) 
पुनेस्तथेच्छतां तक्षिरनायासेन साभवत्‌ ॥१६॥| को अनायास ठति दोजाती ॥ १६॥ जिस # 

इन्ताज्च ; समजायत इच्छा करते थे बह पूरी हो जाती थी तथा जल \. 
( तयायासो पतत एवनापरत । | र माना अकार की सृतम सिद्ध्या रख शौर . 
अपां सौक्ष्म्यात्‌ ततस्तासां सिद्धिनाना रसोहसा २० उरलास पूवक प्रात होजाती थीं ॥ २० ॥ उन लोगों 

> ९ को मनवांदित फल देने वाली सिद्धि भप्त दोती 
4 र सव्यकाममदायिनी । योर प्रजा संस्कारों से रदित तथा ₹मेशा 
-असंस्काय्यः शरीरथ परनास्ताः स्थिरयोवना॥|२१॥| जवान वनी रहती, थी ॥२९॥ उनके सङ्करप के विना 

॥ कं त दी थजा मिथुन रूप से उत्पन्न होती थी तथा जिख 
तासां विना तु सङ्खं भाषन्ते पुनाः भनाः । | धकार वे पक साय वेदा होते थे उसी करार पक 
समं जन्म च रूपच भ्रियन्ते चवे ताः समम्‌ ॥२२॥ साथ मर भी जते थे ॥ २२॥ श्च्छा श्रौर देष से ` 


अनिच्छादवषसंुक्ता वर्तन्ते त॒ परस्परम्‌ । रदित वे श्राफस मे रहते थे, उनके रूप श्नौर श्राय ` 


दुर र < समान थे रौर उनमें कोई अधम चनौर उत्तमं नधे 
ठंरथरूपागुषः सव्या श्रधमोत्तमतां विना ॥२३। ॥२२॥ माली चार इन्र बयो फ उनकी शाय 


चत्वारि ठु सदस्तणि वषाणां मादुषाणि तु} | होती थी तथा उनले कमी के जीर श्रापत्तिन ,_ 
आयुः्रमाणं जीवन्ति न च छंशाद्धिपत्तयः ॥२४ | होती थी ।२४॥ पृथ्वी से उनका सम्बन्ध होने के ¦“: 


चनया तिमिः | यी सथ र 
कालेन गच्छता नाशसुपयान्ति यथा रना; ॥२५॥| को पात होते थे उसी तरद वह सिद्धि मी नषटदो 
तथा ताः कमशो नाशं जगुः सवव सिद्धयः । , | जाती थी ॥२॥ इसी प्रकार जव सिद्धियां नघ हो 
तासु सर्व्वासु नष्टासु नमः भद्युता नरा; ॥२६॥| जाती व व युत दोक पूधवी 
ग्रथशः । ह्विका; | ` | पर ॥ राच जोग पायः कल्प चत्त की ` 
भायशः करप्ास्ते सम्भूता चहसं्गिताः । | वर गसं र व | 
समयपमोगव तासां तेभ्यः भनायते ॥२१॥ य ओर दनक मोग भौ उसी जार पेद जेय, `. 


""---------------~------.~ ~. 


ध ० ~ ~~ -------न म 


` श्र .४& २४ , -माकंरुडेयपुराण ` १८५ 


वयन्ति स्म तेभ्यस्तास््ेतायुगषुसे तदा । | जवर ता भेष क २ ५ ४ 
त रज्र काल म .उनको कस्मात्‌ प्रीति उत्पन्न. दुहे ॥२८॥ 
त्तः फालेन षै रागस्तासामाकरस्मिकोऽमवत्‌ ः फिर हर महीने मे ऋतुकाल श्रौर गर्भोत्पत्ति दोन 
मासि मास्यात्तवोलत््या गरभोत्पत्तिः पुनः पुनः । ¦ | लगी तथा. फिर उन गरदसंशरकं चो भ राग यैवा 
रागोलत्या ततस्तासां दृकतास्ते शृहसं्निताः ॥२६॥| होने लगा ॥२९॥ हे घान्‌ । उन बतो से. जो शनन्य 
मरह्मननन्वपरेषान्तु पेतुः शाखा महीरुहाम्‌ । . . | क र व त र आं 
। वनि ति । . |> , । | भूषण उत्पन्न हाने लगे ॥३०॥ उनम दी .छन्द्र-गंघ, 
वस्राणि च भदयन्ते फलेष्वाभरणानि च ॥३९॥ वं शौर रस से युक्त विना मकल क प्रु से भरे 


तेष्वेव जाधते तेषां गन्धवणंरसान्वितम्‌ । | हण यौन उत्पत होने लगे ॥२९॥ त्रेतायुग भै इसी 

शमाक्षिकं महावीय्यं' पुटके पुटके मधु ॥२१॥ क लोग रहते थे कि व 
वरदयनिति ~ 3 लमा ॥ ३२ ॥ममतायुक्त ह उन चु 

र ५०९६ स्म॒ युखे परेतायुगस्य ध | त 

‡ कलिान्तरेणेव पुनललोभान्वितास्तु ता; ॥३२॥ चार से न्ट होगये ॥ २३॥ फिर उनमें श्रापसु मे 

ृ्तास्ताः प्यशन्त॒ ममत्वाविष्टचेतसः । , | भगे होने लगे शरीर उन भग को मिटाने :ॐ 

नेथुस्तेनापचारेण तेऽपि तासां -महीरुहाः ॥३३।॥| लिये उन्दने परो का निमा किया ॥ २४॥ प्ख 


ततो दन्द्ान्य॒नायन्त शीतोष्णकन्धुखानि वैः। | क अ) 


श ॥ 

पास्तु हल्दोपघाताथ चक्रः पूं पुराणि तु ॥३ ५॥| अंगुलियों से नाप कर दुग बनाने लगे तथा नूपुके 
भरुषन्येषु दुर्गेषु .पववतेषु दरीयु च । ! | किये एक प्रमाण भी स्थिर किया ॥ ३६॥ पृथ्वी की 
संयन्ति च दुगांणि वक्षं पाव्यंतमौदकम्‌ ।*२५॥ १ परमार का सव स ग 

कृभिम त अतः | | वील पराच च् य असः चील ष भा 
त न भिलात्मनोऽदगुलेः | पक्त बालाग्र तथा तीस वालाग्र का पक निष्कल 
मानाथानि भमाणानि तास्त प्व भवनिरे ॥२९।॥ शौर तीस मिष्कल का पक यूका शरीर तीस युका 
परमाणुः परं सृ्ष्मं॑तरसरेणमहीरजः । ' | का एक यवोदर दोता था ॥ ३७॥ श्रौरः ग्यारदे 


वालाग्रर्येव निष्काञ्च युकराचाथ यवोद्रम्‌॥२७॥| यवोदर का ध छ चीर ग्यारह 1 
; तेषां ध थाङः पक श्रयुल दाता छ; गुल का पक पद्‌ र तिपि 
भ ४ तेपां यवमयं तवाद तम्‌ । दो पद्‌ की एक विपरित होती ॥३८॥ दो त्रिपस्ति 
पट्टः गुलं पदं तच्च वितसतिदठिगुं ५ सपृत्‌ ॥२८॥॥| का पक दाय जिसको. कि व्राहमधतीयादिवेधन भी 
द्र वितस्ती तथा हस्तो ्राह्मयतीथादिवेष्टनम्‌! कहते है दोता है तथा चार दाथ का एक धलुष 
चतुरर्तं धलुरद॑ण्डो नादिकायुगमेव च ॥२ ¦ जिसको ड या नाडिकायुग भी कहते ह होता 
धुं दे स्स ठ गव्यतिस्तचतुगंणप्‌। | ॥३९॥ दो दन्ञार धटुष की एक गव्यूति (दो कोश) 
ख क 0 दोती है श्नौर चार दश्ञार्‌ धनुष को विद्वान्‌ लोग . 
भोक्तञ्च योजनं पह् संख्यानाथमिदं परस्‌" ४०।|| संख्या फे रथं योजन कहते दै ॥४०॥ चार दुगौ मँ : 
चतुणासथ दुगाणा ससम्त्थानि प्रीणि तु। | से तीन तो उन्होने श्रपने उढनेके लिये घनाय  ..“ 
चतुथं छृतरिमं -दुगं स्च $य्यात्‌ सतस्तु ते ॥४१॥| चौथा शृनिम सवने मिलकर तैयार किया ॥४१॥ , 
पुर्व. खेटकंचव तद्वदरोणीपुखं दविजः । ; पुर, सेकं श्नौर उसी प्रकार द्रोशीसुख, शाखानगर . 
शाखानगग्कंचापि तथा कव्बेटकं त्रयी ॥४२॥॥ श्नौर तीन.कर्वयक वनाये ॥४२॥ किर उन अन 
ग्रामसह्मेपविन्यासं तेषु चावसथान्‌ पृथक्‌ । शरीरः रने के अलग-अलग सन वनाय ,. . 
व तषु ९, स्तम्‌ ध ] ।४२॥ खा्र्ो से.धिरे इष गदु शमर द्ग वनाये ५ ४२. . 
तथवेमरकृरच स्ततः १२ "| पुर पक कोस चौड़ा चौर गाठ कोस लम्बा. डोता' 
योजनाद्वद्धविष्कम्भमष्टमागाय तं पुरम्‌ । | है, इसमे पानो का उतार पूर्वं क्री ओर द्योता, 
पागदकवनं . शस्तं, शद्रवंशषहिगं सम्‌ .॥४४| रीर इसके बादर च चांस लगतेः जते ह 1७४ , 


, १८६ ` . भाकरडेयषुराण । - शरण 
५ ~~ 
, -तददधेन तथा खेटं तत्पदेन च क्वम्‌ | इससे अधे - को खेटकं श्र खेटक से जो राधा ` 


। ४ हो उसे कर्व्वटक कदते दै 1 कर्वटक-के आधे को 
| न्यूनं ्णीुखं तस्मादष्टमागेन चोच्यते ।॥४५॥ दरोखीमुख शरीर चीथाई को 'अन्तमाग कते दह ॥ 


ह हीनं पुर॑ ब्भवदुच्यते। , | वह इग जिसमे खा न हो चह. पुर कहलाता दै 
भकारं परिसाहीनं भुर & श्नीर जिसमे मन्ी, खामन्त आदि रहते दय 
शाखानगरकंचान्यन्सन्वि-सामन्त-ृक्तिमत्‌ ॥४६।|| भोगा की सामध्री बहत हो वह शाखानगर, कात , 


तथा शद्रननप्रायाः स्वसम्द्धिषीवलाः हे ॥४६॥ तथा जच्छ ्रधिकतर शद्ध लोग रते दं 


षत्रोपमोग्यभमध्ये वसतिर्रामसहिता ॥४७ ध = १ 
ग्य हो उसकी 

अनयसमाकगरादेया का्ययुदिश्य ४५ । | नगर से बादर किसी कायं बिशेष का उदेश्य कर 

क्रियते वयति; सावं विङ्ञेणा वसरिनेर के जो बस्ती वना जाती ह उसको चस्ती कहते 


ुष्टमायो विना करैः परमूमिचरो बसी । | दै ॥४८॥ जय विन चेतो क दी दूसरे की भूमि पर 


एवाननं 4. रहने वाले लोग रहते हो, वह दुष्ट चाहे राज्ञा के 
राम जो रानवहमसंभ्रय ॥४६।| भिय ही को न यं उस प्राम को अकी कहते 
शकटारूदभारटैथ गोपलेर्िपणं -विना । | ॥४६॥ जहाँ परः -गुश्राले अपने चर्तनभाडो, को 
गोशस्स्तथा घोषो यमरेच्छाभूमिफेतनः ॥५०॥ गाड पर लाद ४ रखते दो, जां दुकानें आदि 
त एवं नगरादीसतु कूला षासा्मातमनः। = | न हो» तथा जदा भभ का समूह रला हो 
निकेतनानि दन्द्रानां चक्ररावसथाय वे ॥५१॥ सा सि शा शो 

नानि न्द्रा 

गृहाकारा यथा पव्वं तेषामासन्‌ महीरुहाः 


है ॥५०॥ तव श्रपने रहने. के लिये नगर श्रादि चना 
कर उन्दने सक्रान बनाये जिनमे स्ी-पुरुष जोड़े 

† संसृत्य तत्‌ सव्व चतरर्वश्मानि ताः मनाः ॥५२ 
दृक्षस्यवं गताः शसास्तथवञ्चापरा गताः । 


रहने लगे ॥ ५१ ॥ जिस पकार पटिले वे चुतो. .के 
नीचे.रहते थे उखी विवारः को सेकर उन्दने श्रते ५ 
नताश्चेवोन्नताश्चेव पदस्यालाः भचक्निरे ॥५२॥ 
याः शाखाः कस्पदक्षाणां पव्वमासन्‌ द्विजोत्तम्‌ । 


रहने के मकान वनाये ॥ ५२ ॥ चष्तकी जिस प्रकार “ˆ 

छोई ॐ ची, कोई नीची -शाखय होती "है उसी 

प्रकार प्रजार््रो ने ऊवे नीचे घर बनाये ॥ ४३॥ 
ता एव. शाखा गेहानां शलाखं तेन तासु तत्‌॥५४। क ५ वी ९ ५. 

। । 
कृ इनद्रोपातं ते वा्तोपायमचिन्तयन्‌ । लिये वनाः ॥ ५8 ॥ जव उन ` खी-पुरूषोँ ने पक्र 
नष्टेषु -मधुना साद्ध॒करषटक््वरोषतः ॥४५॥| दूसरे के उपधात का उपाय सोचा तो मधु सदितं 

` विषादव्याङ्घलास्ता वे भरजास्तृष्णाक्षधार्हिताः। | वे कल्प वृत समूल नष होगये ॥ ५५॥ इसपर चे 
तत॒ः भोदुव्बभो तासां सिद्धिसेता्ुखे तदा ॥५६॥ 6 व ड्य स 
ख युर दय हश्ा॥ 
वाततास्साधिता चन्या दृष्टस्तासां निकामतः; | | उनके विना चदे हुए दी वषा इई नौर उस वर्षा 
तासां दृष्टयदकानीह यानि निम्नगतानि वे ॥१७॥| का जन पृथ्वी चर रहा तथा नदिय मे चला गया 
 इष्टयावरुद्धेरभवत्‌ सोतपखातानि निम्नगाः । | ॥५७॥ उस वषां के जलस्े जो प्रथ्वी पर गिरा ` 
ये पुरस्वादपां स्तोका आपः पृथिवीतले ॥४८ | चोतः सद श्र नदिं अरग ॥५८॥ किर भूमि 
} ततरो भूमेश्च संयोगा दोपध्वस्तास्तदाभवन्‌ । 
अफातद्ृष्टाश्चातुपा प्रम्पारण्याथतुश ॥५६। 
¡ छतुपुष्पफलाश्चेव रक्षा गुस्पश्चि जिर । 
+आदुभावस्तु- बरेतायामाचोऽयमौषधस्य तु ॥६.०॥ 
तेनौषधेन. . वन्ते ` भ्रनासेतायुगे . एने 1... 


श्रौर जज के संयोग से विना जोते श्रौर वोये हुए 

गव श्रोर जङ्गल की चौददः प्रकार की श्नौषः 
धियां उत्पतन इहै ॥५९॥ तथा छतु के "पल, फल, 
छृ्त छर गुत्स इत्यादि भी उत्पन्न दए, इस पकार 
नेता युग फे रस्म मे शओओौषधि्यों का प्रादुमाव 
इश्मा ॥ ६० ॥ हे पुनि ! भरेतायुग भँ ` प्रजाजन उन्हीं 
श्रौषधियों पर निभर रदते थे कि कस्मात्‌ उनके 


॥ 


श्र०.४६ ;माकंरेयषुराण | . १८७ 


राग-सोभौ समासा भजाश्चाङसिपिकौ ठदा॥६१॥| राम रौर लोभ पेदा दयोगये ॥६१॥ फिर उन लोगों 
तरस्ता परहन्त नदीमेत्राणि पर्वतान्‌ । | न क १ शा 
पारद इर्त, छ्रोष गुट्मां को अपने-शपने लिये 

व चलम्‌॥ इथिया लिया ॥ ६२॥ ह द्विजवर ! इस दोषर.से 
अग्रसह्‌ भू युगपत्‌ तास्तदौषध्यो , महामते ॥६२।॥ उन श्रौपधि्यो को पृथ्वी हटात्‌ लय करगंई 1६२ ॥ 
युनस्ताछ भरनषटा् विभ्ान्तास्ताः धुन; प्रनाः। | उन श्रौपधि्यो फ न दोनेपर मजा चुधासे इसित 
ब्रह्मणं शरणं नगः धरधाततः परमेष्ठिनम्‌ ।६४॥ शरोर भानत होकर परमेश्वर तय की शरण मे ङ 
स चापि तत्वतो तवां तदा अस्तं षसुन्धराम्‌ । | ॥६७॥ बह भगवान्‌ अहा भी उस पृथ्वीकोजो 
वत्सं कतां सुभेरन्त॒ दुदोह भगवान्‌ विथः ।६५॥ धोषधियों को थत करग थी तत्व से जान गये 
दुग्धेयं गौस्तदा तेन शस्यानि पृथिवीतले । र अवा र न श 

प इहा ॥ ६५॥ एफर पु द्ध स्थत पर 
नहे तानि वीजानि ग्राम्यारणएयास्तु ताः पुनः. ६९६| बीज उतपन्न ह शरीर उन वीजो की उत्पचि भ्राम 
ओषध्यः फलपाकान्ता गणाः सप्तदश स्मृताः। मे इहै ॥ ६९॥ फल के पके पर श्नोषः 
्रीहयश्च यवाश्चैव गोधूमा अणवस्विलाः ॥६७॥|| धियां निम्नलिखित सनद मा्‌ की ६, यव, 
मिथो बदा कोरदूषाः सचीनकाः | गोधूम, अणव, तिल ॥ ६७ ॥. कौनी, . उदारः दूषा, 
शापा धुत भद्राय भिषावाः सद्ालयसाः ६९८ | जीवाः आ दर भद, न्यः इतषौ ॥ ९८॥ 
आदकाथणकाश्वैव गणाः सक्ठदश स्पताः । न्नौर दक तथा चना.यदी सत्र परकारकीत्राम्य 
येता ्ओपधीनान्त प्राभ्यां जातयः पुरा ।॥६६॥ | भ्ौपधियां पिते उत्यच इ ॥ ६९॥ यक सम्बन्धी 
ओषध्यो यकियाश्ैय ्रा्यारण्याथतुदश | | श्रौपधियां जो रो ्ौरबनों भे चेदा दती ह 
नीयश यवार्यैव धमा अरणवस्तिलञः ।॥७०॥| चौदह धकार की £ यया नीह ववि पम 
मियङगुरक्षपा देते अष्मसत इलतथकाः । श्नौर तिल्ञ ॥ ७० ॥ तथा कौनी, इकललथी, श्यामाक, 
श्यासाकरास्लथ नीषारा यत्ति सगवेधुकाः ७१।॥ नीवार, तिल, गवेष ॥५९॥ व 


इरुविन्दा म्कटकास्तथापेगुपरधाश्च मर्कटक, वेखुपरथ इस प्रकार भ्रामं ओर वरना "मे 
हरुबिन्दां मकटकास्तथविशुग्रप व 
सता श उत्पन्न होने वाली यद चौदह रा है ॥७२ ॥ 


| १ स्मृता नो & ॥ ^ 
्रम्यारण्याः सृता यं ता ओषध्य चठुदंश॥७२।॥ जव योने पर भी श्रौपधियां षृथवी पर अंहस्ति न , 


यदा भरसष्टा ्रोषध्यो न रोहन्ति ताः पुनः । ह .तो बरहमाजी ने उनकी इद्धि के लिये अन्य 


तत १ 8 [1 ५ । ( चकरा 
तः च तासां दद्धययं वार्तोपायं चकार ह ।॥७२॥| उपाय किया ॥ ७६॥ फिर स्वयम भगवान्‌. हा ` 
ब्रह्मा स्वयम्धुभगवान्‌ इस्तसिद्धिश्व कप्मजाम्‌। | ने श्पनी कर्मजा दस्तसिद्धि को रा श्रौर उससे : 
प्भृत्यथौषध्यः. कृष्टपच्यास्तु ज्गिरे ॥७४।॥ वे रु्पच्या शरीपधियां उत्पन्न होमे लीं 1.७8 ॥ , 


- संसिदधायनतु वार्तायां ततस्तासां सवयं ममुः । | इ बाल क सिद दोने पर लम भय व 


वरणानामाभमाणा्च धरममान्‌ धर्मतां वर। | शण्किमी ! नर धर्म लन के लिये लोको के 


सोकानांसरगववर्णानां सम्यण्म्पारथेपालिनाम्‌॥७६॥| लव वयु के आथरमौ ज्ौर धरमोको निचय किया ॥. 


भ्ानापुत्यं बाह्मणानां सप्तं स्थानं क्रियायताम्‌ । ' | जिया करनेवलि ब्रा्णोके लिये भाजात्य स्थानद 


स्थानमैन्द्रं ष्रियाणां संगरामेष्वपलायिनाम्‌ ॥७७॥| तया युध मे न भागने बलि नियो के लिये इन्द्र, 
स्थान है ॥99॥ अपने धमे मे स्त वेषया को चायु 


वैश्यानां मस्तं स्थानं ' स्वभमम्यमडुवततताम्‌ । 


म्या र प्रजान के लिये उनके न्याय श्रोर गुणक अशुसार 1 
मयादा स्थापयामास यथान्यायं यथागुएम्‌।७५॥ नान समापित च ॥७९॥ ह धमो येष 


+ स~~ ~ 


। १८८ 


ग्म ५० 


न्धं शुद्रनातीनां परिचरय्यालुव्त॑ताम्‌ ।७८। 
आ्ठशीतिपदस्ाणाभृषीणामूदुधवरेतसाम्‌ । 


लोक श्रौर सेवात्रती शद्धो को गन्धर्वलोक मिलता 


दै॥७८॥ जो लोग गुर के स्थान मँ रदेकर शुखकी 
सेवा करते वे अद्सी दज्ञार उध्वैरेता छ षीश्वसं 


सतं तेषान्तु यत्‌ स्थानं तदेव गुरुवासिनाम्‌ ॥७६। के स्थान को जाते हँ ॥७६॥ सप्तप्यं का जौ 


सदर्ीणान्तु यत्‌ स्थानं स्मृतं तद्रे पनौकसाम्‌ । 
प्ो्ापत्य गृहस्थानां न्यासिनां बद्यणः क्षयम्‌ । 


योगिनासमतं स्थानमिति वै स्थानकटयना ॥८०॥ 


स्थान है वद वनवासियो को मिलता है तथा 
प्राजापत्यं स्थान गरृहस्थियों को श्नौर बरहयस्थानं 
खन्यासियो. को मिलता श्नौर योगियों को मोत 
स्थान पातत होता है, इस प्रकार प्रजाश्मोँ के लिये 
सथान की कल्पना फी गर ॥ ८० ॥ 


इति श्रीमाक॑रुडेयपुराण मे खषटिपकरण नाम ४्ष्वां अध्याय समाप्‌ 1 
~" उे-ि>क -- 


पचासवाँ अध्याय 


भाकैरडेय उवाच 
तंतीऽभिष्यायतस्तस्य ज्षिरे मानसी; भरना, । 


तच्रीरपयुरपननः काय्यैस्तेः कारणैः सह ॥ १॥ 


ेजङ्ञाः समवर्तन्त गाप्रभ्यस्तस्य धीमतः । 

तै सर्व्वे समवत्तन्त ये मया भागुदाहूताः ॥ २॥ 
५, 

देषांयाः स्थावरान्ताश्च प्रेगुए्यविषयाः स्पृताः] 


.माकरडयजी पोले- । 
, हे करणुकिजी ! इसके श्ननन्तर ध्यान करते हृष ~. 


ब्रह्माजी ने मानसी पजा को उत्पन्न किर्या । ये प्रजां 
ब्रह्माजी के शरीर से कार्य रौर कारण सहित पैदा 
इई ॥१॥ उन विद्धान्‌ ब्रह्माजी के शरीर से ब्रहमल्ानी 


लोग उत्पन्न हपट तथा ज्ञेखा कि.मै पिले कद चुका : 


हवै सव लोग ब्रह्मा के शरीर से ही उत्पन्न हए ॥ 


एत्भ्भूतानि शठानि स्थावराणि चराणि च! ३॥| देववाशरोसे लेकर स्थावरो तक सवप्रजातिरणोत्मक्‌ 


यदास्य .ताः भजाः स्वा न व्यवद्धन्त धीमतः। 
श्रथान्यान्‌ भानसान्‌ पुत्रान्‌ सदशानात्मनोऽखनत्‌४ 
भृगुं पुलस्त्यं पुलहं क्रतमङ्किरसं तथा 1 - 


मरीचि दकषमव्रिश्च वशिष्टैव मानसम्‌ ॥.५॥| 


नव ब्रह्मण इत्येत पुराणे निश्चयं गताः । 
ततोऽ्टजवु पुनस टं कोधात्मसम्भवम्‌ ॥ & } 
सदसदेव धम्पच पू्वपामपि पूर्वम्‌ । 


थीं शरीर इसी प्रकार स्थावर छरीर जङ्गम प्रारियों 
की खष्टि इड ॥३॥ जव ब्रह्माजी कीं वना है बद 
रजा न वृद तव .वुद्धिमान्‌ बह्माजीने अपने सदश 
अन्य मानसीं पुज की रचनाकीं ॥४॥ श्रगु, पुलस्त्य 
पुलदः करतु, अ्गिरस, भरीचि, " दच्च, अन्नि श्चौर 
वशिष्ठं यद भानेसी पुत्र इए ॥५॥ ये पुरार्णो मे नव 
ब्रहम क्लाते ह । इसके याद ह्माजीने अपने कोप 
से रुदर. को उत्पन्न किया ॥६॥ पूर्वं लोगों फे पक्त 
उत्पन्न हप. सङ्कटप चनौर धर्मको भी ब्रह्माजी ने रचां 


सनन्दनादयो ये च पूवं खष्टाः स्वयम्भुवा ॥ ७॥| तथा उन्डोनि सनन्दनादि को पिते बनाया .॥७॥ 


न ते लोकेषु सञ्जन्तो निपक्षा; समाहिताः। 
सर्व्व तेऽनागतज्ञाना वीतरागा ` धिमत्सराः-॥ ८ ॥ 
तेष्वेवं निरपेक्षेषु लोकखष्टौ महात्मनः । 
ब्रह्मणोऽभून्पहाक्रोधस्तनोतपन्नोऽकंसन्निः 
्द्धनारीनखयु; ` पुरुषोऽतिशरीरवान्‌ । 


विभनात्मानमि्युक्छवा स तदान्तरपे ततः ॥१०॥ 


स चोक्तो वै पृथक्‌ सीतं पुरुषत्वं तथायोद्‌ । 


; ¬~ पुरुषत्वञ्च दशधा वेका तु सः ॥११॥ 


ये लोग संसार में आसक्तं न हप, वे सवं निरपेक्त 


भै 


। 


ज्ञानी नौर राग देष से रहित थे य| ज्व ये लोग ` 


-लोक्-खष्टि से निरपेक्त दोगये तो ब्रह्माज्ीको महान्‌: 


क्रोध इरा जिससे सयं के समान कान्तिमान 1९] 


॥ &। पकः ४ रुष उत्यन्न हश्ा जिसका आधा शरीर ली 
छरीर श्राधा पुरुष का सा था [ बह यह कहकर कि 


(त्मा का विभाग करो" अन्तर्धान दोगया ॥१० ॥ 
षप 
उसके एसा कहने परः ब्रह्माजी ने खी जोर. पुरुष 


को पथक्‌-पुथक्‌ उत्पन्न किया शौर उन्दने पुरुषत्व ` । 


के ग्यारह विभाग किये ॥१९॥ फिर चन चत्यात्दी, ते ` 


„ ० ४० १६ 


सौम्य, दुर्जन, शान्त, श्वेत, शयाम अदि अनेकं 


सौम्यासौभ्यस्तथा शान्तै पसं शवीसवंच स भभु । | सौम्य, 
भकार के पुखप, खी श्रौर'देवगणरस्पन्न किये॥९२॥ 


॥॥ स >$ म ॥। 
विभेद बहुधा देवः म रसितेः सिते ॥१२॥| ह विव सो 
ततो ब्रहमात्मसम्मूतं पृल्व स्वायम्भुव ममुः | _ | श्रे शर से रघो्य्ुवसलं को अजापालन के 
आत्मनः सदृशं कृत्वा प्रनापला सनु द्विजः) १३॥॥ निमित्त उत्पन्न किया ॥१२॥ तपखिनी निष्पाप खीं 
शतरूपाञ्च तां नारीं तपोनिधृतकर्मपाम्‌ । | शतरूपाको स्वायभ्युवमजने पल्ली रूपमे प्रहएकिया 
“~ स्वायम्भुवो महुर्देवः पनीत जगहे विभुः ।॥ १४। | ॥९७॥ शतरूपाने लायम्बुवमच से दो पु उतपन्न किये 
तस्माच पुरुषात्‌ पुत्रौ शतरूपा व्यजायत । | जो किं श्रपने उकम से प्रियवत शरीर उत्तानपाद्‌ 
मियनतोचानपादौ भरख्याता्रारमकम्मभिः ॥१५।| के नाम से प्रसिद्ध इण ॥ १५॥ ओर उनके ऋष 
कन्ये द्रं च तथा द्धि भसूतिञ्च ततः पिता{ | तथा प्रसति नाम दो कन्याये हैः जिनमेसे भसति 
ददौ भसति दक्षाय तथा ऋद्धि रुचेः परा ॥१९। क द्तके ल र व साथ 
परजापतिः स जग्राह तयोर्यज्गः सदक्षिणः । 1 त न ए 
यरो ने महाभाग दम्पती मिथुनं ततः ॥१७॥| वाठ व 
पु | खरी दक्षिणा सित जुड़वां पेदा किया ॥ ७॥ फिर 
यङगस्य दक्षिणायान्तु षुत्रा दादश जरर । | दिखा ने यज्ञ से बारह पुत्र तयक किय जो दि 
यामा इति समार्याता देवाः स्वायम्भुषेऽन्तर ॥१८॥ खायस्मुव मन्वन्तर मे यामा नाम सत प्रसिद्ध इं ॥ 
तस्य पुत्रास्तु यतस्य दक्षिणायां सभास्वराः । दक्षिणा से उत्पन्न यक्ञ फे वे पुज घडे तेजस्वी हण 
्सूत्याञ्च सथा दक्षथतसो विंशतिस्तथा ॥१६।॥| तथा असेति ने दत्से चौवीस ॥१६॥ कन्याये उत्पन्न 
९ ङनामानि मे रख ! कीं जिनके कि नाम सुमसे खनो । (१ ) धद्धा (२) 
ससन्जं कन्यास्तासांच सम्यड्नामानि म शृण दमी ९ । 
^ ४ ९ ~ ६। › (३) श्यति, (४) व्रि, (५) पुष्टि, (६) 
दधा लक्ष्मी तिसत्टिः पिधा क्रिया तथा॥२०॥| मेधा, { ७) करिया ॥२०॥ ( ८) घु, (९) लज्ज, 
ुदधिसज्जा घषुः शान्तिः सिद्धिः कीरचिदयोदशी । ॥ १०) बधु, (१९) शन (तिन सव 
यँ परतिजयाह धर्मों दाक्षायणीः परथ; ॥२१॥| तेर यक््‌-कन्याश्रां को धम पली रूप से श्दण 
व मतिनगराद धम्म ५ ध सुल ‡। किया ॥२९॥ श्व वची हुदै ग्यारह खन्दर नेचर्वाली 
ताभ्यः शिष्टा यवीयस्य एकादश इसाचना ध कन्याये य थी-( १ ) ख्याति, (२) सती, (३) 
यापि सत्वयसम्भूि स्तिः तिता मा | सुमपत, (४) स्ति, (५) गोल चमा ॥ 
सननतिथासुद्या च ऊञ्नां स्वाहा स्वधा तं छरीर (७ ) सन्तति, (८) नस्या, ( ६ ) ऊंजौ, 
र्वो मरीचिश्च तथा चैवाङ्गिरा एनिः ॥२२॥ ( १०) अ ५.९९ ) सधा । इनका कम से श, 
; पुलह तथा] भव, मरीचि, अंगिरा ॥२२॥ पुलस्त्य, पुल, केतु, 
पुलस्त्य, व क व ॥२४॥॥| बरिष्ठ श्रनि, यन्नि श्नीर पितर ` के साथ विधाह 
इ यनयो निसत्तमाः । होगया ९ दे र त 
व मुनियों सन्तान हहे वद । जद्ाका, 
श्रद्धा कामं श्रीश दपं नियमं धृतिरात्मजम्‌ ॥२५॥ धुन काम, लच्मी का द्‌ °, धति का नियम ॥ २९॥ ` 
सन्तोपंच तथा दष्टं पष्टिरनायत्‌ । ह ठि का. सन्तोषः पु्टि का लोभ, मेधाका भुत शौर - 
मेषा श्रुतं क्रिया दस्ड नय विनयमेव च ॥ क्रिया के नय श्नर विनय हु ॥२६॥ बुषद्धका , 
बोधं युद्धिस्तथा लज्जा विनयं वपुरात्मजम्‌ ‹ . 
व्यवसायं ` भरजक्ते च केमं॑शान्तिरघयते,॥२७॥ 
सं सिद्धेशः कीरिरि्येते धममदलवः । 
कामादतिषुदं हषं . . धम्पपौत्रमसूयत ॥२८। 


लला का विनय श्रौर बु का पुत्र व्यवसायः > ^ 
तथा शान्ति का केम ॥ २७॥ सिद्धि का सुल श्रर | 
कीतिं का यश दुखा 1 ये खच धमं के पुज ह तथा| 
काम का पुत्र दर्पं इमा जो धमे का पौच.कलाया। 


-१६० माकंएडेयपुराण ० १० 


ना = 


जहे तथास्‌ धर्म ङी हिधा नासी भाया से अनृत नामका पुर्च 
हिसा पाय्यां वधस्मस्य तस्या जज्ञे तथाद्तस्‌) न 


कन्या च नि तिस्तस्ा सौद नरकं मय्‌॥|२६॥ पुत्र रौर ह (१) नरक, (द) भय ॥२९। पिर: 
समायाच वेदना चव मिय॒नं हययेतया;) | के साया श्नौर बरेदना नामके मिश्वन उत्पत हृष तथा 
तयोजहेऽथ वै माया मर्यं भूतापारिखम्‌ ।३०\ मावा क्य पुत्र र व 
वेदनात्युतंवापि दःखं लङ्ञेऽ्थ रोसाद्‌ | क व व 
ृतयो््यापि-जरां शोकतष्णाकोधाशच जङ्ग) १।॥ जरा, शोक, चप्णा शौर क्रोध उन्पत्च ह 1२१ ॥ चे ' 
सोद्रवाः स्पता हं ते सर्व्वे वा धम्मलक्षणाः। । सव च्रधर् क लक्स है तथा ये दुःख से उत्यद्न दयते 
तेषां भरव्यास्ति पुत्रो घा स्ते रष्वरेतसः॥२२]] दै) इने न कोई सीदे रौर न पुल, ये उष्वरेतस 


। हे दया हे मुनि ! गृल्यु की निरृति श्रोर श्रलच्मी 
निक्छ तिश्च तथा चान्या मृत्योभाय्यामवन्धरने ) ल 


अलक्ष्मीनाम तस्यांच मृत्योः पत्रा्तुद श ॥३२॥ उत्य्ह 1३२ श्रल्मीके य पुत्र खत्युका अदेश 
अअजल्मीपुत्रका दह्यते परत्योरादेशकारिणः । | मानने बाले & र विनाश के समच मरुप्यों के 
ब्रिनाशकालेषु नरान्‌ भजन्त्येते शृुष्व तान्‌।३४॥| पास ये जिस तर शाते हँ बट खनो ॥ 9 9 
निमेष दशसैरे > लाः इन्द्रियों तथा मन मेँ स्थित रहकर ये श्पने-ध 
क ५ न च स्थिताः । निषय मँ चियोँ रौर पुख्यों को लगा देते दँ ॥३५॥ 
खे स्र नरं च्ियं वापि विषये योजयन्ति हि 11२५ हे ्रिभबर ! किर इन्द्रियो को श्राकपित करक 
्यन्दरियाणि चाक्रम्य रागक्रोधादिभिनंरान्‌। | ड्या को राग शौर कोधादिक मे परचुत्त करदेते 
योजयन्ति यथा हानिं यान्त्यधम्मादिभिर्दिनारे&। है जिससे किं वे अधम के कारण हानि उठते ह 1 


्हह्धासातयानयस्याम्यो शुदधिसंस्थतः कोड अङ्कार मँ तथा कोई बुद्धि मे स्थित रहकर 
हङ्ारयतयान्यस्तथान्वा स्थतः | | मोह उत्पत करति ह ओर तःय के नाथ्‌ के 
विनाशाय नराः सीणां यतन्ते मोहसंभिताः ॥२७॥| लिये यज्तवान्‌ रहते ट ॥३अ] इसी पकार मलुप्वोके ' 
चैवान्ये शे णवा दशो ॥ शह मं ढःखड नाम का प्क योर विघ्न दोता हेन 
रथेबान्य गे घुंसां दः? हे चम वशुवः। | मूक से पीडित, गोचा व 
शदक्षामोऽधोसो नशरथीरी काकसमस्वनः ॥३८॥ कौपकी सी आवाज़ बाला है ॥ ३ ॥ तपोनिधि 
प स्वान्‌ सादितं शठो रमणा तसो निधिः! | बानी न जव टको उत्यजक्या त बरे बिकरल 


॥ क दात्‌, विचरे ओर भयानक आकृति चाज्ञा खवको 
इष्रकरालमत्यथं॒विदतास्यं सुरम्‌ ॥३६।॥ खाने को ऽत हुश्रा ।३९॥ फिर लोको के पितामह 


तित सवनल्यमय, गुध जगत्‌ के कारण अव्यय ब्रह्माजी 
तमततुकाममाहेदं ब्रह्मा लो स दुःसह से जो सवक खाने की इच्छा करता 


॥ {5 


3 न 


पव्वत्रह्ममयः शुद्ध; कारणं जगतोऽन्ययः |४०।॥ था वोत्ते ॥ ४०॥ 
ब्रह्मोच्च जल्लाजी चोक्ते 

नात्तव्यं ते जगदिदं जहि कोपं शमं व्रज ] चमरो यहं जगद्‌ न खाना चाहिये, कोध को 

प्वसैनां तामसीं दृतिमिणस्व रजसः कलाम्‌ ॥४१॥ छोडकर शान्त हो जाञ्रो 1 तामसी चृतति को छोड़ . 

इस रवश्च कर जस कला क्ता धारर्‌ करो ाष्रर 
प इ्ामोऽस्मि सगाय पिपिदुशापि द्वव ५५ 
५ सवाप दुन्बलः हे.जगत्‌ क स्वामी ! मे भृच से पीडित.न्यासा 

हं दृ्िमियां नाय भवेयं व्तवान्‌ कथम्‌ । चर्चलष 

रथाश्रयो समाख्याहि वत्तेयं यत्र निहतः ॥९२॥ केसे बलवान्‌ होगा ? भरे रटनेका स्थान कौनसा 
व्रह्मोदाच । उसो चता ९ म॑ लिच्च होकर ररह ॥४या 


{ ब्रह्माजी कोके 
[वाभरयो छं पुंसां जनयाधाम्मिको वलम्‌! ¦ जलत अध लोग रहते है वहीं -पर तुम्हारा 


००. 


० ५९ 


 भाकरदेयपुराण , १६१ 


्टिनिचयक्रियाहा्या भवान्‌ षत्व गमिष्यति ॥४२।। 


हथ स्फोटाश्च ते वसरमाहारश्च ददामि ते । 


आश्रय है । जहां नित्य नैमित्तिक, करियाच्रो. का 
श्रभाव हे बीं चे वुम्हारी पुष्टि होगी ! रते 
वत्सं ! तुम वहाँ टी जाश्रो ॥ ४३॥ जो'लोग व्रथा 
सते था वोलते दों बीं तुम्दप्ा वशे र तुम 


क्षतं कीटावपन्नञ्च तथा श्वभिरवेक्षितम्‌ ॥४४।| को आदार भी देत ह चत, श्रथवा जिस बस्तु मे 


‰ भग्रभाएूडगतं तद्त्‌ युखवातोपशामितम्‌ । 
उच्छिषटापकमखिन्नमवलीद्मसंस्छृतम्‌ 
भग्नासतनस्थितेधेक्तमासन्नागतमेव च । 


विदिद्छुलं ८ 


उद्क्योपहतं भुक्तुदक्याद्एमेव च । 
य्ोपधातवत्‌ विविदरक्ष्यं पेयमथापि वा | 


एतानि तव पुष्टव्थमन्यक्वापि ददामि ते ॥४७॥ 


श्रद्धया हृतं दत्तमस्नातैयैदक्तया । 


यत्नामयुपू््यकं किप्तमनर्थीडतमेव च ॥४८॥ 


स्यक्तुमाविषछृतं यत्‌ त दत्तन्वेवातिषिस्मयात्‌। 


२. दषं क्रुद्धार्च॑दत्तंच यक्ष तद्ागि तत्‌ फलम्‌ ।॥४६॥ 


` यत्च पौनभवः विचित्‌ फरोत्यागुष्िकं क्रमम्‌ । 


यच पौनर्भवां योषित्‌ तहयक्ष तव र्ये ॥५०॥ 


कन्या शुद्धोपधानाय सयुपास्ते धनक्रियाः | 


तयेव यक्ष पृष्टय्थमसच्याखक्रियाश्च याः ॥५१॥ 


यच्चाथं नितं िविदधीतं यन्न सत्यतः। 


तत्‌ स्वं तव कालांध ददामि तव सिद्धये ॥५२॥ 
गुचिए्यमिगमे सन्ध्यानित्यकाय्यन्यतिक्रमे ॥४३॥ 


शसच्चासक्रियालाप-दुपितेएु च दुःसह । 


 -तवाभिभवसामधथ्यं भविष्यति खदा दपु ॥५४॥ 


पटिन्तमेदे टृथापाके पाकभेदे तथा क्रिया । 


नित्यंच गेदफलहै भविता वसतिस्तव ॥५१॥ 
ञरपोप्यमाणे च तथा वद्धे गोवाहनादिके । ` , 
असन्ध्याभ्युक्षितागारे काले तचो भयं इणाम्‌॥१९ 


नक्षत्र गषीडाु धिविधोत्पातदशेने . । 


कीड़े पड्गये हो, जो छनते द्वारा देवली ग द्यो ॥ 
जो टे वरतेन मै रक्ली हो, उसी प्रकार जो पंक 


॥९१।|| मास्कर रुढी कीगहे दोऽजो भटी तथा श्रपक छर 


संस्कारद्ीन दो ॥४५॥ फटे हुए शासन पर ` वैखबःर 
जो श्रतिथि को विना दिये हुए खाया जाय, श्रथवां 
जो ुदिशाघनों षी श्नोर वैठकर सन्ध्याश्नोके श्रथवा 
चेत्य छनौर गीत के समय खाया जाय ॥४६॥ ऋतु- 
मती खी का स्पशौ करिया हुश्रा अथवा देखा हश्चा, 
श्मथवा किसी का भहा किया हुश्रा ये सव तथा 
छरीर कु तेरी पुष्टि क लिये भोजन श्नौर पान 
देता ह ॥ ४७ ॥ षिने श्रद्धा के जो हवन कियागया 
हो, विना स्नान किये जो अवज्ञपूर्वकर दिया ` गया 
हो, विना जल चिडकी हुईं बस्तु तथा जो -वस्तु 
वेकार पडो ॥४८॥ जो बस्तु त्यागीहूईै हो श्रथवा 
वहुत लोगों दार देखी गई दो, जो वस्तु भयसे 
किसीनेदीषहो श्रथवा दुष्ट, क्रोधी नौर दुभ्खी 
द्ारादी हृ हो दसं सवके खाने का फलं हे यते | 
तुमको होगा ॥ ४६॥ धुनभू पुर्पया खी जो कद ` 
कर्म करते टै हे यक्त ! वह सव वु्दारी तिके 
लिये दोगा ॥५०॥ कन्या को वेचकर जो धन प्राप्त 
होता है तथा उख धन से जो कम किया जाता है 
प्रौर ्रसत्‌ शाल्लीय जो क्रियाय है हेयत्त | घे सव 
तुम्हाय पुटि रियं ॥५६॥ जो चिना र्थके कायं 
विया जाय श्रौर जो सत्यपूर्वक शचध्ययन न किया 
जाय चह सव तुर्हारी सिद्धि के लिये है ॥ ५२॥ 
वम्दासे सिद्धि के कालये होगे, गर्भिणी से मेथुन 
करने तथा संध्यादि नित्यकमो के व्यतिक्रम के 
समय श्रादि ॥ ५३ ॥ श्रसत्‌. शास्रं की क्रियाया 
श्राल्ापके समय हे वुःस ! तम्दाग परक्रम क्षोगों 
पर होगा ॥५४॥ चौर तुम प॑क्तिभेद, बथा पाकश्चौर 
पाकमेद तथा गृह-कलद मेँ जाकर निना कशोः॥ 
जां मौ तथा श्रन्थ बादनमे 9 व 

विना चिल्लये पिलाये बध दिये जाते दो तथा 
पविना सिल १ घरमे सफर न की गहै 
हो वद्यं मनुष्यो को तमसे भय देगा ॥ ५६॥ न्न 
अथवा हों की पीड़में तथा तीनो प्रकारणे उत्पात 


: | दिखा देने पर जो मुण्य उनकी शांति के उपाय 


अशान्तिकपयान्‌ यक्ष नरनभिमविष्यसि ॥५७।॥ नर्द कसते है उनके छम अपना भय दिलाश्रोगे ॥ 


, तपोवने ग्राम्यथ्ुनां तथेवानिभ्नितात्मनाम्‌ 


टथोपवासिनो मत्या चूत-सीषु सदां रताः । 


` परिचयुतानां या चेष्ठा प्रलोकाथैमीप्ठताम्‌ ॥९०॥ 
तस्याश यत्‌ फलं सव्वं तत्‌ ते यक्ष भविष्यति । 


क 
ˆ ` चन्‌. यक्त त्यनेधाशानद्ूयकान 1७२॥ 


+ € श 


सियो मै आसक्त रहता हे, जो दुवेचने वोलता दै 
तथा जिसकी चुली चन्ति विख्छी शे सी है ॥ भतो 
विना बह्मचयं पालन क्रिये इए जे वेद पाठ करता 
हे, मूख दाया किया इश्ना यक्त, तथा तपोवन मर 
अलितेन्द्रियों या गृहस्थियों की तरह र्टना ॥५६॥ 


लद्धापणोपकर्तासो वैदालव्रतिकराश्च ये ॥४८॥ 
श्नबरह्यवारिणाधीतमिञ्या चाषिदुषा ता । 


जद्यण-प्षत्रिय-विशां शूद्राणांच स्कम्म॑तः 
चत होकर परसाक की इच्छा के कारण क्रियाय 


करते हेदि यक्त ! उपरोक्त इन सवकीं कियार््ो 
का एल तुमको दोगा ओर मी जो तुम्दारी.पुषटिके 


छमन्यच् ते भयच्ामि पुष्यथ संनिषोध तत्‌ ॥६१॥ 
भ्रवतो वैश्वदेवान्ते नामोचारणपूल्वंकम्‌ । 
एतत्‌ तवेति दास्यन्ति भवतो बलिमून्नितम्‌ ॥६२। 
यः संश्छताशी विपिवच्छुचिरन्तस्तथा वहिः । 
अलोलुपो ऽनितद्धीकस्तद्र हमपषज्जय ॥६३॥ 


शूल्यन्ते हव्य-कव्याभ्यां देवताः पितरस्तथा । 
यामयोऽतिथयश्वापि तद्रेहं यक्ष वल्नय ॥६४॥ 
शूत्र मैश्री शै बालद्ध-योभिन्नरेषु च। 
तथा स्वजनवगँषु शह ततापि वञ्जंय ॥६५॥ 
योषितोऽभिरता यत्र न वहिगंमनोत्सुकाः । 
लज्जान्वितः सदा गेहं यक्ष तत्‌ परिवर्जय ॥६६॥ 
धरयःसस्बन्धयोग्यानि शयनान्याशनानि च । 
यतर गहै त्रया यक्ष तद्रज्यं यचनान्मम ॥६७॥ 
अत्र कारुणिका नित्यं साधूकम्मणयवस्थिताः। 
सामान्योपस्वरेयुकतास्त्यनेथा यक्ष तद्‌श्दम्‌ |॥६८॥ 
यत्रासनस्थासतिषटत्छ॒गुरुषृदध-द्विजापिषु 

न तिष्ठन्ति गहं तश्च वञ्ज्यं यक्ष त्रया सदा ॥६६॥ 
तरुगुल्सादिमिदयौरं न विद्ध' यस्य वेश्मनः | 
मम्भभेदोऽथवा पुंसस्तच्छेयो मयनं न ते ॥७०॥ 
्ेवता-पिद्‌-सस्यानामतिथीनाश्च पैन्‌ । . 

यस्यावशिष्टेनामेन पुसस्तस्य . ग्रहं त्यज ।॥७१।' क व २ प 
सत्यगाक्यान्‌ क्षसाशीलानरिस्रान्‌ नानुतापिनः 1 . | न करने चलि, दुखरों को पीड़ा न देने बाति, शरोर 


न्त मे तुम्हारे नाम करा उचारण करके तुमको 
चलि दी जायेगी जिखसे कि तुम्हारी पुष्टि दोगी॥ 
जो विधिवत्‌ संस्कार किया हुआ र्न खाते हों 
श्नोर भीतर बाहर से पवि दो, लोभ रहित हों 
तथास्रीकेवशमेनदोरेसेलोगोंक्ते गरौ को 
तुम न जाना ॥ ६३॥ जां देबतार््रो नौर पितरोका 
हव्य कव्य आदिसे पूजन दोवादे योर जहाँ अरति. 
थियो ओर बाह्यो का सत्कार होता दो हे यक्त 


खरी, पुरुष श्रोर स्वजने मे परस्पर मेधी हो वहां 


दँ रर चादर निकलने के लिये उत्छुक न हों तथा 
लज्ञायुक्तं दां दे यक्त ! वर्हँभी तुमको जाना बरजित 
ह ॥ ६६॥ हे यत्ते ! जदं ्रवस्था भौर सम्बन्ध के 
श्रुसार भोजन श्नौर शयन दोता है उस घरमे भी 
मेरे बचन से तुम्हारा निपेध दै ॥६७॥ हे थक! जाँ 
दयगवान्‌ रहते हे, जहापर लोग नित्य साघक्ममे 
स्थित हों ओर जो यक्तं आहार विहार क्रते लं 
फेखे धरको भी छोड़ देना ॥ ६८ ॥ हे यक्ञ } जहाँ 
आसन पर वैडे इए गुरु, चद्धजन या ब्राह्मण लोग 
हे वहाँ धर वाला.सम्मान के कारण उनके वसवर 
न वे पेसे स्थान पर तुम न जाना ॥६६॥ जिस धर 
का द्धार चक्त यालताश्दिसेधिरयानदहो तथा 
ज्यं ममेभेदी वातत करने बाला पुरुष न हो पसे 
धर भे.जाने से वुम्हाय फस्याण न होगा ॥ ७०॥ 
जिख धरपे देवता, पितर, मयुष्य, श्रतिथि आदि 
को मोजन कराकर बचे इणः अन्न को मयुष्य खाते 


तुम त्याय.देन्ना ॥ ७२ ॥ 


| जो व्यथं उपवास करता द, जो सदैव .जुञ्ा -श्नौर 


वर्ह तुम मत जाना ॥६७॥ जिस घरमे चालक, बद्ध, ; 


भी त॒म न.जाश्रो ॥६५॥जहां खियाँ पेमपूवैक रती 


किसी की बराह न करने बाले, एसे पुरुषों को 


बराह्मण, ्तरिय, पैश्य या शुद्र जो अपने कमो से. 


लिये देता हँ उसको खगो ॥ ६९ ॥ बेश्वदेव कर्म के . 


०.५० २५ साक्ैरटेयपुसण ` १६३ 


----------~----------------~---------------------- ~ -- ------ "~~~ ---------~------~----- 


{शशपरे तीस ¦ जो खी खामी की सेवा म तत्पर हे, दु सियो 
भचर ( दक्तामसत्सीसगवर््नताम्‌ । | का साथन करती द्य, कुटुम्ब का भरण पोपण॒कर 
. कटुम्ब-भनु शेषान्न-पुएटाश्च त्यज योषितम्‌ ॥७३।), वचे इष छरच् से ्रपने को पुष्ट करती दो पेली खी 

क को भी छटोडदेना ॥७३॥ यजन.अध्ययन, वेदाभ्यास्त 
यजनाभ्ययनाभ्याप्ष-दानासक्तमतिं सदा । | तथा दान च्रादिमे जिसकी रुचिो तथा यक्चकराना 


योजनाध्यापनादान-दवत्ति हिज त्यज ।७४। पटना ओर दान लेना आदि जिसकी इकति हो 
फेस ब्ाह्मरको छोडदेमा ॥७४॥ हे दुःसह । जो दान, 

दानध्ययन-यगु सदोदथुक्तश्च दुःपह । च यज्ञादि मै सदा उद्यत हो श्रौर जो क्षात्र 
त्रय धमे > श्नसार उक्तम जीविका करता हो पेसे 
नैव्रियं त्यज सृच्छहृशस्ञाजीवात्तमेतनम्‌ ॥७१५॥ क्षननिय र चड्देना ॥ ७४५॥ जो उपरोक्त दान, 
रेभिः पूर्णत ह्य श्रध्ययन श्रौर यज्ञादि करने के तीनों गुणो से युक्त 

ई पठ च्यु य # (4 

भिः एव्वयुणेगुक्तं पाशुपासय-वरिन्यंयोः । दो तथा पशुपालन, व्यवसाय श्रौरः खेती से भ्रपनी 
पेशावा्टत्तिञ्च त्यज वैश्यसकरमपम्‌ ॥७६॥| जीधिका प्रात करता दो पेते निष्याय वैश्य को भी 
नेर । चछोड्देना ॥७६॥ दान, यज्ञ श्चर ब्राह्म की सेवा में 
दानेज्या-दविजश्च्रुषा-तत्यरं यक्ष सन्त्यज । | तत्पर तथा व्राह्मण श्रादि तीनों ष कीषकिवा से 
; दीनां ~ उपजीचिका फरने बाला जो श्र हो उसको भी "दै 
एच ब्ा्मणादीनां शुभ्रुपाहत्तिपोषकम्‌ ॥७७॥| यत्त | दम चढ़ देना ॥ ७७ ॥ जिस धरम युद्धौ 
ृतिस्ृत्यविरोषेन छतत श्दी। | शति नर स्ति के विरोध म न चलता हो शौर 


तः ~ बद उदां कीं भी र्दे उसी खी उसकी अु- 
त्र तत्र च तत्पलौ तस्यैवालुगतास्मिफा ॥७८॥| मामिनी हो ॥७८॥ जापर पुत्र शर, देवता शौर 


त्र पत्रो युसेः पूजां देवानाञ्च तथा पितुः । | पिता व पली अपने र की 1 करती दै 
४ 2 स ५ 
पत्ती च भक्तः र्ते तत्र ¡ इतः घँ अलद्मी का भय कसा १॥७६॥ जो धर सभ्या 
सकितीग् दः ॥७६॥ खमय लीपा जाय, जद जल चिका जाय ` श्नौर 
यद्रानुलिष्ं॑सन्ध्यासु गरहमम्युसष्क्षितम्‌ । | जदं एलो सहित देवताश्रों का पूजन किया जाय ` 
पवि लं शवनोपि दीक्षित हे यक्त ! उस घरको तुम नदीं देख सकते ॥ ८० ॥ 


करारएगय्यानि नित्या तिच] | जां लोग सुर्योदय से पूवं सोकर उदते दं तथा 
4 स छश्चि मौर जल कभी न घटता दयो श्रौर सयोदय 


याबलोकदीषानि लक्ष्या गेहानि भाजतय्‌॥८१॥| त यीपक जलता दो णेस धरे मे. दच्मी सदेव 
५ 6 निषास करनी दै ॥ ८९ ॥ जिस धस्मे वैल, चन्दन, 
यत्रोप्षा चन्दनं बौणा दशो मधुसरपी। | वीशा, शीश, शद्द, थी, विप या तचे के पावो 


परि त्र क उस घरमे ु्ासा श्माश्चय नदीं दोगा ॥ ८२ ॥ जितत 
प्राथ ताग्रपात्राणि वश्यं न तवाश्रयः ॥८२॥ र केर ल हो अथव अद धान वोरा 
यत्रं कणएटक्रिनो रक्षा यत्र निष्रषव्टुयी। हुश्या चे श्रौर जि धरं पुन्‌ व याजो 
६. टीम पा खाया ह्या दो, हे यत्त ! पेखे घर को 
भाय्या पुनभृवस्मीकस्तदयक्ष तवं मन्दिरम्‌ ॥८३।| तुम श्रपा 4 नि च पाच 

= व च गाः परप दीनी यीर तीन गाय रहती हा भ्रौर जद 
यस्मिन्‌ षृ नराः पच सखीयं तावतीव गाः। | शधकार मै दयन जलाकर अकाश करतो उस घर 


ग्रन्धकारेन्धनाभ्िञ्च तदगृहं सतिस्तय ॥८४॥| भ ठम रना ॥८७॥ हे यच् | जिस धरम एक बकरी, 


पृः + ~= न थ सातं दष धि नण करदेना 
इश्वं स्रमतिङ्ग ग्रह यक्षाय श्पय ॥८१५॥ जदा दाल, हसिया, पीट श्नौर दसी तरद थाल 


इृदासदात्रपिढकं तदत्‌ स्थाद्वदिभाजनम्‌ । | श्रादि वर्तन इधर-उधर फेरे हय पड़ रदते दो बद 


१६४ माकंण्डैयपुराए , -श्र० ५१ 


यत्र तत्रैव क्षिप्तानि तव दद; धतिभ्यम्‌ ।.८६॥/ धर तमको आश्रय देना चादतादै देखा समभोद॥ 
त ध यत्त ! जो खियां मूसल या ओोखली पर ्रथवा 
खले स्रीणामास्या तदददुम्बरे । | गूलर के पेडके नीचे वैरी दो या घर के पी 
~ 3 ८७}॥| आपसमे वात करती | उन लियो को लुम अपना 
अवस्कर मन््रणंच यक्तदुपत्‌ तव ॥८७॥ उपकायी समभना ॥ ८७ ॥ दे दुःख ! जिस धर में 
लङ््यन्ते य॒त्र धान्यानि प्कापकानि वेश्मनि। | कन्े अथवा पके धान्योका च्रौर उसी वरह शासो 
तद्च्डाल्ञाणि तत्र तवं यथेष्ट चर दु{सह ॥८८॥ का निर्दर द्योता हो बय पर ठम इच्छासार ) 
दासः च ५ ५ ॥ विचयेो॥पप॥ जिस घरमे थाली,खरपोश, या कलद्ी ^ˆ 
स्थालीपिधाने यत्राभिदेततो दर्व्वीफलेन वा। | से श्रनि दी जाती दयो उस घर मे शेष अरि्रैका 
गृहे तत्र हि रिष्टानासेषाणं समाश्रयः ॥८६॥| स्थान है ॥ ८६ ॥ जिस घर में मचष्य की (1 टो, 
 भाुषास्थि ग्रहे यत्र दिवारात्रं ृतस्थितिः । | था ण्क दिन शौर सत ख॒दां पड़ा रहे बरहा पर दे 
` तत्र यक्ष तवावासस्तथान्येषांच रक्षाम्‌ ॥६०॥| यक उम्दा नौर दूसरे राचखो का बास गा ॥ 


जञो मजञण्य पने भाद बन्धुश्रों को पिंड श्रौर जल 
श्रदत््ा धृहधते े वै बन्धो; पिएं तथोदकम्‌ । | न देकर खयं मोजन करलेताद उस मचष्यके पास 


सपिण्ठान्‌ सोदकांथैव तत्कालतान्‌ नरान्‌ भज६१॥| तथा उस पि श्रौर जलम ठम निवास करो ॥६१॥ 
यत्र॒पद्ममहापलौ युवती मोदकाशिनी । । जहाँ पच रौर महापञ्च रहता हो, खी मोद्कखाने 


दषभेरावतो ह बाली दो अथवा शिवजी के नान्दी या एेरावत ` 
छषेरावतो यग्र॒ करस्यते तदं त्यन ॥६२॥ हाथी की मति रो उस बरको भी हुम चाड देना ॥ 
श्ररस्ना देवता यत्र सशखखाश्वाहवं षिना । जा रश देवता अथवा युद्ध बिना शख श्नं 
कटप्यन्ते मनुजेरचास्तत्‌ परियन मन्दिरम्‌ ॥६३। की म्य पूना करतें उस धर को भी तुम छेड्‌ 
पौरनानपदा यत्र॒ भ्राक्मसिद्धमहोत्सवा; । | देना ॥६२।जिख घरमे पुरवासी उत्सवयपूर्वैक श्राकर ' 


९ > रदे उस धर मे तुम न जाना ॥६७॥ सूप की वासे 
रिन्त 4 न्वं तव शे र ॥९४॥| ठरडा किये ह जल से, घड़ के जल से, कपड़े के) 
पवातयटास्मोपिः सानं वल्ञाम्बुविभेः । . | निचचोडे हु जल से श्रथवा नखोसे स्पशं क्ये हृषः 
नखाग्रसलिलेश्चेव तान्‌.याहि हवलक्षणान्‌ ॥६५॥॥| जल से जो इलषणी लोग स्नान करते है उनके 

देशाचारान्‌ समयान ज्ञातिधम्मं पास ठम ५५ ६५॥ ५ = 
१ हों ङ्गं श्राचरण॒ करने बाले, जाति, धमे, जप, दोम,मदल, 
नपं होमं मङ्गलं देवतम्‌ । देवतानं का पूजन करने वाले, भली प्रकार पित्र 


सम्पक्‌ शौचं विधिवहोकवादान्‌ रहने बाले तथा निधिचत्‌ वात चीत करने वाजे जो. 
पुंसस्त्वया इव्वेतो मास्तु सङ्गः ।६६।॥ लोग है उनका तुम सङ्ग मत करना ॥ ६६॥ 
माकैरडेय उवाच माकैरडयजी वोले- 
इत्युक्या दुःसहं ब्रह्मा तत्रैवान्तरधीयत । दुद इख भकार क्कः ब्रह्माजी अन्तानि 


. होगये शौर दुःसह भी कमलयोनि ब्रह्माजी की 
चकार शासनं सोऽपि तथा पङ्कनजन्मनः ॥६७।॥ आ्ञाजुसार रहने लगा ॥ ६७॥ 


इति श्रीमाकंर्डेयपुराण मे यक्षायुशासन नाम ५०बां अर समाप्त | । 
~ ~उ सुक नः = ~ - । । 
इक्यावन अध्याय 


माक॑रडेय उवाच | माकंरडेयजी वोल्े- | । 
दुःसहस्याभवद्वाय्यां निर्म्माष्टिनाम नामतः । नमाष्ठि नाम की दुःखह की पत्नी इहै जो कि 


ति < ९ कलि की खी से उतकाल भें चारडाल क सम्पकरं 
` शाता कलेस भाग्यायागृतौ चाण्डालदशंनात्‌ ॥१॥ घे पैदा इ थी ॥ १॥ उन दोनों की जगत्या 


भ्र° ५१ माकर्टेयपुराण १६५ 


--------------------_-~-~-~-~-~-~--------~-- 
तथोरपत्यान्यभवन्‌ जगहचयापीनि षोड़श । | सोलद सन्तान हैः जिनमे श्नाठ पुत्र श्रौर श्राठ 
अष्टौ माराः कन्याश्च तथाष्टवतिभीपणः २। या क ( ( ॥ 0 
दन्तषषटस्तथोक्तिश्च परिवच्स्तथापरः । | शनी, ( ६) गरडधान्तरति, (७ ) गर्भदं {= । 
अङ्गधुक्‌ शदुतिश्वष गण्डपरान्तरतिस्तथा ॥ २ ॥| शस्या, ये श्राट पुत्र हुए श्रव कन्यान्रौ के आठ 
) गहा शसा चानय; कमारास्तनयास्तयो; । | न को छने ॥ २॥४॥ (२) सियोजिका, (र) 
` कन्याशचान्यास्त्थेवा्ठ तातां नामानि मे शृरए+४॥ भ श ५ 0 (५) 
नियोनिका वै प्रथमा तथेवान्या विरोधिनी । @ ति व ५७ स 
स्वयंहारकरी चैव घ्रामणी ऋतुहारिका ॥ ५॥| मयमीत कर रका है ॥ ५। ६॥ हे बिभवर शर 
सृतिबीजहरे चान्ये तयोः कन्येऽतिदारुणे ! | म इनके कमो का तथा इनके दोपां की शान्ति का 
विदधेषएयष्टमी नाम कन्या लोकभयावहा ॥ ६ ॥| वर्णन फरता ह । पिते राड पुं का दाल खनिये 
एतासां कम्मं प्ष्यामि दोषमशमनंच यत्‌ । 19] पदिला पत्र दन्ताकृष्टि नवजात चालकोके दति 


अष्टानांच कुमाराणां श्रयतां द्विजसत्तम्‌ ॥ ७ ॥| पर राता दै जिससे उनके दात किटकियतेदै 
( दुम्सह के श्रागमन को वतलाते हँ ॥ ८॥ इसकी 


दन्ताङृष्टिः भरसूतानां बालानां दशनस्थितः । दलि 
स्मेति विकी शान्ति इस प्रकार करे कि सोतेुए वालके दांतों 

करोति संहषमति , चिकीषुःसहागमम्‌ ॥। ८ ॥ शरीर श्या पर तिल शरीर सरस चिक दे ॥ ६॥ 
तस्योपशमनं काय्यं सुप्तस्य सितसषषः | | अथवा न्दर = के जलसे सख्रान करावेया 
मादेव सत्शास्् का कीर्तन करावे, ऊंट या तदु की दड़ी 

। शयनस्य सिादुदनोपरि ५ को गले मे वधे या रेशमी वस्त्र पदिनाते ॥१गजो 
+ ुवसौपधीलानात्‌ तथा सच्छास्चकीततनात्‌ । | वालक शुभम, अभे था हर समय घोलता रदे 
| उषटूकरटकखदगास्थि-्ौमव्ञविधारणात्‌ ॥१०।॥ उसको तथोक्ति नाम दुःखदटका दुसरा पुत्र शागया 


त्यन्यङमारस्त॒तथासित्वत्यसष्दन्नवन्‌ । | समभना चाये ॥११॥ उस रोषकी शान्तिके लिष 
१ क परिडतों ने कटा है किं जो श्ररिष्ट या माङ्गल्य देखे, 


शुभाशभे चरणां ुच्त तथोक्तिस्तच १९८ ॥११॥ सुने या कहे गये हँ उनका जप या भगवान्‌ का 
तस्माददृष् मङ्गल्यं वक्तव्यं पणिडितेः सदा । | कीर्तन कराते श्रथवा ल देवता बरह्माजीका पूजन 


षे श्रते तथेबोक्ते कीत॑नीयो जनाद नः। | करे {श एक ङे ध के गर्भे 
वरणस्य य देवता ॥१२ होता है शौर स्तयो से दथा वकवाद करता है ॥ 
ध । उसको परिवर्तक कते दै, इससे भभावित खीकी 


अन्यग्भे परान्‌ गमान्‌ सदेव परिवत्तयन्‌। | सेद खरौ वि 
रतिमा्नोति बाक्यंच विबकोरन्यदेम यत्‌ ॥१२ | कर श्ानी पुखय रक्ता करे ॥१९। चौथा अङ्क्‌ दै 
परिवचैकसंज्ोऽपं तस्यापि सितसपपंः। | जो वायु फे ध रह मे प्रविष्ट होकर फडकन 
=. † र दा करता दै रौर शुभ श्रथ्म वातं वकवत दहं 

, रकषोघ्रमन्तरजप्येशच रघनां इव्वीति तत्ववित्‌ ॥१४ | ° 4 ४. 
+ द्यथानिलवगरणामङ्ध ` रुरणोदितम्‌ । इसे दोप की निवृत्ति शङ्खो पर ङश के मारने 
445 से होती है ॥२५५॥ दुःख का ्पौचवां पु शकुन दै 
शमाशुभं समाचष्ट इशंस्तस्याङ्गतादनम्‌ ॥११५।॥| जो काक श्चादि पक्षियों म भविष्ट होकर श्राकाश 


काकादिपक्षिसंस्थोऽ्यः श्वशृगालगतोऽपि बा । | मे विचरता दै श्र मुप्यों को शमाशुभ वताता, 
हे ॥ १६ ॥ उसके बोलने के समय किसी कायं का 


श॒भाभ॑व छशतैः इमारोऽन्यो चरवीति वै ॥१६॥ ध 
तत्रापि दुष्टे व्याकषयः भारम्भत्याग एव च । | शीघ्र सिद्ध दो पेखा ब्रह्माजी ने कटा दै ॥ १७॥ हे 
शभे द्रुततरं काय्यमिति भ्राह प्रजापतिः ॥१७१॥ द्विजवर ! छा गंडरान्तरति नामक टै जो लोगों 
गण्डान्तषु स्थितशान्यो यहां ध्िजोचतमः । । के गरडान्त योगम आधी धी तक रदत दै यद्‌ 


१६६ धरकर्डेयपुरीण |  श्र०१ 


----------------------------------------------- ~----~------~------------“------------- ------- ~~ 


६ ध सद कायौद्ने श्रारस्भको सश्र करताद । अति 
ऽन्ति श्वानशुशतम! १८) गौ हरीत ( 
स्ारम्भान मारो शस्तताश्वानशयता्‌॥\८॥ भशुसत चनौर च्निन्दित ॥९८॥ बाहो आशीर्वाद ४ 


विमोक्त्या देषतास्तुत्या मूलोतुखातेन | ट्िज ॥ से, दत्तानां फी स्तुति से, म्रूल चच्तेत्र कीं शन्ति 
स, गोरूत्र शर सस्मर के खान कणने से चौर 


गोमूत्रसष॑पस्नानेस्तदकषग्रहपूजनः ॥१६॥| उसके सन्तन फे गृ र पूजन करने से ॥ १६था 
पुश्च धरममोपनिषस्तैः शसदरधैः । | फिर धमोपनिपदो पाठ करने से ५ शसो का 
अवया जन्मनश् प्रशमं याति गण्डवान्‌ ॥२०॥ व ह ह व 
भर्म स्रीणां तथाञन्यस्तु फलनाशी सुदारुणः | ग्रहा ज सयाच गम नप्रकरर्रदतादह्‌ त्था 
जो वदा मानक दै छर नित्य परयिच्र रहकर उस 
तस्य रक्षा षद्‌ काय्यं नित्यं शौघनिषेवणात्‌॥२१॥| से श्रपनी रता करनी चाहिये ॥ २१॥ हे द्विजवर । 
र ॥ र प्रसिद्धे मन्त्र लिखकर उख गकज्ते म वाँधकरर शुद्ध 
भसिदधमनरलिसनाच्छस्तमासयादिपारणात्‌ 1" अ 
विश्ुदधगेहावसषथादनायास्ा्च वै द्विज ॥२२। दानादि देकर उससे रचा करनी चाद्ये ॥२२॥ 
तथैव शस्यहा चान्यः शस्यदवुपहन्ति यः ! | वां श॒स्यहाहै जो चर्नोकी बृद्धिको नर कर्ता 
हे श्यसे भी पुने जते पदिन कर खेत की रक्ता 
तस्थापि रं इव्वीतं जीर्णोपानद्विषारणाद्‌ ॥२३॥ करनी चदय ॥२२ तथा सेते चासं तरफ मीस ` 
तथापसव्यगमनाबाण्डालस्य , ्रयेशनात्‌ । र, अथवा चार्डाल से स्पशं करा कर येतत फे 
। ५ ` . | बाहर बलिदान कर$ श्रथरवा चन्द्रमा या जल की 
वदिवलिभदानाश्च सोमाम्बुपरिकीर्चनात्‌ ॥२४॥ स्वति करके भी शस्यहा की गन्ति करनी चादिये , 
परदारपरव्य-हरणादिषु मानवान्‌ । ।२४॥ सरे की स्री या धन के हरण करने मे जो 
लियोनयति मदष्यां की प्रचरन्ति कराती ह चद दुःसह की प्रथम 
तेयोजयति चैवान्यान्‌ कन्या सा च नियोजिका२५॥| पुरी नियोलिका हे ॥ २५॥ पिन पाड से, ब्रोध 
तस्याः प्षितरपठनात्‌ क्रोलोमादिषल्जंनात्‌ । ०५६ ष = र ह 
र जेका सुभको भदत्त कररददै वि धी वातो 
नियोजयति मामेषु पिरोधाच्च पिवनज्जनयर्‌ ।॥२६।॥| को मदष्य चाड दे ॥२६॥ चदि कोई व्यक्ति गल्लीदे 
आन्रुष्टोज्येन मन्येत तादो वा नियोनिका। तो यद समम ते कि यद्‌ नियोजिफा की मार्ट, ` 


५ वदी पेसी योजना 
नियोनयत्यनमिति न गच्छेत्‌ तद्वशं इषः ॥२७॥| मदपय उस व 3 


परदारादिसंसगे चित्तमात्मानमेव च | | दूसरे कीसी से संस्म करने फो हो ते वुद्धिमान्‌ 


नयोजयत्यत्र सा मामिति भाज्नो विचिन्पयेत्‌॥२८॥ युको फसा रदी द ¦ 
विरोधं इर्ते चान्या द्पतयोः प्रीयमारगर; दवयति भूः बाहं दनु आहा 
ग थ भाय्नाणुवाः | | पिता यर पुत्र मे तथा सजात्ये बिरोध करा 
वन्धूना सुदा पित्रोः पुत्रः सावरिकष या 1२६ देती हे ॥२६॥ बहे िसेधिनी कटलाती हे उस ग 
विरोधिनी सा तद्रक्ष इर्व्ीति वलिकम्पणा | | वलिकमं जारा तथा विवाद रहित शास्त्रीय राचारः + 
पेथातिवादसहनाच्छास्ाचारनिेषणात्‌ ॥२०॥ ती भ्रपनी रता करनी चादिये ॥ २०॥ दसद की 
धान्यं खलादुशृहाक्ोभ्यः प सरी कभ्या जो खलिद्ान से धान्यो को ओर 
द ५ | घ्रस्ते दध, श्रीक श्रौर ऋद्धि सिद्धिको नष्ट कर. 


सशृ्िमृ्धिमदरन्यादपहन्ति च कन्यका ॥२१। देती दै ॥ ३९॥ वट खथं.हारिका कहलाती है श्नीर ` 
सा सख्यंहारिकेलयुक्ता सदान्तर्ढानवतपररा । | सदैव अन्तधन रहती हं । वह श्सोदैघर मे प्रवेश 


मदानसादद्ध सिद्धमन्नामारस्थतं तथा. ॥३२॥ = रसो को सिं नदीं दने देती 1 २२॥ तथा, 
णड चदय पिष ह्योकर भोजः ४ 
परिविश्यमानश्च सदा साद भुल्क्तं च धुश्षक्ता | रघथं भोज्ञन रयो 8 को. . 


॥ 


० ५१ मादेर्डेयपुशण 
भाकेरडेयपुणणे १६७ 


ह उनके ्न्नको भी हरण कर्ती है ॥३२॥ 
हे द्विज ! जिस धसमै छुकमे न हश्रायो यष्ट उखकी 
द्धि, सिद्धिको दरण करलेती है तथा गाय श्रौर 
स्मी क स्तनो से दृध हरण करलेती ह ।॥२०॥ ददी 
्रखेषी, तिलोमेसे तेल श्मौर मदिर फे स्थान 
सते मदिय तथा श्रौर कपास र से सूत ॥३५॥ दे 


सा स्हारिका नाम दरतयविरतं हिन । निरी] यह खयं्रिका निशत क 
&, इससे वचने के किये एक स्वीक तथा दो मोरो 


कु््याच्छिख एिडिना (1 # [1 
प्या उना दनद रक्ष | ङ धव 

धौ न व क खियम्‌)३६। की एतम श्राति वरम काटनी चाये, उन 
रक्षाव ग्रहे लक्ष्या चञ्ज्या च सेष्मतातथा ॥३७॥ तस्वीर का मिना बसत है ॥ ३६।२७॥ हवन 
होसापिदेवतातधप-मस्मना च पारिप्किया । शी छनि म धूप दै छर्‌ अग्नि की उल, भस 
काय्यं पीर । स्त्री श्रपने स्तन पर मजे तथा दूध के वर्तन 

दिभाण्डानामेव तद्र्णंसतम्‌॥९८॥ सचे ए प्रकार इससे रक्ता होती ॥२८॥ श्रामणी 

उद गं जनयरत्यन्पा एकस्थाननिवापिनः । = | नाम की दुःसद की चोधी पुनी प्क जगह श्ड 
रुपस्य त॒ याभोक्ा घरागणी सा ठ कन्यका।६॥ भा ध ष ॥ इससे 

सतवा ~ वरििरैः सितस ९०, वचने के {लि जँ परः पुरुप रहता हो बह) पर 
सस्याय रका रवति वि पितरः । | यने शरोर सोने के स्थान पर्‌ सेढ सर 
प्रासने शयने चोव्वयां यत्रास्त स 2 मानयः।।४०॥ 


चिडक दे ॥ ४० ॥ रौर मलुप्य को बिचार करना 
चिन्तयेच्च नरः पापा मामेषा दषटचेतना । चादि भे दृष्टा पापिनी श्ामणी य॒मे घुमा रदी है 


भसयतयरष््नपयं मुवः स्तं समाधिना ॥४ ५। व | यी 8 त 
स्रीणां पुष्यं हरतयन्या षटं सा ए कन्यका | | 


२ हर्ण करती ह वह इसी कारणसे ऋतुदारिका 
प्रथ प्रहृत्तं सा हेया दासा चतुरिका ॥४२॥ कदललाती ह ॥ ४२॥ सकी शन्ति के लिये स्रीको 
र्व्यति तीर्-देवोकशवतय-पव्यतसानुएु । 
सद्धम पर स्नान करावे ॥४२। हे क्रौकि । मनः 
शरीर त्व के जानने ब्ते लोगो को दिये कि 
चिकित्सा वे मेयः सम्भयुकरवरौ पध ‡ {1४९} च्रौपधिर्यौ दष अच्छा कराघे ॥9४॥ जो स्वरोंकी | 
सातिश्वापहरत्यन्पा चीणां सा स्पृतिहारिका । 
मेध्यान्नमोजनः सलत्निस्तस्या्ोपशमे। भवद्‌ ॥९६॥ खन से कमणः रञ नीर वीयं त 
भ्रोजन ओर खान करने से दसके शान्त हो 


तीर्थं, देवालय, यक्षशाला, द्वैत के किनारे या नरद 

नदीसङ्गमे स्नपनं तल्मशान्तये ॥४२॥ 
मन््रचित्‌ कृतत्तजञ प्व॑भूषसि यद्वि) उख स्री को प म भरातःकाल खान कराये तथा 
चिकित्सा जानने वलि ष्य से उखको उन्तम 

प्रिर > सेति व्रता द नो एष र भवेत्‌ १ 1 | 
अ त्वाोयमनी 1 ॥४१५।|| सेन करने से होती हे ॥४५॥ दुःसह की र्त 
चीजापहारिणी चान्या ्ीपसारतिभीपणा । = | भीयण्‌ साती नी वीजदस दै जो सीशुषय का 


- ऋषएमी द्रेपणी नाम कन्य ताकमयाव्हा। | ल वापसी जोसं 
एमी द्रे नाम ह ॥४६। आठवी कन्य देपरिणी दे जो संसार 


1 ध जाती 
या करोति सवद्धष्टं नर नासमथापि वा 1४७ स शरति भयानक है भोर सत गुखो मै देष उत्पत 


मधु-क्षीर-घृताक्रस्ति शान्ल्भ ्ौमयैत्‌ तिलान। यंसती दहै 19७ उसकी पन्ति क लिये मधु, चीर, ` 
व्यत मित्रविन्दा तयेष्ठं तसणान्त्वे ॥४८ || चूत श्रौर तिलं ट्बनकर तथा मित्रविन्दा नामक 
एतेषा माराण वल्यानां नसत (च षटकिजी.। अन इन 
= । नियौ चौरः पुरा क शचद्तीस सन्तान = 4 
्ररिशप्यानि तेषां तामा ये शरु ॥४६॥, सुमख सुनो ॥५६॥ पणि द वो बम्ययं ह 


दन्ताकररभूस्‌ कन्था परिनसा मलहा तथा । = । (६) निजस्प (९) कलहा । विजस्पाजे श्नः 


4 = ~ 


| 


१६८ भराकेर्टेयपुराणे भ्र० ५१ 


ञअवह्गाटृतदष्टोक्तिर्षिजस्या तत्मशान्तये ॥५० 1 1 1 
च ४ ७८१५। 44१ ५ ५० 
तामेव चिन्तयेत्‌ = शी भवेत्‌| मभ्य उखी का चितवन करे । कलहा ` भवुष्यां के 
कलहा कलहं गेहे करोत्यविरतं दणाम्‌ ॥५१॥ गृहौ मे कल उत्पन्न दारदी है ॥ ५१॥ कलहा 
टुम्बनाशरैतुः सा त्मशान्ति निशामय । | कुटुम्ब के गा फा फारस होती है, उखकी शति 
दव्वाडुरान्‌ मघु-पृत-कषीराक्तान्‌ वत्तिकम्यणि १२. अ स ९ ५ १ 
ज्जया्वानलं मि्र॑न दीर्ये के अंङुरों से वल्लिकम ३ 1 
विकिपज्छहुयाचवानलं मित्रंन कीत्तयेत्‌ | वि 
भूताना मात्मिः सा्ध बालकानान्तु शान्तये॥५३। मातृगणो के खाथ भूतो का कीर्तन करे जिससे 
व्रि्ानां तपसाश्वेष संयमस्य यमस्य च। वालकं को शान्ति प्रिले ॥५२॥ तथा यह कटे करि 
कृष्यां वाणिज्यलामे च शान्ति हुर््वनतु मे सदा५४॥ ० ध यमके तथा चारिन्य 
५ ९ रन्ता. करष्मांड 
त 1 | 
हष्माण्डा यातुषानाश्च ये चान्ये गणसंत्िता; ५५।॥| पूजित टोकर सन्नोप को प्रात हौ ॥ ५५॥ मादिव 
महादेवपरसादेन महेश्वरमतेन च । 
सव्वं एते दृणां नित्यं तष्टिमा् व्रजन्तु ते ॥५६॥ 
तटाः सव्वं निरस्यन्तु दुष्कृतं दुरितम्‌ ! 
क ४ 
महापातकजं सच्च यचान्यद्वि्ठकारणम्‌ ॥ १७ 
¢ 
तेषामेव परसादेन विष्ना नश्यन्तु सबव्वंशः | 


के प्रसाद से सव मनुष्य नित्य तुष्टि को प्राप्त कर 
श्रापको पावं ॥५६॥ सन्तु होकर सवे दुष्त, पाप 
शरीर पाप से उत्पन्न जो शौर विष्न के कारण है 
उनको चाड ॥५७॥ उन गों के धसराद से विवाहो 
अथवा बरद्धिके जो कर्मं उनमे जो विष्न उपस्थित - 
च ९ हें उनका नाश हो ४] 
उद्वाेषु च सव्यषु रद्धिकम्भषु चव हि ।॥४८॥| योगो मै, गुर श्रौ क 
एर्याचुष्ठानयोगेषु गृरुदेवाञ्नेषु „ च। | यक के विधानां पे श्र यात्रा श्रादि नो चोद 
जप-यज्ञ-विधानेषु यात्रासु च चतुदरश ॥५६॥ गण है वे ॥५६॥ शरीर मे च्रारोग्य श्रादि भोगों मे, 
शरीरारोग्यभोग्येपु युखदानधनेषु च । | उख, दान + धन मे तथा दृद, वालक शौर 
दधवालातुरेेव शान्त नु मे सदा ।॥६०॥ आठ, सवाभ रका कर ॥६०॥ तथा चन्म, 
नलौ श्ण, समुद्र, सूय, वायु र श्रि भी मेरी रक्ता 
पोमाम्बुयौ तथाम्भोधिः सविता चानिलानलौ । | करै । तथो कालजिद्धा नाम का पुत्र इतरा जो 
पथोक्तेः कालजिह)ऽभूत्‌ पुत्रस्तालनिकेतनः ॥६१॥| ताल के चर्ठषर रहता दै ॥६१॥ यह कालजिह्वा 
प येषां जननीसंस्थस्तानसाून्‌ विबाधते । जिन माताम स्थित टो जातादहै उनकी संतानं 
सखिर॑सुतौ दौ त विरूप-विषेतौ द्विज ॥६२॥ को वहत दुल देता दै । हे धिष ! परिवर्तक क 
ग तु रृक्षग्र-परिखा-पकारम्भोपिसंश्रयौ | 
(वर्या परिवततं तौ हरतः पादपादिषु ॥६३॥ 
कोष्टुफे परिष्तन्त्या गमाक्रामो यथोदरात्‌ । 
न इृक्षशवेवे नैवाद्रिं न पराकारं महादधिष्‌ ॥६४॥ 
रिखां घा समाक्रामेदवल्ला गर्भधारिणी | 
गधुक्‌ तनयं लेभे पिशुनं नाम नामतः ॥६१॥ 
0 स्थिमञ्नागतः पंपां बलमत्यजितात्मनाम्‌ । 


दिर श्यौर चिषत नामकेदोपुश्र हुए ॥ ६२॥ वे 
घतत, रये, महल), नव्ये ग्रौर ताल्ावौमे रहते 

येन-काक-कयोतार्च भोलुकेश्च व सुतान्‌ ॥६६॥ 

(याप शुङ्कनिः; पंच जगरहुस्तान्‌ सुराखराः। 


दै तथा अम्य स्श्रानों मे घृूमते हण गर्भिरी खियों 
को दुःख देते दै ॥ ६२॥ हे कोरक ! इन स्थानें मे 
धूमती इहं मभिणी खरी पर वे श्रमण करते है, 
श्रतः पेड़, पदाङ़, किले च समुद्र पर ॥ ६४ ॥ तथा 
खाई श्रादि जहां हों चां गर्भवती को न जाना 
चािये । अङ्रश््‌ का पिशुन नाम पुत् इश्रा ॥६५॥ 
बद अननतेन्दरिय पुरूोकी हडी चनौर सजामे पुव 
कर उनके वलकरो खाता दै । चाज्ञ, फौश्मा, कवूतर, 
गिद्ध, उल्ल ये पाँच पुत्र ॥६द्‌/ शङ्कनि के इण, इन 
को देवतां श्रौर रात्तसो ने रक्खा । सयु .ने 


भ षः ~-~~---~----~-- ~ अ 


० ५१ माकंण्देयपुराण १६६ 


-शयेनं जग्राह मृस्यु् फार कालो श्दीतवान्‌ ॥६७])| वाश्ञको श्नौर कालने वौपएको लिया 1६9 निन्रति 


5 पतर } ने अरति भयानक उल्लू को लिया तथा व्याधिने 
स निचछ तिश्चव॒जग्राहातिभयावहम्‌ । | गिद्ध छो श्नौर यमराज ने कवूतर फो ज्लिया ॥ द८॥ 


गरं व्यपिस्तदीशोऽय कयोतंच सयं यमः ॥६८॥ इन्दी परिय फ दोलने पर जीब पापम अवृततदोते 
एतेषामेव चेबोक्ता भूताः पापोपपादने | । दै। दे निभवर ! वाज श्रादि वे पक्ती जिसके धरः 
तस्माच्छे नादयो यस्य निलीयेुः शिरस्यथ । | था शिर पर वैरते द उसको श्रपनी रका के लिये 


ति ,£६।\/ शान्ति करनी चाष्िये ॥ ६६॥ जिस घरमे यद पैदा 
नात्मर्षणायालं शानत इ्याटदिजोत्तम ॥९६॥ हों या ्रपना घोंखला वनान्तं उस धर को मसुष्य 


गेहे भ्सूतिरेतेपां ` तदवननीडविषेशनम्‌ । | छोड़ दे । यदि शिरपर कवूतर वैदजाय तो उसकी 
नरस्तं वनज्जयेट्गेहं कपोताक्रान्तमस्तकम्‌ ॥७०॥| भी ल ॥७० हे विर ! घर | 

। सौ ९ कवृतर, गिद्ध, कौश्चा, चौर उद्लू का प्रवि ह 
श्येनः कपोते गुगरस्त काकोल गृह द्विन। जाना यद वताता है कि उस धर मे रटने बालका 
भविषटः कथयेदन्तं वसतां तवर वेश्मनि (७१ शन्त श्रागया ॥७१॥ रेते घर को परिडत चोड दे 
टका परिस्यमेद्गेहं शाम्ति क््याचच पण्डितः । | श्रथवा उसकी शान्ति कर, स्वप्न मे भी कवूतरको 
सखभेऽपि हि कपोतस्य दशनं न भरशसयते ॥७२॥ देखना शरचचरा नहीं हे ॥७२॥ गरडमान्तरति की भी 


र | छः सन्ताने है, ये सियो की रज मेँ रहती हैँ इनके 
पुटपत्यानि कथ्यन्ते गण्टपान्तरतेस्तथा ! | समय मभस घनो = 
प 0 | समय मुभे सुनो ॥७३॥ खी के ऋतुमती होने के 
स्रीणां रजस्यवस्थान तेषां काल मे शृणु ॥७३।| चौथे दिनतक उसमे पदिला पुत्र, घरयोदशीके दिन 
चतवा््यदानि पून्वाणि तथंवान्यत्‌ ब्रयोदश्‌ । नपर दिनि स पुत्र शी के ध 
[3 + वै दिने पि 
ने । ७४।|| स्थान मे रहता है ॥5४॥ चौथा दिनमे मेथुन कर 
श १ ० ० १ के समय तथा पाँचवाँ श्राद्ध श्नौर दान करनेः के 
छ्न्यदिनाभिगमने श्राद्धदाने तथापरे । | खमय शरीरः छटा पवो ॐ विनेमं रजस्थानमे रदता 


पर्वमसयान्यत्‌ तस्र्‌ तु कर््ान्येतानि पणिदतैः।|| दै इसलिये परिडतों को चाये र उपरोक्त दिनो 


9, 


मे मैथुन न करे॥ ७५॥ गर्भहा का पुत्र निष्नहा 
ग्भन्तुः सुतो निघो मोहनी चापि कन्यका | प्यीर उसकी कन्या मोदिनी नाम की इड । गर्म में 


[> (1 [= 1 
गर्भम्यको {हियतेऽपरा ॥७६॥। धुख कर बिभ्न उसको खा जाता दै तथा मोहिनी ¦ 
भविश्य गममत्येको यक्ता मेयतेऽपरा ॥७६ भी उसे खाकर मेहन करदेती दै ॥ ऽ६॥ मोहन 


जायन्ते मोहनाद्‌ तस्याः स॑मएदककच्छपा; । | करने से गम से स्प, ढक या कला पैदा होता । 
त्‌ ५ ०५ ¢ र हु 
सरीखपाणि चान्यानि पुरीपमथवा पुनः ॥७७॥| दे अथवा कभी-कभी उस गमका इश्क या विषा ! : 


गन्विसीमासम भी दो जाता है॥ ७७] छः मदीने के भीतर यदि, 
षणएमासान्‌ गुल्वशीमासमश्ुवानामसयताम्‌ । गिरी खी माँस लाय तो तथा श्रसंयत्त रदने से 


दरषच्छायाश्रयां रात्रायथवा त्रिचतुप्पथे ॥७८॥| राति को वक की छाया भ व्हरे से, वराहा, 
्मशानकटममिष्ठा्ु्तरीयबिवग्निताम्‌ = । | तिराया या एमशान म जाने से तथा विना विक्ाये 
# 


+ र स्चियम्‌ ७६॥॥ ज्ञमीन पर सोने से, रति को रोनेसे मोदिनी उस 
रुयमाना निशयऽ्य भआविदोत्‌ तामस। सित्‌ ५६। खरी भे प्रवेश कर जाती हे ॥७८-७६॥ शस्या का 


शर्यहनतुस्तथंवेकः रको साम सा त । दरक नाम एक पुत्रै जो छिद्र पाकर क्रिस तरह 
शस्य स सदा हन्तिलन्धवा रन्धं शरणुष्व तत्‌८०।|| शस्य को न्ट करदेता है यद सुनो ॥ ८०॥ अर्म 
अरमङ्गरयदिनारम्मष्वर्नो कपे च यः। | दिन ये अथवा शद दोकर जो खेत चाया जात 


्रष्वेशं करोत्यन्तोपसद्धष उस खेत मे कद्रक प्रवेश कर जाता है ॥८९॥ इस 
्ेषमुपयेशं वे त्न्तोपसङ्भषु ॥८६। लिये श्रच्छे युहतं चौर उन्तम दिन को चन््रमाकां 


तस्मात्‌ कल्यः सुमशसत दिगेऽ्यच््य तिशाकरम्‌। पूजन करॐे ह्यु नौर बलवान्‌ होकर कायं का 
्र्य्यादारम्भसुशिश्च स्ुष्टः सहायवान्‌ ॥८१॥| श्ारम्म करे या खेत को चो ॥ ८२॥ दुःख की 
{्यजिकेति या कन्या दुःसदस्य मयोदिता । | नियोजिका नाम कन्या का चरणन मँ कर चुका ह 


| न ० माकश्डेयपुराण अ० ४१ 


व त ~ -~-- ~ च ---------------- ४ 


= 
। जातं भचोदिकासंं तस्याः कन्याचतुष्टयम्‌ ॥८२। स व धमे ५ चार हई ॥ 
> ५ ता पदा | नाप दहै-(१) मत्ता (२) उन्मत्ता २) प्रमत्ता 
1 संचोन्मममततासत न ए ताः पदा । चनौर ४) रवा \ये मद्या के शरीर मे प्रवेश करः 
{ शमाविशन्ति नागाय चोदयन्तीह दारुणम्‌ ॥८४॥| क उनके ना ऋ मेर्शा कर्ती है ॥र9॥ ये मद्य 
3 अधमं धस्यैरूपेण का्ंचाकामरूपिएम्‌ । करो धर्मं से प्रधम, काम्‌ से काम, चरथं से न 
` श्रनर्ैन्चाथैरूपेण ोक्षचामोक्षरूपिणम्‌ ॥८५॥ रौर मोच से रमो पररित कर्ती ६ ॥८५॥ ये 
नविीता पि तच द्यन्त पस्नरान्‌] दर्िनीत द ननोर श्रपवित्र मचुप्यो को दिला देती , 
वविनीता धना १ अ ह ये सातो धु को श्रथं से अलगकर, घुमाती 
भ्राम्यन्ते तामिरष्राभिः ुरषाथात्‌एचडनरा ।८६॥| ह = इनका भ्रवश घ संध्या, ऋक श्र गूलर 
तासां प्रवेशश्च गूहे सन्ध्य उदुम्बरे । | भै दै तथा उस जगं मे भी द जहाँ धाताविधातां 
ध विधात्रे च लित काले न दीयते ॥८७॥ न्नौर काल को वलि नहीं दिया ज्ञाता दे ॥ >5॥ 

+ २ 6 उपरोक्त वलि दिये विना जो भोजन लाया च्रीर्‌ ` 
युतां पिवतां घापि सद्धिमिनलविभुषैः । | पानी पिया प उलो साथ थे मङुप्ोम भवे 
नवनारीपु सं्रान्विस्तासामासमिजायते ॥८८॥ 
चिरोधिन्याद्यः ुत्राशरोदके भ्राहकस्तथा । 
तमाच्चादकधान्यस्तत्सवर्पं णुच मे ॥८६॥ 

दीपतैलसंसगे-ूषिते लिते. तथा 


करती ह तथा नई स्तयो भे मी ये शी धुसजाती 

ह ॥ स्म ॥ विरोधिनी के चार पुत्र द ( १) चोदक `. 
(२) बराह शचौर तीसरा तमः प्रच्छादक इनका ` ˆ 
स्वरूप सुनो ॥२६॥ जलत हप दीपकके तेल से 
भौमी दई जगद पर, लधी हुई चीज पर,. मृशलत,. 


धुषलालुखले य पादुके वासने सियः ॥६० ॥ श्रोखली या खङ्ाऊं पर ॥६०॥ तथा सपः 3 शरीर 


3 8 स्त्रियो के पाव से र्खचि हु रासन प्र च र उस 
त्रादिकं यत्र॒ पदादरष्य तथासनम्‌ । | धर भै जँ विना लीषे नौर पूजन किये लोग रहते 
| यत्नोपलिकचानच्य विहारः क्रियते हे 11६१ ह ॥६९॥ तथा जहां कल से श्चि निकाल कर 
८ | = क 9 ४] 
, इन्वीुसेण यत्रारिराहूतोऽन्यच नीयते! | दर व हे विरोधिनीके पुत्र इन स्थान 
। > च्ननिताः म रहते है रौर मलुभ्यो स चकब है ॥६२॥ 

विनुमभन्ते भचोदिताः ॥६२॥ त १ 

, कासा श | चोदक नाप का नियोजिका का पटिला पुत्र स्त्री 
एको निहागतः पसा सं ाञ्यालीक त्यवान्‌। ¦ श्नौर पुरुषो की जीम पर वैखकर श्रसत्य भत्‌ 
चोद्ो नाम स भोक्तः पुन्य रते श्रे ॥६३।। कराला धनौर छटिलला रद्य कस्ता है ॥६२॥ दसरा 
द्‌ | „ < "(~ ( ञी रं 
पतिः । दरति दान से स्थिन सदत है तथा ₹ -पुरुपो कं 

। >. 81 | # ॥ > (ध ् ४ र 
। अवधानङत ध त भवस तदपि । । ¦ वचनां को परदण कर्तादै, इती कारण उसका 
करोति ग्रहणं तेपां वचसा ग्रहक्ठ सः ।६४।॥| नाम ग्राहक दै ॥ ८४॥ तीसरा इवि मलुप्यो के 


¦ आङ्ग्य सनो नृणा तमसाच्या मयति | मन पर रामर करा दै ओर उसको तमोगुण 
| ते श्राच्छादित क फरो उत्पन्न करता है, इसं 
स्वयंहाय्यारः स्तु चर्ध्येण जनितं तनयत्रयम्‌ ॥ हास के चौयं से तीन यु उत्पन्न हप (१) ख्व 
सहाय्यं हारी च वी्यदारी तथेव च ॥६६। हासे @) चर्चायै जौ? & वी्॑दयरी 1६। जो `: 
घर लीणा नदीं जाता तथा जहाँ सदाचार की न्यु 
अमस्ातितपदेु भरविशसछ_ मान ॥६७॥| आदि मै ल जति द ॥९७॥ उपरोक्त सथानम तथा 
खलेषु गेष्टेषु च च. ्रोदो येषु गदेषु व । खलिहानें ४, गे मै श्रौर जिन घसो से परस्पर 
भ्रमण्यास्तनयस्तेकः काकनङ् इति स्मतः । मामसौ > पठ वडा जिसको लाज के ` 
६ हे उसे प्रमावित हृश्रा मवुप्य कीं आनन्द प्र, 


क्रोधं जनयते यस्तु तमश्च्यादकस्तु सः ॥६५।॥ लिये उसको चमः प्रच्रहक कहते है ॥६५॥ स्वयं 
` मन्दाचारण्ेषु च = श्रौर ज्यं विना प 
ञ्जनाचान्तगेषवेते मन्द 1 । नता दै श्चौर जहां वना पव घोये लोग पाच्छशाला 
तेष स्वै यथान्यायं बिरहन्ति रमन्ति च ॥६८॥ निरोहः यहा रह अज तट्‌ रमण कणत 8 ॥ 
[९ ^ च न = पुरे 
~ रति स्वो नैव प्रामोति ` वै पुरे ॥६६।॥| नदी कर सकता दै ॥ ६६॥ 


अ० ५१ २६ भाक॑रुडेयपुराण २०१ 


=-= "~ 


शन्‌ यो गायते मैत्रे गायते हसते च यः ! | मेत्जन करते सम्य जो गाते या हसते है अथवा 


तिनि ततिति संध्या समय जो मैथुन करते हे द्विज ! काकजेध 
भ्यमिथु ति द्विज ॥१०० | उनके शरीर मे भ्वेशा कर जाता है ॥१००॥ दुःख 


कन्यात्रयं भसूता सा या कन्था ऋतुहारिणी १०१। की कन्या ऋतदाप्थी ॐ तीन कन्य उत्प हई 


एका इुचदरा कन्या अन्या व्यज्ञनहारिका । पदिली का नाम चरा, दुसरीका व्यश्चनहारिका 
तं श्रौर नीसररी जातहारिणी नाम से विख्यात हुई ॥ 
तीया तु भमाखूयाता न्यका नातहारिणी १०२॥| जिस स्नी के विवाद को विधि पूर्वक नदीं किया 


` यस्या न क्रियते स्व॑ः सम्पग्वेवाहिको विधिः। व व विषाद सुहत चूकने पर 
त 1 हे उस स्तनो को कुचरः हरण कर 
कालातीतोऽयवा तस्या हरत्येका इवद्वयम्‌॥१०३॥ लेती ह ॥ १०३ ॥ भती भाषि श्राद्ध किये विना 


सम्यक्‌ भाद्धमदक्वाच तथानन्व्यं च मातरम्‌ । अथा मादगरं को पूजे विना जो कन्या विवादी 
विवाहितायाः कन्याया हरति व्यञ्ननं तथा॥१०४। जाती ह न ध को दरलेती है ॥ 
अस्य्ुशन्य विथपे सविनी स्ी के घर मेँ श्चि, जल, धूप, 
अदी त 1 ९ 9 । | शस्या मुशल ने हो श्रथवा सरसों भी छिडका 

पशुसम भूतिसषपवज्जिते ॥१०४।॥ इञा न हो उस घर मे वह जातहारिणी भवैश कर 
छनुपरविश्य सा जातमपहत्यात्मसम्भवम्‌ । | # उस वालक को हरण कर लेती है जिससे हे 


्षएमसविनी बालं ` ततरवोषटजते दविज ॥१०६॥ कौष्टुकिजी ! बह वालक कण भर भं मर जाता हे 
रिणी शं शिता 1१०९१०६ वह भयानक जातहारिणी सदा मांस 


तस्मात्‌ संरक्षणं काय्यं यत्नतः सुतिकाषे १०७ ९ भाति 1 व ॥ १०७॥ जव 
तेर्चामयः सूविश्ह स्बूना रहता ह तव हरा का पुत्र 
स्मृतिञ्वामयतानाञ्च शुन्वागारमिषेषणात्‌ । | भचरड़ उस घर मँ वेश करके उस स्त्रीकी बुधि 


..: श्रयन्ति सुतस्तस्याः भचण्डो नाम नामत;।|१०८॥| को हरण कर जेता है ॥१०८॥ मचणड के पच शोर 
ौवेभ्स्तरय सम्भूता लीकाः शतसहस्चशः। | पौन ठ व सीक = चारडाल योनि 
~> ९ तथा दरडश्यसर्पश्चह हुप अत्ति भयाः 
चणढालयोनयथष्ौ दण्डपाशातिभीषणाः ॥१०६॥ नक धे॥ १०६॥ चे चाएडाल योनि ठीक भूख से 
ुधाविष्टास्ततो सीकास्ताश्च चणडाल्योनयः । | पीडति होकर पक दूसरे को खाने की इच्छा से 
ञभ्यथाबन्त चान्योन्यमतुकामा; परस्परम्‌ ५ ११०)॥ प्क दूसरे ऊपर दौड॥९१०॥ उन चांडालयोनियो 
भचण्डो वारयित्वा तु तास्ताशण्डालयोनयः । | को र ने पा ४ व 
खमयं निश्चित किया बह खनो ॥ १९१ ॥ श्रजस 
समये स्थापयामास याददे तादशं शण ॥१११॥| पोच लो मनुष्य लीक को स्थान देगा उसको भै 
द्यभभृति लोकानासाबसं यो हि दस्यति । श्रतुल दरड दंगा जिखसे चद भिशेगा इसमे संशय 
दण तस्थादमतुलं एतयिष्ये न संशयः ॥११२॥ नर्द ॥ ९९२॥ जिस स घरमे स्वी ९ 
। चणडालयोन्यावसये लीका या परविष्यति । || ग्ज ई॥,२३॥ नोर अवयो ड 
वि ४1 र 
‡ तस्याथ सन्ततिः सन्ना साच सो नशिष्यति ११३ तीर्यं को हर्य करनेवाली वीजहारिकके दो कन्या - 
भसूते कन्यके दवे ठु सरीप॑सोवीनहारिणी । | उत्पन्न ह (१) बालरूपा (२) श्ररूपा, इनच्छ परः 
वातरूपामरूगाच तस्याः प्रहरणन्तु ते ।\११ | हार सुनो॥९९७॥ जो मचुप्य ६ र 
निषेकान्ते ~ चादरूपा उसंक् तया ५ 
बातरूपा निपेकानते सा यसमै षिः सम्‌ । | नम दै षसपहादि योग इत 
स पुमान्‌ वातुल भयात वनितापि वा ॥११५।॥| करती ड ४.९५॥ इसी नरह तकाल के वाद्‌ शद्ध ` 
तयैव गच्छतः रद्य निर्वीजलमरूयया । , | हने.पर जो मचुष्य स्त्री भोग नह छना उसके 
अरलाताशौ ने येऽ तथा चापिवियोनिगः११६।॥ शरीर मे शरू श्रचेय करक उलन च दरण 


२०२्‌ 


साकेण्टेथपुरण 


० ५२ 


विद्रेषिणी तु या कन्या भकरीङ्रिलानना 
तस्या द्वौ तनयौ पुसामपकासकाशकों ॥११७। 
नि्ीनल्वं तरो याति चारी का शचवन्जिता । 


पेशन्याभिरतं ज्लोलमसन्नलनिपदणसर्‌ ॥१९८॥ 


पुर्षे पिणंचरो सरमक्रस्यं तिष्टतः 


माता भ्रतरा क्था भिनैरभीषटः स्वननेः ८२११६ 


विद्धि चाशसायात्ि पुरस्षो धम्पतोध्येतः 


एकस्तु सगणो परकाशयति पापत्‌ ॥१२०॥, से संस्र मं पापी को प्रगट करता 


द्िीयस्ह गणान्‌ पैर सोक्स्यासपकषति ! 
इत्येते दाःसहाः शव्यं यक्षणः सन्ततावथं | 


2 
¦ खव तती र्दी है दो पुज उत्पन्न इए, पिला 


पुव चा उपकारक ओर दसरा भकताम्ठक ५९९७] 
जो पुरप नपसक दो तथा जो स्यी पवित दो 
। दुय्ला नी जिस च्वि द ज्ते नच्च 

अथा अशचुद्ध जलल से चान करताद्ये 1१२२] जिस 
; पल्य ल देव सच हो पेते पुच्यो मे ये दोनें परवन्त 
` छर जाते दै तथा माता, श्चाता, मिच, पिय श्रौर 
; स्वजनो दे ॥ ११९॥ जो विसेध करा ऋर मडष्य क्र 
! चर्माथ क्ते नष करता है वह यश्मशक अपने शण 


॥ २२०. 

ट्ख खणो ज्र मित्रता का नाश कर देता है 
¦ हे क्रौषकिजी ! यत्त डुःखह की.श्न खव सन्तानों 
¡ का जो पापी है तथा जिनसे सम्पूर जगत्‌ व्यापि 


पापाचारा; समाख्याता येन्याप्रमखिलं नगत्‌१२१॥ मेने आपसे बरन किया ॥९२९॥ । 
इति श्रीमाकण्डयपराणमे दोःपदोसत्ति समापन नाम शश्वाँ च° समाप ।. .. - 


--ख--<र-- 


बावतेबां अध्याय ४ 


| माकंरडेय उचाच 

सत्येष तामसः समो अद्चणोऽन्यक्तनन्सनः । 
¦ शद्रसगं प्रवक्ष्यामि तन्ते निगदतः 
तनयाश्च तथेा्टौ पल्यः पुत्राश्च ते तथा । 


माकरड्वजी वोल्े- १ 
छव्यक्तडन्मा बह्याजी च तामस सर्मतो यद 


इश्मा, अद उनके द्द सगं को कता हँ खनो 1४ 


शृ ।। १ ॥; जव प्रथु वह्णाजी ने कल्प कते रादि में अपे सथान 


पुज उत्पन्न करने च्छ विचार किया ठो उनके. ऋं 


करपादादात्मरस्तुरयं सतं पध्वायतः धमो; 1 २॥ इव ञ्नौर अठ एु्रियां उत्पन्न इ रवे पुत्रिय 


प्ादरासीदथाङ्कऽस्य मायो नीललो हितः 


छसेद सुस्रं सोऽय द्रवंशस द्विजसत्तस 1 २॥ कर वड़े ॐच 


रि रोदिषीत तं गल्ला दन्तं प्रसुवन्‌ ह 


नाम देहीति तं सोऽय भर्युवाच जगतिमू | ४ ।।| उसने 


स्रस्तं देव नाम्नापि मा रोदीथेय्यंमषह ) 


एवघ्क्तस्ततः सोऽय भपछतरो च्योद ह ॥ ४1 से देखा 


ततोऽन्यानि ददा तस्मे पर नामानि देप) 


उन ठ पुं की खियां इई ॥२॥ हे विप्रः! 
अह्याजी रे खङसेजो रो पु इञा चह दौड 
सोने लगा ॥३॥ जह्माजीने 
: उस सेते इए पु दे पृद्धा क्ति तुम क्यो येते हो ? 
कष करि मेर? न्यम रियं 1 इपर जगत्‌ 
खासी बह्माडी उसे बोजे 8 ॥ हे देच ! तस सत॒ 

। रो्रो, धै रको, कु्दयासा नाम खर होगा । उस 
ने षरवेसातों भी योने स्ये १५॥ 

तच भसु रह्याज्यी ने उन सातो के नाम मी रखटिये 


४ 


स्थानानि चेषामष्टानां पत्नीः प्च ३ द्विज॥ ६ ॥ इन अठ ॐ स्यान तथा इनकी खी ओर पुतो के 


भवं सव्वं तथेशानं तथा पुतं प्रभः 


¦ नाम भी सुनो ॥ ६ 1 पितामह ने उनके भव, सर्व, 
ईशान, पश्पति, भीम, उ शौर सहदेव ये सात 


भसियुद्र महादवमुवाच स॒ धितामहः 1 ७॥ नाम रक्ते अ इख धकार नामकरण करके उनका 


चक्रं नामान्यथेत्ानि स्थानान्येषां चकार 
स्यो जलं मही बह्िवायुराकाशमेद इ । 
दीकिवो ब्राह्मणः सोम्‌ इत्येतास्तनवः कमात्‌ । 


८ ॥, स्थन भी निश्वित्त कतिया [८ ॥ सूय, जल, पथ्धीं, 


¡ अचि, चारु, आकाश रौर चन्द्रमा, ये कमः 


ह्याजी क उपसेक्त साह पुं ॐ स्थान. है तथौ 


भर ५२९ माकेण्डेयपुराणः २०३ 


सुषच्चला तथेबोमा विकेशी चापरा स्वधा ॥ ६॥ सुवचसा, उमा, विकेशी, खधा ॥ ६॥ श्नीर खाहा, 
सवाहा दिशस्तया दीमा रोहिणी च यथाक्रमम्‌ | इ व दे क येष 
५ ड । 
सरयादीनां दविनग्ेष्ठ दाये नामभिः सह ॥१०॥ खियां इई ॥१०॥ तथा त व 
शनेश्चरस्तथा शूकरो लोहिताङ्गो मनोजवः । | क, मदकल मनोजव, छन्द, स, सन्तान शौर 
स्कन्दः सरगोऽय सन्तानो वुयश्चालुक्रमात्‌ सतः ११॥ वुध हप ॥१९॥ दसौ भकार खद ते सदी को श्रपनी- 
“ एत्रम्मकारो श्ोऽसौ सर्तौ भार्यामविन्दत । | खर वनाया जिसने दत्त क कोच करने के कास 
दक्षकोपाश्च तत्याज सा पती स्वं कलेषरम्‌ )॥१२॥ अरपते शरीरको छोड़ दिया ॥१२॥ हे विभरवर ! वह 
हिमवद्दुहिता सामून्मेनायां द्विजसत्तम | | मेनासे दिमवानकी पुरी इद, उसका राता मैनाक 
तस्या भ्राता तु मैनाेः सलाभ्भोषेरसुततमः । | इ जिसका मिज समुद है रौर पि इन पावैती- 


६ र ॥ जी ने खयं भगवान्‌ शिव के साथ विवाह किया ॥ 
उपयेमे. पुनश्चनामनन्यां भगवान्‌ भवः ॥१३॥ शगु कौ खी स्याति से धावा शरीर ब्िधाता नामके 


र धाता-विधातारो भृगो; ख्यापिर्यत । | दो पतर उत्पन्न हृ श्नौर देवदेव नारायणजी की 
भियंच देवदेवस्य पतनी नारायणस्य या ॥१४॥॥ सनी ल्मीजी हुदै ॥ १४॥ महात्मा मेरु की दोनों 
्ायति्तियतिश्ैव मेसेः कन्ये महात्मनः ] | कन्याये आयति श्रोर नियंतिधाता न्नौर विधाताकी 
धाताविधात्रोस्ते ाय्य तथानातौ सुताुमौ ॥१५।| लिया इ रौर उनसे क्रमशः दो पुन हष ॥ १५९॥ 
भाए्रव मृकण्डुश्च पिता मम महायशाः | | माय शोर मेरा पिला सूकर । चकु का विवा 


तनि र मनखिनी से हुश्रा जिसे मेरी उत्पत्ति इहै श्रौर 
मनस्िन्यामहं तस्मात्‌ पत्रो वेदशिरा मम्‌ ॥१६॥ मेरे पु का नाम घेदशिरा दै ॥ १६॥ धू्रवती से 


धूम्रवत्यां समभवत्‌ पाणएस्यापि निबोध मे । | भ्रा फी जो सन्तान हु उसको खनो । धरण ऋ 
' भाणस्य य्‌ तिमान्‌ पुत्र उत्यन्नस्तस्य चात्मजः।॥१७ | पुत्र च तिमान्‌ इमा तथा ८८५ का चोढा भाई 
तयोः पुत्राः वाथ कवोऽभवन्‌ ॥ १७ ॥ श्च जरा ह्या, उन दोना के बहुत से पुत्र 
व व ॥ व 6 । छरीर नाती इय चौर सरीचि की खरी सभूति से 
पनी मरीचेः सम्भूतिः पएमासमलूयत ।१८॥|पूरमास नाम का घु हा ॥ १॥ महातमा पूर 
विरजाः पर्वतश्चैव तस्य पुत्रो महात्मनः। मास ॐ विरजा नौर पवेत चाम्रकेदो पुत्र प। 
तयोः पुत्रास्तु रक्ष्ये वंशसंकीतेने हिन ।।१६॥| दे द्विज ! इन दोनां के र 1 वणन ओ 
सयृतिशाङ्गिरसः पत्नी भ्रदूता कन्यकास्तथा । | कैग ॥ १९॥ अ 1 
ॐ ^ उत्पन्न हैः जिनके नाम ह सिनीवाली, इद्ध, राका? 
सिनीवाली इश्च राका चालुमती तथा ॥२०॥| भाटुमदी तथा ॥ २० ॥ श्या जिसने श्नि मुनि 
अलुष्या तथेव्रेजजे पुत्रानकल्मषान्‌ । | से विवाह किया जिसके पुर्यात्मा सोम, 
सोमं दुव्वांसमश्वेव, दत्तात्रेयश्च' योगिनम्‌ ॥२१॥| डर्बासा छौर योगी स ५ 
प्रीत्यां यां दत्तोलिस्ततसु द्धी पीति चामश््रीसे द्चतोलिके नाम पुत्र उ 
1 द्तोलिरतततोऽभवत सो स्वायं मनो अगस 
ूतवेन्मनि सोऽगस्त्यः स्मृतः स्वायम्भुवेऽन्तरे।। २२ > नाम से विख्यात थे ॥ २२॥ कर्दम, शरयैवीर 
कदमाव्वेवीरश सरिषण् सतत्रयम्‌ । | शरीर सदिषु ये तीनो पुन धुलद प्रजापति की खी 
कमात सुुषे भाय्भ्रा एह्य मापते; ॥२२॥ कतमा से उत्पच् हप ॥२२ करतु की खो सक्ति इदं 
करतोस, सन्नतिभाय्यां वालिखिव्यानघ्रूयत । | जिससे वालिखिल्य लोग उत्पन्न हुए, ये दी साठ 
` पष्टयानि -सदस्रणि पीणामूष्वरेतसाम्‌ ।२४॥| हज्ञार उ्वरेतसे ऋषि हए ॥२७॥ चशिष्ठि की 
. .उठर्नायान्तु वशिष्ठस्य सक्ाजायन्त वरः सुताः1- | ऊजां नाम कीखी से स्यत युज हष, (१) रज, 
रनोगात्रोदध्वबाहुश्चः : सवलशचानवस्तथा ॥२५।॥ (२.) गात्र, (२) उर्व, (४ ) सवज, (५१, 


२०४ 


पुता; श॒क्र इत्येते स्वै सप्तष॑यः स्मृताः । 


योञ्खावभ्चिरभीमानी ब्रह्मणस्तनयोञ्यरजः ॥२६।॥ 


तस्मात्‌ स्वाहा सुतान्‌ लेभे व्रीसुदारौनसो द्विज । 
पावकं पयमानंच शचिश्वापि जलाशिनम्‌ ॥२७। 
तेषान्तु सन्ततावन्ये चल्वारिशच्च षच च । 
कथ्यन्ते बहुशुश्चेते पित्ता पुत्रत्रयंच यत्‌ ।२८॥ 
एवमेकोनपंचाशददुन्ज॑याः परिकीर्षिताः । 
पितरे बरह्मणा खषा ये व्याख्याता मया तव॥२६॥ 
ग्रपरिष्वात्ता वर्हिषदोऽनश्रयः साञ्चयक््च ये । 
तेभ्यः स्वधा सुते जङ्ग मेनां वैधारिणी तथा ॥३० 
ते उभे ब्रह्मवादिन्यौ योगिन्यो चाप्युभे द्विज । 
उत्तमह्गानसम्यन्े सर्वैः सपुदिते गुणैः ॥२१॥ 
इत्येषा दक्षकन्यानां कथितापत्यसन्ततिः। 
्रद्धावान्‌ संस्मरनेतानानपत्योऽभिजायते ।३२'. 


नघ ॥ २४॥ (६) वपा, (७) शुक्र । येदी 
सक्षपिं कहलाते है, ओर व्रह्मा के प्रथम पुधरजो 
अचरि है ॥ २६ उनके स्वाहा से परम उदार श्नीर 
तेजस्वी तीन पत्र हुपए-{ १) पावक, (२) पवमान 
श्रौर तीसरा जन का भोजन करनेवाला शुचि।२७॥ 
उनके पैतालीसं सन्तानं दु, तथा तीन पुञ्च श्रौर 
पिता सहित ॥ २८॥ वे उनेचास दुय हणः । हे 
विप्रवर ! बह्माज्ी ने जो पितरो को खजा वद ने 
तुमसे ब्णन करदिया टै ॥२६॥ अञ्चिष्वावावर्हिषद, 
श्ननश्चि रौर साचि इनसे स्वधा के दो कन्याय हुदै 
( १) मेना भौर (२) धारिणी ॥२०॥ दे दविज ¦ 
वे दोनों उत्तम स्नान खे युक्त, सचंशुए सम्पत्न, 
ब्रह्मवादिनी इई ॥ ३९ ॥ ब्रह्माजी की कन्याश्मो की 
खन्तति का यड चन है, जो इसको श्रद्ध पूर्वक 
स्मरण करता है उसके सन्तान उत्पन्न दोती है ॥ 


इति श्रीमाकीर्डेयपुराण मे शद्रसगाभिधान नाम ५२बां श्रध्याय समाप्त 
--स्म-क० 


दिरेणनव अध्याय 


करोणकिखुवाच 
स्वायम्भुवं सखयाख्यातमेतन्मन्वन्तरंच यत्‌ । 
तदहं भगवन्‌ सम्यक्‌ श्रोतमिच्छामि कथ्यताम्‌ १ 
मन्वन्तरममाणंच देवा देवषेयस्तथा । 
ये च क्षितीशा भगवन्‌ देवेन्रश्वेव यस्तथा ॥ २॥ 
भाकंरडेय उवाच 
मन्वन्तराणां संख्याता साधिका हेकसप्रतिः। 


कोष्टुकिजी वोले-- 

दे भगवन्‌ } आपने जो स्वायंभुव मन्वन्तर का 
वरेन क्रिया उसको म भली प्रकार सुना चाहता 
ह, किये ॥९॥ मन्वन्तरका प्रमाण तथा उख काल 
मे जो देवता, ऋषि, राजा लोग श्नौर देचेन्द्र॒ हए ` 
उनका बर्ण॑न कीजिये ॥२॥ 
माकरडेयजी चोक्ते- 


इकत्तर चतुयंगोका एक मन्वतन्र होता है अव 


माटुषेर प्रमाणेन शु मन्वन्तरं भे + ३॥ मच्यो के बपं के पमाण से मन्वन्तर का खमय 


व्िश्कोव्यस्तु संख्याताः सदस्चणि च पिंशतिः। 
सप्षष्टिस्तथान्यानि तिदुानि च संख्यया \ 

सन्वन्तरपरमाणंच इत्येतत्‌ साधिकं पिना ॥ ४॥ 
अष्टौ शतसहस्राणि दिव्यया संख्यया स्पृतम्‌ । 


खनो ॥ २॥ मद्यं के तीर करोड अडसट लाख 


| वीख दज्ञार चपौं का एक मन्वन्तर दोताहै मन्वंतर ४ 


का यदी धमार है ॥ ९॥ डोर देवताश्नों के श्रार 
लाख चानन हज्ञार वपं का प्रमाण ॥ ५॥ स्वयंभु 


द्िपंचाशत्‌ तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि च ॥ ५ ॥ मन्वन्तर का है, श्नौर इसके बाद इतना-ही स्वा- 


स्वायम्मुवो मलः प्व मजुः स्वारोचिषस्तथा । 


रोचिप मन्वन्तर होता है तथा श्रौत्तम, तामस, 


ओचतमस्तामसश्चेव रवेपस््ा्ुषस्तथा ॥ ६।|| रेवत ओर चातु ॥ ६॥ ये सव छः मन्वन्तर है 
२५, मनवेऽतीतास्तथा वैवस््ता्ुना ! | इनके वीतने पर वैवस्वत मन्वन्तर होता है जो. 


अ० ५३ माकंरडेयपुराणं २५ 
सावि; पंच रौच्याश्च भौत्याश्चागमिनस्वमी ७ | ाजकल चल रहा है श्नौर साचि पञ्चरौचय 
एतेषां विस्तरं भयो सन्वन्तरपरिरे । तथा भौत्य के श्माने पर ॥ ७।॥ इनका विस्तारः पूर्वक 

२ वणेन मन्वन्तरं के वृत्तान्त मे कर"गए तथा देवता 
वश्य देवाद्पीरचव ' येनः पितरश्च ८ अति वदलीर पितर तो म्व 9 चरे #॥ 
उत्पत्ति संग्र व्रह्मन्‌ श्रूयतामस्य सन्तति; । | दे ब्रह्मन्‌ ! उनकी उत्पत्ति, संग्रह श्रौर सन्तति को 
यत्च तेषामभूत्‌ षं तत्पुत्राणां महात्मनाम्‌ । ६ ॥ 9 उनके जो चे शौर मदात्मा पुत्र. ह 
व पुत्रा + उनको भी करहुगा ॥६॥ स्वायम्युवमयं के दंश पुत्र 
[4 स्वायथ्भवस्य 1 ~ ०५ ७ 
मनो सय स्वाय भुषस्यसिन्‌ दश पुत्रस्तु तत्वमा | उन्दी के समान हुए जिन्दोने कि सातां द्वीप चौर 
येरियं पृथिवी स्वां स्पा सपव्वता । १० | पर्व॑तो सदित सम्पूरं पृथ्वी फो ॥ १०॥ समुद्र के 
ससुदराकरषती अतिवृष निवेशिता । | सहित अपने वश मे कर क्लिया । पदि स्वायंभुव 
स्वायम्भुव॑ऽन्तरे पूव्येमाय तरेतायुगे तथा ॥११। मन्वन्तर मे अता युग फे श्रादि मे ॥१६॥ भ्रियन्र॑तके 
भियव्तस्य पत्रस्तः पौ; स्वायम्भुवस्य च । | पु रीर स्वायम्ुव के पौँ ने धरथ्वी पर रज्य 
मियवतात्‌ भजाषत्यां वीरात्‌ कन्या व्यजायत्‌॥ १२।॥ क्रिया । वीर भ्रियवत ने कन्य! जावती से ॥९२॥ 
. कन्या सा तु महाभागा कर्मस्य प्रजापतेः | जो पजापति कटम की पुन्री थी विवाह किया 1 
पन्ये द दश पुत्राय सम्रार्‌ कुक्षी च ते उभे ॥१२॥| उन वोनो से दो कन्याये ओर दल तर उत्प हष 
तयोव भ्रातरः शूराः भरनापतिसमा दश । | ५१॥ ष ५ व २ 
मे ४ ध 1 (१) श्श्नीध्र, (२) मे › (३) वपुष्मान्‌ 
अर्धो मेधातिथिश्च वपुषपांथ तथापरः ॥१४॥| 1 १४॥ तथा (भ; ज्योतिष्न्‌ (५) यू तिमान्‌, 
व्योतिष्पान्‌ च्‌ तिमान्‌ भव्यः सवनः सप एव ते। | (६) भव्य, (७) सवम । ये सात हए चौर मेधा, 
सेधाभिबाहुमितरा्तपो भग परायणाः । | श्रलिकाड तथा मिज इन तीनो छोटे म्नि रज्य 
जातिस्मरा महाभागा न राज्यायमनो दधुः ॥१५। म चिन्त न दिया शरोर तपस्या करनेके लि योगी 


भियरतोऽभ्यषिशवत्‌ तान सक सषु पाथिवान्‌ | दोग ॥९५॥ राजा भियनत ने बड़ सात ध को 
्रपिष्येतेषु ध््येण दरीपास्वैव निबोध मे । | सात दीपं का राजा चना दिया। अदी को जम्बु 
जम्बुद्रीपे तथाप्नीधं राजानं श्तवान्‌ पिता ॥१६॥ दीप का रज्य मिला ॥१द्‌। भियतत ने मेधातिथि 
ए्द्वपेश्वस्थापि सेन मेधातिथिः कृतः । को ष्लकत दवीप, वपुष्मान्‌ को शाल्मलि द्वीप तथा 


= + ज्योतिषन्तं ल्योतिप्मान्‌ को इश डीप का राजा किया ॥ १७॥ 
शार्मले तु पुष्मन्तं ज्यो कुशाषये ॥१७॥ नय य का गाड च ठिमान्‌ को, शाकी 


कर्चदवपि चू तिमन्तं भव्यं शाकाहयेश्वरम्‌ | | का मन्य को शौर पुष्कर द अधिपति सवन को 
ुष्कराधिपरिञ्चापि सवनं कृतवान्‌ सुतम्‌ ॥१८ 1 ॥६८॥ ५ राजा व 

धातकिश्च पुष्कराधिपतेः त र धानि नाम दो पुत्र हुए 1जन्टान क्रि पुष्कर 
महावीतो यो (4 १६॥ को श्राधा-्ाघा वार लिया 1 १६॥ मव्य के सात 
द्विषा श्रत्वा तयोवेषं पुष्कर सन्यचशुयत्‌ पुत्र हप जिनके नाम मुभे घनो । ( १ ) जलद, 
भव्यस्य पुत्राः सप्तासन्‌ नामतस्तान निबोध मे । | (२) कमार, (३) खुङमार, (४) जनीयकारण। 
जलदश्च हृमारश्व दुङ्मारो वनीयकः ॥२०॥| (५) ङशोत्तर, (६) मोदाकी गनौर (७) महा 
छशोतसेऽ्य मेधावी सप्तमस्तु महाषटमः ! | ठम इन खातों को शाकद्वीप के सात भाग करके 


वपा शाकदीपे $ देदिये जिससे किं इनके नाम से सतव कदलाने 
स्नामकानि रर्पाणि शाकदीपे चकार सः ॥९५॥ लगे ॥२९) इसी प्रकार य तिमान्‌ के सात पुत्र ह 


तथा ध तिमतः सप्त ुतरास्ताथ ॥ मे । | जिनके नाम सुभे खनो । ॥ । 2) मदग, 
कुशलो . मलुगथोष्ण; भकार ; ॥२२।॥| (३) उप््‌,.( ४ ) पाकार, ५ ५ / अथकारः ॥९२॥ 
नियं द्दुभिश्वैव सप्तमः परिकीरितः ! । (६) यनि नौर 9 इन्दुभि । इन्दं सातो. के, नाम 


~~ 
~~~ - = "~~ 
[क 


२०६ माकरुडेयपुरार श्र ५१ 


हेषा : 3 ^> से कोच द्वीप मे सत्त व्पौ के लाम पडे तथा उस 
तेषां सनामेयानि करोनवदवीपे तथाभवन्‌ ॥२३' | को लात भातो म बाया ग्या ॥ २३) (योतिष्मान 


ऽ्योतिप्पतः इृशदरीपे पुत्रनामाङ्कितानि षै । | के इुशदीप मे पु क नाम से सात व ए, उन 
तत्रापि सप्त वर्षाणि तेषां नामानि मे भृ ॥२४॥| के नाम समसे सुनो ॥ २४॥ (१) उद्धिद, (२) 
उद्भिदं वैपएवञ्यैव सुरथं लम्बनं तथा । | वैष्णव, ( २) खुरथ, (४) लम्बन, ( ५ ) धृतिमत्‌ 
धृतिमलमभाकस्येव ऋ्ापिलल्चापि सप्तमम्‌ ॥२५॥ (६) भमाकर शोर ( ७) कापिल ॥२५॥ शाल्मलि 
वपुष्मतः सुता सप्त शारमलेशस्य चाभयम्‌ । | दीप के स्वामी घपुप्मान्‌ के सात पुत्र हे (१) 


श्वेत, (२) हरित, (३ ) जीमूत्त, (४ ) रोहित ॥ 
श्वेतश्च हरितश्चैव नीभूतो रोदितस्तथा ॥२६॥ [9 (९) आर कात्‌ 


वय्‌ तो मानसश्चैव केठमान्‌ सप्तमस्तथा । | इन्हीं सातौ क लिये शाल्मलि के सात खएड हप 
तथैष शार्मज्ते तेषां समनामानि सप्त षं ॥२७1॥| जौर इनके नामों दे वयौ खात वषं कहलाये ॥२७॥ 


सप्त मेधातिथिः पुत्राः पुक्दवीपेश्वरस्य वै । | प्लक्दधीप के ७ क) के भी सात पुत्र हषः 
षं 3 3, जिनके नाम से प्लक्षद्वीप मेँ अरलग.प्रलग वर्प हुए 
येषां नामाङ्किेवषृः पद्रीपसतु सप्तथा ॥२८॥| तथा ष्ल्ुदधीप को सात भागों म विमत किया 


प्यं शाकमवं वषं शिशिरन्तु सुखोदयम्‌ । । गया ॥ २८॥ उनके नाम ये है-( १ ) शाकभव, (२) 
आनन्दञ्च शिवंचेव क्षेमकंच धवं तथा ॥२६॥. शिशिर, (२) खुखोदयः, (४ ) आनन्द, (५) शिब 
इ्षद्टीपादिभृतेष शाकद्वीपान्तिमेषु॒तै । । ( ६) कमक शरोर (9) धुव ॥२९॥ प्लक्त, शाद्मलि, 


कुश, करच श्रौर शाक इन पाँच दीपो मे वशांश्रम 
्ेयः पंच धम्श्च वणाश्रमविभागनः ॥३०॥ धर्मं भरचलित है ॥३०॥ यहाँ स्वामाविकत्तया हिंसा 
नित्यः स्वाभाविकश्चेव श्र्दिसाविधिव्ितः नहीं होती है तथा इन पचो द्वीपौ मै सव ध्म 


` पंचस्येतेष वर्षु सव्वं साधारणं स्मृतम्‌ ॥२१।. साधारण है ५२१॥ हे क्रौषटकिजी ! पिता पियत ने 

शरीराय पिता पत्वं जम्बुद्रीपं ददों द्विज । | श्रन्नीध्र को जम्बुदधीप दिया था, उसके नौ पुत्र हप 
तस्य पुत्रा वभ पुर्हिं प्रजापतिसमा नव ॥३२।। जो पजापति के समान थे ॥३२॥ बड़े का. नाम 
जयेष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किभ्पुरुषोऽ्नुनः । | नाभि शौर उससे छोटे का नाम किम्पुरुष था'तथा 


र तीसरे ऋ नाम हस्विपं चनौर चौथे का इलाधतं 
रिवषस्तृतीयस्तु  चतुर्ोऽमूदिलातः ॥३३॥ द्श्रा॥३३॥ पाँचवे पुत्रका नामरम्य, छेका 


रम्य्च पंचमः पुत्रो हिरण्यः पष उच्यते | हिरण्य, सातवे का छर श्रौर श्राठवे' का भद्राण्व 
इरुस्तु सपरमस्तेषां भद्राग्वशाष्ठमः स्एृतः ॥२४॥| ह्या ॥ ३९॥ नवां पुत्र केतुमाल हइश्रा, इन्दं नौ 
नवमः पेतुमालश्च तन्नाम्ना वषसंस्थिति पुोके नाम जम्बूद्टीपके नो बध हुए श्रौर क्रिपुशष 
यानि किम्पुरूपाख्याणि वज्ज॑यित्वा हिमाहृयम्‌ २४ श्रादि जो वभे दै उनमे हिमवपं को छोड़कर ॥३९॥ 


तेषां स्वभावतः सिद्धिः सुखप्राया ह्ययत्नतः । | सव वर्षो मे स्वामाधिकलया सिद्धि रहती दै श्रौ 


नवा त नि विना प्रयन्ञ करिये ही सव जीव खखी रदते है वहं 
बिष ५. त्वस्ति ,नरामृत्युमय न च ॥२९॥| न निपतति दरौर न चरद्धावस्था तथा सृल्यु काभय 
धम्मधिम्मा न तेष्वास्तां नोत्तमाधममध्यमाः । | है।३६ बहा धम॑, रधम तथा उत्तम, मध्यम शौर 


न वै चतुयुगावस्था नात्वा ऋतो न च ॥२७॥ अधम छख नदीं है नीर न वा चासो युगं रौर 
उरघ्ीधरपुनोनाभेस्त॒ ऋपभोऽभृत्‌ सुतो दविज । न तुयं ॥ २७ ॥ दे हिज ! अभ्नीध का पुत्र नाभि 


श्रौर उसके 
ऋषभाद्भरतो, जङ्गे वीरः धुतरशताद्वरः ॥३८॥| सो पुत्र त म ध 
सोभभिपिच्यपभः ए ` महाभावराज्यमास्थितः राज्याभिषेक करके पुल के आश्रम.को तप करने 


तपस्ते महाभागः पुलदश्रम्संधरयः ।३६॥॥ ॐ ्िथे चले गये ॥३६॥ पिता ने भरतको हिमालयः 
दिभद्रं दक्षिणं घषं भरताय पिति ददौ] ` | केदक्तिणकावभैदियाजो कि उसके. नाम. परर 


~~ 


` ° ५४ | भाकंरुडेयधुराण --०७ 


तस्मात्‌ ठु मारतं चप तस्य नाम्ना महात्मनः ॥४०]॥| भारतवप नाम से विख्यात हुश्रा ॥ ४०॥ भरत कं 

 भ्रतस्याप्यभूत्‌ घुमर सुमतिनांम धार्मिकः । | भी खुमति नाम धार्मिक पुत्र मा जिसंवौ पि, 
तस्मिन्‌ राज्यं समावेश्य भरतोऽपि वनं ययौ |४१॥ राज्य देकर भरत भी वन को गये ॥ ४१॥ इस 
एतेषां पुत्रपौेस्त॒॒सष्टद्रीण यसुन्थरा । ! स्वायम्भुव मन्वन्तर म प्रियत फे पुज पौन ने 
भियत्रतस्य पुत्रस्तु शक्ता स्वायभ्धुवेऽन्तरे ॥४२॥| सद्वीपा बछुम्धया को भोगा ॥ ४२॥ हे कौषटुकि ! 
एष स्वायम्थुवः सगं; कथितस्ते द्विजोत्तम । ये मेने स्वायंभुव मन्वन्तर श्रापसे कहा, यवम 
पव्वमन्वन्तरे सम्यक्‌ किमन्यत्‌ कथयामि ते ॥४२॥॥ शरीर क्या कहं यह वताद्ये ॥ ४२३॥ ` | 


इति श्रीमाक॑र्डेयपुराण मे मन्वन्तर कथन नाम ५३ अध्याय समत । ‰ ` ` 


-- 97 .भ>;&द, ८९ -- 
चौवन्ां अध्याय्‌ 
क्रोष्टकिरुवाच क्रीषएटकिजी वोत 
कति द्वीपाः सयुर वा परव्वेता षा कतिं ह्विन । हे भाकरडेयजी ! कितने द्वीप, समुद. पर्व॑त 


कियन्ति चैव परषाणि तेषां नधश्च का रुने ॥ १॥| श्नौर अप॑ है श्रौर उनमे कौनसी नदियां है १॥.१॥ 
महाभतपरमाणंच लोकालोकं तथैव च! | पएर्वी का भमार्‌, लोकालोक शौर उनके चारो 
प्यास परिमाणश्च गति चन्द्राकयोरपि ॥ २॥| शोर का भ्रमाण शरीर चन्द्रमा सयं की. गति भीं ॥ 
एतत्‌ प्र्रहि मे सम्ब पिस्तरेण महायुने ॥ ३॥ ्े महामुनि {येसव सुभसे विंस्तारपूवैक कदटिये॥ 


माकरडेय उवाच मार्केरडेयजी बोले-- ध 
शताद्धकोिषिस्तारा परथिवी इृतस्वशो द्विज । ह छिन ! सम्पू रथ्यः आ विस्वार पास 


खिलं तत्‌ करोड योजन है, श्च उदके खव स्थानोँकौ कहता 
तस्या दि स्थानमसखिलं कथयामि श्रुष तत्‌॥ ४ ॥ ह खनो ॥४॥ हे विप्र! मेने तुमको जम्बू आदि 


ये ते द्वीपा मया परोक्ता जम्बद्रीयादयो द्विन। | दीपं से लेकर पुष्कर तक वताय, अय इनका 
पुष्वरान्ता महाभाग शृएवेषां पिस्तरं पुनः ॥ ५॥| विस्तार सुनो ॥५॥ पक द्वीप से दूसरा द्वीप इगना 


जम्ब रक्षोऽथ | | है श्रथोत्‌ जम्बू द्वीप से ढुगना प्लक्त, प्लत से |] ॥ 
1 दुगना शाद्मलि, शाट्मलि से दुगना कुश, श से 


इशः क्रौश्स्तथा शाकः ुष्करदरीप एव च ॥ ६ । | स दगना कच. च शे गना शाक शौर शाके 
लवणेषु-एग-सर्पिदधि-दुग्ध-जलान्विभिः । | गना पुष्कर है ६] शौर यद दीप लवण, ईैख के 
दवियुेदिगुण दध्या सव्यतः परिवेष्टितः ॥.७॥| रर, खुरा, धृत, ददी, दूध श्नौर जल के समुद्रौ से 


यें निबोध मे| | जो प्क से दूसरा गना है चासं शरोर धिरे हण दं 
समीप सस्वनं मदे निकष भ ॥अ श्रव म जग्वु द्वीप का प्रमार्‌ कहता द सुनो 1 


लक्षमेकं योजनानां ततौ ` विसतारदैषयतः ॥८॥ चद एक लाख योजन लम्बा ्नौर चौड़ा दै ॥८॥ 
हिमवान्‌ दैमङ्व्ध ऋषमो मेररेव च । ` हिमवान, हेमकूट, ऋषभ, मेर, नीलः श्वेत श्रौर 
नीलः श्वेतस्तथा शृङ्खी सप्तास्मिन्‌ वषपव्वंताः॥। ६ ॥ श्री ये सात इसमे वपे-पर्वत ह 1 ६॥ इसके वीच 
ढौ लक्षयोजनायामौ मध्ये ततर महाचलौ । | म एकणक लाख योजन के दो मदाय पर्वत दै, 
तयोर्दक्षिणतो यौ त॒ यौ तथेत्तरता गिरी.॥ १० ध्न दोनों के उत्तर शौर दक्तिए मे दो-दो प॑त 
दशमिरदशमिन्यने सहसैसैः परस्परम्‌ । प्नीर ह ॥ १० ॥ बे पर्व॑त लम्बा मे दशांश कम ढे 
दविवादलोनछयः; सरे तावदविसतारिएब ते ॥११।॥| तथात्र दोरा योजन ऊंचे ओर इतने ही चौड 


,,२०८ माक॑रुडेयपुराण ` अ० ५४ 
माता 
सथान्तःभविषटा्च षदृस्मिन्‌ वर्ष्या; | है ॥ १९॥ चुः वपै-पवैव समुद्र तक पले हु श्र 


+ तुङ्गा ध दक्षिण. उत्तर, नीचे तथा मध्यमे वे ऊचे हे॥९२॥ 
दक्षिणोत्तरा निम्ना मध्ये तुङ्गता क्षितिः॥१२ र वितथा वीत शर & र 


विदे दकि ्रीणि प्रीणि वर्षाणि चोक्तरे। | इलावतं उन दोनों कै वीच म॑ अरदचन््ाकार की 
इलाेतं तयोर्मध्ये चनदराद्ाकारषत्‌ स्थितम्‌ ।॥१३।॥ तरद स्थित है ॥ १३॥ उसके पूरं मे भद्राश्व श्रौर 
ततः पूर्व्वेण भद्राष्वं केतुमांच पिमे । पश्चिम में केतुमाल है श्रौर इलावर्तं के मध्य मे 


| ; कनक्वर्नवत; खद का मेर पर्वैत है ॥ १४॥ वह महान परत 
दला्तस्य मध्ये त॒ मेरुः कनकपव्यतः ॥१४।॥| चौरासी हजार योलन ऊ ह, बद सोलददजार 


चतुरशीतिसाहस्रसतसयोच्छायो महागिरेः । योजन प्रथ्वी मेँ धसा हुश्रा ्नौर सोल हार 
प्रविष्टः षोडशाधस्ताद्वस्तीणं षोडशैव तु ॥१५।॥ योजन चौडा है ॥२५॥ इस परव॑तका शिखर वनत्तीस 
 शरावसंस्थितत्वाच दात्िंशन्मर्दिथ्न विस्तृतः दज्ञार योजन चौड़ा है यौर शयवकी तरह स्थित 


दै तथ।-पूवं मे श्वेत, दक्षिण मे पीला, पश्चिम मे 
शः पीतोऽसिते रक्तः मात्य दिपुययाक्रमम्‌॥ १ नीला श्नौर उत्तरम लाल रङ्का मालूम दोताहे ॥१६ 


विप्रो वैश्यस्तथा शद्रः क्षत्रियश्च सवणंतः। | ये पवत न्य, चतय, वैशय शरौर शरुद् इन चास 
तस्योपरि तथेवाष्टौ पूल्वादिषु यथाक्रमम्‌ ॥१७।॥| चर्णौका है चनौर उसके ऊषर पूर्वादि आटो दिशा 
इनद्रादिलोकपालानां तन्मध्य बरह्मणः सभा । | मे ॥ १७॥ इन्द्रादि लोकपाल रदते ह तथा इसके 


९ वीच में ब्रह्मलोकषै, ये चौदह दञ्ञार योजन ॐच 
योजनानां सहस्राणि चतुरश सयुच्छता ॥१८॥ य 


¢ ४ 

अरयुतोच्छायस्तस्याधस्तथा पिष्कम्पपव्वतः | , | निष्कम्प श्रादि चार पर्वत क्रमश पूर्रादि दिशाश् 
प्राच्यादिषु क्रमेणेव मन्दरो गन्धमादनः ॥१६॥| मेँ हँ (र) मन्दर (२) गन्धमादन ॥१६। (३) विपुल 
विषुलश्व रुपाश्वध केतुपादपशोभिताः श्नौर ( ५६ । इन र पर्वतं & उपर चार 
दच्त उनकी चार भ्वजा्ों के सदश है, मन्दर पर 

कदम्बो मन्दरे केतनमबवं गन्धमादने ॥२०॥| ददन का व 
विपुल्ते च तथाश्वत्थः सुणाश्वं च पटो महान्‌ । विपुल क ऊपर पीपल ओर खुपाश्व ङ ऊपर धरः 
 योननानामिमे नगाः !,२१।| गद का बरकत । इन पवतां का विस्तार ग्यारहसरौ 
एकादशशातायामा यो मे नगाः ।२१। योजन है ॥२१॥ इसके पूर्वं की दिशा मे जठर शौर 
जठरो देवदूटश्च पव्वस्यां दिशि पव्वेतौ | देव्रुर पवेत है तथा जठर ऊ पास आनील श्रौर 


श्रानीक्ञ-निषधी प्राप्रं परस्परनिरन्तरो ॥२२॥ देवक्रट कै पास निषध पर्व॑त है ॥ २२॥ मेर पर्वतके ` 


पश्चिम की शरोर निपध चौरः पारिपात्र ह तथा पूवं 
निषधः पारिपात्रश्च मेरोः पाव तु पिमे । मे स्थित जरर शौर देव्रुट का जितना प्रमाण है 


यथा पूत्वौ तथा चैतावानीलनिषथाय॒तौ ॥२२।| उतना दी आनील नौर निषध का भौ है ॥२३॥मेर 
3 ~ हिमवते ॐ दकि की शरोर हिमवान्‌ श्रौर कैलाश पर्वत है 
केलासो हिमवांश्च दक्षिणेन महाचल । इनका विस्तार भी उतनादही दै जितना किं पूवं 
पर्येपश्चायतावेतावणवान्तन्यवस्थितीं ॥२७॥ चौर पथ्िम के पतों का है तथा यद समुद्र कै 


श्ङ्क्वान्‌ जारुधिश्चैव तथंबोत्तरपव्वतीं | अन्दर तक पठं हप. है ॥२४॥ मेरु पचेत के उत्तर क 


की श्योर श्यङ्धवाच्‌ भौर जारुधि पर्वतषै तथा जिस 
यथैव दक्षिणे तद्वदन्तवान्तव्यैवस्थितौ ॥२५॥ भकार दिख ॐ प्ल सुर मे ले हण है जी 


मय्यादापव्वता हेते कथ्यन्तेऽषटौ द्विजोत्तम । । पकार ये मी समुद्र ॐ श्न्दर भवि दोगये ह २५॥ 
हिमवद्धेमङूदादिषव्वेतानां परस्परम्‌ ॥२६॥| दे कोषटक्िजी ! भे श्राठों मयादा पवेत है ओर 
नव॒योजनसादसरं प्रागुदण्दक्षिणोत्तरम्‌ | | 'द्मनाच तग ६.१९ त परस्पर ॥२६॥ नौदज्ञार 


भेरोरिलाषते तदन्तरे यै चतुर्दिशम्‌ ॥२७॥| चारो दिशा मै इलाव्तं ॐ मध्यमे स्थित ह ॥२७॥ 
~ <> " यानि यै जम्बा गन्धमादनपव्बेते ! | श्रौर गंधमादन पर्वतपर जोः जामुन पेडका : फलै 


फः 


योजन तक फैले हणं शरोर दक्तिण उत्तर इत्यादि . . 


अ०५५ २७ माक॑रुटेयपुराण २०६ 


गजदेदपमाणानि पतन्ति गिरिभूद्धनि ॥२८॥| वह दी के शरीर के वरीवर दै. ्रौर परैत के 


यन जाम्बृनद्‌ नामं कनकं सम्प्रजायते ॥२६॥। लेता है दिस जाम्बूनद नामक सवरणं निकलता 


परिशति द्वि देती दै उसी जम्ब के चृक्तके नीचे वहती. है जिस 
शति द्विनशाट्‌ दू पीयमाना जनैश्च .तैः ॥३० त 


द्ाशवेऽइवरिरा विष्ुभारते इममसंस्थतिः भद्राश्व वषं मे विष्णु यग्रीव रूप से भरतवर्ष मे 
वराह केतुमाले च्‌ | कूम, केतुमाल मे वाराद्‌ वथा उत्तर म मत्स्यरूप 
तेयु नक्षत्रविन्यासाष्टिषः क ॥९९॥ से तिराजते हे ॥३१॥ हे कौषएूकिजी | इन चारो वपँ 

हतया सम ^ मे .सक्त्रां का 'ञ्रावागमन रहता है तथा प्रहोँका 


चतुष्येपि द्विजश्रेष्ठ श्रहामिमवपाटकाः ॥२३२॥ प्रभाव मौ पडता है ॥३२॥ | 
इति श्रीमाकण्टेयपुराण मे श्ुवनकोप मँ जम्बद्रीप कयन नाम का ४४बाँ ध्याय समाप्त | 
-- ®>: ०, † 


पचपनवां अध्याय 


। भाकैरडेय उवाच | माकेरडेयजी वोले-- 
शेलेष॒मन्दराचेषु॒चतुर्व॒द्विनोत्तम | ३ द्विजोत्तम ! मन्दरादिक चो पव॑ते मे जो 
वनानि यानि चत्वारि 1 च निवोध मे ॥ १।| चार वन श्र चार सरोवर ह उने सुमते खनये 
एव्वं चेत्ररथ नाम दक्षिणं नन्दनं वनम्‌ | |॥ १॥ पूरव मे चे्रथ, दक्षिण मेँ नन्दनवन, पश्चिम 
म पथिमे शैले साषिवं ॥ २ ॥ में वैशाज श्रौर उन्तर मे साचि नामका चन .दै॥२॥ 
अरुणद्‌ सरः पूष्वं मानसं ॒देक्षिणं तथा | | पूरी पर्वत पर शअररणोद, दंकतिण मँ मानस, पश्चिम 
शीतोदं ` पश्चिमे च तथोत्तरे ॥ ३॥ मे शीतेद्‌ श्नौर उत्तर मै महाभद्र नाम का सरोबर 
शीताततश्चक्रमुञ्चश्च कुलीरोऽथ सुफङ्कवान्‌ । हे ॥ ३॥ शीतात्तं, च 

्रमुंज, छलीर, खुपङ्कवान्‌, 
य व व # ४ ॥ भरि्ेल, दृषच्ान्‌, महानील, भवाचल ॥91 सर्वद । 
सविन्दुम> णस्ताम्‌ मन्दर, वेश, रामस श्रौर निपध श्रौर देधगेलः ये 
8 क ध ॥ ४॥ महापर्वत ये मन्दराचल के पूर्वक रोर द ॥५॥ 
श ॥ चि साद्रि पतंराक्र, स्चक,साच- 
कूट, गरखा, कलिङ्ग ? ॥ 
साटुाश्चाद्वस्तामरकोऽय विशाखा ॥९॥ य्‌, त्राप्रक, विशाखवान्‌ ॥ ६ ॥ वेतादर, समूल, 
शवेतोदरः सभूलश्च -बसुधारश्च रतवान्‌. , | बार, रला, महाल पकः ह, रैलयाज 
# पाठकः .॥ ७ । 
एकभृज्गो महाशेलो राजशंलः पिपाखकः.॥ ७॥ तवाक ॥ ७॥ शौर प्त्रे प्रैत, 
पवशैलोथ सौलासा हिमवां ऽवाचञे्मः 1. .| हिमालय ये महापर्वत मेर की दिए विशा मद 
ह्येते दक्षिणे पाव मेरा; भोक्ता महाचलाः॥ ८ ॥ "^ शिथिरा, वैद्य, पिंगल, पिजर, ` 
सरः शिधिरा्ष्व वूः पिङ्गलस्तथा) ध कपिलं ॥६ ॥ च्र्चन, कुटः, 
पिज्ञिरिभ्य मह सुरसः कपिला सधु {1 & ¦ मरामद्धः सरसः क्र 9 मधु कोर म 
ञ्रज्ञनः कटः दृष्णः पांएडुरश्चार्चलेततमः | कष्या, प्ठतश्र पारस, खद गतर {^ ˆ 


=-= 


---------- > अ~ ~ 


› =-= , माकंण्डेयपुराण । :भ्र० ५१ 
८ =-= = (ब 
इहसरशिखरश्चाद्रिः पारिपान्नः सम्गवान्‌ ।१०।॥ वान पारिपान पर्वत ॥ १०॥ ये मेर की. पश्चिम, 
पशविमेन तथा मेरोर्वष्कम्मात्‌ प्र्विमादरहिः। ` दिशा भ परिचिमी, विष्कम्भ के वादिर्‌ ह ।' इन्‌ 
एतेऽचलाः समारूयाताः शरणुष्वानयास्तथोत्तरान१ १ पवो के वाद अच शर उत्तर पलों को निवे 
शहक्ऽ्य दषभो हंसनाभस्तथाचलः । | ॥ १९ ॥ शंखकट, दषम, ंसनाभ प्रवत, कपिलेन्द्र 
कषिलेनद्स्तथा शैलः सालुमान्‌ नील एव च ॥ १२॥ पर्वैत तथा सामान श्नौर नील ॥९२॥ शरीर खणे 
ल्णभृ्णी शातमृङक पुष्पको मेचपर्व्वतः ॑ शातश््गी, पुष्पक, मेघपर्वत; ` विरजाक्ः 
विरनास्ो बराहा्िमयरो जारुधिस्तथा ॥१२॥ वराहाद्ि, मयुर, जारुधि ॥१३॥ टे ब्रह्मन्‌ । ये पवेत 
ह्यते कथिता हन्‌ मेरारूतरतो नगाः नेर के उन्तर मे स्थित हँ । इन पर्वतांकी घायियां 
¦ एतेषां पर्व्यतानान्तु ्रोण्याऽसीव सनेहराः ॥१४॥ अत्यन्त मनोह ह  ९४॥ चिरा वन, र 

निर्मल" जल बले सरोचसं से -खुशोभित.ट 1 दे 
। बनैरमल्षपानीयैः सरोभिरुपोभिताः । । उन र्म लोम नोनं ह 
\ तासु पुण्यकृतां जन्म भलुष्याणां द्विनात्तम ! १५॥ क 8 
एते भौमा दिर सग; सर्मुणापिकाः ॥९५॥ हे दिजघरे्ट ] ये स्वरगसे भी ्रधिक शुरोबाले 
| 
प ० ४५ 0 ताखपि | पवि उपभोग भी उपस्थित ह श्नौर इन शीतांता- 
९ शीतान्तायेष ॒चेतेष्‌ शोलेषु द्विजसत्तम .।१७।।| दिक पर्वतेमिं विद्याधर, यक्त, किश्नर, नार, रा्तसः 
विद्याधराणां यक्षाणां किन्नरेरगरक्षघाम्‌। | देवता श्रौर गन्धर्वो के सुन्दर २. निवास त द 
^ देवानाञ्च सहावासा गन्धर््वाणाज्चशोभनाः॥१८।|| 1९७९८ ॥ जो कर चड़ पवि हं शौर मनोहर उप 
सहापुए्या मनेञेश्च॒सदेवापवनंयुताः वनो से र है। व सरोवर तथा र 
ऽनिलः तशो मे ख देने चा 
सरसि च मनोज्ञानि पव्यससखदाऽनिलः ॥१६॥| री मलयो को व 1 
न चैतेषु मलुष्याणां मेमनस्यानि इत्चित्‌ ।. | प्रकार भने श्रार पत्र वाला परथ्वी-कमलः चतला 
तदेवं पार्थिवं परश चतुष्पत्रं मयोदितम्‌ ॥२०।॥ दिया ॥ २०॥ इसके चारों ओर भद्रा्व.भारतादिक, 
भूद्रारवभारतायानि पत्राण्यस्य चतुर्दिशम्‌ । | चार पत्र दै । भारतवपे जो मैने दक्षिण की. श्रो 
भारतं नाम यदेष दक्षिणेन सयेदितम्‌ ॥२१।॥| बतलाया है ॥ २१॥ यदी कर्मभूमि दे, अन्यत्र नी 
तत्‌ कम्मभमिनान्यत्र सम्पि पुण्य-पापयोः यँ पुर्य-पाप की प्रापि होती है, इसे दी पधान 
` एतत्‌ परधानं विज्ञेयं यत्र सव्व भरतिषठित्‌ ॥२२॥| समभन चाये क्योकि इसी मे सव निदित दै ॥ 
तस्मात्‌ सवगापयगौ, च माङुष्यनारकावपि । |च दविज | मोच, 
 तिस्यक्ल्मथवाप्न्यत्‌ नरः भाषो वै द्विन॥।२२॥ कर" ३ | + ~ र ५ ५.१ 
इति श्रीमाकंर्डेयपुराण मेँ शुवनकोष नामं ५१ ्रध्याय समाप्त । 


~> -<-6 
` चष्पन्वो अध्या 
भाकौरडेयं उवाच ` ` [ माकडेयजी मो 


। ध्रवाधारं जगद्येाने पद्‌. सारायणस्य .यत्‌। जगत्‌ के आधार श्चौर संखार के कारण. श्री 
तवः प्रहता या देवी गङ्ग त्रिपथगामिनी ॥.१ ॥+: नारायण के चरणसे त्रिपथगामिनी रङ्गाजी उत्पन्न 


१ 


"०५६ |  भण्यषुराण २९५१ 


सा प्रविश्य सुधायेोनि साममाधारमम्भसाम्‌। ` | इड ॥ १॥ चंह खुधाके कारण चनौर जल के शरधार 
तेतः . सम्बध्यमानाकं ररिमशङ्कतिषावनी ' ॥ २॥ 4 सुय ष (४ से, पवित 
॑ मेस द लगीं ॥२ वे मेर पर्व॑त पर पहुचे कर 
पवर च सा चतुदधा ततो ययौ | चार धारां मे वहने लगीं तथा मेरङ्ट पवेत ' के 
2 ¦ न्त्य निपतन्ती ..षिवर्तिता ॥ २॥ अरन्त म जाकर उदर रई, ॥२॥ उनका जल वहाँ 
वकीष्यमाणसलिला निरालम्बा पपातं सा । ` | जाकर फैलगथा शौर तरे निरावलस्व होकर मनद 
नदरा षु पदेषु भिभक्तोदकमा समम्‌ ॥ ४॥. यच त म जाकर (= दोगहै' ॥४॥ 
क शिलाया “जेव वे चारा पहाड़ पर गिरीं -तेां पाड कटक 
चतुष्वपि पपाताम्बु विभिन्ना शिलोचया | कर जल के साथ व्रहगये. जर इसके वाद गङ्गाजी 
पच्या शीतेःतिविख्याताः ययौ चेत्रथं बनम्‌ ॥ ४॥ पने मँ शीत कलाः तथा वहं से चैत्ररथ वनको 
2 ८ वरोदं चली गई ॥ ५॥ चैन्नरथ को प्लावित करतीं इ 
तद्‌ छवयित्वाःच ययौ वरुणोदं  सरेष्रम्‌ । | व अचय सेको टं था बस सीदत 
शीतान्तंव गिरितस :| पवेत को शरोर शीतान्त से क्रमशः अन्य पर्वतां 
शी ८ ४ रतस्मदूततश्चान्यान्‌ गिरीन मातु , पर होती हह ॥ ६ ॥ भूमि पर आई ओर भद्राश्व 
गला यवं `समेसाद् मदराश्वाञ्जलधि गता | | खरड मे होकर समुद्र मै मिलगई । इसी भकार 
(2 प = `श्रलकनन्दा नाम की दूसरी धारा दक्षिण मे गन्धः 
तथराहक्रः दक्षिणे गन्धमादने ॥.७॥| मादन पव॑त पर होकर ॥७॥ मेका वन र 
भेरुपादयनं , गत्वा . नन्दनं ` देवनन्दनम्‌ । | देवताश ॐ नन्दन बन को प्लावित करती हई 
मानसं महाविगात्‌ एषयित्वा सरोवरम्‌ ॥ ८ ॥ ५ से मानसरोवर मे व ८॥ तथा बदँ 
सरसा शैलराजानं रम्य हि शिखरं तथा । . | से शलराज.पवैत क रमसीकं शिखर पर पी 
व शीर दक्षिणा के सथ पवैतेों की परिक्रमा देती हरै ॥ 
। तस्माच्च वान्‌ सववान दशिणोपकरमोदितान्‌॥6 | उनको प्लावितं करे मदागिरि दिमवान्पर पर्ची 
तान्‌ प्लाषयित्वा सम्ाप्ता हिमवन्तं महागिरिम्‌ । ह ध व ने श्रपनी जगाद्नों म रख 
१९०" ; £ » ©. [> (6 
दधार तेत तां शुम्भते ने युमेच चि इषध्वजः या श्रौर फिरन छड् ॥ १० ॥ भागीरथजीं के 
४ ह बर ता शममुनं इमा हषः ॥१० ५ तपस्या करने श्रौर महदिवजी की -स्॒ति रीर 
भगीरथेनोपवासेः स्तुत्या चाराधितो बिभः । | श्रराधना करने पर शिवजी ने उसे युक्त किया! 
क फिर गङ्खाजी सात धाराओं मे वहने लगीं जिने 
तत सक्ता च शव्वंण सप्ता दक्षिणोदपिम्‌॥११॥ से चार सुद्र म मिलगई ॥१९॥ मदानदी गद्गाजी 
भरिवेश त्रिधा भाच्यां प्लावयन्ती महानदी । | की तीन धारये प्लाबित करती हह पूं की अर 
अगीरथरथस्यानु स्रोतसैकेन दक्षिणाम्‌ ॥ गड" जिनमे से एक भागीरथ के पीके दक्षिण की 


४ प "छोर गहै ॥ १२॥ उसी पकार पश्चिम मे महानदी 
तथव पथिमे पादे बिले सा महानदी । श्रीगङ्भाजी विपुले होकर वैधाज नाम वनमे गह 


सखरपुरिति षिख्याता वैभ्राजं साचलं ययी ॥१ ३॥ जिससे उनका नार खरल चिख्यात हश्चा ॥ १३॥ 
शौतोदच परस्तस्मात्‌ प्लावयन्ती महानदी | | फिर बह से दी जलमय करती हः शीलाद नाम 
_श्प्द्‌ च, सरस्व + । / तालाब मे आर" ओर फिर वहां से त्रिशिख पवेत 


स्वरुः पन्त २ ्रिशिखं गता ॥१४। पर पहुंचीं ॥९७॥ फिर कम से सव पवते शिखयें 
तस्माद्‌ क्रमेण बा्रीणां शिखरेषु निपत्य सा । | पर दतीं इई केठमाल वष मे त्रकर क्षार समुद्र 
केतुमालं समासा भविं बणोदधिम्‌ ।*१५॥ मे पि 1१ स चौथी धारा 
6, 9; 3 नः सुपाश्वं श्रौर मेरु पवेत प्रर होती दुहे सप्ता बन 
उपानत्‌ तेयवाद्रि, मराद १ त | । मे गई जयौ वह सोमा नाम .से विख्यात हुई ॥६६॥ 
तत्न सोमेति विख्याता. सा ययो. सवितुवन्‌। १ &॥ बरही ते पान्तो को जल से ओतपोत करती है 
तत्‌ पवयन्तीःसम्राप्ता महाभद्रं सरोवरम्‌ । : | महाभद्र सरोधैर पर पवी जदाँ से चलकर फिर 


ततर्वशं ल्ट साः.भयाता वै महानदी ॥१७॥ तलह पनत प्त इ ॥ ९७॥ वा ल किए , 


२१२ माकंण्डेयपुराण श्र° ४७ 
1 
न धान्‌] ¡ कम पूरवेकः छृपम रादि पवतें पर परहुच कर उन 
स हषमादीन्‌ सा कात्‌ भागय शिहोध् ॥ भ्रान्तं को जलमय करती हु उत्तर के महा समुद्र 
महार्सवमनुपराक्ा प्लावयितत्तरान्‌ इरन ॥१८।। मे मलग ॥१८॥ टे करौधूकिजी ! त दस प्रकार ९ 

£ 
आपसे गङ्गाजी का वणेन क्रिया शरोर जम्बु श्रादि. 

एषा मया ङ्घ फथिता ते द्विजपम । | अ 

पनिवेाच् वर्पणि च यथातथम्‌ ॥१६॥ द्वीपो नौर उनके वर्पो भी ठीक-टीक चणनकिया 
जम्बद्रप। नशा व ॥ २६ ॥-उन क्रम्पुरुपर श्रादि वर्पौमि सर्वत्र भजाजन 
वसन्ति तेषु स्वेषु प्रजाः किम्पुरुषादिषु । सुखपूर्वक निर्भय दो पएकसी दशया मे रहते हे, चं 
सुखपाया निरातङ्गा न्युनतोत्कषव्ग्जिताः ॥२०।॥| न्‌ को$ न्यून दै @ोर न कोई उचछ हे ॥२०॥ श्रौर 
नवस्वपि च वेय सप्त प इलाच्लाः नौ वर मे से भरस्येक म सात- कुलाचल पर्वत द 


4 जिनमे से सदियाँ निकली है ॥२९॥ हे हिजोत्तम ! 
एकैकरससतदा देशे नचधाद्विषिनिःखताः । २६॥ किम्पुख्प आदि श्राठ वपां मे सच वस्तु पृध्वी से 


यानि किम्पुरुषाचानि' घषाए्यष्टो द्विजोत्तम । | विना किसी यल के मिलती परन्तु भारतवप ` 
मे मेधो की बां चे सव छु होता है ॥२२॥ इन 
तेृद्िदानि गोयं चैषवाचयतर भारते ॥२९९॥ श्राट चपा मे चात्ती, खामाविकी, देश्या, तोयोत्था 
बाकी स्वाभाधिकी देश्या तोयोत्या मानसी तथा । मानसी चौर कमजा ये सिद्धियां मदुप्यों को घाप 
कल्पना च व्रणा सिद्धिवर्पषयेतेषु चाटु ॥२३॥ दोती टं ॥ २३॥ इतौ से कामना सिद्ध होने को 
| | सिधि खम चाची, खभाव से टी कायं सिद्ध होने को खाभा- 
कासपरदेम्यो देेभ्यो वाक्सिद्धिः स्वभावना। | विकी चनौर देश से दी काथं सिद्ध होने को देश्या 
स्वाभाषिकी समाख्याता तृि्दैश्या च दैशिकी२४।॥| सिद्धि दते है ॥\४॥ जव थोड़े जलसे कायं सिद्ध 
अपां सोया दायोत्या धया # | दोजाय उसको तेयोत्था, ध्यनसे दी अभिलाप्रा > 
। सच सायाता उपानपष्ठा व मनसि पृणँ होने को मानसी श्रौर उपासना ्रादि^से कार्यं 
उगसनादिकाय्यातत्‌ कम्पना साप्युदाहूता ॥२९।॥| सिध होने को कमजा सिद्धि कदते दै ॥ २५॥ रे) ॥ 
चेतेष ॥ गौषकरिजी ! दन वर्मौ मे न युग धमेहैघ्रौरन 
न -चतषु युगावस्था नाधयो व्याधयो न च । आधिःव्यापि ह तथा इनमे पुरय श्रौर पापका 
पुए्यापुएयसमारम्भो नैव तेषु द्विनोत्तम ॥२६॥ भ्रसङ्ग भी नदीं है ॥ २६॥ 


^ ७ 


इति श्रीमाकण्डेयपुराण में गङ्भावतार नाम ५६बां ° समाप्त । 


ददः ~ 
स्तवन्त अध्याय 
, कऋोषुकिस्वाच कौकि वोक्ेः-- 
भगयन्‌ कथितन्त्ेतज्ज्बद्ीष समासतः । दे माकरडेय जी । जस्बद्वीप का वसेन आपने 


यदेतद्भवता परोक्तं कम्मं नान्यत्र पुए्यदम्‌ ॥ १॥ व व 
पापाय का महाभाग वर्जयित्वा तु भारतम्‌ | | भारत चप के अतिरिक्त कीं नदीं है । भारत वर्षं 
इतः स्मगध मोक्षश्च मध्यंचान्तश्च गम्यते ॥ २॥| मे ही स्वरम, मोत्त, जन्म शौर मरण है ॥>॥ अन्यत्र 
न खखन्यत्र मच्यानां भूमौ कम्पं विधीयते । | मदस्य के लिये कमं का चिधान नदीं हे परस्तु, 
तस्मा्िस्तरशो व्रह्मन्‌ ममैतद्ारतं द ॥ ३ ॥. भारत बण कमशमि कंदलाती दै 1 इसलिये हे 


५ विप्रवर ! इस भारतवर्षं का 
ये चास्य येद्‌ याचन्तो यथावत्‌ स्थिति च। 1 चरन. कीजिये ॥ २॥ 


द ब्रह्मन्‌ ! इसके भद्‌, इसकी स्थिति शौर इसमे 
५ द्विनशाह्‌ दूल ये चास्मिन देशपरव्वताः।। ४ | जो देश. ओर पवत हे उनक्रा भी वसने करिये॥*४॥ , ` 


क 
~ 
--~-------. ~~~, 
~--~------~-~--- 


7“ विपास। देविका रंसुर्निश्चीरा गण्डकी तथा । 


1 माक॑र्ठेयपुराण २११ 


"~~------~-+ ~~~ 


माक्ररडेय उचाच साकर्डेयजी बोले 
५ भ, ~ ऋ न ~ [= 
भारतस्यास्य वपस्य नव भेदान्‌ निवोध मे) दे कटुक } भारतवर्ष के नौ भाग ( मेद ) दै 
सु्रान्तरिता कञेयास्ते तगम्याः परस्परम्‌ ॥ ५।॥ ‰॥२ वह समुद्र तफ फले हय है तथा पक दुसरे 
दीपः करेरमांसतम्रव्णो गभस्तिमान्‌ । | (द) तवसं (५, (सर्ब (वनेम 
श ताध्रदखं ४ {च शे 

नागहपस्तथा सौम्यो गानयववो बाहणस्तथा॥ ६॥ सौर ८) चर 1 
न सोम्य (9) गान्ध ओर (८ ) वाण ॥ ६॥ तथा 

य॒यन्तु  नवमस्तेप रपः सागरसहतः । नवँ मारतवपं हेये समुद्र सेधिरा हश्राहै तथा 
योजनानां सहसत वै दीपोऽयं दक्षिणोचरात्‌॥ ७ ॥ श्छ ठ ५ = उ्चर से दिस तका पक 
पूर किराता यस्यान्ते पथिमे यवनास्तथा । | दर ५ जनन त वि मं किरात तथा 
राणाः त्रय वेशया शद्थानतःस्यता दिन श्वम मे यवन रहते है 1 हे विप ! इसमे बाह्यण, 
प्रिया वेया; श्राान्तःस्थिता द्रिज८॥| क्निय, वेध्य शौर द स्थित दै ॥ ८॥ यच्च, नेद्‌. 
इव्याध्याययणिव्यादय \कम्ममिः कृतपावनाः । | पटन, चीर व्यवसाय चावि कर्मो सेये चारों बरं 
तेषां संव्यवहारश्च एभिः कम्ममिरिप्यते ॥ ६ ॥ ध तथा इन्हीं कर्मो से इनका व्यवहार 

५ [ ५ ॥। श नटीं र 
स्वरगापवगमाप्तिथ पुण्यं पपच वे तदा । | खरग नौर प १ 0 व इनको 
५ 1 

मेरो मलयः सद्यः शक्तिमादृप्वतः । | होते # \ महमद, मलय व = 
विन्ध्यश्च पारिपावरथ सपौवात्र इलाचलाः ॥१०॥| विन्ध्य शोर पारिषत ञ् साव ४ 
ता ध १९) विन्ध्य शरीर पारिएात्र ये सात इसमे प॑त है ॥१० 
पा सहस्र धो व ^“ | रधा इनके समीप श्नौर भी दज्ञासो पदाड्‌ द ॥१९॥ 
विस्तारोच्छारि रम्या वपुलात्राध सानवः। | इनके श्रतिरिक्त वदत से लम्बे चौडे, रमरीक, ऊँ 
कोलाहलः वैभ्राजो मन्दरो दददु राचलः ॥१२॥| र विशाल सान है । कोलादल, सवैश्चाज, 


 वातसवनो वैध तथ मैनाकः सरसस्तथा । = | मन्दरः इल ॥२२॥ वातस्वन, बेच, मेना, 


तङ्गभस्थो नागगिरी रेचनः पाण्डराचलः | १२॥ स्वरस, तुद्परस्थ, नागगिरि श्रौर पारड़राचल॥२३॥ 
युष्पो गिरिदुर्जयन्तो रेवतोाश्ुद पव च) पुप्पगिरि, दुस्जंयन्तः रेवत, श्ववुंद, ऋष्यमूक, 
ऋष्यमूकः सगोमन्तः रूटशेलः तस्म ॥१४॥| समोमन्त, करटरौल, सौर ऊतस्मर ॥९७॥ श्रीप्॑त, 
श्रीपव्यैतश्च कोरश्च एतशोऽन्ये च पर्वताः । | कोर. तथा अन्य सैको पवत है, इन पवतो के 
रविमिशरा जनपदा म्लेच्छाधार्य्ा भागशः ॥१५।| अस पतत म्लेच्छ श्रौर श्राव्य जातिया रहती | 
तैः पीयन्ते सरिच्छेष्ठा यास्ताः सम्यदनिवोय मे। है ॥२५॥ ये लोग जिन शरेष्ठ नदियों का जल पीते दै 
गङ्गा सरस्ती सिनधुधदरभागा तथापरा ॥१९॥ उनके नाम यनो, ग्ग, सरस्वती, सिन्धु शरीर 
गुना च शतदथ वितस्तेरावती $: । चन्द्रभागा ॥ ९६॥ शरोर चजुना, तदु, वितस्ता, 
गोमती धूतपापा च बाहुदा सदशद्ती ॥१७॥ इरावती, कह, गोमती, घूनपापा, बाहुदा, यण्धतौ 
| ॥ १७॥ विपाखा, देविका, रक्त, निश्चीरा, गरडकी, 


कौशिकी चापगा .विमर हिमवत्पादनिःदताः ॥९८। यौशिकी ये सव नदियां हिमालय पवेत से निक; 


येदस्पतिवदवती छत्रघर सिन्धुरेव च} | सती दै ९८ बेदस्टतिः वेदचती, बृजष्नी, सिन्धु, 
वेएवा सानन्दनी चैव सदानीर। मही तथा ॥१६॥| बेरवा, नन्दनी, सदानीरा,तथा मही ॥ १६ ॥ पारा, | 
पासा चम्मैएवती तापी विदिशा त्रवस्यपि । | चम्मैरवती, तापी, विदिशा, नेचवती, गिभ्रा, शरीरः 
शिप्राह्वणीं च तथा पारिपत्राभ्रयाः स्पृताः॥॥२०।॥| श्रवणौ इन सच नदियों का उच्चम स्थान ५२५ ) 
शोणो. महानदश्चैव नम्पदा सुस्थाद्रिना। । पत ह ॥२०॥ शोण, महानद, -नमेदा, सुस्था, 


२१४ माकेरुडेयपुराण ० ५७ 
सन्दाकिनी दशाण च चित्रकूटा तथापरा ॥२१।॥ अद्रिजा, मन्दाकिनी, दशार्णा, चिवक्टा तथा ॥२९॥ 
चित्रोखला सतमसा करमोदा पिशाचिका । | चित्या, सतमसा, करमोदा, पिशादिकाऽपिप्य- 
तथान्या पिपलिशरोणि्विपाशा क्जुला नदी॥२२॥|हि्ोपि विपाशा, अर वं ॥ २२॥ मरना, 
सुमेरुजा शुक्तिमती शङुली त्रिदिवाक्रमुः। | शक्तिमती, शली, चिदिवाक्रसु, स्कन्धपाद पसूता 
स्कन्धपादसूता वै तथान्या वेगवाहिनी `तथा वेय वाहिनी ॥२२॥ शिप्रा, पयोष्णी, निर्विन्ध्या 
शिप्रा पयोष्णी चिर्खिन्ध्या तापी स॒निषधावती । | तापी, सनिषधाचती -बेरवा, वैतरणी, ` सिनीवाली, 
वैतरणी | ^ त - महानौः ध दगा ८ ५ 
वेणवा त्‌ सिनीबाली इयुद्रती ॥२४॥ कुसुद्धती ॥२४ ॥ करतोया, री, ङ्गा, नन्तः 
करतोया सहागौरी दुगा चान्तःशिरा तथा ) शिराये सव पुरय सक्तिला श्म नदियां विन्ध्याचलं 
विन्ध्यपाद्रसतास्वा नघः पुण्यजलाः युभा५।।२४॥॥| पर्वत से निकलीं है ॥ २४1 गोदायी, भीमरथो, 
गोदावरी भीमस्था व तथापरा । | छृष्णवेण्वा, तंदगभद्र, सुप्रयोगा, बाद्याभौर कावेरी 
तुङ्खभ र र १ "क षत से निकली २ 
श व ५ त १ ॥२६॥ ये उत्तम नदियां ज्लिदापाद परवैत से नि 
सिद्यपाद ता ६ त " स त त है । कृतमाला, त्रयी, पुष्पजा रौर उत्पल्लावती 
इतमाला तानरपण भना ता । ९७|| ॥ २७॥ थे शीतल जल वाली नदिय" मलयाचल 
, सलयाद्रिसमुहुभूताः नधः शीतनलास्त्माः । पव॑त से निकली दै ।पिठेसोमा, ऋषिकुल्या, इकुका, 
| पिदसोमर्डल्या च ईका विवा च या ॥२८॥|| न्नर त्रिदिवा ॥र तथा लाङ्गसिनी ओर वंशकरो 
लाङ्गलिनी वंशकरा महैनद्रममवाः स्पृताः! | ये महन पव॑त से निकलती है । ऋषिकुल्या, 
ऋषिस्य छमारी च मन्दगा मन्दवाहिनी ।\२६। कुमारी, मन्दगा, मन्द वाहिनी ॥ २६} श्नीर कपा 
कृपा पलाशिनी चव शुक्तिमलखमवाः स्पृताः । तथा पलाशिनी इन नियो की उत्पत्ति `किम्‌ 
स्वाः एण्याः सरस्वत्यः सर्व्वा गङ्गा सथुद्रयाः, ३० पत से दै । ये सव पुएयवती नदियां सरस्वती, 
मिशवस्यः मातरः सत्र सवयाः पापहरा; ताः । | पङ ८ सु व म ५ ६ नुदि 
वताता जी ! ये सव जगत की माते है तथा सव पापों 
अन्याः सदसरशर्चोक्ताःभूदरनचो दिजोत्तम ॥३१॥ को हरय करने वाली दै । भारत वेषं भे शरीर भी 
आ्टटफालवहाः; सन्ति सदाकालवहाश्च याः! | छोरी छोटी इक्ञारो नदिय है ॥ ३९॥ इनमे. से 
मत्स्याश्वक्षटाःछृरयाश्चशुन्तलाः काशिकोशला;३२/ डच नदियां तो त्रपा पृतु मे दी वहती. रौर 
+ पायशोऽमी +> ह " १ कुन्तलाः शी शत्र ॥२२॥ अथच 
मध्यदेश्या जनपदाः मायशोऽसी मकीतिता॥२२॥| अकरि मलक र चक ये संव द मषयद 
सदस्य चोत्तरे यास्तु यत्र गोदावरी नदौ | | शीय कटलति ह ॥ ३३॥ सहा पवैत के. उत्तर मे 
पृथिव्यामपि कृत्स्नायां स मदे मनोरमः ॥॥३४।॥| जहाँ गोदावरी नदौ वहती है वड भदेश -समस्त 
गोवद्धनं पुरं रम्यं भागेवस्य महात्मनः । 1 ध ₹ ३७) सुन शनराचायं ` 
स (रको न नगर है" चह भी परेम रमरखीक है) 
वा्ठीफा वाटधानाश्च मीरा; लतायाः ४" चादधीक, वारधान, आभीर, कालतोयक॥ २५ ॥ 
अपरान्ताश्च. शुद्रश्च प्बार्चम्भंखणिडिकाः । ध 
गान्धारा यवनाश्चैव सिन्यु-सोवीर-मदरकाः ॥३६॥| `^ ° ` अपक, बन्वार, 
( यचन, सिन्धु, सौवीर, मद्र ॥ ३६ ॥ शतद्‌, कलिङ्ग, 
शतदा; कलिङ्गाश्च पारदा हारभूषिकाः 1 पारद, दारभूषिक, माठ, बहुम्‌ देय शवर भः 
20 श 3 ध $ ् दश 
माठर हुद्रारव कैकेया दशमालिकाः ॥३े७्‌॥ „°` + व कय चर्‌ 


[#० 


त्रियो म्विशाश्च ॒बेश्ये-शुद्हृलानि च ] , : गल ॥ ३७॥ इन सव देशो मे चे, वैश्य श्नर 


श्र०.१७ , माकरुटेयपुराण २१५ 


काम्बोजा दरदाश्षेव षव्र -दपवद्धनाः ॥३८॥ लोग रते है । काम्बोज, दरद, ष्व्‌ शरौर 
चीनाश्चैव तु खाराश्च बहुता धाह्यतो नरा; । | द्वर्दन ।२८॥ चीन, खार, वृहूल, वाहयतोनर 
श्रत्रेयाश्च भरद्वाजाः पुष्कलाश्च करोरुकाः ॥२६।॥ शरा्रेय, भरद्वाज, पुष्कल श्नौर करेखक ॥३६॥ तथा 
लम्पाक; शूलकाराश्च युलिका नागुडः सद । | लम्पाक, शर्कार, चुलिक, जागुड, श्रोषध शरोर 
्नोपधाश्चानिशदराषव किरातानाश्च जातयः ' ४०। निभद्र इन देशो मै कियत लोग रहते दै ॥४९॥ 

("तामसा हससागा् कारमीरास्ुद्गनास्तथा । 
| कुहकाश्पेव नणां दव्वास्तथेष च ॥४१॥ 
एते देशा षदीच्यास्तु भ्ाच्यान्‌ देशान्‌ निवोध मे। ४ # 
अध्रारका युदकरां अनर्यां बर्िराः ॥४२॥| ° अव एवम षते इने रए 
यथां व्ल, रा मानदाः मानर्षिकाः शरन्तर्मिरी, वहिर्िर ॥ ४२॥ प्रवद्ध, रङ्ग यः माद, 
ब्राह्म्याः भविजया भावा यमका; ॥४२॥ मानवि, ाह्ठ्तर विजय, भागे, ेयमलतक 
परागज्योतिषाश मद्रा पिदेहास्ताप्रलिप्तकाः [प्रागस्योतिप, मद्र, विदेह, ताभ्रलिततकः भरल) 
महधा मगध-गोमन्ताः भ्ाच्या जनपदाः स्पृता\॥।४४।॥| मगध-गोमन्त ये पूर्व देश फटलति ह ॥४४॥ इनके 
श्नथापरे ( 1 दक्षिणापथवासिनः! | श्रतिरि्त दिर दिशावती देश है । पड, केरल, 
पुर्दाश्‌ केरलाश्चैन गोलादगूलास्तथंय च॥४५॥ 
शेलपामूपिकाश्चैव शुमा नाम वाका} प 
महार मिका कतिङगवैव सत्वः ॥४६॥| मदाय, मकः कलि आमीर, य 
-भीरः सहमैरिक्या, आदकया शवराध ये । | घद्क्य, शबर, लिन्द, विन्ध्यमोलेय,' बैद, 
पुलिन्दाः प्रिध्यमौलेया वैदभो दण्डकः सह ॥४७॥| दरडक ॥४७॥ सौरिक, मौलिक, ्रष्मक, भोगवरखन 
पौरिका मोतिकाश्चव अकमक भोगवद्धनाः र ्ैषिक, कुन्तल, श्रन्ध, उदज, बनदारक ॥४८॥ ये 
मैपिकाः इन्तला अन्धा द्विदा षनदारकाः॥४८ ० # 

, दाकिणात्यस्चमी देशा शरपरान्तन्‌ बोध मे] | द दक्षौ ठ, भ्रव ्रपरानत दो को खनो । 
प्यारा कालिवला दु्गाश्वानीकटेः सदह . ॥४६।॥ स्यार, कालिवल, दुगा, श्रनीकट 1४९॥ पुलिन्द 
पुलिन्दा सुसीनाथ रूपपा; सापदः पह । 
तथा कुरुमिनश्चेव .सव्वे . चेव कटाक्षाः ॥१०॥ 
नासिक्यााध ये चान्ये ये चेवोत्तरनम्मेदाः। . . 
भीरकच्वाः समाहेयाः सह सारस्वतैरपि ॥५१॥ भीस्कच्च, समाहेय श्नौर सारस्वत ॥५१॥ काश्मीर, 

.\ -कारमीरोध सुराश्च अचन्त्ाश्चाव्वदैः सहं । | घषर ्वनत,श्म्डद, इन दर्शो. के रने वराते 
त्यते ्परन्ताश्च श॒ विन्ध्यनिवासिनः; ॥४२, | श्रपरानत है, अव विन्ध्य निवासियो को खनो ॥५२॥ 
सरनाश्चः करूपाश्र केरलाथोत्तलेः सह । | सरन, करप,केरल, ऽकल, उमस वशाशुमोल्य 
उदमणा दशाण मोसपसिषिन्यकए५२॥ किष्किधक ५२ कोशलः, कोशल, तपुर वेदिशे, 
तोशला, कोशलासैव परु वैदिशस्तथा । 
त्बुरस्त्बुला्यैव परषो नैषधे. सह ॥५४॥ 
ज्नास्तुष्टिकार श्व बीरहोत्रा इवन्तय; 1.“ ; 


तामस, दैसमायं, काश्मीर, तद्धन, शिक, कुहक; 
जणं शरीर द्वं ॥७९॥ ये देश श्रौ्ीर्यो फे रहने के 


सुमीन, रूपपः, स्वापद, कुरमिन, कठाक्तेरं ॥ ५० ॥ 


मासिक्य, तथा दूखरे जो नम॑दा के उत्तरम हे, 


तम्र तम्बुल,पट तेषध॥५४॥ शरभ, ष्ठिकारबीर 
होत्र, अवन्ती ये लोग इन्दं के नाप पर, षने देशं 


२१६ माकरुडेयपुराण ० ५८ 


[११ 


एते जनपदाः सरवै विन्ध्यपृष्टनिवासिनः ॥५१५।॥ मे विन्ध्याचल पंत की पीठ पर रहते द ॥ ५५॥ 
ञजतो देशान्‌ वक्ष्यामि प्व॑ता्रयिणश्च ये । [अव उन देशो को करटगा जो पवर्तो पर स्थित ह, 
५ मणा ह 1 ॥ > [४ कु । र ५, 
नीहारा हंसमार्गाश्च ङरुवो गुणः खसाः ॥५६॥| नीहार. दंखमाग कर, सुगणः खस ॥ ४६॥ इन्त 
्ुन्तमाबरणाश्चैव उरणं दाया सकृत्रका; । | श्रावस्स, ऊख) दाव, छवक्र, (मत, मालव्‌ 
त्रिगर्ता मालवारचैव किरातास्तामसै; सह ॥५७॥| कियत. तामस ॥ ५७॥ सतटग श्रादि चायो युगो ॥ 


्रततरेताठि ९ विधि; से युक्त जिसमे विधि दै, इस प्रकार चारों श्रोर से ^< 
तन ताष्वकदवात चतुयुगङ़तो ४ चखा इ्ा भारत वर है ॥ ५८ ॥ जिसके दक्षिण, 


एतत्‌ तु भारतं वषं चतुःसस्पानसंस्थिम्‌ ॥४८॥| पश्चिम ओर पूरं म समु है उक्र कौ शरोर 
दक्षिणापरितो स्य पूर्व्वेण च महोदधि; । | धनुष की प्रत्थ॑चा की तर्द हिमालय पर्वत है॥५६॥ 
हिमवाचुत्तरेणास्य काम्बुकस्य यथा गुणः ॥५६॥ दे न यह भरतवं ५५ श्रमरेशता, , 
4 ९ ९. पिजं । दवेतत्व (र मरुहूगखं चग कारण ड ॥ ६०} मग, 
तदेतद्वारतं ८१६ द्विनोत्म । | पश. श्रप्रा, सपं चौर स्थावर श्रादि सव 
बरह्मत्वसमरेशतयं देवत्वं मरुतस्तथा ॥९०॥| योनियां दे वहन्‌ ! यदीं क थमाम कमो कफल 
मृगपश्वप्परोयोनिस्वदव सव्वं सरीखपाः । स्वरूप प्राप्न ह्र करती दं ॥ ६९ ॥ दे ब्रह्मन्‌ । 
स्थावराणाश्च सरव्वैपामितो ब्रह्न शुभाशुभैः ६१॥ लोकों 1८ शरोर दृखरी ४ दै। दे 
प्रया ९,.-९ भ विन्ते सिप्रप देवताश्च क ` सदा यदह मनार्थ रदत 
ति 1 सवै सोक ध । 5 दैकि ॥ ६२॥ वै देवत्व से चूटकर पृथ्वी. 
देवानामपि विपरष देवष मनोरथ; ॥६२॥ स को भात क्रं क्योकि मून बह कम॑ 
रपि मानुष्यमराप्स्यामो देवलात्‌ च्युताः क्षित । कर सकता है जिसको फिं देवता श्रौर श्रछुर नदीं 
लभयः ते तद्‌ ह यच्च यं रुरः ।॥६३।|| कर सकते ६॥ भोल चे कर्न यु ) 
म्भरि + ष तसै (~ दं तथा शरपनेकेमो क चञ्चसा कर दरदा 
न्गदटग्र # स्वरम्परस्यापत [4 ~ 2१ + घे 
तत्क ध व (4 
न किचित्‌ क्रियते पम्म सुसललेशोट हिरः ॥६४॥ खपुर छद भी कमं नदीं कर सकते ॥ ६४॥ 
इति भ्रीमाकंरुडेय० म नथादि वणेन नाम भरँ ° समाप्त 


10. ग्भ [ ये 


अटुवनवां ध्याय 
क्रौधटुकिसवाच | क्रौटकरि जी वोलेः- | | 
भगवन्‌ कथितं सम्यग्भवता भारतं मम । | हे माक्रण्डेय जी } आपने मुम से भारत वर्ष 
सरितः पर्त देशा ये च त बसन्त ये ॥१॥ कमली भति कस किया आवह जो न 
किन्तु रम्मस्त्रया पूव भारते भगवान्‌ हरि; । विन्त व । 
कथितस्तस्य संस्थानं शरोतुमिच्छाम्परोवतः ॥ २।॥ के दरम स्वरूप कौ स्थिति कदी थी उसको मै पूं `` 
कथं स संस्ितो दैवः कूमरूपी ननार्ईनः | | सूप से खनना चाहता ह ॥ २॥ यहाँ पर देव क्रम 
४. न क ॥ २५ तथा कसे पौव ह यद विस्तार ( कि ¢ | 
डेय उवाच - रदेयजी चोल 1 
माकर्डेयजी वोल्े-- . ^ ; 
दे चिप ! करमेरूपी सगवान्‌ पूर्वं संख होकर 
॥ ४ ॥॥ स्थित द तथा मास्त वर्पः के नौ मेद है ४ “` 


५५ भय-ूलानि ` च | ` ¦ मालः ५९०१ न सव दाम स], ख 


भाडछ्ठसो भगवान्‌ देवः म॑स व्यवस्थितः । 
~ आक्रम्य भारतं वपं नवयेद्भिदं द्विजः 


+ 


० भूख . २८ माकरुेयपुराण २१७ 
-~--------------------------------~---------------~~~~_ 
नवधा संस्ितान्यस्य नक्षत्राणि समन्ततः । इसके चारों रोर नौ नक्त स्थित दै तथा दे 
विषयाश्च द्विजश्रेष्ठ ये सम्पद्‌ तान्‌ मिवोध मे विभबर ! इसके वारो ओर ओ विषय द उनको 
वेदमन््ा पिमाणडन्याः शाखखनीयास्तथा शुकाः । | खनो ॥ ५॥ बरेदमन्न, विमाएडव्य, शाएटवनीय.शक्, 
उञ्जिहानास्तथा परस पोषसंख्यास्तथा खशाः॥६॥| उलिरान तथा हे वत ! घोषसंख्य श्चौर खशा ॥६॥ 
मध्ये सारस्वता मस्याः शूरसेनाः समराणुराः। | भारतवपे के मध्य मे सारखत, मरस्य, शरसे 
- पर्मारएया ज्योतिपिका गौरयरीवाशुदाश्मकाः॥॥७॥| मा, धर्मारएव, प्योतिपिक गौरप्रीव शौर गुडा 
उदेहकाः सप्ला; सहताः कडकमास्ताः। | कि पवद चात 
कालकोटि्पापरडाः पारिपत्रनिवापिनः ॥ ८ ॥ आधित ह ॥= कापिगल, र, बाह नौर उड्र 
फापिङ्गलाः इ्वादिस्तथेोडम्बरा जनाः । | निवासी तथा दस्तिणा ये जल के रहने चलि कूर्म 
गनाहयाश्च कम्पस्य जलमध्यनिवासिनः ।॥ ६ ॥| भगवान्‌ की पीट के मध्य भै स्थित है ॥६॥ 
कृत्तिका रोहिणी सोम्या एतेष मध्यवासिनाम्‌ । | परौएकिजी ! छृत्तिका, रोहिरी चनौर मृगशिरो भे 
नक्षत्रधितयं भिम शभाशुभविपराटकम्‌ ॥१०॥ तीनों नक्ष उन मध्यनिवाखियों के शुभ श्वीरं 
टपध्वजोऽङ्जनश्यैव ज्याख्यो मानवादलः । | श्म को वतजञाते हँ ॥ १०॥ दपभ्वज, श्जञन, 
शूरो व्याघ्लः स्कः र््वयाशनः ॥११।| जसवाल्य, मानवाचल, शयकरौ,व्याप्सुत, समक 
तथा चदेधरश्चैव सशाप्व भगधास्तथा | = | चर कर्न ॥११॥ तथा चनदेभ्र, क, मगध 
भिरयो पथाः पोरदासतथा बद्नदनतुरा ॥१२॥ मैथिल, पीरड्‌ श्रौर वदनदन्तुर ॥ध्सपाग्‌ जयोति, 

भागज्योतिषाः सललौहित्याः साङा; पुरुषादकाः । लौदित्य, सुद, पुरादकः पूरो, भद्रगौर 
 पूरणो्टो भ्रगौरस्तथोदयगिरिद्िन ॥१३॥ श्र दे कुकिजी ! इती प्रकार उदयमिरि ॥६२॥ 
कशाया मेखलायुटासताप्रलिरकपादषाः । 


कशाय, मेखला. सुट ता्रलिप्त, एकपादप, बद्धैः 
£ त कमस्य संर मान्‌. नीर फोशल ये सव देश भगवान्‌ कर्मं के 
वद्धमानाः कोशाश्च रे कम्पस्य संस्थिताः ॥१४| सुख पर स्थितै ॥९४॥ शरद, पुनव शरीर प्य 
` रोः पुनव्व॑सुः एष्यो नकषत्रनितयं से। | ये तीन नक्षत्र ध्न दशाँ के निवासियो को शमाणठम 
एदे तु दक्षिणे देशाः क्रोष्टुको घदतः शृखु । ।११॥ घरतलाते दै । हे कोपि कमे भगवान्‌ देक्तिण 
ह चर्ण धर ओ देश स्थित है उनको सुनो ॥ १५॥ 
कलिङ्ख-बद्ध-नटयाः कोशला गृपिकास्तथा । ज न 
चेदयो पतस्यायामिन्यवापिनः १६ किष ब नर शशल 
ऽ. र्देला 1 कर्य शौर मत्स्यादि जो विस्ध्य-निवासी देशदे॥९६॥ 
विदभौ नारिकेलाश्च धम्पदठीपस्तथ्िकाः । | तथा बिद, नारिकेल, घर्मदीप तथा पेलिकः्या्र 
वयघ्ररीदा महाग्रीवाः श्मश्रुधारिणः ॥ १७॥ भरी, शुर शौर इमभुधारी ॥ ९७॥ किष्किन्धा, 
नकन्धया हेमकूटश्च निषथाः कटकस्यलाः। ` | हक, निष, दशा, दारिकः, न, विषा श्र 
- दशार्णां हारिका नम्रा पिषादाः काषलालका; १८॥ काङलालक ॥ १८॥ तथा पसं श्रौर शवर ये ` दशं 
तथैव परणशवराः प्रदे वै पुववदक्षिे । पर स्थ 
धकप तथा केयं फद्युन्यः परथमास्तया ॥१६। | केषा, मघा शरोर पूर्वाफालणुणी' ॥ १६॥ ये तीनो 
मक्षत्रतित्यं पादमाधितं पू्न्वदक्षिएम्‌ । | नदर पू दण चरण पर स्थित रहते दै । लङ्क 
मेनद्र-मलयाद्रौ च द्रे च वसन्ति ये। | मदेन. मलयाद्रिः्ीर युर प्रतौ पर जो लोग 
करकोटकवने ये च भृमुकच्छाः सकोङ्कणाः |।२१॥ श्राधितः दं बे, तथा भृगुकच्छ नौर कोङ्कन ॥ २९॥ 


छम भगवा्‌ के पूर दक्षिण चरण पर स्थित है 
लङा कालाभिनाश्वैव भैिका निकटास्तथा॥२०]] कालाजिन, पैलिक नीर निकट ॥ ९०॥ तया 


२१८ -माकंण्डेयपुराण श्र° ५८ ` ` 


ववश्वे तथाभीरा येर्वातीरनिवासिनः। | ये सव तथा आभीरः शरीर चेएवाहीर निवासी, 
्रवन्तयो दासपुरास्तयेवाकणिनो जनाः ॥२२॥॥ श्रवन्ती, दासपुर तथा जँ ्राकशिन लोग रहते 
पिहाराषटाः सकणांय गोनदाशिचत्रकूटकाः | है ॥ २२ ॥ महाराष्ट्र, करट. गोच, चिधक 
बोलला; कोलगिराश्वैव क्रौश्चद्रीपनटाधराः ॥२३॥॥ चोल, कोलगिरि, कौचद्ीप श्रौर जयाधर ॥ २३॥ 
कावेरीं छष्यभूकस्या नासिक्याश्चेव ये जना!। | कावेसै श्रौर ऋष्यमूक के निकटबती लोग, गख, , 
शंखथक्त्यादिद््य-शेलमान्तचराश्च ये ॥२४॥ शक्ता श्नौर वैदृचयं अदि पर्वतो पर रहनेवलि॥२५॥ ¦ 
तथा बारिषिणः कोलाश्चम्मंपटनिवासिनः | | दथा वारिचर, कोल, चम्म॑पट, गण्वाह्य रौर ` 
एवाघ्याः पराः कृष्णा द्वीपवासनिवासिनः ॥२५।॥ इृष्णद्धीप आदि के रहने वाले लोग ॥ २५॥ 
र्य्रो यदादौ च ते षसन्ति तथा नना; । |, छुद्र पर जो लोग दते दे श्रौला- 
गरौसाधनाः सपिशिकास्तथाये कम्मंनायक्ाः॥२६॥| वन, पिशिक शौर कस्म॑नायक ॥ २६॥ ददि, 
दक्षिणाः कौरुषा ये च षिकास्तापसाश्रमाः। | कौर्प, ऋषिक, तापसाश्रम ऋषभ, सिहल श्रौर 
ऋषभाः सिंहलाश्चेष तथा काश्चीनिवासिनः ॥२७॥| काशीनिवासी ॥ २७ ॥ तिल, ऊुऽजरदसे, श्चीर 
तिलङ्ाङुजरदरी-कच्छवासाथ ये जनाः। | कच्छवासी ये सव लोग क्लम भगवान्‌. के दक्षिण 
वाभ्रपणीं तथा इक्षिरिति क्म्भस्य दक्षिणः ॥२८।॥ छक्ति मे वसते द ॥ २८॥ उत्ता फाल्णुणी, दस्त 
फव्णुन्यशोत्तरा दस्ता चित्रा चकषंत्रयं द्विन । | भौर चिन्ना ये तीनों नक्त भी क्रम्म की दिश 
मस्य दक्षिणे इतौ याद्मपादस्तथापम्‌ २६|| कोख स्थित द । अव वय पान परजो कव है वद 
काम्बोजाः पलषाश्यैव तथैव वद्वाुलाः । कहता हं ॥ २६॥ काम्बोज, प्रह्व, वड़वामुख, “ 
तथा च सिन्धुसौवीरः सान्ता बनिताखाः ॥२०॥॥| सिन्ध, सौवीर, भानत शरोर चनितामुख ॥२०॥ 
्राबणाः मार्भिगाः शद्रः कर्लभाधेयवल्वराः | | द्रावः मार्गगा, शा, कराधेय, वलै, किरात, 
किराताः पारदाः पाणबयास्तथा पारशवाः कलाः३१| परः 1, पारव शोर क 
धका रैमगिरिकाः सिन्धुकालकवैरताः |` | ‰ का, दम का डकः लद = 


सौराष्ट्रा दरदाश्चैव द्राविडाश्च महाणंवाः ॥३२॥ द्वाविंश श्रौर महाशैव ॥ ३२॥ उन देशों के लोग 
एते जनपदाः पादे स्थिता दै द्िरेऽपरे । क्रमं भगवान्‌ के चाद्य के दक्षिण पाँच पर स्थिते 


ध तथा स्वाति, विशाखा श्रौर अदुराधा ये तीन न्तत 
स्वात्यो विशाखा मेत्रश्च नक्षत्रवरयमेव च ॥२२॥ उनके वा दी है ॥३३॥ मरितेध, चराद्धि, 
मणिमेषः कषुराद्रिध खञ्नोऽस्तगिरिस्तथा | | खन्जन, अस्तगिरि, अपरान्तिका, दैदय, शान्तिक 
श्रपरान्तिका हयाश्च शान्तिका विरशस्तका;३४॥॥| श्नौर विभशस्तक ॥३५॥ कोङ्कण, पञ्चनदक, 
कोङ्णाः प्श्चनदका वमना ह्यवरास्तथा | | बमन, तारजुरा, अङ्तक, शक्र श्नौर शात्मचे-' 
तरसुरा ्ज्गतकाः शकंराः शामवेश्मकाः ॥३५॥| घमक ॥ २५॥ ुरुस्वर, फाल्णुएक चौर जो लोग «| 
शुरुस्वराः एस्णुनका वेणुमत्याश्च ये जनाः ! | वेणमती के रहने वाले ह श्रौर फाल्गुलुक, घोर, ' 
तथा फाल्गुलुका घोराः गुरुदाश्चकल।स्तथा ॥३६॥॥| शख्ट ओर चकल ॥ ३६॥ पकेक्तण्‌, वाजञिकेशु, 
एकेक्षणा वानिरेशा दीध॑ग्रीवाः एचूलिकाः । दीघ्रमरीव, छुचूलिक शरौर अश्वकेश ये सव लोगो 
अ्धकेशास्तथा पुच्छे जनाः संस्थिता; २७॥| इस्म भगवान्‌ क पुच्छ भाग मे स्थित है ॥ ३७॥ 


द्रं मूलं तथापादा नक्ष्र्यमेव च ¦ | जयेष्ठा, मूल ओर पूर्वपा ये तीन पुच्छ मागं के 
माण्डव्या नक्त दै । मारडव्य, चरडखार, अश्मक श्रौरं 
भाएडव्याशण्डसारा अश्मका ललनास्तथा॥३८॥ ललन ॥ ३८ ॥ इन्यतालड्ह, लवाय. वालिका 
8 र क 4१. त 


[थ 
शि 


^ ्-शषलानि च | ¦ | मलक ॥ २० ॥ इ य दशाए म चना, व्य शीर - 
= पक $ 5 


ष 


` अ० ५८ माकश्टेयपुराण २१६ 


्ुन्यता लडहाशचैव द्ीवाद्या बालिकास्तथा । ` 
गरृरिंहा वेणमत्या्च वललावस्थास्तथापरे 
धम्मवद्धास्तथालका उकस्कमस्थिता जनाः । 
वामपादे जनाः पाश्च स्थिताः कुस्म॑स्य भागुरे।४०॥ 
आआपादाश्रवशे चेव धनिष्ठ यत्र संस्थिता। 
केलास हिम्ांश्चव धर्मान्‌ वसुमांस्तथा ॥४१॥ 
करौश्वाः कुरुषकाश्चैव शुद्रवीणाश्च ये जनाः । 
रसायाः सकेकेया भोगभस्थाः सयायुनाः ॥४२॥ 
अन्तर्दीपास्िगत्ताथ अग्रीञ्याः सादना जना! ] , 
तयेवाश्वषुखाः भाप्ठाधिषिहाः पेशधारिणएः ॥४२॥ 
दासेरफा वाटधानाः शवधानास्तथेव च। 
पुष्कलाधमकैरातास्तथा तक्षशिलायाः ॥४४॥ 
भस्वात्ता मालवा मद्रा वेशुकाः सवदन्तिकाः। 
पिङ्गला मानकलदहा हणः कोदलकास्तया ॥४५॥ 
माण्डन्या भूतियुवकाः शातका दैमतारकाः | 
यशोमत्याः सगान्धाराः स्वरसागरराशयः । ४६॥ 
गरौपेया दासमेयाश् राजन्याः श्यासकास्तथा | 
ेमधत्ताथ कम्पस्य वामङुक्षियुपाभिताः ॥४७॥ 
वारुणश्वात्र नक्षत्रं त॒ भौषटपदाद्रयम्‌ | 

येन फरचराज्यन्यच पद्ुपा्तं सकीचकम्‌ ॥४८॥ 
का्मीरकं तथा रषूममिपारजनस्तया । 
दवदास्छद्धनाश्चेव ` $लटा॒बनरष्रकाः ॥४६॥ 
सैरिष्ठ व्रह्मपुरकास्तथेव वनवाद्चकाः । 
किरात-कौरिकानन्दा जनाः पषटवल्लोलनाः ॥५०।. 
दार्व्बादा मरफाश्चैव ङरयथान्नदारकाः। 
एकादा; खशा घोषाः स्वरगभौमानवयकाः ॥५१॥ 
तथा सथवना हिङ्गाथीरपावरणश्च ये । 
त्रिनेत्रा; पौरवाश्चेव मन्धर्ववाश्च द्विजोत्तम ॥५२॥ 
पर्योत्तरन्तु करम्मंस्य पादमेते समाश्रिताः । | ॥ ५२॥ हे सुनीम्वर ¦ कूम के जिसःजिस माग मे ` 
रेवत्याश्वश्चि दैवत्यं याम्यंचक्षंभिति जयम्‌ ॥५३॥ जो-जो देश चोर उनके जो-जो नत्व हे वे सव ; 
तत्र पादे" समाख्यातं पाकाय परनिसत्तम'।. , | मैने तमसे कटे ॥५७॥ इन देशेमिं नक्रं के विगड्ने 
दष्येते चैतानि नकत्रा्यपि वै दिन ॥५४॥. से मच्यो कोः पीडा होती है नौर उत्तम शो के | 
एतत्यीडा अमी देशा, पीव्यन्ते ये.क्रमोदिता; | ¦ | सपय नक्र स्थित दोन प्र. मदुष्य ` अभ्युदय 
यान्ति चाभ्युदयं बि गरः सम्यगवस्थितैः ॥५५॥ को भराप्त सयते है ॥ ५५॥ जिस नक्त का जो ब्रह 


सिह, धेरुमती श्रौरं बलावस्था ॥ २६॥ धर्म 
वद्धा, उलूक, उरुक निबाक्ती लोग कूम भगवान 
के वये पाव मेँ रहते है ॥ ४०॥ उत्तरषाठ्‌, भावस 
श्रौर धनिष्ठा ये तीनों नक्र भी वहां पर स्थित ह 
केलाश, हिमवान्‌, धलुष्मान्‌ श्रौर वसुमान्‌ ॥ ४१॥ 
कञ्च, खक श्रौर चुद्रवीण जो लोग है श्नौर 
-रसालय, कैकेय, भोगप्रस्थ श्रौर यामुन ॥ ४२॥ 
श्न्तर्ीप, चिगरतै, चस्रीज्य तथा अदन लोग श्रौर 
श्रश्वमुख चिचिड्‌ श्रौर केशधारी ॥ ४३ ॥ दासेरक 
वारान, शबधान, पुष्कल, श्रधम, कैरात, ` तकत 
श्र शिलाश्रय ॥ ४४॥ श्चस्वाला, मालवा, भद्र; 
वेरएुक खवदन्तिक, पिङ्गल, मानकलद, हर शरीर 
फोदलक ॥ ४५॥ भारडग्य, भूतियुचक, शातक, | 
हेमतारक, यशोमत्य गान्धार श्रौर खर सागर; 
राशि ॥ ४६॥ यौधेय, दासमेय, राजन्या, श्यामक , 
शरीर केमधूतेक थे खव देश मगवान्‌ कूम की बा 
कोख मे स्थित दै ॥ ४७॥ शतमभिप, पूर्वाभाद्र, भीर 
उन्चराभाद्र ये तीनों नक्त उन देशा के ह । नर. 
राज्य, पशुपाल, कीचक ॥ ४८ ॥ कामीरक, राष्रू, | 
श्रमिसारजन. दवाङ्गनः, लदा श्रौर वनराुक , 
॥ ४६॥ तोरि, ब्रह्मपुरक, वनवाह्मक, किरात, ¦ 
कौशिक, नन्द श्रौर पटहय लोलन ॥ ५० ॥ दा्बाद, 
मर्क, कुर, श्र्नदारक, प्कपाद, सश, पोप, 
खमे भौम शौर अनवय्यक ॥५१॥ तथा यथन, 
हि, चीरपरावण्‌ रीर दे विप्रवर ! चिनेत्र, पौरव 
श्रौर गन्धन्वं ॥ ५२॥ यह सव लोग कमं भगवान्‌ 
के पूरघोत्तर चरण मेँ श्राभित हँ तथा रेवती, 
्ण्विनी नौर भरणी यदह. तीन उनके नक्ष है ॥ 


; 
# 


~ २२९; भाकर्डेथयुराश त्र० ४८ 
स्क्ष॑स्य पतिर्यो वे ग्रहस्द्भावितौ भयम्‌ । 
देशस्य सनिशरेष्ठ॒तदुत्क्ये शुभागमः ॥५६॥ 
व्येकं देशसामान्यं नक्षतरग्रहसम्भवम्‌ । 
मयं लोकस्य भवति शोभनं वा द्विजोत्तम ॥५७॥ 
लरशोमनेनन्तोः सामान्यमिति भीतिदम्‌। 
भबति पीडोत्थमरस्पायासमशोमनम्‌ ॥५८॥ 
पथेव शोभनः पाको दुःस्थितैथ तथा ग्रहैः । 
धररपोपकाराय इणां देशङ्गेधात्मनो बुधैः । 
व्ये गोष्टे भृत्येषु सुहत ॒तनयेषु वा । 
भा््यायाञ्च अरे दुःस्थे भयं पुएयवतां टरणाम्‌ ६०॥ 
आसमम्यथा्पयुण्यानां सव्धर्ैवातिपापिनाम्‌ । 
नैक्ापि हयपापानां भयमस्ति कदाचन ॥६१॥ 
दिग्देशजनसामान्यं दृपसामान्यमात्मजम्‌ । 


वामी है उसके विगडने पर लोगों पर विपत्ति 
ऋ 


ती है तथा उसका उच्करषं होने पर हें मुनिवर ! 
प्रजा को सख होता दे ॥५९॥ हे द्विजं ! प्रत्येक 
देश के नक्ष भौर प्रह के अनुसार प्रजाको भय 
या सुख होता है ॥ ५७ ॥ शअपने-श्यपने नक्तो के 
श्रश्यभ होने पर देशं मे प्रजाको अत्यन्त भय श्रौर 
दुःख द्योता है ॥ ५८ ॥ ग्रं की कुरस्थिति के कारण 
जो भय होता है उसको दर करने के लिये ज्ञानी 
लोग मयुष्यों के लिये जप, दान प्रादि का देश 
करते है ॥ ५६॥ ग्रह की कुःस्छित स्थिति मे पुण्य 
वान्‌ लोगो को भी धन, गोठ, भृत्य, मित, पुच्,खी 
आदि करके भय होता ॥६०॥ यदि अह श्चुभ द्योतो 
श्रल्प-पुर्य बालों, नितान्त पापियो तथा निष्पापी 
इनमे से किसी को कणर नदीं होता ॥ ६१ ॥ दिशा, 
देश, प्रजा, राजा श्रौर पुत्र की सचुक्रूलता यां 


पत्रगहयामान्यं नरो शुखं पतिक्रूलता मदुप्य श्रपने ग्रट्‌ या नच्तके अनुसार 
नक्षत्रग्रदसामान्यं नरां शडक्तं शमाशमम्‌ ॥६२॥| मोगता हे ॥६य्‌ रद्य की स्वस्थ स्थिति होने पर 


परस्पराभिरक्षा च ग्रहादौरस्थ्येन नायते । | परस्पर रक्ता होती है तथा हे विमेन्द्र ! इनकी दु 
एतेभ्य. एव ॒व्िपरन्र॒ शुमहानिस्तथाशभैः ॥६२॥ स्थिति होने पर कट होता है ॥६३॥ नकचत्न सहित 
यदेतत्‌ कूम्मसंस्थानं नक्र मयोदितम्‌ । क कया, हे बह 
एतत्‌ ठ देशसामान्यमथमं शगमेब च ॥६७॥ ह मनन 1 ता नथा अही 
तस्माद्ङ्गाय देशक्ष ग्रहपीडां तथात्मनः । | श्रादि को मालुम करके बुद्धिमान को चादिये किं 
वीति शान्ति मेधावी लोकवादांश्च सत्तम ॥६५॥| परिडतों से उसकी शान्ति करावें ॥६५॥ श्याकाश मेँ 
आ्ाशादवतानांच दैत्यादीनान्च दोहदः जो । शौर र काभीशरदहै श्नौर जो 
पृथ्वथां पतन्ि ते लोके लोकाद्‌ इति भ्रताः।६६॥ ध र दया र त 
तां तथेव युधः ुरय्याह्ोकवादान्‌ न हापयेत्‌ । करानी चादिये क्योकि इन्दी ग्रहादि के कारण 
तेषां तत्वरणानृणं युक्तो दृष्टागमक्षयः ॥६७।| मलप्य को केश जर शरथ॒भ होता दै ॥ ६७॥ हे 
` शुभोदयं भहानिल्य पापानां द्विजसत्तम । ह व 1 स 
भ्ाहाति असे द्रयादीनान्व ते ॥९८॥| ऋ भर अ अ त नेर 
, तस्माच्ान्तिपरः भाज्ञो लोकवबादसतस्तथा । | लिये युद्धिमानों को चादिये कफि लोकवाद्‌ श्रौर 
[ लोकवादांश्च शान्तीश्च प्रदपीढाु कारयेत्‌ ।।९६॥| रं कौ शान्ति पीड़ा दोने पर करावे ॥ ६९ ॥~ 
( अ्रोहादुपयासांस्च शस्तं चत्यादिवन्द्नम्‌। त स ६ वैर रदित र, उपवास 
1 जपं होमं तथा दानं सानं कोधादिवज्जेनम्‌ ॥७०॥ 4 
^ अद्रोह; सव्व॑भूतेष॒ मेती इम्याच परिडितः 
प ञ्जयेदसतां भाचमतिबादांस्तथेव च ।७१॥ 
पूजाञ्च इव्यीत रव्वेषीदाु मानवः 


श्रादि करं तथा क्रोधं से दृर रषं ॥७०॥ पर्डित को 
^ ` उ शाम्यन्तयशचेपाणि घोराणि दविजसत्तम ॥७२॥ 


चाहिये करि वैर रहित होकर सय भ्रासियों से मैत्री 
करे तथा असत्य भापण श्रौर त्यन्त विवाद न 
करे ॥ ७१ ॥ सव कष्ट मे मचुप्यो को ग्रह की पूजा 
करनी ्ादिये । इस प्रकार शेव श्नौर घोर कष्ट 
भी मिर जाते है ह ॥ ७२॥ पवित्र मनुष्यों को भी 


भष - वर्य-शद्रकलानि च (न रपुष्सवनप-पज त-स सम्म -प्न्‌हा स -प्नपएवश्य-श्रार-- - -- 


श्र ४६ माकेएढेय्ुराण २११ 


प्रयतानां मनुष्याणां प्रह्षल्थान्यसेषतः ग्रहों के कारण शुभाम होरा है। छूर्मभगवान्‌ का 
एषं कर्म्म मया ख्यातो भारते भगवान्‌ धिभूः।॥७३।" जो मारत मेँ स्थित हैँ मने बशेन किया 1७३ कूम 


नारायणो द्यचिन्त्यात्मा यत्र सर्व मरिष्ठितम्‌ | मगवान श्रचिन्तात्मा हे श्रौर इन्दी म सम्पूणं 
देवाः रि भ्रति गत्‌ पतिष्ठित है तथा इन्दं मे देवतां रौर 
तत्र देवाः स्थताः सव्वं प्रातनक्षत्रसन्रयाः 1७४ नचो की स्थिति है ॥७४॥ हे बौषकिजी । अथि 


तथा मध्ये हुतवहः पृथ्वी सोमश्च षे दिन । | पृथ्वी, चन्द्रमा यद छम भगवान्‌ के मध्य मे स्थित 


मेषादयल्चयो मध्ये सुखे द्वो मिथुनादिको ॥७५॥ = तथा ५५ ओर र भीमभ्यमेदै।, ५ ह 
नक्ुभकेमुलमे हें ॥७४॥ ककं श्चीर सिह 
भाग्दक्षिणे तथा पादे ककसिंह व्यवरिथतां । म ५ 


सिद-कन्या-तुलाश्चव $ राशय स्थितम्‌॥७६॥ | नौर लला यह्‌ तीनों राशियां कूम की कोख है 
तुलाथ हश्चिकश्वाभो पादै दक्षिणपथिमे। | ॥७६॥ तुला सनौर इश्क यद दोनो दक्तिण पश्चिम 
पृष्ठे च दृिकेनैव सह धन्वी व्यवस्थितः ।७७।।| चर मे स्थित द । कूम की पीठ पर दृश्चिक चौर 


{र धनु स्थित है ॥७७॥ रमं भगवा के वायव्य चरण 
वायव्ये चास्य बे पादे धनुग्राहादिकं अयम्‌ । मे धन, मकर रौर कुम्भ राशियां हँ तथा उनकी 


कम्म-मीनौ तथेवास्य उत्तरं इक्षिमाथितो ॥७८॥ उच्तर कुविमे म्भ श्नौर मीन ॥७८॥ ह द्विजवरं 
मीन-मेषोौ द्विजश्रेष्ठ पादे पूर्वोत्तरे स्थितो । | पूर्वोत्तर चरमे मीन शौर मेष स्थितै । हे विथ ! 


कम्मं देशास्तथक्षांणि देशेष्येतेषु वे दविज ॥७६॥ ५ 1 1 म ४ ॥ ७६ 4 ध राशि 
+ शरोर राशियों मे ब्रं ष्टी स्थति दै, इसलिये ्त- 
राशयश्च तथरषपु प्रहा राशिष्ववस्थिता 01 


तस्मादगरहषपीड़ासु देशपीडां विनिर्भेत्‌ ॥८०। | स्थिति मे छान करके बिधि पूर्वक दान देना ओर 


तत्र स्नात्वा भङ्व्वीव दानहोमादिकं विधिम्‌ ! | वन श्चादि करना चादिये, इसको वैष्णव पाद 
व | कटते ह जिसको ब्रह्मा ने मध्यमे ग्रहण करिया शरीर 


[१ षि भ 
(स एष बेष्णवः पादो ब्रहम मध्य गरहस्य यः जो जगत्‌ के कारण प्रभु नारायण के नामस 
नारायणख्योऽचिन्त्यार्मा कारणं जगतः परथुः८१।॥| विख्यात है ॥ ८९॥ 


इति श्रीमाकण्डेयपुराणएपे कुम-नियेश नाम ध्वँ ० समप् । 
-- "प्य - <~ 


उनेषटर्वाध्याय 
भाकराडेय उवाच माकंए्डेयजीं वोल्त- 


ते हे मुनिवर ! यैन ्रापसे भार्तवपं का यथा 
एवन्तु भारतं पष यथावत्‌ कथितं दने । 1 


छृतं रेता द्वापरश्च तथात्िष्यं चतुर्युगम्‌ ॥ १॥ युगो को भी वताया ॥९॥ दे द्विज ! इन चारौ युगो 
~ अत्रेवैतदुयुगानान्तु चातुव्यर्योऽ्न वै द्विन । । मर चात वसत के मद्यो की श्रायु क्रमशः चारसौ 


चत्वारि श्रीणि दे चैव तथेकच शरच्छतम्‌ ॥ २॥| तीनसौ दोसौ शनौर सौ वपं है ॥२॥ हे बहमन! ` 


, जीवन्त्य नरा ब्रह्मन्‌ कृतप्रेतादिके क्रमात्‌ । | सतयुग, जेता श्रादि युगो मे इस क्रम से लोग 
देवकटस्य पून्व॑स्य शलिन्द्रस्य महार्मनः ॥ ३ ।॥| जीवित रहते है । शैलराज देवक्रूट के पूवं मे 1-3॥ 
पूर्व्वेण यत्‌ स्थितं वं भद्राश्व तन्निबोध मे। | जो यद्वाव व दै उसको शुभे उनो । उसमे 
्वेतपण॑श्च नीलश्च शोवालश्वाचलोत्तमः ॥ ४ ।।| श्वेतपसं, नील, पवतो मे श्रेष्ठ शवा ॥४॥ कौर 
कोरञ्ञः पणंशालाभ्रः .प॑चेते तु इल्वलाः 1. ; च्रौर पणशालात्र यद पाच इलप्नत हँ उनमे से 


[व १1 


२२२ 


तेषां परसूतिरन्य ये बह्षः षदरपव्व॑ताः ॥ ५॥ वषु से ल्योरे-द्ोरे पवंत निक्रलते दहं ॥४५॥ इनः 


तेर्विरिष्टा जनपदा नानारूपाः सदशः । 
ततः ॒दयङ्काश्चाः शद्धसानुसुमङ्लाः ॥ & : 
इत्येवमादथोऽन्येऽपि शतशोऽथ सहस्रशः । 
शीता शंखावती भद्रा चक्रावर्तादिकास्तथा ॥ ७। 
नोऽ वयो विस्तीणाः शीततोयोधवाहिकाः । 
ञरत्र॒ वर्ष सराः शंखशद्धहेमसमप्रभाः ॥ ८ ॥ 
दिव्यसङ्गमिनः पुण्या दशवष॑शतायुपः । 
मन्दोत्तमौ न तेषु स्तः स्वे ते समदशंनाः ॥ ६ ॥ 
तिरिक्षादिमिरष्टाभिः प्रकृत्या ते गुणयंताः । 
तत्राव्यश्चशिरा देवशतुन्बाहुनंनाईनः ॥१०॥ 
शिरोहृदयमेदाव्सि-दस्तेशाक्षिियान्वितः । 
तस्याप्यथेवं विषया विज्ञेया जगतः पथोः ॥११॥ 
केतुमालमतो वषं निबोध सस॒पशिमस्‌ | 
षिंशालः कम्बलः कृष्णो जयन्तो हरिपर्व्वताः॥१२॥ 
विशोको वद्ध॑मानश्च समेते इलपर्व्वताः | 
अन्ये सहखशः शेता येषु लोकगणः स्थितः ।॥१२॥ 
मोलयस्ते महाक्रायाः शाकपोतकरम्भकाः | 


माक॑रुडेयघुराख 


श्र° ५६ 


पर्वतं क ्रतिरिक्त दज्ञासें नाना धरक्रार कदेश 
उस भद्राश्व चपं पर है तथा कुमुद के खमान, शुद्ध 
श्रौर सद्गल वहाँ के किनारे हैं ॥६॥ फेसे तथा 
श्रन्य सेकं हज्ञारों पर्वत वहाँ पर है । शीता, 
शंखावती, भद्रा श्रौर चक्राव्ता श्रादि ॥७॥ बद्धे, 
चिस्तार बाली तथा श्रगाघध शीतल जल वाली 
नदियां हँ । इस वर्षं म मनुष्य शंख श्रौर सुन्दर 
वण की तरह कान्तिमान्‌ दै ॥ = ॥ उन लोगोकी 
दिष्य गतिं है तथा वे पुयात्मा है उनकी श्राय 
क्सौदस वपं कप है । उन लोगों मे उन्तम शौर 
मध्यम को नदीं है तथा वे सव समदर्शी है ॥ ६॥ 
वे लोग खभाव से दी तितिन्ञा शादि श्रो शृें 
यक्त ह श्नौर वहाँ छ्ण्वशिरा, चवुर्मुज मगवान 
जनादन रहते ह ॥१०॥ भगवान्‌ अश्वशिरा शिर 
हृदय, लिङ्क, चरण, हाथ श्रौर तीन नेनों सें युक्तै 
उस्र जगत्‌ मे उसी प्रु का विषय जानना चादिये 
॥६९॥ प्रच पथिम मेँ स्थित केतमाल चं का दाल 
खनो । विशाल, कम्बल, कृष्ण, जयन्त, दरि पर्वत 
॥१२॥ विशोक श्रौर बद्धंमाय्‌ यह सात वहाँ परः 
कुल पवैत हैँ श्रौर भी दज्ञासें दोखे-खोरे पर्वत हैँ 
जिनमे लोग रते है ॥१३॥ बे विशाल शसीर वाले \ 
है तथा उनके शिर बड़ हैँ । शाक, पोतक, स्म्भक 
न्नौर चंगुल आदि प्रमुख सहस्नों मडप्य वहं रहते 


अडगुलमसुखाश्वापि वसन्ति शतशो जनाः ॥१४।| ह ॥ ९४ ॥ यह लोग जिन मदानदियों के जल को 


ये पिषन्ति महानयोरकषं श्यामां सकम्बलाम्‌ | 


पीते हे उनके नाम खनो । श्लु, भ्याम, कम्बला, 
4 ६४ 
अमोघा, कमिनी आदि तथा छीर भी हक्ञारों 


अमोधां [^] ५, त + 
अमोां कामिनीं रयामां तथेवान्याः सहस्रश्‌॥१५।॥ नदियां वहाँ पर है ॥ १५॥ व भी श्राय एकसौ 


अव्राप्यायुः समं पूर्व्वर्ापि भगवान्‌ हरिः । 


परादरूपी पादस्य हत्‌ृषठ-पाश्वेतस्तथा ॥१६॥ 


त्रिनकषत्रयुते देशे नक्षत्राणि शुभानि च। 
इत्येतत्‌ केतुमालं ते कथितं ुनिसत्तम ॥१७॥ 
श्रत; परं इुरून्‌ वक्ष्ये निबोधेह मभोत्तरान्‌ ] 


दस व्प॑की होती है तथा यहां वाराहस्पी हरि 
भगवान्‌ रहते द जिन$ चरण, हृदय. सुख, पीट 
श्रौर पाव ह ॥ १६॥ यह देश भी तीन नक्ष खे 
युक्त है जिनका क्रि श्ुमाश्चभम फल होता है! हे 
सनिवर ! मेने आपसे इस थकार केतुमाल वष का 


वसन क्या ॥ १७॥ चव उत्तरः दिशा की शरोर जो 
छर वषं दै उसको कता हँ, खनो । वहां के घृक्त - 


तन्न क्ता मधुफला नित्यपुष्पफलोपगाः ॥१८॥ पुष्प रौर मीठे फल नित्य देते ह ॥१८॥ वहा चरतो 


4 च प्रसूयन्ते फलेष्वाभरणानि च) 
सव्वेकामपदास्ते हि सव्वकासफरभदाः ॥१६॥ 
भूमिर्मशिमंयी वायुः सुगन्धः सव्व॑दासुखः । 
जायन्ते मानवास्तत्र देवलोकपरिच्युताः ॥२०॥ 


मिथुनानि भ्रुयन्ते समकालस्थितानि बै । 
"` भनचशुदकलोने चा 


फल रूप मे वख आभूपण॒ उत्पन्न होते है । वे 
चत्त सव कामनाथों रे देने दले तथा पशं फल 
करले वक्ते दै ॥ १६॥ वहां की पृथ्वी सशिमयी है 
ञ्ीर वायु स्वेदा छखदायक शौर स्ुगन्धिमयीः 
चलती है । जो लोग देवलोक से च्युत होते वे 
वदँ पर जन्मते द ॥ २० ॥ वहां स्री.पुरुष जोड से 
समान काल श्रौ स्थिति मै जन्म धारण करते है 


श्० ६० भाकंण्डेयपुराण .. ¦ २२३ 


# 1 


्न्योन्यमनुरक्तानि चक्रयारोपमाणि च ॥२१ ॥ तथा उनम चकवा चकई की तरह प्रीति स्थिर 


चतुर्दशसहस्राणि तेषां सारद्धानि वै स्थितिः रदती है ॥२९॥ वहाँ लोगों की आयु सादे चौद 


ह । दज्ञार वप्रं की डोती है । चन्द्रकान्त पर्वत तथा 
दरकान्तशर शेलेन्रः सूय्यकान्तस्तथापरः ॥२२॥ सू॑करान्त ॥ २२ ॥ उख गतर यह योनो कल प्यत 


तस्मिन इलाचल्ली धपे तन्मध्ये च महानदी । | ६, उसके मध्य महानदी भद्रूसोमा जिखकी जल 
भद्रसोमा परयाघ्ु््व॑यां पुए्यामलजलौ विनी ।। २३}, रशि पवि श्रौर पुण्यवती है ॥ २३॥ तथा 
ग्ट्सशस्तथेवान्पा नदयो वपृऽपि चोत्तरे | श्रन्य सदसो नदियां वहती है श्रौरः वहाँ क्षीर 

थान्या; ्षीरबािण्यो धृतवाहिन्थ एव च ॥२४।| कादिनी तथा घरतवादिनी नयियां मी है ॥२ हां 
दध्नो हदास्तदा तत्र तथान्ये चाङुपन्वेताः पर्‌ अनेक दधि के एड ह त्था अनेक ग्मसीक 


पर्व॑त दै । वहाँ पर अनेक प्रकार के फल दहै 
शरपृतास्वादथरपानि फलानि बिषिधानि च ॥२५।॥| जिनका खायः अमृत के समान हे ॥ २५ ॥ दस ब्प 


वनेषु तेपु वर्षु शतशोऽथ सहक्षशः। | मे सेकं दजासे वन है" तथा दाँ मगवान्‌ विष्णु 
तत्रापि भगवान्‌ विष्णुः भाक्भिरा मतस्यरूपवान्‌२६| मत्स्य सुप से पूवे की शरोर सुख करके स्थित है ॥ 
विभक्तो नवधा विभ नक्षत्राणां त्रयं ब्रथम्‌ | | द.कीषकिजी { उस वपे तीन नच नी विाग 


। हे मुनिर ! दिशायं भी वहाँ नौ भागों मे वैरी 
दिशस्तथापि्नवधा पिभक्ता युनिसत्तम ॥ ¦ हह हैः ॥ २७॥ सपु मे चीप हे तथा दूस 


चनद्रढीपः सयुद्रे च भद्रदीपस्तथापरः भद्रद्ीप श्रति पवित्र है । हे महामुने ! इसके चारों 
तत्रापि पण्यो विख्यात; समु्रान्तमंहाभुमे ॥२८।॥ ओर समुद्र दै ॥ २८ ॥ दे ह्मम्‌ ! मैने ्रापसे न्तर 

इत्येतत्‌ कथितं व्रह्मन्‌ शुरुवपं मयोत्तरम्‌ | | वतीं कुर दपं का वणन किया श्रव किसपुरष आदि 
भृश िम्पुरुषादीनि वर्पाणि गदतो मम ॥२६॥॥ वर्षा का वणन करता हः सुनिये ॥ २६॥ 


इति श्रीमाकीरडेयपुराण भे उत्तर ङु कथन नाम ४६बाँ अध्याय समाघ्र । 
"~~~ चै च ; ~€ -९+ ~ 


साढा सष्याय 


मार्कण्डेय उचाच माक॑रडेयजी वोले- 
यत्‌ तु विम्धुरूषं घ॑ तत्‌ वक्ष्याम्यहं द्विज । & करोष्टकफिजी ! किस्य रप नामक चं का वर्णन 


| श्रव मै करतां जहां फि पुरुषाकी शायर दस हज्ञार 
यत्रायुदशसास् पुरुषाणां वुप्मताम्‌ ॥ ९ ॥ चर्पंै॥ १॥ चदा पुदप सिया शोक रहित श्रौर 


श्ननामया हयशोकाश्च नरा यत्र वथा ्ियः। | पसनन चित्त ४ 9 
¦ परडथ तत्रोक्तः सुमहान्‌ नन्दनीपमः | २। विशाल बन है जो नन्दनवन के खमान दहै ॥२॥ 
क तमै फलरसं पिवन्तः पुरषाः सदा । | उसी बनके फलों का रस पीते हय वहां के पुरुष 


४ सदा युवा घने रहते हे तथा इसी कारण से वहां 
*- स्थिरयौवननिष्पन्ाः सियशरोत्पलगन्थिकाः ॥ ३ की खियों मे कमल की सुगन्धि आती है ॥३] पिः 


ञ्जत; एरं किम्पुरुषाद्धरिवपं प्रवक्ष्यते । पुख्प ऊ वाद हरिवप का इृत्तान्त कता दह जाँ 
महारनतसङ्काशा जायन्ते तत्र॒ मानवा; ॥ ४॥| पुरुष न्वांदी के समान क्तान्तिमान ह ॥ ४ ॥ देवताः 


4 ४ ल्लोकां खे गिरकरः लोग.देवरूप होकर उस वर्प 
देवलोकच्युताः सच्चे देवरूपाथच स्वश; । स अत ह रिवर्स लोग हेलका रदा पाति 


हरिवपं नराः सव्ये पिवन्तीभुरसं शुभम्‌ ॥ ५॥| ॥५॥ वां लोगोको दृद्धावस्या नदीं सताती ज्नीर 
न जरा वाधते तत्र न जीर्यन्ते च कर्िचित्‌। | नबे जीं दति ह ! जव तक वै जीवित रहते 


तावन्तमेव ते कालं जीवन्स्यथ निरामयाः ॥ ६ ॥ तब वकं रोग रित रते ह ॥६॥ अव भेर षं के 


"२१४ 


मेरुवषं मया पोक्तं मध्यमं यदिलाहृत्‌ । 
न तत्र सूर्यस्तपति न ते जीय्यैन्ति मानवाः॥ ७॥ 
लमन्ते नात्मलाभश्च रश्मश्चन््र-सुच्येयोः । 
नक्षत्राणां प्रहाणाञ्च मेरोस्तत्र परा दूतिः ॥ ८ । 
पत्नभमा पञ्गन्धा जम्बूफलरसाशिनः । 
प्पत्रायताक्षास्तु जायन्ते तत्र मानदाः ॥ & ॥ 


वर्षाणान्त॒ सहस्राणि तत्राप्यागुद्धयोदश । 
सरावाकारसंस्तारो मेरुमध्ये ईलषटते ॥१०॥ 
मेरुस्त्र॒ महाशेलस्तदाख्यातमिलाषरतम्‌ । 
रम्यकः वर्षमस्माच्च कथयिष्ये निवोष तम्‌ ॥११॥ 
रकषस्तत्रापि वोतुङ्गो न्यग्रोधो हरितच्छदः | 
तस्यापि ते फलरसं पन्तो वर्तयन्ति बे ॥१२॥ 
वर्षायुतायुषस्तत्र॒ नरास्तत्फलभोगिनः । 
रतिपरधानविमला जरादौगन्ध्यवर््निताः ॥१३॥ 
तस्मादथोत्तरं वषं नाम्ना स्यातं हिरएमयम्‌ | 
हिरण्वती नदी तत्र प्रभूतकमलोज्ञ्वला ॥१४। 
महाबलाः सतेजस्का जायन्ते तत्र मानवाः | 


साकंण्देयपुराण 


 श्र° ६१ 


इलायतं खरड का वरन करते हैँ जदा न तो. वं . 


तपत्ता है चौर न मनुष्य चरद्ध होते दै ॥७॥ चन्द्रमा 
श्नौर सयं की किरणं वहां लोग अपने लाभके लिये 
लेते टै तथा नक्तो श्नौर ग्रहौ का प्रकाश मेर पर्वत 
के परे होता है ॥८॥ वाँ के मख्य की कान्ति 
कमल के समान दहै तथा उनम से कमलकीसी 
खगन्धि आती है । वे लोग जम्बू फलके स्सको 
पीते है खीर उनके नेत्र कमल के समान है ॥ ६॥ 
वदां लोगों की श्राय तेरह दड्ार वपं की होती है, 


॥ 


+~ 
1 


ष 
१ 


इलावर्तं के मध्य मे जो मेर पर्व॑तहै उसका श्राकार ` 


ठकने कासा है ॥९०॥ वापर मेर नामका विशाल 


पर्व॑त है निसको इत्नघृत्त भी कहते है । ्रवमै 


रम्यक्र वपं को कहता ह उसको खनो ॥ १९॥ वदां 
पर दरे पत्त वाला वड़ा उचा एक चरगद का पेड 
है जिस्केकि फलोकेग्स को पीकर वे लोग 
जीवित रटते है ॥६२॥ वहां पर मलुष्य दस दज्ञार 
वपं की खाग्रु बले होते द । वे खच्छु तथा रतिम 


कुशल दते हं । उन लोगों को बुढपा छरीर दुर्गध 


कभी नदीं शात ॥ १२॥ उसके उत्तरम दिर्रमय 

नाम णक चप है जहां पर कि खच्छु दिरएवतीनदी 
[~ 9 

कमलो से युक्त विद्यमान हे ॥ १७ ॥ बहांपर मयुध्य 


चड़ वलवान्‌, तेजखीः यत्त ॐ समानः पराक्रमी, \ 


५१५ 


य्षरूपा महासत्वा धनिनः भियदर्शनाः ॥१५।|| घनी नौर प्रीतियुकत दोते दै ॥९५॥ 


इति श्रीमाक॑र्डेयपुराण मे धुवनकोष नाम ६०्वां अध्याय समाप्त 1 
"मे -कन्- 


इकसटरोँ अध्याय 


करौषकिरुबाच 
कथितं भवता सम्यक्‌ यत्‌ पृषटोऽसि महामुने । 


भूससुद्रादिसंस्थानं भमाणानि तथा ब्रहाः ॥ १॥ 


तेषाञ्चेव भमाणंच नक्षत्राणाञ्च संस्थितिः । 
मूरा्दयश्चया लोकाः पातासान्यखिलान्यपि ॥ २॥ 
स्वायम्थुवं तथा स्यातं मुने मन्वन्तरं मम । 
तदन्तराण्यहं श्रोतुभिच्छे मन्वन्तराणि वे । 


कोषटुकिजी वोले- 

हे माकर्डेयजी ! जो कु मैने पुच्छा वह श्राप 
ने पृथ्वी, ससद आदि की स्थिति तथा श्रह श्नादि 
सवका वणेन किया ॥ १॥ ग्रहो के परमाश, नको 


॥ 


की स्थिति, भू आदिक तीनो लोक ओौरः, सव पा- , 


ताल्ल ॥२॥ श्रौर स्वायंसुच मन्वन्तर का चृत्तान्त भी ¬: 


आपने मुमसे कहा 1 इसके वादं अव म मन्वंतरों 
तथा 'मन्वन्तरों के राजा, देवता, राजर्षि श्रौर उन 


मन्वन्त्राधिषान्‌ देवादषींस्तत्तनयान्‌ सृपान्‌। ३॥ के पु का वन खनने की इच्छा करता है ॥ ३.॥ 


| माकैर्डेय उताच 
मन्वन्तरं मयाख्यातं तव स्त्रायम्धुषऽ्च यत्‌ । 


माकंर्डेयजी चोक्ते 
` मेने ्रापसे स्वायंभुवे मन्वन्तरका वर्णन किया 


-स्वारोचिपारुयसन्यत्‌ तु श्ण तस्मादनन्तरम्‌॥.४।॥ अव दखरे मन्वन्तर स्वारोचिष को सुसे सुनो ॥ 


च => === --- 


श्र०,६१ , २६ ` ¦ माकैरदेयपुराण „ २११ 


----~ --~ -----"- ` ~~~ ~~ -~---~ ~ ~~ "~~ 


करटिचटिद्टजाततिगवरः पुरेऽगूदरूणास्पदे ¡| . ¡ वर्णा नदी के तर पर स्थित रूणास्पद नगरमे 


वरुणायास्तटे प्रिमो सूपेणात्यधिनाचपि ॥ ५ अभ्विनीकमाों के समान रूपवान्‌, कोई बराह्मण 
रहता थ ॥ ५॥ वह ब्राह्मण कोमल स्वभावं वाल्ला 


सदातिथिमिय रत्रवागतानां . सयाभयः ॥ ६ ॥{- को परिय तथा याति मे आने वालो को श्र्रय,देने 


तस्य बुद्धिरियं त्रासीदहं पश्ये बरुन्धराम्‌। | वाला था॥ ६॥ पक दिन उस बाह्मएुको यद यद्धि 


पजी कि वह पृथ्वी को श्रत्यन्त रभणीकं चन 
॥ [4 
सपिरम्यवनोचानां नानानगरशोभिताम्‌ ॥७। 4 


श्रथागतोऽतिथिः कशचित्‌ कदाचित्‌ तस्य वेश्मनि! | इसी समय उसके धर पर एक अतिथि श्या जो 


नाना भकार ऊी श्रौपयियों ॐ प्रभाव तथा मलब 
नानौपमिममावङग मन्तवि्ाविशारद्‌ः ॥८॥ विद्या को सव जानता था ॥ ५ ॥ शरद्धापूर्वक पविभ 


त्रभ्यर्थितस्तु तेनासौ श्रद्धापूतेन चेतसा । | चित्त से भ्रतिथि की च्भ्यर्भना करफे उसने उनसे 


तस्याचख्यौ स देशांश्च रम्याणि नगराणि च ।*६॥ 2 फिवट क ५ नगर द देशसे 
॥६॥ वन, नद, पचेते श्रर्‌ बहुत से पुण्यं 
वनानि नद्यः शलांश्च पुण्यान्यायतनानि च! | को उसने गताय! 8 


स ततो विस्मयाषिष्टः प्राह तं द्विजसत्तमम्‌ \:१० ब्राह्मण ने उससे कदा ॥ १०॥ हे विग्रदेव ! ` अनेक 


+ देश को देखने परः ्रापको धकावट नहीं हुई : 
अनेकदेशदितवेनाति्रमृसमन्वित । मालुम होती है । श्राप न बहुत वृद्ध श्रीर नं युवां , 


लं नातिषटदधौ वयसा नातिष्त्श्च यौवनात्‌ । | ह, ते तरल काल मे आपने कित पार प््डी ` 
7 ५ पृथ्वी ` 
कथं कालेन ' पृथिषीमटसि द्विज ॥११॥ छा धमा कर लिया ॥११॥ 4 

` ब्राह्मरा उचाच ब्राह्मण वोला-- 


| \ हे विभ ! मन्नं र श्रौपचियो के परमाव से ` 
मन्त्रौपथिध्रभावेण विप्रापतिहता गर्तं त कवि दि 


योजनानां सदस हि दिनर्द्धिन घरनाम्यहम्‌ ।॥१२॥ दज्ञार योजन चकवा .॥९२॥ 
माकैरडेय उबा्च माकरडेयजी वौले-~ 


ततः स विमस्तं भूयः प्र्युवचेदभादरा्‌ । उस्र महात्मा यत्तिथि फी चातो म धद्धा रखते 


उख फिर मानपूवेक उससेकदा ॥१३॥ 
चतः ॥१३।॥ हप उस ब्ाहणने 
श्रद्धधानो वचस्तस्य ताह्यणस्य विपरिचत्तः ॥१ व 


मम्‌ भसादं भगवम्‌ कु सन्मभावजम्‌ । 

्रटमता महीयतीमिच्छ भवत मुमसे कषिये, इस पृथ्वी को देखने की मेरी घड़ी 
्रष्टमेतां मम॒ महीमतीवेच्छा भवन्ते ॥१४।॥| इच्छ द ॥ ९४॥ तव उस उदार शचतिथि बराह्मण 
प्रादाद्‌ घ जाह्यणएष्वास्मे पादलेपुदारधीः । उसको पादलेष दे दिया तया टसकी यता 


अभिमन्त्रयामापर दिश तेनाखू्याताञ्च यत्नतः॥११| विया सधे ह ध खला गया ॥ 
| न ~ दिल हे दिञद्त्तम ? उस लेप को पवि. यं. लगाकर वष्ट 
तेनायुलिष्ठपदोष्य स. दिनो दहिजसत्तम । ब्राह्मर॒ श्चनेक भरनो से युक्त हिमालय पर्वत को 


` हिमचन्तसगादु्रषटुंनानापरस्रवणान्वितम्‌ ॥ ९६1 देवने ॐ लिये गया ॥५॥ उसने सोचा किं धर 
सहस्र योजनानां हि दिनादधेन बनामि यद्‌ । | दिन मे पक दजार योन जाङगा तथा दिनि पै 
श्रायास्यामीति सञ्चिन्त्य तदर्धनाररेण हि॥ १७ दृखरे राये माग मे वद से लौट श्रां या ॥ १७ ॥ 
सम्भाषो हिमदतपृष्ट नातिशान्ततसुर्दिन। | बह बाह्मण विना प्रमे दी हिमालयी पीठ पर 
विचचार ततस्तत्र तदिनाचलभूतसे 1१८ प्च कर वहां वरिचरने-लगा 1८॥ वद परमीयधि 
पद्‌क्रान्तेन तस्याथ तुदिनेन वि्तीयता } | पादलिध चलने से तथा .चफं से धुलकर विच्रीन 
यक्षाङधितः. - पादलेषः स्समोपधिसम्भवः ॥१६॥ न 


२२६ माकेरटढेयपुराख ` , अर ९१ 


ततो जडगतिः सोऽय इतप्चेतश्च पय्यटन्‌ । होगई ॥ १६॥ इसके वाद वह जडमति होकर 


+ इधर उधर घूमने लगा तो उसने दिमालय पवेत 
ददशोतिमनोजञानि सानि हिमभूतः ॥२०॥ के पक अत्यन्तं मनोरम स्थान को देखा ॥ २०॥ 


सिद्धगन्धव्वनुष्टानि किञ्राभिरतानि च । वहां पर सिद्ध, गन्धर्वं श्रौर किन्नर विहार कर रहे ` 
करीदाविहाररम्याणि देवादीनामितस्ततः ॥२१॥| थे तथा देवताश्नो की कीड़ा रमरीक स्थान इधर 
दिन्याप्परोगणशतैराकीान्यवलोकयन्‌ । | उधर वने इष थे ॥२९॥ सैकड़ों दिव्य ्रण्सराश्ं से 
नाट््यत द्विजश्रेष्ठः प्रोदभूतपुलको यने ॥२२॥ त व \ 
9 यमच 1 
चित्‌ प्वणादुशरष्टनलपातमनोरमम्‌ । भारनों से गिरते हप जल का मनोहर रश धा 
भचरत्यच्छिखिकेकाभिरन्यतशथ्च निनादितम्‌ ॥२३॥| कीं मोर नाच रे थे तथा बह स्थान सुन्दर 
दात्यहकोयष्टिकायेः कचिचातिभनोहयेः पक्तियों की ध्वनि से गूञ्च रहा था॥ २३॥ कोयजल 
पुंस्कोकिलकलालापः भरतिहारिभिरन्वितम्‌ ॥२५। शमादि के र मनोहर श्रालापों से बह स्थान 
त्यन्त रम्य दो रहा था ॥ २६ ॥ परफल्लित वृतो 
भुहतरुगन्ेन पासितानिलपीनितम्‌ ॥ की सुगन्ध से भरी हुई दवा से युक्त उस स्थानको 
दा युक्तः स दुद्े हिमवन्तं महागिरिम्‌ ॥२४. | हिमालय पवेत पर उस प्रसन्न चिच व्ाहमणने देखा 
दृष्ट चैतं द्विजछुतो हिमवन्तं महाचमू । ॥२५॥महापर्व॑तहिमवान्‌ को देखकर ब्राह्मणएने सोचा 


शरो दध्यामीति सख्िन्त्य मतिं चक्रे हं अति ॥२६॥ कि कल पतिर श्राकर देर्खंगा, अव धर को चलं 
1रद्‌॥ परस्तु पादज्लेप के धुल जाने से वड जड्गति 


विभरष्टपादलेपोऽय ध जङतक्रमः। | होपया शौर चल न शका । पिर उने सोचा कि 
चिन्तयामास किमिदं मयाज्ञानादरु्ठितम्‌ ॥२७।॥| अनजान म मैने यद क्या किया १॥ २७॥ वर्ण से 


यदि लेषो नष्टो मे विलीनो दिमवारिणा । | मेरा पाजेप धुलगया । यद पर्वत शरत्यन्त दुम 
शंलोऽतिदगंमश्चायं द्रज्चाहमिहागतः ॥२८॥| ३ श्रौर म अति दूर यदां श्यगा ह ॥ २८ ॥ श्रननि ५ 
भयास्यामि क्रियाहानिमभ्नि्भरूषणादिकम्‌ 1 | पजा रादि नित्यक्रिया भी भै व कैसे करूंगा १ 
कथमत्र करिष्यामि सङ्कटं महदागतम्‌ ॥२६॥ यह तो महान्‌ सङ्कट आगया ॥ २६॥ इस रमसीक 
इदं रम्यभिदं रस्यमित्यस्मिन्‌ परपव्वेते। | पर्व॑त पर यह रमणीक है बह रमणीकरे यह देखते 
सकि दि न_यासयेदगतेरपि ॥२०॥ इर क कथो म भी दसि न हणी ॥ ६० ॥ 
किन्नराणां कलालापाः समन्ाचछोनहारिणः चारों रोर चिः खुन्दर गायनो से मेरे कान 
व पा र # १॥ आसक्त होरहे टै तथा एूले हृ चलो की सुगन्धि 
तर से मेरी नाक को महान्‌ सुख होरा है ॥२९॥ यर्दा 
सुखस्पशस्तथा वायुः फलानि रसवन्ति च | | की वायु के खस्पशं से, रखदार फलो के रख पि 
हरन्ति भसभं चेतो मनोज्ञानि सरांसि च ॥३२॥॥| शरीर खरोवरो से मेरा चित्त लुभायमान दोरा ह 


एवं गते तु पश्येयं यदि कचित्‌ तपोनिधिम्‌! | ॥ २९॥ इस अवस्था मे यदि कोड तपोनिधि सुभे 
धर जाने के 

स॒ मगोपदिरेनमाम गमनाय ग्रहं मति ॥३३॥| भन भिये मानं ऋ विन्दन करे तो _ 

स एवं चिन्तयन्‌ पिभो वभ्राम च हिमाचले पाँव की श्रौपधिके धुलजाने से परमः चिकलता 


` ्ष्टपादषधिवलो वेवं परमं गतः ।३४।॥| को भात बद व्राह्मण यद सोचता हुश्रा दिमालयः 
। तं ददश ध्नमन्तञ्च मुनिश्रेष्ट वरूथिनी । | पर धमता रदा ॥ ३४ ॥ इतने दी मे उस धमते इ 

चराप्परा महाभागा मोलेया रूपशालिनी ॥२५।॥, सुनिश्रे्ठ को सुन्दरी श््सरा वरूथिनी नामक 
तस्मिन्‌ दष्टे ततः साभदिददजवर््ये वरूथिनी । ॥ | महाभागा ने देखा ॥६५] चरूथिनी उस बराह्मण को 


९ माकश्देयपुराण २९७ 


मदनाढृष्टदया साचुरागा हि तक्षणात्‌ ॥२६॥ वामदेव से श्रारृषट दो तत्क्षण श्रासक्त दो 
चिन्तयामास को न्वेष रमणीयतमा्िः । | १६।२६॥ बद मनम सोचने लगी किः इना नदर 
सफलं मे मदैव्नन्त यदि भां नादमन्यते ॥१७॥| यह कौन दै चदि यद युम मान जते तो मेरा जीवन 
अहोऽस्य महो | सफल हो जावे ॥ २७॥ श्रदा । इसका रूप-माधुरयं 
रूपमाधु्यमहऽस्य ललिता गतिः। | श्रौर इसकी सलीनी "चाल, श्की गंभीर चितवन 
श्रहो गम्भीरता षठः कुतोऽस्य दशो भूवि ॥२८॥ के ध इसके समान संसार मे फौन रूपवां दै. 
दष देवास्तथा दैत्याः सिद्धग्धवयेप्नगाः। | ५>॥ १ 4 दैत्य, सिद्ध, गन्धं 
कथमेको तर ॥ र्ना 7 है परन्तु इस मदात्मा फे 
ऽपि नास्त्यस्य तुर्यरूपो महात्मनः॥।२६॥| समान को$ रूपवान्‌ नही है ॥३६॥ यदि जिस 
यथादमस्मिन्‌ मय्येष सानुरागस्तथा यदि । र मेरी प्रीति शसम दोग उसी भकार इसकी 
भवेद्र मया काय्यसत्दः णयसंचयः ॥४०॥ भीति सुम दोजाय तो मेय कायं छदं दोजाय ॥ 
येय समि दुस्थ टम निपातयेत्‌ । यदि यद मेरी श्रोर प्रेममयी दशि से देखनल्ते..तो 
सोल शोके तीनों ल्लोक मे मेरे खमान पुर्यवती सी दुसरी 

कृतयुएया न मत्तोऽन्या तरलोक्ये पनिता तत॥४१॥ नदं है ॥ ४१॥ | 

। माकरडेय उवाच मारकरडेयजी वोले- । । 
एवं सञ्विन्तयन्ती सा दिव्ययोपित्‌ स्मरातुरा । दस पकार बिचार करती हु उस कामातुर 
आत्मानं दशयामास कमनीयतराङृतिर्‌ ॥४२ | चण्डा ४ ५५५ 1 
चह उख .रूपवती वरू 
तान्तु चा दविनसुतश्चारुरूपां वरूथिनीम्‌ । | थिनी को देखकर उससे उपचार पूवक यह भचन 
सोपचारं समागम्य भाक्यमेतदुवाच इ ॥४३॥| बोला ॥४३॥ हे कमलम के समान कान्तिालीं ! 
का त्वं कमलग्मामे कस्य क्रि वायुतिष्ठसि। | ठम कौन दो शरीरः करा रती दो मैवा प 
स्पद्‌ नगर से श्राया हुशरा राह्मण ठ ॥ ४५ ॥. भः 
त नमरादरुणास्पदात्‌ ॥४५॥ पादलेप वपर के जल से धुलकर विलीन. होगया है 
पादेपोऽ्चर मे ध्वस्तो धिलीनो हिमषारिणा। | निस कारण से किदे मदिराके सेनेत्र वाली! तै 
यस्यायुभावाद्त्राहमागतो मदिरेक्षणे ॥४१५।॥ दयँ ्ा पबा ॥ ४५॥ ४ 
यरूथिन्युबाच वरूथिनी वोली-- 


मौलेयह महाभागा नाम्ना स्याता बरूथिनी । ण्या ने कडा कि मँ बरूथिनी नामक ` श्रन- 


७ मोल शीर शरति भाग्यवान्‌ अष्सयः हं श्रौर सदा 
विचरामि सदैवात्र रमणीये महाचले ॥४६॥| श्ससमसीक पवैत पर विचरती रहती ह ॥४६॥ हे 
साहं खदक्नाद्धिपि कामवक्तव्यतां गता । 


विगर ! ुम्दारे दशन से भै कामासक्त हो रही ह । 

1 जो सुमको आक्ञाहो सो कलं, इस समय मे 

शाधि यनया काय्यं खदधीनासिमि साम्मतम्‌४७।॥ तम्दारे आधीन ह ॥७॥ | | 
ब्राह्मण उराच ब्राह्मण वोला-- 


येनोपायेन गच्छेयं निजगेदं शुचिस्मिते । हे खुन्दसी ! जिस उपायसे म रपे धर पच 
र ध सरू उसको सुमसे कटो, प्यकि विना घर पे 
तन्ममाचह्य करयाणि हानिरनोऽखित्तकम्पेणाम्‌ ४८ 


मेर समस्त करियाञ्ौ की हानि दो रदी दै ॥ ४८॥ 
निखतैमितिकानान्त॒ मदाहानिर्धिनन्मनः । नि 
भवल्यतस्तवं हे भद्र म्ठदवर दिमारयात्‌ ॥४६। | भु हिमालय से जार हभण 
शसते न भवातो ब्राहमणानां कदायन । . | को प्रवास भै रना चिद ना इ च अ 
9 । हलवश देशो को देखते हण धूमनाही , चाये 
अपरद! न मे भौर देशदशंनकौतम्‌ ॥५०॥ 5,५॥ उत्तम ्रयए कौ सवर ओं ौ सिद्धि 
हदो शे दविजा्यस्य निष्पत्तिः सर्ववम्भणामू्‌। । भर पर दी होती है तथा परदेश मे स्ने से शली 


२२८ माकरडेयपुराण श्ट ६१ 


नित्यनैमित्तिकानासख हानिरेवं प्रवासिनः ॥५९।। भकार न्त्य श्रौर नैमित्तिक क्रियाय चुट जाती हैँ 


। } ४९ हे यश्स्वरी ! आधक्त कहवे ख क्या ल 
पावर बहुनोक्तेन तथा इर्‌ यशस्िनि । है एेखा कयो लिखे श्चूयास्त कै पदित्े म श्रपने 


य॒था नास्तं गते ष्यं पश्यामि निजमाक्तयम्‌॥५२ | घर पर्टुच जा ॥५२॥ 


वरूाथन्युवाच वरूथिनी वोली-- २ 
मेवं ब्रहि सहाभिग माभूत्‌ स दिवसो सस । ` दै महाभागः पेखा मत को, वद दिन 


भ परिखल्य यत्र लं निनगेदष्यसि ।।५२॥| कमी न दो जव क ठम सुः छोड़ कर श्रपने घर 

सवग न युतो . द्विजनन्दन । जायो ॥५३॥ हे ब्राह्मण { इससे अधिक रमणीक 
महो स्म्पतर्‌, स्व । स्वमंभी नदीं ह, इसी लिये हम स्व को छोडकर 
अतो षयं परित्यज्य तिषठामोऽ् सुरालयम्‌ ॥५४।॥| चं रहती ह ॥५५॥ ह कान्त ! तुम पान्त भे इस 


स खं ख॒ह भया कान्त कान्तेऽतर तुहिनाचले। | पर्वतपर मेरे खाथ रमण करो । रमर करते हु तुम , 


रममाणो न मरस्यानां बान्धवानां स्मरिष्यसि५५। मडप्यलोक के पने भाई बन्धु को भूल जाच्रोगे 


म्यमोज्यानुलेषनम्‌ 1५५॥ मेरे हदय कनो कामदेव ने चश म करलिया दें 
सनो बखाएुयलङ्कारान्‌ भक्यमोज्यालुलेषनम्‌ ! ये तुमक्ते माला, चख, अक्लंकार, भोजन, चन्दन 


द्‌ास्यास्यत तथाहं ते स्मरेण वशगा हताः 1 *&॥ प्रादि सव कुष्य टंगी ॥५६) यदं किश्चरोके मनोहर 
सीणवेरखनं गीतं किन्नराणां मनोरमम्‌ । | गीव श्रौर वीणा तथा वेरु के शब्द सुनाई देते 
अङ्भाहादकरो वाथुरुष्णान्नयुदफं शचि ।५७]॥| तथा वा चड़ी खुलकर हे । यहां का अन्न ताज्ञा 


= तथा जलल पविच है ॥ ५७ ॥ श्रहां पर मन बांदित 
मनोभमिलपिता श्या सुगन्धमञुलेपनम्‌ । शय्या तथा सुगन्धियुक्त चन्दन है । हे महाभाग ! 


इृहासतो महाभाग गहे किं ते निनेऽधिकम्‌ ।४८। इससे अधिक तम्दारे घर मे क्या है १॥ श्या यदहं 
इदासतो नेव जरा कदाचिद्‌ ते भविष्यति । | रते हष ल्ट युढापा कभी न दोगा । वद्‌ भूमि 
व्रिदशानामियं भमियौषनोपचयथद्‌ा ॥५६॥| देबतात्रा कम चनह हई टै, कारण-यहां सदा 


यौवन रदता है ॥५२॥ यह ककर श्चनुराग सहित 
श्त्युक्त्वा सासुराया सा सहसरा कुमलक्षणा । हसे वह कमलनयनी सुफपर पन्न टोः यह कहती 


आलिलिङ्ख प्रसीदेति वदन्ती ृलयुन्पनाः ॥ ६०॥ इई जाह्यस से क्िपटने को उघ्यत इई ॥६०॥ 
ज्ाह्यण॒ उवाच व्राह्मण वोला-- . 
सा मां स्पाक्षत्रैनान्यत् दुष यः सदृशस्तव । हे दे ! खश्को स्पशं न कर चौर अन्यन्न जा 
नि समन्यमैवपयुतेष जहां करं तेर दी समान तुको मिल जाय । मैने 
न्यथा याचिता ? मम्‌॥६१॥ बृथा ही तुमसे पूछा, तू सुमते शरथा हौ मिलना 
सायं परातहुतं हव्यं लोकान्‌ यच्छति शाश्वतान्‌ | चाठती द 1 द ॥ मयुष्य सायं ओर भातः दोनों 


त्रलोक्यमेतदसि्तं मदं ह्य भतिष्ठितस्‌ दपा हवन करके स्वग को जातें । हे मदे ! यदह 
्रेलोक्यमेतदखिलं मृद हव्ये तम्‌ । । तीनों लोक दोममे दी स्थित! रेखा खरल उपाय 
थूयायं समिध्य येन यामि खमाल्लयम्‌ ॥६२॥ सुखे वता जिससे में शीन्र प्रपते घर जाड ॥ ६२॥ 


वरूथिन्टुबाच वरूथिनी वोली-- . 


कितेनाहं भिया धिपररपणीयोन कि गिरिः) हे बराह्मण ! ऋयत यै तुस्टासै परिया नदीं हई खर ` * 


गन्धर्व्वान्‌ क्षि्नरादीध त्यक्लाभीष्टो हि कस्तव ३1॥ क्या ` चद्‌ पवेत ररक नहीं हे १ गन्ध रौर 


प्यसमाद्भवान्‌ यास्वत्यसंशयम्‌ न््ज्रिको छोड़कर तुमको पया अभीष्ट ह १।६२॥ 
निनमालयमप्यस्माद 3 । _ | आप निर्छम्ेह अपने घर समो जर्येग परस्तु थोड़े 
 स्वरपकालं मया साद्ध श्व भोगान सुदुलंभान्‌ ६४ दी समयक लिये मेरे साथ उम भोगम भोगो ॥ 


ब्राह्यख्‌ उवाचि मादस वोला- _- ४ 
अभीष्टा गाहेपत्यायाः सततं २ अयाऽ्यः | राष्देपत्य यदि तीनों सान्त अधिया दी सुभ 


क्रो अभी िडीशसर्णंदी खश्टको 
र्स्य ममापरिशस्णं देवी विस्तरणी भिर्या | ।६५।॥ ट दयौर दशम नासी मेस पिया नि र रमशवाक 


मि {म --च ॥। व 


1 गप्र ण्व गप नरचः-च क-- ~ ~ 


नः 


० ६१ माकैरुदैयपुराण २२६. 


[1 
» ~~~ -~-----------------~- ~~ ~~ ---~-~----------- * * 


~+ ~ ~~~ ~~~ ~~~ --~---~ 


वरूधिन्धुचोष्व | वरूथिनी बोली-- | 
अष्टावात्मयुखा ये हि तेषामादौ दया दिनि । | दे दिज ! आतमा ऊ शाट गुर्‌ टै उन दया, 


1 


है । हे धर्मपालक ! इसलिये तम शुफपर दया 
कर्यो नीं करते १।६६) हे कुलनन्दन ! तुम सुपर 
प्रत टरो जायो, मेरी तुमे प्रीति है । तुम्हारे 
छोड़ने परर मै जीवित रहेगी, यहमें मिथ्या 
नटीं कती ह ॥ ९७ ॥ । 

बराह्मण वोला-- 


यदि तेरी प्रीति सच्ची दै श्रौर केवल उप- 
चार मा नरी है तो ेसा उपाय वता जिससे 
मै श्रपने घर परह जाऊ" ॥ ६८ ॥ 
बरूथिनी वोली- 


श्राप निस्सन्देह श्रपने घर को पर्हुव जागे, 
परन्तु थोडे दी समय के लिये मेरे साथ श्रलभ्य 
भोगों को भोगिये ॥ ६६ ॥ 
ब्राह्मण बोला- 

हे वरुथिनि ! शास्र मे ब्राह्मणे फे लिये भोग 
नटीं लिखा है । ब्राह्मणों का जीवन टस संसार में 
प्रच्य दुखदादे परन्तु परलोके वह फलपदहै ॥ 
वरूथिनी योली- त 

हे बाह्मण ! मेरे खाथ भोग करके मुभ श्त- 
प्राय की स्तता करो, इस से तम्दै सवे पर्य `का 
फल होगा ॥७१॥ यदा पर तर्द दो लाभदः 
परन्तु शके विपरीत करने से मेरी सत्यु होगी 
शरीर तुमको पाप लगेगा ॥७२॥ । 
बराह्मण वोला-- 

मेरे गुरने कटाथा कि अन्य खी की अभिलाषा 
न करना इस कार्ण मै तेरी इच्छा पूरं नदी 
सकता तू वि्धाप कर अथा न कर ॥७॥ 
मार्डेयजी बोक्ते- | 

यर्‌ कहकर वह॒ भाम्यतान्‌ व्राह्मण जल को 
स्पश कर पिच हो गार्हपत्य भगवान्‌ श्रध 1 
परति यह योला ॥ ७४ ॥ हे भगवन्‌ } गृदकी देता 
श्रञचि! छपर सव कमो के कारण है । श्राप.मे हवन 
करने से खथ श्रश्नियां पत हो जाती द ॥७९॥ श्राप 
कके ठ दोने से दी खव देवता घपां करने ह जिस 


तां करोषि कथं न खं मयि सद्धरमपालक ॥६६॥ 
तदविुक्ता न जीवामि तथा प्रीतिमती त्वयि । 
नैतद्रदाम्यहं मिथ्या प्रसीद सनन्दन \*६७॥ 

ब्राह्मण उवाच 


यदि प्रीतिमती सत्यं नोपचाराट्‌त्रचीपि माम्‌ । 


तदुपायं समाचक्ष्व येन यामि स्वमालयम्‌ ॥६८॥ 
वरूथिन्युवए्च 

निजमालयमप्यस्माद्रवान. यास्यत्यसंशयम्‌ । 

खल्पकालं मया सादं सदश्व भोगान सदुलेभान६६ 
द्राद्यण उवाच 

न भोगार्थाय बिमाणां शस्यते दि वरूधिनि । 

इह छेशाय विमाणं वेष्टा भेत्याफरभदा ॥७०॥ 
चरूथिन्युवाच 

. सन्त्राणं भियमाणाया मम॒छृतवा परत्र ते । 

पुण्यस्यैव फलं भाषि भोगाथान्यत्र जन्मनि \७१॥ 

एवल्च द्वयमप्यन्न तवोभ्चयकारणम्‌ । 

भत्याख्यानादहं मृत्युं खञ्च पायमवाप्स्यसि॥७२॥ 
द्राह्यखं उवान्व 

परच्ियं तामिलपेदित्ूजगुसो मम । 

तेन चां नामिवान्छामि कामं विल्लप शुष्य वा।।७२॥ 

माक्रडेय उवच 
इत्युक्त्वा स महाथागः सृषटराएः भयतः शुचिः। 
~. भाहिदं अणिप्याभ्रिं मापत्यषुमंना ॥७४। 

भगवन्‌ गारहपत्यामे योनिस्तव सर्व्यकम्पाम्‌ । 

खत्त आहयनीयोऽथिदंक्षिखाभ्िथ नान्यतः ॥७५॥ 

ुष्पदाप्यायनादेवा ` दृ्टिशसयादिदेतवः । | चे ध्वी पर शर उलन होता है ओर्‌ अन खे 

भवन्ति शस्यादसखिलं जगद्यति नान्यतः ॥७६।|| दी सम्पू जगत्‌ के माणियो का जीवन ड ॥ ७६॥ 

एवं तत्तो भयदयेतदयेन सस्येन वै जगत्‌ । | श्रगर शे दँ तो दसी सत्ये वै यास्त से 

तथाहमय खं गेहं. प्रये सति भास्करे 11७1 पिले. घर पटच जाऊ ॥.७७॥ यदि मैने उसके 


॥ साकरडेयषुराण अ०.६२ 
_ __ __ ---------------- 
या वैवेदिं कमम खकालेनोनमितं मया] = | समय पर चैषिकं कमो को न चोड्ाद्ो तो उसी 


(न सत्येन पश्येयं शृदश्थोऽय दिवाकरप्‌ ¦ ७८॥| छत्व चे मै आज घर पर्व कर सू्ंको देख ॥५८॥ 
द्रव्ये परदारे चमे मतिः । यदि मेस श्रभिलापा दूसरे के धन प्रर खीमें 
ध ध कभी नदीं ई हो तो उस सत्य से मेरा भरण 


दाचित्‌ सामिलाषाम्‌त्‌ तथेतत्‌ सिद्धमत ॥ सिद्ध दो ॥ ७६॥ 
इति श्रीमाक॑र्डेयपुराणमे स्वारोचिष मन्वंतर मै त्राद्यणएवाक्य नाम ६१ अध्याय समाप्त । | ५ 


-- शै :०:-€<--- 
मचटगा अध्याय्‌ 
माकैरडेय उवाच | माक॑रडेयजी वोक्ते- + 
नतु वदतस्तस्य द्विजपुत्रस्य पावकः । | उस व्राह्मण के इस धकार कटने पर गापत्य 
ष | श्रश्निदेव ने उसके शरीर मे प्रवेश किया ॥२॥ 


¢ 
भारहैपत्यः शरीरे त॒ सनिधानमथाकरोत्‌ ॥ १॥ चठ हय अछ दश ते दे दभ 
तेन चाधिष्टिः सोऽथ प्रभामण्डलमध्यगः । | मान्‌ होने लगा जैसे प्रभामरडल के वीच मे मूर्तिः 
व्यदीययत तं देशं मूतिमानिव हव्यवाट्‌ ॥ २॥ भान्‌ श्रि शोभा देता है ॥ २॥ उस्र ण्सराने जव 
तस्यास्तु सुतरां ततर ताद्रपे द्विजन्मनि । | बहम के उस रूप को देखा तो उसको श्नौर- भी 
ञरनुरागोऽभवद्धं पश्यन्त्या देवयोपितः ॥ ३ ॥ श्रधिक शर्ञसग दोगया ४ २॥ श्रधि के प्रवेश 
ततः सोऽपिष्टितस्तेन हव्यवाहेन ततेक्षणात्‌ । | क्र जाने पर बह बाह्मण कमार पिले की भांति 


यथा पूष्वं तथा गन्तं प्ररतो द्विजनन्दन; ॥ ४॥ १ को व म ॥४॥ क ) 
दे $ दख देखते चह शोध्र चत्र गया श्रषर उस 
ठ निरी 1 "| न~. ०६ 

जगाम च तवरायुक्तस्तया देव्या निरीक्षितः । | क विरद म ब उन्दी कम्पित शरीर बाली हो 


रा दृष्टिपातात्‌ तन्व्गा निश्वासो्कम्पिकन्धरम्‌५॥| कर श्वास लेने लगी ॥५॥ तव क्षण मर मेदी 
ततः ्णेमेव तदा निजगेहमषाप्य सः । | उस ब्राह्मण ने पने घर पटच कर पूर्वोक्त खमस्त 
यथोक्तं द्विजशरेष्ठधकार सकलाः क्रियाः ॥ & ॥| क्रियाय सम्पन्न कीं ॥ ६॥ नौर वह सुन्दरी उस 
श्रथ सा चारुसव्वाज्ी तचासक्तातममानसा । | बाह्म मे आसक्त मनदाली होकर लम्बी लम्बी 


निश्वांसपरमा निन्ये दिनरोषं तथा निशाम्‌ ॥ ७। व इतनेही मेँ दिन समास दा रौर 
ग न च ४५ 

नश्वसत्यनयचाही हिति सुदती यहुः। | योती 9 हकार व 
मन्दभण्येति चात्मानं निनिन्द मदिरेक्षणा ॥८॥| भाग्य रौर युवावस्था को भी धिकारने लगी ॥८॥ - 

न विहारे न चाहारे रमणीये न वावषने। | उसको न भोजन मे, न विहार मे, न उस रमणीक 
न कन्दरेषु रसयेषु सा बबन्ध तदा रतिम्‌ ॥ ६ ॥ वन मे श्नौर न उन रम्य कन्दरा मे भीति इहे ॥ ~ 

` चकार रममाणो च चक्रवाकयुगे स्पृहाम्‌ । के पिर्म चकं दुगि होती दै 

युक्ता तेन वरारोहा निनिन्द निनयौवनम्‌ ।१०॥ क 0 

अपने यौवन को कोसमे लगी ॥ १०॥ सै दु दैव 


५ ३ 9 3, ध 
 कवागताहमिमं ० इ्दैववलाछता । `| ॐ योगे इ पर्वतपर क्षयो श्रागईै जो मेरी दृष्टि 
\ क च भक्सं मे छगोचरं तादशो नरः ॥११ गोवर देखा मद्ध्य इचा १ ॥ ११॥ वरयोकि उख 
६ यच्च स महाभागो नमे सङ्गुेष्यति। | महामाग से अव मेया सङ्ग न होगा, इसक्तिये ह 


^ सामासि मां क्षपयिष्यति दुःसहः ॥१२॥ त्रखद्य कामास्नि से त्रवृश्य नष करदेगी ॥ १२॥ 


्र० ६२ माफोएदैयपुराण २३१ 


रमणीयमभूदुयत्‌ तत्‌ पुंस्कोकिलनिनादितम्‌ । | कोयलों फे नाद से रमतीक यद बन उस ब्राह्मणक 


तेन हीनं तदेवैतदहतीवाधय मामत्तम्‌ ॥१२। विना मुभे जला रहा है पेखा मालुम होता है 1६२ 
भाकंर्डेयज्ञी वोक्ते- 
भाकरडेय उवाच 


॥ ब्ौषकि सुनि ! इस प्रकार कामासक्त द 
` हत्थं सा मदनाविष्टा जगाम एुनिसत्तममू्‌ । | बरूथिनी का श्रजुराग उस ब्राह्म मँ भदित 
वद्धे च तदा रागस्तस्यास्तस्मिन्‌ प्ररिक्षणएम्‌॥१४।।| वडवा मया ॥७॥ फिर कलि नाम ॐ गन्धर्व ने जो 


कलिनाम्ना तु गन्धर्व; सानुरागो निराश्चतः। | उससे १ करता था तथा जो पिलेःखससे -श्रप- 
ह | मानित हो चुका था वरूथिनी को उस अवसथा मै 
4 वमू सोऽय तदवस्थं ददश्‌ ताम्‌ । १५॥ देखा ॥९४॥ उसने सोचा क्रि गजगामिनी बरूथिनी 


ग़ चिन्तयामास तदा फि न्येपा गजगामिनी । | भरो इस प्रकार इस पदाड़ पर श्वास तेती ह 
निश्वासपवनम्लाना गिरावत्र वरूथिनी ॥१६॥ म्लान दोर दै ॥१६॥ या तो इसक्रो किसी मुनिने 


युनिशापकषता किं सु फनचित्‌ किं विमानिता । | शप दिया ह श्रथवा किसी मनुष्य ने इसका श्रपु 
मान क्रिया हे "जो इसका सुख च्रांुश्ों की धारसे ,, 


बाणवारिररिषिन्ि्ं 6 यतो एखम्‌ ॥१५७॥ भीगा दश्रा है ॥ १७॥ तव कलि ने कौतुकवेश इस 
ततः स दध्यो सुचिर तमयं कातुकात्‌ क्तिः । चात को जानने ॐ क्तिये बहुत देर तक ध्यान किया 
ज्ञातवांध प्रभाषेण समाधेः स॒ यथातथम्‌ ॥१८।॥| शौर ध्यान के भ्रमाव से यथां चातको जान लिया 
पुनः स चिन्तयामास तद्जनाय युमः कलिः । व फिर उस ब्राह्म की ् जानकर उसने 
ममोपपादितं गरत्‌ ् कटा के उस ब्राह्यश॒ { वड उप 
म साधु भाग्यरेतत्‌ पराकृतः ॥१६॥ तिया तथा ये भेर पजनम के परय से दसा इत 
मयेपा सानुरागेन बहुशः भार्थिता सती । | दै ॥ १६॥ पदिले मने बडे प्रेम से इसकी चाद की 
निराकृतवती सेयमद्य प्राप्या भविष्यति ॥२०॥॥ थी परन्तु शसने मेरा अनादर किया, श्रव यद सुमे 
"गुप सालुरागेयं तत्र॒ कद्रपथारिणि। | म होम ॥२०॥ यह मनुष्य पर आसक्त इई है 


इसलिये यदि मेँ उसी मचुप्यकासा स्प धारण 
रस्यते मस्यसन्द्ं कं कालेन करोमि तत्‌ २१॥| करलं तो यद निस्सनदेद सुस मेम करेगी ॥२९॥ 
माकेरडेय उवाच 


माकंएडेयजी वोले-- 

श्ास्ममभावैण ततस्तस्य रूपं द्विजन्मनः | तव ध 1 
ला चचार त्रासते निपएणा सा बरूथिनी ॥२२।|| ॥२२॥ वष्ट भ 
सा तं द्र वरारोहा किञचिदुतूफलोचना । | सित नेच दोकर उसके पास ध्राकर ' कहने लगी 
समेत्य प्राह तन्व्गी प्रसीदेति पुनः पुनः ॥२३॥ कि सु पर प्रसन्न हो जाघ्नो ॥ २३॥ तुम्हारे छोड़ 
त्वया त्यक्ता न सन्देहः परित्यक्ष्यामि जितम्‌ । ध पर ६ व का 4६ (२ 
नाः मालो मित १ वु 
मया समेत्य रम्येऽरिमन्‌ महाकन्दरकन्धरे । 

मत्परिज्राणजं पम्ममवश्यं प्रतिपत्स्यते ॥२५॥ 

श्रायुपः साकदेपं मे नूनमस्ति महामते । 


कन्दरा मे यदि मेरे साथ मेरे प्राणोकी सत्ता कसेगे 
तो तुमको वड़ा धमं दोगा ॥ २५॥ हे मदान्‌ बुद्धि 
मिद्टत्स्तेन -नूनं तं हृदयाहादकारकः ॥२६॥ 
कलिखवाच 


वाते ¡ निश्चय मेरी श्चायु समाक दोने वोद 
जो मेरे श्यानन्द देने वाले तुम मुभ से ब्रूटते 
करि करोमि त्रियाहानिभेवत्यत्र सती मम । 
त्वमप्येवंविषं वाक्यं व्रवीपि तसुमध्यमे ॥२७); 


नदीं दो ॥ २६॥ 
प्ददः सङ्टं पप्तो यदन्रवीमि करोषि तद्‌ । 


कलि वोल्ल- 
हे खन्दरी! जो तुम णेसा कदतीदो तो वतोश्रो 


मेस कौनसी क्रिया की डानि होगी ॥२७॥ सुभे यद 
हैकिञो लं मे कट उसको तुम करे तो 


२३२ भाद॑रुडेयपुराख द्म० ६३ 


„.--------------------------------------------------- ~ ~ --~---------------~-~---~---~~--- 
--~-~--~----------- -----~ 


यदि स्यात्‌ सङ्गमो मेऽ भवत्या सह नान्यथा २८। मेरा श्रौर तुगहाय संखगं दोगा श्रन्यथा नदी एन , 


वरूथिन्युवाच वरूथिनी कोली. । 
परसीद यदू्वीपि लवं तत्‌ करोमि न ते पूपा । घ्रा धरसचर हो । जो छ्‌ तम कडोगे वदी मँ 


॥ करू गी, इसमे अट नही है । जो कायं भुसे +, 
त्रवीम्येतदनाशङ्कय यतर्‌ ते काय्य सयाघुना ॥२६॥| श्रशक्य हो उखक्तो मी कटो म करूंगी ॥२६॥ ` 


कलिरवाच कलि वोल्ला- ववा 

नाच्च सम्भोगससये ्टव्योऽदं त्वया घने । हे छन्द ! सम्भोय के समय तुम र बन्द ^ 

निमीलिता्याः संसर्मस्तव सुप्र मया सह ॥३०॥ रख कर खम को न देखो तो भे होसकता दै ॥ ` 
बरूथिन्युवाचं वरूथिनी वोली-- 


तिः ४ श्रापका कल्याण दो, जो श्रापकी इच्चादै वदी. 
एवं मवतु भदरं ते यथेच्छसि तथास्तु तत्‌। | म करूगी । जँ एस समय सव प्रकार से श्मापकरे ` } 


मया सव्वं प्रकारं हि वर स्थेयं तवाधुना ॥२१॥ वशम ह ॥२९॥ 
इति श्रीभाकर्डेयपुराण मे स्वारोचिप मन्वन्तर नामं रवां ० प्रमाप्त } 


~ सवरप ० - 
तिरेसटवां अध्याय्‌ 

माकँरडेय उवाच माक॑रुडेवजी वोत्त- श, 

ततः सह तया सोऽय रराम गिरिसादुपु । वह गन्धर्वै वरूथिनी ॐ साथ पटा, किनार्यो, 


फष्कानतदहूय षु मनोनञेषु सरयु उ॥१॥ फूल हण वनों शरीर मनोहर सयोबरां मे विददार , 
कन्दरेष च. रम्येषु निभ्नगायुलिनेप्‌ च । करने लगा ॥ १॥ हे बाह्मण ! चद रमणीक क्व्‌ 
ॐ < 61 


रायो, नदियोँ के किना तथा न्य मनोहर देशो ५ ' 
मोक्षेषु तथान्येषु देशेषु छदितो द्विन ॥ २॥| म भसन होकर रमण करने लगा ॥ २॥ मोग के 


हिनाधिष्ठितस्यासीदुयदसूयं तस्य तेजसा । क त्ख बन्द कर जेत श्रौर अश्च. 
शरचिन्तयद्वोगकाले निमीलितबिलोचना ॥ ३ से श्रधिष्ठित उस बाह्म की वेजमयी मूर्तिं का ` 
ततः कालेन सा गर्भमवाप॒ुनिसततम । | ध्यान करतौ ॥ २॥ दे कोक सुनि ! ऊ काल 


गती ली निन्त घराह्मणरूषी गन्धर्वं करे वीर्यं से बरूथिनी ने गर्भं 
ॐ रपं चिन्तनाच्च द्विजन्मनः ॥ ४॥| धापन किया ॥ ४॥ उस गर्भवती. वूथिनी को 


तां ग्षारिणीं सोऽथ सान्तयित्वा वरूथिनीम्‌ | | सान्त्वनः देक त्राण रूपथासी बद गन्धर्वं उसे ` 
विभरूपथरो यातस्तया भीत्या भिसर्िनतः ॥ ५।|| भीति पूवे विखजिन होगया ॥५॥ गम की अवधि 
जरे स बालो घ्‌ तिमान्‌ उथलननिव विभावसुः । पूणं होने पर जिस पकार सस्यं सकल दिशा्चोको , 


व प्रकाशित करते द उसी थक्रार कान्तिमान्‌ प्क पुश 
स्वरोचिर्भियथा सूयो भासयन्‌ सकला दिभः ६॥| उत्प हृशरा ॥ ६॥ जिस पकार श्रपने तेज से खयं 
स्रोचिर्भियतो भाति भास्ानिव ख बालकः । प्रकाशमान्‌ होते ष उसी प्रकार बह वालकः तेज 


ततः स्वरोचिरतयिषं नाम्ना ख्यातो बभूव सः॥ ७ ॥| यकत हश्रा । इसी कारण बह खयेचि नाम से; 
वये च महामागो षयसाचुदिनं तथा 1 ` विख्यात इमा ॥ ७ ॥ जिस प्रकार चन्द्रमा अपनी 


॥ ` | कलाद्मों से दिन दिन वडा है उसी ` प्रकार - व 
शुणौपेशच यथा बालः कलाभिः शशलाञ्चनः॥ ८ ।॥| वालकः अवस्था वथा गुणो मे दिन प्रति दिन वढृने 


स जग्रा धलुववैदं॑वेदाैव मनना यथाक्रम । | लगा॥८॥ बह भाग्यवान्‌ चालक धटुर्ेद,वेद तथा 

विधायैव महाभागस्तदा -योवनगोचरः; ॥ ६।| क्रम से विचा को पठकरः यौवन सम्पन्न हु ॥ ` 

मन्दु कदाचित्‌ स षिच्रंधारुचेष्टितः । | मन्दराचल परेत पर विचरते इण उसने }मरयभीत 
_ ददशकां तदा कन्यां गिरिमस्ये भयातुराम्‌ ।॥१०॥ हरै यक कन्या को पूवद देश मे देखा ॥ १०॥ 


भ्रण ६९ ३० .“ साकए्ठेयषुंराण : २३२ 
त्रायस्वेति निरीप्यैनं सा तदा बाक्यमन्रवीत्‌ । ` ¦ बह इसको देखकर बोली नि मेरी रकता करो दस 
र | ' `  . | पर बह उस कन्या से जिसकी भय से भासं बन्द 
मा पीरिति स भह भयषिप्लुतलोचनाम्‌ ॥१९। हो रदं थीं बोला कि तुम मत उरो ॥ ११९॥ उस 
किमेतदिति तेनोक्तं वीरवाक्ये .महास्मना । ` | महात्मा खरोचिष के 4 पुने पर 
। करि क्या प र 

ततः सा कथयामास र्वासाकषप्लतक्षरम्‌ ।॥१२।| अस भेकी यत श ते इय असप 
कन्योचाच कन्या वोली- < , 
अरहमिन्दीवरास्य घुतां विचांधरस्य वै। |, ५ वरात नाम बिदाधरी वेटी मनोरमा 
। ह ओर मेरी मां मरुधन्वा की वेदी है ॥ १२॥ मेस 
नाम्ना मनोरमा जाता सुतायां मरेधन्वनः ॥१२ | विभावरी नामक ससी मन्दार चिचायर की पवी 
मन्दारविश्राधरना सखी मम॒ विभावरी ! | चौर दृखरी कलावती पारसुनि की कन्या है ॥श४ा 
कलावती चप्यपरा सुता पारस्य वै शुने; ॥१४ | उन व साथ ० पर ५ 

ध „ हपट वहां मेने पक सुनि को देखा जिनकी आः 
ताभ्यां सह मा यातं कलासतरुचमम्‌ , -[वान्याति जति व मोर ज दया 
तत्र द्छर धुनिः कशचित्‌ तपसातिेशाकृतिः । | तथा जिनका करढ भूख प्यास से सूखा हा श्नौर 
ुतक्षामकण्ठो निस्तेना दरपाताकितारकः ॥१५। ५ गदहेमें शी ५ थीं ॥१९॥ उनको देखकर 
| वीनि सुमे हंसी राग जिससे उन्दने क्रोधित होकर 
मयावहसितः 2 तदा शशाप ह । | इशे.चमननसे हे संप ए सर भौर दोडे ष 
भामक्षामस्वरः (क्वत्‌ कन्िताधरप्वः ॥१६९॥| शाप दिया ॥ शा हे दुरे ¡ जो कि त्‌ सुभे देखकर 
त्वयाबहंसितो यस्मादनाय्ये दुष्टतापसि । | दंसी है इसतिये बहुत शीघ्र तुमको पक 9 राच्तसे 
तस्माद्‌ लांमचिरेणेव राक्षसोऽभिमविष्यति ॥१७॥| भक्षण करेगा ॥९७॥ सुमे शाप देनेपर भेरी सज्जिय 
ते शरे मलयस्य स तु नरिती धनि; ने मुमि फी निन्दा फी श्रौर कदा कि तुम्हारे ब्राह्म 
दतश्र २९151181 तु ध ए र नः | रत्वेको धिकार है कि तम म्तमा नदीं हि, तुमने 
धिक्‌ ते ब्ाह्मर्यमक्षान्त्या कृतं ते निखिलं तपः॥ १८ दथा दी तप क्रिया ॥१८॥ मालुम होता है किं तुम 


दमर्पौरवषतो नातिकर्धितः क्रोध से टी कीर होरदे हो तपसे नदीं । मावान्‌ 
ऽसि तपसा तः । होना दी ब्ाह्यरत्व है श्रौर क्रोध का नियन्त्रण 


# भ, # [| ह | तप ४ 
्न्त्यास्पद्‌ चर ब्राह्मण्यं कोधसंयमनं तपः ॥१६॥ करना तय द्े॥९९॥ यद नकर उस अभित मनसी 
एतच्छुत्वा दंदौ शापं तयोरप्यमितचू तिः। | शुनि ने उन दोनो को भी शाप दिया कि धक को 


एकस्याः हृष्ठमङ्गेप भाव्यन्यस्यास्तथा क्षयः॥२०॥| इष शौर दूसरी को य रोग होगा ॥ २०॥ उसके 

तयोस्तयै र योक तेन तत्‌ । ` उसी क्षणे कहते दी वे दोनों छुट चनौर क्य रोगसे 
र] ५ तज्जात य सवत म तत्क्षणात भ्रसित दोग छरीर मेरे पीेभी यह महान्‌ रात्तस 
ममाप्येवं मददरक्षः सयुपेति पदानुगम्‌ ॥२१।॥| चला शाता है ॥ २९१॥ कया भाप उसके गर्जने 


न शृणोपि महानादं तस्याद्रेऽपि गज्ज॑तः । 1 को 1 व श्रि 1 
¡ यन्मेष्षठ यह मेरा पीदा ची छीडता टं ॥ २२॥ पाष 
दतीयमन्र दिवसं यन्मे पृष्ठ न एति ॥९९॥ सम्पू खों का हदय मौजूद दै "। .दे मदामते। 


। ५ हुदयग्रादमय । ष ५, म 
थरसग्रामस्य॒सच्स्य॒हृदमगराद ते। | इस मै.आपको देती है, आय इस राक्तससे मरी 
तं भयच्ामि मां रक्ष रक्षसोऽस्मन्महामते ॥२२॥ रका करे ॥ २३.॥ स हृदय को सव से पदिले 


प्रादाद्‌ स्वायम्शुषस्यादौ खयं ररः पिनाकषक्‌। पन्या कथ गददेवषी ९ 
2 दत्तवान्‌ ॥२४॥ दिया था श्रौर खायंम्भुव ने द य वशिष्ठ 
1 का शा व जीं को दिया ॥२४ ॥ बशिष्ठजी ने ' यद मेरे नाना 


तेनापि दतं न्मातुः . पितरे चव्राुधाय ष । ६ चिचायध,को दिया जिसने मेरी माता के .विवाद 
भादादौ द्ादिकं सोऽपि मिवे श्वरः सयम्‌।।२५। | भ इसको मेर पिता,को.पिया ॥ २५॥ देवीर [मर 
मयापि शितं वीर संाशाहंबालया पितु; । | पिता ने सको समे वाल्याबस्या मे ही दे दिया । 


२३४ माकुशेबषुराण श्रद्‌ ` 


~~~ 
<~ ~ ~ ~~ ~ =-= ~~ 


न ॥| यद सम्पू खों का हदय ज्र शंके नाण 
य सकलास्ाणामशषरिषुनाशनम्‌ ॥२६॥| करने बाला म ते इसको "जो समर 
` तदिदं गतां शीघ्रमरेषाक्लपरायणम्‌। | भद्रो ५ ह है आपं ध कीजियि श्रौर 
दरस्थानं ब्रह्मण केशाप के कारण श्रये ` इण इस दु 

ततो जहि दुरात्मानमेनं ब्रह्मसमागतम्‌ ॥२७॥| क्षो मारिये ॥ २७॥ न 


माक॑रडेय उवाच भार्करडेयजी वोक्ते- र 
तथेत्युक्तं ततस्तेन ्र्यपसपृश्य तस्य तत्‌ । यद ककर उसने हाथ मे जल लेकर श्रसोके 


्रहराणां हृदयं पादात्‌ सरहस्यनिभरनम्‌ |२८॥ ददय को उसके रदस्य निवतेन सि सन 
स्मिजन्तरे भीषणाषतिः | ॥ कोद दिथा॥२८॥ इसी अव्र भ बह भीषणं 
एत रकषस्तत्‌ तदा त 


नरमानो महानादमाजगाम त्वरान्वितः ॥२६।॥ दी वहाँ आ पड्चा ॥ २६॥ सुम से भयभीत इ 
मरयाभिूता कि त्राणयुपैति द्रुतमेहि मे। कोईभी तेरी रक्ता नदीं करेगा, शीष मेरे पासश्रा 

०4 जिससे मै तुे खाऊ । इस प्रकार योलते हुए उस 
भक्षाय रिं चिरेणेति नुषाण त॒ ददश सः ।*२०।|| को स््रोचि ने देखा ॥ ३०॥ उसको पास श्राया 
सखरोचिशिन्तयामास शटा तं सषुपागतम्‌ | | इरा देखकर स्वरोचिने सोचाकि यदि इसको यह 


4 ४ -रा्तस पकड़ ले तो महामुनि का वचन भी सत्य 
एहालेष वचः सत्यं तस्यास्ति महाुनेः ॥२१॥| होजाय 1३९॥ उस रा्तस ते शीघ्री उस मनोरमा 


शुपेलना ¦ के पास आकर उसको पकड लिया श्रौर वंह 
राह सपना ५ सोऽ ५ सुन्दरी करणा पूर्वंक विलाप करने लमी.कि “मुमे 
आरा ब्राहीति करणं विलपन्तं सुमध्यमाम्‌ ॥३२।|| वचाय, सुमे वादये? ॥३२॥ तव स्वरोचि ने द 
ततः स्वरोचिः संुरण्टाखमतिभेरवम्‌ | | भीपर्‌ ररुडाख को शीघ्र उस राच्चस 
¡ निवेश्य तद्रक्षो ददशनिमिषक्षणः ।॥३२॥ र चला दिया ॥ ३३ ॥ उससे डरकर निशा-५ 
शं स॒ तदा ताुतज्य निशाचरः । | चर ने मनोस्मा को चछोद्दिया शौर बह कनेलगा ८ 
५ ध कि आप प्रसन्न होकर इस श्रख को शान्त करे 
भसीद्‌. शम्यतास्नं॑शरयतान्पेत्यभाषत ।४॥ | रौर मेरी वात खे ।३४॥ दे महान्‌ तेजस्वी ¡ सुभं 
` मोक्षितोऽ्ं लया शपादतिधोरान्मदा्‌ ते। | को तुमने बुद्धिमान्‌ बरह्ममिच के दिये हट अरतिघोर 
' भरदत्तादतितीत्रेस ब्रह्मित्रेण धीमता ॥३१५ । शाप से चरा लिया ॥ २५ ॥ हे महाभाग ! तुमसे 
। उपकारी न मे त्तो महाागािकोऽप्रः । | अधिक मेय र कोद उपकारी मदी है जो कि ` 


तमने महान्‌ शाप के घोर कसे मुभको 
1 येनाहं सुसहाकष्टन्मदाशापाद्विमोक्ितः ॥२६॥॥| करिया हे ॥ २६।॥ 1. 


{ च स्वरोचिरुवाच स्वरोचि बोले `` - . ४ 

६ बर्मिव्रेण निना किं निमितं महात्मना । महातमा ब्रहममिन्रं ने तुमको किस काररते शाप . 
2 शत्स्त्वं कीटशथेव शापा दत्तोऽमवद्‌ पुरा ॥२७॥| दिया था यद कदो ॥ २७॥- ` 

{ राच्तस उवाच रात्तस वोला- 


1 च्छि्माु्दमथीतवान्‌ |, |. वामर रह्मि शरङ्ग सटित आायुदश्नोर ~: 
क तरयदशाधिकारः भृहयाथव्दणो द्विन; ॥३८॥ तेरो अधिकार खदित अथव्ेद्‌ का अध्ययन 
` अरहेन्दीषराकषति रूयातोऽस्या जनकोऽपवम्‌ । | किया है ॥२य मै इन्दीवराक् नाम इसं मनोरमा 
त विद्याधरपतेः पुत्रो नल्तनाभस्य सदधगिनः ॥२६॥| का भता नोर विद्याधये के पंति नलनाम का 
१ मया च याचितः पू वहमिवोऽभवन्युभिः । | $ ५।९.५न पदिते हामिच सुनि से. याचना , 
` श्ायु्ैदमरेषं मे भगवन्‌ दातुम॑सि ।४०॥ क ह भगवन्‌ ! अणुतेदफो सम्ूतः सुभे 


ह रो ५ पद्ये ॥ ९० ॥ हे वीर ! यदपि ने उनसे चहुत 
य त॒ बहुशो वीर भयाेनतस्य मे । | श्रयुनय निनय पढने के क्ये किया परन्तु न्दोनि 


 अ० ६ माकएरेष्टरख २३५ 


न प्रादाहयाचितो विधाभायुर्येदातिकां मम।॥४१। सुमे शायद न पदाथा ॥४९॥ हे निष्पाप स्वरोचिः! 
गिष्येभ्यो ददतस्तस्य मयान्तर्थानगेन हि । जव घ गिष्योँ को पटति थे उस समय श्रन्तधान 
आु्वैदाल्मिक विचा रहीताभूत्‌ तदानच ४२|| दोकर मने उस श्ारवेद विया को प्रा रिया 
दीतायान्तु बिायां ासैरषठमिरनतराद्‌ । | धिपे ह रटकर नि शराढ महीने भ बह तिया पद्‌ 
ममातिदपादभवद्ध सोऽतीव पुनः पुनः ॥४३॥ र र 1 
भत्यमित्नाय मां हासन्ुनिः फोपसमन्वितः । | सममः गये श्र ऋ्ोघसंयुक्त कम्पिते शरीर हयेकर 
िकेम्थिकन्धरः माह मामिदं परुप्षरम्‌ ॥४४॥ कठोर शब्दो मे कहने लगे ॥४४॥ दे दु्दधि! राच्तस 
राक्षसेनेय यस्मान्मे त्वयाश्ट्येन दुमतिे। | की तरद तृने ्रदश्य होकर धिया पड़ ली दै रौर 
हृता पिद्याबहासथ मरामवङ्गाय यै इतः ॥४१।॥| श्रव तू सकर मेस श्रपमान करता दै ॥ ४५॥ इस 
तस्माद्‌ लं राक्षसः पाप भच्दापेनं निराछरेत! । | लिये त्‌ मेरे शाप से सात रातके भीतर प्कदादण्‌ 


भयिप्यसि न सन्देह; सप्त रात्रेण दारुणः ॥४६॥ राकस द्ोजायगा ॥४६॥ उनके पसा कटने पर भने 
। परराम श्रादि श्रद्धेनय विगयसे उनको प्रस किया , 


इत्यते प्रणिमाताय् सुपारः मसादितः। | तो फिर कोमल दय होकर सुनि े युस कडा ' 
स॒ मामाह पनर्विमस्ततक्षणान्पृदुमानसः ॥४७।॥ ॥४७॥ दे गन्ध } जो मेने कदा हे बह तो श्नवश्य ` 


यन्मथोक्तमबयं तद्रापि गन्धन्वं मान्यथा । | दयेगा, परन्तु तुम व ४ सवर । 
लं स्यं भाप्तयसे वए॥1४८ शाप्त करोमे ॥४२॥ श्चपनी स्यति को धं 
लं रो 4 चश होकर जच तू श्चपनी लडकी के खानेको उदयत ` 


नषटसृतियंदा कुद्धः खमप्त्यं चिखादिषुः । दोगा तव किसी के श्चस्र की अधिकेतापसे तेण , 
निशाचरं गन्ता तदस्रानलतापितः ॥४६॥ राक्सपन वला जायगा ॥४६॥ फिर दोशमें श्राकर : 
पुनः संक्ामपाप्य सखामयप्स्यसि निजं बदु; । | त्‌ पने शरीर को प्रा करेगा शरीर गन्धवेलोक 
तर्येव स्मप्रिष्ठानं ल्लोके गन्धर्नवसंभनिते ॥५०॥| को ज्यया ॥ ४० ॥ दे महाभाग ! तुमने सुमे इस 
सों खया महाभाग मोधितोऽ्मान्दाभयात्‌ । | स्तसत्व रूपी मद्यभय से सुक पिया टै इसलिये | 
निशाचरत्वाहूयद्रीर तेन मे पार्थनां कुर ।५१ श्व मुभे वर मगो ॥५९॥ इस कन्या को तु ; 
इमां ते तनयां भाग्यं पयच्छामि भतीच्छताम्‌ ] देव दे महरकये जर अर्ह सित शायद - 
श्रायुव्येदश्च सकलस्परषटङ्गो यो मया तृतः | | # 
युनेः सकाशात्‌ सम्मापस्तं गृीष्य महामते ॥५२॥ 
माफरडेय उवाच मादरुडेयजी वोले-- 


इत्युक्सया तं धियां स च दिव्याम्बरोज्ज्यलः। यह कहकर उस्ने वह विद्या सवरोचि को दे ॥ 
त्युक्टया प्रददा धियां स चदि ञ्ज्य त वालो ओर शामूमस आदि 


, सरगभपणधसे दिव्यं पुराणं बृधुरास्थितः ।५३।॥ धारण करके पूववत्‌ श्यपने गन्धर्वं रूप म. भकर 
र धियां ततः. कन्यां स ` दातुधषचक्रमे । हयोगया ॥५३॥ उस विया को देकर कन्या को देने ¦ 
१ दषु का जव सन्ध ने घ्रायोजन किया तो वह कन्या 
तमाह सा तदा कन्था जनितारं स्वरूपिणम्‌ ।॥५४।| श्रपने पिता से कटने ली ॥ ४४॥ हे तात प इस ; 
शरनुरागो मयाऽ्प्यत् तातातीव महात्मनि । | मदत भ जो किं मेरे विशेष उपकारी द दशन स 


णंनादैव विकरेपेसोपकारिशि ` ही मेरी भीति धोगई५५॥ किन्तु मेरी दो +| 
दशनाद सज्ञतो . विरेषेणोपकारिणि ॥५५॥ क 111 


विम्लेपा मे ससी सा च मते दुःखषीडिते । | को इख श्वस्था म छोडकर मोग विलास करना, 
अतो नामिह्षे भोगान्‌ मोकतुमेतेनं वै सभम्‌ ॥५६॥॥ नदी चादती ॥ ४६ ॥ देसी निदैधता तो पुष्य भी 


जो भने सुनि सते पटा दै वह भी रहए करो ॥ ५२॥ 


२३६ माेर्डेयपुराख श्रध | 


चैरपि नो शक्या करचमित्थं बरशंखता । करने को समर्थनदीँहे ज्स्मिमेतोखीर्हैजो 
पमावरचिरेमासक फथं योषित्‌ करिष्यति ॥५७॥ स्वभाव से ही कोमल होती दै ॥ ५७॥ दे पिता ! 


हं ययाच दुला मत्ते इन्यमे पित होगरई है उसी तरह म भी उनके दुःख की शोका 
था स्थास्यामि तदृदुःते तच्योकानलतापिता५८॥ प जलती हई स्थित रमी ॥ ५८॥ 

स्वरोविरुवाच ४ स्वरोचि वोक्ले-- - 1 
1चुर्व्ददमसादेन ते करिष्ये पुनन | हे खन्दरी ! त॒मःशोक को छोड़ दो, आवद 
3 = कं हं क प्रसाद से मेँ तुम्हारी दोनों सखियों का नया 
[रयौ तव महाशोक सयुत्छन सुमध्यमे ॥५६॥ जीवन कर दगा ॥५६॥ , | 


माकैरडेय उवाच माक्रर्डयजी वोले- = = + 
तः पित्रा स्वयं दत्तां तां कन्यां स विधानतः | "| ` फिर पिता ने उस कन्याको विधि पूरवैक पदान 
किया श्रौर स्वसेचि ने उस सुन्दरी से उसी परैत 


येमे गिरो तस्मिन्‌ स्वरोबिशारलोचनाम्‌ ।।६०॥ पर बिधि पूर्वक निवा किया ॥ ६०॥ उस कन्या, 
{्तन्तु तां तदा कन्यामभिसान्वय च भाविनीम्‌ | को प्रदान करने के वाद्‌ गन्धं ने उस भाविनी 


को ्रनेक प्रकार से सात्वना दी श्नौर श्प दिव्य 
गमाम दिव्यया गत्या गन्धच्व; स्वपुरं ततः ॥६१ गति से गन्धर्वलोक को चला गया ॥६१॥ स्वरोचि 


प चापि सदितस्तन्वथा तदुद्यानं वदा यौ । | भी सुन्दरी सहित स उदयानमे गये जँ मनोरमा 

= की दोनों सिया सुनि के शाप से रोगयुक्त इश 
हन्यकायुगल पत्र तच्चापात्‌ तु गदातुरम्‌ ॥६२॥| पदी थी ॥६२॥ फिर महातमा स्वरोचिने रोगनाशक 
ततस्तयोः स त्वक्ञो रोगघ्रेरोषधे रसे; । | श्रौपधियों ॐ रसस उन दोनों सख्यो का शरीर 
वकार सीरुने देहे खरोधिरयरानितः ॥६३।॥ नीरोग कर विया ॥ ६३॥ रोगरदित दोनेके कारश - 
तोऽरिशोपने भन्ये प्ते वयाधः शभे । | च वोन सिया सतयन शोभित ने लभी, श्र , 


वी उन्टोने अपनी कान्ति की ज्योति से उस पवैत को 
घकान्त्योदयोतिदिग्मायं करति तन्महीधरम्‌ ६४।॥| सव दिशां मे भकाशित कर दिया ॥ ६७॥ ` 


इति श्रीमाकरडेय० मे स्वारोषिष मन्वन्तर (२) नाम ६२बाँ अ समाप्त । 


"ध 4- ; 
चोंपटबोँ अध्याय 
माकंरडेय उवाच माकरडेयजी वोले- 


एवं व्रिक्तरोगा तु कन्यका तं बुदान्विता | ् वे ४ सिया तेग से दछूटगरई' श्रीर उनमें 
चेदं गि एक ने प्रसन्नता पूवक ` स्वरोचि -से कहा,“ 
स्वरोचिषा शव वचन भमा ॥१॥ पभो ! खनो ॥२॥ यैं मन्दार नाम विद्याधर की 
मन्दारवि्ाधरना नाम्ना ख्यातां विभावरी | कन्या विभावरी, आप उपकारी ह दसल्िये अपने 
उपकारिम्‌ स्वमात्मानं भयच्छामि भरतीच्छ माम्‌ ॥२।॥ भे. शरपके खमपेण. करती ह, आप सुमे स्वी 
विदश्च तुभ्यं दास्यामि सर््भूतर्तानि ते। | कार कर ॥२॥ मे आपको प्क विद्या भौ देती ह 


जिससे सव जीवों की बोली का ज्ञानं श्रापको हो 
पयाभिच्यक्तिमेष्यन्त पसादपुरगो भव ॥३॥ जायगा । राप सुंफपर प्रसन्न हो ॥२॥ 
ू मा्क॑रडेय उवाच , | माकरडेयजी वोक्ते--: 
एवमस्त्विति तेनोक्ते धम्मन स्वरोचिषा | उसके इख प्रकार कटने पर धर्मात्मा -खरोचि 
दितीया हु तदा कन्या इं ~, , , | ने उससे “प्वमस्तु" कदा ्नौर.उसे अङ्गीकार करं 
“ता ठ तद्‌ कन्या इदं वचनमप्रवीत्‌ ॥ ४ ॥| लिया । दूसरी सखी भी इख परकार.कदतेक्वगी ॥९। 


व 


जिस तरह वे दोन सखियां मेरे कारण दुःखित . ` 


श्रः &8 माकंरडेयपुराणं २३७ 
कुमारजरह्यचा्यासीत्‌ पारो नाम पिता मम । | दे डमार ! वेद बेदाङ्ग के जानने बाले, माभ्यवान्‌ 
जह्यर्षिः सुमहाभागो वेदपेदाङ्कपारगः ।॥ ।। जहपि बरह्मचारी पार सुनि मेरे पिती द ॥५॥ एक 
तस्य पंस्कोकिलालाप-रमरीये मधौ एर । समय फोकिलों कीं ध्वनि से परम रमसीक पसंत 
आनगामाप्सराभ्यासं परयाता पुलिकस्तना ॥६। चठ मं पविकस्त नाम श्रष्सरा उनके पास पाह ॥ 
कामवक्त्यतां नीतः स. तदा यनिषुङ्गवः । | उस मदापन॑च पर कामासक्त होकर सुनिने उससे 


तत्संयोगेऽ्युतपन्ना तस्यामन्र सहाचले | ७॥ ध व भौर उख मेरा जन्म हश 
भको उस निजन यनं मे जहा सपं जीर 

विहाय मां गता 
हाय मां गता सां च मातास्मिन्‌ निञ्जने षने।. | सिह भरे हए ये, पृथ्वी पर श्रफेला छाडकर मेरी 


बालमेकां मरीपएष्ठे व्यालश्वापदसंङले ॥ ८ । | माता चली गई ॥ ८॥ फिर जिख तरह चश्मा 
तेत्ः कलाभिः सोमस्य ्ध॑न्तीभिरक्षयम्‌ । कलाओं खे दिन-दिन बढ़ता है उसी तरह भै इद्धि 
आष्यास्यमानाहरह्टे दि यातास्मि सत्तम ॥&£ को पपत होती गई ॥ ६॥ दसी कारण मेरे पिताने 
सतः फलाषरीत्येतन्पम नाम सहात्मना | सेरा नाम कलाचती रका न्नौर इसके चादि" सुभा 


न एक गन्धर्र फारने फे लिये पिता से मंम कर. कते, 
एीतायाः, कृतं पित्रा गनध शुभानना ॥१०॥ गया ॥१०॥ फिर मेरे पिता से णक रास ने. सुभ 


न. दत्तां तदा तेन याचितेन मदात्मना । | माँगा । उनका न देते पर उस स्ठसे उन्हे सोते 
देवारिणा्तिना शस्तो मे घातितः पिता ॥११।॥| समय शूल से मार डाला ॥ ११॥ इससे मै रति 
ततोऽहमतिनिव्वैदादात्पव्यापादनोधता } नियर होकर श्रातसमधात.करनेपर उद्यत तोउसं 


समय शिवजी की पत्नी सतसीने मुकको पेशसा करे 
निवारिता शम्धपल्या सत्या सत्यमतिभ्वा ॥१२॥| से रेका ॥६२। ह न्दे तू सोच मत कर ते 


मा शचः सुभ भर्ता ते महाभागो मषिष्यति । | खामी महाभाग स्बरोचि दोग श्र उनके पुत्र भयु 
स्वरोचिनौम ` पुत्रश्च मलुस्तस्य भविष्यति ॥१३॥॥ दंगे ॥ १३१ दे शमे ! सम्पूणं निधियां तेरी ता 
प्माङ्गाश्च निधयः सव्व करिष्यन्ति तवारताः को मनेगी जओौर तमको मनवांधित धनादि देगी ॥ 
यथाभिलषितं वित्तं भरदास्यन्ति च ते शमे ॥१४॥| मपश्च से पज्ित पञ्चनी, नाम विचा दनद देती| 
यस्था बस्ते भमावेण वियायास्तां गृहाण मे ! | है, श्छको रहण करो, इसी निया. के प्रभाव से 
पद्निनी. नाम ¦ विद्ययं. बहापृदमाभिपूनिता ॥१५॥| खव निधिथां तुम्हारी होगी: ॥२५॥. सत्यपरायसा 
हव्याह, मां दक्षसुता सती सत्यपरायणा , दष्ह्न्या खनी ने.मुभसे पसा कदा था। स्वरोचि| 


था ॥१६।॥| निश्चय ही तुम हो । देनी असत्य नरह कद ~ ०॥ 
स्वरोचिस्तव ध्रवं देवी नान्यथा सा वदिष्यति॥१६ 1 


साहं पराणएमदायाब्र तां चिं स्वं तथा वुः! | शरीर को मै आपके रपर करती ह । श्राप 
प्रयच्छामि प्ररीच्छं त्वं प्रसादसुगुखो मस ॥१७।॥ कार करके सुमपर प्रसन्न दो ॥ १७॥ ` - 
भाकीरडेय उवाच माकरड्यजी चोल्े- ॥ 


तामाह च त॒ कन्यां कलावतीम्‌ | स्वरोचि उस कन्या कलावतीसे -बोल्ते कि पेस्ट 
व द दोगा ! विभादसी तथा कलावती के लिग्ध भेम 


विभावस्य; रलावत्याः स्निगद्टयातुमोदितः१८॥ स्वरोचि बहुत प्रसक्त हप ॥ १८ ॥ देवताश की < 


$ { कान्ति वाले स्वरोचि ने उन दोना े खाथ ˆ ५। 
अ. पाणी स तवोरसि क्रल्िया ! उस विवाह में देवताश ने वाजे वजार 


नदत्सु देवतुथ्यष मृत्यन्तीषप्परःपु च ॥२१६॥ प्रर श्रप्सरायं लाची. १६॥ 


इति श्रीमाकंण्डेयघुराण म स्वरोचिषमन्व॑न्तर (३) नाम ईय अध्याय समाप्त । 
[छ - कक 4८ = 7 


0 


"~~ ^~ 


२६८ माकेशडेवपुरांण - ध ६५ 


पेते अध्याय 
`. माकरडेय उवाच मा्क॑रडेयजी बोले-- . वह 
ततः स तामिः सहितः पत्नीभिरमरघ तिः । इसके वाद्‌ वह देवताश की सी काम्तिवाला 


9 ५१ स्वरोचि उन सियो के साथ उस पेत पर तथा- 
रणम्‌ तस्मिन्‌ शद्रे रम्यकानननिभरे ॥ १। अन पौर भरनो मे विहार करनेलगा ॥९॥. उपमोग 


सव्वोपभोभरत्नानि मधूनि मधुराणि च। र रल, अष शीर मधुर उनके १ 
॥ (विः ( पर्चिनी विद्या के प्रमावसे सेव निधियां वश वर्तिनी 
निधयः सपाह; पञिन्या वशिनः ॥ २ ॥|| होकर उपस्थित करती थीं ॥ २॥ माल, वख, 


सनो वल्नाएयलङ्कारान्‌ गन्धाल्यमनुलेषनम्‌ । | अलङ्कार, गन्ध, चम्दन आदि लेप तथाः सोने के 


न च्छया वने हए सुन्दर श्राखन तथा अन्य वस्तुः जिनकी , 
रासनान्यतिद्चभ्राणि काश्चनानि य ॥३॥ ए कसते थ॥ सोन वतन तथा नान 


सौवर्णानि महाभाग करकान्‌ भाजनानि च । | यकार की श्या रीर परोत सब बसे उन 
तथा शय्याश्च विषिधा दिव्यरास्तरणेयता; ॥ ४॥| को निधियां देती थी ॥ ४॥ दिव्य गन्धो सदिव 
एवं स ताभि! सहितो दिव्यगन्धादिवासिते। | उस छन्द्र पवेत पर स्वरोचि उन-लियोँ के साथ 


चर्पाभिमासिते ९. पर्वते 
> ॥ ५ ।|| स्म करने लगे ॥५॥ वे दिया भी स्वरोचि के 
रराम स्यि वर्‌ ५॥ साथ परम पूवक रदतीं थी ओर उस पर्वत पर इस 


ताश्चापि सह नेति लेभिरे हदषतमाम्‌ | | प्रकार रमर करतीं थीं लिख रकार कि. वे स्वर्गमें 
रममाणा यथा सगे तथा तत्र शिलोचये ॥ & ॥| दो ॥ ६॥ स्वरोचि श्रर उसकी सियो का ललित. 
कलहंसी नगादैकां चक्रषाकीं जले सतीम्‌ । | सम्बन्ध देखकर स्पृदा करके एफ हंसनी- जल मेँ 


व ७॥| दूसरी चक्रवाकी से बोली ॥ ७॥ शरतयन्तं परयवान्‌ 
तस्य तासां ललिते सम्बन्धे च सृहावती ॥ ७॥ यद स्वरोचि धन्य है जो यौवनौविस्था' मै च्रपनी 


भन्योऽवमतिषुणए्योऽं योऽयं यौवनगोचरः! | खयो सदित इच्छित मोगोँ को'भोयता हैः॥६॥ 
पवित्ाभिः सरैतामिडयते भोगानभौम्षितान्‌।८॥ | इष संसार मै वहुधा.यदि पति छन्बर शौर युवा 
न्ति यौवनिनः शछध्यास्ततपल्यो नातिशोभनाः। | दै ते उसकी खौ रुपा रर यदि पतनी ध 
भगत्यामरपमाः पल्यः पतयशवातिशोमनाः ॥ £ ॥ ह श न म 
परभीष्ठाः कस्यचिद्‌ कान्ता कान्तः कस्याधिदीप्तितः दुलभ है ॥१०॥ यह स्रोचि धन्य.है कि इसकी 
र्परानुरागाढ्यं दाभ्पत्यमतिदुलेभम्‌ ॥१० पत्नियां इसको चाहती ह श्रौर यह भी उनको, 
न्यो्यं दयिताभीष्टो हेताशरास्यातिषष्मा; । | बहुत प्यार करवा है। जिन खी-पुरषो मे परस्पर 


भीति है वे धन्य है ॥९९॥ हंसिनी के इन वचनोको 
रसरालुरागो हि धन्यानामेव नायते ॥११॥ सुनकर चनवाकौ न आश्य रदितःहोकर कडा,॥ 


एवननिशम्य वचनं कलहसीसमीरितम्‌ । यह स्वरोचि धन्य नहीं है कारण-इसको अन्य 
वाच कक्रषाकी तां नातिषिस्मतमानसा ॥१२॥| खी के सामीप्य से लज्ञा नहीं दै । जव यह एकक 
यं धन्यो यतो लज्जा नान्यस्ीसननिकर्ष॑तः। | ्रतिरिकत दूसरी खी से भी मोग करता.है तो इस 


९ | कौ भीति सव मे बरावर नदीं हो सकती ॥ १२३॥ 
न्यां तवियमयं चदे न सव्वासस्य मान्‌ २।| जव सदे चित्त का श्रजुराग पक द र स्य॥ 
धतानुराग एकस्मिमिषठाने यतः ससि । ` | नही है तो इसकी पीति सव खियोमेवरायर किस 
तो हि परी्तिमानेप भाय्यांसु भिता कथम्‌ ||१४। भकार हो सकती दै १ ॥ १४॥ इसलिये त तों यद 
सन दभिताः पुता दयितः पतिः। || शि सि जर = 

मव ये तो केवल विनोद मभि 
नोदमत्रमेवैता यथा परिजनोऽपरः ।॥१५॥| अन्य सोग द उसी. तर य भौ च| यि 


न न = ~ --------+ 


[१ 


> 4 


श्र° ६१ भाकर्ठेयुराण २३६ 


एतासाश्च यदीषटोऽयं त्‌ कि भाणान्‌ न सुच्छति । | ग लोगों का यही दण्डे तो जव ये पक दमी : 


। श्ना्लिगन करके दृसरीसे भाग करतार तो तीसरी : 
श्रालिङ्गत्यपरां कान्तां ध्यायतो बै कान्तयान्यया १६ खी प्राण वयो नदीं छोड़ देती ॥ ९६॥ इन च्ियोँ ` 


विचयापरदानभूष्येन विक्रीतो शेप ॒ूत्यवत्‌ । ने विद्या दानरूपी भूर्य देकर स्वरोचि को बतौर 


५ वक फे खरीद लि ~ वि 
भव्तते न हिमेस समं वह्ठीपु तिष्ठति वक के खरीद लिया हे । एक पुरुप का प्रेम कटै ¦ 


खियोँ मे वरावरः नीं रः सकता है ॥ ९७॥ 
कलसि पतिधन्यो मम॒धन्याहमेव च । | दै दंसनी ] मेरा पति शरोर मै धन्य, कारण पक 


चितं सरि ह शनीर मेय पति भी एक है श्रौर पक का पकमें 
यस्यैकस्याधिरं चित्तं यस्याथैकत्र संस्थितम्‌ ॥१८॥ प्रेम स्थित दै ॥९८॥ 


माकरडेय उवाच मार्करडेयजी बोले द. 
सर्व्यसक्वरुतजोऽपौ सखरोचिरपरानितः । स्वरोचि जो सव जीवों की वोली सलममते थे, 


& श्सख वार्तालाप को सुनकर वड़े लज्जित हुए शरीर 

निशम्य सन्नितो दध्यौ सत्यमेव हि नाृतम्‌॥१६॥| उन्दोने मनमेँ निश्चय ३ कि यद सत्य है, समे 
९ महामिसं भंड नदीं ॥ १६ ॥ इसके वाद्‌ वह उस पर्वत पर 

ततो ब याति रममाणो णिच । सखौ वपं तक विहार करते रटे । विददार करते हुः 
रममाणः समं ताभिदंदशं पुरतो मृगम्‌ ॥२०।॥| उन्दने पक खग को देखा ॥ २०॥ जो खुन्दर श्रौर 
एकतिग्थपीनावयवं भगीयुविहारिणम्‌ । | द ए था तथा सृगियों के मंड मे विहार कर 
6 शा धा । वह्‌ सन्दर हरििर्यो से धिरा इश्रा उन 

वासिताभिः स्वरूपाभिम्‌ गीभिः परिवारितम्‌ ।२१॥| ऊ दारा सधा जारहा था ॥२९॥ चे हरिणियां चाः 
आदृषटघ्ाणपुटका निघरन्तीस्तास्ततो रृगी; । पित ोकर उसको संधती रौर उससे लिपरती 


गम्यताम्‌ थीं । वह मूग उनसे वोला कि तुम सुमे लजा मत 
उवाच स मृगो रामा लञ्जात्यागेन ॥२२। चा गदर यहं से जानो ॥ २९ सवरेचि 


 -हं लसेचिस्तच्यीलो न बेबादं सुलोचना; । | नदी ह शरीर न उसका सा मेरा शील दे । उसके 


नि्तज्ना बहवः सन्ति ताच्शासत्र गच्चतः समान हुत से निल मृग है, त॒म उनके पास 
ञ्जा बहवः सन्त तादास्त्र गच्छत; ॥२९॥ जाश्मो ॥ २३॥ जिस पकार णए्क दी की बहुतसे 


एका तनेकाञुगता तथा दासास्पदं जने । रपो ॐ सपय रहने से संसार मै सी होती है 
श्ननेकामिस्तयैतरैफो भोगदया निरीक्षितः ॥२४।॥| उसी प्रकार पक पुखप का श्रनेक सियौको भोगना 
तस्य॒ धम्पक्रियाहानिरहन्यहनि जायते । | निन्दित द २ 
१.५ चान्य र रता है उसकी धारमिक क्रियाश्च की दिनपरः 
सक्तोऽन्यभाय्यपाचान्य कामासक्तः सदैवसः । ती ह ॥ २५॥ जो येल चरि याला 
यस्तादशोऽन्यस्तच्ीलः प्रलोकपराछखः । | श्रौर परलोक से विषधल शग दो उसको ठम दं 


ड. 


तं कामयत भद्रं यो नाहं तुरयः स्वरोचिपा ॥२६॥ लो, मै स्वसेचि के त॒ल्य नदीं ह ॥२६॥ 


इति श्रीमाक॑र्टेयपुराण में स्वरोचिप मन्वन्तर (४) नाम ६ धां प्रध्याय समाघ्न। 
~~ अ -@ 


वियासठ्य अध्याय ` ` . 
माकरुडेय उवाच मा्फर्डेयजी वोक्ते- | 
एवं निरस्यमानास्ता हरिणेन मृगाद्गनाः । हरिण द्वारा खगियोँ के प्रति कटे हप वचनो 
रला सख्रोचिरात्मानं मेने स पितं यथा ॥। १॥, फो नकरः स्वरोचि ने छ्रपने फो पतित समा ॥ 
त्यागे चकार च मनः स तासां यनिसत्तम । | हे ्ौकिजी ! चक्रवाकी पवं खग की कदी इं 


चक्रवाकी गृमभोक्तो ` फगचरयजुम्डितः ॥ २ ॥ नसीदत से न्दने खयो क त्यागने कौ इच्छा की 


1 


२४० किरुडेयपुराण ` ° ६६ 
समेत्य ताभिर्भेयथ वदध॑मानमनोमवंः । | ॥२॥ परन्तु खिर के पास आति दी उसकी कामः 


भूल 
त्क्षिपतनि््वेदकथो रेमे वपृशतानि षट्‌ ॥ ३॥ ८ त 


किन्त धर्म्माविरोधेन इव्वन्‌ धरम्माभरिताः क्रियाः । | खाथ चिह्र किया॥३॥ परतु व दुदिमान्‌ स्व 

शुडक्ते स्वरोचिर्धिषथान्‌ सह ताभिरुदारथीः।॥। ४॥ रोचि विषयों मे ्रासक्त होता हुत्रा भी धरमपूवक 

ततश्च जिर तस्य अरयः पुत्रा; स्वरोचिषः क करतां प ॥.8॥ इसके ५ । 

: विनयो म्द प्रभावश्च महावलः स्य से तोन महाबला पुत्र उत्पन्न हए (जनक \ 
ह मरन विनयं अ महाबलः ॥ ५॥ नाम कि विज्य, मेदनन्द शौर परमाव हुए ॥ ५॥ 

¦ मनोरमा च विनयं प्रासूतन्दीवरास्मना । | इन्दीवर छी पुरी मनोरमा से विजय, विभावरी से 

, बिभावरी मेरुनन्दं प्रभावश्च कलावती ॥ ६ ।॥ मेखनन्द श्रौर कलावती से प्रभाव उत्पन्न हुए ॥६॥ 


प्चिनी नाम या विया स्पभोगोप्पादिका | | सव भोगों को उत्पन्न करने वाली जो पञ्चनी नाम 
विद्या थी उसके बल से स्वरोचि ने तीन नगर 


स॒ तेषा तलमभावण पिता वक्रे पुरवरम्‌ ॥ ७॥ वसाये ॥७॥ उस पर्व॑त दै पूरव दिशा की शरोर उस 
¦ भ्राच्यान्तु विजयं नाम॒ ामरूपे नगोपरि । | ने कामरूप विजय नाम नगर वसाया जिसे पिले 
, विनयाय सुतायादौ स ददौ पुरफुत्तमम्‌ ॥ ८ ॥| पुत्र विजय को दे दिया ॥॥ उत्तर दिशा की शरोर 
उदीच्यां मेन्दस्य पुरौ नन्दबतीमिति । वडचडे भवनों से युक्त नन्देवती नाम नगरी स्था- 


रे पित की जिसको कि उस्ने मेसनन्द को दिया - ॥६॥ 
रयातां चकार मोनद्गचममाकारमासिनीमू्‌ ॥ & ।| दक्तिय कौ शओोर यक नगर जिसका नाम नि ताल 


पलावतीसुतस्वापि भावस्य निवेशितम्‌ । | था वसाकर कलावती फे पुत्र प्रभाव को दिया १०॥ 
रं तालमिति ख्यातं दक्षिणापथमाभितम्‌ ॥१०॥॥| हे करौपुकिजो } पने पुत्रों को दस ` पकार श्रलग 
एवं निवेश्य पुत्रान्‌ स ॒पुरेष पुरुषर्षभः जलग राज्य देकर बह पुरुष धेषठ इन खिथों -के 


¦ साथ पूववत्‌ रमण करता रहा ॥ ११॥ पक वार 
रेमे ताभिः समं विप्र पनोक्ेष्वतिभमिप ॥११॥ व व 


एकद्‌ तु गतोऽरण्मे विहरन्‌ घ धरुद्धरः । | पक शक्र का पी करिया शरीर जव बह वहुत.दूर 
चकष धतुरालोक्य॒वराहमतिद्रगम्‌ ॥१२।॥| पर दिखाई दिया तो धुप को खेचा ॥१२॥ उस 
अथाह फाचिदभ्येत्य तं तदा हरिणाङ्खना । | समय .णएक रिणी वहां शाक्रः यद वोली कि आप 


मय्येव पाल्यतां वाणः ; पन प्रसन्न होकर यह वाण मुभ पर चाड दीजिये 
येव पात्यतां वाणः सीदेति पुनः एनः ॥१३॥ वह वार वार पेसा कहने लगी ॥६३॥ इस शूकर के 


किमनेन हतेनाच „ मम | विनिपातय्‌ 1 | मारनेसे क्या लामै, सुभरो शीघ्र मारिये । श्राप 
खया निपातितो बाणो दुःखान्मां मोक्षयिष्यति १४॥ का वाण लगनेसे. मै अपने दुखोसे सुक्त.दोजा्जगी] 


स्वरोचिरुवाच , ( स्वरोचि वोे-- 
न ते शरीरं सरूनमस्माभिरुपलक्ष्यते | . | . दम तेरे शरीर भे कई रोग भी नदीं देखते है 
किल तत्कारणं येच त्वं भराणान्‌ हातुमिच्छसि १५।॥| फिर त्‌ क्यों श्रपना पाणधातं करना चाहती है१॥ 
मृग्युवाच स्गी वली- ॥ 
अन्यास्वासक्तदहदये यस्सिश्चेतः कृतास्पदम्‌ । :/ जिस पुरुष को मै चाहती हँ चह श्रन्थ ख्रीपर 


फिर उः 
मम तेन दिना गृल्युराषधं किमिहापरप्‌ ॥१६॥ श ध ब्रिना मेरी ५ ख्व्यु 


रोचिर्वाच ` , | स्वरोचि योते 3 
करत्वा नाभिलपेद्रीर सालुरागासि. त्र बा | वद कौन पुरुष है जिसमे कि तेण. अराग दै 


श्नौर जो तुमे नदीं चादतादै तथा जिसके न मिलने 
यदमुपनो निजान्‌ पराणान्‌ परित्यक्तु व्ययस्यसि १७॥ ॐ कारणत प्राणत्याग करना चांदती-है ॥ ९७॥ 


-अ०.६६ ३१ 


--~---------~-------------~-----------------------~---------_ ~ "~~ ~~~" ~ ~ 


। ` शग्युवाच | 
स्वामेवेच्छामि भद्रं ते खया मेऽ्वहूतं सनः 


-ाकरएटेयपुराण २४१ 


संगी बेली- 
दे भद्र | मे तुमको दी चाहती है शरीर तमद्य 
भनको दरण किया } श्रतः अरव मै खव्युदी । 


दृणोम्यदमतो मृत्यं मयि वाणो निपात्यताम्‌ ॥१ || चाहवी ह, श्राप वार मारिये ॥९८॥ 
स्वरेचि बोले 


स्वरोचिरुवाच 
त्वं भगी चश्चलापाङ्गी नररूपधरावयम्‌ | 


, कथं त्वया समं योगो मद्धिस्य भविष्यति ॥१६॥ 


मृगगुचाच 
यदि सपिक्षितं चित्तं मयि ते मां परिष्वज) 
यदि वा साधु चित्तं ते करिष्यामि यथेप्सितम्‌। 


एतावताहं भवता . भविष्याम्यतिमानिता ॥ २० 


माकौरडेय उबात् 
श्रा्तिलिङ्क ततस्तां सम स्वरोविहरिणङ्धनाम्‌ । 


तेन चालिङ्िता सयः साभूदिव्यवपर्रा ॥२१॥ 


ततः स विस्मयाविष्टः का स्मित्यभ्यभापत | 


सा चास्मे कथयामास मेमलज्जाजङा्षरम्‌ ॥२२॥ 


द्महमभ्यर्थिता देवैः फांननस्यास्य देवता । 


उत्पादनीयो हि मदुस्तया मयि महामते ॥२३ 


 श्रीतिमत्यां मयि सुतं भृलेकिपरिपालकम्‌ । 


तथुत्पादय देवार्ना त्वामहं धचनाददे ॥२४॥ 


भ्राकुरडय उवाच 
ततः स॒ तस्यां तनयं सव्यलक्षणलक्षितम्‌ । 


तेजस्विनमिषात्मानं जनयामास तक्षणात्‌ ॥२५॥ 


जातमात्रस्य ' तस्याथ .देववाद्या निसस्वनुः 
जयुगन्धन्वेपतयो 
सिषिचुः शीकरेनागा शरपयश्च तपोधनाः । 


देवाश्च पुष्पवर्षश्च श्चुश्च समन्ततः ।२७॥ 


तस्य तेजः समालोक्य नाम चक्रे पिता स्वयम्‌ । 


“श तिमानिति येनास्य तेजसा भासिता दिशः|।२८॥ 
स बालो ध्‌ तिमान्‌ नाम महाबलपराक्रमः |. 
स्रोचिपःसुतोयस्मात्‌ तस्मात्‌ स्वारोषिषोऽभवप २६ 


सःचापि विचरन्‌ रम्ये कदाचिद्विरिनिभररे। 


नरेत॒धाप्परोगणाः ॥२६॥ 


तू तो चश्चला ष्गी है शौर मँ मनुष्य रूपधारी 


ह, मेरा तेरे साथ किस प्रकार योग होगा १॥१६॥ 
स्गी वोली- 
यदि वुम्दारा श्रञुराग मुभामेदैतो मुक से 


श्रालिङ्गन करो । यदि श्राप मुभसे इचछित भोग 
करेगे तो जो च शाप चारहैगे चह मै दोजाङभी॥ 


भाकीर्डेयजी वोल्ते-- 

इसके श्रनन्वर स्वरोचि ने उस हरिणी को 
द्मालिद्धन किया । उसके श्रालिङ्गन करते दी बद 
हरिणी शीघ्री दिव्य शरीर वाली सखी दोग३।२९॥ 
उस्र समय विस्मयान्वित होकर खरोचि उससे 

ोले तुम कौन हो ? उसने प्रेम से ललित दोकर 

कटा ॥२९॥ मेँ इस वनक्ी देवी ह, मुमसे देवता्रों 
ने धार्थना की है रतः भ श्रापसे कटती ह किटै 
महामते ! सुभसे मजु को पेदा कीजिये ॥२६॥ देवे 
ताँ फे चचन से मै आपसे कती दँ किसुक 
भ्रीतिमती म भूलोक का पालन करने वाला पुज 
उत्पन्न कीजिये ॥२४॥ 
माकरडेयजी बोकज्ते-- 

इसके वाद स्वरोचि ने सव लक्षणो से युक्त 
श्रीर श्रपने समान तेजखी एक पुत्र उस हरिणी से 
पैदा किया ॥ २५ ॥ उस पुत्र के पेदा होने के सम्रय 
देवता लोग वाजे वजानेलगे, गन्धर्वं गाने लगे शीर 
श्मप्सरयें नाचने लगीं ॥ २६ ॥ तथा नागलोगं शरीर 
तपोधन ऋषिगसए उस वालक के अपर जलके छि 
मारने लगे रौर देवता लोग पुष्पों की अषां, करने 
लगे ॥२७ ॥ पिता ने उसका तेज दैखकर खयं उस 
का नाम य॒ तिमान रक्खा कारण किं वहे श्रपने 
तेज से सव दिशां को प्रकाशित कर रहा था ॥ ` 
वह वालक दय तिमान्‌ वड़ा वली श्रीर पराक्रमी 
हुश्रा रीर स्वरोचि का पुर दोनेके कारण स्वरो 
चिप कहलाया ॥ २६ ॥ पक ` वार स्वरोचि ने उस 
रमसीक. पर्व॑त पर विचरते हुए पक हंस रौर 


स्ररोचिददशे हंसं मिनपत्तीसमन्वितम्‌ ॥३०॥| दंखिनी को देखा ॥३०॥ दंसिनीको कामवासनायुक्त 


उवाच स तदा हंसी साभिलापां एनः पनः 


देखकर दंस ने कहा कि श्रव सुभको छोड़ दो, मे 


उपसहियतामात्मा चिरं ते क्रीडितं मया ॥२१।॥ ने उम्दारे खाथ वहत काल तक क्रीड़ा की ,॥३१॥ 


, २४२ न 'आक॑रएडेयपुराण | ध  श्र० ९७ 


(लं भने „ =+, , | सदैव भोग करने से दी क्या लाम हैः १ ्वस्थाभी 
किं सनयकालं भोगस्ते आसर चरमं षयः । चरमं-सीमा को पच गई है । हे जल्लवरि “श्रब्र ' 
सित्यागस्य कालो मे तव चापि जलेचरि ॥३२॥ मेरे श्नौर तेरे वियोग का समय है ॥ ३२ 

हस्युवाच हंसिनी चोती- । 


कालः को हि भोगानांसव्वभोगात्मकं जगत्‌। ४. ०५ 0 र 
समस्त र्‌ 

यजा जयन्ते मोगाथ ब्राह्मे; संयतात्मभिः ॥२२॥ संयतात्मा दोकर भोग के सिये हो यज्ञ वरते ह ॥ 

दृादृष्टास्तथा भोगान्‌ बाञ्छमाना षिवेकिनः। . ज्ञानी लोग दण श्रदष् भोगों की इच्छा करते हुए ` 


दानानि च प्रयच्छन्ति पूणधम्मांश्च कृन्प॑ते ॥३४॥ ध ४ 1 ६ श 

स त नेच्ठसि फं भोगान्‌ भोगब्टाफलं ृणाम्‌। | का फल भोग ही ह तो तुम तियंग योनि भँ हर 

विपेकिनां तिरवाश्च किं पतः संयतार्मनाम्‌॥२५।॥| भी भोग की इच्छा क्यो नदीं करते १ ॥ ३५ ॥*. :. 
हंस उवाच हंस बोला- 


भोगेष्दसक्तचित्तानां प्रमात्मान्वित्ता मततिः । भोगों श्रौर भाईबन्धुतोमे श्रासक्त चित्तवलिों 


= ८1 की परमात्मामे बुद्धि षिन्स तरह स्थिर होगी ३६] 
भविष्यति कदा सङ्खुपेतानाश्च बन्धुषु ॥२६। य 0 ली कि 


पत्र-मित्र-कतल्ेषु सक्ता; सीदन्ति जन्तवः प्रकार दुःख पाते है जिस धक्रार बद्ध थी ताल्लाव 
सरःप्ड्ाणवे प्रा जीणा .वनगजा दव ॥३७॥॥ की स ४ जाता है ॥ ० हे भदे ! तुम 

स्वरोचि नदीं देखतीं चाल्यावस्था 
क्षि न पश्यसि वा भद्रे जातसङ्ग स्वरोचिषमू । न 
श्रावार्ात्‌ पमर्ससक्तं मगन तेहामबुकहमे ॥२८॥| मं मञ्च होरे है ॥ र८॥ स्वरोचि ्रपनी युघावस्था 
यौवतेऽ्तीव भार्यासु साम्यं पुचर-नषषषु | | म सियो मे श्रासक्त थे प्रौर श्रव पने पुतो मे 


्रासक्तरे । इनका मन एस कीचडुसे केसे निकलेगो 
स्ररोधिषो मनो मदारं भापयते कृतः ॥९६॥ ॥ ३६॥ हे हंसिनी ¡ मै खरोचिकी तरह खीके वश्च 


नादं स्वरोचिषस्तुरयः स्लीबाध्यो वा जलेचरि। | मे नहीं ह । सुभे विक है इसलिये म अय भोगी 
विवेकवाश्च भोगानां निदत्तोऽस्मि च साम्भतम्‌।\४०।॥| से निदत्त होता ह ॥ ४०॥ 
भाकरडेय उवाच ध माकरडयजी वेलि- 


स्वरोचिरेतदाकृणए्यै लातोदेगः खगेरितम्‌। | ‰ दंस के व स्वरोचिसनो 
तरे 
आदाय भाय्यास्तपसे ययावन्यत्‌ तपोवंनय्‌ ॥४१॥ 4: ८२६ 1 ध 


तत्र तप्ला तपो घोरं सह ताभिष्दारधी; । ` | स्त्रियों सटित घोर तप करके रपे संपूरणं. पो - 
लगाम लोकानमलान्‌ निृत्ताखिलकरमषः ॥४२।॥ बो निवृत्त करतेहप निर्मल लोको मै प्ुचंगयेध॥ 
इति श्रीमाकण्डेयपुराण मेँ स्वारोचिष मन्वन्तर (४) नाम द्वौ अध्याय सम॑प्त " 


.-.  ->>‰<^९ ~ ॥ । 2 
~ -..-. सदृषठतरां ष्या .::  -. . > 
। भाक रडय.उचाच १ माकरडयजी बोल्ते-- ` >. 
ततः स्वारोचिषं नाम्ना चुतिमन्तं प्रापतत्‌ । तव द्य तिम्रान्‌ नाम स्वारोचिषः -को भगवान 


मन्वन्तरं ॥ १॥ जापति ने मु की पदवी दी, चव उसकञेःमन्वेक 
क र व < को सुनो ॥.१॥ हे करौुकि ! उस मन्वन्तर मे जो 
न्तर तु भुनपस्वरत देवता, सुनि श्रौर राजा जोग मु के पुर दुष उन 
` ५९, क्रोष्टके ये तान्‌ गदतस्तव निशामय. २॥ का वर्तन करता ह+ नो ॥२॥ स्वारोचिष मेन्ववैर 


न 
--------~--~--------~~- 
~-----------~~-------~-----------------------~-~---------~-----~~ 
॥ 


देवाः पाराव्रतास्तत्र तथेव तुपिता द्विज । मे पारावत श्चौर तुषितं नाम देवता हषः श्रं 

स्वारपिषेऽ्तर चेन्द्रो पिपथिदिति विश्रू्ः ॥ ३। | पश्चिति नाम इन्द्र हुए ॥ ३ ॥ उर, च 
ऊज्मस्तम्बस्तथा प्रणो दत्तोलिच्छपभस्तथा | दत्तोलति, षभ, निश्चर श्रौर श्चव्ववीर ये सषि 
मिथरधाव्ययोसंध तत्र सकतषयोऽभवन्‌ ॥ ४॥ उस .मन्बन्तर मे हु ॥ ४॥ उस , मदात्मा स्वारो 
चतःविमपुरुपायाय सुतास्तस्य महात्मनः । | चिषके चब, किमबुरप दि सात धन प जा बडे 


सुधारन्‌ सुमहावीर्यः एूथिवीपरिपालकाः ।। ५॥ वलवान्‌ श्नौर पृथी के पालने बाले थे -॥-५॥ जब 
क उस यन्वन्तर की श्रवधि रही तव तक उसी 


तस्र मन्वन्तरं यायत्‌ वावत्‌ तद्र॑शपिस्तरे। : वंश से लोगों न इस एृथ्वी पर राज्य किया. ्न्य 
युदततेयसयनिः स्यां द्वितीयं वैः तदन्तरम्‌ ॥ ६ ॥ .किंसी चश ने नदीं ॥ ६॥ जे मलुप्य स्वारोचिष के 


स्वरोषिपस्तु चरितं जन्म स्वारोचिपस्य च । । जन्म ग्नौर चरिता शरद्पूर्वक सुनता वह सव 
निशम्य सुच्यते पापैः श्रदधानो हि मानवः । ७॥ पापों से मुक्त दे जाता है॥७1 


: इति श्रीमा्र्डेयधुराणमे स्वारोचिष मन्वन्तर नाम (९) ९७ त्र” समाप्त । | 


क्रीएकिरूवाच कौुषिजी बोले-- 
गमन्‌ कथितं सव्वं विस्तरेण तया मम । | ॐ 8 क 
, सखोर्बिपस्तु चरितं जन्म स्ारोविपस्य तु ; १1 पर्क कदा ॥ १॥ भोगों को उत्तर करनेवाली जो 
` या. सा पिन नाम विद्वा भोगोपपादिका । 


पश्चिनी नामक विद्यहै.उसके श्रित. जो निधियां 


त्संभ्रया ये निधयस्तान्‌ भे भि्तरतो यद्‌ ॥ २॥| ‰ उनका भुमसे विस्तारं पूरवंक वर्शंन करो ॥ २॥ 
रुरुदैव ¡ आठ निधयो के स्यरप शरीर दर्यो 


द्टौ ये निधयस्तेपां सरूप ्रनयसंस्थितिः करके उनकी जो स्थिति दै उसको मै च्छ तरदं 
भवताभिहितं सम्यक्‌ श्रोतुमिच्डाम्यहं गुर ॥ ३॥ श्रापत्ते नना व्वाहता हथ ` । 
भाकरडेय उत्राच मार्करडेयजी वोल्े-- 


पद्विनी नाम-या विदा लक््मीस्तस्याश्च देवता । क र धु देवता न 
\ ४॥ र उने निधे श्राधारभूतर, घु 
तेदाधाराश्च मिधयस्तन्मे निगदतः शर ॥ त 


यत्र प्रशनमहाप्ठौ ˆ तथा मकटकच्चपा ! | नील छर शंख ये.आलें निधियां लक्मीजी के पास 
न्दो नन्दकथैव नील श्भो्टमो निधिः ॥*४ : | रहती ई ॥५॥ सतोयुणपुक्त जिसको ऋद्धियां प्रात 


भवन्त्येते धिदधिस्तेषां हि नायते । टोती ह उन्दी को ये निधियाँ भी उत्प .धोजाती 
4 वा द । द कीक! ये दी आय निधियां दै जतम 


` एते इष्टौ समास्याता निपयर्तव रोपे ॥ ६। वो सुनाई" ॥ ६॥ हे युनि ! जी लोग देवताच को 
तानां `. भरसादेन ` धाधुसंसेवनेन असक ह अयवां साधुतां कते. द उनके 
एभिसलोक्षितं वितं . सारुषस्य षदा ने ॥७॥| धन को ये निधियां देखती हं ॥ ७॥ दे दविज | इन 
याक. सस्यं भव्ति तन्मे ` निगदतः. शृण । -निधियों के खरूप मुभे खनो । पञ्चनी नामक 
धती मोम निधिः पूवव मंयस्य मवति दज ॥ ८ ॥ निधि परिक्ते मय नामक राच्तस के घरमे रदती थी 
तस्यं वत्ुतानाश्च तलौवाणा्च नित्यशः | ` |॥८॥ बह उसके पर्नो, पी शरौर प्रपौत्रो से बहुत 
दाक्षिस्यसारं पुरपस्तेन , चाधिष्ठितो मवेत्‌ ॥ ६ ॥ भसन रहकर उनके घर खदैव रहती -थी ॥६॥ 


------------~-~ 


२४४ भाकंएडेयपुराण भण ६८ 


० „५ । इस निधि ऋ श्राधार सतोयुणहै तथा यह महान्‌ 
त्वापारो महामोगो यतोऽसौ सातिको निधिः१० भोगों को उत्पन्न करतेवाली है, रतः यद सात्विक 
एवर-रपय-ताम्रादिथातुनाञ्च परिग्रहम्‌ । | निधि कहलाती दै ॥ १०॥ यद सीना, चांदी शरीर 
तोलति सोऽय तेषांच क्रयविक्यम्‌ (११॥ सा भादि घातु को देने वाली है तथा जिस 

त्यत्र स्।ऽ्थ तेषाच क्रयोवक्रयम्‌ मलुप्य पर इसफा परमाव हे वह इन घातु की. 
परति च तथा यङ्गान्‌ दक्षिणाञ्च प्रयच्छति। | बहुत ५ विकी करता दै | ९ वद्‌. मदुप्य 
" देवनिकेतां ध यज्ञ करता है तथा दण देता है । उखसं परभाः 
भां शर ॒स कारयति तन्मनाः ।१२ चित होर बह देवसमा च मन्दिर नाता ९२ 
प्वाधासो निषिशवान्यो महापञ्च इति श्रुतः । | दूसरी निधि सतोगुख प्रधान महाय है । उससे 
व्वपरथानो भवति तेन चाधिष्टितो नरः ॥१३॥ भभाविच मनुष्य खतोगुण भधान दोजाता दैः ॥१३॥ 


दि ञ्च परिग्रहम्‌ यह निधि पद्मराग रादि रलौ को भ्रात कराती दै 
रोति प्रागादि-रत्नाना ध 1 त मोदी, भुम आदि की सीद शरीर चिकी भी 


गोक्तिकानां परवालानां तेषांच कयविकरयान्‌ ॥१ | कराती है ॥ १४॥ उन 'योगशील पुरुषों को यदह 
ए्दाति योगशीतेभ्यस्तेषामावसथास्तथा । | इव्यों का स्थान वनाती दै । यदह निधि मद्य र 
प कारयति तच्छील; स्वयमेव च जायते ॥१५।॥ शील को वनाती दै ॥६॥ तथा उसके पुच्च श्रौर 
लसूतास्तथाशीलाः पुत्रपो्कमेण च । पौषो म भी वैखादी शील उत्पन्न करती है तथा 
नि त उस पुरुष को सात पुश्त तक नदीं छोड़ती ॥९६॥ 
एल्वम सप्ासौ पुरुषां न सुज्चति ॥१६॥ तीसरी मकर नामक तामसी निधिरै, उखसे प्रभा- 
तामसो मकरो नाम निधिस्तेनावलोकितः। | वित्त मचुप्य सुशील होतेह भी तमोगुसी दयोजाता 
ुरपोऽय तमभरायः सुशीलोऽपि हि जायते *१७॥| द त 
क ञच परिग्रह करता है श्रौर उसकी खचि राजाश्मों के साथ मै 

॥१ ववा 1 त । करने मे रहती है ॥१८ उस मनुष्य की उत्ति शूर 
(सनानि इरत ति, नरीन्च राजभिः ।॥१८॥| बीरों की सी दोती है छौर बह रेस ही लोगोंको 
ददाति शो्यह्सीनां भूना ये च तत्मियाः। | भिय होता है । इसकी भीति गा के ऋय-विक्रय 
क्रयविक्रये च शस्राणों नान्धत् भीतिमेति च ।१६॥ मे दी होती दै क क ५५ निधि पक 
= ॥ मयुष्य तक सीमित रहः , बह मदुष्य 
ध ४ ^ त तस्याचुनासुगः । | धन के कति किसी चोर से श्रथवा संग्राममे मारा 
द्रव्याय दस्युतो नाशं संग्रामे चापि स व्रञेत्‌॥२०। जाता दै ॥ २० ॥ चौथी कच्छप निधि दै । इसका 
कच्छपश्च निपिरयोऽौ नरस्तेनाभिवीक्षितः | | जिख मदुप्य पर भभाव दोता है बह तमोयुी हो 
तमःभधानो भवति यतोऽतौ तामसो निधिः ।२१।| आता दै क्योकि यद तामसौ निधि है ॥२९॥ परंतु 
0 षि इसका व्यवहार पुरयशील लोगों से दोता दै श्रीर 
"यवहार _ पर्यजातेः करोति च । | यह सम्पू कमौँ के करने वाले मचुष्यो को प्रभा- 
नसि निह चित करती है । इससे प्रमावित "पुरुष को किसी 
समस्यानतिलाव बिएवसिति कस्य १त्‌॥२९॥| का विश्वास नहीं होता ॥२२्‌। जिस भकार कच्छप 
समस्तानि यथाङ्गानि संहरत्येव कच्छप; । | श्रपने अज्ञो को समेट लेवाहै उसी तरह वै पुरुष 
तमानसः ॥२२।॥ सव वस्वश्रो से श्रपना मनं दटाकर धन मे लगाता 
तथा विष्टभ्य चित्तानि िषठतयायतमानस ॥२२ द॥ २३॥ बद मनुष्य न तो देत है रीर न सवय 
स ददाति ल वा युडन्तं तद्िनाशभयाङ्क्तः । खाता है चौर धन के विनाश होजाने के भयसे 
निधानमुव्वथां हरते निधिः सोऽ्प्येकपूरुषः ॥२४॥| व्याल रहता दै ! यह निधि उससे पृथ्वीमे धन 
रनोगुणमयश्ान्ो युन्दो नाम ये निधिः । | गढ़वाली दे जो कि एक पत तक ही चलता, दे ॥ 


| र पांचवीं निधि भङ्घन्द नामक रजोगुणमयी है 1 हे 
नरोऽलोकितस्तेन तदु भवति द्विज ॥२१५॥ बज ! यह्‌ जिस मलु्य को देती ह बह शी 


2 -पण-मृदङ्खानामातोधयस्य परिग्रहम्‌ । ` । होता है ॥२॥ बह मनुष्य वीणा, बेणु.जनौर मृद 


० ६८ माकैर्टेयपुराण -२४१ 


-------- ----- 


करोति गायतां धित्तं वरत्यताञ्च प्रयच्छति ॥२६॥ चर्व का संग्रह करता तथा गायको रौर नाचने ` 
बन्दिनामय सूतानां बिटानां लास्यपांठिनाम्‌। | बालों को धन दाद द दे िज |. बह वंदिजनों 


ध 0 भारो, चारणे श्नौर नयो रादि को सदा भोजन 
ददात्यहर्निशं भोगान्‌ शुत तथ सम दविज॥।२७॥ दिया करता है तथा श्रापभी उनके काथ भोजन 


कुतदटास्वरतिशवास्य भवत्यन्यैध तद्विपः। | करता हे ॥ २अ॥ इखकी कुलटा सियो मे तथा वैसे 
प्रयाति सङ्खमेकंच यं निधिर्भजते नरम्‌ ॥२८॥ दी अन्य बेश्यागःमी पुरुषो से ीति रहती दै, यद 


न्यो न तानिधिः निधि म्प्य की प्क पुश्त तक चलती है ॥२८॥ 
रजस्तमोमय नन्दा नाम सहानिषिः | छखवीं मदानिधि नन्द नामक है जो रजोगुण छीर 


उपैति स्तम्भमधिषः नरस्तेनावलोकितः ॥२६॥| ठमोगु से य॒त दै । थह जिस मनुष्य पर इ 
समस्तधातुरत्नानां पुण्यधान्यादिकस्य च । करती है बह ॥ २६॥ समस्त धालुच्यो, रत्नौ रौर 


परिग्रहं करोत्येष तथेव क्रयविक्रयम्‌ ॥३०. धनों श्रादि का संग्रह्‌ करता हे तथा उनका क्रय 


४ शरीर विक्रय करता है ॥ ३०॥ व श्रपने स्वजनो, 
आधारः स्वजनार्नाच आगताभ्यागतस्य च । श्रतिथियों श्नौर चभ्यागतोका पालन धरता तथा 


सहते नापमानोक्तिं खसपामपि मदाष्ुने ॥२१।| बड़ थोड़ी भी श्रपमान की वात नदीं कता है॥ 
स्तूयमानश्च महतीं प्रीती वध्नाति यच्छति । | वद विनश्र होकर सबके साथ प्रीति रखता श्नौर 
यं यमिच्छति वै फामं मृदुत्वषुपयाति च ॥२२॥ जिस.जिस वात की बह फामना करतां है बह पूरी 


,, ` | दोजाती है ॥३२॥ कमल फे समान इस खुन्दर 
बहो भाथा भवन्त्यस्य हूतिमत्पोऽतिशोभनाः। व 


रतये स्न च नरान्‌ निथिर्नदोऽ्ुवत्तते ॥३३॥| नामक निधि सात पुश्च तक चलती है ॥ २९॥ हे 
भवद्ध॑मानाऽ्य नरमष्टभागेन सत्तम । | करौटुकि ! यद रागं घ से इद्धि को भाप ह 


दवा ¡ भयच्छति सव मनुष्यों को दीर्थात्रु कर देती दै ॥ २९॥' वहं 
दीषाुष्न्च सर्वेषां पुरषाणां भरयच्छति ॥२४॥ मचुष्य दर से श्रये हप भै-वन्धुश्ों का भरणं 


वनधूनाभेव भरणं ये च द्रादुपागताः । | करता दै । नमद चे भमाबित भचुष्य परलोकः कोः 
तेषां करोति वै नन्दः परलोके न चाहतः ॥३५॥| नदीं मानता ॥ २५॥ उसकी भीति पुरवासियों से 
भवत्यस्य न च स्नेहः सहवापिपु जायते । | गही होती दै 1 रने मिं से उसकी भीति मे 


४ 3, शिथिलता ्राती है तथा बह अनन्य नये मिनो से 
पूल्वमित्रेष शोभि भीतिमन्यः करोति च ॥२६॥ प्रीति करता है ॥३६॥ सातवीं निधि खतोयुख नौर 


तथैव सततव-रजसी यो विभि महानिधिः । | रजोगुण से युक्त नील नागक दै जिसका सङ्गी 
स नीलसंशस्तत्सद्धी नरस्तच्छीलवान्‌ भवेत्‌ ॥२७॥॥| पुर सत्सङ्ग दता दै ॥ २७ ॥ वद वः, कपास, 
वस्ञ-कापास-धान्यादि-फल पुष्पपरिगरहम्‌ । र था ज वं स ९५ 
क्ता-विषटुमशंखानां शक्त्यादीनां तथा हने॥३८॥ जो जल से पैदा दती है उनका भी संग्रह रौर 
काषटठादीनां करोत्येष यज्चान्यञ्जलसम्भवम्‌ । | करय-विक्रय करता है, उसका मन अन्यवः नदीं 
क्रयविक्रयमन्येषां नान्यत्र रमते मनः ॥२६॥| लगता ॥ २८-२९॥ चद म युगाः चाबद्ी तथां 
किः य < चाया लगवाता दै । वद नदियां के वांध वनवातां 
तडागान्‌. एष्करिर्योऽ्य तथारामान्‌ करोति ० तथा इक लाता है ॥४०॥ वह म्प्य चन्दन, पुष्प 
बन्ध्वे सरितां दृ्ास्तथारोपयते नरः ॥४०।॥ शरीर भोय श्रादि को लेकर अति मसन्न होता दै! 
अ्तुलेपनपष्पादि-मोगं शक््वाभिनायते । | यद नील नामक निधि सीन पुरत तक -चलती है, 
वरिपौरुषश्वापि निधिर्नीलो. नामैष जायते ॥४१।॥ ॥ ४९ ॥ आवी शुंख नामक निधि रजोगुण श्रौर' 


न पिः} ` तमोशुखं से युक्त है ! दे विभ } जिस पर इसकी | 
रजस्तमोमयश्रान्यः शंससंहो दि या नि्िः। | दि हीही ह बद यसी दज दै ॥ ४२॥ यद एक 


तेनापि नीयते पिपर तद्गुणं निषीश्वरः ॥७२॥ पुरुप के श्रभ्रित रहकर दुसरे के पाख नहीं जाती 
एकस्यैव भरत्येष मरं नान्थषुपेति च ) | है) हेक्रीधुकिजी ! जिस भचुप्यके पास शंख निधि, 


, स. च तस्याः सुचाव्वज्गया दशनादेव पार्थिवः 
| ददाति. स्यशेनं मत्रे -गात्रस्पशे च तन्मयः 1 ६ ॥ 


"२४६ माकस्ठेयेषुराण श्ं०:६६ 


स्य शंखो निधिस्तस्य खरूपं करष्टुके शृण ॥४२॥ हो उसका स्वरूप खनो ॥४/ बट मचुष्य अपना 
। पैदा क्रिया श्ना रन्न खाता है तथा श्रपनेदी उपा 
एक एवात्मना खष्टसनने यड्तं तथाम्बरमू । | सित वस्र प्दिनता है } वह कभी दूखरे का शन्न 


हद्थुक परिजनो न च शोभनवशध्रक्‌ ¦ ४७।॥ नदीं खाता रौर न चच्छं कपड़े पदिनता दै ॥७४॥ 
वह मित्र, पत्नी, भाई, पु, वदिन प्रादि को श्रन्न 
१ ददाति सु्ाय्यात्ाकु-ु्-स्ुषादिषु । चस्य नहीं देता । शंख निधि घाला पुर्प खदा 


पोपणपरः शंखी नरो भधति सव्वंदा ॥४५।॥ ्रपने दी पोषणम तत्पर रहता है ॥७४॥ ये निधियां 


ष्यं की र्थ देता कदलाती है । यदिषकसे 
पेते निधयः ख्याता नराणामथैदेवता निनि पत 


मेश्रावलोकनान्मिश्राः सखभावफलदायिनः ॥४६॥ अधिक दिधि का टी फल मदुष्य को होता ॥४दा 


धां जितनी निधियों की दष्ट पड्ती.दै उतनी निधि 
पा स्यातस्वमावस्तु भवत्येव विलोकनात्‌ । काही फल्न होता ह । जहां सव निधियों का समा- 


र्व्वषामाधिपत्ये च श्रीरेषा द्विज पञ्चिनी ४७ रोह दो बद्यँ पद्िनी नाम चिदया मी होती है ४७ 
1 इति ्रीमाक्ण्डेयपुराण मे निथि निणेय नाम ६८वां ° समाप्तं | 


त न अ ^ न - 

(९ उनत्तरवां अध्याय 
। क्रौष्ुकिरुवाच करौषकिजी वोले- ; 
विस्तरात्‌ कथितं ब्रह्मन्‌ मम सारोचिषं स्वया) दे बह्म्‌ ¦ आपने सुसें स्वारोचिष मन्वन्तर 


का हाल विस्तार पूर्वक कदा श्नौर जो. मेने श्राय 
न्तरं तथेवा्ठौ ये पृश निधयो भया ॥ १॥| निथियां पटीं उनको भी आपर्ने.वताया ॥१॥ आपने 
सायम्भुवं॑पू्वमेव मन्वन्परभुदाहूतम्‌ । | पदिले स्वायम्भुव मन्वन्तर का बन भी सुमते 


मन्वन्तरं ततीयं मे कथयोत्तमसंक्नितम्‌ ॥ २॥ ९ क ४. र व 


माकंरडेय उवाच माकरडेयजी वज्ञे ~` , । 
उत्तानपादपुत्रोऽमृदु्तमो नामनामतः । , . उत्तानपाद राजा के सुरुचि नाम स्ने महान्‌ 
सुरुच्यास्तनयः ख्यातो सहाबलपराक्रमः ॥ ३।॥ वली श्नोर परक्रमशाली उत्तम नाम का पुत्र इरा ॥ 


म्पात्मा ३ महात्मा च पराक्रमधनो मृषः वह राजा घाता, मात्मा रौर पराक्रमी थां तथा 
४ 3 न ष वह सव प्राणियां मे सूय.ॐ समान तेजस्वी था॥४॥ 


अतीत्य सर्वभूतानि वमौ भानुपराक्रमः ॥ ४॥ ह मामति करधकिनी ! बद धर थच जीर मिज 
समः शत्रौ च मित्रे च रे प्रे च धर्मवित्‌ । | तथा मजा जोर पं को संमान समभता-था । ब 
दुष्टे च यमवत्‌ साधौ सोमवच्च महाघ्ुने ॥ ४॥| इषौ के लिये यमं ओर १ के लिये चन्दमाके 
वौभ्रवीं -बहुलां नामं उपयेमे स धस्मवित्‌ 1 | समान धा ॥ ५ ॥ उत्तानपाद ऋ पुन धर ्ञः उत्तम 
उत्तानपादतनयः शचीमिन्द्र- इवोत्तमः ॥ ६॥ ने बहुला नाम छन्दरी से उसी तरं विवाह .किया 


जिस पकार कि-इन्दर ने .शची-से किया था 
र्यातामतीव तस्यासीटद्िजवय्य मनः सदा । हे दविजश्रेष्ठ ! (ल चन्द्रमा रोदिणीमे त 


स्नेहवच्छगिनो यद्रदरोहि्यां निहितारपदम्‌ ॥ ७।५ रखते हे उसी भकार उन्तमने चटुलामे श्र पना.चित्तं 

कायोजनासक्तियुपेति न हि तन्मनः लगाया ॥ ७ ॥ उसं राजा की श्रासक्ति ` नौर किंसीं 
सवभ चैव तदालम्वि मनोऽभूतु तस्य भूमृतः ॥ ८ ॥| काम भे न दोती थी तथा स्प्न-मे.भी चट्‌ दत्तः 
चित्त दोकर उसी को.देखता था ॥८॥ .वद .राजा ,, 
उस खुन्दर "को ` चसन दी शयीर खे शरीरं का 
आलिङ्गन करकं तन्मय होजाता था ॥&॥ बहुलो का 


अद्‌ _ ` माकंश्ेयषुराण २४७ 


॥ 


भरोप्रोदेगकरं. वाक्यं मियसप्यवनीपतेः शब्द सुनते दी राजा को. वहु उद्धेग होता या, 
परस्यापि भरि सम्मानं मेने' परिभषं ततः ॥१०।॥| परन्तु बद उसको नकर बहत पसन्न टोता था 


॥ १० ॥ वहुला का ्धरापृतं पान कस्तेसमय .उसं 
भरवमेने सनं दत्तां श॒भान्याभरणानि च । | को माला तथा अमूषस कषटदायकं मालुम होते थे 


उत्तस्थावद्गपीडव पिवतोऽस्य - वरासवम्‌ ॥११।॥| रतः बह उनको उतार कर रत देता था ॥११॥ व 
अञ्जता- च नरेन्द्रेण क्षणमात्रं रे ध्रता। राजा खाते समय भी उसका हाथ पकड़ कर थोड़ा 
धुभजे स्वस्पकं भक्ष्यं द्विज नातिपुदावती ॥१२॥| सा खाल्िया करता था, परन्तु बद स्री पसंन्न न 
एव तस्यातुदल्तस्य नायुदुला महात्मनः । थी ॥१२॥ राजा का प्रेम वहुलामे अधिक थां परल 
भभृततरमत्यथं चके रागं म्टीपतिः |॥१२॥| खे चगल महात्मा से भी बह अजल न थी॥ 


प्क दप्सा चुरा पीते हषः राजा ने सुरासे भरा हश्रा 
श्रथ परानगते भूपः कदाचित्‌ तां सनस्ििनीम्‌ । | दा णक पाय वान रीषि 


सुरापूतं पानपात्रं ग्राहयामास सादरः ॥१४।॥| 1१७ उस समय बँ राजां नौर सुख्यःमुख्य 
पश्यतां :भमिपाललानां वारघुख्यैः समन्वितः मवुष्याँका समारोद था तथा वहुतसे गायक मधुर 


न लिया श्रौरः श्रपना भह पतेर जिया ! समस्त 


सा त॒ नेच्छति ततपाप्रमादातुं तत्पराङ्मुखी । | यजां के सामने श्रपमानित दोनेके कारण राजा 
समक्षमवनीशानां ततः कद्धः सं पार्थिवः ॥१६।॥ को वड़ा क्रोध श्राया ॥६ क्रोध मे सपं की तरद 
उवाच दवाःस्थमहूय निश्वसन्सुरगो यथा । | पुसकार कते हण उसने दारपालो को बुनकर 


कहा कि स देवी ने मुभे श्रभिय समम कर मेरा 
निराकृतस्तया देव्या प्रियया परतिरमियः ॥१७॥| पमान किया ह ॥ १४॥ हे दारपासो ! शीघ्र ही 


द्व्या . षटृदयामादाय ` विजने षने । | इस एठा को निर्जन वनम लेजाकर छोड़ आ 
-परित्यजाश नैवत्‌ ते विचाय्यं वचनं सम ॥१८॥॥| यद मेरा वचनदै, तुम इसमे इ विचार न करो ॥ 
माकंरडेय उवाच मार्करडेयजी 


ततो पस्य वचनमविचाय्येमवेशष्य सः। फिर रजाकी आक्षा नकर वे द्वारपाल विनां 
देखे रौर विचारे दृण उख सुल्दसे को स्थे - वैडा 
दाःस्थस्तत्याज तां सुभरमारोप्य स्यन्दने वने॥१६। वर लेग शरीर वने छोड़ आये ॥ १६॥ राजास 


साच तं विपिने त्यागं नीता तेन महीभृता] | व्यक्त होकर श्नौर उस वनभ चूटकर, उसने 
श्रहृश्यमाना तं मेने परं कृतमसु्रहम्‌ ॥२०॥ को धन्य थाना कि श्रव उस राजाको मै दिखाहं न 


} दमी ॥२गा परतु रःजा उत्तम उसके प्रेम मे विदलं 
सोऽपि ` तत्राहुरागारति-दद्यमानात्ममनसः | सारा सी नी 


श्रौततानपादिभूपालो नान्यां माय्यामबिन्दत २१।॥| ॥२१॥ राजा दिन रात उस सुन्दरीक ध्यानमे रहता 
सस्मार तां सुचान्यदधीमहर्निशमनिषटतः था । इसके साथी वह अपने राज्य "म पजा का 


राज्यं प्रजा धर्म्मेण पालयन्‌ ॥२२॥॥| धममपूज॑क पान करता था ॥९२॥ ।जस्‌ तरह. पिता 
चकार चेःनिजं रा श्रपने पुत्र का पालन करता है उसी प्रकार उन्तमं 


+ग्रजा; पालयतस्तस्य पितुः पुत्रानिवौरसान्‌ । र 
आगत्य ग्राह्यः कथिदिदमादात्तमानसः ॥२३॥| हण किसी बाह्मण ने राजा से श्राकर कटा ॥ २३॥ 

= > ,.; .“: आह्यण उवाच ~. `` | बाह्म बोला- । 
-मेहारान 'ृशतोऽस्मि भेयतां गदतो 'मम । हे महाराज ! मँ बहुत इभी ह, मेरी बात 


निये, क्योकि राजा के अतिरिक्त मयुष्योंके दुःख 
दणंमासिपरितराणमन्यतो न नराधिपात्‌ ॥२४॥ जून चकर सकता हे ॥ २९।॥ सोति फ समथ 


.शृरहदारमदुट्‌धायच्य ती समानेतुमरपिं ॥२५। "दरण करंलिया ह, उसे श्रापदी .लनि .को-संमर्धहै॥ 


२७द माकर्ठेयपुराण श्र ६६ 


ह 1 हन | दे जह्मर ! जव तुम दी नदीं जानते हो कि 
नं वेसि केनप्हूताक ग नीता तु साद्धिन। किसने तुम्हारी सजी को हरण क्रिवा श्रौर वह ऽसे 


~ = कदं लेणया तो किर मैं किसको पकड श्रौर उसे 
यतामि धिग्रह कस्य हृतो वाप्यानयामि तम्‌ ॥२६। ॥ 1 


बद्धस उवाच । बाह्मर वोला- 
तथैव स्थगिते दवारि भरसुपस्य महीपते! ¦ दे राजन्‌ ! सरेण किसने दार खोलकर मेस 


{ डि केनेद्येतदविज्ञायते | स्जीको खर लिया है ह कोई नदीं जानता श्राप . 
हता हि भाव्या किं ञायते भवान्‌ ॥२७ ` ह शको जान सवते ह 1२७) हे राजन्‌ १ श्यनो 
त्वं रक्षिता नो टपते पडमागादासवेतनः 


श्राया चुडा भाय दस श्चापको पनी रत्ताङे 
धस्पैस्य तेन नििन्ताः सपन्ति समुना निशि २८॥ वेखटक्ञे सोते ह ॥२न॥ 


तिये देते ह श्नौर इसी धमं से मरप्य रत्नि 


रजोवाच | राजा बोले- 
तते शटा मया भाय्यां यादृयरपा च देदतः। मेने तुम्हा बाह्यसी को शर ब रूप से नदीं 
देखा हे, तुम उसकी अवस्था श्रौर शील श्रादि 


वयच्ेव समाख्याहि रिशीला बाह्यणी च ते ॥२६।॥ नो चताञ्नो ॥ २६॥ 
आद्य उवाच ब्रह्य चाला- 
कठोरेत्रा सांदयु्चा हस्ववाहुः दशानना । हे राजन्‌ ! उसके नेज कठोर है, बह वहुत 
ऊ ची दहै तथा उसकी वाहु छोरी-दछोटी है, उसका 
विरूपरूपा भप्त न निन्दामि तथेव ताम्‌ ॥३० सुख कश है श्रौर बह कुरूप है तो भी मै उसकी 
निन्दा नदीं करता हं ॥ ३० ॥ दे राजन्‌ ! उसकी 
वाचि भूपातिपरपा न सम्या सा च शीलतः वारी कडोर चनौर स्वभाव दु दै! मेरी सी लिख 
इत्याख्याता मया भाय्यां साकारा दुरिरीक्षणा२१।| ऋ रुप देखने योग्य नदीं है इस भकार कौ ह२९॥ 
सनागतीतं भूपाल तस्या अयमं चयः | | दे पृ्वीपते ! उसकी पदिली वस्था व्यतीत 
| ४ छो चुकी दै । इख पकार की मेरी सनी है जिसको 
ताद्गरूपा हि मे भाग्या सत्यमेदन्मयोदितम्‌॥३२॥ कि चै सत्य कदत ह ॥द२। 
~ यजोवाच राजा वोत्ते- 
शरस ते ब्राह्मण तया भाय्यामन्थां ददामिते। हे बराल ! बह स्वी तुम्हारे दुःख का कारण 
सुखाय भाय्यां कस्याणी दुःखहेति ताद्शी।।३३।॥ थी, उसे रदने दो । मे त्हारे खख के निमि 


दुसरी भद्र स्त्री देतह ॥२३॥ टे चिप्र ! पी वनने 
कर्ये एर्पता वरिम कारणं शीलमुत्तमम्‌ | ख्य छौर शील मुख्य आरण है ! रप श्नौर शील 


१ 
सूपशीलविदहीना या त्याज्या सा तेन हेतुना ॥२३४ | रदित हेत स्त्री तयास्य ड ॥ २४ ॥ 
ग्राह्य उवप्व 1२ चोला- 
रस्या भाच्या महष इति न श्रतित्तमा । | डे राजय्‌ ! उत्तम श्रुति यदी कदतीदे कि पती 
भाय्वौयां रस्यमाणायां भजा मवति रक्षिता ॥३१।! की अब्श्व रक्ता करनी चाये ऋ्योंकि भायि ही -. 


रलम हि नायते स्या सा र्यादों नरेधर । | युत्र की उत्पत्ति होती हे एरशा हे न स्वीकीः 
सत वश्य रन्ता करनी चादिये क्योकि उससे श्त्या ` 
पनायां र्यसाणयामात्सा भवति रक्षतः २६ रूप पुत्र उत्पन्न होता है शौर पु से अपनी र्ता 


स्यामरकष्यमाणायां अविता दणसङ्करः ! | दोती दै ॥२॥ ह ष्वीपति ! उसकी रा न करने . 
प पातवेन्महीपाल पूष्वान्‌ सगांदधः पिवन्‌ ॥३५७ से उसके द्ण॑खङ्कर पुल उत्पन्न होता है जो कि 


को स्वभंसेभीगिसदेतादहै) 2७} री 

पसपेहानियालुदिनमभाव्यैस्व॒भवेन्समे } |! पियो 
विना [३ दिन ष्द्न होगी 

नेत्यक्रियाणं दिभ्रशात्‌ स चापि पतनाय मे [२८॥ हा नित्यः त ध न ॥ 


~ ------+~-----. 


श्र ६8 ३२ ` माक॑शत्युराण ३४९ ' 
<--------------------~----------------------------------- 


तरस्याघ्च पृथिवीपाल भवित्री मम सन्तति;। | दोजायेगा ॥२०॥ ह शपति ! उससे मेरी सन्तति 


षं षड्भागदात्री सा भवित्री धम्पहतकी ॥२६॥| धमी व 
र्देतत्‌ । काकारण ॥२९॥ हे प्रभु तरह भेरीः 
तदेतत्‌ ते भयाख्याता पत्नी या मे हृता भमो । श्री हरी ग वह भने श्नापसे कटदिया । अव उस 


तां समानय रक्षायां भवानधिकृतो यतः ॥४० को लाकर मेरी रक्ता करना श्नापकेश्रधिकासमे ३४०] 
माकरडेय उवाच . माकण्डेयजी वोल्े- 
स त्येवं बच! श्रत्वा विग्रष्य च नरेश्वरः वह णजा ब्राह्मण के वचन सुनकर तथा मनम 


सर्ववोपकरणेयक्तमारुरोह बिचार करके सव साज-सामान के साथ स्थ परः 
करगौ्ुकतम रुरोद महारथम्‌ ॥४१।| च व 


इतेशतथ तेनासौ परिवभ्राम मेदिनीम्‌ । | पक वदे वनमे तप का यक उत्तम शर्म देखा. 
ददशं च महारण्ये तापसाश्रमयुत्तमम्‌ ॥४२। | ॥ ४२ ॥ उस्ने वद उतर कर एक आाश्चम मे प्रवेश ` 


्वतीय्यै च तत्रासौ भषिश्य ददर एुनिम्‌ । १.७ खय १ = स 
भा जातीनि नाम | पर वैडे हप एक सु खा ॥४३॥ नृप को। 
† यां समासीनं ज्वलन्तमिव तेनसा ॥४२) श्राया हुश्रा देखकर भुनि शीधता से उठे रीर! 


र्ट दरेपतिं प्राप्तं सषुत्थाय त्वरान्वितः सम्मानपू्क उनका स्वागत करक शिष्यसे भोले 
सम्मान्य स्वागतेनेव शिष्यमादाधंमानयं ॥४४।॥| कि ष्यं लो ॥ ४४॥ शिष्य ने युनि से कद? कि, 


तमाह शिष्यः शनकेदीतन्योरऽ्यो , | इनको शर्य दिया जाय या न्दी, यह विचार कर 
र ययोस ने । श्राक्षा दीजिये, श्राप जो आक्षा देगे वदी भ करूगा । 


तदक्षापय संचिन्तय तवाज्ां हि करोम्यहम्‌ ॥४५॥ ॥ ४५.॥ उख मुनिने फिर ध्यानसे राजाका घत्ान्त | 
ततोऽवगतहत्तन्तो भृपतेस्तस्य स॒ द्विजः जानकर च्य के लिये निषेध करदियां श्रौर वातः 
सम्भाषासनदानेन चके सम्मानमात्मषान्‌ ॥४६ त श्रासन देकर राजाका सम्मान किया॥ 


। हे यजन्‌! श्राप किस निमित्त से यदः राये 
किं निमित्तमिहायातो भवीन्‌ किं ते वििरपितम्‌ । | तथा आपद कया एना? यै जाता ह्र 


उन्तामपादतनयं ` वेमि त्वाुत्तमं दप ॥४७॥॥| महाराज उत्तानपाद के पुत्र उत्तमे ह ॥ ४७॥ 
राजोवाच | राजा वेले-- 


ब्राह्मणस्य शृहाद्वाय्यां केनाप्यपहूता एने। ष सुनिजी १६ त्वे के धरसे सकी ॑ 
अविना ४ + स्जीोहरण करल हः उसका ह द्ट्तादुश्ना न यहां 
रूपेण तामनवष्टुमिदागतः ॥४८॥| आ पहुंचा ॥ 6८ ॥ हेभगवन्‌! मै विनयपूरवक पक. 


पृच्छामि यत्‌ ते तन्मे लं प्रणतस्यादुकस्पया । | वात श्रापसे पूता ह, श्राप द्या करके सुभे 
मभ्यागतस्याथं गह भगवन्‌ वकतुमहसिं ॥४६। वताइये क्योकि मेँ श्रापके धर पर श्राया ह ॥७६॥ । 

६ । व । जो कुद श्रापको पूद्धना हो ब । 

यै भामवनीपाल्‌ तत्‌ परष्टव्यमशङ्कितः निःशङ्क होकर प्ये । उसको तत्वतः मै श्राप 

वक्त॑च्यन्येत्‌ तव मया कृथयिष्यामिं तत्त; ॥५०।|.को वसलाऊं गा ॥ ५०॥ । 
राजोवाज ~ ` । ८ क = | 
षि | जव मै च्नापके धर पर श्राया था 

एहागताय यों ` मघं भषमे दशने एने । देखते ही पने छरध्यं देने को कदा था, बह ष्यं 
त्या सश्धतो दातुं थं ` सोऽर्थो निवर्तित; ॥५१॥ 0 नदीं दिया गया.१॥ ५९॥ . 


छ्टूपिरुवाच , 
तदृशनेन. रभसादाकषप्तोऽयं ` मयाः दप । त ठ ध 1 | 
4 य्दा तदादमेतेन्‌ शिष्येण भतिवीधितः ||# &4)। मुस 11 कराया ॥ ५२॥ ज्कि. प्रकार मे भूत, 
एष वेत्ति जगत्यत्र: मल्मसादादनोगतम्‌ | . ` `| भविष्य श्रीरं वतमान ` का "दलिःजानता ह उसी 


1 1 ध [.) 


-माकंरढेयपुराण 


: अ०--६६ 


यथाहं मरीतंच वरदभानञ्च सर्वत; ॥५३॥ प्रकार मेरी कृपा से थद शिष्य भी जानता हे ॥५३॥ 


भ्रालोच्या्ञापयेदयुक्ते ततो ज्ञातं मयापि ठत्‌। 


ततो न दत्तवानधंमहं तुभ्यं षिधानतः ॥५४। 


सतं राजन्‌ त्मर्पाहः इले सायम्धुवस्य च |. 


तथापि नाधंयोग्यं तां मन्यामो वमडुत्तमम्‌ ॥५५। हम 


राजोनाच 
कि कृतं हि भया ब्ह्यन्‌ ज्ञानादज्ञानतोऽपि बा । 


येन तवत्तोऽ्म्हामि नाहमभ्यागतथिराद्‌ ॥५६. 
ऋषिरुवाच 
किं विस्मृतं ये यत्‌ पत्नी त्वया त्यक्ता च कानने | 


परित्यक्तस्तमा साधं तया धर्म्मो टृपाखिलः॥।५७। 
पक्षेण कम्पो हान्या भयात्यस्पशेतां नरः । 
विरूतैवाषिकी यस्य हानिस्ते नित्यकम्पणः।।५८॥ 
पल्यातुश्ूलया भाव्यं यथाशीलेऽपि भर्तरि । ` 
दुःशीलापि तथा भाग्या पोषणीया नरेश्वर।।५६॥ 
तिला हि सा पल्ली तस्य विप्रस्य या हता | 
तथापि धम्बकामोऽपौ ताणुहयारितरां इ९।६०॥ 
चलतः स्थापयस्यन्यान्‌ स्वधर्मेषु महीपते | 


त्वा स्वधभ्मां विचलितं कोऽपरः स्थापयिष्यति॥६१।' 
माकडेय उवाच । 
विलय; स॒ महीपाल इत्युक्तस्तेन धीमता । 


तथेत्युक्त्वा च पमच्छ हृतां पत्नीं द्विजन्मनः ॥६२॥ 


भगवन्‌ फेन नीता सा पत्नी विप्रस्य इत्र दा 


-श्रतीतानागतं वत्ति जगत्यवितथं भवान्‌ | 


त ऋषिरुवाच 
}तां नहारा बलाको. नाम राक्षसः 


| ्ै द्‌ ध 
द्रष्ये चाय तां भूष .उतलावतक ` वने ॥६४॥ 


: गच्छ संयोजयाश॒ लवं भास्यया दिं द्विजोत्तमम्‌ } 
मा पापास्पदतां यातु खमिवासौ दिने दिने ॥६१. 


१ (व । 
१ 
१२१५ 
„ 


जव इस शिष्य ने का किं विचार करके रक्ष 
दीजिये, तव मैने श्रापका सव वृत्तान्त मनमे जान 
लिया श्नौर आपको विधानपूर्वक छ्य न दिया ॥ 
हे राज्ञन्‌ ! थह सत्य है कि श्राप ` स्वायम्भुव के 
छल मे उत्पन्न होकर चर्यं के श्रधिकारी है परन्तु 
श्रापको अघ्यं के योग्य नदीं मानते दै ॥५५॥ 
राजा वोज्ते- । 3.८६ 

हे ब्रह्मन्‌ ¡ मैन कषान से श्रथव ज्ञान से कौन 
सा पाप किया है जिससे श्तने दिन वाद्‌ श्राये हष 
मुभको अपि शर्य के अयोग्य समर्भते है ॥५६॥ . 
ऋषि चोज्े-- । क 

हे राजन्‌ ! क्या श्राप- भूल गये कि , श्रापने 


पत्नी को वन मँ छोडने से उसके साथ सम्पू 


धर्मौ को भी ड़ दिया है १॥ ५७॥ जिस मयुष्यं 
की एक पत्ततक क्रियाश्च की हानि इई रो उसको 
स्पशं नहीं करना व्चाहिये, जिसके नित्यकमो की 
हानि एक वषं तक हृ दो उसका तो. कटना दी 
कया हे ॥ ४८ ॥ हे नरेश्वर | जिस प्रकारं पुरषःका 
कतव्य कि श्ररृ्ूल श्रौर सुशीला रत्री का पालनं 
करे, उखी प्रहर दुःशीला स्त्री काभी पोषणे 
करना मरुप्य को उब्दित है ॥ ५६ ॥ हे राजन्‌ ! स 


ब्रह्य चमे रची र्यी दर्रे प्रतिकूल रलती-थी 


परन्तु धमे कौ वामना सि ये बहश छापसे श्रपनी 
श्त्री की याचना करता है ॥६०॥ हे पृथ्वीपते ! श्राप 
से; धमं करने बालों केः धर्म से रिथन करते हो, 
परन्त॒ जच छण ₹\ धर्मं से त्रिचलित होते है तो 
चापको दीन धम मे स्थापित करेगा ॥६१॥ 
म कंडी वं ले- व 

ठह राजा ऋषि की यह वात सुनकर ललित 
दशना श्रौर फिर बाह्य की पट्नीकी चोरीके विषय 
मे पृद्धने लगा ॥ ६२॥ ठे भगवन्‌ ! बाह्य की चह 
पत्ती किसने ली है रथा वह श्रध क ह. .श्राप 
भूत, भविष्य श्र, वतमान को जानते दै, श 
लिये फदिये ॥ ६३ ॥ ~ 

हे ` राजन्‌ } उस ब्राह्मणी को श्राद्धि के पुध 
वलाक नाम राक्तस ने चराय! है । श्राप उसको 
श्ाज दी उत्पला वतक वन म देख सरके ॥ ६४॥ 
श्राप जाइये श्रौर शीश द श्रेष्ठ बराह्मण को इसकी 
पल्ली दिल्ञनादये जिसे दिनपर दिन श्रापकी तरह 
-यह भी पापकाभागी न वने॥६५॥ :. ~ --- 


,.. ~ इति शरीमाकंर्डेयपुरारमे उतम मन्वंतर नाम ६बाँ अध्याय समाप्त | ^; ^: 


अ० ७० माकरेयषुराण ` २५१ ` 
स 


सत्तरवां अध्याय 


माकैरडेयजी बोक्े- 
इसे वराद राजा महामुनि को प्रणाम कर. 
श्रपने रथ पर चट्‌ सुनि बताये दए उत्पलावतैक ` 
घेन की शरोर चला ॥ ९॥ षहा प्च कर. राजा ने. 
एक स्त्री को भिसका स्वरूप बिल्कुल वैसादी था ' 
जेसा कि उस व्राह्मण ने अपनी स्री का वताया ' 
था देखा। - राजाने उससे पृदा, “हे मद्रे ¡ तुम षस ` 
वन मे कैसे आई १ सत्य कटो. तुम तो विशाल ` 
नास ब्राह्मण के पुत्र की स्त्री हो"॥३॥ ; 
ब्राह्मणी बोल्ली- । 
मँ वनवासी ह्मण अतिरा्की पुची हं तथा 
जिस आपने नाम लिया उस विशाल पुत्र की 
स्त्री हं ॥ ४॥ मुभको चलाक नाम दुष्ट राक्वस ने 
रानि में सेति हुए घर से चुरा लिया है तथा दसी 
कारण मेरा भाई | माता श्नौर पति खे चियोग हो 
गया है ॥५॥ जिस रात्तसने करि मेरा माता श्रौर 
भारै-बन्धुश्ं से वियोग करा दिया है बहे जलकरः 
भस्म हदोजाय, मै यह अत्यन्त दुःखित होकर 
रहती ह ॥६॥ इसं अत्यन्त गदन वन मे उसने सुभे 
लाकर रका है, सुभे इसका कारण नदीं मालुम है 


माकडेय उवाच 
अथारुरोह सरथं परणिपत्य - मराघनिम्‌ । 
तेनारूयातं वनं तच्च भय्याृतपलावतप्‌ ॥ १ 
यथाख्यातस्वरूपाश्च भांय्यां भ्रा द्विजस्य ताम्‌। 
भक्षयन्तीं ददर्शाथ. श्रीफलानि. नरेधरः ॥ २॥ 
पच्छः च ` केथं भूरे - त्मेतद्रनमागता । 
स्फुटं वीहि वैशालेरपि भाय्यां सुशम्मणः ॥ ३॥ 
। ब्राह्मर वाच 

संताहमतिरा्रस्य॒ दविजस्य वनवापिनः 
पत्नी. षिशलपुत्रस्य यस्य नाम त्वयोदितम्‌ ॥ ४ ॥ 
साहं हृता वलाकेन राक्षसेन दुरात्मना । 
भसुश्ा भवनस्यान्ते श्राठ्‌-मारवियोभिता ॥ ५॥ 
भस्पीभवतु तद्रक्षो येनास्म्येवं षियोनिता | 


मत्रा भरादभिरन्यैष पिठा्यव शदःिता ॥ ६॥ 


स्मिन्‌ वनेऽतिगहने सेनानीयाहमष्ुन्‌भिता। व 
न वैन्नि कारणं किं तनोपथक्ते न खादति ॥७। दै शरोर न सुभे खाता दी है ॥७॥ 
रजोवाच राजा क | ध 
ह ब्राह्म क्यात्‌ जा कं वह्‌ य्तस 
मपि लाते ररता्ठछनयःफ १ गर्‌ यमे छोडकर कहां न मँ तेर स्वामी का, भेजा 
अहं भत्रं तवैवात्र मेषितो दिजनन्दिनि ॥ ८ ॥| इश्रा श्राया ह ॥ ८॥ 
जह्यरयुवाच ब्राह्मणी वाली-- 


{ इसी वन के दूसरे छोर पर बह रक्षसे रहता 
स्येव काननस्यान्ते स॒ तिष्ठति निशाचरः । (1 
परविश्य परश्यतु मवान्‌ न विभेति ततो यदि ॥ ६ ॥ >ख लीजिये ॥६॥ 
+ .. माक॑रडेय उवाच माकेरुडेयजी वोले-- 
)-भविवेश,ततः सोऽथ तया वत्ैनि दर्शिते 1 ने कु व 
[ि | वनम प्रवेशं या समर शा 
ध . व । | राक्तस करो देखा ॥.१०॥ शीघ्र वह रा्तस राजाकरो 


देखते दी दुर से दी सुक कर्‌ प्रणाम करता इभा 
दृदेव मही भूरष्नां स्पृशन्‌ पादान्तिकं ययो ॥११॥| राजा के निकट पटुचा ॥ ५८॥ 
: ; ˆ राक्षस उवाच 


राच चोला- 
मसात्रगिच्छता गेहं. प्रसादस्ते महान्‌ कृतः । 


श्राप जो यहाँ मेरे धरः पर श्राय यद श्रापकरी 
वदी रपा है, क्योकि मै यापक राज्यमें रना 
` परशापि.िःकसेस्येष ब्रह्मि विषये तव ॥१२॥ 


। इसलिये आकष! दीजिये क्कि क्था. करू ॥१२॥ 


` २५२ माकंर्टेयपुराण | आअ०-७+ 


क | स्थीयताज्चेदमासनम्‌ श्राप इस चर्यं को लीजिये तथा इख रासन << 
अधभ्चेमं भरतीच्छ त्वं स्थीयताञ्चेदमासनम्‌ । त 
आज्ञाकरे ॥१३॥ ` 
राजा वेत्ते-- 

हे राज्ञस ! तुमने यह सव अतिथि-सत्कार तो 
किया परन्तु यह यताश्रो कि तुम इस ब्राह्म की , 
स्रीकोक्योँले रये दो १॥ १४ ॥ यदि तुम श्ख 1. 
को श्रपनी सरी वनानेकेलिये लये हो तो यद 
| खरूपवान्‌ नदी वरन्‌ कुरूपा है नौर यदि.खाने. के 
लिये लाये हो तो तुमने इखको श्रवतक क्यो न्दी 
खाया, यद पुभसे कटो ॥ १५॥ .. 
रा्तख बोला-- ` ` ` (त 

हे राजन्‌ ! टम लोगं भवुष्य-भक्ती नदीं है, वे 
राक्षस दूसरे ह । दम ल्लोग इस वनके उक्तम फलं 


सुकृतस्य फलं यत्‌ तु तदश्चीमो वयं दप ॥१ साति दै ॥ ९६॥ मेरा तथा मेरी खियो का खभावः 
मयुष्यों जैसा ह । में अपनी सियो का मान करता 


स्वभावंच मनुष्याणां योभिताच विमानिताः। | हनाव य करी दै, वम मलुयभलीः नदी दै 
मानिताश्च समश्चीमो न षयं जन्तुखादकाः ॥१७।॥| ॥ ९७॥ क्योकि मँ मलुष्यौ पर दया करता हँ श्छ. 
आभिदेणां | किये वे समले कुद रहते है, यदि मै भी द 
॥ न्तिभुक्त ष्यन्ति तेरदा। स्वभावचाला दोता तो वे भुको.शुखवान्‌ समते 
भुक्ते दष स्वभाषे च गुणवन्तो भवन्ति च ॥१८॥| ॥१८॥ हे राजन्‌ ! हमारे यहाँ श्रगेक खियां प्सः 
; ¡ सया राशो के समान रूपवान्‌ दै, उन न्दर राक्तसियोँ ` . 
सन्ति नः ममदा भप सूपेणाप्सरसां समा; । क दते ह भेरी कर्पा "लणयखियो भै प्रीतिः 
राक्षस्यस्तासु तिष्ठतु मानुषीषु रतिः कथम्‌ ॥१६॥ कैसे डोगी १॥ १९॥ 
राजोवाच राजा वेले- | नः 
यत्रेषा नोपभोगाय नाहाराय निशाचरं दे निशाचर ! यदि य ब्राह्मणी न तो भोग के 
५ लिये ओर न खाने के लिये है तो तुमने तऋह्मण के ` 
गृह भ्रषिश्य विप्रस्य तत्‌ फिमेषा हता त्वया! 1२ © ॥ । श्वर मे घुस कर इसको क्यो हरण क्रिया 4 ॥ २० ॥ ४ 
राकस उवाच राक्षस बोलला- । ॥ 
मन्त्रवित्‌ स द्विजश्रेष्ठो ये यत्ने गतस्य मे । दे राजन्‌ ! वह बाह्मण. ५ है श्रौर जिस 
्रमन् करोत्य्ाटनं यज्ञ मे.म जातय दहं बदँ ही से र्लोध्न मन्न पदृकर 
रो पठनाद्‌ करोतयुायनं छप. ॥२१॥| बह मेर उन करदेत व ॥ २१॥ उसके मन्त्र 
चय युभुक्ितास्तस्य मन्वोचाटनकरम्णा । उच्चारण से ट्म लोग भूखे हे, हे राजन्‌ ! अवम । 
ए यामः सर्वययजेयु स॒ ऋत्वग्भवति द्विन ॥२२॥| कर जाय क्योकि बह. समी यो भे , ऋत्विक, 
न होता है ॥ २२॥ इसलिये इसके किये यद - 
ततोऽस्मामिरिदं तस॒ वैकतयषटपपादितम्‌ । . होता है ॥ २२॥ इसलिये हमने इसके किये यद 


उपाय्‌ निकाला है । स्री के विना वह यज्ञकमं करने: 
पल्या विना पुमानिञ्या-कम्मयोग्यो न जायते॥ २३ | के योग्य न रहेगा ॥ २३॥ > 


वयं भृत्या भवान्‌ स्वामी दृदमाह्ापयस्व माम्‌ १३॥ 
राजोचाच 


कतमे त्रया सव्वं सव्वामिदातिधिक्रियाम्‌ । 
किमयं ब्राह्मणएबपुस््वयानीता निशाचर ॥१४॥ 


तेयं सुरूपा सन्स्यन्या भाय्यारथनयेत्‌ हुता त्वया । 


भक्ष्यार्थं चेत्‌ कथं नात्ता त्वयैतत्‌ कथ्यतां मम्‌॥११॥ 
शंच्तस उवाच 
न चयं मादुषाहारा अन्ये ते वरप राक्षसाः। 


न, 
भ 


माकंरडेय उचाच माक॑रडेयजी वोक्ते- । 
वेकरयोक्चारणात्‌ तस्य ब्राह्यणस्य महामतेः ।. . | ` हे कौषटुकि ! उख व्राह्मण की यद.चिकलता का- 


ततः स राजातिभूशं विपस्मः समजायत ।[२४।| विचार करर राजाको अत्यन्त भल होनेलगा॥२४॥ 


देकरयमेव नि उस ब्राह्मण. -की विकलता का वणन करके यह. 
स्मेव विमस्य बदन मामेव निन्दति । | च्चस भेरी निन्दा कसा है, सनिते भी सुमे अये 
१५. ५. च मा. साञ्प्याह्‌ युनिसत्तमः ॥२५।॥.क श्रयोग्य.वताया था २५ रात्तसने उत्त बाह्मर , 


"न = ~~ ~~~ ~ ~~ 


अ माकेरेयपुराण २१९ 


--- ~ -~~-~---~-------~-~------------~--~---~-~------ 


वैकरयं तस्य विभरस्य राक्षसोऽप्याह मे यथा! ` | फी 1 मानों मेरी दी निकलता - 
० वताहै है 1.चिनाखरी के मै, छत्यधिक सङ्कटापन्न ` 
अपत्नीकतया सोऽहं सङ्कटं महदास्थितः ॥२९॥ हो मया ह ॥ २६॥ ` "` `` ` 1 


। माकरडेय उवाच माकर्डेयजी वोले-- ६ ® ^ 
एवं चिन्तयतस्तस्य पुनरप्याह राक्षसः । हे मुनि ! इख कार सोच करते हृष्ट उस ¦ 
४ & राकस ने राजा से दाथ जोड़ कर प्रणाम करते : 

 भएमनम्नो राजानं बद्धाज्ञलिपटो सुने ॥२७॥| इष बहा ॥ २७॥ | 
राच्चेस उवच रात्तस योला- ॥ 

नरेनदरज्ञापदानेन भसादः क्रियतां मम। हे राजन. ! सु दीन सेषक पर श्प छपा , 


क यवासिन के प्राज्ञा जिय, 
1 आपकर न्य मरने ` 


। राजोवाच राजा वेले-- ५ 
स्वभावं वयमश्चीमस्त्वयोक्तं यन्निशाचर । हे राज्ञस ! जिस प्रकार बाह्मण उसी प्रकार , 


तदधिनो बयं येन का्येस शरु तन्मम ॥२६॥ मेरा भी दाल है । शरिये जोव कह द खनो । 
॥ २६॥ श्राज त॒म इस ब्राह्मसी के दुम्पील को 


भ्स्यास्त्वया् बराह्मणा दौशीर्थषुपधेल्यताम्‌। | यक्ण कर जशो जिससे कि यह श्चपने दुःशील 


येन ल्यात्दौ$शीरया तद्वितीता भवेदियम्‌ ।॥२०॥ को चोड़ कर नम्र दो जाने ॥२०॥ दे निशाचर । 
फिर सको उस व्राह्मण के घर पर्हुचा देना जिस 


नीयतां यस्य भाय्यं तस्य येश्म निशाचर । | की पि. यह ली है, तारे येखा करने पर भर 
श्रसिमिन्‌ ङते कतं सव्वं शृदमभ्यागतस्य मे ॥३१॥| यहाँ श्राने का श्राशय पृं हो जायगा ॥ ३१ ॥ 
भाकैरडेय उवाच माकरडेयजी वोत्ते-- 


“ ततः स राक्षसस्तस्या प्रविश्यान्तः स्वमायया । फिर वद्‌ रा्तसं राजा की आक्ञा के श्रचुसार' 
शछ्रपनी माया से उस ब्राह्मसी के अन्दर शुस.गया 


भक्षयामास दौशीर्यं निजशक्त्या दृपाज्ञया॥२२) | श्नौर उसने श्रपनी शक्ति से उसके दुभ्शील को.खा 


{शील्येनातिसगरेण न्मनः लिया ॥ ३२॥ जव उस ब्राह्मणी की वह्‌ भीषणं 
दौभीर ही कसय प्न | शीलता निकल गई तच बह राजा के प्रति बोलीः 


तेन सा सम्परित्यक्ता तमाह जगतीपतिम्‌ ॥३३।| ।२२॥ श्रपने कम के फलसे दी मेरा अयने मदात्मा 
सवकम्भफलपाेन भदसतस्य महात्मनः । | पति से बियोग होकर १ वस का साला 

दियोजितां तद्धेतरयमासीन्निशाचर ¢ # ) २४ ॥ इस यच्तस का उस महात्मा मर पराच. 
शा वत त 9) १ काकोई त तथा न यद श्रौर किसी.का 

ष {` दो है, यद मेरे क्रिये कम॑ का भोग है ॥ ३४॥ 
प्मेव ` दोषो नान्यस्य सुकृत टरुप्ज्यते ॥२५' | पूर्व जन्मे मैने किसी का वियोगः किया ` दोगा 
अन्यजन्मनि कस्यापि विमंयोगः तो मया । (जिसके कार्‌ कि सुमे नियोग सहना पड । ई 

, सोऽयं भयाप्युपगतः को दोपौऽस्य महात्मनः॥॥३६॥ (ला का कोई दोष नदीं दै ॥२९॥ 

ध ग | ह भ, क्से भ इसे पतिं के 
भापयामि । तवादेशादिमा । शतु श प्रभो । | घर पहुचावा ह । हे रजन्‌ ! श्व जो छ श्रीर 
यदन्यत्‌ करणीयं , ते तदाङ्ञापय पार्थिव ॥३७॥|| करना चो उसे शरा्ञा करे ॥२७ ध. 

४ , , शजोचाच । राजा बेते- 


अस्मन्‌ ते कृतं सन्वं लया मे रजनीचर + ' हे निशाचर ! इतना करने प्र नै समभगाकि 
॥ । यने खव कद कर दिया । कायै होने परः म त॒म 


। + ्यकाले त 9 तो र | “ 
श्रागन्तन्यश्च ते घीर क्य स्परतेन मे ॥३८।॥ को याद कष तो ठम मेरे पासं शाना ॥र८॥ 


२५४ माकरुढेयुराण अ० .७१ 


अकर्डंय उच्च 


तथेत्युक्ता तु तद्षस्तामादाय दविजा्गनम्‌ । राज्ञा ऊ यह कने पर उस -क्तख ने उख 


ब्राह्मसी को जिसका किं दुः्लील . नट दोगवा थो 


0 111 


निन्ये भृत्तश्दं शां दोःशीर्यापममात्‌ चटा ॥९६।॥ उस पति कै पर्चा चिया.॥ ३६॥ ॥ 
इति ्रीमारगरडेवषुतण रटेयपराण भँ जौत्तम मन्वन्तर मे द्विच भार्यानयननाम ७०्वां अध्याय समापन ! 
~ -स्प > व्यः - । - - 
इङ्हचर्गो अध्याय 
मार्करडेय उवाच भार्क॑रडेयजी वोत 
तं भेषविला राजापि खभ रहमङ्गनाम्‌ । ~ रला ञ्छ वबाह्यी को उसके पति कते धर 


मिजवाक्रर श्या जे लेकर चिन्ता करने-लगा किं 
नि | 

चिन्तयामास निधय करिवर सुं भवद्‌ ॥ १॥' पेय पुर्व किख तरह चले ॥९॥ यद बड़े क्ष की 

अनययोग्यताक्ः स॒ मामाह महामनाः। वात कि उख सुनि ने सुक अध्यं के श्रयोग्य 

दकस्य वि्रषटिशय तथाहायं निशाचरः ॥ २ 1; क्ताया था तथा ब्राह्मण के वहाने से उस .राक्तसुने 


दोऽ कयं करिष्यामि चक्ता पत्नी मया हिरा : मेरी निन्दा की ॥ २1 च्पनी उख पत्नी को त्याग 


ह पृच्छामि कर अव मं क्या कर अथवा ज्षानचचु उस सुनि 
परयवा जानं ठं पृच्छामि इनिसत्तमम्‌ ॥ २ ॥ से दी पृष्ट ॥ ३॥ बह राजा इख प्रक्षार सोद कर - 


सचिन्तेत्यं स भू्यलः समारुह्य च तं रथम्‌ । ¦ शपते रथ पर चढ़कर वद या जद बह. धर्मात्मा - 
ययौ यत्र स धर्म्मात्मा त्रिकालज्ञो महायुनिः॥ ।॥ चिकालक्ञ छषि रहता था 1 ४ ॥ उसं सुनि के पास 
अय स्याद्‌ सोऽय तं समेत्य परणम्य च । ¦ ताने पर राजाने रथ खे उतर सुनिको भाम किया 


तथा राक्तस से मिलने पर जो द्धं इञा था वह ` 
यथात समाचख्या राक्षन समागमम्‌ ॥ र ॥ कह सुनाया ॥५॥ त्ाहयरी को देखना, उसका, 


च्राद्वए्या दशनब्वेव द‡शस्यापगम्‌ तथा । | दुःशील हरण, उसका स्वामी के .धर मेजा जानां 
मेषणं भृत्त गेहे च काय्यमागमनं च यत्‌ || & 1 तथा अपने आने का कारण, यहंखव कह दिया ॥ 
पिदवाच | ऋषि वेले-- 


काययमागमने चैव भलवमीपे रवार ्मापके यद्या आने का कारण सव ङ मुभे पिके 
गमने च॑व मत्स्माप॒ तवाछलम्‌ ॥ ७ ॥ ही विदित हे ॥७॥ ह पृश्वीपालक ! तुम सुखे . 


पृच्छ मामिह ई काय्यं मयेलयुदिञ्नमानसः। । पूद्धो कि तुम उद्रि चित्त क्यों दो 1 श्रपने यह. 
स्वय्यागते महीपाल शरण काय्यञ्च चद्‌ तया ॥ ८ 11 पर चाने का कारण भी तुमःखनो ॥ ८ ॥ मुष्यो के - 


। धमे, अर्थं श्मोर काम का प्रबल कारणल्री दी 
ःपली घरम्मयिकरामानां कारणं मचल टृणाम्‌ । | उमे छोड दे समजञन्य खा विदेय चं १ 


श 
ऽविरोषतथ थम्ब सन्तयकतसत्यजता हि ताम्‌ ॥ & 1 | जाना है ॥ ६॥ हे राजन्‌ ! च ह्ण, चतरय, वैश्य ` 
हश्रपत्तीको नरो भुन योग्यो निजकम्बणाम्‌ | | श्रथवाष्कोदैभीहो खी के दिना वह मनुष्य 
त्राह्मणः त्रियो वापि वैश्यः शच्रोऽपि बा ० ६ # योग्य नीं दे ॥ १० ॥ आपने श्रपनी ` 
वनवा मवा पल न शोमनमत्ठिय्‌ | | सोयी 
प्रत्याज्यो हि यया भत्ताद्धीणां भध्य्यात्रयादरणाम्‌ ।|| कि खी को श्रपना पति न दछोडना चाहिये ॥१९॥ 
राजोवाच राजा वो्े-- ` = 


हे भगवम्‌ ! में क्या करू यह्‌ मेरे कमोक्रा फल 
कयोम्पेष विपाको : ॐ 
पगवन्‌ किं क विपाको मम्‌ कम्म॑णाम्‌ । ; दै 1 मेरे च्रयुकृल टोते इए भी बह मसे घतिकृल 


म ~ ~~न + + ~~~ ~~~. --- ~~~ ~ 


हातमेतन्मया पूव्यं यत्‌ छृतं ते नराधिप । | हे राजन्‌ ! ्रापने जो कु क्रिया वह. वथा _ 
{ 
{ 


तति 


~ अ०,७१ .पाकेर्टेयपुराण २५१ 


न्िकलाबुदरूतस्य यस्मात्‌ त्यक्ता तती मया।१२५ थी, इसी कारण से मेने उसे छोड़ा ॥१२:॥ वह.जो 
यदयत्‌ करोति तच्‌ कान्तं दह्यमानेन चेतसा । | छ भी कती थी उसको मँ क्षपा करदिया करता 


था । हे भगवन ! उसके विथोगकूपी शरभ्निसे मेय 
भगवंस्तद्वियोगाि-विभीतेनान्तरात्मना ॥१३॥ हृदय वतक जल गहा है॥ ९३ ॥ उसो चन 


साम्बतन्तु षने त्यक्ता नवेश सु सा गता। | छोड़कर मै नरी जानता किं चह कटां गई अ्रथवा 
भक्षिता वापि षिपिने सिंद-व्याघ्र निशाचरे; ॥१४॥| उसको सिद, व्याघ्र, रात्तसादिने साक्तिया ॥ 


+ फपिरुवाच 


हे राजन्‌ } उसको सिद, व्याघ्र श्रथवा राक्तस 
न भक्षिता सा भूषा सिंह-व्याघ्र-निशाचरः वि का 2 शत य वि 
सा त्वपिप्लुतचारित्ा साम्पतन्तु रसातले ॥१५॥ बाली दै तथा रसातल मे रदवी हे ॥ १५॥ 
राजोवाच । राजा योज्े- ि 
सा नीता केन पातालमास्ते साऽदूपिता कथम्‌ । है व्रह्मन्‌ ! उसको पातालम कौन सेगया तथा 


वह श्रव तक दोपरदित किंस प्रकार है १ यह बड़ी 
अत्यटथतमिदं व्रह्मन्‌ यथावद्रक्तुमहसि ॥१६।॥ द्धन वात है, रपा कर घताश्ये ॥१६॥ 
छपिरुवाच | श्पि वले- 

पाताले नागराजोऽस्ति प्रख्यात कपोतकः व १ क का न । 

सै तुम्हार दौड देनं पर उसको उस वनम धमते हए 

तेनच्छा व रममाणा महावने ॥१७।| दन्द व प क 

सा सपशातिनी, तेन्‌ साञरगेण पार्थिवे । | सी से भमपूर्क उसका हाल पूच्कर चद उसे 
वेदितार्थेन पातालं नीता सा युवी तदा ॥१८।। पाताल को लिवाकर क्ेगया ॥ १८ ॥ हे शप ! वहाँ ` 

ततस्तस्य सुता सुभर्न्दा नाम महीपते | उस नागगज की सुन्दरी नन्दा नाम पुत्री थी तथा 


। + उस वुद्धिमान्‌ की स्री का नाम मनोरमा था ॥१६॥ 
मय्या मनोरमा चास्य नागराजस्य धीमतः ॥१६॥| यद छन्द तेरी मंदी सपत्नी होमो. शस प्रकार 


तया मातुः सपत्नोयं धा भविप्रीति शाभना । | उसने श्रपनी पुत्री नन्दा से कटा रौर वह उसे 
षट खगेहं सा नीता युक्षा चान्तःपुरे शमा ॥२०॥| श्रपने धर के + पुरम व ॥ २०॥ जिस 

| नन्दा ४ भो समय नागयज ने यह्‌ कहा नन्दा ने उसका ङ्द 

््ा ठ याचिता ९ ददाति | | उत्तर न दिया । इसपर नागराज नै कहा कित्‌ 
मूका ममिष्यसीत्याहे तदा तां तनयां पिता ।।२१॥| भगी दोजा ॥ २९ ॥ हे राजन ! पिता ऊँ इस भकार 
एवं शप्ता युता तेन सा घास्ते तत्र भषते। शाप देने पर नन्दा गेगी दोग श्नौर फिर नागराज 
नीता तेनोरगेनद्रेए धृता तत्सुतया सती ॥२२॥ ने भ्रापकी लको अपनी कन्याके साथ रखदिया ॥ 
व ध व इषित ढोकर उनसे पूद्खने 

तो : राना परं हपमवाप्य॒तमपृचछत । लगे क्रि श्रपनी खरी के परति मेरे शस दुभाग्य का 
दविनवन्यं सदौभाग्य-कारणं दयितां प्रति ॥२३॥| शरण क्या दै १॥ २८२॥ ॑ 
५, राजोवाच राजा घेति 


हे भगवन्‌ ! सव लोगों मे मेरी भीति श्रपनी 

, भगवन्‌ सर्व्वलोकस्य मयि प्रीतिरुत्तमा । अ 
किं नं'तत्‌ कारणं येन सपत्नी नातिवत्सक्ला ॥२४॥| कि वद सुभसे भीति पो र एकी १४ ॥ हे 
मदामुनिजी ! मै उसको पराण धिक परिय 

मम ` चारावतीवेष्ठ भ्राणेभ्यो्े महामन । खता था परन्तु बह मेरे परति दुःशील रखती थी 

साच भां प्रति दुःशीलता ्रहि यत्‌ कारणं दविज ":२५॥ ह दधिज ! इसका कारण वताद्ये ॥२४॥ , 
ध पि बोल्े- 
ऋषिरुवाच 

` प्रणिप्रहणकाले ` तवं सू्य-मोम-शनेश्वरैः। ,| पाणिग्रहण के समय तु्दारी खौ के अद को 


--- - -- ~~~ 


„२५६ माकरेयुराण  'भ*७य्‌ 


व) ५ ० 


[क्र-वाचस्पतिम्याश्च तव भाप्यावलोकिता ।॥२६।॥ खय, मन्गलं र शक 9 देहे | 
ऽ + था | | येपर्षी उस युहतेमे चन्द्रमा श्रोर वुघमी परस्पर 
व 1 ॥२७॥ बिपी होते इण श्रापको श्रनि करनेवाले ये॥२७॥ 
रवर त, ततर पाव १ शृषबर्‌ इसलिये श्रव श्राप जाये श्रीर धमेपूर्वेक पृथ्वीका 
च्छ तं स्वधम्मण परिपालय मेदिनीम्‌ । | पालन करिये तथा श्रपंनी छी के साय 
त्तीसहायः सर्व्वा कुरु धम्मवतीः क्रियाः ॥२८॥ धार्मिक क्रियाश्च को संपादितं करिये ॥ २८॥ 
माकंरडेय उवाचं माक्रर्डयजी चोल्े-- ४ 
तयुते भणिपत्येनमारु् स्यन्दनं ततः । ऋषि के पेसा कहते पंर राजान उनको प्रणाम 
किया श्रौर श्रपने र्थ पर चढ़ कर राजा उत्तम 
त्तमः पृथिवीपाल आजगाम निनं पुरम्‌ ॥२६॥ श्रपते नगर को शये ॥ २६॥ 


इति श्रीमाकंण्डेयपुराण मे आततम्‌ मन्वन्तर मे ७१बोँ अ° समाप । 
"~ ~~ 


वहुतरं अध्याय 


माकौरडेय उवाच माकरएडेयजी वोल्ते- 
[तः खनगरं प्राप्य तं ददशं द्विजं वपः तव ्रपने नगर में पर्हुचकर राजा ने प्रसक्र 
। द्ाह्णए को शपेनी शीतर्वती खी 

मेवं भार्यया चेव शीलबस्या युदान्वितम्‌ ॥ १॥ क खदित देखा ॥ ९॥ 
ब्राह्मण उवाच ब्राह्मण बोला- 4.4 
गजव्य छृतार्थोऽस्मि यतो धर्मद रक्ितः दे राजन्‌ ! मै. आपसे कृताथ इश 1. श्राप; 
धर्मज्ञ है, आपने मेरी खी को लाकर मेरे धर्म 

म्महेनेह भवता मा्यामानयता मम ॥२॥| की राकी ॥२॥ ` . 


राजोवाच राजा वेले-- । 
(तार्थस्तवं द्विजश्रेष्ठ निजधर्म्मालुपालना्‌ । शरेष्ठ विपर {श्राप तो धमं कां र्न कटे 
न के कारण कृतःथं होगये परन्तु मै बडे सङ्कट मे 
यं सङ्कटिनो पिम येषां पतनी न वेश्मनि ॥२॥ क्योकि मेरे षर भे सखी नहीं है ॥३॥ - 
| ब्राह्मण उवाच बर्ण वोला- 
रेन सा हि पिपिने भक्षिता श्वापदेयदि | ` हे राजन्‌ ¡ यदि श्रापकी खी को किसी पने 


चन मै खालिया हो तो चवं वह कहाँ से अधिग 


्रलं तया किमन्यस्या न पाणिगदयते त्वया | | अव श्राप दूसरी खरी से विवा कयो नदीं करते 
श्रापने कोघ.के वशीभूत होकर -श्रपने ध्म. की 
क्रोधस्य वशमागस्य षर्म्मो न रक्षितंस्वया ।॥ ४॥ रज्ञा न कौ ॥४॥ 4 


. राजोवाच. . ` , "` । राजा वोक्े- 


न भक्षिता मे दयिता श्वापदैः सा हि जीवति । न खी को म ने नदीं क 
भरविदूषितचारिजरा कथमेतत्‌ करोम्यदम्‌ ॥ ५॥ सी स्थ यर त 1 


बराह्मण उवाच ` ` | ब्रह्मण बोला--,. 
यदि जीवति ते भाय्यां न चेव व्यभिचारिणी | यदि श्रापकी खी जीवितदै नौर व्यभिचारिणी - 


तदपन्नीकताजन्म.कि पापं क्रियते तया ॥ ६॥| नदीं इद दै, तो खी के विना राप पाप क्यो 
मा रहे है.१॥ ६] | 


( 2) । 


-श०७२ ३३ ` मादरुटेयपुराण | २४७ 


राजोवाच ` ` राजा वेल्ते-- 
आनीतापि हि सा विप्र पतिला सदैव मे। हे बाह्मण । यदि वह श्माभी जायमी तो उसके 


भरतिक्लल होने के कारण सुमे दुभ दी दोगा सुख 
दुःखाय म सुखायालं तस्या मेती न वै मयि । |" 
नही, कारण"वह मुभसे मेनरी नदीं रखती, इसलिये 
तथा तवंह यत्न मे यथा सा वशगा्िनी || ७॥|| लम यख चलकर जिससे बह मर बरे जाय 
॥ , ब्राह्म उवाच ब्राह्मण हमर वोलला- 
तव॒ सम्भीतये तस्था 'रेष्टिस्पकारिणी | हे राजन्‌ ¡ यदि श्राप उस खी से प्रीति करना 


वचयाहते ह तो मिघ्रवि आपे लिये 
क्रियते मित्रकामेयां मित्रविन्दा करोमि ताम्‌॥ ८ ॥| जिसको कि बै लोग क जो मित्रकी न 


र करते है 1८ हे राजन्‌ } जिन स्ी-पुरुष भै परस्परं 
मीतयोः भरीतिकसौ सा दि सजञननी परम्‌ । भीति न दयो उनमें मित्रविन्दाश्यज्ञ भीति क्रा देता 


भाय्या-पर्योमंसुष्येनद्र ता तवेष्टिं कयोम्यहम्‌ ) ६ ।॥| ह, शसक्िये वह यश ्रापके जिये करूंगा ॥ ६॥ 


यन्नः तिष्टति सा पुभरस्तव भार्या महीपते । | दे एध्वी ॐ स्वमी ! जह तग्दारी छन्दरी खी दै 
उसको ले श्रादये, बद श्रव तुमसे 
तस्मादानीयतां सा ते परां प्रीिषेष्यति ॥१०॥| परम भीति करेगी ॥६०॥ 


माकछरडेय उवाच `| माकीरडेयजी बोजे 
इत्युक्तः स॒त॒॒सम्भारानयेषानवनीपतिः । उस बराह्मण कै पेखा कदने पर शाजा ने खव 


ञ्ञानिनाय चकारे स च तां द्विजसत्तमः ॥११। सामप्री ५ की मग ष ॥ ह 
। मिघनिन्दा यज्ञ कराया ॥ ११॥ उस भ्रट बाह्मण 
सकलः ख तु तदा चकारेष्टि एनः पुनः राजा च्रौर उसकी खी मे परस्पर प्रीति दोजाय 


तस्य राहो दिनभषठो माय्यासम्पादनाय च ॥१ २॥| इसके लिये सात वार वह यक्ष कराया ॥ १२॥ जव 
/ यदारोपितमेनां ताममन्यत महाभुनिः । ¦ | बह मित्रविन्दा यक्ञ सम्पूरणं दोगया तव ब्राह्मण्‌ ने 
.श्वभसंरि तदा विभस्तष्ुवाच नराधिपम्‌ ॥१३॥ सजा से फटा ॥९३॥ दे राजन्‌ | श्रव श्राप अपनी 
क्रानीय तां नरभेष् या तवेष्टातनोऽन्तिकम्‌ । | खीको लाकर अपने पास रखिये तथा उसके साथ 

ङ्ख भोगांस्तया साद्ध' यज यक्ञास्तथाइतः ॥१४॥| श्रादरपूवक भोगो को भोगिये नौर यज्ञ फरियि ॥ 


.` भाकरडेय उवाच श ब । 
। बाह्मण 1 कहने पर याजा भरसन्न-हुपः 
शयुक्स्तेन विप्रेण भूपालो भिरिमतस्तदा । तथा उन्दोनि उस बलवान्‌ श्रौर सत्य पतिक्षा बलि 


सस्मार तं महावीय्यं सत्यसन्धं निशाचरम्‌ ॥१५॥ राख चो स्मर्या किया ॥ १५॥ दे करौषटरिजी ! 
स्मृतस्तेन तदा सः सुपेत्य नराधिपम्‌ | , | स्मरण कयते ही बह रास शीघ्र राज्ञा के पास 
कि-करोमीति सोऽप्याह भणिपत्य महामुने ॥१६॥| पचा नर कहने लगा कि भ क्या करं ॥ १६॥ 


इसके छनन्तर राजा ने विस्तार पूरक स्व वात 
ततस्तेन नरै विस्तण निपिदिते। उससे कषटदी श्रौर वह रा्तस पाताल मेँ. जाकर 


५, गत्वा पातातिमादाय रानपीषपाययो ॥१७॥ राजपत्नी को ले श्राया ॥ १७॥ उसने. आकर पति 
श्रारीता चातिहाैन घां ददशं वदा पतिम्‌ | को देखा चौर दयसे भसन्न होकर गर्बार कहने 


लगी. ‹ श्राप सुपर प्रसन्न हो ॥१८ ॥ फिर राजा 
उवाच च भीदेपि भूयो मृयो शुदान्विता ॥१८।| ख छो आातद्गन करे पोते, 


तेत स राजा रभा परिष्वञ्याह मानिनीम्‌ । ही ह किर ह भये { मः देखा. कयो 
भिये पसनन एवाहं मृयोऽप्येव व्रवीपि पिम्‌ ॥१६॥ उरी ९॥१६॥ = - 
पल्य वाच पत्नी योली 
नः ह सजन्‌. ! यदि आपं सुस सन्न हँ तो 
युद्धि, प्रसादं नरन मयि तेमः क याचना रती पराय उत 
तदैतदभियाये तां तत्‌ रुष्व ममाहणएम्‌ ॥२०॥८ पूरा करः ॥ २०॥ | 


२४८ माकंर्डेयपुराण श्र०७२्‌ 


रजोवाच - , राजा वोल्े- 
निःश बूहि सत्तो यद्रवत्या किश्िदीप्ितम्‌। , ¦ _ हे भिये ! जो डच ठम्हारी इच्छा हो वह म 
॥ द ` | से निःशङ्क किये 1 यदि कोर बस्तु अलभ्य होगी 
तदलभ्यं च ते भीर तवायत्तोऽस्मि नान्यथा} २१ तो भी भ्र तुमको दया ॥२९॥ 
पल्युवाच पत्ती वोली-- 
सदथं तेन नागेन सुता शप्र सखी मम । नागराज ने मेरी सखी.को जो कि उनकी पुत्री 
थीमेरेही कार्ण शाप देकर कदा कितु गंगी 
भूकर भविष्यसीत्याह साच्‌ मूकत्वसागता ॥२२।॥ होजा च्रौर वह गंगी दोगई ॥ २२॥ चेरी रचि यह 
ड! ५ 


भरतिकरियां है कि उसका ऊं उपकार करू, यदि श्रापकी 
तस्याः भविक्रियां भीत्या मम श्क्नोति चेद्रवान्‌ ¡ | शक्ति मे हो तो देखा उपाय कीजिये जिससे बह 


वाग्विमातप्रशान्त्यथं ततः कि न इतं मम ॥२३॥ ९९ लगे! यदि यह टोजायगा तोम समभगी 
सच कचं दोगया ॥२२॥ 


सार्करडेयवाच माकरडयजी वो्ते- 
ततःस राजा तं विपरमाहास्मिन्‌ कीरशी क्रिया | फिर राजा ने उस ब्राहमण से पृ्धा कि पेसी 


४ कौनसी क्रिया दै जिससे उसकी सूकता दीक द्यो 
तन्भूकतापनोदाय स च तं पराह पार्थिवम्‌ ॥२४।॥| जाय । इसपर बाह्मण ते राजा से"कदा रथा 
तराह्मरा उवाच ब्राह्मण वोला- । । 
भूप सारखतीमिषटं करोमि षचनाद्‌ तव । हे जन्‌ ! आपकी ज्ञा से मै सरखती-यज् 


हेयमाचणय . | करू गा जिससे क्रि श्रापकी पत्नी अपनी सखी के 
पत तवेयमादप्यं यातु तदाकसवत्तनात्‌ ॥२५।| वोकतने से मसल होजाय ॥ २५. । 


~ ^ माकडेय उवाच माकैरडयजी बोलते ` 
इष्टं सारस्वतीं चक्र तदथं स द्विजोत्तमः । ; तव उस श्रेष्ठ बाह्मण ने ससी ऊ वोलने -के, 


सारखतानि सूक्तानि जाप च समादितः ॥२६॥ निभित्त | इशः किया शरोर रखती, कः 
ततेः पटतमाक्यां तां ग्मः. भाह रसातले । स्तां का जप किया परप] उस नागकन्याके वोलने 
* € रपातलं पर पाताल मे गगं सुनिने कहा कि यह कठिन 
उपकारः ससीमत्रं कृतोऽयमतिदुष्करः ॥२७॥| उपकार श्सकी सखी क स्वामी ने किया है ॥.७॥ 
इतयं हानं समासाच सन्दा शौध्रगतिः पुरम्‌] | इख वात को जानकर नागकन्या नन्द शीधगति 
ची ची त - | से उस नगर म पहुंची श्रौर वहां जाकर श्रपनी 
पपा र्ना परिमवज्य खसखीमुरगात्मना ॥२८।|| सखी उस रानी से अिङगन किया ॥ र ॥ शौर 
त्च संस्तूय भूपालं कस्याणोेक्त्या पुनः पुन; । | बह नागकन्या श्रासन पर वैटकर कल्यामयी पव 
उपाच मधुरं नागी तासनपरिगरहा ।|२६॥॥| मधर बाणी से राजा से विनय करने लगी ॥२६॥ 
उपकारः कृतो वीर भवता यं ` | हे वीर ! आज जो ्रापने मेरा उपकार किया. है 
१ ₹ भवता या ममाधुना}! | इससे मेरा हदय श्रापकी रोर ्रकरषित होगया 
तेनास्मयाषषहदया यदूव्रवीमि शरु तद्‌ ॥३०।॥| है इसलिये जो भ क बह खनो ॥२० ॥ हे राजन्‌ ! 
तव पुत्रो: महावीर्य्यो भविष्यति नराधिप | ‡ | आपस एक च्रत्यन्त वलवान्‌ पुत्र होगा' जो कि 
तस्यमिहतं चक्रमस्यां श्वि भविष्यति ॥२१।|| इस म्बी पर चलब राज्य करा ॥ ६९ ॥ चह ` 
सववाशासतत्ज्ञो शरम्पुष्ठानतसपर्‌ सव शारो के अथे रौर तत्व का जानने वाला, 
श तत्परः ` । | धार्मिक क्रियाशर ॐ करने ओं तत्पर श्र मन्वन्तर 
श्वरो धीमान्‌ भविष्यति सवै सदुः ॥२२।॥ का भववंक शौर बुद्धिमान सदु दोगा ॥२२॥ - . . 


माकडेय उवाच . | माक॑रडयजी वोत्ते-- । : 
इति दत्वा घरं तस्मे नागराजसुता ततः । " हे क्रो्टकि } इसके वाद्‌ बह नागकन्या - उस 


राजा को इख प्रकार वर देकर श्रौर चपनी सखी 


अन्दे मकैरदेयषुराण २५६ 
तत्र तस्य तया पां रमतः पृथिवीपतेः । | राजा को श्रपनी स्री के साथ रमण करते' तथां ` 


६ भजा का पालन करते करते वडुत काल व्यतीत 
गाम कालः सुमहान्‌ भनाः पालयतस्तथा ॥२४।|| गया ॥२७॥ तव राजा के खस सती से यक पुन ए 


ततः स तस्यां तनयो महे राहो मात्मनः 1 , | हा जिसकी कन्ति पूमासीक चन्रमाके सदश्‌ 
ौरोमास्यां यथा कान्तः सम्पूणोपएदतः॥३५ "| थी ॥ २५॥ उस महात्मा पुन के उत्पन्न पर 


तस्मिन्‌ नाते मुदं भरापुः नाः स्या महात्मनि । सम्प भजा आनन्द को मास इर ! उस समय 
दबटदुभयो तेः. ष्टिः पपात च ॥२६॥ देवता ने इन्डुभी वजह श्रौर पुष्पों की -वषौ 

ॐ: ॐ ५ की ॥ ३६॥ उस वालक का शरीर, भका ` नौर 
त॒स्य दृष्टा षपुः कान्तं भविष्यं शीलमेव च । शील देखकर प्राये इप सुनिर्यो ने उसका नाम 
शरोत्तमधेति नयो नाम चक्रुः. समागताः; ॥२७॥ श्ौत्तम रक्ला ॥ ३७॥ उन्होने कहा कि यह वालक 


के उत्तम वंश श्नौर उत्तम समय मे उत्पन्न हा है 
ऽयञुत्तमे ह 
नातोऽ शे तत्र .काले तथोततम । तथा इसे सखव अवयव उत्तम हं ्सलिये इसका 


उत्तम।वयवस्तेन = ओत्तमोऽयं भविष्यति ॥३८॥| नाम शरोत्तम दोगा 1३ 


माकरडेय उवाच माकरडेयजी वो्ते- 
उत्तमस्य पुतः सोऽथ नाम्ना स्यातस्तथौत्तमः | उत्तम के इस पुत्रका नाम श्रौत्तम इचा । वद 


मनुरासीद क्लभावो भारे श्रयतां मम ।॥३६।॥ मच इ । अव उसके व को ५ ५ त 
क जन्म॒ नेवोत्तमस्य च । वादे नमी क नि ही 
स १ सी रुदाचिन्न गच्छति ।४०। करता ॥ ४० ॥ इस चरि के पदृने था सुनने छे 
इषटदार स्तथा र कदाचन । भ्रियजनो, सनी, एथ श्रौर बन्धुवान्धवों से 
पुस्य मन्वन्तर जरह्यन्‌ वदतो मे निशामय । मन्वन्तर का हाल तथा उसमे जो इन्द्र, देवत 


भ्रूयतां तत्र यथेन्द्रो ये च देवास्तथर्षयः ॥४२।॥ श्नौर छपि इए यद सुभे उनिये ॥४२॥ 


इति शरीसाण्डेयुराण भे र्म मन्वन्तर नाम्‌ ७ ध्याय समाप्त । 
| | ~ सये 


` ` तिच अध्याय 


माकरडेय उवाच व द 
मृमन्तं ऽस्पिन्नोत्तमस्य प्रजापतेः प्रजापति ज्रीत्तम के दद तीरं मन्व 
रे तृतीये अलाप |, | अ वाय प आपि हद इवो 


देवानिनद्रमृपीन भूपान्‌ निबोध गद्तो सम ॥ १ ५ सुस उनो ॥९॥ प्रथम तो उसमें स्वधामान नाम 
, खधामानस्तथा देवा यथानामानुकारिणः 1 | देवता-ह जिनके शास कि उनके नाम ॐ अजुसर 


र श भ 
सत्यास्यश्च द्विदीयोऽन्यशिदशानां तथा गणः।। २॥ थे । दृसरे देवता तथा गण सत्य नाम स कदल 
# तीय गरे देवाः शिबारूया भुनिसत्तम । | ॥ २॥ दे मुनिवर ! तीसरे देवता लोग शिव नाम 
त से ्रसिद्ध हए ।- वे शिव के समान कल्याणमय 


शिवाः खरूपतसते त भरताः पापमणाणनाः॥ ९ ॥ श्नौर पापो क नाण करने बले थे ॥२ दे रोधक! 
ररनाख्यश्च गंणो . देवानां -घनिसत्तम । , | उस श्नौचम मन्वन्तर मे देवताश का चौथा मण 
चरतुथस्तत्र कयित ओत्तमस्यान्तर मनोः ॥.४.॥ अरतरदतं नाम कलाया ॥४॥ हे दिऽ वशवर्ती 
वषसिनः पंचमेऽपि देवास्तत्र गणे दवि । | नाम पचे यणे जो देवता हुणः उनके स्वरूप.मी 


वथास्पातखरूपासं स्वै" पंथ सदाने ।। ४।॥ उनके नामों के श्रुसार ये ॥५॥ ये दी पाच देव. 


२६० माकेएडेयषएुराण | श्र ७६ 


एते देवगणा; ५ स्पृता यज्ञयुनस्तथा । | गण्‌ यज्ञ मे मोग करने वाते थे । उस शरेष्ठ मनु केः 
सन्न्तरे सनश्रेष्ठ सव्यं द्वादश्का गणाः | & ॥ मन्वन्तर मे सव वारह गण थे ॥ ६॥ उनके तीर्न 
तेषामिन्द्रो महामागस्लोकये स गुरूमबेत्‌] | लोक मेँ शर महामाग, खुशान्ति नाम इनदर हप जो 
शतं करदूनामाहृत्य घुशन्तर्नाम नामतः ।। ७।॥| किं सौ यज्ञ करके इन्द्रत् को भाच इ थे ॥9॥ इन , 
यस्पोपसर्गनाशाय नामाक्षरविभूषिता । | के नाम क अक्षरो को प्रथ्वीवल पर शमन के 
अपि मानवैगाथा गीयते ठु मील ॥ ८ ॥| नाश करने े हिषे श्रव तक मलय लोग गात ६॥ , 
एशानिरदेषराद्‌ कान्तः इुशान्त स भयच्छति । | मे कढते है कि देवराट्‌ खनति शिव, सत्य र 
सहितः शिवसत्या्प्तयैव॒वशविनः ॥ ६। वरव देवताश के पदं हमने चर र 
श्न ए्रशुनिरटिन्यो महाबलपराक्रमाः । शन्ति दे" ॥धा उस मनु के दैवताञ्चोके सर्टश तीन 


एत्रस्तस्यमनोराएन्‌पिर्याताशधिदशोपमा॥१०॥ | मावली रर परमौ त अज; परनि भर 
प्मिः पालितामन्रेधरः दिव्य नाम वाले हष ॥.१०॥ . उत्तम , मचः का.जव 
पतिसम्मबमूमः = । | तक मन्वन्तर रहा तव तच्छ उसी के वंश के राजा 
= ५ मनोरुतमतेनसः ॥९१॥ लोग पृथ्वी पर शासन करते रहे ॥ ११॥- जैसा कि . 
चतुयुगाणं संस्याता साधिका हेकसपतिः। | प पिते क चुका खतयुग, चता, द्वापर, कलि. 
कुतत्रेतादिसंत्नानां यान्युक्तानि युगे मया ॥१२॥ युग इन चारो युगो इक्र चलु् पक मन्त्र 
स्वेना हि तपसो वरिष्ठस्य महात्मनः । | मं ते है ॥१२॥ मदात्मा वशिष्ठ के तेजस्ती सात्‌ 
तनयाथान्तरे तस्मिन्‌ सम॒ सकषेयोऽमबन्‌ ।॥१३।॥ पु उस मम्बन्तर मँ सप्तमं कहलाये ॥ १३॥ इस 
दृतीयमेतत्‌ कथितं तव मन्वन्तरं मया । | भकार मैने तीसरे मन्वन्तर का हाल कट दिया । 
तामसस्य ॒चतुथन्तु मनोरन्तरमुच्यते ॥१४॥ श्रव तामख नाम.चौये मन्वन्तरको कहता ह ॥९४॥ 
वियोनिजन्मनो यस्य यशसा चयोतितं जगत्‌ । . । १ ध क 
् $ र जगत 
जन्म तसय मनोत. भरता गदतो मम ॥१५॥ परमित दगया था उका वरुन सम खनो. ॥ 
अतीन्द्रिमवेषाणाममूनां चरितं तथा । | सवं महात्मा ओर जितिन्दिय मच म तामसम - 
तथा जन्मापि विज्ञेयं प्रभावश्च महात्मनाम्‌ ॥१६। ॥ का जन्स.्रभाव श्नरौर चरिज अत्यन्त उत्तमहै॥१६॥ - 


इति श्रीमाकण्डेयपुराण मे ओत्त भन्वन्तर नाम रवां अध्याय समाप । 


~~ 2 92; ९६.६८. 
चोद्रषां अध्याय 
मारकरडेय उवाच माकक॑रडेयजी वोल्े- 


राजाभुडभुवि विख्यातः स्वराने नाम वीस्यवान्‌ | पृथ्वी पर स्व एष्रूनाम्‌ एक घडा वलवान्‌ राजा 

अनेकयषत्‌ भः संग्ामषवपरानितः ॥ १।१ र जिसने अनेक यव कि शी ८. 
तस्व प | पराजित न हुता ॥ १ ॥ मन्न से आराधित सूयन 

‡ सुमहत्‌ परादाद्‌ मन्विणराधितो रवि; । । उसको वद आयु भदान की.! दे.दविज ! उसके 
पर्नीनाञ्च शातं तेस्य धन्यानामभवत्‌ द्विज ।। २॥ सौ पलियां वदो पतिव्रता हुरै' ॥ २॥ हे करीष्ुकि ! 

| [प र्या = , € च्यः 

वी नादिदीरबयुपो ¦ यद्यपि वह दीर्घायु था परन्तु उसकी ` चिर्यो की 

चस्य दै घादुपः पल्यौ नातिदी्ायुपो मुने । | अवस्था श्रयिक न ५ जो किः ` समय 
फालेन जगुनिथनं भूत्य-मन्विननास्तथा ॥ ३॥ पाकर ख्यु को माघ दोग शरोर इसी भकार धीरे 
0 ४. धीरे राजा के मन्त्री श्रौर सेनक भी-मरगये  ॥.२ (| 


--"---------~ ~~~ ~ 


च माकण्ेयषुार २६१ 


~~ ,---~------~-- ------~---~. 


स॒ भा््याभिस्तथायुक्तो भृत्ये सदजन्मभिः । 
उद्टिदेताः सम्पाप वीय्यहानिमहरमिशम्‌ ॥ ४, 
त वीर्यहीनं निमूतैभ तयक्तं सुदुःखितम्‌ । 
छरनन्तसो विमर्॑रूपो राज्याच्च्यायितर्वास्तदा ॥५॥ 
, राज्याच्चयुतं सोऽपि बनं गल निर्खिएमानसः। 
तपस्तेपे महाभागो वितस्तापुलिने स्थितः ॥ ६ 
्रष्मे पञ्चतपा भूत्वा व्ा्नभरङपारिकः। 
जलशायी च शिरिरे निराहारो यतव्रतः ॥ ७॥ 
ततस्तपस्यतस्तस्य प्रा्ट्काले माणवः । 
वभूवालुदिनं ` मेये्यषद्विरलुसन्ततम्‌ ॥८॥ 
न दिषििहञायते पूर्वा दक्षिणा वा न पश्चिमा । 
नोत्त तमसा सन्येमहलिप्मिवाभवद्‌ ॥ ६ ॥ 
ततोऽतिषुवने भूपः स॒ नयाः भररितस्तदम्‌ । 
्रर्मयन्नपि नावाप हियमाणोऽतिवेगिना ॥१०॥ 
ओ दूरे जलौधेन हियमाणो महीपतिः । 
श्राससाद जले रदी स पुच्छे नगरहे च ताम्‌ ॥१ श 
तेन छयेन - स॒ गरयावुद्मानो महीतले । 
हतश्चेतधान्धकारे आससाद तरं ततः ॥१२॥ 
विस्तारि पङकमत्यथं दुस्तरं स ृषस्तरन । 
तयैव दृष्यमाणोऽ्यद्रव्यं वृनमवाप सः ॥ १३ 
तत्रान्थकारे सा सही चकपं वसुधाधिपम्‌ । 
पुच्छे लग्नं महाभागं कृशं धमनिसन्ततं ॥१४ 
तस्याथ स्पसम्मूतामवापषदमुत्तमाम्‌ । 


9\ 


सोऽन्धकारे रमन्‌ भुयो मदनाङृष्टमानसः ॥११. 
पिङ्गाय सादुरगं तं ृष्स्पणनतत्परम्‌ । 
नरेन्रं तदनस्यान्तः सा प्रमी तयवाच द ॥१६॥ 
वि पृष्ठं वेपधुमता करेण स्पृशते मम । 
^ छन्यथेषास्य काव्यस्य सञ्चाता नरपते गति; ॥१७ 
, नास्थाने षो मनो यातं नागम्ादं त्थेशवर । 
~ कन्तु तत्सङ्गमे विश्रमेष लोलः करोति मे ॥१८॥ 
। ` . माक्ररुडेय उवाचन 
ति शरुता वचस्तस्या एवा जगतीपतिः । 
जौतक्ौतृहलो. -सैरीमिदं वचनमचरव्‌ ॥१६॥ 


-------------~ 
खियो तथा सेवकादिको के मरने से राजा दिन 
रात उदास रहने लग! जिससे कि ` वद वर्लहीन 
होता गया ॥9॥ सेवको श्नौरं मन्त्री श्रादिकों से 
चिरीन राजा वदन दुःखित प्रौर वलदीन दोगया 
शरीर उसको विमर्द नाम राजाने राज्य से च्युतं 
कर दिया ॥ ५॥ रास्य खे च्युत दोकर बह राजा 
विरक्त होकर वितस्ता नदी के पफिनारे तप्‌ करने 
लमा ॥ ६ ॥ स्मौ की ऋतु मे वद पाचों श्र्चियां 
तपता "तथा वर्प ऋतु म भीगता धा श्रीर जामे 
वह निराहार रद्र जलल मे शयन करता था ॥अ॥ 
वरप तुमे पक वार उसके तप करते हषः निरंतर 
यमते दप मेधो ने इतनी बृष्टि की कि जलार्सव 
सोया ॥ ८ ॥ उस्र समय उत्तर, दक्तिण. पूरं ओर 
पथि श्यादि किसी दिशा करा क्षान न होताथां 
छरीर स्वरव रेरा छागया ॥ ६॥ उस नदी के तर, 
पर जलारव मे साजा के दुःनित होकर पाथना 
करने पर्‌ भी कोर टिकिानान मिला ॥ १०॥ वद 
गजा उस जलार्णव मे.बहुन दृरतक वहा चलागयाः 
किः जल मे उसको क हरिणी मिल गहै जिसको 
कि उसने पं से पकड़ लिया ॥१९॥ फिर उखं जलं 
म हवते उद्धते दृष हरिणी के सदार से राजा 
नदी क तड पर पच गया ॥ १२॥ फिर कीचड 
पीर दस्र दलद्न क्रो पार करके वद हरिणी 
गाज चो णक कृसरे रमरीक बन मे लेग ॥ ९३ ॥ 
पृचक्ो पकडे दप चद भाग्यवान्‌ गजा हरिणी 
दासं श्रन्धकार मं वहत दृर्तक खीचा गया जिस 
से किः वह मस्यन्त थक गया ॥ १९॥ उस दर्सी 
क स्पशं से राजा को श्रत्यन्त श्रानन्द ग्रत इञा 
शरीर उस श्रन्धक्छार भे धमते हप उसको कामदेवं 
ते श्रारृ्ट कर लिया ॥१॥ राजा के प्रनुराग श्रौ 
पीड क स्पशं करने श्रादि को जानकर उस हरिणी 
ने राजा से कटा ॥९६॥ दे राजन्‌ \ आप कामासक्त 
दोकर हाथ ते मेरो पीठ को यों सिरति दै, सं 
कोय कसे से श्रापका सतम न्ट दोजायगा ॥ 
ह भभु ! श्रापने च्रयुचित्‌ स्थान म चित्त कोनी 
लगाया ह श्र मँ श्रापके लिये गम्या भी नर्द 
ह परलतु मेरे श्चापके सङ्गम मे लोल वि 
डालते द ॥ १८॥ क 
माकैरुडेयजी वोले- 

उस गंगी के यदं वचन सुनकर राजा को वड्‌ 
कौतूहल हु श्रौरं चे उख हरिणी खे यदह चः 
योजि ॥ १६॥ ए 


२६२ 


माकंएडैयपुराण 


~ ~~------------------------------------------------------------------------------ 


राजोवाच 
का तवं ब्रूहि मृगी क्यं कथं मालुषवदरद । 
कश्चैष लोलो यो विध्नं त्वस्सङ्धे रुते मम॥२०) 


| खग्युवाच 
अहं ते दयिता भुप भरागासमुखलावती । 


भार्यां शताग्रसहिषी दुहिता ददधन्वनः ॥२१॥ 
। राजोवाच 


किन्तु यावत्‌ कृतं कम्म येनेमां योनिमागता । 


पतित्रता धमम्मपरा सा वेत्थं कथमीरशी ॥२२॥ 
सृग्युबाच 


श्रहं पितृश्हे बाला सखीभिः सहिता वनम्‌। 
रतुं गता ददरैकं मृगं या समागतम्‌ ॥२३॥ 
ततः समीपवरिन्या मया सा ताद्िता भगी । 


या त्रस्ता मतान्यतर करदः पाह ततो एृगः ॥२४। 
हे किमेवं सत्तासि भिक्‌ ते दौःशीर्यमीद्शम्‌ । 


राजा चोक्ते र त ~ 
हे दर्शी ! यह तुम क्या कहती हो द श्रीर्‌ 

म्प्य कमै तरद किस प्रकार बोलती दो, श्रोरयद 
लोल कौन दहै जो मेरे श्रीर वुम्दारे सङ्गम मं 
विधन डालता है १॥ २०॥ स 
मृगी चोली - क 

हे राजन्‌ ! मँ उत्पललावती नाम तुम्हारी पदिली 
खी हं जो कि टद़धन्वा की पुत्री शौर तुम्दारीसौ 
रानिया मे छघ्रणीथी॥२९॥ . . ` . ` ` 
राजा वेक्ते- | ७ (त 

तू तो रत्यु पतिजत धमं के पालने वाली 
थी फिर तूने पेखा कौनसा करम किया -जिससे यहः 
योनि. पार ॥ २२॥ त 
मृगी वोली- 

पितां के घर पर एक समय याल्यावस्था मं 
श्रपनी सियो के साथ खेलने को वनम गह तौ 
वहाँ दर्शी के साथ एक गग को देखाः ॥ २३.॥ 
जव बह गी मेरे पास राई तो मैने उसे मारा 
शौर मेर डर से वह दूर चलीगई जिससे क्रोधित 
होकर बह खग चोला ॥ २४॥ हे मूख ! तू इतनी 
प्रमत्त क्यो है ? तेरी इस दुता को धिकार है कि 


श्राधानकाल्लो येनायं तयामे विफलीकृतः ॥२५॥ तुभे मेरे गमांधान करनेका समय विफल करदिया॥ 


वां श्रुखा ततस्तस्य मनुस्ये भाषतः । 
भीता तमन्रवं फो ऽसीस्थेतां योनिषुपागतः ॥२६॥ 
ठतः स भरा पुत्रोऽहमृपर्मिर तिचक्षुपः । 
सुता नाम मृग्यान्तु साभिलाषो मृगोऽभवस्‌।।२७॥ 
पमाश्चानुगतः भरम्णा वाञ्छितश्चानया चने । 
त्वया वियोजिता दुष्टे तस्माच्छापं ददामि ते॥२८॥ 
समा चोतं तवाज्गानादपराधः इतो यने । 
प्रसादं कुरु शापंमे न भवान्‌ दातुमर॑ति ॥२६॥ 
इत्युक्तः पाह मां सोऽपि युनिरित्यं महीपते । 
न प्रयच्चामि शापं ते यच्रासमानं ददामिते ॥२०;. 
सया चोक्तः मृगी. नाहं मृगरूपधरा षने । 
लष्स्यसेऽन्यां शृगीं तावन्मयि भावो निवत्त्यताम्‌ ३१ 
इच्युक्तः कोपरक्ताक्षः च पराह र्फुरिताधरः। 


नाहं मृगी. खयेत्युकतं मृगी सूह भविष्यसि ॥३२॥ 


`` भशं मन्ययित्ता परणम्य धनिमन्रषस्‌ 


-----^------“+ ~~~ --- ~~ -~- -- 


मचुण्य की तरह उसको बोलते इण सुनकर मै डर 


| गह श्नौर मैने उससे पूदा कि तुम कौन हो श्नौर 


इस योनि मे किस तरह प्राप्त इप ॥९६॥ बह बोला 
कि मँ निचृत्तिचद्धुप नाम पि का पुचरहुःश्नीर 
मेरा नाम खुतया है । इस सृगी से भोग करने की. 
इच्छा से मै हरिण होगया ॥ २७॥ मे इस हरिणी 
को बहुत चाहता ह रौर यद भीं मुमसे' प्रीति 
रखती है । हे दे } तूने इससे मेरा वियोग करा 
दिया इसल्लिये तु म शाप देता द ॥२८॥ मैने कहा, 
कि हे सुनि ! अरक्ञान से मैने आपका यह श्रपराध 
शिया है । छपा करे श्रौर चाप सुमे शापन ३ ॥ 
दे राञ न्‌ ] मेरे फेसा कहने पर बड सुनि कहनेलगा _ 
कि म तफ शाप न दूंगा परन्तु,.मे तु अपनीः 
श्ात्मा देता ह ॥ २० ॥ सेने उखः सगरूपी सुनि.से 


कटा किमे टरिी नींद । व्‌ खरी हरिणी शं 


इच्छा कर तथा मुभसे एेसा भाव मत रख ॥ र९अ' 
जव मेने उससे पेसा कहा तव क्रोधसे उसके होट , 
कोपने लगे श्रौर आंखे लाल होगई 1 बद बोला, हे. ° 
मूख ! जो तृयट कदतीह कि ओँ शमी नदीं हसो तुः 


प, (+: 


„०.७४ , माकंएटेयपुराण ८२६३ 


‰ -------------*~--~-------~-~-~ ---~~~---------------------------------------------------- ~~~ ~---------~------------~--- } 
॥ 


स्वरूपस्थमतिकरद्धं॑ प्रसीदेति पुनः एनः ॥३३॥ कि सुपर छपा कीजिये ॥ ३ ॥ ने वालिका ह 
बालानभिज्ञा वाक्यानां ततः पोक्तभिदं मया । । क ह विय । जित न॑ | 
पित्सति नारीभिर्वरियते दि पतिः स्वयम्‌ ॥२४॥ चुन जेती 1 यर ह यसी ग | 
सतति ताते कयश्रां टणोमि इनिसन्तम । | मे दे सुनिसत्तम्‌ ! म श्रायक्रो क्रिस तरद न | 
कपराधाथवा पादौ भसीदेश नमाम्यहम्‌ ॥३५॥ श्ापक्ते चरणं मे नमस्कार करती ह, मेया श्प" | 
भरसीदेति ` परसीदेति . भरणताया महामते । व व र मैने मरत होकर 
> । ॥ र्‌ कि श्माप सुक पर प्रसन्नो त 
इत्यं लालपयमानायाः स भां पुनिषङ्गयः ॥३६॥ यिम वमल बोले ॥२९॥ मेय कटा 
न भवत्यन्यथा ोक्तं मम वाकयं कद्प्न्‌। | भन्यथा नदं हो सकता । मरने पर तू इस वन मे | 
भूमी भविष्यति पता पनेऽस्मिनेव जन्मनि ॥२७॥| = गी होगी ।। २७॥ हे माविनी. ! जत्रत्‌ | 
मृगतै ` च महाबाहुस्तव ॒गभेषुपष्ति । र 1 
नः पतः सिद्वस्य भ॑ से उत्पन्न हों 
त नाम क 1 | अ को ० 
जापर भविन्री लं तस्मिन्‌ गर्भषुपागते । | दोजावेभी शरोर उख स्यति के कारण तू मद्ध्य की | 
समति पराप्य तथा वाचं मानुषीमीरयिष्यसि ।२६॥ व के उष्य दोते दी तू. | 
तस्मिन्‌ जाते मृगीत्वात्‌ चं वक्ता पतिनार्विता । ९ लोको योनि से चुटफर पति से पनित दो त्‌ | 
लोभताच्येति 0 डन लोधं को जायमी जिनफो कि अत्यन्त दुष्कर | 
लोकानवाप्स्यसि पप्य ये न दु्ृतकम्ममिः॥४०॥| तप रादि कर्के भी लोग नहीं पते दै ॥४०॥ बद | 
सोऽपि लोलो महाबीय्यः पिततु निपात्य वै | | वलवान्‌ ल के शतश को मार कर संपू । 
निता बहुन्धरौ छना भिष्यति ततो मनुः॥४१॥ ध व 014 | 
धप तं ययक 
. एवं शापमं लब्ध्या एता तिथ्यैकल्मागता । | रात $ ह । हे राजन्‌ ¡मेर उदर मे आप स्वं | 
त्वत्सस्पशा्च गर्भो सो सम्भूतो जरे मम ।४२॥| से य गभं उदर गया दै ॥ ४२ श्सी से मै कती । 
शतो व्रवीमि नास्थाने तव "यातं मनो मयि। ६ ५ ठ र | 
वि | । क ` त याभीनर्दीहं , 
न चाप्यगम्य गर्म लोलो विघ्रं करोत्यपरौ॥४३॥| परु गभ मे स्थित लोल बिष्न करते है ॥ ४३ ॥ | 
४१ ` ' भाकंर्डय उवाच माकैरडयजी वेले - न 
एवषटक्तस्ततः सोऽपि राजा राप्य परं दम्‌ । | नि उः खनकर राजा ४ श 
। ^. ~> धिव्यां उनका पुत्र शबुश्या को जीतकर पृथ्नी पर्‌ मवु । 
पुत्रो ममार निति पृथिव्यां भिता मनुः ४४।| दोगा ॥४४॥ फिर उस सगो ने शच्च लच्ो शे । 
ततस्तं सुपुये पत्रंसा भगी लक्षणान्वितम्‌ | रक्त पक पुत्र को उत्पन्न धरिया जिसके उत्पन्न होते 
तस्मिन्‌ जाते च भूतानि सर्व्वाणि परययुमृदम्‌॥५५॥ 
_ धिषषतश्च राजासौ णे जाते महावले । 
सा वियुक्ता फृगी शापात्‌ भाप लोकाननु त्तमा ४९॥ 
ततस्तस्य्पयः सर्वै समेत्य -युनिरत्तम । ` 
वेय भाविनीमृद्धि नाम चकतुमहारमनः ॥४७॥ 
तामसीं ४ योनिं मात्यनायते | 
तमसा = क लोके तामुोऽयं भविष्यति ॥४८॥ 
, ततः स तामसस्तेत ` पिना संवर्धितो कने। . 


5 


ही सव धारियों को प्रस्ता इहै ॥ ४५॥ शरीर 
बिशेष श्रानन्द राजाको उस मदावली पुत्रके उत्पन्न | 
हयेने से इश्रा । बह हरिणी भी वन्धन से युक्त | 
होकर उन्तम लोको को गई ॥४६॥ दे मुनिसत्तम । । 
फिर लव ऋषि उसके पास श्रये शौर उस महात्मा 
पुत्र को छद्ियों से युक्त देखक्षर उसका नाम | 
रखने लगे ॥४७॥ इसकी उत्पत्ति ताम्रसी योनिमे 
प्राप्त माता से हई दै श्नौर सके उत्पन्न होने..के 
समय संसार मे शरंधेरा छागया था अतः दसकं , 
नाम तामख होगा ॥४८॥ हे क्रषटुकि सुनि ! इसके . 
श्ननन्तर उख तामख को उसके पिता ने उसी; वन 


~न 


२६४ भाकेरुढेयुरार अ० ७५. 


नातु्धवाचव ध म पाला । जव तामस मँ बुद्धि का उद्य इं तव 
वाचदं पितरं युनिसत्तम ॥४६ वह अपने पिता से वोला 1 ४६॥ दतत! तुम 
क्त्वं तात कथं धां पुत्रो माता च का सम । | कौन दो, मै कि तर तुम्हास पु हरं तथा .मेरी 
ष ५ माता कौन है श्रौर श्राप क्रिस कारणसे यहाँ रये 
किमर्थमागतशच खमेतद्‌ सत्वं चर्वीदि मे ॥५०॥|| इष है यह सव सत्यनतत्य सुमे किये ॥५०॥ 
- मार्कश्डेय उवाच माकेरुडयजी वेत्ते- 
ततः पिता यथात स्वराञ्यच्यावनादिकम्‌ । तव पिता ने अपने राज्य से च्युत दोने शादि 
तस्याचरे महागाहुः पुत्रस्य जगतीपतिः ॥५१॥| < रूर जो इतान्त था वद सव अपने महावलौ 


तत्‌ सकं स पुत्र को कह सनाय ॥५९१॥ उस खव वृत्तान्त को 
रखा तद्‌ सकलं सोऽपि समाराध्य च भास्करम्‌ । | सुनकर उसने सूयं की आराधना की `न्नौर उनसे 
अवाप दिव्यान्यन्नाणि स॒ संहारास्यशेपतः ॥१२॥ दिव्य अस्वो तथा उने चलने -की.विया'को 
कृताच्वस्तानरीन्‌ जित्वा प्तुरानीय चान्तिकम्‌ | | म्रद किया ॥४२ बह उन अस्त्रां से सव शवुश्यं 


श्नुन्नातान्‌ युमोचाथ तेन स्वं धस्पमास्थितः ॥५३ को जीतकर पिता के समीप ले श्राया ओर उनकी 
पितापि छं स्ोयतवमन्नितान्‌ आज्ञा से शत्तश्रों को छोडकर अपने ध्म कामे 
ताप तस्य स्वान्‌ लाका स्तयहृसमन्जतान्‌ । | स्थित हा ॥४या उसका पिता भी तप यज्ञ रादि 


विदेहः सम्पप्तो द्र पुत्रहुखं सुखम्‌ ॥५४।।| करके ओर अपने पुत्र का सुख देखकर 
निघा समस्तां पृथिवीं तामसाख्य! ख पार्थिवः शरर् त्याग क पर्ल(क को गया ॥ ५४ ॥ तापस 


~ ब नाम उस राजा ने समस्त प्रथ्वी को जीत क्लिया 
तामसारूयो मनुरभूत्‌ तस्व मन्वन्तर श्रु ॥५१।| क वि 


ये देवा यदपततियश्च देवेन ये तयपेयः। | श्रव उसके मन्वन्तर को सुनो ॥५५॥ उस मन्वंतर 
ये पुत्राश्च मनोस्तस्य पृथिवीपरिफलकाः ।५६॥| मे जो देवता, उनके स्वामी.देषनद्रश्रौर ऋषि. तथा , 
सत्यास्तथान्ये सुधियः सुरूप हरयस्तथा । | उस मञ्च के प्र जो रजा हप उनको सुनो ॥५६॥ 


सं ने || ५७।।। उ मन्वन्तर मे धि, खरूप श्र हर श्रादि 
एते ठेवगणास्् , सप्विशतिका सुने ॥१७॥ सत्ताईस देवतागण्हु ॥५७॥ शिखि नाम महाबली 


महावलो महावीर्य; तयह्ञोषलकषितः । | शौर पराक्रमी याजा सौ यसौ को करके डन देत 
शिद्धिरिनस्तेथा तेपां देवानामभवद्धिथुः ॥१८॥ तान्नो का इन्द्र हुता ॥५८॥ हे बह्मन्‌ ! ज्योतिधर्मा, 


ज्योतिद्धामा पथः काव्यधेगोऽप्रिवलकस्तथा | | प्रथु, काव्य, चैज, अचि, बलक रौर पीबस्ये ही 
पीवर तथा ब्रह्मन्‌ सप्र सष्ठपयोऽभवन्‌ ॥५६।\ सात सर्पि हण ॥ ५६॥ तामस के पुज नर, लान्ति 
नर्‌, क्षान्तिः शन्त-दान्त-जानु-जह्ाद यस्तथा | | शन्त, दान्त, जालं रादि महाबली राजा 
पुत्रस्तु तामसस्यासन्‌ राजानः सुमहाबलाः; ॥६०॥| हए ॥ ६०॥ । 


[क । 


इति श्रीमाकंण्डेयपुराणमे तामस मन्वन्तर नाम ७४ श्र समाप ! ` 


- स्य - युः 
पिचहतरवां अध्याय ए 
माकैरडेयं उवाच । माकरडेयजी वो्ते-- । 
पश्चमोऽपि मरुत्रेह्यन्‌ ररत नाम विशतः | _ हें करोष्किजी ! पाँचवां मनु रेवत नामसे 


पिस्तरणः शृणुष्व कथयामि ते ॥ १॥ विख्यात हुश्रा, उसकी उत्पत्ति मे विस्तार पृ्षैक 
० र ॥ कता ह, सुनिये ॥ १ ॥ तदाक नाम पक षिः 


ऋषिरसीन्महामाग ऋतवागिति षिभरुतः। | यै जिनके पडले कोड पु न शा परन्तु फिर उनके 
` ५६१ पुत्राऽयूवत्यन्तं [महत्मिनः ॥ २ ॥' पक पुत्र सती नक्त के शन्त मे हुश्चा 1२ ॥ हे 


(1 
~ ~~~ 1 


1 


अ० ७५ २४ माकण्ठेयघुराण २६९१ : 


[1 


सृ तस्य पिधिवचकरे जातकर्मादिकाः क्रियाः । | सुनि { किर उन्होने उस लड़के की जातके आदि | 
तथोपनयनादीय स॒ चाशीलोऽमवन्ुने ॥ २॥ भीलन भ व व 
1 ~ ध, न्‌ न हु ॥२॥ जिस समय से उस पुज की: 
यतः भृति नातोऽ उतः भसति सोऽपि; । | उत्पत्ति इई उसी समय से ते ऋषि दीष सेग 
दीधरोगपरामपंसवाप गुनिुङ्खवः ॥४॥ चौर दुःख से धिर गये ॥9॥ उस पुत्रकी माता कठ 
माता तस्य परामािं इ्ठतेगादिषीदिता । र पीडित टोकर बहुत दुःलौ हदोगे शरोर । 
जगास स पिता चास्य चिन्तयामास दुःखितः ॥५॥ षि भी इससे इती दोकर सोचने.लगे ॥५॥। 
निरेतदिति सोऽस्य घत वतिः । ||ह फा दै! यद पु तो श्रत्यन्त दद्धि है कि, 
मतेष्ठप्त सऽ्यस्य प्सवत्यन्तद््मतः । | इसने दृखरे मुनि पुत्र की भायां सम्मुखी को ध्रहण , 
जग्राह भाव्यामन्यस्य मुनिपुत्रस्य सम्प्ुखीम्‌॥। ६ ॥| करलिया।द॥तव किन्न-चित्त होकर तवाक्‌ कत । 
ठतो ग्िपएणएमनपा "तवागिदमुक्तयान्‌ ! | कि मलयो ॐ लिये छपुत होने से व धज के । 
रता महुष्याणां श्रेयसे न डषुतरता ॥ ७ रना उत्तम दे ॥9॥ प कुन माता के हदय ` 
1 (9 न छर + । ॥| को सरैव संताप देता है शरीर पितो को भी सरग; 
षाया सच्वदा इत पपतुः 1 | से नीचे गिरा देता है ॥२॥ द पु से न तो मिनो | 
मातु स्गसंस्थांश्च स्वपिवृन्‌ पतयत्यधः ॥ ८ का उपकार दोता है श्रौर न पितरो की दी ठति, 
सु्दां नोपकाराय पिदृणाश्च न ठप्ये!। | दरी दै माता पिता तो बह दुभ्ल का कारण | 
परिर्दःखाय धिगजनम तस्य दुष्छृतकरम्पणएः॥ ६ ॥ ही 8 भरतः पले युन फो धिकार दे॥९ वेदी 
र ये व पिताः पुत्र धन्य है जिनकी सव लोग प्रशंसा करं तथां | 
न्पास्त तनया येषां सल का ; 1 | जौ परोपकारी, शान्त चित्त श्नौर साधु कमो मे, 
प्रोपकारिणः शान्ताः साधुकम्पेएयुव्रताः ॥१०॥ भवृत्त हों ॥ १० ॥ $ परलोक से विसुख होता 


श्रनि तं तदा मन्दं परलोकपराड्छसम्‌ । है ख फरण उस मन्द के माता-पिता की सद्गति 


नरकाय न सद्वये इपुत्रालम्वि जन्पनः ॥११॥ व 4 1 
करोति सुहृदां, दन्यमहितानां तथा मुदम्‌ । | तथा माता पिता को समय श्रनि से पदठिलेदी वृद 
फाले च जरां पित्रोः कुपुत्रः इर्ते धुवम्‌ ।॥१२।॥ वना देता है ॥१२॥ 


माक॑एडेय उवाच _ . , मार्करुडयजी वोल्ते- ` 9 
एवं सोऽ्यन्तदुषटस्य पुत्रस्य चस्तिमूनिः । इस ध्रकार उस दुष पुव के चरि से खित 


६ ९ चित्त होकर सनि ऋतवाकने इसका दत्तान्त गग ' 
ददमानमनोरिसतं भरममृच्छत ॥१२॥ सुनि स परहा ॥९२॥ . " , 


ऋतवागुवाच तवाक्‌ वोले- ह ह ॑ 
सत्रतेन पु विधिवन्मया पूर्वं काल्‌ मे चती दोकर मेने . तिधिवत्‌ वेदां । 
सुवतेन छ वेदा शीता विषिबन्मया । का श्रध्ययनकिया श्रौर चध्ययन समाप्तकर विधि. 


स्रमाप्य वेदान्‌ ब्रिधिवद्‌ कृतो दारपरिग्रहः ॥१४॥॥ बत्‌.्पना विवाद क्रिया ॥९७॥ हे मदयासुनि \ खी 


रेणा प्रियाः कार्य्याः धौताः स्मातां {|| खदित मने श्रौत, स्मातै श्रौर पद्‌ क्रियां को ` 
सदारेण क्रियाः कायाः भता; स्पाततां बपटुक्रिया व 
नमे न्यूनाः ताः क़शिहयावदय महाघरुने ॥१५॥ न दोड़ा ॥९५॥ दे सुनि ] पनाम नरक के रसे | 
गर्माथानविधानेन न काममयुदन्धतां। | पत्र भराति क सथ विधि व 
र्‌ # 211 ( १ 
त्राय जनितश्रायं पु्ाम्नो विभ्यता मुने ॥१६॥ अ न 
सोऽयं किमात्मदोपेण मम दोपेण बा यने । | रकार यद पुत्र उतपन्न दोगया है जिसके कि दष्ट , 
श्रस्पददुःखवहो जातो दौःशीरयाट्वन्धुशोकदः १७| स्वभाव से हम तंथा खव बन्धु-वान्धव इखी द॑ ॥ ¦. 
ग. गे उवाच | गग वोज्ञे- ` ` । । 
सवत्यन्ते धनिश्रेठ :. जातोऽयं, ततयस्तव.1.„ |. द.छननिबर । चद धु सेत्री न्न के अन्त मे 


~ ----~-~--~----" 


२६६ | 


भाकंरुढेयपुराण 


अर०७१ ` 


तेन दुःखाय ते दुष्टे काल्ते यस्मादनायत ॥१८॥ उत्पन्न इया है । चकि यद दुष्ट कालम उत्पन्न हश्रा 


न तैऽपचारो नैवास्य मालुनांयं इलस्य ते । 


तस्य दौशीरयहैतुस्तु॒ रेवत्यन्तश्ुपागतम्‌ ॥१६॥ 
ूतवाुवाच 


-यस्मान्ममेकपुत्रस्य रवत्यन्तसयुद्रवम्‌ । 


दौशीर्यमेतत्‌ सा तस्माद्‌ पततामाश॒ रेवती॥२०॥ 
माकंएडेय उवत्च 
तेनैवं व्याहूते शापे रेवत्यक्षं पपात इ । 
पश्यतः सन्वेलोकस्य भिस्मयापिष्टवेतसः ॥२१॥ 
रेवत्यक्षश्च पतितं इपदाद्रौ समन्ततः । 
सास्यामास सहस्रा वन-कन्द्रनि करम्‌ ॥२२॥ 
ुमुदाद्रिथ तत्पातात्‌ ख्यातो स्वतकोऽभवत्‌ । 
दीव रम्यः सव्यस्य पृथिव्यां पृथिवीधरः ॥२३॥ 
तस्यकषस्य तुया कान्तिजांता पङ्कजिनी सरः 
ततो जङ्ग तदा कन्या रूपेणातीव शोभना ॥२४) 
रेवतीकान्तिसम्मतां तां दृषा भ्षुचो निः 
तस्या नाभ चकारेत्थं रेवती नाम भायुरे ॥२५॥ 
पोषयामास चैवैतां स्वाश्रमाभ्याससम्भवाम्‌ । 
प्रयुचः स॒ महामागस्तस्मिनेवे महाचले ॥२६॥ 
तान्तु योवनिनीं टरा कन्यकां रूपशालिनीम्‌ । 
स युनिधिन्तयामास कोऽस्या भक्ता भवेदिति ॥२७॥ 
एषं चिन्तयतस्तस्य ययौ कालो महान्‌ घने । 
न चाससाद सदशं वरं तस्या महानि; ॥२८॥ 
ततस्तस्या षरं परष्टुमथिं स प्रणुचो यनि 
विषेश वहिशालां बै प्र्टारं प्राह इव्यभुक्‌ ॥२६॥ 
महावल्लो सहावीय्येः प्रियवाग्धम्मेवत्सलः | 
दुममो नाम भविता न्तं यस्या मदीपतिः ॥३० 
माकंरडेय उवाच 
श्रनन्तरश्च मृगयापरसङ्ग नागतो युने। 
तस्याश्रमपदं धीमान्‌ दु्गंसः स॒ नराधिपः ॥३१॥ 
परियत्रतान्वयभवो महाबलपराक्रमः । 
पुत्रो विक्रमशीलस्य कालिन्दीनटरोद्रवः ॥२२॥ 
स परविश्या्रमपदं तां तन्वीं जगतीपतिः 


श्मतः यह दुःख दे रा हे ॥श८ समे तुम्हारा 
इसका, माता का श्रथवा कल का दोप नहीं 
इसके दुःशील का हेतु वही रेवती नक्तज है ॥१६॥. 
ऋतवाक्‌ वोल्ते- 
जो कि मेरा एक पुत्रभी रेवती नक्त के श्रन्त 
उत्पन्न होने से दुःशील को प्रा होगया तो शसं 
रेवती नक्ष का पतन टोजाय ॥२०॥ 


माकरडेयजी वेत्े- 


उनके शाप देते दी रेवती नक्र सव लोगों के 


विस्मय पंक दे खते-दे खते स्वगे से नीचे गिर पड़ा 
॥२९॥ बह रेवती चन्त कुसुदाद्वि पवत -पर गिरा 
श्रीर उसके गिरते दी सहसा सव ` वन, कन्दरा 
शरीर भरने प्रकाशित हदोगये ॥२२॥ श्सफे -वाद्‌ से 
सुद पर्व॑त रेवतकं नाम से विख्यात इश्ा श्नौर 
तवी से वह पवेत पृथ्वीपर सव पव॑तोँसे श्रधिक 
रमसीक होगया ॥२३॥ श्रीर उस न्त की कान्ति 
से वहाँ पर पड्कजिनी नाम एक सरोवर प्रगट हुश्या 
जिखसे कि पक श्चत्यन्त सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुदै 
॥२७] पमुचि सुनि ने रेवती नक्ष की कान्ति से 
उत्पन्न उस कल्या को देखकर उसका नाम रेवती 
रका ॥ २५ ॥ श्रौर उसरी पर्वत पर स्थित श्रपने 


` आश्रम मेँ उसको लाकर प्रमुचि मुनिं ने उसकंं 


पालन पोषण किया ॥ २६ ॥ जच वह सुन्दरी फन्या 
युवती इई तो वे मुनि सोचने लगे क्षि इसका 
खामी कौन दोगा ॥२७ ॥ है. कौष्टफि सुनि ! उनको 
इस प्रकार सोचते हुए वहत काल वीत गथा परंतु 
मह सुनि ने उस कन्या ऊ योग्य वर न पाया ॥घ्॥ 
इसके अनन्तर प्रसुचि मुनि उसका वर कौन होगा 
यह श्रनि चे पूने के लिये अ्चिशालामे गये. श्नौर 
वहाँ श्रि से पृद्ातोश्श्चिनेकदा ॥२६॥ इस 
कन्या का स्वामी महावलवान्‌ पराक्रमी, पियव्चन 
वोलने चाला धर्मात्मा यजा दमम दोगा ॥३०॥ 
माकैरडेयजी बोले-- ए 
दे करोटकि मुनि ! इसे वाद्‌ स्गया करते हु 
उनके श्राश्नम पर राजा दगंम परसङ्धवश श्राये।॥३१॥ 
यहे वलवान्‌ श्रौर पराक्रमी राजा दुर्गम प्रियतं के 
वंश मे काल्िन्दीके गभेसे उत्पन्न राजः चिक्रमशील 
का पुत्र था॥३२॥ वह राजा उस ्चाश्चम्र मे प्रवेश 
कर ्छरषि को न देखकर उस सुन्दरी से हे धिया 


 "वश्यमानस्तयूृपिं -भियेत्यामन्तय पृष्टवान्‌ ।३३।॥ यह ककरः पचने लगा ॥२२॥ 


। ` अ ७४ माकफर्देयपुराण ९६७ 


~~” =" 


। राजोवाच ॥ राजा वोके- | 
क गतो भगवानस्मादाभ्रमान्शनिपृङ्गवः । हे शोभने! इल शाम से सुनिभरेठ काये 
तं भणेतुमिहेच्यामि त्‌ खं मनू शोभने ॥३४।॥ यढ छम वताननो मै उनको भम के श्राया है | 
। माकरडेय उवाच माकरडेयजी वो्े- | ध 
भरिशालां गतो विपरसतच्छरूलवा तस्य भाषितम्‌ । अश्रिशाला को गये हुः वे सुनि. उसकी वातः 


= ४ वीत श्रीर श्रिये" के सम्बोधन को सुनकर शीघ्र 
परियेत्यामन्रणन्चेव निश्चक्राम त्वरान्वितः ॥३५ बं से निके ॥ ३५॥ पिर सुनिने स्यच स 


स ददशं महात्मानं रानानं दुम युमः । `| यु शरोर विनय से शुके इय महात्मा राला ट 
नरेन्रविहसदितं भश्नयावनतं पुरः ॥२६॥॥| को देखा ॥२९॥ उसको देखकर सुनिने शरपने भिय 
तस्मिन्‌ दृष्टे ततः शिष्यञुवाच स तु गौतमम्‌ । | गीतम से कडा, “2 मौतम । मदयायजपे लिये शीघ्र 
गौतमानीयतां शी्रमरघोऽस्य जगतीपते; ।२७॥ शर्ष्ं लाश्रो" 1 ३७ ॥ पक तो यड राजा बहुतदिन 
` एकस्तावदयं भूपधिरकालादुपागतः । | बाद श्रये ह नौर दूसरे यद मेरे जामाता दै अत;, 
जामाता च विरोपण योग्पोऽ्षस्य मतो मम (२८ विशेष अर्यं के योग्य है यह मेय भत है ॥ इ८ ॥/ 


1\ 
.। 


माकंरडेय उवाच माक॑रडेयजी वेले- 
ततः घ चिन्तयामास राना जामातृकारणम्‌ । इसपर राजा सोचनेलगे कि मँ इनका जामाता 


नण्ेऽन्वं ठं दृषा किस प्रकार हश्रा ? परन्तु वे कदु न वोलेः ओौर। 
विवेद च न तन्मौनी न तं छप्‌; ॥२६॥| अर्य रण॒ कर लिया ॥ ३६॥ जव राजा शासन 


तभासनगतं विमो गृदीतायं महामुनिः! | पर वड गये शौर उन्दने अर्य ग्रहण करलिया तो! 
स्वागतं प्राह ` रानेन्रमपि ते शलं शे (॥४०।॥| मदासुनि ने पृचछा, “राजन. ¡ आपका स्त्ागत द 


कोपे वलेऽथ सत्रेषु भूस्यामात्ये परेश्वर । ६ तो 1 है{॥५० ० 
यत्र स्व॑ श्रपने कोप, सेना, मि, सेवको, मन्नियां तथाः 

 सथात्मनि महावाहो यत्र सव्वं प्रतिष्ठितम्‌ ॥४१॥| श्रपनी भी कशल किये ॥ ४९ ॥ ऋषी ` खी जो 
पत्ती च ते हशक्िनी यतत॒एवासुतिषटति। | यदं है वह्‌ छुशल दै, श्रव आपकी अन्य खयो 
पृच्छाम्पस्यास्ततो नाह शलिन्योऽपरास्तब।॥४२॥| फी शला पूता ह ॥४२॥ | 
| राजोवाच राजा वेले-- ५ 
दादङ्कशलं ` न कचि सुव्रत दे बत ! आपकी कृपा यां कटी भीः 
0 च ६ 9 ध्रछुशत्त नहीं है । दे सुनि ! युको आश्चयं है भ 
जातकौतृषलशास्मि मम भा््यत्र का शुने । ४३।॥ मेरी यद्य कौनसी पल है ॥४३॥ ; 


1 


ऋपिशयाच ऋषि वेते- 
रेवती सुमहाभागा बरेसोक्यस्यापि सन्धय त्रिलोकी मे खुन्दरी रेवती नाम श्रपनी सौ 


६ ४ भाग्यवती खीको हे यजन्‌ ! वम किस शकार र। 

तव भार्यां षरारोहा तां तं राजन्‌ न वेस्वि क्रिम्‌ ४४| जानते हो १ ॥ ४४॥ 
ि राजोवाच यजा वेले-- स 

मद्रा शान्ततनयां कापिरीतनयां षिभो । सीरा 

सुरषटरनं सुनाताञच कदम्बाञ्च वरूथनाम्‌ ॥४५॥| तथा परिपा श्र नम्दिनी ये दी भायां मेरे र ५५ 

, िपादां नन्दिनीञ्यैव वेवि भाय्ीं गदिन । | ह जिनको है जानता ह । हे भगवम्‌ } पर दौ रर 

£ तिष्ठन्ति मे न भगवन्‌ रेवतीं धेतनि कान्वियम्‌ ॥४६।॥| रेवतीनाम कोई सजी नदीं है जिसको क्रि मे आन्‌ 

। छपिरुवाच चपि वोले- 

म्ये चयो , दहे राजन्‌ } जिस खुन्दर वणं बाती सनी से 

भिेति साम्भतं येयं स्योक्ता वरसरएिनी । , (क पिये ककर सभ्योधन किया थं पया 


0 ९७ 


२६८ माकैरडेयपुराण -अ० ७ 


ङ विस्मृतं ते भषाल शछाध्येयं शृहिणी तव्‌ ।४७; उसको उम भूलगये, वरद परयवती स्मा 


राजोबाच ¦ राजा वले 
| हे सुनि! यह सत्य है कि मैने उखको भिया 


त्वसक्तं मया किन्तु मावो दुष्टो न मे इने । | ककर सम्बोधनं क्रिया परन्तु $ दुएन ` 
८ ९५ था 1 सैं जापते याचना करता हं कि श्राप सुम . 
1 कोपं मवान्‌ कतुमहेत्यस्माु याचितः ॥४८॥ 0 
ऋपिरवाचं । चपि वो्े-- । 
त्त्वं ्वीपि भपाल् न भावस्तव दृपितिः। ¦ हे रालन्‌ ! आपके भावम कोई दोषन था, 


भवानिति दितः अपने जो छुद्टु कहा था वहं अधिकी-भेरणा से 
याजहार भवानेतद्रहिना टेप बोदितः ।४६।॥ सत्य कहा या १९९ हे महाराज ? शने परिल ही 


पया पृष्टो हुतवहः कोऽस्या भरतेति पार्थिव । । च्च सं पृद्धा था व कौन 
। होया जिसपर उन्टाने चपकेदहो कटा था, 
पविता पेन चाप्युक्तो मवानेवाच बे परः ॥५०॥ श्रतः अव यही इस कल्या के खामी दे ॥ ४०॥ 


| 
ुश्तां मया दत्ता तुभ्यं कन्या नराधिप | | हे राजन्‌ ! अव मै इस इन्याको आपके लिये देता 


ह, अप खीकार कीजिये । इसको "प्रियः सम्बोधन 
येत्यामन्विता चेयं विचारं छुपे कवम्‌ ॥५१॥ करॐे यच श्राप क्या विचचार करते है १॥ ५१॥ 
माकरडेव उवाच 


् । माकल्डयजा वर्त 
१तोऽाचभदन्पोनी तेनोक्तः पृथिदीपतिः! 


सुनि के एेखा कहनेपर राजा चुप ४७ शौर 

; करैः तस्य ।१२। उनि उनके विवाह के निमित्त तैयारी लगे ॥ 
छपसतथोचतः क्तस्य वाकं विषि्‌।\भर च कन्या ने श्पने पिता महासुनि को -विवाह की 
णतं सा पितरं विवाहाय ` महान । =, तैयासे करते देदा तो चह अत्यन्त विनय पूरक | 
स्बाच कन्या त्‌ किचित्‌ प्रभयावनतानना ॥५२॥॥| उनसे चोली ॥ ४३॥ हे तात ! यदि श्रायकती रीति 


पदि मे भौतिमांस्तात परसादं कलतुमहसि । | मे है तो मेरे उपर छृपा करे शौर भसभ्न हो 
वतय विवाहं मे तत्‌ करोतु भसादितः ।\५७]।॥| कर मेरे विवाह को रेवती नक्त मै करे ॥ ५४॥ 
ऋपिरुवाच पि वि 


ऋषि वेते- 

हे पुत्री ! रेवती नक्र अव चन्द्रमरडल मे 
स्थित नदीं है । डे छ्दरी ! तुम्हारे विवाहे लिये 
श्नौर भी नक्त द ॥ ५५॥ 


वतयं न दे भद्रे चन्द्रयोग व्यवस्थितम्‌ । 
अन्यानि सन्ति ऋक्षाणि सुभुरेवाहिकांनि त।५५॥ 


कन्योवाच कल्या वोलली- 
ताति तेन विना कालो विफलः परतिमाति से हे तात ! रेवती न्तन के विना सुभको समय 


विफल मालुम होतषठै, सुर जैसी कन्याको विर्बा 


बाहो विफले काले मदिधायाः कथं भवेत्‌ ।५६।| विफल काल भे किस भकार होगा ॥ २६1 


चपापरषाद रषि वोज्े- 


ऋतवागिति विखूयातस्तपसी रेवतीं प्रतिं! ` . | तवाक्‌ नाम प्क असिद्ध तपस्वी ने रेवती 

1 नकतज के पति कोथ करके जसा पतेन करी.दियौ , 

चकार क रद्धेन तेनं क ॥५७। ॥ ७ ॥ मै तेय विवाह राजा वर्ममर के साथ कले . 
परया चास्मे प्रतिज्ञाता माय्येति सदिरेक्षणा। ४५ परतिज्ञा कर 1 यदि तू अव चिव . करने 
चेच्छर क्य इच्छा न करगो तो मुख पर वड़ा सङ्कट 
न चेस्छेभरि विवादं खं सङ्कटं नः समागतम्‌ ॥ ५८) श्रा जायगा ॥ ५८) | । 

, कन्यत्रिच व । कन्या वोली- ४ 

तवाक्‌ स इुनिस्तात किमेवं तपवीस्तपः । , | ` दे तात ! क्या तवाक्‌ सुनि-ने ही पतृपश्ची - 

त~ अ ऋथीजो किमेरे पिता ञ्रापने नहींको हे? क्या 


अ० ७५ माकंण्डेयपुराण २६६ 


त तवया मम तातेन त्रह्घन्धोः सुतास्मि किम्‌॥५४६॥ मे राप जसे ब्राह्मण की पुरी नदीं ह १॥ ५६॥ त्तम कि 


„_ __-----------------------~-~------------ 


ऋषिरुवाच पि वोले-- । 
ब्रह्मबन्धोः सुता न लं बाले नैव तपस्विनः! |. ० तपस्वी की 
। ह ही वेरीनहीदधःत्‌मेरोपुीहेिजो कि वर्ह , 
सुता तवं मम यो देवान्‌ कुव॑मन्यान्‌ सुत्सहे॥६०॥| तो देवताश को भौ वदल दू ॥६१॥ ८ 
कन्योचाच कन्या वोली- अ 
तपसी यदि मे तातस्तत्‌ मिमृक्षमिदं दिवि । यदि मेरे षिता उद्धर तपस्वी दै तो वे क्यो 


रित ५ न इख नक्तच को पुनः स्वगं मे स्थापित करके मेरा ' 
समारोप्य विवाहो मे त क्रियते न तु ॥६१ | विवाह रेवदी नक्षत्र भे कर देते द १॥ ६१ ॥ † 
. ऋषिरुवाच पपि बोले-- क 
एवं भवतु भद्रं ते मद प्रीतिमती भव । हे क तेय कल्याण हो, यदितेसै पेली ही 
आसोपयाभन्दुमायं वि इच्छा है तो मँ तेरे किये रेवती न्तत क्रो चन्द्र 
४ रव्यं ते तच । ।६२।॥ माग मै स्थित करूंगा ॥ ६२॥ । 
माकरुडेय उवत्व मार्वरुडेयजी बोल्े- : 
ततस्तपःभमावेए रेवत्य महानिः । दे दविेष्ठ । तव उन मदासुनि ने अपने तप 


६ श प्रभाव से रेवती नक्त को पिले की तरह 
यथा पूर्वं तथा चक्र सोमयोभि द्विजोत्तम ॥६३॥ चन्द्रमा फे खाय जोड दिया ॥६२॥ किर ख 
विवाहल्यैव दुहित्िधिवनसन्वयोगिनम्‌ 1 | क्न्याका विधिपू्वैक मन्न सदित विवाह कर 
तिष्याय प्रीतिमान्‌ भुयो जामातारमथानीत्‌।।६४॥ 


दिया श्नौर इसके वाद वे प्रस होकर श्रपने जमाह 
से वाहने लगे ॥६७॥ हे राजन्‌ ! नवाह की दर्तिणा 
र नै पको क्या दूँ, किये 1 म अत्यन्त दुलभ 


मोदि ते भूपाल कथ्यता व । चस्त॒कोभी आपके लिये दे सकता ह, क्योकि 
\दुेभ्यमपि दास्यामि ममाप्रतिहतं तपः 1६१॥| नेया तप अनियन्तित है ॥६५॥ ~ 
राजोजाचं राजा वेले- 


हे सुनिजी ! मेरा जन्म स्वायस्भुन मदुके वंश 
म इ हे 1 मै ्रापसे यद वर मागता ह किमेरा 
पुत्र मन्वन्तर का छ्मधीश्वर मछ दो ॥द 


मनो; सखवायम्धवस्यादषतन्ः सन्ततौ शुने । 
अन्वन्तराधिपं षु लससादादृम्पदम्‌ ॥६६॥ 


। ऋपिरवाच + ६ न 
-मविष्यल्येषः दुस्लत्तनये | हे राजन तुम्हारी यद कामना पू 
दे कासो महस्तव मय्‌ तुम्हारा पुत्र मड होकर सम्प्रा पृथ्वी पर राज्य 
सकलां मोध्यते भप धम्पविच भविष्यति ।॥६७॥ करेगा तथा वद धर्मात्मा होगा 1६७ ॥ _ :;- 
रुः मार्क॑स्डेय उवाच मार्करडेयजी बो्ते- 


तामादाय प तगरं ययौ । तव उख सती को जकर साजा च्रपने नगर को 
तामादाय ततो भूः स्वमेष ५ 4 गये श्रौर बह उस रेवती से एक पु उत्पन्न कयः 
,>>-तस्मादनायते सुतो वरया शेषतो मुः ।॥६८५| जो कि रवत मजु कहलाया ॥ ६० ॥ चह धर्मा 
समेतः सकलयम्ममानवैरपराजिवः _ । से युक्त ा ५ क 
५ । ९ सव शासं द्विद्या के र्थौ को.जा 
विहञानाखिलशाघ्र्थो वेदविचाथेशवित 1६६ सवपा 1१ द रहन! उल मन्वन्तर पर ४ 
तस्य्‌ मन्वन्तरे देवान निदेवेनद्रग्थिवान. । देवता खनि. देवेन्द्र न्नीर राजा आदि हए उनको 
कथ्यमानान्‌ मथा व्रह्मन्‌ निबोध सुखमादितः।७०॥ मे कूटता हुम ध्यानसे खनो ॥७०॥ हे द्विज ! 
सुमेधसस्तत्र देवास्तथा भूषतयो द्विज! | उस समय देवता सुमेध नाम से प्रसिद्ध हप श्नौर 
६ [१ ्यौद्र 
वैङणएडाथमितामाय चतुदश चतुदश ॥७१।॥ वैकुरुड तथा अमिताभ नम से क्रमशः चौदह २ 


.----- ~~~ न 


| रि आकेरटेयपुराण ०५६ 


॥1 
॥ 


तेषां देवगणानान्तु चतुरणीमपि चेश्वरः । | रजा हए ॥ ७६॥ उन देवता के स्वामी वि 

नाम्ना विशवरभृदिन्ः शतयङगोपलक्षकः ॥७२।॥| नान इन्दर इ जिने कि सय यकन करिये थे ॥ 

हिरण्यरोमा वेदश्ररुूरध्ववाहुस्तथापर; ] | दे महानि ! हिरण्यरोमा, वेदभरी, उदुष्ववाहु 

। वेदवाहुः सुधामा च पर्नन्यश्च महामुनिः ॥७२॥| रौर पर्जन्य ॥७३॥ ओर वेदवेदा् के जानने 

| वशिष्टय महाभागो वेदवेदान्तपारगः । चाले महाभाग वाशि यी सव रेवत मन्वन्तर मँ 
एते सक्तपयथासन्‌ रेवतस्यान्तरे मनोः ॥७४॥ स्थं इ ॥७४॥ वलबन्धु, महावीर्यं, छुयषटव 

. श्रीर सत्यक शत्यादि रैवत मल के पुत्र हप ॥७९५॥ ` 

। बलबन्धुमहाषीय्यः सुयष््यस्तथापर;ः । | ~ ध ¦ 

` बलबन्धुमह्‌ ८ हि| प र्‌ 3/2 करौषटक्िजी ! रेवत मय तक जितने मचुश्मों का 

सत्यकाास्तयैवासन्‌ सतस्य मनोः सताः ॥७५।॥ हाल हमने शरापसे कदा है वद सव स्वायमयुव 

रेषतान्तास्तु मनवः कथिता ये मयातव | | वंश के ्राभित है परन्तु स्वारोचिष वंश श्ससे , 

स्वायम्भुवाभ्रया देते स्वारो चिषमृते तुग्‌ ॥७६।॥ पथक्‌ हे ॥ ७६॥ । 


इति श्रीमाकंरडेयपुराणमें रेवत मन्वंतर नाम ७रयाँ अनध्याय समाप्त । 


च 
। 
४ 
1 
॥ 
॥ 
। 
॥ 
। 


~ > १०१०<६०-- 
चियत्तरषां अध्याय 
माकेरडेय उवाच माकरुडेयजी बोले-- . 
इत्येतत्‌ कथितं तुभ्यं पश्चमन्वन्तरं मया । | ' इस प्रकार मेने च्रापसे पांच मन्बन्तसो का , 


च: ह वशेन किया । अघ चुटे मन्वन्तर चाञ्चुप को 
क 0 | ९॥ ॥ १॥ हे दविज ! क म यह परमेष्टी ५ ल 
| ह "पुत्र थे अतः इस जलम मे यदह चाक्तृप कदलाये ॥२॥ 
चाकषुपल्वमतस्तस्य जन्मन्यस्मन्नपि द्विज ॥ २॥| राजप शननमिव की खी से पक विद्वान्‌ शौर पतिन 
प्नमित्रस्य राजर्ेभद्रा भाय्यां महात्मनः 1 | पतर उत्पन्न हृश्रा जिसको कि पदिले जन्म की.याद 
जङग सुतं घषिद्टसं शचि जातिस्मर बिथम्‌ ॥ ३॥. थी॥३॥ जव ये उत्पन्न हुए तसो मातानेद्नको 


९ भोर 1 श्रपनी गोद मे लेकर इनका . दुलार . कियां तथा 
जातं भाता निनो स्थितषाप्य तं पुनः। | प्यार करक वह इनको दवय से चिपदाती 
परिष्वजति ददन पुनरुहापयत्यथ ॥ 9 ॥ थी॥४॥ भाताकी गोद मे उनको पूरं , जन्म की 
जातिस्मरः स जातो वै मतुरुसङ्गमास्थितः। | याद्‌ आई रौर बे सने लगे । इस पर माता 
नहास तं तदा माता संक्रा वाक्यमत्रवीत्‌ ॥ १॥ व दोकर व । लगी ॥५॥ हे. वत्स । 
भीतास्मि मिदं वत्स हासो यदवदने तव । | वुम्डा खज पर चद दसी कसी { इसको देखकर 

(3 मं डरती हं । तमको. यद असमय बोध किस 
श्कालबोधः सजात; कच्चित्‌ पश्यसि शोमनम्‌॥ ६।॥| प्रकार हा ॥६॥ 4 


पुर उशच पुज धोलाः- „ `~ ५. 
म + 9 ५ री र्विः & र 
मर्ितुमिच्छति पुरो माञ्जारी किं न पश्यसि। क्या तुम नदीं देखतीं कि सामने खड़ी हु 


अन्तद्धानगता चेयं द्वितीया जातहारिणी ॥ ७॥ | सुे खाना 0 

1 इई यदह जातहारिणी ६ ॥ ७॥ पुत्रपेम से श्द्रं 
धुतभीत्य च भवी सहादां म्र सवती । ` | दोष दुभ-धमको वती चे बौ 8 
षप्ो्ा्य बहुशः परिणति मां यत; ॥ ८ ॥| मेरा लाड़ चाव्‌ कर सुभे गले से लगापी हो ॥५॥ 
उहमृतघु्तका स्नेद-सम्भवासरा्रिलेक्षणा । इक नेट्‌ से तुम्दारा शरीर. पुलकित ्ो र्दा 
ततो ध तो हासः प्यत्र है चौर नेश म आस्‌ दं । तुम्हारी इस प्रीतिको 
ततो ममागतो हासः शरु चाप्यत्र कारणम्‌ ।। & ॥ देखकर सुमे सी प्ागईअवे इसका कासर ुनो॥६॥ 


श्र° ७६ भाकएडेयपुराण २७१ 


सार्थे भसक्ता मार्जारी परस्तं माभवेक्षते । = हयेकर यद विदली सुमको देख 
तथान्तद्धनिगा चैव हितीया नातहारिणी ॥१०॥ 0 

पने स्वार्थ के ल्िये दी चिपी हु मेरी ओर देख 
स्वार्थाय स्निधहदये यथैषैते ममोपरि । 


रदी है ॥ १०॥ जिस प्रकार स्वाथ सि वे शे 
ति ५ दैखती हँ उसी तरह म सुम्दारी प्ीततिभी समता 
ते स्ार्थमास्थाय तथैष प्रतिभासि मे ॥११ रह्॥ व शा दीदैकिविल्ली.शौर, 
मान्नंरै ज सुभे फोरन दी साजाना चाहती 
कन्त मढुयमोगाय 0 नातहारिणी । है चीर तुम धीरे धीरे सुभे उपकार ष्वाहती 
वन्तु कमेणोपभोगयं मत्तः फलमभीष्स्यसि ॥१२॥ 


हो ॥ १२॥ तुम नदीं जानती हो किम रौद 
तमां जानासि कोऽप्येष न बैवोयङ्ृतं मया! | नौर उम्दाय उपकार ससे न होगा । भेरी 
पद्धते नातिकालीनं प्श्वसप्रदिनात्मकम्‌ ।॥१३॥ 


उत्पत्ति इन पाँच सात दिन की दी नदी ह ॥ १२॥ 
ती भी तुम सुभसे इवना स्नेद करती दो श्रीरः 


तातेति षर्स भरेति निर्न्यलीकं ब्रवीषि साप्‌ ॥१७।॥ चिपराती दो ॥ ९४॥ 
। मातो माता वोलीः- 


हे बत्स ! मै इच उपकार चाहने के लिये 
तमको प्यार नदीं करती थी, ठम सुकसे भीति 
दयो सकते हो, श्नौर तुमसे यदि मेरा कोई स्वार्थः 
भी थे तो उसको मै छोड्ती है ॥ १५॥ . 
सकरडेयजी वोल्े-- 
जव यह कदकर वहं उसे लोड कर सृतिकाः 
शह से निकल गई तो उस जङ्‌ चङ्वाले, शुद्धात्मा 
दत्लक को ॥ १६॥ जिसको कि उसी माता ने. 
छोड़ दिया था जतिदारिणी उठाकर लेगई ओर 
उसे राजा विक्रम की भूता सी की शय्या पर 
रख दिया तथा उसकी जगद उस स्री के पुजकोः 
उठाकर जेर } १७॥ फिर उप्त पुत्र फो दूसरे धर. 
म ले गह शौर वा से जिस वालक को लाह वदं 
तीसरा वालक जातदारिणी दाय भ्ण फर 
लिया गया. यो इसी पकार निदैयी जतिहारिणी 
पक घालकको इष ४ र ध 
सुदिनं ९ तथान्ययोः धर जे जाकर वदकल र न्त 
च ५ 8 ५ १ खाजाती है ॥ ९६॥ राजा विक्रान्त > भी उर पुत्र 
वान्तेऽपि ततस्तस्य सुतस्येव महीपति; । | के राजाभ्नों के सै संस्कार कराये ॥२०॥ उस 
> कारयामास घरंस्कारान्‌ राजन्यस्य भवन्ति ये।।२०॥| वालक के पिता राजा विक्त ने त्यन्त प्रसर 
श्ानन्देति च नामास्य पिता चके भिधानतः । | होकर उसका नाम ७ ध रक्ला 
1 परमया न्तः स॒ नराधिपः ॥२९।॥ ५२१ ॥ उपनयने संस्कार करते हए गुर ने कुमार ` 
न न कुमारकम्‌ । ` | से का फि पिके ्रपनी माता को शाम फर ` 
~ ल्वाभिवादनम्‌। स्तुति करो ॥ २२१ ष वाज्षक गुर के यह घचन 
जनन्याः भागुपस्यानं ्रियताज्वाभिषादनम्‌॥२२॥ शुन कर देखा नौर बोला कि कौन सौ भाता फी 
स गुयोस्तदवः भुत्वा विहस्यंयमथात्रचीद्‌ ! | नन्दना करं, पालने ` बाली को श्थ्वा जनने 
वन्यां मे कतमा पाता जननी परती दु किम्‌॥२२।५. बली फी {,॥ २२॥ न. 


नं ताहुपकाराथं वत्स प्रीत्या परिष्व । 
न चेदेतद्रवलीसये पसत्यक्तोस्मघहं तया । 


स्वाथो मया परित्यक्तो यस्तत्तो मे भरिष्यति १५॥ 


माकषरडेय उवत्व 

इत्युक्ता सा शधुज्य निष्करान्ता दतिका्हात्‌। 
,नडुङ्गवाद्यकरणं श॒द्धान्तःररणात्मकम्‌ ॥१९ 
जहार तं परित्यक्त' सा तदा जातहारिणी ¦ 
सा हृत्वा तं तदा बालं विक्रान्तस्य महीभृतः । 
हुतं पत्नीशयने न्यस्य तस्याददे रुतम्‌ ॥१७) 
तमप्यन्यश्हे नीता गरदीत्वा तस्य चात्मजम्‌ । 
ततीयं मक्षयामास सा कमास्जातहारिणी ॥१८. 
हुता हत्वा ठतीयन्तु भक्षयत्यतिनिष्ंणा । 


२७२ माकेरडेयपुराणः ` श्र ७६ 
स 
च गुख्ख्वाच ` गुर योले- ५ 
नन्वियं 1 हाभाग ! विक्रान्त महाराज कीजोयह 
नन्वियं ते महाभाग जनघ्रीजास्थात्मना । व समिन त ध 
४ ीनाह्थाः । वसे श्रेष्ट रानी हैमिनी है बही तुम्हारी माता है 


वित्ान्तस्याग्रमदिषी दैभिनी नाम नामृतः ।॥२४। उसकी बम्दना करो 1६५] | 


अनन्द उवाच श्रानन्द वोलाः- । 
यं जनित्री चैत्रस्य वरिशालग्रामवासिनः । यह मिनी तो विल नगर के निवासी चेश 
छ "1 की माता । बह चेत्र बोध नाम ब्राह्मण कापुतर. 
वरियाग्रयवोधपुत्रस्य योऽस्वां नातोऽ्यतो षयम्‌२५।॥, कडलाता दै, मेरी माता तो दृ्री है ॥ २५॥ 
ष सुख्ख्वाच गुर वोलेः- 
इतस्त्वं कथयानन्द चेः को वा लयोच्यते । हे श्रानन्द ! यह तुम क्था कहते दो, यह चेत 


[4 ॐ = 
ति कोन दै तथा तुम कहां उत्पन्न हुए दो, मुस 
सङ्कट हदं क जातोऽ बरवीषि क्म्‌ ॥२६॥ कहो | मुखे तुमारी चातो वड़ा संकट होगयारै॥ 
. ध दाचन्द्‌ उवाच पि श्रानन्द वोलाः = । 
जातांऽहमवनीन्दरस्य क्षत्रियस्य ग्रहे द्विज । म महाराज चचुष की मार्या गिरिभद्रा से 


ततयल्यां गिमदरायामाददे जातहारिणी ॥२७॥| चतरिय के घर उत्पतन हा ह 1 मुभे .जातहारिी 
यहाँ उढाकर ले आई ॥ २७1 वह सुभे हैमिनी के. 


त्यात युक्तो हमिनयाशृहीला च इुतन्च सा! पास छोड़ कर इसके पुत्र को व्राह्मण श्रेष्ट बोध केः 
बोधस्य द्विजमुख्यस्य ग्रहे नीतवती पुनः ॥२८॥| घर लेगई ॥ २८॥ शौर त्राह योध के पु को बह 
भक्षयामास च सुतं तस्य बोधद्विन्मनः । | जावारिसी भक कर्‌ गई । उख बाहा न 
त्र हिनसंकरै संतो हैमनीहुरः हेमिनी ऊ पुज को बाह्मणोचित संस्कारा से पाला 
९ तत्र दिनं संतो ; ॥२६।॥| है ॥२६॥ हे महामाग ! श्राप गुर है शोर प्रापने; 
वयमत्र महाभाग संछृता गुणा तया । | दी मेय संस्कार कराया है । मै पकी श्चाज्ञा को \ 


६ र = रिरेध -5 कः = च्छ ह ग क्रिः ॥ त्‌. 
मया तव वचः कायि कतमा युरो ॥३० व 


समम्‌ ॥ २० ॥ 

. ., ., ख्ख्वाच प 
तीव गहनं बत्स सङ्कटं महदागतम्‌ । डे बत्स ! त्यन्त कठिन संकट उपस्थितं 
किञ्चिन्पोहेन ण होगया द = सोह रे नेर [1 ` खाती देः 
न वेद्वि किञ्निनपोेन भ्रमन्तीव हि बुद्धयः॥३१॥| दूषा १ द ९ म चि चक्कर खाती दै 

॥ श्रानन्द्‌ उनाच श्रौर व म कुद नदीं आता ॥ ३१॥ . 

¦; कोज न अनन्द वोलाः-- स 
गोहसयावरः कोऽ नगते व्यवस्थित । हे व्रहम्पि ! इस संसार की जसी स्थिति 


कः पस्य पुत्रो विये को वा कस्य न वान्यवः||२॥| उसमे मोद क क्या शाजस्यक्ता दै, यहां कनः 
दविस पु है शौर कौन किसी का चन्धु दै। २२: 


आरभ्य जन्मनो दरणां सम्बन्धितषुपैति यः | | जो मदुप्य जन्म धार करते दही सम्बन्ध स्थापितः 
न्ये यम्बन्धिनो चंतिवरिवाः करता है बह मरते दी सव सम्वन्धों को मिटा 
त ध श्तयुना संनिवसिताः॥द २॥| देवा हे ॥३३॥ यटा भी यदी चात है जन्म के समयं ^ 
ध य्य वान्धिबः। | जिन भाई वमयु से सम्बन्ध स्यापित होता है 
तो जवीषि वहस्य भयात्यपोऽसिलक्रमः॥२४॥| मरे पर बह सव दू जाता दे ॥ २४ ॥ इसलियै 
० वापि संतं ४ कान बान्धवः | मँ कटतादहकि संसार में कौन किसी का वन्धुः 
१ बू सत्त चनः व विभराम्यते मतिः :२१।॥ जौर वौन नदीं है 1 आप व्यथं क्यों रम मे पड़ते 
1. मथा माम्‌ समन्नव हि जन्मनि] | है ॥ ३८॥ इसी जन्मे सुमको दो पिता शौर 
भावय किं भिरं यद््यदहसस्पवे ।।३६॥ माता मिली, इसमे भी कथा ्रधय हे १५ ३६॥ ' 


अन्द्‌ २५ मकषठेय्राण __ __ _ २७३. 
सोऽहं तपः करिष्यामि त्वया यो हयस्य भूपते; । . ` , रतः मतो तप करूंगा श्चौर श्राप . विशाल नगर 
विशालग्रामतः पुत्रैर आनीयतामिह से र के पुत्रको क्ते ये । ३७ ` 
माकडेय उनाच क व खी श्र सवनु 
ततः स विरिमतो राजा सभाय्येः.सह बन्धुभिः! | सहित विस्मय को भाता रौर उस ते पनी 
तस्माननिवतत्यं भमतामसुभेने वनाय॒तमू ॥३८। | ममता दटाकर उसर्को चन जञाने की अजुमति देदी ` 
= च = ॥द् फिर राजा विक्रान्त ने श्पने पत्र चेत्रको ` 
चत्रमानीय तनयं राञ्ययोभ्यं चकार सः। | बुलाकर उसको ल्य दे दिया शर उख तराम ` 
सम्मान्य ब्राह्मणं येन पुत्रबुद्धया स पालितः।२६॥ को भी जिसने कि उसे पु समभषकर ` पाला था 
, सम्मानित किया ॥ २६॥ श्रौर वह चालक आनन्दः 
सोऽ्यानन्दस्तपस्तेप बाल एव महावने । | मी वनम उन कमो कानाणु.करने के लिये जो 
कम्मणां क्षपणारथांय वियुक्तः परिपन्थिनाम्‌॥४०॥ 4 मै वाधक दै स त ॥४०॥ 
† ततस्न्च $ ह र प्रजापति ब्रह्माजी ने तपस्या इण उस 
= माह देव; प्रनापतिः । बालक से पदधा, “हे वत्स ! लम यदह उद्र तपस्या 


किमथं तप्यसे त्स तपस्ती्रं बदस्व तत्‌ ॥४१।॥| किख लिये कर रहे हो, कोः" ॥ ४९ ॥ 


श्रानन्द उव्रन्व आनन्द बोला- ¢ - द 
ग्रात्मनः शुद्धिकामोऽ्ं करेमि मगवंस्तपः | हे भगवन्‌ | मै पनी आत्ता की शुद्धि के देत 
र तद्षपणोनदुल तथा उन क्कि नाश करनेकेलिये जोकि सासारिक 
बन्धाय मम कम्मांणि यानि खः॥ ४२१ वन्धनों मे डालते है तपस्या कर रहा ह ॥ ४२॥ 
ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी वोहे- 


क्षीणाधिकारो भवति दुक्तियेोप्यो न क््म॑वान्‌। जिखका 1 4 वदी शुक्ति के 
ति ७ † ड | इस 
सलाधकोसवन क्तिमवाप्यति कवंभवान्‌॥४ | य ता न त क 


, 


षष्ठे त॒म जाश्नो, तपस्या करने से तुमको कोह ल्भ 

भवता मनुना भाव्य पष्ठन व्रजं तत्‌ इर्‌ । नहीं । तुभ ठते मल, होकर उसी कारण से 

ञ्ल ते तपसा तस्मिन्‌ ते युक्तिमवाप्सयसि॥४४।॥ सक्ति प्राप्त करोगे ॥ ४४॥ । 
माकरडेय उवाच माकौरडेयजी 


इत्युक्तो त ब्रह्मणा सोऽपि तथेत्युक्त्वा महामतिः। घह्माजी के यद कदने पर उस मद्ामति ने उन 
| का कि मै देखा दी करूंगा श्नौर फिर उसने 


से 
तत्कममाभिषलो यातस्तपसो विरराम ह ॥४५॥| तपस्या दोडकर ब्रह्माजी के तय छ मो ॐ 
वं ६ षिनिवर्तय श्मपनी पवत्ति की ॥ ४५॥ तप से निवारण 
चाकेतयाद तं ज्मा -तपता व्यन्‌ | 
पूर्वं नाम्ना बूबाय प्रर्यातथाक्षुषो मतुः ॥४६।| यही उनका पदिला नाम था-इस कारण चे वगु 


उपयेमे विदां स॒ छत्रस्य भृशः । | मलं व षि 1 
तस्याञ्चोः भर्यातपिक्रमान्‌ ७७| विदभां से अपना विवाद या अट उस श्र 
त्पादयामास पत्रान्‌ प्रख्याताचक्रमान्‌ ४७ बलवान्‌ पत्र उत्प रिय ॥ ४७॥ उस भजु के 


५ मनवनतरशस्य यऽनतरत्रिदशा विन । | मन्वन्तर भ जो देवता, ऋषि, इन्र जीर उस मजु 
ये चरषयस्तथेषनद्रो ये सुताश्वास्य तान्‌ श्रृणु ॥४८॥| के पु इषं उनको खनो ॥ ४८ ' उस व म 
रायां नाम सुरास्तत्र तेषामेफोष्को गणः । | श्रा नाम क देवता हेय ओर उनमं श्राठ देवताः 
भर्यातकरैशा विप्र यत्ते इन्ययुनामयम्‌ ॥४६। | श का पक गर दोला या | द ध ५ 

बलवीर्ययाां ९ बर्‌ म इष्य भोजी परसिद्ध थे ५.४६ ॥ परसिद्ध चल चाल 
प्रख्यातं भभामणडलदुहृद शाम्‌ । | तथा प्रभा मरडल के सदश नेच वले देवताश फे, 
द्वितीयश्च प्रूताख्यो देवानामष्टको . गण; ॥५०॥| दखरे श्चथटक गण भसूत.नाम के हए ॥५०॥ सी 


२७४ माकेएडेयपुराण ` अ० ७७ 


तथवाए्क एवान्यो भन्याख्योा देवतागणः प्रकार देवगणो का तीसरा श््ठक भव्य नाम वाला . 
चतुथथ गशणस्तत्र यृथगाख्यस्तथाषए्टकः ॥५१।॥ था श्रौर चौथा श्रएटक यथग कटलाता था ॥ ५१॥ 
लेखसंनास्तथैवान्ये - तत्र॒ मन्वन्तरे द्विज । | दे द्धिज } उस मन्वन्तर मे पाँचवं देवगण लेखनाम 
पश्वमे च गणे देवास्तत्सं्ञा दयमृताशिनः र बलि हए] ये देवता श्रगृतपायी थे ) श्रा इने , 
शतं क्रतूनामाहत्य यस्तेषामयिपोऽभवत्‌ । | देवतां ॐ स्वाभी मनोजन नाम इन्दर हप -चिन्दों 


किसौ यश्च किये ये श्रौर जो यक्ञ-भागके भोक्ता. 
मनोजवस्तयेवेन्धः संख्याता यज्ञमागशक्‌ ॥५२॥ वि: 


सुमेधा विरलाधेव॒हविष्माजु्त मधुः श्रतिनामा श्नौर सदिष्णु ये उस मन्वन्तर के सात 
तिनामा सषिष्णश्च सप्रासन्निति चषयः ॥५४॥ सपि इष ॥५४॥ महावली उरूपुरं श्रौर शतय्‌ र्न 
उरु-पूर-शतद्यम्नपरयुखाः उमहयबलाः । उस चाल्प मु फे पुत्र इए जिन्टोने कि सम्पूणं 


चाक्षुषस्य मनेः पुत्राः पृथिवीपतयोऽभवन्‌ ॥५५॥ 1 किया ॥५५॥ दे द्विज ! 1 | 
श्रापने पृ था वह छशा मन्वन्तर श्रापक्ो क 
एतत्‌ ते कथितं पष्ठ मया मन्वन्तरं हिन । सुनाया श्रौर इसके साथ महात्मा चाचुपका चरित 
चाक्षुषस्य तृथा जन्म॒ चरितश्च महात्मनः ॥५६।| भी आपको छुना दिया ॥५६॥ तथा शसं समय जो | 
साम्पतं त्ते योऽयं नाम्ना वैवस्वतो मुः मन्वन्तर वैवस्वव नाम वर्तमान है वह खातवाँ - 


स्मे येऽन्तरे तस्य दैवा्ास्तान्‌ शृणष्व मे॥४७॥ मन्बम्तर है चव उसके देवतादिको सुभे शुनो ॥ - 
इति श्वीमाकंरुठेयपुराण मे चाक्षष मन्वन्तर मे दाँ ° समापत्‌ । | 


-्च्टू- 
सत्र अध्याय 
व माकेएडेय उवाच | माकरुडेयजी बोले-- 
माेएडस्य रयेभाय्यां तनया विशकम्पणः सयं भगवान्‌ ने विश्वकमां की पुरी संज्ञा नाम 


संता नाम महाभाग पस्यां परम सौभाभ्यवती श्रपनी भार्यां घे पुत्र उत्पन्न, 

मनं व ॥ १॥ कयि ॥१॥ विचस्वान्‌ फे पुज दोनेके कारण वैवखत 
शानपार्गम्‌ । | नाम वलि मजु वड़े यशस्वी शौर ज्ञानवान्‌ इष ॥२॥ 

विवस्वतः सुते यस्मत्‌ तस्माद्रेवस्वतस्त॒ सः॥ २॥| रवि के तेज को न संह कर संज्ञा उनको देखने पर 

सन्ना च रविणा दष्टा निमीलयति जोचने। | अखं चम्द कर लेती । इसपर व 

यतस्ततः सरोषोऽकः सहां निष्ठुरमत्रवीत्‌ ॥ २॥ क्रोध कर संज्ञा के परति कठोर बचन कहने लगे ॥ 

ऊ 
मयि च एदा यसमात्‌ इरे ने्रसंयमस्‌। ` । दे भू! उमर देकर जो त्‌ सदेव नेव ब्द 


करलेती है इसलिये तू परजां को पीड़ा देने बाला 
रस्मान्ननिप्यसे मूर `अजासंयमनं यमम्‌ ॥ ४। पु यम उत्य् करेगी ॥४॥. | 


माकेरुडेय उवाच | माकरडेयजी वोले- श क 
ततः सा दर - "इसके वाद्‌ भय से विदल होनेक कारण संज्ञा 
परिलोतितद्थं देवी ५ देवी की दष्ट चपल दोग । चश्चल नेनवाली उस 

तदश दृष पुनराह च -तां रवि; ॥ ५॥| को देकर प्र सूयं भगवान्‌ वोत ५॥ जो इसं 

यस्मािलोलिता द्टिमैयि दृष्टे त्वयाधना । | समय सुखे देखकर तम्डारी दृष्टि चपल दोग है 

तस्मादिलोलां तनयां नदीं त्वं भसविष्यसि ॥ ६॥ इसलिये तुम नदी रूप एक चञ्चला पुत्री को 
उत्पन्न कसोगी ॥६॥ `. ४ । 

माकंरडेय उवाच... , ` | माकैरडेयजी पोल ` ` ` ४ 

ततस्तस्यान्तु संजङ्गं भनु शापेन तेन वै । | इसके ्ननन्तर स्वामी के शाप ३ेने ॐ कारण 


अण ७७ 


यमश्च यष्ुना चैव भ्रस्याता. समहानदी ॥ ७॥ 


सापि संता रेस्तेजः सेहे दुःखेन भाषिनी । 


माकंश्डेयषुराण २७५ 


छद दिन चाद संज्ञा ने यम नाम पुत्र श्रौर यमुना 
नाम पुत्नीको जो क्षि प्क महान्‌ नदी है उत्पन्न 
किथा॥ ७॥ फिर वह संज्ञा वड़े दुल से सुय के 


श्रसहन्ती च सा तेजधिन्तयामास वै तदा ॥ ८ ।॥| ठेज को सहन करती श्नौर जब वद शसा होगथा 


` किकेरोमि क गच्ामिक गताया निर तिः। 


भवेन्मम कथं भत्ता कोपमकंश्च नेष्यति ॥ ६ 


इति सञ्जिन्त्य बहुधा प्रनापतिसुता तदा । 


वहु मेने सहाभागा पिद्संभ्रयमेव सा ॥१०॥ 


ततः पिवृशहै गन्तं तयुद्धियैशस्विनी । 


चायामयीमात्मतनु निम्म॑मे दयितां वेः ॥११ 


ताश्वोवाच खया पैशमन्यतर भानो्यैधा मया । 


तथा सम्यगपत्येपु वर्पितव्यं तथा रौ ॥१२॥ 


पृष्टयापि न वाच्यं ते तथंतद्गमनं मम। 


सेवास्मि नाम संहेत्ति वाच्यमेतत्‌ सदा षचः।॥१३॥ 


छायसिंज्ञोवाच 
आआकेशग्रहणारेषि आशापाश वचस्तव । 


वृह सोचने लनी ॥८॥ ' मै क्या करू” कां 
जाऊ कां जाने से शुभे खल दोगा ? शरीर किंस 
प्रकार मेरे स्वामी का करोध शन्त हो १॥ ६ ॥ इसे ` 
प्रजार बहुत सोच विचार कर उस विश्वकमां की 
पुरी संज्ञा ने पिता के श्राध्म मेँ जाना दी उचित 
समभा ॥ १०॥ फिर उस यशस्विनी ने पिता के 
धर जाने.का श्यदा करके अपनी छाया को सूयी 
प्ली वने रहने ऊ लिथे छोड़ दिया ॥११॥ चद उस 
छायारूपी संज्ञा से बोली कि जिल भकार ते यष्ट 
रती थी उसी पकार तुम भी मेरे स्वामी सूर्यं क 
हस धर मे रहकर मेरे व्योका पालन करना ॥१२॥ 
उनके पद्नेपर भी मेरा यदाखि जाना न घताना श्नौर 
दरस तरह वोलना जिससे बह मुभे यदीं समभ ॥ 
छाया संञा वोली-- 

हे देवि ! जव तक स्पयं मेरे केश न परकडंगे 
श्रौर शाप ज दंगे तव तक भै तुम्दारा कदा करूंगी 


करिष्ये कथपिष्यामि हत्तन्तु शापकर्षणात्‌ ॥१४॥ परन्तु वाक्त खीचने पर श्रथवा शाप देने पर खव 


| ध 
शुक्त सा तदा देवी जगाम भवनं पितुः । 


दद्धं तत्र चषटारं तपसा भूतकर्मपम्‌ ॥१५॥ 


बहुमानाच्च तेनापि पूजिता विधकम्मेणा । 


तस्थौ पितरे सा तु कश्चित्‌ कालमनिन्दिता॥१६॥ 


ततस्तां माह चाव््धीं पिता नातिचिरोपितम्‌। 


बृत्तान्त कद दमी ॥९४॥ छाया कै यद कदने पर 
संका अपने पिता के धर चली गई नौर वहां जा 
कर उसने अपने पिताको जो कि तपस्यासे निष्पाप 
हयोगये थे देखा ॥ १५॥ श्रौर विश्वकमां ने भी उस 
का वहुत ्रादर सत्कारक्रिया श्नीर बहे कुचं समय 
तक सुख से पिता के धर रही ॥ १६॥ इसके वाद्‌ 
उस खुन्दर शरीर बाली अपनी कन्यास विभ्वकमां 
ते मेम श्रौर विनय पूर्वक कदा ॥१७॥ दे पुत्री ! तुम 


स्तुत्वा च तनयां प्ेम-वहुमानपुरःसरम्‌ ॥१७।॥| को देखते हप युमाको वहत दिन भी प्क मुहत्तंके 


तान्तु मे पश्यतो त्से दिनानि खवहुन्यपि । 


समान घ्यतीत दोगये परन्तु अव मँ देखता है कि 


यहृतौसमानि स्युः किन्त धर्म्मो धिलप्यते ॥ | धर्मं की हानि हो रदी है ॥ ध सियो का वहत 


वान्धवेषु चिरं वासो नारीणां न यशस्करः । 


दिन तक पिता के घर रहना अच्छा नहीं है श्रौर 
भाई-बन्धुञओं की अभिलापा तो यही रहती है क्ति 


› अनोरधो वन्यानां नाया भतुभरे स्थरि॥१६॥| कन्या अपते स्वाती क धर सदे ॥ १९ ॥ द 


स्वां त्रेलोक्यनाथेन भत्र सूयेण सङ्गता । 


त्रे स्वामी तो सुय भयवान्‌ द जो न्रिलोकी के 
स्वामी है, तुम्हारा अधिक काल तक पिता के धर 


पिद चिरं कालं वस्तुं नर्सि पुत्रिके ॥२०॥ रदना उचित नहीं है ॥ २०॥ इष्तक्िमे अरव तुम 
स्वामी 


घा त्वं भशं गच्च तष्टो पितापि मे ।. 


के घर जाश्नो } मैने प्रखन्‌ दोक्रर 
व यथोचित सम्मान कर दिया दै । हे शमे ! 


पुनरागसन ` कार्य्यं दनाय शुभे मम ॥२१॥| फिर कमी मिलने क हिप चाना ॥ २१ ॥ 


`. मार्वएडथ उवाच 


इत्युक्त! सा वदा. पितरा तथेदयुक्ला च सा एने 


मार्वरुडेयजी बोले- ८५ 
पिता के पेखा कहने पर संका ने पिता से कदा 


------ -----^~“--~-~ 


-- ~~ 


२७६ माकंणदेयपुराण अर-७७ ` 


= ~~~ ~ ~ -- - ---------~-- 
। कि मैरे दी करूंगी, श्रौर वदः पिता को भरणामं 
सम्पूजयित्वा पितरं जगामायोत्तरान्‌ इरन्‌ ॥२२॥ कर उत्तर दिशा में कुरुदेशको चली गङ्२२॥ सूर्यं . 


तेच्च तस्य बिभ्यती। | केतेजकोन चाहती हु नौर उखसे भयभीत हं 
्यतापमनिचडनती तेनपसतसय र्सी वह घोड़ी का रूप धारण कर वाँ तपस्या करने 
तप्चार्‌॒तवरापि बद्वारूपथारिणी ॥२२॥, लगी ॥ २३॥ उस दूसरी खी छाया को. ही -संशा 
देयमिति मन्धानो द्वितीयायामहषतिः । | सममः कर सूं भगवान्‌ ने उससे दो पुर श्रौर ` 
मनयामास तनयौ कन्याज्चेकां मनोरमाम्‌ ॥२९॥| पक कन्या मनोरमा को उत्यन्नं किया ॥२४॥ हाया 
, खेषमरि प्रकार श्रपनी सन्तानं को श्रति स्नेह से 
आरायासंजञा त्वपत्य यथा सवेष म । | प्यार करती थी उस धकार षह संशञाके पुजपुियो 
पथा न सृत्ताकन्यायां पुत्रयोधान्ववत्तत ॥२५।।, को नदीं चाहती थी ॥ २५ ॥ दिन पर दिन यही 
पपोने पिरषमलुवासरम्‌ । भेदपृरशं व्यवहार खाने, पीने रौर पहिनने श्राह 
१लिनाचुपभोगेष । खवारब्‌ मे भी किया जाने लगा । इसको वैवस्वत मनु तो 
बुस्तदक्षान्तवानस्या यमस्तस्या न चक्षमे ॥२६॥ ङक (१ न ले परन्तु यम श र 
द कोपा. ४ सहन न इई ॥२६॥ एक देन सज्ञा कौ मार 
[इनाय च पँ कोपात्‌. - पादस्तेन सयु्यतः । उनि अयना पाव उ रु पिर दे 
सयाः नः कान्तता न ह देहे निपातितः ॥२७॥|| न्त दोगये श्रौर शरीर मे लात फो नं माराय 
तः शशाप तं कोपाच्छायासंज्ञा यमं दिन । | टे दविज ! श्सपर उस छयारूपी संज्ञा ने रोध कर 


कोँपते हुए दोर से नीर दोनो हाथों को चलाते 
$च्नवित्‌ पर्पुरमाणोष्ठी बिचलत्पाणिपट्छवा॥२८॥ 


इण यम् को शाप दिया ॥ २८ ॥ मे तुम्हारे पिताकी 
तु; पीममरवयादं यन्मां रन्नयसे पदा । | पल ह रौर क्योकि तुम ु्को पद से भार 
बि तस्मादयं पाद्स्तवा व प्रतिष्यति ॥२६॥ 


करना चाहते थे इस्तिये यह तुम्हारा पद शमी 
पृथ्वी पर भिर पड़े ॥ २६॥ मते 


माकडेय उवाच माकैरडेयजी योक्े- 9 
याकण्य यमः शापं मात्रा दत्तं भयातुरः । ध क शाप ४ भय 
. व्याङ्कल होकर पिता के पासे श्रये श्चौर प्रण ` 
भ्येत्य पितरं भराह भरणिपातपुरसरम्‌ ॥३०॥ करके उनसे वोसे॥३०॥ ` ४५ 
यम उवाच यम षां 


हे तात ¡ यह मदान्‌ श्राश््यं की वात हे जक्षि 
कीं भी नहीं देखी गहै कि माता श्चपने वात्सल्य 
। को छोडकर पुत्र को शाप देती दै ॥ ३१ ॥ जैसाकि 
प मतुमामाचष्टे नेयं माता तथा मम | | मुने ध कहा, श । ४ हमारी बी है 
८ | श्रयोभ्य पुत्र 4 
रेवि पत्र न माता विगुणा भषेत्‌ ॥३२॥ विन त 1 स 
` ` माकैरडेय उवाच माक॑रडयजी बोले ८... 
स्यतद्रचः ` श्रुखा. भगवांस्तिभिरापहः | यम के यद.चचन सुनकर तिमिरनाशी सूर्यं ५ 
यासां समाहूय पप्रच्छ फ गतेति सा॥३३। भगवान्‌ ने छाया को बुलाकरः पूना कि संञा कदा 
चाह तनया लष्टरहं सं विभावसो । | ३ च यती न 8 स्वामिन्‌ ¡मँ दी विश्व , 
6 पः प्यन्येतानं कमा की पुत्री संज्ञा रीर श्रापकी सखी है, श्रावते ` 
¶ तव स्वयाप्त्यान्यतानिं जनितानि मे ॥३४॥ दी सुमसे इस सन्तति को उत्पन्न किया है ॥ ३॥ ' ` 
¡ िबस््तः सा तु बहुशः पृच्छतो यदा | | खयं क कार से उससे पूजा परण्वु छाया ने * , 
व भावास्त ङु मेद्‌.न यताया + इसप - अगवान्‌ शाप ` 
पच ततः द्धो भावास्त शतुमुचतः ॥२५॥| देने को उचत ह्‌ ॥ २५१ सं र शाप देने कोः ; 
' सा कथयामास यथाृत्तं पिवेसवतः। | दयत देखकर छायाने उनको सबदाल कह सुनाया"... 


तेत्महदाशय्यं न दृष्टमिति ेनचित्‌ । 
ता वास्सस्यदुतसञ्य शापं पुत्रे परयच्छति ॥३१॥ 


भ०्७८ माकेरटेयुरार २७७ 
विदिवाथश्च भगवान नगामं त्वष्टुरालयम्‌ ॥३६॥ श्रौर बे उसको जानकर विश्वकमकि घर गये।द६॥ 


ततः स पूजयामास = कयपूमितम्‌ फिर विश्वकमां ने श्पने घर प्र अये ह सुरथं 
रि मास तदा बरोषयपृजितम्‌। मगवान्‌ काजोकिश्रिलोकीसे पूञ्ति है परम 
भाखन्तं परया भक्त्या निजगेद्ुपागतम्‌ ॥२७।। भक्ति से पूजन किया ॥ २७॥ फिर मूरथं जने उनसे 


सां पृष्टस्तदा तस्मै कथयामास विध्व्रत्‌ । | संशा की बात पूरा तौ विभ्वकमां ने कटा किव 

क ल व यद्य आ थी परज्तु कु दिन वाद मैने उसे श्राप 
्रायतेमरेह म भतः भपित ब ॥२८॥॥ के यहाँ ही मेज दिया था ।य फिर सूयं भगवान्‌ 
दिवाकरः समाधिस्थो बढवारूपधारिणीम्‌ । ने ध्यान करिया तो संज्ञा को घोड़ी के वेप मे उत्तर 


तपधरन्तीं दह्ये उत्तरेषु कुरुथ ॥३६॥ दिशा मै स्थित कख देश मे तप करते हप देखा ॥ 
सौम्यमूर्सिः शुभाकारो मम भत्ता भवेदिति। भोर सूं यह भी जाना कि बह इसलिये तप 

"यु कर रदी है कि उसके खामी शान्तमूर्तिं श्रीर शम 
अभिसन्धिश्च तपसो बुयुधेऽस्या दिवाकरः ॥४०॥॥| श्राकार घले दो जाने" ॥ ४०॥ दे करौषटुजिजी ! स 
शातनं तेनसो मेष्य क्रियतामिति भास्करः । | पर सूर्य ने संकञा के पिता विश्वकमां से कडा कि 


(चाह मिखकम्पसं संया; पितरं मेरे तेज को घटा दीजिये ॥ ४१॥ फिर विश्वकमां 
चाह विश्वकम्पां संज्ञायाः पितरं दिन ॥४१। ने सम्वत्सर चक्र बाले सूयं के तेज फो घटा दिया 


संब्सरभमेस्तस्य पिए्वकम्मा खस्ततः । | रर देवां ने बहौ कर ख भगवान्‌ कौ 
तेजस; शातनं चक्रे स्तृयमानथ दैवतः ॥४२॥॥ स्त॒ की ॥४२॥ | 


इति श्रीमादौण्डेयपुराणमे वैवस्वत मन्वन्तर नाम ७७बोँ अ° समाप्‌ । 


-- छद -~ 
श्ररट्तरषां भ्याय 
माकीरडेय उवाच मार्करदेयजी चोले-- । 
ततस्तं तुष्ुरदेवास्तया देवपयो रषिम्‌ । दसके ्ननन्तर सव दैवता श्रीर देवपिं गण 
वाम्मिरीड्यमदपस्य रैलोक्यस्य समागताः ॥ १॥ शरेल्ोक्यसेलंदनीय सू्यमगवानकी स्तुति करनेलगे। 
देवा उः देवता वोकज्ते- 
नमस्ते ऋक्स्वरूपाय सामरूपाय ते नमः) हे भगवस्‌ ! ऋण्बेद, यजुत्रद, श्रौर सामवेदके 


यजुःस्वरूपरूपाय साम्नां धामवते नमः ॥ २ ॥ खरूप ्ापको नमस्कार है.॥ २॥ क्ञान के.धाम, , 
ज्ञानैकथामभूतायं निथुततमसे ` तयः छअन्धकारनाशक, शुद्ध ॒ ज्योति श्नीर निर्मलात्मा 
शुद्धन्योतिःखवरूपाय विश॒दधायामलात्मने ॥ २॥ व खरूपोँ को प्रणाम है ॥ ३॥ व 
= चरोएय, पर, परमात्मा, समस्तं जयत्‌ व्याप 
ध बरिषठाय॒वरेएयाय पर्न परमात्मने ौ श्रात्ममूरति शादि आपके स्वरूपो को नमस्कार दै॥ 
“` नमोऽखिलनगदापि-खरूपायात्मभूचये ॥ ४॥ शाप सव पदाथ के कारण शौर छान मे चित 
स्व्वकारणभूताय निष्ठायै ज्ञानचेतसाम्‌ । | म स्थित है । काश आतमा सरूप सूं |, आपको 
नमः सष्यैसवसूपाय भकाशातवरूपिरे ॥ ५॥ नमस्कार है ॥८॥ भाखर शौर विवाकः सूप भराय 


तयं ; कौ नमस्कार है तथा सत्रि के कारणभूत श्रौर 
भास्कराय नमृस्तुभ्य तया दिनङते नमः । न्ध्या ज्योत्स्ना के करने बाले आपको नमस्कारः 


शव्यरीदतवे यैब सन्धयाभ्योतसनाकृते नमः ॥ ६ ॥ हे ॥ ६॥ हे भगवन्‌. | यद सम्पूणं जगत्‌ आप दी 
त्वं स््यमेतद्धगवान्‌ नगदुदश्रमता त्या । | है जीर आपके दी मण्‌ करने से शरापके साय 
भ्रसत्याविद्धमखिलं बह्माणडं चराचरम्‌ ।। ७ ॥ सव चयचर बरह्ड धमतः है ॥७॥ आपकी 


| 

तदंशुभिरिदं स्पष्टं सब्ब सज्ञायते शुचि । , किरणों सव ( 

त्रियते लत्करैः स्ाञ्नतादीना पथित्रता ॥ ८ ॥ शरारी किरणो स्पत से व पिज - 

होमदानादिको धम्मो नोप्काराय जायते । होते दै जव तक शपो किरं से व का 
संयोग नदीं होता तचतक होम,दानादिक धमं सफल ` 

¡तावद्यावन्न संयोगि जगदेतद्‌ त्वदंश॒भिः 1 ६॥ 1 । 


¡ सकलानि च सामानि निपतन्ति तदङ्गतः ॥१०॥ जगत्‌ के स्वामी ! श्राप जिस.रकार ऋग्नेद्‌, 
| ऋडसयस्त्वं जगमाथ. खमेव च यदुम्मेयः। | यद ओर सामनेदमय है उसी प्रकार श्राय 
। यतः सामसयशैव ततो नाथ अयीमयः ॥११॥ चयीमय है ॥ ११ ॥ श्राप बह्म के स्वरूप श्रीर पर 

| 


¦ खमेव त्रह्मणो रूपं प्रश्चापरमेव च । | तथा श्रपरः ह । तथा श्राप मूर, मूर्त सदम .श्ौर 
: तामृतस्तथा ष्म स्थलरूपस्तथा स्थितः ॥१२॥ स्थूल रूप से स्थित हँ ॥ १२॥ निमेष चीर. काष्ठ 


= १ ; श्रद्‌ काल खरूप त्षयातममक आ्रपदी हे, श्राप . 
निमेष-काषठादिमयः कालरूपः क्षयात्मकः । प्रसन्न हों श्रौर अपनी इच्छा से दी श्रपने तेज को . 


भसीद स्वेच्छया रूपं स्वतेनःशमनं कृरु ॥१३॥| शमन करे ॥ ९२।॥ 
साकरडेय उवाच माकंरडेयजी ५8 
¡स्तु । देवताच्रों ओर देवर्षियौं के एस प्रकार स्तुति 
एवं सं्तृथमानस्त॒॒देवेदवर्षिभिस्तथा । > 
धुोच स्वं एदा तेनसेनसां राषिर्ययः ॥१४।॥| करन पर तेजरशि श््यय ख्य भगवान्‌ ने शरपने 


{यत्‌ तस्य छढ्मयं तेनो भविता तेन मेदिनी । | तेज से पृथ्वी, यजुर्मय तेजसे श्राकाश, श्रौर साम- 
स्यसुम्भयेणापि दिवं खगे सामसयं रेः ॥१५।॥| मय तेज से स्वम की उत्पत्ति इ ॥१५॥ शान्त इष 
ऽशातितास्तेनसो भागा ये तषट दश पंच च | | वेज के पन भाग मे से एक भाग का विर्वकमां 


ने महादेव का चिश्रूल निर्मित किया ॥१६॥ सूर्यं के 
सत्वणेव तेन सव्वेस्य कृतं शतं महात्मना ॥१६॥ निके तेज से वि्वकमा ने विम्य का चकर, 


ऽचकर विष्णोवसूनांश्च शङ्करस्य सुदारुणा । | बछर के वार्‌, रभि की शक्ति छरीर कुवेर की ' 


२७८ माकरडेयषुराण ०७८ ` 


नदीं होते ॥६॥ सव ऋचायें तथा यजुर्वेद के मन्त्र ` 
| ऋचस्ते सकला शेता यज॑ष्येतानि चान्यतः । | श्रौर सामयन्ब श्रापक्न अति ९०: 


तेजको कम करदिया ॥१४॥ भगवान्‌ सूर्यके छग्मय " 


~ [1 


पावकस्य तथा शक्तः शिषिका धनदस्य च ॥१७।॥ पालकी वनाई ॥१७॥ तथा श्रन्य देवताश्रौ, यक्तं ` . 


अन्ेषाच सुरारीणामल्ा्ु ॥ माणि । विश्वकमां ने सूरय के निकले हुण तेज से बनाये ॥ 
पक्विययापराणाञ्च तानि चक्रं स विश्वकृत्‌ ॥१८॥ शौर उस तेज के सोलन भागः को भगवान्‌ स्यं 
उतत षोडशं भागं बिभर्मि भगवान्‌ पिथ; ने स्वयं धारण फिया तथा अविष्ठ पन्द्रह भाग ` 


ऽतत्‌ तेजः पंचदशधा शातितं विश्वकम्पणा ॥ १६ वेज को विश्वकर्मां ने शान्त करके देवताश्रोँ के 


अखं वनाडाले ॥ १६ ॥ फिर घोडे का रूप धारण 
*तताञ्शवस्पक्भादुरुतरानगमत्‌ इरन्‌ । | कर सूं उततर दिशा मे र्देशको गये श्रौर बह 


ददश तत्र सो्ञाञ्य बद्षारूपधारिणीम्‌ ॥२०॥| जाकर उन्होने घोड़ी के रूपपे संशाको देखा ॥२०॥ 
; पर्प संज्ञा ने जव उनको अति हुए देखा तो पर्‌ पुरुषः 
साच दृष्ट तमायन्तं परसो विशृङ्धया। की शङ्गा करके वद उनके सन्पुख श्राग . जिसे 
जगाम सभ्युखं तस्य पृष्टरक्षणतत्परा ॥२१ छि पीछे की तरफ की रक्ता दोजावे ॥ २१॥ तव 


ततश्च नासिकायोमं तयोस्तत्र ॒समेतयोः। उन दोनो की नाक्र से नाक का योग होगा श्री 
उस घोड़ी रूपी सं्ञाके सुख से नासत्य शौर दख 


-नासत्यदसौ तनयावश्वीवक्त्रचिनिगंतौ ॥२२॥ नाम वाले दो पुत्र उत्पन्न हुए ॥ २२ ॥ सू्यके परथ्वी ` 


{रेतसोऽन्ते च सन्तः खद्गी चम्मं तयुतरध्क्‌ । पर गिरे इए वीर्यं से रोषन्त नाम.एक पुरुषं प्रकट . 
| इमा जो घोड़े पर चढ़ा हा था तथा उल, तलल- 
५ समुदमूतो वाणतूएसमन्वितः ॥२२।॥| बार, चदुप वा श्नौर अन्य शख धारण किये हु 


1. _ नन्डंः 


> + 1 


श्र ७६ | माकेरएठेयघुराण २७६ 


ततः खरूपमतलं ` दशयामास भानुमान्‌ [ था॥ २३॥ इसके अनन्तर सूयं ने अपना अतुल 
तस्यैषा च समालोक्य स्वरूपं शदमाददे ॥२४।॥ स्वरूपदिखाया जिसको देखकर णि संज्ञाने भयत 


1३ भसन्रता हई ॥ २४॥ फिर सं्षा ने शपे पू्वंखरूप 
स्वरूपधारिणीञ्चेमामानिनाय निनाभ्रयम्‌ | | को पुनः धारण कर किया नौर सूर्मी उस भीति. 


संतं माय्यीं भीतिमतीं भास्करो वारितस्करः ॥२५॥ मती भाया को फिर अपते श्राधममे जेगये॥२॥ इस 

9 (& योऽस्या १ ऽमृदरेप्तो { [क येचस्च नीरं ४ 
ततः पृष्वुतो ; सोऽम्‌ मलुः। | के वाद सेका प्रथम ९ वैवस्वत मच हप श्रौर 
द्वितीयश्च यमः शापादम्मेदष्टिरमूत्‌ सुतः ॥२६॥ दरे पुव शाप के कारण धमेदष्टि यम दुष ॥२॥ 


। तीसरी कन्या यमुना नाम महानदी इहै श्नौर यम 
क्रिमयो मांपमादाय. पादोऽस्य महीतले । | को पान ॐ पृध्वी पर गिरने का शाप सं ने स्वयं 


धतिष्यन्तीति शापान्तं तस्य चक्रं पिता स्वयस्‌॥ २७ शान्त कर दिया ॥ २७॥ श्रौर यमराज को जो धमं 
ं ) ष्टि रखते थे शरोर मित्र तथा शत्रको 
ध्मदष्टियतशषासौ समो सिते तथाऽहिते। | मँ टि रखते थे शरोर मिन तथा शतुफो समभाव 


(स छेखते । ते =] ६] ६6 निरय 
ततो नियोगं तं याम्ये चकार तिमिरापह; २८) ध के त व ता 


युना च नदी जज्ञे कलिन्दान्ताहिनी । | नदी होकर कलिन्द देश भे वहने लगी -श्रीर मदा- 
ञ्विनौ देवभिथजौ इतौ पित्रा महात्मना ।॥२६। | त्मा ख ने छपने दोना पुत्रको जो धोड़ीरूप संक्ञा : 
शु्काधिपतिले च सवन्तौऽपि नियोनितः । | से उत्पल ट थै चभवनीमा नाम ले चेव 


॥ , ताश्नोका वैच वनाया ॥२६॥ सूर्थने येवन्तको शुद्यको | 
बायासंहासतानाज्च नियोगः भरयतां मम ॥३०॥| का अथिपति बनाया । शरव चाया के पु की शो ` 


ूर्व्वनस्य मनोस्तुस्यश्चायासंहगाइतोऽ्रनः । | नियुक्ति द उसको खनो ॥ २०॥ चाया फे षडे 
ततः साबर्िकीं संजञामवाप तनयो खे; ॥२१॥ पुर का जो मड के ल्य था लं ने साचरिक नाम 
भविष्यति मतुः सोऽपि बलिरिन्द्रो यदा तदा । 1 न 9 ॑ 
‡ शनैश्चरो ग्रहाणांच मध्ये पित्रा नियोजितः ॥२२॥ सूं ने गरदयँ के मध्य भे नियुक्त विया ॥ ३२ ॥ शौर 
५ तयोस्ठतीयां या कन्या तपती नामस इस्प्‌ । तीसस जो कन्था थी उसका नाम तपती रखा ! 
शपात्‌ संवरणात्‌ पुत्रमवाप मनुजेश्वरम्‌ ॥२२॥ तपतीके §रुदेशके राज्ञा सम्ब्रणसे मबुजेश्वर नाम 


० पक पुज तरा ॥३३॥ हे करषटुकि { अव उस सातवें 
तस्य वैवस्वतस्याहं मनोः. सपतममन्तरम्‌ । | मन्वन्तर मे जो देवता, ऋषि शरीर उस मञके पुत्र 


कथयामि स॒तान्‌ भूषाशषीन्‌ देवान्‌ सुराधिपम्‌ ३४।।, राजा लोग हप उनको कता हँ ।र्ध॥ 
इति शीमाक॑स्डेयपुराण मेँ बेवस्यत मन्वन्तर मे वैवसखतोपत्ति नाम ७८बां अध्याय समप्त | 


-- उद ~ 
उनासीवं भध्याय 
माकर्डयवाचं माकंरडेयजी बोे- 
>.-द्ादिस्या वसवो रद्राः साध्या विश्वे मरुद्रणाः । वैवसूबत मन्वन्तर म आदित्यम, वगर, 


शद्रगण, साध्यगण, विश्वेगण, मरुहगण, भ्गुगण 
भृग्ोऽङ्धिरसथ्ै यत्र॒ देवगणाः स्पृताः ॥ १ ॥ शौर अद्िरसगण ये श्राठ देवताशओकि ग॒ कहाये 
आदित्या यवो सुदा विद्याः कश्यपात्मनाः। | ॥१॥ श्ादित्य, व र सद्गण करयप भे मन 


४ हे वथा साध्य, सत्‌ श्नीर चिश्वेगण॒ देतरतार््ोके 

साध्याश्च वसवो विश्वे . धमष्नगणाल्ञयः ॥ ९॥ संयु कदे गेह | २॥ भरयुगरा शशु के पुज दै 
भृगोस्तु भृगवो देवाः पत्रा द्गिरसः सुताः । | श्नीर शर्गिरख श्रङ्गिण पि ी सन्तान दै दै 
एष सगथ मारीचो विङ्ेयः साम्प्रतं द्विजः ॥ २॥ दिज । यद सम मारीच नाम है जो र खमयतक 


उर्सवी नाम्‌ चैनो महात्म यहमागश्क्‌ । ` वतमान दै ॥३॥ श्नौर इस मर के द द्र मदात्मा 


#। 
॥ 


२८० माकेडयषुराण गर ८० `, 


शतीतानागता ये च वर्चन्ते साम्भतश्च ये ॥ ४। | अलस है लो कि यक्षभाग के भोक्ता है रौर ओ - 


य विहेयस्ुतयलक्षणाः इन्द्र टोदुके दै, दोने चा है श्रथवा जो वर्तमान है ` 
॥ त्रिदशेन्द्रास्तु || [| दिये 4 
स्व ते (४ । | ॥॥ उन सवको सभान लच्तणएबाला जाननाचा 
सदसक इिशिनः सव्वं एव पुरन्दराः.॥ ५॥ दै सव पकदङ्ञार श्रांख वाले, वञ्जको धारण करने. 


मघतन्तो इषाः स्व शृङ्िणो गनगामिनः | . | बे तथा पुरन्दर नाम से परसिद्ध. दोन ` 
ते शतक्रतवः सव्व भूताभिमवतेनघः ॥ ६ ।॥| वाले दै ॥५॥ वे सथ इन्दर मधतान्‌, ङ्गी शरोर `. 


वै कारैः शुद्धैरयिषत्यगुणान्िः गजगामी है । उनम से दर एकने सौ यन्न करिये: 

ष # १ । | | = य ५. ५६ 
ध व ।  । तथा चे सव तेजस्वी ॥ ६॥ ये इन्द धमादि द्र । 
भूतमव्यमवन्नाथा; श्रणु चतव्रयं (द्वन ॥ ७॥|| चरणों करके स्वामित्व को प्रात हयै तथा भूत ` ` 


भूर्लोकोऽयं स्मृता भृभिरन्तरीक्ं दिवः स्यृतम्‌। | भविष्यत्‌ ओर वर्तमानपर ्राधिपत्य करते ह श्रव 
दिन्यारूयश्च था खग॑सत्रैलोक्यमिति गचते ॥ ८ ॥ दे द्विज ! इस मन्वन्तर के बैलोक्य को सुनो ॥७॥ 
अव्रिमैव दरिष्टध काश्यपश्च सहादरषिः। | भूलोक पृथ्धी, दिवलोक श्रं तरित श्रीर दिव्यलोक . 


मत कौशिकः स्वर्गं के नाम से परसिद्ध ह ओर यदी इस मन्वंतर .. 
श भरद्वाजो विश्वामित्रोऽय कोरिकः ॥ ६॥ ङ यैलोक्य हे ॥ ८॥ परबि, रिष्ट, कास्यप.नीवमं ` 


तथेव पूत्रो भगवादचीकस्य महात्मनः | भर्द्ाज तथा कौशिक विश्वामित्र ॥ ६॥ श्रौर ` 
नमदभिस्तु सेते युनयोऽत्र तथान्तरे ।॥१०।॥ भगवान्‌ ऋचीक के पुत्र यमदाचचि यदी सात श्स 
इ्वाढु्लामगश्चैव ष्टः शर्यातिरेव च | | मन्वन्तर के सप्र्पिं ह ॥ १० ॥ इवङ्‌, नाभग.धुष्ट, 
नरिष्यन्तश्च विख्यातो नामगो दिष्ट एव च ॥११॥| श्याति, नरिष्यन्त, दिष्ट ॥११॥ करूप, पूषध श्रीर 
करूषश्च पृषध्र वसुमान्‌ लोकविश्रुतः । | बछुमान यदी नौ पुत्र वैवस्वत मनु के संसार -मँ 
मनोवैषस्वतस्येते नव पुत्राः भक्ीर्पिताः ॥१२॥ भसिद्ध है ॥ १२॥ ड व्रह्मन्‌ ! इस प्रकार मैने श्रापं 
वैवस्वतमिदं व्रह्मन्‌ कथितं ते मयान्तरम्‌ । | से वैवस्वत मन्वन्तर कडा । इसको शुने से या, 
अस्मन्‌ शरुते नरः स्यः पठिते चेव सत्तम | | पड़ने से मलुप्य सव पापँ से छूट कर महान्‌ पुरयं 
च्यते पातकैः सर्वैः पुण्यश्च महदश्ुते ॥१३।॥ को भाघ करता है ॥ १३॥ ॑ 


इति श्रीमाकर्डेयपुराण मे साविक मन्वन्तर भँ वैवस्वत कीतंन नाम ७६्बौँ ध्याय समाप्त | 


-> खरः < 
अस्सीवों अध्याय 
रोषटुकिरवाच , | करीष्टुकिजी वोक्े- । 
स्वायम्धुवा्या; कथिताः सेते मनवो मया । हे मार्कारडेयजी ! स्वायस्धुब आदि सात - 


। मन्वन्तसे का तथा उनके अन्दर जो देवता, राजा 
तदन्तरेषु ये देवा राजानो भुनयस्तथा ॥ १॥| शौर खनि ह उन सवका दृत श्रापने वशेन +; 


किया ॥ १॥ हे महामुनि माकरडेयजी ! इस कल्प 
अस्मन्‌ कपे सपमेऽन्ये भविष्यन्ति महाएुने। | ॐ इन सात मन्वन्तरोके पश्चात्‌ जो अन्वन्तर श्रौर 


भनवस्तान्‌ समाचध्व ये च देवादयश्च ये ॥ २1 दंगे उनका भौर उनके समय मे जो देवता श्रादि 


क 


होगे उनका चत्तात किये ॥२॥ ` 


माकरडेय उवाच ` | मार्करुडेयजी बोले-- | | ` - , 
कथितस्तव ॒ सावरिश्छायासंज्ञासुतथ यः! | . मैं छाया संज्ञा के पुव सावर्भिक के विषय. मे 


3 . , , -> 1 च्रापसे कह चुका हं कि वे अपने बध क 
` `.“ .+ मनोस्तस्य; स. मलुमेषितामः ॥ २ ॥ तुल्य तेजस्वी अही = 


~ प्र 


\ 


श्र ८१ २६ माकणडेयपुराण | २८१ 


रामो व्यासो गालवश्च दीक्निसान्‌ कृष एवं च | | ॥३॥ उस भन्वंतर मे राम, व्यास, गासंव.दीघमान्‌, 
ष्यभृङ्गस्तथा द्रौणिस्तत्र सप््षयोऽमवन्‌ ॥ ४।| छप, डीपि तथा अश्वत्थामा ये साती सपि 
सतयाथामिताभाश्च सख्याध्ैव त्रिधा सुराः | दोगे॥ ४॥ तपा, श्रमितामा च्रीर सख्या इन्दी 
विंशकः कथितयैषां प्रयाणं त्रिगुणो गणः ॥ ५॥| तीन देवताश ॐ गरा त्रिणुण विंशक प्रसिद्ध होगे 
तपस्तपथ शक्रश्च च तिज्योतिः मभाकरः ] | ॥५॥ तपः तपस्वी, शक, यू ति, ज्योति भभाकर, 


भरमासो दयितो धम्मसेनोररिमश वरतुः ॥ ६ ॥ मभास, दयित, धमे तेजरशि, शरीर कह ॥६॥ 
इत्यादे तपा नाम देवतां के विंशक गर होगे 


इत्यादिकस्तु सुतपा देवानां विंशफो गणः | ५4 

भथुविमर्विभासाचयास्तथान्थो विंशको गणः | ७॥ व व क 
खगाणाममितानान्तु ठतीयमपि मे शृणु । | गणो को खनो 1 बे दम, दान्त, ऋ, सोम शरीर 
दमो दान्तो रितः सोमो विन्ताचयाश्रव विंशतिः) ८ )। नन्ता रादि विशक गण ह ॥२॥ यदी खय देवता 
स्या देते समास्याता देवा मन्वन्तरापिपाः । | इख मन्वन्तरे स्वामी होगे । म देवता साविक 


. मारीचस्यैव ते पुत्राः काश्यपस्य भनापतेः । | मन्वन्तर भ मरीच अथात्‌ मजापति कग्यप के पु 


भविष्याश्च भविष्यन्ति सांषणस्यान्तरे मनोः ॥ ६ ॥ रौमि ॥ ६॥ हे सुनि ¡ विरोचन फ पुत्र राजा वलि 


सरोचनिमे इन देवतां के इन्द्र होगे ! यह राजा वलि श्रपनी 
तेषामिन्द्रो भपिष्यस्तु वर्तिर्वरोचनिमुने । धतिज्ञा को पालने के किये भव तक पाताल लोक . 


पि दैः 4 वृन्धन्‌ ॐ ^~ 1 निप्सोहि 
पाताल आसत योऽ्धापि द्यः समयबन्धन॥१०।|| र स्थित है ॥ १०॥ विरला, अव्वैवीर, ध 
विरनााव्ववीर् निम्महिः सत्यवाक्‌ इतिः | | सत्यवाक्‌, ति शौर विष्णु आदि, ये सावर्षिक 
विष्टवा्याश्चेव तनयाः सावणंस्य मनोर पाः॥११॥ म कते पुत्र उस मन्वंतर ऊ राजा गि ॥ ११॥ , . 


इति श्रीमादर्डेयपुराण मे सावणीक मन्वन्तर नाम ८ ण्यां अध्याय समाघ्र। 


~~ यै 2 :&& १ ८६९ ~~ 
इक्याीक्षं चष्याय 
॥ देवी मादात्स्य ॥ 
॥ श्नोरम्‌ नमश्वरिडकायै . 
माकेरडेय उवाच माक॑एडेयजी चोल ~त = 
सू्य-पुत सावरिक की जो कि श्राटवं भनु 


सावः घुप्यैतनयो यो मदु; कथ्यतेऽ्मः। इ 
तदुः है उत्पात २ 

निशामय तदुसपतति विस्तरादरदतो मम ॥ १॥ ह छुनिये ॥९॥ जिस प्रकार कि महामायाके ममाव 

महामायानुभावेन यथा सन्धन्तराधिएः। | से वद महाभाग सावर्णिक मन्वंतर के स्वामी हण 


, स बभूव महाभागः सावणिस्तनयो सेः ॥२॥ | यह सुनिये ॥२॥ पदिले स्वारोचिष मन्वंतर में स्वा- 


स्वासेचिषेऽन्तरे प्य॑वैवरषंशसञुद्रव! । . । रोचिष मु क पुत्र चैचके बं मे उरथ नाम राजा 
||| इः जो कि समस्त पृथ्वी मरडल पर राज्य करते 


तेमणडल्ते 
ध व व धे ॥२॥ पिर प्रजा को चीरस पुत्र की तरह पालते 
1. इए उनके कोला-विध्वंसी लोग श्रु दोगये ॥ ४॥ 
बभूवुः शत्रवो भूपाः फोलािध्वंसिनस्तथा ॥ ४॥ उन परवल शघुश्के साथ राजा रक धोर युध 
तस्य तैरभवदुगुद्मत्तिमवत्तदणिडिनः ] इरा श्नौर ययपि कोला-ध्वंसी लोग थोड़ी तादान्‌ 


यूनि षं वदे कोलाविध्वंसिमिर्चितः ॥ ५ ||| चैने न्न मै नव्य खी विजय दर 1 ५॥ फिर वद 


२८२ 
ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत्‌ 
आक्रान्तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः ॥ ६ ॥ 
शरमात्यत्तिभिदुषेहव्वलस्य दुरात्मभिः । 
कोषो वलश्वापहूतं तत्रापि खवपुरे ततः ॥७॥ 
ततो शृगया्यानेन हृतस्वाम्यः स भूपति; । 
एकाकी हयमारुद्य जगाम गहनं घनम्‌ ।॥ ८ ॥ 
प॒ तत्राभ्रममद्रा्ीदद्विनवय्यैस्य मेधसः | 
प्रशान्पश्वापदाकीणं युनिशिष्योपशोमितम्‌ ॥ ६। 
तस्थौ कन्नित्‌ स कालञ्च सुनिना तेन सत्कृतः । 
इतश्चेपच विचरंस्तस्मिन्‌ ुनिवराभ्रमे ॥१ 
सोऽचिन्तयत्‌ तदा ततर ममत्वाङृष्टचेतनः । 
मसूरः पालितं पूर्वं खया दीनं पुर हि तत्‌ । 
मदभृत्यस्तैरसद्शचेध्मतः पारयते न या ॥११॥ 
नजाने स भानो मे शुरहस्ती सदामदः । 
मम वेरिवशं यातः कान्‌ भोगाजुपलषस्यते ॥१२॥ 
ये ममानुगता नित्यं पभरसादधनभोजनैः । 
अनुत्त धुवं तेऽ्य इव्वन्तयन्यमहीभृताम्‌ ॥१३। 
शरसम्यग्बययशीतैसतः इव्व॑द्विः सत्त्यम्‌ । 
संचितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोषो गमिष्यति ॥१४॥ 
एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः | 
तत्र पिमरा्माभ्यासे वैश्यमेकं ददशं सः ॥१५), 
स पृष्टस्तेन कस्तं भो हेतुागमनेऽत्र कः । 
सशोक इव स्मात्‌ तं दुम्मंना इव लक्यसे ॥१६॥ 
इतयाकण्यं वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम्‌ । 
भतयुवाच स तं वैषयः पश्रयावनतो दपम्‌ ॥१७॥ 

वय उवाच 
समाधिर्नाम वैश्योऽदषुयन्नो धनिनां इले | 
पत्रदारेर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः ॥१८॥ 
बिदीनश्च धनेदारे; प्रेरादाय मे धनम्‌ । 
पृनमभ्यागतो दुःखी ` निरस्तथाप्वन्धुभिः ॥१६॥ 
सोऽदं नेन्न एत्राणं इशलाङुशलात्मिकाम्‌। 


माक्ठेयपुराण 


सुरथ अपने नगर मे श्चपनेदी दशके स्वामी होगये 


अ० ८१ 


परन्तु वर्हाभ उन प्रवल श्रो उनको धेरलिया 
॥६॥ फिर श्नके नगरमे दी इनके कमजोर दो. 
जानेपर इनके दु शौर दुरात्मा मेध्यो श्रीर सेना 
पतिर्यो ने राज्य फे खज्ञाने छर सेना पर अपना 
श्राधिपत्य जमा कल्िया ॥७॥ जच राजा सुरथ का. 
स्वामित्व कीर दने लगा तो श्चाखेट ॐे हाने वह 
श्रकेलते धोड़े पर सवार होकर दुर्गम वनम चल्ेगये 
॥८॥ उन्दने उस वनम द्विजवयं मेधा का शआ्राश्चम 
देखा जो करि परशन्त, पशु-पक्ियों से व्याप्त त्था 
सुनि के शिष्यो से शोभित था ॥६॥ सुनिसे सत्कार 
प्रप्त करने पर वह राजा छुं समय के लिये उसी 
श्राश्रममे उदर गथा, चह वहुधा उस भुनिके सुन्दर 
श्रम में इधर-उधर धुता रहता था ॥ १०॥ प्क 
समय वह राजा याँ पर ममतायुक्त होकर सोचने 
लगा कि जो नगर मेरे पूर्वजं ने वखाथा था उस 
को भै छोडकर चला आयान मालूम मेरे च्रधर्मीं 
नौकर लोग परजा का धमं पूर्वक पालन करतेहै या 
नदीं ॥ ११॥ मै नदीं जानता किं मेरे मदयुक्त उस 
चलचान्‌ हाथी को शु के वशम होकरः वद पधान 
खाना देता हे या नदीं ॥ १२॥ जो मेरी असन्ना के 
ज्ये नित्य मेरे पास ्राकर धन श्नौर भोजनादि ` 
पाते थे वेज श्रपनी आजीविका के लिये दुसरे 
राजाश्रों की सेवा करते होँगे॥ १३॥ सजा अत्यन्त 
दुःखपूर्वक सोचने लगा कि जो सलज्ञाना मैने बडे 
परिभ्रमसि जमा किया था उसको नौकर ल्लोग 
निरन्तर खर्च फरफे कीश कररटे होगे ॥ १४॥ यद 
तथा श्नन्य घातं चह राजा सोच रहा था कि इतने 
मे उसने आश्रम के पास एक वैश्य को देखा ॥१५॥ 
उसने वैश्य से पाकि तुम कौन दो चनौर किंस 
कारण से यदा राये हो तथां किंस कारण से तुम 
उदास श्रौर शोकयुक्त भतीत होते हो ? ॥ १६॥ 
राजा के यह वचन नकर वह "वैश्य राजा को. 
भणाम कर विनयपूैक कने लगा ॥१७॥ = ` 
वेश्य वोला- 

, -घनियों के लम उत्पन्न मै समाधि नाम वेश्य 
ह नौर घन केलोमसेमेरे दुली पुने सुम 
को घर से वाहर निकाल दिया है ॥१८ ॥ खी पुत्रा. 
दिको मेरे घनको लेकर सुभे घरसे चादर निकाल. 
दिथा है दस कारण मै डुभ्खी होकर भवधुशो ` 
से त्यागा हुश्रा इस वन मँ आया ह ॥ १६॥ श्रौर 
श्रव यहां रहते हण सुभे खी-पु् ओर. स्बजनोंकी 


` ~ स्वननानाँच दांराणाञ्चात्र संस्थितः॥२०॥ कुशल दम का ङ मो पता नदीं हे ॥ २०॥ `श्रौर : 


षष 


<^ = 


य्िरस्तो भवांहव्यैः पव्रदारादिभिर्षनेः । 


यत्‌ पेमपरवशं चित्तं चिगुशेष्यपि बन्धु ॥२५ 


. समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः ॥२७॥ 


नमस्त ` समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे । 


भ° ८१ माकेण्डेयषुराण २८३ 


म नदीं जानता कि घरपर उनकी कुशले या नदीं 
तथा वे च्रच्छे कायौ मे पचत्त ह या नदी ॥ २१॥ 
राजा वेक्ते-- 

जिन खी-पु्ादि ने घन के लोभ से तुमकोधर, 
से निकाल दिया उनके स्नेह मे तुम्हारे चित्त को, 


ग 


ममत्व कया है १॥२२॥ 
वेश्य वोल्ला-- ` । 
जिस तरद आपने कटा वह सत्य है, परन्तु, 
क्या कर मेरा मन वशम नदीं है शौर उनके प्रतिः 
निर नदीं दोता ॥२३॥ जिन खरी पु ने घन केः 
लोभ से पति श्रौर पिदेस्नेह फो यु दिया श्रीर. 
श्रीर समको धर से निकाल दिथा उनके प्रति श्चव 
भी मेरे हदय मे ममता है ॥२०॥ हे महाबुद्धि ! य. 
छ्राश्वयं है किं मे यह सव जानता ह्या भी अन 
जान दोरा हं कारणक उन भाहैनवन्धु्ो मे भी 
मेरी ममता है जिन्दोने मेरे भरति शतु कासा कम॑ 
किया है ॥ २५॥ उन्दी ऊ लिये मै श्वास दोड़ा' 
करता हँ तथा दुःखी रहता ह । मै क्था उपायकर 
जिससे किं मेरा मन उनकी प्रीति चछोडकर उनके | 
प्रवि निर होजाय ?॥२६॥ ॥ 
माकेरडेयजी वेले- ( 
तव वे दोनों समाधि नाम वैश्य चनौर तृपघरेठ ¦ 
सुरथ उस सुनि के पास जाकर वैठे ॥ २७ ॥ उन, 
तौ ¡ यथाहं रेन संबिदम्‌ दोनों मे भ्याय पूर्वक सुनि की पूजाकी शौर उनकी । 
कृत्वा तु तो यथान्यायं यथाहं तेन संपिदम्‌। | श्क्षा पाकर घे वैठगये । इसके वाद उन वैश्य 
उपविष्टौ कथाः काथिकचक्रतरवश्य-पार्थिवो ॥२८]॥| रौर राजा ने कथा-वातां कहना शरू किया ॥२८॥| 
यजोवाच (2 र चापे 4 | 
भगर्वस्लवामहं प्रएटमिच्याम्येवं भगवन्‌ ! मै श्नापसे एक वात पृदता ह ॥, 
२ र मेरा चित्त मेरे बश मे नदीं है श्रीर इस कारण मेरे। 
दुःखाय यन्मे सनसः स्वचित्तायत्ततां विना ॥२६॥ 


मन को दुःख दोता है ॥ २६॥ दे भुनिवर ! राज्य 

ममत्वं मम राजस्य राज्याङ्ध प्वसिलेष्वपि। | के सम्पूणं अ ष ५ । यह ६ 

र | मी किं वह श्रव मेरा श्क्ञान क्यों होता 

जानतोऽपि 94 हिमेव निसत्तम ॥२०। ह १॥ ३० ॥ यह वैश्य भीखी, पुषा सेवक छीर 

श्मयंच नितः पुतरेदारभ त्यस्तथोन्‌भितः । स्वजनों दारा घन के लोभ मे घर से निकाला गया 

स्वजनेन च सन्त्यक्तस्तेषु हा तथाप्यति ॥३१। | है, परन्तु तो भी इसके उनम शतयन्त भीति दे 1 

श यद्‌ वैश्य श्नौर मै दोनों बहुत डुःखी ह कारणकि| 

एवमेष तथाहंच द्वायप्यत्यन्तदुःखितौ । | हम दधिदोष से विषय को विपरीत सममकर 
दृष्टदोषेऽपि बिषये ममत्ाद्ृषटमानसौ ॥३२॥ 


ममताके वशमेदहोर्हे दहै ॥२३२॥ हे महाभाग! 
तत्‌ केनैतन्मदाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि । 


यह किख तरह है कि क्षानियों को भी मोद होत 
हे । मेरी श्नौर श्स वैश्य की खी मूर्खता तो चवि 
ममास्य च भवत्येषा बिवेकान्धस्य मूद्ता ॥२३॥ वेकी श्नौर अन्धो मे होनी चादि ॥२३॥ 
ऋषिरवाच छपि वोज 


हे महामाय ! विषय के खमभने मे सब जीवों 


किं ठु तेषां एे क्षेममक्षेमं किं च॒ साम्पतम्‌ । सामय | मे नदी जानता फि घरपर उनकी कुलद था नही 
कथं ते किंनु सदृशाः दत्ता किं नु मे एताः २१॥ 
राजोवाच 


तु किं भषतः स्नेहमनुवधाति मानसम्‌ ॥२२॥ 
वैश्य उवाच 
एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं षचः। 


ङि करोमिन वघ्राति मम निष्टुरतां मनः ॥२३॥ 
यैः सन्त्यज्य पितृस्नेहं धनलुन्ध्निराकृतः । 

पतिखजनहाईञ्च हां तेष्वेव मे मनः ॥२४ 
किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते । 


तेषां ते मे निश्वासा दौम्म॑नस्यंच जायते । 
करोमि किं यन्न सनस्तेषवपरीतिषु निष्ठुरम्‌ ॥२६॥ 


साकेरदेय उवाच 


ततस्तौ सदितौ थिम तं युनि सथुपस्थितौ | 


-१८४ माकंर्देयपुराण |  अ० ८१ 


नन 


को ज्ञान है परन्तु यद चिपरय भी सवका च्रलम २ 
मेषयथ महाभाग याति चेवं पृथक्‌ पृथक्‌ ॥३४।॥| इ ७] क जोव दिन मे अनये होतेह थर कच 


देवान्धाः पराणिनः केविद्रात्राबन्धास्तथापरे । सानि मे, तथा छद जीवों को दिन रौर रात्रि मे 


तथा भाणिनस्तुस्यद्टयः ॥२५।॥| समान दिखा देता है ॥ ३५॥ सत्य चात तो यह 
५ व वनदरेन रभवत्‌ है कि देवल ५ को = नदीं ज 
ज्ञान पठ. पत्ती शौर .खगादिर्क मं भी दोता दे॥ 

[तो हि ज्ञानिनः सत्वे पशु-पक्ि-मृगादयः ॥३६।॥| जो क्ञान मनुष्यों को श वदी शग श्रौर पक्ियो को 
[नंच तत्मदुष्याणां यद्‌ तेषां शग-पक्षिणम्‌ । | है इस कारण मजुप्य श्रौर पश्-पक्ी क्वानम वरावर 
नुष्याणांच यत्‌ तेषां तर्यमन्यत्‌ तथोभयो;॥२७॥| ६ ॥.२७॥ देये, चधा से पीडित पथ पचची चह 


जानते हट भी चच्यो के खाने से हमारी भूख नदी 
नेऽपि सति पृ्यतान्‌ पतंगायावचचपु | | जायगी, मोह वश श्रपनी नोच से वच्च ॐ सुख 


एमोक्षास्तान्‌ मोहात्‌ पीड्यमानानपि श्ुधा॥३८॥| भर श्रादयार देते दै ॥ २८॥ हे मच्यो मे सिद ! क्या 
हुषा मञुनन्याघ्र साभिलाषाः सुतान्‌ भरति | | चाप नदीं देखते कि श्वान होते हप भी मजुप्य 
गोमाद्‌ भत्युपकाराय नन्दते द्वि न पश्यसि ।३६॥| भरतयुपकार कौ श्राशा से पु को पालते ह १।२९॥ 


संसार ॐ पालने चाज इभ्वरकी महामायाके प्रभाव 
थापि ममतावत्तं मोहगत्े निपातिताः से मदुष्य ममता शौर मोह के गर्वं मे गिरते है. ॥ ` 


हामायाप्रभावेण संखारस्थितिकारिणः ॥४०॥| इसलिये इसमे सन्देह न करना चाहिये कि महाः 
[नात्र विस्मयः कार्थ्यो योगनिद्रा जगपतेः ५ केस्वामीजो त व 
जगत्‌ ॥४१॥ हे श्रौर इसी से यह जगत्‌ मोहित र 
1 र व ष 19९ 1 ४१ ॥ वह देवी भगवती क्ञानियों के चित्तको भी 
निनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा। वलपूर्वक खींचकर मोह मे डाल देती है ॥ ४२॥ 
[लादादृष्य मोहाय महामाया भ्रयच्छति ।४२॥| उसी देवी ने इस चराचर जगत्‌ को खजा है. तथा ` 
पया वियते विश्वं जगदेतचराचरम्‌ | | षट स दोकर 9 लिये त को 
इ तरणं ५३॥ घर दता इ ॥४३॥ वद्‌ परम वच्यादट्‌ तथा 
= धर्दा श भवति । ५ क्ति की कारणभूत श्रौर सनातनी है । वह देवी 
श्र षिदा प्रमा क्ते एभूता स॒ ही सांसारिक वन्धनं की कारण श्चौर सव हश्वसें 
पंसारवन्धहेतुश्च संव सर्वेश्वरेश्वरी ॥४४।॥ की इ्वरी है ॥ ४४॥ 
राजोवाच राजा वेल्ते- 


भगवन्‌ का हि सा देवी महामायेति यां भवान्‌। हे भगवन्‌ ! र देवी कौन है ५ कि 
कच क चाप महामाया कहते दे । हे द्विज बह कंसे पदा 
वीति कथयुतखन्ना सा कस्सास्याश्च किं द्विज।४५। इर नीर उसके क कया हे ९ ॥ ४५॥ हे ब्रहम क 


यतूस्रमावा च सा दैवी यत्खरूपा यदुद्रवा जानने वालों मे शरेष्ठ सुनि ! उसदेदीकाजो स्व 
४९ मिम र तनं | त्रीर खरूपं ञरर जिस तरह कि बह उत्पतन 
तत्‌ सन्वं ्रातुमिर ६ ब्रह्माचद्‌। वर ॥४६॥| हई हे वह खच मेँ श्रापसे सुनना चाहता ह ॥७६। . 


षि वोजले- 
नित्येवं सा जगन्ब्रूततस्तया सन्वेमिदं ततस्‌ 1 बह जगतूमूतं नित्य च श्रौ उसी । यहसव 
तथापि ततदुतपत्तिवंहुधा श्रूयतां मम ॥४७]॥| है । तो भी उसकी उत्पत्ति संकतेप मे सुते खनो 
ठेवानों काय्यसिद्धयथैमाविमवति सा यदा ] | ॥९अ॥। यचपि वद देवतानं की कार्यसिद्धि के लिये ` 


उलन्ेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते ॥४८॥ सार म भ्ाडुभू त होती है तो भी उसको नित्या 


कहते हें ॥ ४८ ॥ कट्प के श्रन्त म जगत्‌ -मे प्रलय 
योगनिद्र यदा विष्शुनेगत्येकार्वीडते । होने पर जव भयवान्‌ निल योगनिदा भे प्राप्त द्यो ` 


आस्तीय्यं शेषमभजत्‌ कल्पान्ते भगवान्‌ युः ॥४६॥| कर शेय पर शयन कर रहे थे \७६॥ तव विष्णु केः 
द्वावसुरौ धोरो विर्यातोः मधुकेदभो । । कानके मल सेदो भयङ्कर दैत्यज कि मधु -श्नौर 


= -..-- === ~ ~~~ ~ ----- - 


# 


ज~ -2-न = 


= ननन 


माकरुेयष्राण २८५ 
स -------- ज ~------------------------- 
विष्णकर्णमलोहमतौ हन्तं बरह्मार कैटभ के नाम से विख्यात हुय निके श्र बह्मा 
॥ दूरा ह र हाणएणुचतौ ॥५० जी का वधं करने को तैयार इए ॥ ५०॥ थजापत्ति 
स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः| २ ढे नामि कमले वैरे इष्य थे । उन्दोनि 
तावत चोग्रौ भर ९ उन दोनों भयङ्कर श्रयुरों को देखा परन्तु भगवान्‌ 
` इष्टा तारौ चारा मतुप्च जनाद्नभर्‌ ॥५९॥||विष्यु को सोया हता देखकर ॥५६॥ बहनी ने 
तुष्टा योगनिद्र तामेकाग्रहयसिथितः । क चित्त र भगचान्‌ के नेच मे स्थित योग 
` विबोधनार्थाय दहरेदरिेत्रकृतालयाम्‌ ॥५२॥| निद्र की दरि के जगाने के निमित्त स्तुति की॥५२॥ 
विर्पेयरी नगदी स्थिति-पंहारकारिणीम्‌ । | = चोगन्द विनवे, जगन स्थति वार 
नं भगवती विष्टो कारिणी तथा तेजस्वी भगवान्‌ विष्णु कौ अतुला 
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुक्लं तेजसः परभुः ॥५२॥| भगवती थीं ॥ ५३॥ 
| अह्मोवाच ब्रह्माजी वोले- 
तं स्वाहा चं खधा स्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका | | दै निद्रे ! श्राप ह स्वधा त 
ध श्रापदी वपटूकार खरूपिरी दो । च्चाप खधा दो 
सुधा खमक्षरे निस्येत्रिधामात्रात्मिका स्थिता।५४॥| श्नौर ध ध म तीन प्रकार की माचा के 
५ ऽनचार््या „ , | रूप से स्थित हो ॥ ५४ ॥ टे देवी | आप अद्ध॑माजा 
अद्ध मात्रा स्थिता नित्या याऽनुचाय्या विशेषतः । | स्वरूप से स्थित ह नित्या ह त्या जितक विशेष ` 
स्मेव सा त्वं साचित्री त्वं देवी जननी परा ॥५५।|| रुप से उच्चार न किया जासके वह आप ही है । 
कात सै = श्रापदी सावित्री श्रीर परम जननी है ॥ ५५॥ यह 
स्वयेव धाय्ये सव्वं त्वयेतत्‌ खज्यते जगत्‌ । | सव श्रापदी से व रीर श्राप ` 
= सतलन व तम हीने ष्स जगत का निमा किया है तथा आपी , 
 लतत्‌ पारयते देवि त्वमत्स्यन्ते च सच्यदा ॥५६॥ इल जगत्‌ ॐ पालन शीर नाश करलेवाती द ४ | 
¦ विषष्ौ शषटरूपा लं स्थितिरूपा च पालने | | द जगन्मये । प करने म ध्याप : 
0 रूपा, पालन करने मे स्थितिरूपा तथा अन्त 
तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ॥५७॥ मै खंदाररूपा होकर स्थित ह ॥ ५७॥ श्रापटी मदा | 
महाषिद्या महामाया महामेधा सहास्पृतिः । | विया, मदामाया, महामेधा, मदास्पृति, मह्य" ` 
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी ॥५८।॥ मोहा, 1 श्रीर र दै ॥ ५८॥ -अप्दी 
स्वस्य शणत्रयि सवकी त्रियुणएमयी प्रकृति तथाभयङ्कर कालरात्रि 
भृतिस््वनच ४ गुएतरयविभाविणी । मोदरातरि, सहाराचि भी श्राप ही हं ॥५६॥ अपदी 
कालरात्रिमहाराविर्मोदरावरिश्च दारुणा ॥५६॥| शोमा, द्वरी, लजा, उखि, क्षानःलक्ञणा, लच्ा, 
त्वं शरी्वग्रीप्री त्वं हसं ुदधिर्वोपलक्षणा) | पि, तुथ, शान्व व 1 
हञ्न ुटिस्वया हिस शान्तिःपषान्तरव च६०॥| ची जपन व 
खदिगनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा । | विये हृष ह ॥ ६१॥ श्राप सौग्य है शरीर सौम्यता 
शंखिनी चापिनी पाण-युपुएदी-परिषायुधा ॥६१॥| है तथा सीस्यों मे मी शाप ५ तथा 
12 -सौम्येभ्यस्तवतिसुन्दसी) श्यापी पर, अ्रपर, परमा शरोर परमेश्वरी हं ॥६९॥ ; 
सौम्या सोम्पतराे सौम्येभ्स्त्यति वाप जद पर जो क सद, अद्‌ । 
परापराणां परमा लेव परमेश्वरी ॥६२॥ बर्ह ख सच भँ प्रकत दमडी हो, धरती 
यच किधिद्‌ छविद्स्त सदसद्वाखिलास्मिके । | श्राय ओ है उनकी कँ तक स्तुति की जाय 1६ 
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा लं पि स्वथसे तदा ६३ जो भगवान्‌ व १ जगत 0 
लया गः उत्पत्तिः पालन श्चीर विनाश करते ह, जव वह हः 
- यया स्या जगतस जगत्पाताऽत्ति यो जगत्‌ । तार थमत दोकर सोरे लो इमदाीस्ुति 
साऽपि निद्रविशं नीतः कस्त्वां स्तोपुभिदेश्वरः॥६४।॥| फौन कर सकता दै, ॥६७॥ जवकि विष्टु, मै जीर , 
विष्णः शरीरग्रहणमहमीशान एव च । । महादेव श्रापकी अका स दी शरीर धारण करते 


` २८६ माकंण्डेयपुराण श्र०्ट१ 
न ---------~---------------------------------- - ~~ -- -------- ~~~ 


रितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोवुशक्तिमानभवेत६४ द तो आपकी स्त॒ति करने को कौन समथ ॥६५॥ 
कारितास्ते यतोस्ा कः तोशक्तमान द हे देवि ! च्रापकी इन्दं उदार अभावों से स्तुत्तिकी. 


छ + नक = ता | 
सा खमित्यं परभावः स्वैरदरिदवि एसतुत जाती है, शाप इन दुष्ट मधु र कैटम नाम दैत्यो 
= ५ नः दोनों 
मोहयैतौ हूराधषावसुरां मधुकटभो ॥६९॥| को सो गास कीजिये ॥६६॥ श्राप इन दोनों महान्‌ 
पवोधश्च जगतृखामी नीयतामच्युतो लघु । दैत्यों का वध करनेके लिये अच्युत मगवान्‌ विष्णु 


बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महारो ॥९७॥| को जग्ये ॥६०॥ ` | 
्रषिरुवाच छपि बोले- 
एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा । | मधुकेटम को मारने के लिये विष्णु को जगाने 


~ _ ५ ¡ मधुदो | के निमित्त. जव बह्माजी ने इस प्रकार तामसी देवी 
विष्णोः रवोधनाथांय निहन्तुं मधुकटम ॥६८।'| की स्तुतिकी तव बह भगवती । द विष्णुमगवान्‌ 


ेतरास्य-नासिका-वाहु-हदयेभ्यस्तथोरसः । | ॐ नेन, नासिका, च 1 
नर्मय दने तस्थौ त्र्मणोऽवयक्तमन्मनः ॥६६॥ भरवयक्जन्मा जहमाजी को यथन देते ॐ निमित्त 


६ खडी होगे ॥६६॥ उस योगनिद्रा से युक्त होकर 
उत्तस्थौ च जगनाधस्तया अक्तो जनाईनः। | भगवान्‌ विष्णु शेष शय्या से उठे ओर उन्होने 
एकाएविऽदिशयनात्‌ ततः स ददे च तौ ॥७०॥ स उन दोनों राक्षसो को श ॥ ७०] 

यम < ~ वतिवीरय = फिर वे दोनों दु्ठत्मा रति वलवान्‌ श्चौर पराकमी 

पराक्रमो ~ । 

मधुकेटभां दुरात्मानावतिवीख्यपराक्रमो । य श जोध व धि त दर रदी ते 
करोधरक्तक्षणाबत्तं बरह्माणं जनितो्यमौ ॥७१।॥ खाने के लिये उद्यत इण ॥७१॥ तव निष्णु भगवान्‌ 
सद्ुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान्‌ हरिः । + दोनों के साथ युद्ध करने लगे! विष्णु 
पंच पर्षसदस्ाणि वाहूहरणो विधुः ॥७२॥ ने पाच दज्ार वपं तक उन दोनों दैत्यो से वाह 


युद्ध किया ॥ज२। फिर वे दोनों वलसे उन्मत्त श्रीर्‌, 
तवप्यतिवलोन्म्तौ महामायागिमोदितौ । | महामाया से बिमोहित होकर भगवान विष्ण से 


उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम्‌ ॥७२।॥ वोले कि टम तुम से धसर तुम वर सागि ॥७३॥ 


भगवाञुबाच भगवान्‌ वोल्ते- 
मेताम्य मे तुष्टौ मम॒ वध्यावुभावपि । दि लुम दोनों खम से मस्र हो तो सभे, 
्रिमन्येन वरेणात्र एतावद्धि हतं मम ॥७४।| वर दो कि तम दोन मेरे हाथसे मारे जाच्रो ॥७। 

ऋपिरचाच ऋषि बे्ते- । | 
यच्चिताभ्यामिति तदा सव्वेमापोमयं जगत्‌ । ् ५ ० धोखे मे आकर वे सव ५ 

हा जलत दसकर भगवन कमलनयन 

विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान्‌ कमलेक्षणएः।॥७५।| वि ॥ वा तीर 
भीतौ स्वस्तव युदधन शछाध्यस्तं पृ्ुरावयोः । | ठम्डारे हाथ से हमारी सृत्य श्लाप्य है इसलिये 
वाँ नहि न य॒त्रोन्वीं स्तिलेन परिप्लुता ॥७६।॥ जहौँ पर जल न हो वरदां हमको मारो ॥ ७६॥ 

अरापरुकवाच चरां 
तथेयुक्तवा भगवता शंख-चक्र-गदाभृता |. इस पर ‹ एेखा दीषट्योगा ° इस प्रकार ककर ५ 


ण मै च्छिन्न जवने ^ शंख, चक्र, गदाधारी भगवान्‌ चिष्यु ने उन दोनों ` 
छता चक्रंण वे च्छिन्ने जयने शिरसौ तयोः ॥७७।| का शिर अपनी जोध पर रख कर कार डाला ॥ . 


एवमेषा सयुखन्ना चह्मणा संस्तुता स्वयम्‌ । | इस भकार देवी की उत्पत्ति इई जिसकी किं ` 


कि स्तुति 
भमावमस्या देव्यास्तु भूयः शृण वदामि ते ॥७८॥ व 1 देवी. का 


इति श्रोमाकए्डयपुराणमे सावर्णिक मन्वंतरं देषीमादात्म्यभे मधुकटभवथ नाम < श्वा अण्च । 


' ० ८९ भाकरटेयपुराण २८७ 


वियासीकं अध्याय 
- ऋषिरुषाच छप्रपि योकज्ते-- 
देवामुरमभूद्युद्धं पण॑मव्दशतं पुरा । पूर्वकाल में देवताश न्नीर श्रसुसे म॑ पुरे सी 


देवानथ वं गृद्ध दृश्रा । उस समय रासो का स्वामी 
| सहिपेभ्रणामपिप पुरन्दरे ॥ १॥ महिपाघुर श्नौर देवतां ॐ स्वामी इन्द्थे ॥ १॥ 
। तवासुरेमहीर््यदेवसेन्यं पराजितम्‌ । उस समय मदावल्ी ने देवताश की सेना 
्वानिन््ोऽन ॥ को पराजित कर दिया श्चौर मष्टिपासुर सवं देव- 
निता च सकलान्‌ देवानिन्रमूमहिपाहर॥ २॥ तान्नो फो जीत कर दद्र चन वैश ॥॥ तव परस्व 
ततः प्राजिता देवा; पअयोनिं प्रजापतिम्‌ । | होकर देघना लोग ब्रह्माजी को शरणे करफे वाँ 
नौ गये जहाँ महादेवजी शौर गरडध्वज भगवान्‌ 

गृतास्त चर यत्र ४714; (र ~ [प 
धर््त्य गतास्तत्र शृ गर्ड्धवन। ॥ २॥ विष्युथे॥३॥ फिर देवताश्रँ ने उन दोनोँसे 
यथाच तयोस््मदिपाषुरपेितम्‌ । | भहिपाुरका सय शरृत्तान्त तथा जिस्रकारक्षि उन 
चिद्शाः कथयामसुदेवामिमयवरिस्वरम्‌ ॥ ४।|| का पयाजच द्रा बह सव कट छनाया ॥४] उन्होने 
व्यराम्यनि न्दू कटा कि सूर्य, इन्द, श्चि, वायू, चन्द्रमा, यम 
1 यमस्य परुएस्य च । शरीर वर्श तथा श्नौर देवताश पर भी महिषासुर 
छन्येषांचाधिकारान्‌ स स्वयमेवाधिति्ठति ॥ ४। ने श्रधिकार जमा लिया हे ॥॥ उस दुात्मा मदि 
स्वगांन्निराकृताः सरै तैत देवगणा श्वि । | णु से स्वगं से निकाले हष देवता पूवी परः 


छ भवुष्यौँ की तरह धमते फिरते ह ॥ ६॥ दस प्रकार, 
विचरन्ति यथा मत्यां महिषेण दुरात्मना ॥ ६॥ ति ज वी 3 


1 ४ 

एतदः कथितं सन्वंममरारिषिचेष्ितम्‌ । | छत्तान्ठ कडा ! दम आपकी शरण अये है, `्ाप 
८ शरणंच प्रपन्नाः स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम्‌॥ ७ || उसके श्रव वध की चिन्ता व ॥७॥ च 

५ व दनः दस प्रकार वचन सुनकर विष्णु भगवान्‌ श्रं 
इत्यं निशुम्प देवानां वचांसि स्तन, । महादेवजी ने क्रोध किया जिससे कि उनकी 
चकार कोषं शम्युध भुषटीरटिलाननां ॥ ८ ॥ आङुटी शरीर मुख तन गये ॥ ८ ॥ इसके श्रनन्तरः 
~ {स्य चक्रिसा + कोपटुक्त भगवान्‌ चिष्युके मुख से प्क मदान्‌ 
ततोऽतिकोपषणस्य च 0 तेज निकला तथा उसी प्रकार ब्रह्मा च्रौर शङ्कर के 
तिथक्राम महत्‌ तेजो व्र्मणः शङ्करस्य च ॥ ६ ॥ मुख खे भी एक तेज निकला ६) श्मौर भी इन 
शन्येषाञ्वेष देवानां शक्रादीनां शरीरतः । | श्रापि देवताश जे शरीर से महातेज निक्रल कर 


निर्गतं तेनस्तसचेक्यं समगच्छत सव का तेज पक स्थानत पर इक्र दोगया ॥ १०॥ 
निग॑तं॒पुमरहत्‌ तेजस्तबेक्यं समगच्छत ॥१०॥ त 


रती तेन; दूटं श्थलन्तमिव पल्यम्‌ । | जते हुप पटाङ़ के समान दोगया श्रौर्‌ दिशये 
ददशुस्ते सुयस्तत्र अालाव्यापरदिगन्तरम्‌ ॥११।॥| ज्वालां से व्याप होगरह' ॥ ११॥ सव देवतां 


¦ 1 के शरसे निकलाुश्रा ष्ट ्रवुल तेज एक स्थन 
|] स्व्युटव्‌ च ग्मध्र ८1 
८ त्र तत्‌ तेनः सन्य वशम्‌ । पर पनित होकर नारीरूप दोगया । बह खी 


" एकस्थं तदमृजारौ व्यालोकययं लिपा ॥१२। पो से यल थी ॥ ९२॥ मदादेवजी क नेम 
यदभूच्छाम्भवे तेजस्तेनाजायत तन्धुखम्‌ । | से उसका मुख इध्ा था तथा यमके तेज सेश 


याम्येन चाभवन्‌ केशा बाहवो विष्णुतेजसा ॥१२॥ शरीर विष्णु के तेज से भुजां हृ ॥ १३॥ चंद्रमा 
सौम्य यों मध्यै के तेज से दोनों स्तन, इन्द्र के तेज से मभ्यभाग 
न सनयोयुमं म्ये चाभवत्‌ । | गय के तेज से जथा श्रर पथ्वी क तेल से नितंव 


वास्णेन च नहर नितप्स्तेनसा वः ॥१४।| हुए ॥ १४॥ हा क तेज से पो, सं ॐ तेजसे 
अद्यणस्तेनसा पाद तदडगुर्योऽकरेनसा । | गुल्िया, बसुशनों के तेज से दाथों की गलियां 
धतूनाञ्य फरादयुस्यः कोरे च नासिक १५।॥ शरीर वेर के तेज से नासिका इई ॥ १५॥ यन्त. 


२८८ माक॑रडयषुराण , भ्रण. 


तस्यास्तु दन्ता; सम्मताः प्राजापत्येन तेजसा { | भजापति के ८ से दोँत व व चरभनिके 
तयतनितयं ज्ञे तथा पावकतेनस्ा ॥१६।|| ज से तीन नेम इष ॥ १९॥ र सन्ये 
तेज से उनकी धङुटियां श्नौर घाटरुके तेज से कान 


वौ च सन्ध्ययोस्तेजः श्रवएावनिसस्य च । | उत्पन्न हृए । उपरोक्त तथा न्य देवतान के. तेज 
्न्येषांचेष देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा ॥ से वह शिवा उत्पन्न हई ॥९७॥ मदिपासुर्से पीडित 
ततः समस्तदेवानां तेनोरािसयुद्रवाम्‌ 1 | इए वे सच देवता सूमस्तं देवताश के तेज से 


 पिहोक्य शद । उत्पन्न हई उस देची को देखच्छर हर्पित. हप ॥१८ 
# 4 तं (4 [५ ४.१ ५ 
तं विलोक्य यदं माएरमरा सहिषा्िताः ।॥१८॥ उख समय महादेवजी ने श्रपने शल मे से एकल 


शूलं शूलाद्विनिष्ृष्य ददौ तस्ये पिनाकक्‌। | निकाल कर उनको दिथा तथा चिष्णुने श्चपने चकर 
च्रं दत्तवान्‌ कृष्णः सयुरपाच स्वचक्रतः ।१६॥ मे से एक चक्र निकाल कर देवी को दिया ॥ १६॥ 
शंखञ्च वरुणः शक्ति ददौ तस्ये हताशनः । खा ने शंखः अचि ने शक्ति श्नोर वायरु ने धनुषं 
मारुतो दत्तवंश्वापः वारपय तथेषुधी ॥२०॥ उ १ 
वैजमिन्द्रः समुताद्य इलिशादमराधिपः पक वज्ञ देवी को दिया तथा उन्दीं सदलं चु 
ददौ तस्ये सहस्राक्षो षण्टामेरावताद्गनात्‌ ॥२१।॥| बाले इन्द ने पने पेराचत हाथी का धरा भ 
कालद्ण्डाहूयमो दश्डं पाशंचाम्बुपतिद॑दौ ] उनको देदिया ॥ २१ ॥ यमने पने कालदर्ड म -. 


ना से एक दरड ओर वरुण ने पाश दिया तथा दक 
भरना दद। ब्रह्मा कमण्डलुम्‌ ॥९२॥ प्रजापति ने अक्षमाला चौरः ब्रह्मा ने कमरडलु दिया ' 


पमस्तरोगङषेष॒निजरदमीन्‌ दिवाकरः ॥ २२ ॥ स ने उनके सव रोम कपो मे किरणो का ` 
लश्च दत्तवान्‌ खड तस्याम्मै च मिम्पलम्‌ २३॥| समावेश किया तथा काल ने प्क तलवार शौर 
पीयेदश्रामलं हारमनरे च तथाम्बरे । खुन्दर एक ढाल उनको दी ॥ २३॥ चीर समुद्रने , 


एक निर्मल हार तथा दिव्याम्बर दिया तथा उने 
चटामर्सि तथा ॥ 
यामि तथा दिव्यं इएडले कटकानि च ॥२७॥ पक चूडामणि, दव्य रल शोर पनया भी 


अदधचनदरं तथा शुरं कयून्‌ स्वबाहुषु । | दीं ॥रथा अदधचन््रमा के समान स्वच्छ केषर, 
नूुरो विमसौ तदष्यभेवेयकमसुत्तमम्‌ । ।२५।॥| सव भुजा मे स्वच्छ वाजुबन्द्‌ श्रौर क उत्तम 
श्रगुरीयकरत्नानि समस्ताखङ्गुलोषु च । करार ॥२८॥ तथा सव यशुलियां की श्रमूठियां 


ये खव रत्न मी उसने दिये । विश्वकमां ने एक. 
बिश्वकम्भा ददं तस्य परशुञ्चातिनिम्धलम्‌।२९) । निमेल पर्ुदिया ॥२६॥ ओओर अनेक प्रकारके श्र . 


अखाण्यनेकरूपाणि तथाच्च दंशनम्‌ । शख, मेय, कवच तथा- खिर श्रौर हदय `की 
अम्लानपङ्कनां मालां शिरस्युरसि चापराम्‌ ॥२७.| निर्मल कमलो की माला भी दी ॥ २७॥ समुद्रं ने 
द्दज्जलपिस्तस्यं पएङूजंचातरिशोभनम्‌ | | एक अत्यन्त सुन्दर जमल देवी -को दिया तथा ` 


हिमवान पालं सिहं रतनानि बिषिधानि च, २८॥ चणय ह ६ ध न 


ददावशुन्य सुरया पानपात्रं धनाधिपः पाच दिया 1 सव नायो के स्वामी शेषनानगे ने जो 
रेष सव्यनागेशो महाम णिषिभृषितम्‌ | | कि इख पृथ्वी को धारण क्ये हये है महामणि से 
नागहार ददा तस्यं धत्तं यः पृथिवीमिमाम्‌ ॥२६।॥ शुक प्क नागहार देवी को दिया ॥ २६॥ श्रीरभी 


देवताश्च ने देवी कौ आ्रामूषणो ओर श्रायुर्धो 
अन्येरपि पुरदेवी मुपणेरायुषेस्तथा । | सम्मानित किया रौर इखके वाद वह -देवी बडे 


सम्मानिता ननादोकचः सासं भुम्महुः ॥२०।॥| अचे स्वर से अहृदास करने लगी ॥ २०॥ उसके 
तस्या नादेन योरेण ` दृखमापृरितं नभः | घोर नाद से सम्पूणं आकागा व्याप्त. होगया श्रीर 
द्मायतातिमरहता परिशब्दो महानभूत्‌ २१|| समस्त दिशा म उस नाद का प्रतिशब्द होने 


चधुमुः सकला लकाः सपरा चकम्पिरे | त शम र 


-अ० ८२ २७ माकरटेयपुसण २८६ 
----------------------------------- 
चचाल वसुधा चेलुः सकलाश्च महीषराः ॥३२॥ सम्पूणं पवत भी चललायमान होगे ॥ ३२॥ तव 


भयेति देवा शुदा तामूचुः सिंहवाहिनीम्‌ । ` 1 व व 


दषडुनुनयण्चैनां भक्तिनम्रातममू्तयः ॥२३॥| होकर सुनयने भी देवौ को स्वति की ॥ २३॥ 
षष्ठा समस्तं सन्धं त्रैलोक्यममरारयः । सम्पू घेलेक्य को क्ुभित देखकर देवताश फे 


यैर राक्तस छपने-पने ्रायुधोको 
सदास्ते सयतसयुदायुषाः ॥२४॥ क 
गराः किमेतदिति हिपासुर मी क्रोध से युक्तं होकर श्नौर “अहा 
मे पि 4 1 यह कवर अनेक अरो त 
अभ्यधावत तं -श तः ॥२५।| उधर की तरफ दौड जिधर से कि वह शब्द श्रा 


स ददशं ततो देवीं व्याप्रलोकव्रयां विषा | स्दा र (५ देवी र तीनों श ट 
पादाक्रान्त्या = £| व्याप्त होते इए तथा उसने यद भी देखा 
पादाक्रान्त्या नतयुवं किरीयोष्टिसिताम्बराम्‌।।२६।| उन पावा ॐ भार खे 1 


प्ोभिताशेपपातालां धु्यानिस्वनेन ताम्‌ । | क छएडलो छी ज्योति से आका व्या हो रा 
दिशो भुजसदरसेए समन्तादधाप्य संस्थिताम्‌ ।। ३७१ दै॥३९॥ उनके धञुप सींचनेकी श्रावाङसे अनेको 


तवः भ्रवहते युद्धः तया देव्या पुरद्षाम्‌ । लोक श्रौर व ५ 
शरसासवहमा क्तरादीषितदिगनतरम्‌ = पक हज्ञार, से युक्त होकर सव दिशा 
वहथा क्तरादौपिदिगन्तरप्‌ ॥९८॥ चास नोर विराजमान धी ॥ २०॥ फिर चल देवी 


महिपसुरसेनानीधिक्षराख्यो महासुरः । | क साथ राकस युदध मे प्दृत्त दोगये श्रौर शखर ` 
युयुधे चामरण्ान्येश्चतुरङ्वलान्वितः ॥३६॥ शख्स उस समय दिशाय परदीप्त होरदी थीं॥३८॥ 


पै पदभिस्दग्रारूयो + चिर नाम मदहिपाुर का सेनापति ` श्नौर दृखरा 
न. महाुरः । चामर नाम राक्लख जो वहुतसी चतुरंगिरी सेना ` 


धयुध्यतायुतानाश्च व सदस ए महाहलः ॥४०॥| ॐ सदित था, य दोनो देवी से सूय .लडे,॥ ३६॥ 
पंचाशद्िश्च भिथुतेरसिरं सहारः | | उदग्र नाम मदा असुर साड हजार स्थ केकर चटा 


श्रुतानां शतै; पड्मिरबासली युयुधे रणे ॥४१॥| तथा महादचु नाम रास ने पक करोड़ सेना फे 
गननवानिसदसोवेसकैः परिवारितः । साथ देवी से युद्ध किया ॥ ४०॥ शभ्रसिलोमा नाम 
( महया श्रसुरने पाँच कयोड्‌ सेना लेकर श्मौर बाप्कल : 


हतो रथानां कोव्या च युद्ध तस्मिन्नयुध्यत ॥४२।॥| ने साठ लाख सेना के साथ रमे युद्ध किया ॥७९॥ 
पिद़ाला्तोऽयुतानाञ्च ` पंवागद्भिरथायुतेः। | दक्र धो श्रौर दाथियौ से धिरा हश्ना षह | 


संयुगे त्त्र † परिवारितः । ४३॥ भाया शौर करोड रथो के साथ उसने रमे युद्ध 
ये सगे त्र .एयानां पारितः । ४६। किया ॥४२॥ विडाल नाम श्रञ्ुर पचि लाख र्थ 


(५ 6 

अन्ये च तत्रशुशो स्य-नाग'हयह ताः । लेकर श्राया शौर युद्ध करने लगा ॥४२॥ श्रीर.भी 
युयुधुः संयुगे देव्या सद तत्र महासुराः ॥५५॥| अनेको मदहाश्रस्ुर दसतम्दस दज्ञार रथ, हाथी शौर 
फोटिकोषिसदस स्तु स्थानां दन्तिनां तथा । न क म सोरी के र ष 
` हयासां धराभन्पहिषापरः ४७ फिर कोड़ा हजार र्थ, दाथी अ्ररघोड 
श ^ द तपतेव ¶ ४ लेकर युद्धस्थल में महिषासुर भ्रष्या ॥४५॥ रक्तस 

मरभिन्दुपालश्च शक्किभगुपलंस्ता गण तोमर, भिदिपाल, शक्ति, सुशल, खड्ग, परश 
युयुधुः संयुगे देव्या खड्गैः परपदिशेः ।॥४६॥ शौर पट्टिशो से देवी के साय युद्ध करनेरगे ॥४ा 


केचिच चिक्षिपुः शक्तीः ॐेषित्‌ पाशांस्तथापरे । च १ थे र 
रवी र ड १ र खड्ग प्रहार । 

वी खदगमरहारस्ठ तः त इं भवाः ॥४५॥ चाहतेधे॥४9॥ च्रौर बह चरिडका देवी भी उनश्रख 

सापि देष ततस्तानि शल्राण्यच्नाणि चण्डिका । ` | शखोंको श्रपने श्रख.शसं फी वयां ते कतूदलमाज 


सीलयैव प्रचिच्छेद . निनशस्ासचयर्थिणी ।॥४८॥ मे काट.देती ची ॥४०॥ तव व ऋषि शौर देवत्रा 


॥ 
{ 
॥ 
॥ 


२६० भाकंर्डेयपुराए = =" -श्र०ट 


* श्रनायस्तानना देवी स्तृथमाना ` सुरर्षिभिः श्रये श्नौर देवी की स्तुति करने लगे }. वद -दैश्वरी 


अयने अद्य-शखों को उन रात्तसों के ऊपर छोड 


| प्रमोचापुरदेदैष शस्नाण्यस्चाणि चेश्वरी -। ४६॥ रदी थी ॥.४६॥ देवी का वाहन सिह भी क्रोधित ` 


सोऽपि करद्ो धुतसयो देव्या बाहनकेशरी । ¦ | होकर असुं की सेना मे इस प्रकार धूम रहा था 
चचारासुरसैन्येषु वनेषिव हुताशनः ॥५०॥॥| जिस.पकार क्रि वन मे अश्नि फीस जाती दै ॥५०॥ 


निश्वासान्मुयचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका । 0 ॥ त 
त एव सयः सम्भृता गणा; शतसहस्रशः ॥५ वा चवर र पदि द अरत र 


युयुधुस्ते प्रशुभिर्भिन्दिपाल्लासिपश्शिः ॥ राक्षसो का नाश करमे लगे। देवता लोग भी डेवी 
नाशयन्तोऽ्पुरगणान्‌ देवीशकस्युपट हिताः ॥५२।॥.की शक्ति से उत्साहित होकर ॥५२॥ खुशी से 


, अवादयन्त पटहान्‌ गणा; शंखास्तथाप्रे | . | नमाड़ बजाने लगे ! उस युद्ध के उत्सव मे को 


देवता शंखं नौर कोई गरदज्ग वजा रहे थे ॥ ५३॥ 
मृदङ्गं तथैवान्ये तस्मिन बुद्महोतसवे ॥५२।॥/ फिर देवौ ने तिल, गदा, शकत श्रौर तलवार ॐ 


ततो देवी विशूलेन गदया शक्तिष्टिभिः परहार से सेकडं वड़े सुरो का वंध कर डला.॥ 
खडगादिभिश्च शतशो निजघान महासुरान्‌॥॥५४।| देवी ने बहुत से अ्र्धरों को गिरा दिया ओरदंसपे 


` पातयामास चैवान्यान्‌ घएटास्चनिमोहितान्‌ । घरे के खर से मोदित करके पाश मे बांधकर 


खी लिया ॥ ५५॥ ङु दैत्य' तलवार की तीरेण 
ञसुरान्‌ यवि परेन बुध्वा चान्यानकषयत्‌।।१५॥| धार से कर गये छ गदो के परहार से मारेगयै 


्ेचिदिद्रपाषतास्तीष्णेः खद्गपातेस्तथापरे ¦. | शौर छ चेत होकर भूमि पर पड़ गये ॥ ५६॥ 


को मूशल की मार से श्राहत होकर रुधिरे वमन 
विपोथिता निपातेन गदया ' भि शेरत ॥५९॥| ऊ सरो 


 वेषुश्च केचिहुधिरं . षतेन भृशं हताः ट्कंड२ होकर पृथ्वी पर गिर पड़े थे ॥५७॥ वहत 


फेवरिञ्ियातिता मूमो भिन्नाः शूलेन वक्षसि ॥५७॥| से बाणो की मार से उस रणाङ्गण मे गिर पडे कष 
निरन्तराः शरौपेण कृताः केचिद्रणाजिरे | असुर जो सेना ॐे ध्रागे-यागे चल रहे थे वार्णो से 
तेनाुकारिः माणान्‌ भुुनुसिदशा्ईनाः ॥४८।|| कट कर गिर पड़ ॥५॥ नु भौर डु 
फेषाच्वद्राहयशिवत्नारिचनन्रीवास्तथापरे । ग शिर प 
शिरांसि पेतुरन्येषामन्ये मध्ये षिदारिताः ॥५६॥| यक्ख जंघाशनो क कर जाने से पृथ्वी पर रं पड़ 
पिच्छि्रनद्वास्खयरे पेतुरुन्वंयां महादुराः। | ड्ःकी खज, किसीं की आंख श्रथवा किसी क 
एकवाहकषिचरणाः केचिरव्या द्विषाङ़ताः ॥६०॥| पच कड गया । इच को देवी ने काट कर दोक 


छिन्नेऽपि चान्ये शिरसि परतिताः पुनरुत्थताः। व व, 1 म 


केवेन्धां युुधुदन्या गृहीतपरमायुधाः ॥६१॥| के खाथ युद्ध किया 1४१ उखः युद्ध मे बे चौताला 
तसूतुश्चापरे त्च युद्ध तर्यलयाभिगाः ]. | के साथ चरत्य कर रदे थे श्नौर शिर कटे कबन्ध 
फवन्धारिद्नेशिरसः खडग-शक्त्यष्टिपाणयः।।६२।॥ . दमथो मे खक्ञ, शक्ति शौर ऋष्टि लिये हष तथा 


। श्रौर मी महादैत्य उरो, उदरो" कहते इ देवीसे 
तष तिष्ठति भाषन्तो देवीमन्ये महाघुराः ॥६३॥ युद्ध कर रदे थे ॥६२-६२॥ जदं पर कि महाः युद्धं 


अगेस्या साञ्मवत्‌ तत्र यत्राभूत्‌ स महारण; ॥६५४।॥ रासो ॐे गिरने से श्रगभ्याः होगई थी ॥६४॥ उस 
शोरितीषा महानयः सचस्तत्र विसु युः श्रुर सेना के वीच मे होकर हाथी, -घोडं श्रौर 
पध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम्‌ ॥६५॥| दैत्यो के र्धिर से एक महान्‌ नदी. व . निकली ॥ 
पेन तन्प्रहसेन्थमहुरणां तथाम्बिका । जिस प्रर अश्चि-दणों ॐ देरको प्ण भरे मस्म 


ध 5 + ^ 4 ~ = ~~ ------- न ~^ ~~ 


० < माकंरुदेयपुराण ` ६१ 
| 
निन्ये क्षयं यथा हिस्दृणदारुमह ¦ कर डालती दै उसी भकार श्रम्विका ने श्रघुसे की 

रिले ५ ॥९९॥ उर महासेन्य को शीघदी नष्ट कर डाला ॥६द॥ ` 
सच महानादघुतरषटनन्‌ धुतकेशरः । | जव बह सिं धुतकेशर महानाद करता था तव 
शरीरेभ्योऽरारीणामसनिष षिचिन्धति ॥६७।॥ मानो रक्सो का भार निकल जाता था ॥-६७॥ 
देव्या गणैश्च तैस्तत्र कृतं युद्धं तथास्चरैः। त श कि वदाँ श से युद्ध ५२ 

= + {के ५ ताश पसनन हकर । 
‡-यथशरा तदुपुदवाः पुषृष्टिषचो दिवि ॥६८॥ पुष्प वृष्टि की 1 ॥ + 


श्रीमाकंएदेय ७ ज शाकमन्वंतरमे ७ वीमाहालम्यमेमहि ५, 
इति ० सावर देषीमाहात्म्यमेमदिषादुरसेन्यवधनाम ८ रवां ० स० । 


~~ ०५९ 
तिराषीवां अध्याय 
प्रपिरुवाच षि बेले- | , 
निहन्यमानं तत्‌ सैन्यमवलोक्य महादुरः । उस सेना को मरते हणः देखकर मदान्‌. श्रसुर 


सेनानीरिविक्षरः कोपाद्ययौ योदधमथाम्विकाम्‌॥१। सेनापति चिचर करोधाम्वित होकर अभ्विका से 
# > ४ युद्ध करने को गया ॥१॥ जिस प्रकार मेर पर्व॑त प्र 


देवीं म ५ 
सं देवीं शर्ण ववष समरेऽुरः । | मेघ जल की वपां करते है उसी तरह युद्ध मे उस 
यथा मेरुगिरेः शृङ्कं तोयवर्षेण तोयदः ॥ २ ॥ अरखुर ने देनी पर वारणो की वर्पा की ॥ २॥ उसके 


` तस्य च्छित्वा लीलयैव तीच्ण वाणो को.देनी ने खेल की तरह काट डाला 
तो दी सीतपेव शरोकएन्‌ श्नौर उसके घोड़ों को उनके सारथियों सदत मार 


वाणेर्थन्तारपेव 
८१ 7 १ वि वाजिनाम्‌ ॥ २॥| डाला ॥३॥ शौर पी उसके घलुप शौर ऊंची 
` चिच्छेद र धनुः सद्यो ध्वजंघातिसयुच्छतम्‌ । ध्वजा को भी कारडाला तथा उस .रात्तसके शरीर 
षिव्याध चेष गात्रेषु च्छिन्रधन्वानमाश्चमैः ।। ४ ।॥| को पने बाणो से छेद डाला ॥भजव उस राक्तस 


च्छिनधन्ब ४ के घटुष, रथ, रश्व श्नौर सारथि न्ट होगये तव. 
व वह तलवार ज्ेकर देवी के ऊपर दौड़ा ॥ ५॥ उसने 


श्रभ्यधावत तां देवीं सदग-चम्परोशपुरः ॥ ४॥| ल्वा की तीह थार से सिद को शिरे धायल 
िहमाहत्य खड्गेन ती्एधारेण मूद्ध नि । | किया रौर श्र्यन्त चेग चे देवी की शुजा भ तल 
आजघान शमे सव्ये देवीमष्यतिषेगवान्‌ ॥ ६।|| वार मारी॥ ६॥ हे खप्थ | व ५ 
% ‡ ध्र] गकर गहे, त 
त्याः सदो ताय पाल दपनन्दन । | वं दने इर नो गय 
ततो जग्राह शूलं स कोपादरुणलोचनः ॥ ७ ॥| किया ॥ ७॥ उस महासुर ने आकाश से सयं के 
चिक्षेप च ततस्तत्‌ तु भद्रकाल्यां महाघरः । समान मकता इरा बह शल भद्रकाली के उपर 
जाञ्यर्यमानं तेजोभी रविषिम्वमिबाम्बरात्‌॥ ८ ।|| पका ॥ ८ ॥ उस शएलको आवा इतरा देखकर देवी 
ग्रा तदापतच्छूलं देवी शूलमघुञ्चत 1 - | ने शरपना.्लकोङ़ जिसने कि र्सके शल चौर 
तच्छूलं शतधा तेन नीतं स च महासुरः ॥ ६ ॥ यक्ख चिकुर फे सौ-सी टुकड़े कर दिये ॥६॥ ` 


वीये मूपतं महिषाखर के सेनापति महा वलवान्‌ चिक्तुर के 
हते तस्मिन्‌ महाषीयै मदिषस्य चमूपतौ । 0 


आजगाम _ ` गनाख्ृश्चामरचिदशानः ॥१०॥ कर श्राया ॥ १०॥ उसने भी देवी श्रस्विकापर वड़ीं 
सोऽप शक्ति क ेवयास्तामस्तिका तम्‌ । तेजी से णक शक्ति चलाह जो कि देवी की दकार 
हृहधाराभिहतां भूमौ पावयामास निष्मभाम्‌ ॥११।| माच से पृण्वी पर निस्तेज होकर गिर पड़ी ॥९९॥ 
भग्र शक्ति निपतितां द्रा क्रोधसमन्वितः । | शक्ति को दरं कर पृथ्वी पर" गिरते हप दैखकरः 


म 


| चिेप.चामरः शूलं षाणस्तदपि सोऽच्छिनत्‌॥ १२ 


, पाहूयुदधेन ` युयुधे रेनोचैसिदशार्णि ॥१३॥ 


. श्य भारण्डयषुराणः = ` भर < ` 


चामर ने शल को छोड़ा जिते कि देवी ने,वाणसि* 
काटः डाला ॥ १२॥ फिर सिह दद करदाथीके . .. 
मस्तक पर चढ़ गया रौर वद्य उसः देवताः केः 
तौ वैरी से वाहु युद्धं फरनेः लगा ॥ १२॥ ते दोनो 
युध्यमानौ ततस्तौ ठ तस्मा्नायान्मदहीं मतौ । | युद्ध करेइ उस हाथी से उतर कर परथ्वी पर 
ययधातेऽतिसंर्यौ ` परहाररतिदारृणैः ॥१४॥ भये ओर पक दूसरे पर भहार करते हप दाख 
युद्ध करने लगे ॥१४॥ फिर उस सिंह ने. कूद -कर 
तता वेगात्‌ ससत्य निपत्य च मृगारिणा । , तमाचे के प्रहार से चामर का शिर धड़ सेः श्रलग 
करमहारेण शिरश्चामरस्य पृथक्ष्‌. इृतम्‌ ॥१५॥ कर दिया ॥ १५॥ देवीं ने व उदग्र को शिला ` 
देव्या भिहतः वृत्तादिसे मारडालां श्रौर कराल नाम राच्तस 
त 8 ध व १६॥| रा दात, मुष्टि चनौर हाथों से वध कर दिया ॥१६॥ 
वा ^ नीये रुद्ध दोकर गदा से उद्धत को चूण कर 
देषी क्रुद्धा गदापातश्चुणयामास चोद्धतम्‌ 1 | डाला तथा उसने भिदिपाल से बाष्कल श्नौर बाणे 
वाष्कलं भिन्दिपालेन वाणैस्ताम्र' तथान्धकप्‌।।१७।॥ से ताम्र जर अन्धक.का वध कर दिया ॥ १७॥ 
उग्रास्ययुग्रषीय्यंश्च तथैष च हादयुम्‌ | ्रिनेना परमेश्वरी न-शलसे उभ्रास्य, उग्रनीयं श्नीर 
विना च परिशूलेन जघान परमेश्वरी ॥१८१] गा न ०४५ | 
बिदालस्याधिना कायात्‌ पातयामास वै शिरः.। | डाल दिया तथा दुर शौर दसुलनाम दो राक्षसो 
दद्ध रं टुम्मुखंबोमौ शरेर्निन्ये यमक्षयम्‌ ॥१६॥॥ को बाणो से मारः कर यमपुरं भेज दिया ॥.१९' 
एवं संप्रीयमाणे त॒ खसैन्ये महिषासुरः । व क 1 पर व 
खुर मरहिष रूपसे गणो को त्रास देनेलगा 
माहिषेण स्वस्पेण त्रासयामास तान्‌ गणान्‌॥२०।| | भो र र 
कथित्‌ तण्डमहारेण सखुरमपस्तथापरान्‌। | इच को खुरो की मार छे शौर कद को पूत से. 
तागूलतादितांधान्यान्‌ शृङ्गाभ्या्च बिदारितिान्‌९१ 
पेगेन काधिदपरान्‌ नदेन भ्रमणेन च | 


मारा ।-कु गणे को उसने श्रपने सगो. से मारः 

डालाः॥ २९ १ ङ्च ा को वेगसे,.क ह 

~ . नाद्‌, च्छं का घूमने की चपेट से तथा इल्‌ 

निश्वासपवनेनान्यान्‌ पातयामास भूतले ॥२२।| अपे श्वास की हवा से पृथ्वी पर गि दिया ॥ ` 
॥ निपात । ममथानीकमभ्यधावत सोऽ्ुरः। | गर को मार कर बद असुर देवी के सिह को, 
सि हन्तुं महादेव्याः कोपं चमे ततोऽम्बिका २३|| मारने क किये दौड़ा शीर तव अभ्विका ने वहत 
सोऽपि कोषान्सहायी्य ुरक्ुण्णसहीतलः । 
मृङ्गाभ्यां प्व्वेतादुांधिक्षेप च ननाद च ॥२४॥ 
वेगभ्रमणविश्ुणा मही तस्य व्यशीय्येत । 


क्रोध किया ॥ २३॥ शरीर वह महावलवाय्‌ महिषा- 
लादगुलेनाहतशराव्विः इावयामास सर्व्वतः ॥२५॥ 


प्तः सिंहः सुखस्य गनङ्घम्भान्तरेस्थितः । 


खुर भी क्रोध करके पृथ्वी को सुरँ से लोदनेलगा 
तथा बह सगो से पवंतों को उखाड़ करः गजा ॥ 
उसके चलने फिरने. वेग से पृथ्वी फटगहै श्र 
उसकी पष वेग से समुद्र हिलकर खयको 
धृतशूङ्गविमिन्ना  ययर्षना; प्लावित करने लगा ॥ २४५॥ उसके सींगके दिलाने 
ृतमृ्गविभित्र 1 का | वादलोफे इकड.डकड़ होगये श्रौर उसके श्वास 
श्वासानिलास्ताः शतशो मिपेुनभसोऽचलाः॥२६]| की हवा दे पेत डुकडे २ होकर पृथ्बी पर 
एति करोषसमाध्मातमापतन्तं महासुर ` 1. | गिर पड़े ॥२६॥ इख भकार क्रोध युक्त उस मदिषा- 
दध्र सा चण्डिका कोपं तद्वधाय तदाऽकरोत्‌ २७. खर को आते इष देखकर चिडिकाने उसका हननं 
सा क्षिप्ता तस्य वै पाशं तं वबन्ध महासुरम्‌ । 9 ( क 
त्याज मादिं सपं सोऽपि षदो 'महागृषे ॥२८॥| शाली ल ने श्रयते उस मदिव खव. को छोट 
ततः पिंहोऽभवत्‌ सो याप तस्याम्विका शिर; ।; | दिया २८ 1 पौर बह भी. सिह बन गया, श्रोर 
पष्य "५" "० - -~ ; १५८. व ध । " । \ 


अ० ८२ माकेररेयषुराणं २६३ 


॥ जव तक कि च्रग्विका उसका शिर काटने को र 
चिनत्ति तावत्‌ पुरषः सढ्गपाणिरश्यत ` २६॥| वह हाथ भे तलवार तिथे हय पक परप के रपे 
ततत एवाशु पुरुषं देवी चिच्छेद शायकः | २ ह १ महिषासुरः 
1 ९ ततः सोऽभन्यहागनः देवी ने वाणा से छेदन किया तो वह पुरुष के 
त खड्गचर्मणा साद्ध ततः सोऽभून्महागजः॥२०॥| तेप को छोडकर एक विशाल हाथी बन गया ॥२०॥ 
रेण च महासिंहं तं च्षं जगज्यं च । | फिर उसने श्रपनी सुह से देवी के वाहन सिद को 
ट ह खेच लिया ओर गरजने लगा । इसपर देवीने उस 
कपतस्तु करं देवी सङ्गेन निर्डन्तत ।,२१॥| की तलवार से सूह काट ली।३९॥ फिर घट प्रदा 
ततो महासुरो भूयो मादिषं बपुरास्थितः । | श्र॒र पुनः मिप रूप से भकट ह्र जिससे चर 
तयैव क्षोभयामास प्ैलोक्यं चराचरम्‌ ॥३२॥| ओर श्रचरयुकत तीनो रोक सुमितदोगये ॥ ३२॥ 
। तव करोधित हुई जगत की माता चरिडका ने वारः 
तत, कुद्धा जगन्माता चणिडका पानम्‌ । | वार मदिरा पानकिया जिससे कि उने नेत्र साल 
पपा पुनः पुनश्वैव जहापारणएलोचना ।२३॥ होगये श्रौर ते ( क उधर वह ४ 
९ \ भी अपने वल से उन्मत्त होकर गरजने लगा श्मोर 
ननदं चासुरः सोऽपि वलबीय्यैमदो द्धतः । श्रपने सीगों र पाड को प देवी 
विपाणाभ्याश्च चिक्षेप चरिडकां प्रति भूधरान्‌) २४॥ के ऊपर फंकने लगा ॥ ३७ ॥ देनी भी वाणो से उन 
भ्िांसेन चर्णयन्ती शरोत्करैः पदा को चणँ करती इर भहिपाखर घे धोली । 

सा च तान्‌ भहितांसतन चृयन्ती शरोतकरः । | मविरा.पान कै कारण देवी का सुखमरडल लाल 

उवाच तं मरदोहुभूत-एुखरागाङलाक्षरम्‌ ॥३५॥ हो रदा था ॥ २५॥ । 


देव्युवाच देवी वोली-- 
गञ्जं गज्ज क्षणं सूद्‌ म॒धु यावत्‌ पिबाम्यहम्‌ । र भूख ! द्‌ कण भर छोर गरज ले जवः तक 


छ कि म मदिरा पान कर । मे तुभाको यीं मारी 

सथा तयि हतेऽेव गर्जिजष्यन्त्याशु देवताः॥२६।॥| श्नौर इसके वाद्‌ दैवता लोग गग ॥२६॥ 
ऋपिस्ाच पि वेले- । 
एवयुक्त्वा सयुतत्य सारूढा तं महषुरम्‌ । 4 चरुद (1 पर ढ़्‌ 
== ७ गई रोर पोँव से दवाकर उसके कएढ मे प्क शल, ` 

परदेनाक्रम्य करे च धत ५९ + #, भारा ॥ २७॥ तव वह देवी के चरणं से दवा इया 
ततः सोऽपि पद क्रान्तस्तया निजुखात्‌ ततः। | होने के कारण पूरा न निकल सका रीर देवी २, : 
` अद्ध निष्क्रान्त एवाति देव्या वीर्य्यण संृतः॥३८॥॥| वल के प्रमाव से रघा दी निकला ॥ ३८ ॥ ^" 


तं + निकला हुश्मा दी वह महा असुर युद्ध करने. लगा 
अद्नषमान्त एवासौ युध्यमानो महाघुरः | | निभ वी तका 


तया महासिना देव्या शिरित्वा निपापितः॥२६॥॥| काट जिया जिससे कि चह ष स पड़ा 

हतं सन्य हैतयसैनयं ॥ २६ ॥ फिर ददाकौर करती है दैत्यों की ~ 
. हतो. शातं सव्व दैत्हन्यं नना पद्‌ 1 वि 
भ्रहषंञ्च पर जशः सकला देवतागणा; ॥४० हु्रा ॥४०॥ देवता श्रौर ऋषि गण देवी . 
ठषट्वस्तां सुरा देषीं सह दिव्येमेदषिभिः । | आराधना करने लगे तथा गन्धर्वपतिं गाने अ. 


जयुगनधर्वपतयो नदतुधाप्सरोगणाः ॥४१॥ शरष्सराय नाचने समीं ॥ ४१॥ 


इति शरीमाररुेय०म सायणिकमन्यन्तसमं देषीमाहातमयमे महिषाश्च नाम ८३ ° स० । 
। >< 


२६४ ङ्ए्टेयपुराण ऋ०.८५ 


चौरी अध्याय्‌ 


पिदचाच ¡ पि वोल्े-- ५ ६ 
, शक्रादयः सखा निहतेऽतिवरीय्य ¦ देवरी ारा उस इुपत्मा श्रति वलवपन महि- 
तस्सिन्‌ दरत्वनि सुशािले च देच्या । | पार ॐ सेना खदित नष्ट दयेने परः न्द्ािक 


¡ सव देवता विनय पूवेक दिर तथा कन्धाको सुकरा 
ताँ तुष्टुवुः भरणतिनव्रशिरोऽधरसा | करः छं से भागा होकर देदी फी ति 


वाममि; मरहपपुलकाद्रमचारदेह्यः ॥ १। ¦ करने लगे॥ १ ॥ जिसदेवीने क्रि अपनी शक्ति ` ` 


देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या से सव जगत को व्याप्त कर रक्खा है च्रौर जो. 
निरोपदेवगणशक्तिशभृहपू्या दैवतागसो ॐ तेज से उत्पन्न है उस खम्पृखं देवता - 
तामस्विकामसिलदेवमदर्पिपूल्यां ¡ छ्रौर महरिया से पृजित देवी को दम भक्ति पुक्क 
. भक्त्या नताः स विदधातु शुभानि सा नः ॥२. । परराम करते हमारा कल्याण करे ॥ २॥ 
यस्याः भभावमतल्लं भगवाननन्ती जिसके प्रभाव श्रौर यल को भगवान्‌. विष्छु, बह्म 
ब्र्या हरश्च न हि वक्तुमलं बलश्च. ¦ जीर मदए्देवजी कदने को असमर्थं है, वह देत्री 
सा चण्डिकाखिलजगत्परिपल्लनाय ` ` समस्त जगत क्ता पालन करने के लिये पापजन्य 


नाशाय अचाञ्चुभभयस्व मतिं करोतु ॥ २; भय को नाम्य करने मे अपनी बुद्धि रकल ).३1॥ 


या श्री; खयं सुकृतिचां भवनेष्वलक्ष्मीः  ! जो पुर्ववान्‌ लोगों के घर मे लब्मी, पापियों ` के` 


पापातमनां कतपथियां हृदयेषु शुद्धिः ! । धर में दरिद्र, धीमान्‌ लोगों के ठदय मे उुद्धि, 
श्रद्धा स॒तां क्तजनपथवस्य लज्जा 
तां चां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम्‌ । ४। ॥ 


त्रिभ्व का पालन करे ॥४॥ दम आपके इस 


करि बणयाम तव स्परमचिन्त्यमेत्तत्‌ अचिन्त्य खरूप तथा अघुरों को क्य करने बाले 
ईिचातिवीय्यमसुरक्षयकारि भृरि। पराक्रम श्रौर खव श्रु यौर देवतां भे श्रेष्ठ 
। चरितानि ताति यानि | चरि को किंस भरमार वरन कर त द क 
। आप समस्त संसार कौ कारर,. सतोयुर, 
मच्चु दव्यसुरदेवगणादिकेषु ॥ ४॥ य वीर सित तयत नानि © 
हेतु; समस्तजगतां वरिगुणपि दोपे- | रदित है, श्रापक्ी महिमा ऋ पार विष्णु शौर 
तं ज्ञायसे ` हरिहयदिभिरप्यपारा | ` गिनि अण्डे देवताच्मों ने भी गदी पाया है, आप. 
सव्वाश्रयाखिलमिदं नगदंशभूत- ` सव कमे श्रय तथा चह जगत अप्य अशभत 


मव्याकृता हिं परमा अृतिस्तमाच्ा ॥ ६॥ = १ ना रदत तथा परम. आदि, अकति 
च्याः सम्दुरया शयदीरयेग हे ॥६॥ दे देवे ! आपके नामसे यज्ञो सखव 
४. ¦ देवता दप्ति को प्रत्त होते है । खहा भ्रौर खधा 

वृश्चि प्रयाति सक्र्तप मखेप दपि < 

स्वाहासि वै पित्रगणस्य च वृप्रिेतु- | शरौर खथा से हम देवता लोग ठत होतेह ॥ ७॥ 
सवात स्वमत एव ननः सथा च ॥ ७1; जराप युक्ति की देतु चौर अचिन्त्य हे. तथा सत्य, 
या युक्तिहंतुरविचिन्त्यमहाव्र्ता च } द्वा, बह्यचयादिक नियम आपके साधन है 
त्भ्यस्यसे सुतियतेन्धियतवसारेः । 
मोक्षार्धि € करय ५ 
प्रायिमिमु निभिरस्तसमस्तदोपे- श्ापको दौ जहक्नान रूपी विद्या खमते हे हे 
पिद्यासि सा भावती परमा हिदेषि॥८ ॥ देवि ! आप परम भगनतती धियः ह ॥ ८ ॥ 


| खजनों मे दधा, कलीन मे लक्जा रूप से स्थित 
रती है उस देवी को हम पणाम करते हैँ 1 नदं 


। 


#ि। 


मोती सुनि लेग समस्त दोषों से रदित होकर ` 


भरर? ८४ 


शब्दासिका सुषिमलग्यजपां निधान- 
षुदरीतगम्यपदपास्वतांच साम्नाम्‌ । 

देवी अयी भगवती भवभावनाय 

वात्ता च सव्वेनगतां पए्रमार्सिहन््ी ॥ & ॥ 
मेधासि देवि विदिताखिलशाख्लसारा 

दुगासि दुगेभयसागरनोरसङ्गा । 

श्रीः फटभारिहृदयेकङृतापिवेस्रा 

गौरी तमेव शशिमोलिकृतप्रतिष्ठा ॥१०॥ 
भपत्सहासममलं परिषु्णवन्द्र- 

` निम्वामुकारि कनकोत्तमकान्ति कान्तम्‌ । 
शत्यहूभृूतं प्रहुतमाप्ररुपा ठउथापि 

शक्तं विसोक्य सदसा महिषासुरेण ॥११॥ 
ष्टा ठु देवि कपितं भङ्टीकराल- 
यु्यच्छणाङ्पहपच्छपि यन्न सयः | 

माणान्‌ मुमोच महिपस्तदतीव चित्रं 
कौजीन्यते हि इपितान्तकदशंनेन ॥१२॥ 
देषि प्रसीद प्रमा भवती भवाय . 
सयो पिनाशयसि कोपवती लानि । 
भिङञातमेतदधुनेय यदस्तमेत- 

क्रीतं पललं युपिपु्तं मदििषापुरस्य ॥१३॥ 
ते सम्मता जनपदेष धनानि तेषां 

तेपां यशांसि न च सीदति धस्मबगः 
धन्यास्त एव॒ निभूतात्मनभृत्यदाया 

येषां सदाभ्यदयदा भवती भरयन्ना ॥१४॥ 
धम्मर्थाणि देषि सकल्लानि सदैष कम्पा 
एयत्यादतः प्रतिदिनं सुरती करोति । 

स्वम भयाति च तवो भवतीमसादा- 
छोफमयेऽपि फलदा नयु देवि तेन ॥११॥ 
दँ स्पृता हरसि भीततिमदेपजन्तो 

खस्थैः स्मता मतिमतीव शमां ददासि । 
दारिद्रयदुःखभयदारिणि का तदन्या 
सर्वोपकारकरणाय सदाद्रचित्ता ॥१६॥ 
एमति ` इलं एथ 

„. व्यन्तु नाम्‌ नरकाय चिराय पापम्‌ | 


भाकैर्डेयशुराण 


-सरस्बतीं 


` २६५ 


हे देवि ! श्राप यजुर्वेद की विमल छचाश्रोँ 
तथा पणत्रयुक्त खुन्दर पद पावली श्रीर सामवेद 
के मन्त्रां रूपी तीनों वेदमयी शब्दासिक्रा रूपे । 
द्माप जगत का वेन्धन कारने वाली वार्तां तथा 
सम्रस्त जगत का सङ्कट दरमे चाली है ॥ &॥ 
देवि ¡ श्राप मेधा श्रौर समस्त शाख जानने बाली 
तथा दुरम संसार सागरसे पार 
करने वाली नोका रूप दुगं च्चाप दी ई । भगवाम्‌ 
हदय में रहने वाती लघ्मी च्रौर मदादेवडी के 
शद्धाद् मे रहने वाली गौरी राप ही है ॥१०॥ कुच 
मुस्कराते हष तथा पणमासी फे चन्द्रमा के समान 
कान्तिमान्‌ श्रौर सुवणं के समानं चमकते इषः 
श्रापक्रे मुख को देखकर मदिषाघुर का रणम कोध 
शान्त न हु्या यद वड़ा श्राश्चर्थ हे ॥ १९॥ हे 
देवि ! ्रापशटी कोध युक्त फरल भौं श्रौर उदय- 
कालपरे लाल चन्द्रमा कै समान मुख को देरुकर 


-मदिपाखर ने उसी समय पाणो को यो न छोड 


दिथा यद वड श्रयं दै, क्योकि क्रद्ध यमराजके 
दशन कर कौन जीवित रह सक्ता. है ?॥१२॥ 


" | हे देवि ! श्राप प्रसन्न हो, आप परम दयालु है । 


श्राप करदध होकर हमारे शचश्रों का शीघ्र नाश कर 
देती, ये तो दमने श्री जान लिया है । कारण- 
श्नापने महिषासुर की विशाल सेना कानाश कर 
दियादहै ॥१२६॥ दै देवि} जिन लोगों पर अपं 
प्रसन्न दै वे दी जोग धन्य होते है, उन्दी को मान्य 


खमा जाता दै तथाते ही धन श्रौर यशोपार्जन ` 


करते है, उन्दी को धमे, अर्थ, काम रौर मोच 
प्राच होते द तथा उन्दी के सेवक, सी, पु श्रादि 
ध्रभ्युदय फो प्राप्त दोते दै ॥१४॥ हे देवि ¡ शापक 
दया दी से सव ध्म श्रौर फर्म प्रति दिन क्रिये 
जाते श्रीर सफल होते हँ । ्ापकी रपा से लोग 
खगं म जाते है तथा तीनों लोकम फलदाता श्राप 
हीदह॥१५॥ द्ग | जो श्रापका विपत्ति में 
स्मरण करते है उनका आप सङ्कर दरण कर लेती 
ह न्नर जो खस्य अवस्था मेँ श्रापका स्मरण करते 
है उनको श्राप श्रौर-भी शभ करती है । शापक 
श्रतिरिक्त दरिद्र, दुः्ल शरीर भय के दरने बली 
दीन है । अप सपर उपकार करनेके लिये सदा 
दयालुःचिन्त रहती हँ ॥ ९६॥ दे देवि ! आपने इन 


` | क्सो को इसलिये मासा दै कि इनके मारने से 


जगत को खख होगा श्नौर दूसरे ये पापी, नारकी 


4 


-~-~-------~-~" 


२६६ -माकरटेयपुराण श्ण ट््  ` 


संगरामगृत्यमधिगस्य दिवं प्रयन्तु | रै, यद सं्राम मै खतयुको भाप-दोकर खग मे 
परसेति नूनमदितान षिनि्ंसि देवि 1१७ प्च जाय 1 १७॥ दे देनि 1 क्या श्राप -द्टिमाच ` 
ष्टरैव किं न भवती प्रकरोति भस्म से ही देवतान्नो.क धैरिर्थीका नाश नहीं करस्सक्तीं - 


सर्व्वासरानरिषु यत्‌ भरहिणोपि शकम्‌ । | थीं जो आपने उन पर शस्र-पदार किया ! परन्तु 
लोकान्‌ प्रयान्तु रिपवोऽपि हि शखपूतां श्राप तो शन्नो पर भी दया करती हैयेखा 
इत्यं मतिर्भवति तेष्वपि तेऽतिसाध्वी ॥१८॥| मारा मत दै, कारए-श्रापने श्रपने शख से 


संडगधभानिकरविर्फुरणेस्तथोभेः रा्तसों को पविन्न कर .खर्म मे पर्हुवाया ॥ ष्य] 
शलागरकान्तिनिवरेत दृशोऽसुराणाम्‌ । "दै.देवि ! रत्तो की श्रंखिं -आ्रापके खङ्ग शरीर 
यकरागता विलयमंशमदिन्दुखणड- शल की कान्ति से न पटीं कारणे. श्रद्ध॑दन्द्मा 


योग्याननं त्तव विलोकयतां ` तदेतत्‌ ॥१६॥ यर प्रे सुल कौ देलरटीं थीं ॥ ९६॥ दे.देवि। 
दुततशमनं तव देवि शीलं आपका शील पापियों का पाप नाश फरने क -लिये 
रूपं तथेतदबिचिन््मतुलयमन्यः | है श्नीर रूप श्रापका पेसा है क्रि जिसकी तुलना 

नदीं की जासकती है । दैत्यों को मारने बले अप 


नीययन्च हन्द इतदेवपराकरमाणां | ह परन्रम से आपकी चैरियों के भि मी द्या 
वैरिष्यपि भ्रकटितेव दया त्येत्थम्‌ ।॥२०॥| रग हेदी हे ॥ २०॥ दे देवि ! आपके पराक्रम 
फेनोपमा भवतु तेऽस्य पराक्रमस्य शरीर श्नु को भय देने चाले रूप की उपमा किससे 
रूपंच शनुमयकाय्येतिहारि इत्र । की जाय । हे वरदायिनी देवि ! वित्त भे दया श्रौर 
चित्ते पा समरनिष्टुरता च द्ष्ट भरकर रूप से.युद्ध-मे निष्डुरता यह तीनों लोक भे 
त्वय्येव देवि परदे भुवनन्रयेऽपि ॥\२१।॥ | सिवाये श्रापके -ीर किंस है ॥ २९॥ हे देवि! 
रैलोकयमेतद खिलं रिपुनाशनेन शसु का नाश करके श्रापने तीनों लोरकोकी रक्ता 
ब्रातं तया समरमूद्ध नि तेऽपि हत्वा की है नौर समरमे मारकर उनको स्वर्े पहुंचाया 
नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्त- दै । हमारा सच भय श्राप 'दूर कर -दिया, इकर 


भस्माकन्मदसुंशसिभिवं नमस्ते ॥२२॥ | लिये हम आपको प्रणाम करते ह ॥ २२॥ हे दवि! 
शूलेन पाहि नो देषि पाहि खड्गेन चाम्िे । | श्रभ्विके । श्ल से, खड्ग स घरए्या के.स्वरर से 
पण्यसनेन नः पाहि चापवयानिखनेन च ॥२३। चथा लुप 1 ५ व 
चिदं इक, 1 अपने श्ल 
चया रघ मतीभ्यान्व ४ र दक्षिणे पू्ै, पश्चिम, दक्षिण श्नौर उत्तर मे हमारी रक्ता 
भ्रामणेनास्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि ॥२४॥| कीजिये ॥ २४॥ शौर सौम्य रूप से जिखसेः कि 
सौम्यानि यानि रूपाणि त्रंलोक्ये विचरन्ति ते। | आप तीनों र रली है तथा दस ५ 
यानि चात्यर्थपोराणि तेरकषास्मांस्तथा थवम्‌॥२५॥ प पृथ्वीका ध 
खद्गशूलगदादीनि यानि च्ास्ाणि तेऽ्निक र 1 अ 
करपट्वसङ्गीनि तैरस्मान्‌ रर ॒सव्व॑तः ॥२६॥ रता कीजिये ॥ श्द॥. ` . 
, चूुपिरुवाच । ऋषि बोले | = 
एवं ससुता सुररदिव्यैः इसुमेनन्दनोद्धवैः । . `|. (4 त जगन्माता देवी कीः 
~¬ भ 9, न्दनयनोत्पन्न दिव्य पुष्पों से तथा चन्दनादि के 
अर्चिता जगतां धात्री ठ्या गन्धाजुलेपने; ॥२७]॥| जेप से पूजा की ॥ २०॥ किरं समस्त रैवतं 
भरगतया ममर्रखिदशी्दिन्यषूपस्तु - धूपिता । | देवीको दिय धूपसे पूजितवियां भरर बह छी 


है उनदे हमारी सर्वश्न 


8 ~ >~ 


सथ दप ३८ गीदरदेयषुशण ६६५ 
14 भसदयु्ी समस्तान्‌ भ्रणतान्‌ सुरान्‌ ॥२८। || रपा करके प्रणाम कर्तेण उन देवताशमोसे योल 
देचपुवाच देवी बोली- 


नियतं दशाः सर ऽभिवाभ्कि्‌ दे देवताश्नो { योलिभे, अव श्राप मुभसे या 
 प्दशाः सव्वं यदर्मत्ोऽभिवाज्छतम्‌ | शअमिलापा करते ह ्रापने मेरा मल माति पूजन 


दृदाम्यदेमितिभत्या स्तैरेभि; सुपूनिता ।।२६॥ किये ह इसलिये गीति पूरक भै बही दमी जो पि 


० [1 = 
= 11 ५ ~---~--~ --------~-~--+ 


श्राप मिगे ॥ २६॥ 
देवा उयुः ~ | देता बोक्ले- 
पगवत्या शतं सव्यं न किञ्चिदवशिष्यते । | ट मगचती ! आपने स $ कर दिया, चव 


| | छ शेष नकी है शयोकि दसाय शत्रु मिपास्र 
यद्यं निहत; शत्रुरस्माकं मदिपासुरः ॥३०॥ था वद श्ापने मार दिया ।३०] दै महेश्वरी ] यदि 


व ॥ श्राप तुको घर दना दी चाहती है तो हमने थाप 
यद्र वामि वरो देयस्त्वयास्माकं गहेश्वरि। का स्प॑रण कियो रै प्रीर भविष्य मे जय हम श्राप 


सम्भृता संस्पृता चं नो हिमेथाः परपापद्‌ः ॥३१॥ बा स्मरर्करे स श्राप द्मारे दो को निवारणं 

¶; स्तयरेभिस्तां स्तोप्यत्यमलानने । फीज्यि ॥३१॥ हे पिमलासुखी ! जो मचष्य ्रापकीं 
यथ मन्यः चां स्तप्य्मलानने । | स सोच से सदधि करे उरते घन धानय री 
तस्य॒ वित््िविभवयनदासदिसम्धदाम्‌ । | श्रादि कीरदि के लिय श्राप सदैव उपर परसम्न 
रदयेऽस्मसना खं भवेयाः सव्वदाम्िकं ॥२२॥| होषःर सदायता करे ॥ ६२॥ 


चरपरिर्वाच ऋषिवोे- _ _. ॥ 
इनि प्रमादिता दैवैरजगतोऽ्यं तथात्मनः । हे सुस्थ { देवताश ने जगत फे तथा श्रते 


दिन कै लिये देवी को प्रस किया रौर भद्रकालीं 
तपरधक्लया भद्रकाली वभुबान्तर्हिता यष ॥२२।॥| यद र विः देखा ही र स 
व १ ॥३३ हे सजन. ! जिस प्रक्र कि पूवं काल मेँ दैद- 
इ्येतत्‌ कथितं भु सम्भूता सा व परा। ताश्रौं के सैर से तीनो लोकों की हितैपिणी देवीं 
दी देयपरीरेभ्यो जगव्रयहितेपिणी ॥२४॥| की उत्पतति ट्‌ सव मने ्रापसे कटी ॥ २४॥ 
(0 भाभवत्‌ वद दु रैत्यो चथा घुस्म-निय॒ग्म च्चा वथ 
नय मादा सो सथुमूवा । | करे वे सगर भौरी कप से उल दई ॥ ३५॥ वह 
यथाय दुष्दत्याता कवा शम्भ-निशुम्मयोः ॥२५॥ मौर की उत्पचि लेोक्षोकी स्त्ाके लिये शौर 
रणाय च लोकानां देवानाुपकारिफौ | | ददता ॐ उपकार ले किये र, उसे मे वथौः 
तच्टृणुष्व मयास्यातं यथावत्‌ कथयामि ते ॥२९॥ वतक्व्ता ह उना 
इति श्रीमाैरुेयधुराण मे सावरणिक मन्वन्तसमं मरहिपाषखप समत्ि नाम्‌ <वा अ° समघ। 
--ो-क 


पिवासीय अध्याय 


रपि वोले- 
ऋषिस्य "क > दोः ५; सँ 
प्यामराभ्य शचीपते पूरव काल मे श्म निशुम्भ नाम दोनों रासं - 
पुरा शुम्म-निश्म्भ शचीपते; । ने इनदर का परैलोक्य तथा देवतां का यस भाय, 
्रल्लोक्यं यत्नमागाश्च हता मदवलाश्रषात्‌ ॥} १।॥ श्रपने मद यलसे दरण करक्तिया ॥*९॥उन दोनों 
तयेव घता तददधिकारं तवैनद्वमू 1 | ने र जीर उसी भनार चनो, छव, चम 
द्येरमथ चास्थि । चक्राते यरुणएस्य च ॥ २॥ घनौर चर्ण पर श्रपना श्चधिकार जमा लिया ॥ र" 
कथिरमथ याम्य गिकं घ दोनो पबन ओर श्रभनि को भी अपने वश भ कूर 
लेव पवन. चकरतु्िकम्प च |, | के उनका ऋच स्वयं कसलेले जर देवता सौर 
1 ८ निशत ९, ८ जि १ ॥ ३ | ॥ परस्तं होकर रांज्यसं चुत होगये दौर भयसं 
तद्ये दषा धिनिधूत श्रपराल्या, परा ता. 


२8८ - सर्श्ठेयषुराण | श्र० ८१. 


कायने लगे ॥ २ ॥ उन-दोनों महाश्नञरोने सय देवः ` 
तानो को उनके धिका खे च्युत कर दिया 
 श्नौर स्वम से निकाल दिया इसपर देवतां जे 
श्रपराजिता देवी का स्मरण.किया ॥४.॥ उन्देनि ` 
कहा, “हे देवि ! श्रापने हमको वरदान दिया हैकि 
विपत्ति मँ जिस समय हस श्रापका स्मरण 

तो उसी क्तख आप हमारे कष्टों को हरण करमी"॥ 
स्‌? विचचार करके देवतालोग पव॑तसाज हिमालय 
पर गये श्रौर वहां जाकर भगवती विष्णुमाया की 
की स्तुति करने लगे ॥ ६॥ 

देवता बोले- २५ 

हम लोग देवी,.मदहादेी, शिवा,-परूति, भदा 

च्छो नश्रता पूरवैक निरन्तर णाम करते द ॥-७॥ 
श्दारी को नमस्कार हे तथा श्राप जो नित्या, 
गौरी, धानी, ज्योत्स्ना, इन्द्ररूपां 'छ्रौर "परमानन्द 
रूपा है उनको नमस्कार दै ॥८॥ दुःखीजनोंका 
कल्याण करने वाली, बृद्धि न्नौर सिद्धि. करनेवाली. 
पर्वतां की श्री शौर सर्वांणी ! आपको -नमस्केार 
है ॥.& ॥ संखार रूपी दुग से पार करनेवाली दुगं 
सव जगत का कायं करने बाली, - परति श्रौरं 
पुरुष मे मेदक्ञान रूपिणी, धूम्नाकाली को हमासः 
निरन्तरः प्रणाम है ॥*१० ॥ हे देचि } आप चति 
सौम्य श्रौर अति रौद्र है, श्रापको हमारा भणामः 
जगत के कारण श्रौर क्रिया शक्तिरूप ! श्रपको 
नमस्कार है ॥१९॥ जे देवी खव प्राणियों मे विष्टु, 
की साया फे नाम से प्रसिद्ध है उसको हमारा वार. 
वार प्रणाम है ॥ १२॥ जो देवी .सव पारियों. में 
चेवना रूप से स्थित है उसकी दम चार २ पराम 
करते हं ॥ १३॥ जो देवी खव जीचें मे बुद्धि. सूप, 
से विद्यमान है उसको हम लोग अनेक प्रणाम 
करते दै ॥ ७ ॥ जो देवी सच पारियों मे निदा 


स्तस्य नमस्तस्ये नमस्तस्यै नमो नम्‌; ॥१५।| रप से स्थित टै उकम हम वार बार, नमस्कार 
7 देवी सच्वेभूतेषु क्षधारूपेण संस्थिता! | करते दै ९५५ जो देवी सव प्रारियें मे भूखके रूप्‌ 
मस्वस्य नमृस्तस्य नमस्तस्ये नमो नम; ॥१६॥| मँ स्थित है उसको हमारा श्नेक पणम दैः ॥१६॥ ' 
7 दवी सन्यत छायारूपेण संस्थिता । जो डेवी सव भारियें मे डायारूप से स्थित है. 
र व व | ९७॥| उसको दम यार बार नमस्कार 'चःरते ह ॥ १७५ 
स्वस्मै नमस्तसयै नम मो जो देव्री सब जीवं मे शक्ति रूप से, विराजतीं है ` 
स्वस्य. नम नसः ॥१८।॥| उसको हमं वार वार प्रणाम करते है.॥.श्८॥.जों 
¶ दवी सनवमृेषु वष्ास्पेण संस्थिता | ` देनी सब.प्राणििं मेःठष्शा.रूप से रहती है ..उसं 
मर्तस्य नमस्तस्यै नमस्तस्मै नमो नमः ॥१६॥| को हम नमस्कार करते द ९६॥.जो. देवी स्रः 


~+ ~~ ^+ 


ताधिकारासििदशास्ताभ्यां सर्ववे निराकृताः 
प्रहासुरभ्यां तां देवीं संस्परन्त्यपराजिताम्‌ ॥-४॥ 


तयास्माकं वरो दत्तो यथाप्सु स्मृताखिता, 
पचतां नाशयिष्यामि तत्क्षणाद्‌ "परमापदः ॥ ५॥ 


१ति श्रत्वा मतिं देवा हिमवन्तं नगेश्वरम्‌ । 
मुस्त ततो देवीं विष्णुमायां भ्तुष्टुषः ॥ & । 
दवा उदु 
ममो देन्ये मादेव्ये शिवयिं सततं नमः 1 ` 
मसः दस भद्राय निथताः पणता स्मताम्‌ ७॥ 
प्राये नमो नित्याये गौय्यै घातये नमो नमः 
न्योत्लाये चेन्दुरूपिण्ये सुखाये सततं नम्‌; ॥ ८ ॥ 
प्याय प्रणतां दये सिद्धये स्मो नसो नयः 
१ त्ये भूतां लक्ष्ये सव्वाण्ये ते नमो नसः ॥&॥ 
गये दुगेपारायै सारायै सर्वकारिण्यै । 
्यात्ये तथेव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ॥१०॥ 
पतिसौप्यातिसद्राये नतास्तस्यै नमो नमः 
†मो नयसखतिष्ठाये देव्ये इत्यै नमो नमः ॥११। 
7 देवी सन्वेभूतेषु विष्णमायेति शब्दिता । 
[मस्तस्यं नसस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥१२॥ 
ए देवी सव्वमृतेषु वचेततेत्ययिधीयते। 
{सक्तस्य नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥१३॥ 
7१ देवी स््वमुतेषु बुदिरूपेण संस्थिता ! , 
स्तस्य नमस्तस्ये नमस्तस्यै नमो नमः ॥१४।॥ 
प देवौ सव्वेभूतेषु भिद्रारूपेण संस्थिता । 


- श्र ८१ भाकेरदेयषएराण २६३ 


या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता । । जनों मँ चमा रूप से स्थित ह उसको इमास 
नमस्तस्ये नमस्तस्यै नमस्तस्मै नमो नमः ॥२०। | क 
या देवी सव्दभसेप जातिरूपेण संस्थिपा । 
नमस्तस्ये नमस्तस्मं नमस्तस्ये नमो नमः \२१॥ 
पा देषी सर्व्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता । | जे दे्ी सव भाणिर्यो मे लला रूप से स्थित दै 
नमस्तस्यै नमस्तस्ये नमस्तस्यै नमो नमः ॥२२)॥ उसको मारा नमस्कार है ॥ २२॥ जे देवी सव 
या देधी सव्वंभतेष शान्तिरूपेण संस्थिता । जीबों मं शान्ति रूपसे वियती है उसको दमाय 
समस्तस्य नमस्तस्ये नमस्तस्यं गमो नपः ।॥२२}॥ वार वार धणाम है ॥ २३॥ जो देवी सव पारियों 
या देवी सन्वैभतेषु श्रद्धारूपेण संस्वता। | अद्धा रूप स स्थित है उसको दमारा वार धार 
नमस्तय नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः॥२४॥ प्रराम दै ॥ २ ॥ ज देवी सव प्राणियों मे कान्ति 
या देवी सच्चभृतेप फान्तिरूपेण संस्थिता । से विराजतीं है उसको नमस्कार है, नमस्कार 
नमस्तस्ये नस्तस्य नमस्तस्या नमो नमः ॥२१॥ है, नमस्छार है ॥ २५॥ जो देवी खव जीवों मे 
या देधी सव्येमतेषप लक्ष्मीरूपेण संस्थिता । । लन्मी सूप से स्थित है उसको हमास नमस्कार दै, 
नमस्तस्य नमस्तस्ये नमस्तस्ये समो समः | नमस्कार है, नमस्कार है ॥ २६॥ जो टेवी सव 
या देवी सव्वेभृतेप इत्तिरूपेण स्थिता! | जीवों मे वृत्ति रूप से स्थित दै उसको हम चारः 
नमस्वस्ये नमस्तस्ये नमस्वस्य नमो नमः 1 २७]॥| यार प्रणम करते ट ॥२७॥ जो देवी सद जीवों 
गा देवी सर्वभूतेषु स्पृतिरूपैण संस्थिता । | मँ रति रूप ते स्थिन ह उनको हमारा अनेक 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्ये नमो नमः ॥२८॥॥| नमसकार है ॥ २८॥ जो देवी सव प्राणियों मे दया 
या देवी सब्वेभृतेषु दयारूपेण संस्थिता । | रुप से विराजत है उसको हम अनेकं प्रणाम 
नमस्तस्य समस्तस्य नमस्तस्यौ नमो नमः ॥२६।॥ करते द ॥ २६॥ जो देवी सव जीवों मेँ संतोष रूप 
या देयी सव्वंभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता । | से स्थित है उसको हम वार रअणाम करतेह ॥२०॥ 
नमस्तस¶ नमस्तस्मे नमस्तस्यं नसा नमः ॥२०।॥ जो देवी सव पारियों मे माता दोकर रहती दै 
या देवं सच्यंभृतेपु मृपिस्परण संस्थिता| | उसको हम वार वार प्रणाम करते है ॥२९॥ जो 
नमस्तस्य नमश्तस्य नमस्तस्यं नमो नमः ॥२१।| देवी सव प्राणियों म श्रान्ति रूप से स्थित टै उस 
या देवी सन्वभतेष्‌ भ्रान्तिरूपेण संस्थिता ¡ | को हमारा नमस्कार है ॥३२॥ जो सव प्रशियों 
नमस्तस्यै नमस्तस्यो नभस्तस्य नमो नमः ॥३२॥ मै इन्दियौ की श्रधिषठात्री देवी है शौर सव जीवों 
इन्दरियालासधिष्ठत्री भूतानाश्चाखिलेषु या । | मे व्याप है उसको दम रणम फरते हं ॥ ३३॥ जो 
मूर सततं तसय वयि नमो नमः ॥३३॥|| ण य समर जगल स ॥ 
चितस्य या इत्त्मेतद्ववाप्य स्थिता जगत्‌। | हे शभ करने चली ईश्वरी देवी ! पिते देवतां 
नमस्तस्यं नमस्तस्यं नमस्तस्ये नमा नसः ॥२५॥॥ ने श्रापकी स्तुति की थी र भु ध 
च समगत | ५ 
दिनेषु सेषिता। करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी आप हमाया कल्याण करं ॥ ६९॥ हे देवि ! शल 
शुभानि भद्राएपमिहन्तु चापदः ॥३५॥ स्मय उद्धतं डैत्यों से पीडित कर टम देवता 
` था सम्मितं बोद्धतदैत्यतापितेरस्माभिरीशा च | लोग अपतत नमस्कार कस्ते है 1 भक्तिसे नघ 


॥ 
रूप से स्थित हे उसको हमारा प्रणाम है ! २९॥ 


९३९० माकेरडेयपुसणख ` ` .अ०९५ - 


सुरेनेमस्यते । या च स्मृता ततक्षणसमेव हन्ति | होकर हम जव कभी ्रापका स्मरण करते है तभी . 


: नः सन्बापदो सक्तिविनभ्रूर्भिभिः ।)३६॥ माप हास चिपचियों का नश्च कस्ती हरषि ` ` 
छपिर्वाय शछषि.बोज्ते-- । 
एवं स्तवादियुक्तानां देवानां तत्र प्व्वती | हे राजन्‌ ! देवताश्रकि इस प्रकार स्तुतिं करने ` 


¦ क्ञाठमस्याययौ तोये चान्या दृएनन्दन ॥२७॥| पर देवी पार्वत जञा स्नान करने ॐ दतु सहि 


: साऽत्रवीत्‌ तान्‌ सुरान्‌ सुधरभवद्भिः स्ततेऽतर का । 


श्रौर देवताश्नों के सन्मुख श्रणट हुई" ` ॥.२७.॥ ` वदं 
उन देचताश्नों से योल कि तुम किसकी -स्तति 


: शरीरकोषतशवास्याः सथर ताऽ्रवीच्छिवा ॥३८॥ कस्ते हो, श्नौर उनके शरीर-कोश से. शिवा निकल 


~~ ~~ ~ =+ ~ 


स्तोत्रं मभेतत्‌ कियते शुम्भदैत्यनिराद्तेः कर^उनसे चोली ॥३८॥ समर मे शम्भ भ्रौर निशंम 


; दैत्यो से परास्त ` हयैर श्राप सव देवता भेरी 
द समेते घमरे निभेन परान ॥२९॥ स्ति कर पे है ॥३६॥ क्योंकि वद : चर्व 


शरीरकोपाहयत्‌ तस्याः पाववत्या निःछताभ्निका । | पार्वदीजी करीर को स छप हई सत 


: फौपिकीति समस्तेषु ततौ लोकेषु गीयते ॥४०।।| उनको सव लोकों म कौशिकी कहते "ई ॥७०॥ उक्ते 
¦ तस्यं विनिगतायान्तु छृप्णाऽभद्‌ सापि पर्वती । | निकल जाने पर पाबेतीजी रष्णेबय दोग श्रौर 


; कालिकेति समारुयाता हिमाचलङृताश्रया ॥४१॥ 


इसी कारण चे कालिका कटलाईः शरीर ` हिमालय 
पर्वत पर श्टने ल्ग ॥.४२॥ सिर यभ्व्काङ्िःपरम 


¦ त्तोऽभ्विकां परं रूपं बिभ्राणां छमनोहरम्‌ । | रुप को दैववशात्‌ म्म मिस्प-ॐ सेवक - सड 


॥ि 


क ् "1 
< --- ~ -~ ५ - --~ :-~ 


१० 


ददशं चण्डो धुरुडशच भृस्यौ शम्भ-निशम्भयोः॥४२| सुरुड ने देस ॥ ४२ चे दोनों शम्भक प्रास जाकर 
ताभ्यां शम्भाय चाख्याता अतीव सुमनोहरा | , | बोतते क दे मदाराज ] थक्‌ अत्यन्त 'चुन्दरी छी 


है ओक्ति हिमालय पर्वत को काशमा कर रदी 
काप्यास्ते सी महाराज भासयन्ती दिमाचलम्‌॥४२।| ह ॥ ४३ ॥ हे-्सुरव्रर ] देखा, उल्वमपप किसी 


तैव ताच्क्‌ कचद्रपं छं -पेनचिदुत्तमम्‌। | का कटी.भी नहँ देखा -गयः है, -मालूम होत्रा द 
ज्ञातां काप्य देवी श्रद्यताश्वास्ुरेश्वर ॥४५। वद कोह देवी है, अपि उखको रहण करे ॥ ४४॥ 


। खिथौं 
श्ीरत्नसत्िचाव्य्गी धोतयन्ती दिशस्त्विषा । ध व व ह 1 


सा तु तिष्ठति दपयेनद्र तां भवान्‌ द्रषटुमहैति ॥४५।॥| भकाशितर कररदी दै, श्राप उसको तवश्य देखि 


` यानि रत्नानि भ्रणयो गनाश्वादीनि वै परमो ! 1 हे प्रभो } चिलोकी मे जो श्रेष्ठ -रत्न, मणि, 
 तैलोक्ये तु समस्तानि साश्वं भान्ति ते गृहे ॥४६।॥. गज अश्व आदि है ते इस समय -श्मापके घर पर 


; तंपुर मौजूद है ॥ ४६॥ इन्र से श्राप ` दाथियों “मेँ रत्व 
रावतः समानीतो गनरलं॒॑पुरन्दराद्‌ । | गषत को लाये श्रौ शरसी अकार कप्त शौर 


प्रारिनाततरुश्वायं तथेवोेःभया हथः ॥४७।॥| उच्च श्रवा घोडा भी ग्रित्ते,॥89] रह्मा का टंसःयुक्त 
धिमानं हंससंयुक्तमेतद्‌ तिष्टति तेऽङ्के | , | विमान भीआपके आाङ्गण-मे मौजूद ददै । बद.भी 
रत्ममूतमिहानीतं यदासीदेधोष्टुवम्‌ ॥४८॥ णक र्न है अर बड़ा अद्भुत दे ॥.४८॥ कवेर 


विनि छव महापद्च नाम निधि-को लत्रे तथा समुद्रे 
रेष महाप्ः समानीतो नश्वसात्‌ । | ्रापको अरमलकंज की -किंजल्िनी नाम मालं 


किञ्जल्किनीं ददौ चान्यिरमालामम्लानपडनोय्‌॥४६| भदान की.॥४६॥ चर्ण का चः भी जो वसं 
-छत्रं ते वारुणं गेहे काश्चनस्नापि तिष्ठति । | बसता है अपके घर परःमोजूवदे जरः उसी तरः 
तथायं स्यन्दनवरो यः पुरासीद्‌ परजापतेः ॥५०।॥| यद उक्तम स्थ भी. दै जो कि पटिले प्रजापति के 


ृत्योरतकान्तिदा नाम शक्तिरीश खया हृता । ५ ५०५ 


` परशः सलिलराजस्य भ्रातुस्तव परिग्रहे ॥४१॥ पाश आपके मारै.के हाथ मै रदताःदै.॥ १९ समुद्र 


लिश्म्मस््ात्िजाताश्च समस्ता रत्नजातयः.  ।'से.उत्पच्च दप, जितमे.पत्त है त्सव -चाप्रे-गमाईं 


1. 


` तुव गजरनानि ह्वा देवेन्द्रवाहनम्‌ 


ह 


“~ परमेशव्यमतुलं भाग्सयसे मरपखिहात्‌ । 


६ माकएेयषएरास ३०१ 


2 क 99 
न यादन) 


वहिरपि ददौ तुभ्यमग्निशौचे च वाससी ॥४२५ निम्ब के पाल ठै शरीर प्रधि तेभी श्ापको पकृ 
एव दतेन रलानि समस्तान्याहूतापि ते। =! चथन्त पविव वच भे किया हे 1५२] दैतयेनद। 


। ये सव रत्न प्रापने र्यिदहै, श्रव श्स खीश्तन 
सीरल्नमेपा कस्याणी त कस्मान्न ग्यते ॥५३ | कत्थारी को श्राप क्यों नदीं यदश करते १॥ ५१॥ 
परपिखवाच 


पि बोले । 

निशम्येति क्वः शुम्भः स तदा चएड-गुए्डयोः। वरड भरुरड के इन वचनो को एुनकर शुम्भनिः 

रेपयामास तुग्रं दूतं देव्या महासुरम्‌ ॥४४॥ देवी के पास सुग्रीव नाम दूत राच को भेजा ॥, 

ति चेति च पक्तव्या सा गत्या वचनान्मम । | भीर उससे 6 दिया कि देनी के पास ज्ञाकर 

[+ श्र चचन उस + 

यथा चाभ्येति सम्पीत्या तथा कां चया लघु ५९।॥| णा न चन ०११ ग देना तथा जि तरह च 

गला यासे शैतोररीऽिशोभने । भीति पूरवैक घ्यावे उसे ले आना ॥ ५५॥ वद पूत्॑त 

र व ४ रं रया गिरा ॥५१। के उस सुन्दर शरदश मँ गया जदं चद देवी रत्ती 

पा देवी ताँ ततः पराह शक्ष्ं मयुग्या गिरा ॥५९। | धी शौर वहां जाकर कोमल शब्दम उससे का; 

त ६ दूत वोला- 

दैवि दैसयेएवरः शम्भसैलोक्ये परमेश्वरः । देन ! तीनो ोको$ समी शवर श्म 

दूतोष्धं प्रपित्सते स्त्सकाममिरागतः ॥५७॥ फाला दुधा १ श्राप पास यद्यभ्राया 

¢ ("प 4 चतां पि 

ञरन्याहताजञ सर्व्वासु यः सदा वमोनिप | ह ॥ ५७ ॥ सव देवता लोग उसकी श्रात्ा मानते 

व ५. उसमे सव देवताश को जीत लिया दै । उसने जे; 
नििनिवाखिसदैत्यारिः स यदाह शृप्व तत्‌।५८॥| च है बट सनं धू 

नता सिलं ॥ णु तव्‌ कदा दै बद सुनो ॥ ५८॥ यद जंलोक्य मेरा है,खवं 

भम्‌ चंलोष्यमसखिलं मम ॒देवा वगाङ्गा;। ् 

यद्तमामानहं सर्व्यहिपाश्चामि पृथक पृथक्‌ ॥५६॥ 
लोकय धरएनानि सम॒ वश्यान्यशेपतः । 


ेवतता मेरे वगाचर्ती दै शीर सय यदौःका भाग भैं 
पधक पूथद प्रहर करता ६ ॥ ५९॥ तीर्न स्ते 
म जो-जो खन्दर र्न है वे खव मेरे वशम ह शौर 
खी धकार ने इन्द्रस उसका वाहनं पेराब्रतदाथी 
दरण कर लिया है ॥६०॥ समुद्र-मथनके समय जो, 
पभ्वरस्ल उच्वैःश्रया निकला वा उसो देवदाश्रोंने 
मुके कस्वदध दयोकर समर्पित किया-दै ॥ ६९ शरीरः 
लोलो रज्ञ देवताश्नो, गन्धर्व रोर नागयणोौ के_ 
पास ये वे खव मेरे पक वियमान्‌ द ॥६२॥ दे 
देवि ! दम श्रापको संसार मेँ छी-रल समभे है 
इसलिये श्राप दमाः पासं श्राद्ये, क्योकि स्ल- 
भोका हम दी टै ॥६२॥ द चञलाङ्गी ! मेरे अथवा 
रे दे भाई पराकमी निशुम्भ के पास तुम रहो; 
क्योकि तुम रल सुप हो ॥ ६४ ॥ मेरे साथ विवाह 
करे से तको श्रुल देश्वयं भातत दोगाः }2 यदः 
विचचार कर तुम मेती सी देकर रदो ॥६५॥ , ,, 
शपि वेले- 

उव दृत ते पेखा का तव देवी इसरा गष 
चौर फिर दुगा देवी जो दस सम्पूणं जगत को 
धायस्‌ करती दै गस्मीर बाणी से वों ॥ददा 


देवी बोली-- 
ह दूत { वमने सचक्रदए इसे इभी मिथ्या 


षोतेदमयनोहभूतमग्वरलं ममामरैः । 
उच्चैश्र्रससतं तत्‌ परणिपत्य समर्पितम्‌ ॥६१। 
यानि चान्यानि दपु मन्धर्व्पूरगेषु च । 
रलमूतानि भूतानि तानि मय्येव शोभने ।॥६२॥ 
सीरलनभूतां लां बि लोके मन्यामहे बयम्‌ । 
सा लमस्मालुपागच्चं यतो रत्नथुजो वयम्‌ ॥६२॥ 
मं या ममाद थापि निशम्मघुरुषिक्रमम्‌ । 
भन सवं चश्चलापाङ्धिं रत्नभूतासि बै यतः ।६४॥ 


एतदधुद्धया समालोच्य मसरिग्रहतां बन ॥६५॥ 
, पिख्ाच ध 
इत्युक्ता सा तदा देवी मम्भीशन्तःस्पिता जगा। 


मा भगवती भ्रा ययेदं धार्य्यते जम्‌ ।॥६६॥ 
देव्युवाच 
सत्यष्टतसवया नात्र सिथया विचित्‌ सयोदितम्‌ | 


१०२ 


माकरुडेयपुराण 


श्रे° दद 


मैसलोक्याधिपतिः शम्भो निशुम्धश्च!पि तादश; ६७॥ 
किन्लत्र यत्‌ प्रतिन्नातं मिथ्या तत्‌ क्रियते कथष्‌। 
श्रयतामल्यघुद्धित्वात्‌ परतिज्ञा या कृता पुरा ॥६८ । 
यो मां जयति संग्रमे यो मे दपं व्यपोहति| 

यो मे प्रतिवत्ती सोके स मे भत्ता भविष्यति ॥६६॥ 
तदागच्छतु ॒म्भोञ् निशुम्भो दा महासु६। 

मा जनित्वा फं चिरेणात्र पाणिं ग्रहातु मे लघु॥७०॥ 

दूत उवन्व 

अवलि्रासि में लं दैवि बहि ममाग्रतः । 
व्रलोक्ये कः पुमास्तिष्टेदमर शम्म-निशुम्भयोः॥७१॥ 
छ्न्येषामपि दैत्यानां सर्व्व देवा न वै युधि । 
तिष्ठन्ति सम्भूते देवि कि पुनः शी त्वमेकिक॥७२॥ 
ह्रादा; सकला देवास्तस्य्येषां न संयुगे । 
शुस्मादीनां कथं तेषां स्री प्रयास्यसि सस्पुखम्‌॥७३॥ 
सा सवं गच्छ मयेवोक्ता पाश्वं शुम्भ-नि्यम्भयोः। 


नदीं दै शुम्भ श्रौर निशुम्भ तीनों लोको के श्रधि- 
पति है ॥ ६७ ॥ किन्तु जो धतिक्ञ य कर चुकीं 
वह कैसे मिथ्या दो सकती है मैने श्चस्प वुद्धि के 
कारण जो पदिले पतिक्तष की थी उसको सुनो ॥ 
जे संघाम में सुमे जीत कर मेय दपं चूर करेगा 
पथ्या जो मेरे समान वल्ली द्येगा वही मेस स्वामी 
होया ॥ ६६॥ इसलिये शुम्भ श्नौर निश्चम्भ यहाँ 
श्रविच्रौर यु जीतकर शीघ्र मेय पारिग्रदण कर॥ 
दृत वोला- 
हे देवि ! मेरे आगे अभिमानकी वातं न कत 

ल चिलोकीं मे शुस्म निशुम्भ के रागे कौनसा 

युष्य ठहर सकता है ॥७१॥ खव देवता तो समर 
मे उनके अन्य दैत्यांके श्रागे भीन उर सके 
जिसमे त॒म तो शी हयो नौर वद भी अकेली ॥७२॥ 
जिन श॒म्भादिकों के सन्पुख मै इन्द्रादिक सव 
देवता भी न उदर सक्ष, उनके सन्भृख स्री होकर 
वुम किख भकार भयास करती हो ॥७दा चरतः तुम 
मेरे कहने से शुम्भ निशम्भ फे पास चलो अनन्यथा 
तुम्दारा गौर च्तीए करे बाल पकड फर तुम्हे 


कशाकवणनिद्धत-गौरवा मा गमिष्यसि ॥७४॥| जे जाया जायगा ॥७ध॥ 
# ची 


देव्युवाच 
एवमेतदूबलसी शुम्भो तिद्म्भश्वातिवीय्यंवान्‌ । 
किं करोमि प्रतिज्ञा मे यदनालोचिता पुरा ॥७५॥ 


ष लं गच्छं मयोक्तं ते यदेतत्‌ सव्वंमादतः | 


वोली- 
शुम्भ श्रौर निशुम्भ रेके दी वली रौर परा- 
क्रमी है । परन्तु मे क्याकरू, मै पिले धतिक्ञा 
करः चुकी है ॥७५॥ इसलिये तुम जाश्रो श्रौर जैसा 
मने कहा है बह अविकल उनको कट सुनाश्नो । 
इख पर वे स्रों के अधिपति जो उचित 


तदाचक्ष्वासुरेनराय स च युक्त करोतु यत्‌ ॥७६॥॥| खम्भौगे करेगे ॥ ७६॥ 
इति श्रीमाकरढेयपुराणमे सावरिक मन्वंतरमें देवीमाहात्म्ये दूतसंबाद नाम ८भवां अ०स० । 


त द ~~ 


नियासीषां अध्याय 


शश्परुवाच 
इत्याकरप्यं वचो देव्याः स ॒दृतोऽमपप्रितः 


परमाच समागम्य देत्यराजाय विस्तरात्‌ ॥ १॥ 


तस्यं दुतस्य तद्वाक्यसाकएयासुररार्‌ ततः । 


सक्रोधः पराह दैत्यानामधिपं ध्रज्लोचनम्‌ ॥ २॥ 


है धुम्रलोचसाशु त्वं स्वसेन्यपरिषारितः 


तामानय बलाद्दुष्टां केशाकपणविडलाम्‌ ॥२॥ 


.८५।९१।८; कथिहूयदि बोज्तिष्ठतेऽपरः 


| ऋषि बोक्ते-- 


देवी के यदह वचन सुनकर बह दृत क्रोध से 
पूर दयोकर दैत्यराज शुम्भ के पास गया रौर 
विस्तार पूर्वक सव हाल उसको छना दिया ॥ १॥ 
दुवके उन चच्नोँको सुनकर चह दैत्यराज कोधित 
हो अपने सेनापति धूम्रलो्तन से कटने लगा ॥२॥ 
हे धूम्रलोचन । तुम शीश अपनी सेना को लेकर 
जाश्नो श्रौरः उस दुष्टा को वाद पकड़ कर वीच 


लाश्चो ॥ ३॥ उखकी सत्ता करते बाला यदि बँ 
कोड प्रकट हो तो वद चाहे देवता हो, यत्त 


^ 


१ 


्र° ८६ माकंर्डेयपुराण ३०३ 


----------------~-------~------------------- 


९ इ 
स हन्तन्योऽपरो वापि यको गनधवयै एव वा ४॥ या गनयव हो तुल्व माए डाला जाव ॥ ४॥ 
ऋषिरुवाच वोल्े- 
तेनाङपठस्ततः शीघ्र स॒त्यो धूम्रलोचनः । उसकी आदा पाकर दैत्य धूश्रलोचन शी्रदी 
हतः षष्ट्या सहस्राणामसुराणां दतं ययो ॥ ५ | ल हजार रासो को लेकर चला ॥५॥ उसने 
स॒ टृषट्र तां ततो देवीं दुहिनाचलसंस्थिताम्‌ । देवी को दिमालय पर्वत पर धैठे हृष देखक्र चि 
दोषे {~> > 
नादो; प्रयाहीति मूलं शम्भ-निशुभ्भयो५। ६ ॥| स्वर से कदा कि तुम स्म निशुम्भ के पासं चलो 
त चेत्‌ भीत्या भवती मद्वत्तीरणपष्य ष्यति! |॥६॥ यदि तुम रीति पूर्वक मेरे स्वामी के पास 
ततो व्तान्नयाभ्येष फेशाक्पि १ | नदीं चलोनी तो प्र वलपूवक तदार के पकड 
६ देव्युवाच इताम्‌ 1 ७॥| कर तुमको दुःखी करूंगा शरीर ले जाऊंगा ॥७॥ 


त , ठेवी योल्ी-- 
दैयेश्वरेण प्रहितो वलवान्‌ वलतः । 


तुम दैत्यराज की ्रा्ञासे श्राय दो शरीर सेना 
वलाशयहि भसे हः सहित देने ॐ कारण वलवान्‌ भी टो, यदि तुम 
ला्चयसि मामेवं ततः रं ते करोम्यदग्‌ ॥ ८ ॥ सुमे वलपूैक लेजाश्रोगे तो मे तम्दारा व्याकर गी॥ 
प्पिरुचाच ऋषि वोले- 
इत्युक्तः सोऽभ्यथावत्‌ तामसुरो धूम्रलोचनः । त 8 देषो | 
हृङकरेणे गौध त ६ ऊपर पटा परन्तु श्रग्विका ने उसे इंकार स हः 
व त भर्म ४ स ततः ॥ ६ ॥ अस्म कर डाला ॥६॥ इसके चाद श्रससो की मदान्‌ 
र सील तथाम्बिकाम्‌ । | ना कोप करने लगी परन्तु अम्बिका ने उप पर 
तता धुतगाट, क त्वा नाद्‌ छुभरवम्‌ | | सिह धुतसटः जो देवी का चादनथा शरञुरोि सेना 
<, षप पिह देव्याः सवाहनः ॥१ १॥| म कद पड़ा ॥ १९॥ उसने च शर को हाथके 
कांथित्‌ कमहारेण दैत्यानास्येन चापरान्‌ | | परदार से, कछ को मुख से शरीर छु को दोय से 
श्राक्रन्त्वा चाधरेणान्यान्‌ नघान सुमहासुरा्‌१२॥ पकड़ कर मार डाला ॥ १२५ सल सिदिने इष्ठ 
केषाधित्‌ पाटयामास नसः कोष्ठानि केशरी ! | दत्यो का नलो से पेट फाड़ डाला श्नौर छ का 
तया तलमहारेण भिरंसि तवान्‌ पृथक्‌ ॥१३ | भिर हाथ के भार से श्रलग कर दिया ॥ १३॥ 
पिच्छिन्नवाहुशिगसः तास्तेन तथापरे । | उस धुतकेशर ने वदतो की शुजाये श्नीरः शिर का 
पपौ ' च रषिर कोष्ठादन्येषां पुतकेशरः ॥१४' ज्ञे तथा दृखसों के पेट फाड़ कर उनका ₹ धिर 
शेन तद्वरं सर षयं सीतं उखने पान कर कतिया ॥ १७॥ थोडे दी समयमे उख 
ध्षणेन तद्वरं सव्वं क्षिय नात महात्मना | मदात्मा सिह ने जो कि देनी का बाहन था छ त्यत 
तेन केशरिणा देव्या वाहनेनातिकोपिना: ९५ 
भ्रा तमघुरं देन्या निदतं धप्रलोचनम्‌ | भथ ५ 
= च क्षयितं शरनं देधीेश ध वाहन सिह द्वारा समस्त सेना के नाश का समा 
+, वति व व ^ ९॥| चार सुनकर ॥१६॥ दैत्यज शम्भ के होढ करं 
चुकोप दः ; शुम्भः; मरस्फुरतधरर कपनेलगे श्रौर उसने च॑डःसुंडनाम महान्‌ राकस 
तत्र गच्येत गला च सा समानीयतां ल १८१] ॥ ए ॥ उल वाल पकड्‌ कर असी ला ° 
केरष्वाङृष्य बद्ध्वा वा यदि व संशयो युधि। | बौध कर ले शात श्रौर यदि इसमे सन्द द 
वदारेषायुैः ' सर्ैरुरर्विनिहन्यताम्‌ ॥१६।/ तो उसे शेष अखं से सखव श्र मिलकर मा 


क्रोध करके ग्चसो फी सेन्य को नष्ट कर दाला । 
देवी द्वारा रैत्य धूम्रलोचन का मरण छीर देधी मै 
आज्ञापयामास च तो चण्ड ण्डः महासुरो ॥ ५ | ढो राक्षा दी ॥ १७॥ हे चंडः । हे सड! ठुम बहुः 
हे चण्ड है धएड वरबहुरः परिवारितौ । ` ।| खी सेना लेकर जातो श्नौर उसको शीर लाच 


३५४ मकर्टेवपुरांख [व 


तस्या हृदाया दृष्टया सहं चत पारित | डलं ॥ १६॥ उखं इण के सर जाने घर सिदिको 
भी मार डालना । यथा यदि होखक्ते दो उस 
शीघ्रमागम्यतां वहु्वा शीतः तासथाम्निकनाम्‌ २०; अस्विक को शीर वौधकरं ले तो १२०) 


इति श्रीमाङुरडेयपुराख मं सावर्णिक मन्वन्तर नाम < वां अध्याये समप्र । 


^ 4 
सतासीशं चध्कद्‌- :  ; „ ~: :5 
चऋषिसत्वान्ल -. ¦ ऋिवेके- क 
ततो दैत्याधण्डयुएड्युसोगसाः । . ` . ~ इस भग्र अला पाकर दत्य चरड ओर सुंड 
श्रह्ृष्ास्वु त गो ९ थक लुदरायु र | ॥ १ ॥ न तेतत्य से युरतसं अध्रुषः शीर चतुरि 
बरहरुतलापता  _ वदुरबयुच्दाद ¦ सेना लेकर चले ॥९॥ इसे वाद उन्हे दिमालय 
; ददृशुस्ते ततो देवीमीशद्धासां च्कस्थिताम्‌।! | > शिखर पर धि पर वैदी - हरे ` जीर ङयक 
सिंहस्योपरि शेलेन््रभृङ्ख महति काश्चन ॥२ ॥ सुस्कराती ड देवी कते देखा ॥२॥ उसे देखकर ते 


उसको ले जाने का उयोग करने .लगे, छ लुप 


५ ८4 


तैष्छम तां समादातुषुवसं चक्रस्यताः। | 
| । चङ्ाकरः तथा कृसरे तलवारलेकर उदके पास शये 
८ त्ङृषटापारिथरार्तयान्य तत्समा; ॥ ३। | परीत्व अस्विक रे उनं वैरकि भरति कपि च्या 
` ठतः कोपं दकासोैरभ्विका तानरीन्‌ मति । | शौर ऋोध से उसका मुख कलल. के समगत, रृष्ण 
फोपेन. चास्या पद्नं मसीवणेमभूत्‌ तदा ।। ४।॥| वर दयेयः 1० व टिल न 0 
| छं उस्म सस्य हाथस तलवार आर पाञ्च ङ्स 
भ्न इुटीड्विलात्‌ (| ठल्षाद्फदसष ह 
` ॐ इरी इविलात्‌ व | भयङ्कर सुल" वाली काली उ्पच्च इई ॥५॥ वह - 
सल्ल करदलिवदता ष्कन्ता }॥ ध | | धर ॥ दिष्थि् खट्वा धारण किये इष छौर सुर्डमाल्ल ५ 


: धिविन्रखद्वाङ्धरा नरया्तविभूषणा } | पदिने-इ् थी । खधस्वर ओह इण्ट शष्कं मासका 
` दौपचिन्येपरीषाना शुष्कमांातिभेस्क ॥ & ॥| उद अन्यन्त्‌ भयङ्क अदत दती थीः ॥ ९ ॥ वटः 


छिस्ठारददना `| अपने सुख से लस्वी जीम्‌ निकालेहुए, अति भीपरर्‌ 
ऋरि [| 9 
ेशिस्तारवदना, जिह्ललनभीपणा । , गदर लाल मेनेवादी चौर अपरे यजनते "दिम 


निप्र, रक्तनयना नादापूरितदिड्छसा 11 ७।॥| करो पूरित कर रदः थी ॥9\ वड बडे रय स" 
` सा-केोनायिप्रतिता. वा्तयन्ती महाश्रान्‌.।. | पर टर करः उनका खं्षर करनेलगीः रः सहसो 
सन्ये त्त्र स॒ररीणफाममक्षयदं तटूवलम्‌. 1} < |}! का स्ना में -चह उद्धे ५ दलं भद्रु १ | 
पार्णिगराहाव्छषवराहि- च्रं मदावतश्सदार आर धरा आदिक सष्ित . 
ग्राहाच्छशा 1 । . | थियो ते पय दाय.छे डी पकर उसने जपते 
समादायकट्स्तन इल अषप बार्लान्‌ ॥ € ॥| सुध मे उलि ॥*६॥ उसी कोरः योह को 
क्यं योधं तुरगं रथं सारथिनाः सह| | सवार्‌ खदित. आर सथो को साप्य सदिव उपने 
निक्षिप्य, दक्से दशनेशवव्वेयत्यत्तिभेरवष्‌ } १० | त स कर र उवा-डाल्ञ ॥१०५- ३ 
क क वाला से पकड्कर, किसी कों 
ग्रीदायाम ६, 
पकः जग्राह कु रतावान चापरम्‌ | `| यदभ्सेड्‌ कर, किसी को पाथा क नीचे दविर 
पडनाक्रम्यं चवान्यशुरखान्यमपोधयत्‌ ॥११॥॥ कर करीरः दृखर को वद्ठःस्थलः पर यहा करः 
तैयुक्तानि च शक्वाणि महाच्चाखि तथुरः भारः डाला 1:१९ ॥ च्द्धये दएय लये हुपटःमहान्‌ 
सुखेन ` जग्राह रुपा ` दश्नेमयितान्यपि ॥१२|/ च्ल, श को उने कोधित कर सुखे च 
ग बिना चवं कर दांतं खे पसं उाला 1 १२॥ उन वलीं शरीर. . 
उसि वर न्यगा. अद्रत्मनाम्‌ । | यड़े रक्सो केःदतं मे दे उने चकः मद कर. 
९ गम्रामक्षयच्नन्यानन्यात्ातादुयत्‌ त्य्‌ {| १ 2 खल कुं छः खानि शे सु को मारः उचो 


[न 
५९ 


& 


न> 


2 ~ 


अ, १ 


५. 


, अ० ८७ ३६ भाकरुडेयपुराण ३०४ 


पसिना निष्ताः केचित्‌ केचित्‌ सद्वाद्गतादिताः । | $ याच्तस तलवार से, छ खय्चाज्ग के महारसे 


दन्ताग्रामिहतास्त ओर छ दातो के श्रद्रभाग की चोट से मारे ज 
नणु्िनाशमसुरा =दन्ताग्रामहतास्तथा ॥१४ कर विनाश को पाठ दोगये ॥ १५॥ थोडी समय 


४ ठ ड 
पणेन तद्बलं सव्वेमपुर।णां निपातितम्‌ । | म काली ने गसो की समप सेना का नाया कर 
ष चण्डोऽभिदद्राय तां कालीमतिभीषणाम्‌॥११॥ दिया । सको देखकर चरड उस भीपश कालीकी 
शरयपहाभीमेभमाक्षी तां ` महाशरः । | भोर दीद १ 
~ आद्यामास क्ष धुण किते सहस्रशः ॥१६९॥ 1 ॥ ९ 
तानि वकरारयनेकानि विशमानानि तन्खम्‌। | दख पकार शोभायमान हो टे थे जेते मष क 
। वुयैषाकमिम्वानि सवन दखनादिनी घनोदरम्‌ ॥१७॥ की किरणे ॥ १७॥ फिर काली भीम नाद करती 
रतो नहाारिरषा भीम ता भनार्दिनी । श्रौर करोधसे श्रप्ना भयङ्कर सुख रीर दातदिसयती 
फाली करा्वक्त्नान्तदुशदशनोज्ज्यला ।॥१८॥ हुई हंसने लमी ॥९८॥ श्नोर मासि को उक 
उत्थाय च महाधिहं देवी चण्डमधादत ¡ | देवी चरड के ऊपर दीदी रीर उसके चाल पकड 
गहीत्वा चास्य फेरोषु िरस्तेनािनाच्छिनत्‌|१६॥| कर तलवार से उसका शिर काट लिया ॥.१६॥ 


धुर ^ ६ चरड को गिरते देखकर मुण्ड देवी पर भपरा 
भय दर्टोऽप्यपात्‌ तां दृष्ठ चण्डं निपातितम्‌ परन्तु उसको भी क्रोध करके देवी ने {तलवार से 


तमप्यपातयद्भूमौ सा सद्गामिहतं सपा ॥२०।| मार कर गिरा दिया ॥ २०॥ चण्ड शौर पराक्रम ` 


हतरोपं ततः सैन्यं टा चण्डं निपातितम्‌ । | सुंड के मारे जाने प्र शेष सेना भय से व्याङुल हो 
य॒ण्डश्च सुमहायीय्य दिशो भेजे भयातुरम्‌ ॥(२१।। कर थर उधर भाग गह ॥ २१॥ फिर काली चंड 
शिरथण्डस्य फाली च गृहीत्वा युण्डमेव घ । | शर सुणएड के शि को लेकर श्रभ्विका के पास 


र धार शरीर चरहृदासमिधित शब्दो मे बोली ॥ २२॥ 
भ्रा भचण्डाद्ृहास-मिश्रमभ्येत्य चण्डिकाम्‌॥२२॥ व व सवव भं 


` \ भया तवाप्रोपहृतौ चणढयण्टौ महापश.। । पदशो कौ त्रे लिये वलि दी हे । श्रव शम्भ 
युद्धयस्े स्यं शुम्भं निशुम्भश्च हनिष्यसि ॥२३। श्रीर निशुम्भ का वध तुम खयं करोगी ॥५३॥ 
ऋषिरुवाच रौ षि वो्ते- = ४ 
तावानीतौ ततो षट चण्डधुण्डी महासरो । उन महा श्रञुर चरड शोर शएड व 
उवाच कालीं फटयाणी ललितं चण्डिका वचः|॥२४॥ त व (0० 
यर्माचणएडजव युणएच शदीत्वा त्षुपागता । | लाई छो इसलिये हे देवि ! तुम चाुरडा गाम से 
चाघुएढेति ततो सोके ख्याता देवि भविष्यसि ।(२५॥; संसार मेँ विख्यात दरोगी ॥ २५॥ 


ति श्रीमाकैरडयपुराणमे सावणिकमन्वंतरके देवी माहासम्यमे चंडघंड वध नाम ८७बाँ अ स० । 
-- छ = 1 -4  । 


अटतीषां अध्याय 


ऋपिरुवाच शपि योल्ते~ र 

चरड च्रीर मुरुड ङे समरभूमि मे. गिरने पर 

चणटे च निहते दैत मुण्डे च विनिपातिते । तो 
बहुलेषु च सन्ये पयितेषवुरेश्रः ॥ ९। कै स्वामी ॥ १॥ प्रतापी शम्भ ने क्रोध से पना 
ततः कोपपराथीन-वेता; शुम्भः भताप्वानं | | मस्तिष्क सोकर दैत्या की सव सेना को तैयार 


उद्योगं स्वसैन्यानां दैत्यानामादिदेश ह्‌॥२॥ होने,केःलिये आ्र्ञा दी ॥ २॥ भ्राज उदायुध नाम 


२०६ । माकंश्ेयुराण -छ्म० ८८ 


------------------------------------ 
श्रय सन्वेबलेदत्याः षड्शीतिरुदायुषाः दैत्यो की चियासी सेनाये श्र. क्ब नामके ` 
कम्बूनां चतुरशीतिनियान्तु स्ववलंढ ताः ॥ ३॥ चौरासी दैत्यां की खय सेनां लड़ने के लिंथे चलं 


॥३॥ कोरिवीयं नाम राक्षसो के जो पचास कलहं 
को्वी््याणि प॑चाशदसुराणां लानि वै। | वे सब मेरी श्क्षा से चलं ॥ ४॥ कालका, दीहत, 


शतं लानि धौप्राणां निर्गच्छन्तु ममाज्ञया ॥ ४ ॥| मौय, कालकेय श्रादि जो श्रसुर ह वे- सव सीध 
` कालका दौहता मौर्या; कालकेयास्तथासुराः। | मेरी ज्ञा से युद्ध के लिये खजकर चलं ॥५॥ स 


९ प्रकार श्याज्ञा देकर राक्षसो का स्वामी, भैरव के 
युद्धाय सज्जा नियानतु आ्ञया तरिता मम॥ ५॥| समान श्न वाला वद शम हजारो सना ो 
इत्या्नप्याघुरपतिः शुम्भो भेरवशासनः । | केकर चला ॥ ६॥ उस शत्यन्त भयङ्कर सेना `को 


निनज्ज॑गाम महासेन्य-पदस् बहुमिष्ट त; ॥६ ॥|| शाते हण देखकर चणिडका ने धनुष को चट़ाया 
आयातं चिका दा तद्‌ सैन्यमतिभीषणम्‌। | जिसके शबद से समप पृथ्वी शरोर आकाश व्यास 


। ] स्दिनेभीमदा- 
। छ्याखनैः पूरयामास धरणीगगनान्तरम्‌ ॥ ७ ह व अपे 
ततः सिंहो महानादमतीव द्तवान्‌ रप । | धरे ॐ शब्द से श्चौर भी बढ़ा दिया ॥८॥ धनुष के 


धघण्टाखनेन तान्‌ नादानम्विका चोप यत्‌ ॥ ८॥॥| शब्द, सिद की गजना, ञ्रौर घरटे के भीषण शब्द 
धलुर्यासिहथण्यानां शब्दापूरितदिड्ुखा । | से सव दिशाय पूटोगई' श्नौर उस शब्दने काली 


के गजन को भी ॥६॥ उस्र शब्द को 
निनादभीषणेः काली जिप्य विस्तारितानना॥। & ॥ १ शकर देवे सिद 


तं निनादमुपश्रुत्य देत्यसन्येधतर्दिशम्‌ । | शरीर काली को चारों तरफ से ५ ॥ १० ५ 
देवी सिंहस्तथा कासी सरोषैः परिवारिता ॥१०॥| डे राजन ! उसी अवसर पर रासोका नाशं कर 
एतस्मिन्नन्तरे भूप षिनाशाय सुरद्िषाम्‌ । लिये शौर देवताओं का कल्याण कएने के छिथ 


रो \ » 
भवायासरसिंहानामतिवीर्यैवलान्विताः ॥११॥ प श न 


व्रह्मश-गुह-षिष्यूनां तथेन्द्रस्य . च शक्तयः | कर उन्दी का रूप धारण करके चरिडका के पास 
शरीरेभ्यो विनिष्क्रम्य तद्पशचस्डिकां ययुः ॥१२॥| भाई ॥ १२॥ जिस देवता का जो रुप, भूषण रोर 
यस्य देवस्य यदरपं यथा भूषणवाहनम्‌ । वाहन था उसी उसको धारण करके उसकी शक्ति 


अरर से युद्ध करने को श्राह ॥ १३॥ ंसयुक्त 
तद्वदेव हि तच्चक्तिरसुरान्‌ योदुधुमाययों ॥१३॥ बिमान पर वैरकरं श्रीर हाथमे माला तथा कर्मंडक्त 


हंसयुक्तपिमानाप्रे साक्षसूत्रकमण्दलुः । | लिये हण ब्रह्मा की शक्ति ब्रह्माणी श्राई' ॥ ९४॥ 
श्रायाता बरह्मणः शक्तव्रह्याणी साभिधीयते | १४। वैल पर सवार होकर दामे खुन्दर भरिश्ल धारण 
महेश्वरी दृषारुूदरा त्रिशरूलवरथारिसी । | किये हप, युजा म महापा को लपेटे श्रौ 


महाहिवलया पराठा चन्रलानिभूषणा ॥१५॥| चन्र भन पन शिवजी की श मादिव) 


श्रा ॥ १५ ॥ दाथ शक्ति लिये हृष्ट, न्दर मयूर 
कमारी शक्तिहस्ता च॒ मयरवरवाहना हना | . | पर सखवार दोकर स्वामिकार्तिकेयकी शक्ति कौमारी 


योट्धुमभ्याययों दत्यानम्बिका गुहरूपिणी १६। १ 1 फो आह ॥ १६॥ इसी प्रकार गरड 

, तथेव वैष्णवी शक्तेगरुो पर स्थित होकर शंख, चक्र, गदा, शाङ्ग, खड्ग 
त एवी शक्तिगरोपरि संस्थिता । | य म तिये इष निष की वेष 

। गदाशा -खड्गहस्ताभ्युपाययां ॥१७॥| उपस्थित इई ॥ १७॥ शरीर यश्चवाराह का श्रतुर 
¡ यज्ञवारादमतुल सूपं ॑या बिभ्रतो हरे; । | सूप धारण करने बले विष्णु भगवान्‌ की -शक्तिभी 
शक्तिः साप्याययौ तत्र वाराहीं विघ्रती तचुमू्‌॥१८॥|| बारा रूप से चा चराई ॥ १८ चरसि की शक्ति 

¡ नारसिंही टृिदस्य विभ्रती सदशं .शपुः नारसिदी भी चरसि के सदश शरीर धारण कर 
~= प्राप्ा तत्र ९ दे च्मौर श्रपने भ॑ंडेको श्माकाशमे फदसया कर 
सयाक्तप-किपनक्ष्रसंहतिः -॥१६॥ नक्तो को श्रलगअलग करने लमी ॥ ९९॥ इसी. 


श्र° ८८ माकंरेयपुराण ३ ४७ 


व 
वज्रहस्ता तथेवैन्रौ गजराजोपरिस्थिता | ।, मकार हायर व्च जतिये हर श्रौर गजराज पेरावत 
भारा दल्नयना य = पर वार होकर सदसनेचा एन्द्री श्राईै जिखका 
ह था शाकरस्तथव सा ॥२०।॥| खूप वैसाही यी जैसा कि इन्द्र का ॥ २०॥ उस 
ततः प्रिषटतस्तामिरीशानो देवशक्तिभिः । | समय च के साथ पहादैवजीभी आपये 
हन्यन्तामदुराः शीधर' मम प्रीत्याह चं | चौर चरि छे वोले मि. सु भसन करने 

। छराः शौ त्याह चंडकाम्‌ ॥२१। के लियिश्रष्ठरो को शीघ्र मासे॥ २९॥ फिर देवी 
ततो देवीशरीराद्‌ ठ विनिष्कान्तातिभीषणा । | के शरीर से अत्यन्त मीय, उग्रशक्तिवाली सेक 
चर्डिकाशक्तिरतयुग्रा शिवाशतनिनादिनी ॥२२॥ र 1 हर निकली ॥ २२॥ तव शप 
राजिता देनी धूम्रवणं, जखाधारी महादेवजी से 

सा चाह पूम्रनटिलिमीशानमयरानिता । | बोली, “दे मगवन्‌ } चाप शम् ्रर चिशयभ्म के 
दूतत्वं गच्छ भगवन्‌ पाश्वं शुम्भनिशुम्भयोः | 1२३ | पास दून वनकरः जाँय'”॥ २३ ॥ प्नौर द्भिमानी 


४ ध चितौ शम्भ, निशुम्भ तथा अन्य दानोँसे जो बां युद्ध 
बहि शुम्भं निशम्भंच दानवावतिगन्धित | | के हिथे उपस्थित हो उनसे किये २५ इन्द्र रव 


ये चान्ये दानवास्तत्र युद्धाय सषठपस्यिाः ॥२४।|| जिलोकी का राय करेगे शौर दैवता पनेापने 
्ैलोक्यमिन्द्रो लमतां देवाः सन्तु हविर्थुनः। | यक भाग को लगे । यदि लुम लोग जीवित  रदना 


वा ह जीवितुमिच्छय चाहते हो तो पाताल को जाश्रो ॥२५॥ यदि तुम 
पू भया पतच यदि नीवितुमिच्डय ॥२१॥ लोग धन्त के श्रहङ्कार से युद्ध करना चाहते हो तो 


बलावलेपादथ चेद्वम्तो युद्धकाञ्क्षणः। | ्ा्नो शौर रपे मांस से मेरी शिवाश्च की दि 
तदागच्छत दप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन च; ।॥२६॥| करो 1२६] जो कि देवी ने स्वयं शिव फो दुतकार्य 
यतो निक्तो दौत्येन तया देव्या शिवः खयम्‌। | ॐ लिये नियुक्तं किया इसलिये इस लोक मे वह 


¦ सा ख्यातिमागता २७॥ शिवदूती के नाम से मसिदध हह ॥ २अ॥ उन मदान्‌ 
(शिवदूतीति सोकेषिसस्ततः सा ख्यातिमागता २ ० 


(ऽप भुला वचो देव्याः स््वास्यातं महाघुराः। | मं पं चो उधर की शोर अस्थान किया निधर कि 
भ्रमरपपूरिता जगु्यतः कात्यायनी स्थिता ॥२८॥ देवी (कात्यायनी) मौजूद थीं ॥ रम ॥ ओर उन्दोने 


ततः ‡ प्रथम ही क्रोध से उन्मत्त होकर देवी के ऊपर 
; यममेव शरशकतयषषटिमि | वासो भ्रीर शक्तियों की वषा प्रारम्म करदी ॥२६॥ 


स । र रौ 
ववुरुदता देवीममरारयः ॥२६॥ परन्तु दैवी ने रलस पे चलाघे वार्‌, शल, शकि 
साच तान्‌ प्रहितान्‌ पणान्‌ शूलचक्रपरधधान्‌। श्नौर पर्ण को खेल मे दी च्रपने धनुप के तीच 


(१ 
~ ; ॥२०॥ बाणौ से काट दिया ॥ ३० ॥ इसी भकार देनी के 
1 धद १९०५ चलाये हए भस को रासो ने काट डाला । उस 


तस्याग्रतस्तथा काली शूलपातविदारितान्‌ । | समय काली श्रपना श्ल श्रौर खयवाङग सिये युद्ध 
सटवाङ्गपोधि्ताथारीन हव्वेती भ्यचरत्‌ तदा॥१११।॥| देच मँ बिचरने ह ४ ब्रह्मालीं इधर 
कमर्डलुनलाेप-द । उधर धूमकर शच्च पर अपने कम्रडलु का जल 
पहतवी्यांन्‌ इतीनसः । चिडकती थी जिससे कि वे हतवीयं श्रीर तेजदीन 
्रेह्याणी चाकरोच्छत्रून येन येन स्प धावति २२] दोजाते थे ॥२९ ॥ माद्री न चिश्ठल से, वैष्णवी 


मादिश्वरी ब्रिशुलेन तथा चक्रेण वैष्णवी! | ने चक्र से धर कमारी ने शकतिसे अत्यन्त क्रोध 
ॐ शकत्यातिोपना ३३॥ करके श्रसुरों को मारा ॥ ३३॥ रन्द्र के वच्च की 
दैत्यान्‌ जयान कौमारी तथा व व| 
रेदरीलिशपातेन शतशो दंत्यदानवाः। क्तो प्रवाहित करते हु पृथ्वी पर गिर पड़े ॥ ४ ॥ 


¦ † शधिसैवपवर्षिणः ॥३४॥ बारादी शक्ति के चुएड मार से विध्व होकर, 
७ = क उनकी डाद्‌ से डातियां पट फट कर, श्रौर उनके 


हण्महारिष्वता दषम्रषतवक्षसः । क्र से अनेक राक्षस कटक करः पृश्वी पर गिर 
वराहपूर्या स्पपतेवक्रेए च विदारिताः ॥२१॥. टे ॥ ३९॥ नारसिदी इव रसो को नसत से 


३०८  मांणडयएुराण अ» ८८ ` 


नदेरविदारितांथान्यान्‌ भक्षयन्ती महाशुसन्‌ | ` ] षिदीरं करती इह श्नौर दुखं करो भक्त करती 


ही नै दिर इई रणभूमि मे विचसने लगी तथा उसके नाद से. 
र श नि ॥९९॥| सव दिशायं गू उदीं ॥२६॥ कितनेदी राक्तस भिव" 
वण्डाट्हासेरमुरयः र १ | दूती देवी के भचरड अदास से दूषित दोकर 
पतुः पृथिव्यां परतितास्ताश्चखादाथ सा तदा ॥२७॥॥ नीर ऊच विदीरं द्योकर पृथ्वी पर गिर. जाते थे , 


इति माक्गणं क्रद्धं महयन्त महामरान्‌ । जिनको कि ध व सी \ ३७ ॥.इस 

प्रकार कद्ध दोकर श कीसेना का 
द्यवे नुदेवारिसेनिकाः  ॥२८॥ संहार किया ! शेष राक्षसो की सेना देषि्यो का 
पलायनपरान्‌ दषा द्यान्‌ मादगणार्हितान्‌ । | कोय देखकर भाग खड़ी ह ॥ ३८॥ शक्तियों से 
योद्धमभ्याययौ क्रदो स्तवीजो महासुरः ॥२६॥ मर्दित दैत्यो को भागते इए देखकर रकतवीज नाम 
रक्तबिन्दुर्यदा भुमौ पतत्यस्य शरीरतः का मदान्‌ राकस पित होकर युद्ध करने को ` 
समुयवति मेदिन्यास्तखमाणस्सदासुरः ॥४० माया ॥ ३६ ॥ उस यक्चस के शरीर से जो रकत.षी 
युधे स॒ गदापाणिरिनदरशक्त्यां महासुर 


चद पृथ्वी पर पड़ती थी उससे उसी आकार कां 
एक श्रौर श्रस्ुर पृथ्वीसे उत्पन्न होजाता था ॥४०॥ 
ततथेनद्री स्ववजण रक्तवीजमताइयत्‌ ॥४१॥ 

दुलिशेनाहतस्याश् तस्य युस्ाब शोणितम्‌ । व । 
रक्तवीज् को.ताडन क्रिया ॥ ४१॥ वल से श्राहत 
होने पर राक्षस के शरीर से सरुधिर वंह निकला 

तावन्त; पुरुषा नातास्तद्रीष्यवलविक्रमाः ॥४३॥ व 
ते चापि य॒युधु रक्तसम्भवाः ॥ (14 १ थीं उसके बल पराक्रमं 
न के समान उनमें से दैत्य उत्पन्न होजाते थे ॥ ४२॥ 
ववाह रक्तं पुरुषास्ततो जाताः सरस्रशः ।४५।॥ बीज का शिर वज्ज खे काटा गया तो उसमे से 
वैव्णधी समरे चैनं चक्रेणाभिजघान ह | | रुधिर बद.निकला जिससे हजारों रक्तबीज -पेद्‌ा 
:| अहार किया ॥ ४६ 1 जव वैष्णवी ने. उसे वक्र से 
सहस्रशो जगदा तसमाशेभेदासुरे; ॥४७।॥ काटा तो उसके खधिर से -उत्पन्न हज्ञारो उसी 
वारादी ने तलवार से श्नौर माहेश्वरी ने त्रिशूल से 
स चापि गदया दैत्यः सव्वां एवाहनत्‌ पृथक्‌ । | भारा ॥४८॥ तव मदादैत्य रक्तवीजने भी क्रोधित 
से जो रक्त पृथ्वी पर गिरा उससे सेकडों रक्तबीज 
पपात यो बँ रक्तोषस्तेनासञ्छतशोऽपुरा; ॥५०॥| उतपन्न रोगये ॥५०॥ धीरिधीरे उस सुर के रक्तसे 
भिपण्णान्‌ सुरान दृष्ट चंडिका मराह्त्वरा! | उन देवताश को व्याङुले देखंकर श्चरिडिका -दैबी 
`, करतीं चाष्ुरडे विस्तरं वदनं कर ॥५२।॥। ने काली चामुंडा देवी से कटरा कि तुम श्रपना सुख 


चह महाञ्चुर दाथ मे गदा ज्ञेकर इन्द्र की शक्ति से 
युद्ध करने लगा । इसपर पेन्द्री. ने श्रपने वन्न से 
सत्तस्थस्ततो योधाम्तद्रपास्तत्पराकमाः ॥४२॥ 
यावन्त; पत्तितास्तस्य शरीराद्रक्तविन्दवः जिससे कि उसी रूप नौर पराक्रमे नेको योधा 
प्रगट द्योगये ॥४२॥ उसके शरीर से जितनी रक्तकी 
समं माठ्मिरप्यु्-शस्पातातिभीषणम्‌ । ४४।॥| रक्त से उत्सन्न च हत्य यहाँ पर भीषा `श्मपात 
पुनश्च वजपातेन क्षतमस्य शिरो यदा| | करके शक्तियो से लड्‌ रहे थे ॥४४॥ फिर जव रक्त 
होगये ॥४५॥ युद्ध मेँ वैष्णवी शक्ति ने उसे चक्र से 
गद्या ताडयामास देनी तमसुरेश्वरम्‌ ॥४९। || ताडित किया श्नौर णेन्द्र ने रक्तबीज पर गदाकां 
वेष्एवीचक्रभिन्नस्य रुधिरस्रावसम्भवेः । 
शक्या जघान फौमारी वाराही च तथासिना] | श्राकार वाल रक्तबीजं से जगत व्यात्‌ दोगया ॥ 
म्रौ विशूतेन रक्तवीजं महासुरम्‌ ॥४८।|| उख हान तय रकवीज को कौमारी ने शकि से 
मात कोपसमापिष्ठो रक्तवीजो महासुरः ॥४६। दोकर सब शक्तियो. पर गदा से प्रहार किया ॥४६॥ 
तस्याहतस्य वहुधा शक्तिशूलादिमिरवि । शक्ति शल शादि से घायल होने पर उसके शरीर 
तेथासुछसम्भूतरुरेः सकलं ` जगत्‌ । ` | निकले हण रकवीज दैत्यौसे समस्त संसार व्यातं 
^ व्याप्तमासीत्‌ ततो देवा भयम्राजग्ुरुत्तमम्‌.॥५१। दोगया तव देवतानां को भय उत्पन्न इया ॥५१॥ 


भ्र» ८६ माषरडेयपुरोशं ३०६ 


भच्यल्ञपातसम्भतान्‌ रक्तिन्द्न्‌ महासुरान्‌ । | शैलाशनो ॥ ४२॥ मेर शोके लगनेसे जो रकि 
9 रषु दैत्यों से उत्पन्न दयँ उनको तुम शी श्रपने मुखम 
रक्तबिन्दोः भरतीच्छ तव॑ वक्सरेणानेन पेगिता॥५३॥| ले क्षिया करो जिससे कि वे पृथ्वी पर न गिरने 


भक्षयन्ती चर रणे तदुत्पन्नान्‌ महासुरान्‌ । पाव ॥ ५३॥ रक्तवीज फे रुधिर से उत्पन्नहुए दैत्यो 


। ५ को तुम भक्षण करती म चिचसो । 
। एवमेष क्षयं दैत्यः क्षीणरक्तो गमिष्यति ॥५४॥ यद दत्य क्षीणरक्त ५५ नतो पत्त 0 


भकष्यमाणास्त्या चोग्रा न चोत्पत्स्यन्ति चापरे५१॥| जिन दैत्यो को सम भक्षण कर्‌ जाञ्नोगी उनसे 
दूसरे रक्तवीज उत्पन्न न दो सकेंगे ॥ ५५॥ काली 


इत्युकत्वा तां ततो देवी शूलेनाभिजघान तम्‌ । | से यह कहकर देवी न रक्तवीज को शल घे माय 


ज श्रीर उसके रुधिर को काली ने श्रपने मुख मे से 
एखन काली नच रक्तबीजस्य शोणितम्‌ ॥५६। लिया ॥ ५६ ॥ फिर रक्तवीज ने चरिडक देवी को 


ततोऽघावाजघानाथ गदया तत्र चण्डिकाम्‌ । | गदा से मारा परन्तु उनको उस गदा के भदार चे ' 
न चास्या वेदनां चक्रं गदापातोऽलिपिकामपि ॥५७॥| तनिक भी वेदना न इई ॥५७ ॥ रफ्तवीजके घायल 
तस्याहतस्य देहात्‌ तु वहू सुस्राव शोणितम्‌ । | शरीर से बहुतसा धिर निकला परन्तु उस सव 


को काली चापरंडा ने श्रपने मुख मे ञे लिया ॥५२॥ 
यतस्ततस्तद्कत्रेण षा्ुण्डा सम्प्रतीच्छति ॥५८॥॥| रवत के यतित ज पिय काद ऊ १ 


से समद्रा येऽस्या रक्तपातान्महासुराः । | उतयनन होगये उनको चामुंडा साग शरीर छनके ' 
तांधखादाथ शरायुण्डा प्रपौ तस्य च शोणितम्‌॥५६॥ शोणित को पान कर गह ॥ ४६॥ फिर उस रक्त- 


ल वालेरसिभिश्यमरिभिः वीज को दैवी ने ब्रिश्रूल, पञ्ज, वाण, तलवार शरीरं 
देवी शूलेन वज्ञ ण वाणरसिमिद् भिः । ऋषियों से मारा चौर चामुरुडा ने उसका रुधिर 


जघान रक्तवीजं तं चाञुर्डापीतशोणितम्‌ ॥६०॥| पी लिया ॥ ६० ॥ हे महीपाल ¡ फिर बद मंहावैतय 

. स॒ पपात मदीपएष्ठे शश्चसटसमाहतः । व ध से 1 श खधिरदीन - 

नीरक्त $ पृथ्वी पर गर पड़ा ॥६१॥ हे राजन्‌ । उस समय 

मदीपरल एकतवीनो महापुरः ॥९१॥ देवतां को श्रत॒ले श्रानन्द्‌ हुश्मा श्चीर उनसे 

ततस्ते ` हपमतुलमवापुचचिद्शा टेप । | उत्यन्न शथितयां उनमततदो रुधिर पी षीकर नाचने 
तेषां मादृगणो जातो ननत्ताख्द्मदोद्धतः ॥६२॥| लम ॥ ६२॥ 


इति भ्रीमाकण्डेय०में सावर्णिकमन्वन्तरम देवीमाहात्म्य मेँ रक्तवीजवध नाम ८८वाँ न° घ०। 


> 
नवीं अष्याय 
राजोवाच रजा वेत्ते- 
विचित्रमिदमाख्यातं भगवन्‌ भवता मम । हे भगवन्‌ { आपने यह विचित्र वणंन मुभे 


धरितमाहात्यं प देवी ॐ चरिघ, माहात्म्य श्रौर रक्तवीज के वध 
: देव्या रक्तवीनवधाभरितम्‌ ॥ १॥| का खुनाया ॥ १॥ श्रव तै बह नने की श्छ 


भूययेच्ाम्यहं भोतु रक्तवीने निपातिते। | करता हं जो कि रकतवीज के मरनेपर करद र : 
चकारं शम्भो यत्‌ कम्म निशुम्भ्वातिकोपनः॥ २॥| श्प शरोर निश्॒स्म ने किया ॥२॥ 
2 र रवतसीन के पतन होने रौर अन्य असुरो के 
1 रक्त 
चकार कोपमतुलं स्कवीजे निषातिते। ~ 
-एम्भाषुरो निशुम्भ हतेष्वन्येषु ह चाहवे ॥२॥ किया ॥ ३ ॥ पनी विशाल सेनाको नट श्रा ३ 
हन्यमानं महासैन्यं विलोक्यामपयुद्हन.। | कर क्रोधित टो निशुम्भ श्रपनी सुख्य सेना ` 


1 
~ “4 
"1 


-३१० माकौरठेयपुराण अ ८६ ` 


अभ्यधावन्निशम्भोऽथ इख्यया्सुरसेनया ॥ ४। लड़ने को दौड़ा ॥४॥ उसके ्गे.पीचे तथा गल 


तस्याग्रतस्तथा पृष्ठे प्ाश्वंयोश्च महरा; वगल चारों तफ महादैत्य क्रोधित होकर देवी 
सन्दष्टषठपुटाः करदा हन्तं देवीष्ुपाययुः ॥ ५॥ को मारने को दौड़े ॥ ५॥ महाबलवान्‌ शुम्भ की 
आजगाम महावीय; शम्भोऽपि खवसै्तः । | अपनी सेनां को केकर चरिडकाको मारने प्रीरः 


यदधः शक्तियो से युद्ध करने के लिये श्राया ॥६॥ फिर 
निहन्तुं चणिकां कोपात्‌ ता यदन्त मातभिः॥ ६ देनी नौर व 


ततो युद्धमतीवाषीदेन्या शुम्भनिशुम्भयोः । | शरोर से मेयो ॐ समान वाणो की चषा हो रदी थी 


शरवपंमतीषोग्रं मेघयोरिव वबपंतो; ॥ ७॥| ॥७॥ चंडिका > श्रपने वासोंसे उन त्यौ ॐ तीरों 
चिच्छेदास्ताञ्चरांस्ताभ्यां चण्ठिकाश शरोर; | को कार डाला श्नौर श्रपते शसो से उन दैत्यराज 
तादयामास चाङ्गेषु शखोधेरुरेश्वरौ ॥ ८ ॥ ॐ शरीरौ को ताडन किया ॥ ८॥ निश्यम्भ ने परभा 
निशम्भो निशितं खडगं चम्मं चादाय सुपरभम्‌। | युक्त ढाल श्रौर तलवार लेकर. देवी के उत्तम 


अतादयन्ूर्दिध सिंहं देव्या वाहनधटुत्तमम्‌ ॥ ६ ॥ वाहन सिह के शिर भे परहार किया ॥ ६॥ सिद के, 


ताडिते वाहने देवी श्ुरपेणासिणत्तमम्‌। | आहत दोने पर देवी ने शीघ्र निशुम्मकी तल्तत्रार 
निशुम्भस्याश चिच्छेद चमप चाप्यष्टचन््रकम्‌॥१०॥ दाल श्नौर चन्द्रा्टक को काट डाला ॥ १०॥ ढाल 
चिज चर्मणि खड्गे च शक्ति चिक्षेप सोऽषुरः। | रौर तलवार के द्टने पर श्रदुर ने प्क भक्त 
तामप्यस्य द्विषा चक्र चक्रणामिषुखागताम्‌ ॥११॥ कर ले ॥९९॥ क्रोधयुत होकर पिर निथ्म नै 
कोपाध्मातो निशुम्भोऽय शूलं जग्राह दानवः । | श्ल चलाय! जिसको कि देवी ने अपनी सुटि 


फकी जिसको भी देवी ने पने चक्र से दो इकडे . 


र 


आयातं पषटिपातेन दैवी. तचाप्यचणयत्‌ ॥१२॥ चूर कर डाला ॥ १२॥ फर उसने ' चरिडका पर 


आविध्याथ गदां सोऽपि चिक्षेप चण्डिकां परति! | गदा चला नौर उस गदा को भी देवी ने वरिशल ` 


सापि देग्यां त्रिशूलेन भिना भस्मत्वमागता ॥ १ र ॥ सं काटः कर भस्म कर दिया १३ ॥ पतिर [411 (:॥ 
ततः परणुदश्तं॑तमायान्तं दैत्यपुङ्गवम्‌ । | परा केकर श्राति हः उस दैत्य को देवी ने वांसो 
शराहस्य दैवी षाणौवेरपातयत भूतले ॥१४॥| से वेधं कर पृथ्वी.पर भिरा दिया' 1 १४॥ फिर 


तस्मिन्‌ निपतिते भूमौ निशुम्भे भीमविक्रमे 1. | पराक्रमी निश्म्म के भूमि पर गिरते टी उसका ` 


¦ भाई शुम्भ अत्यन्त क्रोध करके ्रम्विकाको मारने 
भरातयतीवकदधः भयौ इन्तुमम्निकाम्‌ ॥१५॥ ऊ क्लिये श्राया ॥ १५॥ वह रथ पर वैठ कर अपनी 
स॒ रथस्थस्तथात्येश हीतपरमायुधेः । स 

ध ॥ श्राठों सुजान मे परम श्रस्-शसख्रोको धारण करता 
यनेरष्टाभिरतुलेग्याप्याशेषं वभो नमः ॥१ दुश्रा ्राकाश को शोभायमान करने लगा ॥ १६॥ 
तमायान्तं समालोक्य देवी शंसमवाद्यत्‌ । | उसको श्राति हु देखकर देवीने शंख बजाया श्रौर 
इषागब्दश्चापि धयुषथकारातीव दुःसहम्‌ ॥१७॥| धदुष खीचकरः श्त्यन्त दुःसह शब्द्‌ किया ॥१७ ॥ 


उम्टोनि श्रपने घरे के शब्द से समस्त दिशां - 


पूरमामास कुभो निनयण्टासमनेन च। | कव्या कर दिया रौर उख समय रेखा अतीत 
समस्तदैत्यसेन्यानां तेनोवधविथायिना ॥१८॥| होने लमा कि अरव समस्त दैत्य सेना के बध का 
ततः सिंहो महानादैस्त्याजितेममहामदे; । ` | विधान हो मया है ॥ ९८ ॥ किर सिह भी मदानाद्‌ 
पूरथामास गगनं गां तथोपदिशो दश ॥१६॥ करने लगा जिससे-कि समस्त आकाश, पाताल 


ठतः काली समुत्पत्य गगनं मामताङ्यत्‌ | | ने शाका भ उदु कर दोनों हाथ पृथ्वी परार 
कराभ्यां तन्निनादेन प्राक्स्वनास्ते तिरोहिताः२०॥॥| जिसका कि पदिली गरजसे मी. शरथिक शब्दं हुमा 
ˆ< ~ - वं . शिवदूती चकार ह। ।॥२०॥ फिर शिवदूती ने भयङ्कर -अद्धदास किया 


छ्नौर दशो दिशाये व्याप्त होगई ॥ १६ ॥ फिर काली - 


- श्र०८६ माकंरर्यषुराए =, २११ 


= ----न~----------__-_____-~-~-~-~----~ 
तैः शब्दैरसुरासेषुः शुम्भः कोपं प्रं ययौ ।२१॥ जिसके शृष् से दैत्य भयभीत होगये शीर शसम 
दुरात्म॑स्तिष्ठ तिष्ठेति व्याजहाराम्बिका यदा | ९ (1 8 व 
॑देवैराकाशसंस्थतैः दुरात्मन्‌. * तनिक ठहर ।* उस समय श्राकाश 

तदा जयेत्यभिहितं दषराकाशसंसयितः ॥२२॥ स्थित देवतानं ने जय-जयकार किया ।२२॥ शुम्भ 
शुम्भेनागत्य या शक्तिणुक्ता ज्वालातिभीषणा । | ने क व 4४ भीयण॒ शक्ति 
चलाई । देवी नेश्च र के समान श्राती हुई 

। श्रायान्ती वदिदरटाभा सा निरस मोस्कया॥२३। उस शक्ति को महोल्का नाम अखसे कार डाला ॥ 
‡ सिंहनादेन शुम्भस्य व्यं लोकत्रयान्तरम्‌ । 1 उस समय तीनों लोक व्याप्त 
निषतमिछतो | होगये । हे राजन्‌ ¡ उस भीषण शब्द से सव लोग 
निधातनिस्वनो धोरो भितवानवनीपते ॥२४। धरां गये ॥२४॥ शम्भ के चलाये हए वाणोंको देवी 
शुम्भक्ताज्यरान्‌ देषी शुम्भस्तत्महिता्डरान । | ने शौर देवी ध ह हप ार्णोको शुस्मने श्चपने 
विच्छेद सशरश { |२१५।॥| तीर्ण वाणं से सेकडां हजारो इकडे-टुकडे करः 
चिच्छेद सशरः शतशोऽ्य क इले ॥ २५॥ फिर चरिडका ने क्रुद्ध होकर उसे 
ततः सा चण्डिका क्रुद्धा शूलेनाभिजघान तम्‌ । | शल से मारा । तव बद उससे चोर खाकर भूदधित 

स तदाभिहतो भूमौ भूच्ितो निपपात ह ॥२६॥ दो परथ्वी पर गिर पड़ा ॥ २६॥ उसी समय निशं 
ततो निशम्भः सम्भाष्य चेतनामा्तकाम्पंकः । | ने दोण मे आकर धनुष दाथ मे लिया श्र वाों 


र रिणं से दैवी, काली रौर सिह को मारने लगा ॥ २७॥ 
भ्राजयान श्रदवीं कालीं फेशरिणं तथा ॥२७॥| र दरं दानिन ने दस हजार भुजाय धार्य 


पुनश्च श्वा बाहूनामयुतं दसुजेश्वरः। कर उन सव भँ चक्रायुधं लिया श्नौर चरिडका 
चक्रायुधेन दितिजश्यादयामास भरण्डकाम्‌ ॥२८।॥| देवी को ्राच्चादित कर दिया ॥ २८ तव दुगति 


ततो भगवती करुद्धा दुगा दुगोततिनाशिनी । त व ॥ 


। € विच्छेद तानि चक्राणि स्वशरोः शायकांध तान्‌॥२६| से काट जला ॥ २६॥ किर निशुंभ वेग से गदा 
ठतो निशुम्भो वेगेन गदामादाय चणििकाम्‌ । | लाकर दैत्य सेना के साथ चरिडका को मारने को 


इन्त ; || दौड़ा ॥ ३० ॥ चरिडका ने उसकी श्चाती हुई गदा 
भ्भ्यधावत वै दन्तं । व 1 ०॥| को श्प तीर्ण धार चाले सङ्ग से कार गिराया 
तस्यापतत एवाशु गदां चिच्छेद चण्डिका । | फिर शरद्ुर न शटल को लिया ॥३९॥ देवता के 


, खद्गेन शितधारेण ख च शूलं समाददे ।२३१॥ वैस निशुम्भ को शूल हाथ म लिये आता इश्या 
शूलदस्तं समायान्तं निशुम्भममरादनम्‌ । | देखकर चरिडका ने उसकी चुती म अपना शल 
दि विव्याध शूलेन वेगाबिद्धन चण्डिका ॥द२॥| भाय ॥ *९॥ ल से बेधित दते ही उसकी घाती 


भिन्नस्य तस्य शेन हदयान्निःखतोऽपरः ! | स पक इसरा महाबली नीर पराक्रमी दैत्य “से 


~ ५ वदन्‌ ।३३। छदे” यदह कहता इथा 1 ॥ ३३ ॥ उसको 
क ४ 1 । निकलते हुए देखकर देवी बहुत देसी श्रीर उसने 
तस्य निष्कामता द्वा प्रहस्य स्वनवत्‌ उस दैत्य का शिर कार कर उसे पृथ्त्ी पर शिया 


=“ रिरभिच्छेद खड्गेन ततोऽसावपतदशर ॥३४॥| दिया ॥ २७॥ तब दिद ्रपनी उग्र दष्टो ले 
ततः सिहथसादोग्र-दष्क्चएणशिरोधरान्‌। | शरीर काली तथा शिवदूती उनके शिर, धङ्‌ शीर 


५ ॥२१॥| अन्य रात्तसों को खागदईे ॥ ३५॥ क दैत्यो को 
भषरास्तास्तथा त ध कीमारी ने श्रपनी शक्ति से कार डाला 
कौमारीशक्तिनिर्मि्ाः केचितेशमहासुराः बरह्माणी ने अपने अभिमिन््रत जल से दवितते दी 


ब्रह्माणीमन्त्रप्तेन तोयेनान्ये निराङृताः ॥३६॥ श्रखसो को भस्म कर डाला ॥ २६॥ विने दी 
मदिश्वरोनरिशजेन भिना; पेतुस्तथापरे! | घुर मादेभ्वरी के श्ल से कट कर परथ्वी पर गिर 
, ब्राराहीतुण्डातेन केषिधरणीषता श्वि ॥२७॥ पडे शरोर कध वारादी की तड के भार से ,चूरं 


३१२. ध माकर्टेयपुराण -श्र० ६० 

। ¦ करता । .| दोगये ॥ २७॥ कख दानवो को वैष्णवी ने.चक्र से 
व धकरण 1 ध | काट कर टुकडे-टकडे कर डाला रौर $ न्द्री 

वज ण चेन्द्रीदस्ताग्र-षिषुक्तेन तथ कै वञ्च से हत होगये ॥ २८ ॥ दस प्रकार धहुतेसे 


केचिद्धिनेथरसुराः फेषिन्रष्टा महाहवीत्‌ । १५ नष होगये श धुत से र्ण .से म य) 
भकषिताश्वापरे काली-शिवदूती-एृगाधिपेः ॥२६॥ त ५० च १ शिबदूी ५ सि 


इति श्रीमाकण्डेय०्मे सावर्णिकमन्व॑तसमे देवीमाहात्म्यमें निशुभवधनाम ८&्बँ अर सऽ) 


नब्बेवं अध्याय 
पषिरखवाच ऋषि बोल्े- > = 
निशुम्भं नितं दष्टा भ्रातरं प्राणसम्मितम्‌ । श्रपने भाई जि्यम्म न्रौर सव स्ना स 


बध इुश्रा देखकर शुम्भ कोधित ` होकर रेवी.से 
हन्यमानं बलच्ैव शुम्भः करद्धोऽत्रवीदचः ॥ १॥ ग ॥ १॥ ह दा ट ङ तकम 
मा दुरम गर्वमावह । | गवे मत करो । तम दुसरेके बल पर श्रभ्ित 
बलावलेपदुष्टे त्वं मा दुगे गव्वंमावह की 
श्न्यासां बलमाभित्य यध्यसे याऽतिमानिनी॥ २॥॥ समभती से ॥ २॥ 


1 देग्युवाच देवी बोली- ॥ । 4 
एकवा जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा । इस जगत मं भ.पक दी दवश्नोर अमस श्च 
दूसरी कोन है ? रे दुष ! देख, यद सम्पू 
पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मष्धिभूतयः ॥ ३ शक्तियां मुस दी रहती दै ॥३॥ ` ` ह 
ऋषिखवाच पिं बेले ० 
तत समस्तास्ता देव्यो व्रह्याणीषयुखा सयम्‌ । तव ब्ह्मारी रादि जितनी शक्तियां थीं घे.सखष 


| के शरीर म लीन दोग अम्वा 
तस्या देन्यास्तनी जग्पुरेकेवासीत्‌ तदाम्बिका॥। ४ ॥| श्रकेली र गई ॥ ४॥ च ५ + 
च्युवच देवी बोली- - 
रहं बिभूर्या बहुमिरिद सूपेयेदा स्थिता | म दी श्रपने विभव से श्रनेकौं रप मेँ स्थितं थी 
उन स्वको मैने समेट लिया श्रौर.श्रव ओँ पक ह 
तत्‌ संहतं मयैकैव तिष्ठाम्याजो . स्थिरो भव ॥५॥ तू भी उदर ॥५॥ ` ध 


ऋषिर्वाच श्ररषि घेले-- 
ततः भरबडते युद्धं देव्याः शुम्पस्य चोभयो; । देवताश्च शरीर श्रु ॐ देखते देखते ` 
पश्यतां सव्वेदेवानामसुराणाञ्च दारुणम्‌ ॥ ६ ॥| देवी श्रौर म्म का दारुण युद्ध होने जगा "॥ ६॥ - 
दासैः तीर्ण वाणं रौर दारुण श्रखं शसो की वर्षां होने .. 
शरवर्षः शितेः शचेस्तथास्वशव दारुः । न 


तृयोयुद्धममृदभूयः सव्वेजलोकमयङ्करम्‌ ॥ ७ ॥| को भय उत्पन्न करने वाला युद्ध इश्रा ॥७॥ 
दिव्यान्यल्लाणि शतशो भुसुचे यान्यथाम्बिका | | भम्विका ने जो सकट दिव्य अरक्न दोदे उनको . 
वमञ्न तामि देच्ये्धस्तसतीपातकत्त भिः ॥ < ॥| दैत्यराज शम्भ ने अपने शखर से काटडाला ॥ ८॥ 


शुक्तानि तेन चाञ्चाणि दिव्यानि परमेश्वरी । | उस दैत्यं ने जिन अखं को चोडा उनको अंबिका ` 
वभ लीलयैवोग्रङ्सेश्वारणादिभिः ॥ ६ ॥ न ॥ 


शषरशतेदंषीमाच्ादयत साश्छरः ॥ (देवी को.आच्छादित कर दिया।. उन्‌ ` खब `का 


. तत्रापि सा निगधारा युयुधे तेन चरिडका ॥ = 


(-, ९ 


अ माकण्ेाण २१३ 
सापि तत्‌ पिता देवी धलुधिच्छेद पेुभिः।)१०।| को श्नौर उसके धलुप को देवी मे ङपित ८५ 

„ प 1 अ धल चेपुभिः॥१०॥ काट डाला ॥१०॥ धनुप के कने पर दैत्यराज > 
चिन्ने धनुपि दैत्े्रस्तथा शक्तिमथाददे । | ण्क शकि उटाई । जयि वह थाति शुम्भ फे दाथ 


विच्छ मदी थी देवी ने उसे श्रपने चक से कार ड 
च्छद देवी चक्रेण तामप्यस्य करस्थिताम्‌॥११।| ॥ ११॥ फिर दैत्यराज शुम्भ प्क जद्ग श्रौर दाल 
ततः सद्गघपादाय भतचन्द्रन्व भाघुत्‌ । 


वीप जिस खुं रे समान शतचन्द्र लगे दषे लेकर 
अन्वधावत्‌ तदा देवीं देत्यानामधिपेश्वरः ॥१२॥ ५ के उपर भापटा ॥१२॥ उसे शाते दी चंडिका 
व | 
धव ५ र रथ ~ {वरा " सुय्रं र ह 
सुशक „ ५ चाककरामलमू्‌ ॥१२॥| इये वाद बद य शरशयहीन श्र रथ र 
दताश्वः स सदा देत्यरिदनेधन्या पिषारथिः | | धिना र उसा धुप भी काट दिया 
ह द्रं धोरममनिानिथनोचतः गया । फिर वह पक भयानक सुण्दर उयाकर 
५ ४ षर भारमम्विकानिय वतः ॥१४॥ च्रभ्विका के मारने को उयत दुध्रा ॥ २४॥ देवी 
चिच्चेदापततस्तस्य शुरं निशितैः शरै । उस सुदुगर को श्रपने तीच्ण॒ वाणो से कार दिया 
तथापि सोऽभ्यधावत्‌ तां पृष्टस्य पेगयान्‌॥ १५|| फिर वद देवी को ९५ से मारने को मी दौड़ा 
स॒ यष्टिं पातयामास हृदये दैत्यपुङ्गवः) |॥ २५॥ दनयाज नेदेवीके दद्य मे मुष्टिका दयार , 
देव्यास्तन्वापि सा देवी रलेनोरस्यतादयत्‌ ॥१६॥| किया भ्ौरदेवीनेभी हाथ से उते छाती मेँ मारा: 
तलप्रहाराभिहतो निपपात मीत | | ॥ १६॥ देवी के करतल फे ध्र से बह पृथ्वी पर 
म जः ‡ । परन्तु बद दैत्यराज सदसा भिर उदपा ॥ . 
स दैत्यराजः सदक्षा पुनरेव तयोल्ितः ॥१७॥ क 1 
उत्पत्य च प्र्र्योचदेवीं गगनमास्थितः 1 ॥ । 
त्पत्य च देवां गगनमास्थितः । व 
से युद्ध किया ॥१२॥ छाकाशरे दैत्य शनौर चंडिका | 
देवी का परस्पर पेखा युद्ध दुश्रा कि उससे सिद्ध 
शीर पनि ललोग विस्मित दोगये ॥ १६ ॥ फिर 
श्म्विकाने ५: तक उस दैत्यसे युद्ध कर 
~ कै उसे उदाला श्रोर फिर घुमाकरं पृथ्वी पर फक 
उत्पात्य भ्रामयामास चिक्षेप धरणीतले ॥२०॥ र व 


स क्षिपतो धरणीं भ्ाप्य धष्ियम्य वेगितः । छ्रौर फिर वह दुरात्मा सुष्टि तान कर चरिडिकाको 
यभ्वधावत दुष्टता चरिडिकानिधनेच्छया ॥२१।| मारे के जतिये दौड़ा ॥ २९॥ तव दबी ने उख दैत्य , 
तमायान्तं ततो देवी सत्वंदैत्यननेश्यरम्‌ | | गजं को श्राते हप देखकर उसको शरूल से छाती 
जगत्यां पातयामास भित्वा शूलेन यक्षति ॥२२॥|| वेष व श 2 स 
गतासः धरं देवीशूला षतः सरक्त वह पृथ्वी पर भिर पड 

पपातोन्ा श्रवत । गिरने से समुद्र, डीप छीर पर्व॑त सहित सम्पू , 
वियन्‌ सकला पृथ्व साच्द्ीपां सपव्वताम्‌॥२३॥ थ्वी चलायमान दोग ॥ २३॥ उस दुष्ातमा ऊँ 
ततः रसच्नमसिलं हते तस्मिन्‌ दुरात्मनि । 


निषुद्ध खे तदा दैत्श्वरिडका च परस्परम्‌ । 
चक्रतुः पथमं सिद्ध-युनिविस्मयकारक्‌ ॥१६॥ 
तता नियुद्ध" सुचिरं शृत्वा तेनाम्बिका सहं । 


मरने पर समस्त संसार प्रसन्न होकर खस्थ हश्च 


फगत्‌ सखास्थ्यमतीवाप निस्म॑लञ्चाभवन्नम्‌ः | २४।॥| तथा ्याकाश ९० से ५ ४ 
उत्पातमेयाः सोरका ये प्रागासं्ते शमं युः | | मँ के उत्पात चरर उलकापात 


॥ करसे थे घे उसके मरने से सव शान्तं होगये 
सरितो मार्यवाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते ॥२५।| इया 


वै इ्पनिर्मरमा शौर नदियां सीधी वदने लर्भीं ॥ २५॥ फिर सव 
ततो देवगणाः स्वे दरषनर्भरानसाः । देवगण उसके मर्ते से प्रसन्न दोग॑ये शरीर गन्ध 


यभृमुनिहते तस्मिन्‌ गन्धवा लतित जुः ॥९६।॥| लोग ललित मीत ने लगे ॥ २६॥ दुरे गन्ध 


२१४ माकंरटेयपुराण श्र० ६१ 


अवादयंस्वयैवान्ये नसूतुश्राप्सरोगणाः । | वने वजाने लगे शौर श्रण्सरायं नाचनेलीं ! चा 
चलने लगी शौर सूय का प्रकाश वद्‌ गया .। शरन्चि 


वनुः पुरुयास्तथा वाताः सुममोऽमूदिवाकरः । | जो. शान्त होगे थी भव्वक्ित ` दोग तथा 
जव्यलुधास्चयः शान्ताः शानतदिगूजनितस्वनाः ॥ २७ दिशामि जो कोलादल दोरदाथा शान्त दोगया ॥ 


इति श्रीमाकेरडेयपुराण भ सावणिकमन्धन्तरके देवीमाहात्म्ये शुंभवध नाम ६ वाँ य° समाप | 
~ व ८ ८ 


दर्यानवेबं अध्याय 
, ऋषि बोले- | 
देवी दारा उस दैत्यराज के मारे जानेपर इन्द्र 


॥1 


षिरुवान्च । 
देभ्या हते तत्र महषुरेन्धे सेन्द्राः सुरा वहि ' 


पुरोगमास्ताम्‌ । कात्यायनीं ठष्टवुरिष्टलम्भा- | 


दिकाशिवक्सरास्तु पिकाशिताशाः ॥ १॥ 

देवि प्रपन्नार्भिहरे प्रसीद भरसीद भमातनंगतो- 
ऽखिलस्य । परसीद षिष्पेश्वरि पाहि विश्वं 
स्वमीश्वदी देवि चराचरस्य ॥ २॥ 

आधारभूता जगतस्त्वमेका भीस्वरूपेण यतः 
स्थितासि । त्रपां स्वरूपस्थितया त्वयेत- 
दाप्याथ्यते छृत्स्तमलङ्कचवी्यं ॥ २॥ 

त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीय्यां पिश्वस्य बीनं 
परमासि माया । सम्मोहितं देषि समस्तमेतत्‌ 
तवं बे भयन्ना थुषि शुक्तिरेतः ॥ ४॥ 

, विद्याः समस्तास्तव देवि भेदा; लियः समस्ताः 
सकला जगत । स्वयेकया पूरितमम्बयेतत्‌ का 
ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः ॥ ४॥ 
व्यता यदा देवी स्वर॑शक्तिभदायिनी । 


सखदहित खव देवता ्रभिको श्रगि कर सव दिशां 
को काशत करते इण देवी "की स्वति करनेलगे ॥ 
डे देवि ! आप भक्तो कौ चिपत्ति दूर करनेवाली है, 
श्राप समस्त जगत की माता. 1 हे विश्व की 
ईश्वरी ! श्राप प्रसन्न हूजिये ! आप चराचर विश्व 
की ईश्वरी देवी अतः बिश्वकी रज्ञा कीजिये।२॥ 
श्राप दी जगत अगे एक ्राधाररूप हँ तथा आपी 
पृथ्वी रूप से स्थित ह 1 हे अतुल पराक्रम बाली ! 


पटी जल रूपसे स्थित होकर सवको आन्द्‌ 
देती ह ॥ २॥ आपी विश्व की कारण अनन्तवीय 


वैष्णवी शक्ति ह रीर श्रापही वह परम माया ह 
जिससे कि समस्त जगत मोद को प्राप्त दोरहा है, 


पकी प्रसन्नता ही संसार मे मुक्तिका कारण 
होती है ॥४॥ हे देवि ! समस्त विधाय रपी 
के येद स्वरूप दहै जगतत की सव लिया श्राप 
दीका ्ंश दै । हे शम्ब] ्रापदी सव जगते 
व्याप्त है, श्नापकी स्तुति क्या हो खकती है १ राप 
स्तुत्ति से परे हँ ॥ ५॥ हे देवि { ्राप्र सव, जीचों 
को स्वगं श्रोर सक्ति प्रदान करती है । श्रापकी 
स्तुति ऊ लिये वहत कुछ कटना दथा है ॥६॥ आप 


चं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः । & ॥|| सवके हदय मै बुद्धि रूप से विराजमान द्योती है । 


न्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते । 


लगापवगेदे देधिः नारायणि नमोऽस्त ते ॥७॥ 


लाकाषएादिरूपेण परिणाभप्रदायिनी । 


अतः आपी खगं चनौर मोक्त के देने वाली देवि 
द । हे नारायशि ! यापको नमरकार है ॥ ७॥ कला 


-श्मीर काष्टा रूप से परिम देने बाली आपी, 
` आप द्ी संसार खा ना करने.मे समथ हे; . रतः 


चेश्वस्योपरती शके नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ८ || दे नारायणि ! श्रापको प्रणाम है.॥८॥ श्रापस्व 


पव्वमङ्लमाङल्ये शिषे ` सव्र्थिसाधिके | 


एरण्ये त्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते।॥ ६॥ 


इष्टिस्थिति-षिनाशानां शक्तिभूते सनातनि । ,. 


एन्य युएमये नारायणि नमोऽतु ते ॥१०॥ 


, मङ्गलो का रूप ह, कल्याण करने चालली श्नौर सखव 


र्थं का साधन करने वाली च्रपही दं, चापद्यी, 
शरण देनेवाली ज्यस्चका गौरी है, हे नारायणि ! 
श्रापको नमस्कार दै ॥ ६॥ उत्पत्ति, पालन नौर 


` संहार श्चादि करमो म श्रापही सनातनी शवितरूपा , 


ह, सथ शणो के श्राधयवाली, गुणमयी, नारप्यणी! ` 
श्रापको नमस्कारै ॥ १० ॥ शरणागतः दीनं छीर 


ह) 


श्च० ६१ माकंरटैयपुराणं ३१५ 


१ 


शरणागतदीनात्-परित्ाणपरायणे | | श्रातं की रक्ता करने बाजी तथा सवकी ^ { 
घव्यस्यार्िहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥११॥ ३ 1 व 
ण । र्‌ १९॥ दख क्त पवमात पर ९ 
व न्माणीरूपधारिणि | | ब्र्मारी का खूप धारर करे कामद स ५, 
कौशाम्पश्षरिके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥१२॥ शकने वाली नारायसी के पिमिच्च नमस्थार हे ॥ 
्रिश्रूलचन्दराहिधरे महाष्टपमवाहिनि । | शिश, चन्द्रमा तथा सर्पं धार किव दुष मे 


हिश्वरीससूपेण > श्री सूप से नारायसी को नमस्कारै ॥९३ ५ ई, 
माहेश्व नारायणि नोऽस्तु ते ॥१३॥ पर सा व 


मयुर २८८ महाशक्तिषरेऽनये । | कौमारी रूप से स्थित नारायसी को भराम है ॥ 
कायारीरूपसंस्थाने सारायणि नमोऽस्तु ते ॥१४॥ शंख, चक्र, गदा. शाङ्ग छादि परम श्राद्धो को 
वैष्णवीरूपे हे नारायी ¦ श्रपको नमसकार दै ॥ ९५॥ आप 
ए श । 
भरसीद्‌ वेप्णवीरूपे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥१५॥ वी 
इिरूपिसि करने वाली है । ध नारायणि | श्ापक्रो नमस्कार 
परादरूपिणि ग नारायणि नमोऽ ते ॥१६९॥ है ॥१६॥ उग्र वरसिह रूप से दैत्योका नाश करनेको 
चरसिदस्पेणोग्रेए हन्तुं द्यान्‌ तोयमे । 

यरी को मारा प्रणाम है ॥ १७॥ किरीर धार, 

किरीटिनि मदरावजे सदस्ननयनोज्जले । किये इए, मदावनच्र दाथ में ज्ञेकर हजार नेन से 
हत्रमाणहरे चैन्द्रि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥१८॥ शक्तिरूप नारायरी फो प्रणाम दै ॥ १८॥ शिवदूती, 
रूप से दैत्यो की विशाल सेनाको नाश करनेवाली ' 

घोररूपे महारषे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥१ ॥ सो नमस्कार है ॥ १६ ॥ वड़-वड़े शत निकाले हणः 
कराल श्राति वाती, सुरडाकी माला धारण करने 

चाधरुएडे यण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते ॥२०॥| नारायणी को नमस्वर है ॥२०॥ ल्मी, लज्ञा, 
मदाविया, भदा, पुष्टि, खधा, मदारानि ओर महा 

महारात्रि महामाये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥२१॥| हे मेधा, हे सग्खति ! उतम येभ्य से युक्त, रजो. 
मेधे सरस्ति षरे भृति वाश्रमि तामसि! | युए च्नौर तगु संयुक्त नारायसी देवी ! आप 
नियते त्वं मदे नारायदि नमोऽ ते २९ देयि ¦ श्राप स्व॑खरूपा, सरश ओर स्व शक्ति से 
£ [० भुः ४५ [१ न * 
सव्वस्रूपे सव्वेग सब्वेशक्तिसमन्विते । | क्तदो । हे दुं ¡ हमको मयस वचादये, हम श्माप 
वदनं म्व प्रौर िलोचनयु्त सुख हमारी सव जीवो की 

एतद्‌ ते वदनं सम्य सोचनतरयभूपितम्‌ । रक्ता करे । हे कात्यायनी ¡ श्रापको नमस्कार है ॥ 
ऽ्वालाकरालमत्युग्रमरेपासुरशुदनम्‌ | | शरीर भ्रेष सक्तसोको मारने वाला ्रापका चिशूल 
हमारी भय से रक्ता करे । श्रापको नमस्कारदै॥२५॥ 


शंख-चक्र-गदा-शाद्ध-एदीतपरमायुपे । | धारण क्य हु वैष्णवी रुपं से हम पर भसन दो 
गरहीतोग्रमहाचक्र दषद्रतयसुन्धरे । | प्रथ्वी को धारण फिथे प, चाराही रूप से कल्याण। 
८ उद्यत श्ीर वैलोक्य की रक्ता करनेमे तत्पर नारा- 
व्रंलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमोऽस्त ते ॥१७॥ 

म्काशमान, चार फे पराण हरन वाली, णेन्द्र 
शिवदती्वस्मेण हतदैत्यमहाबले । धोर रूपवाली, भयानक शब्द करनेवाली नारायणी 
दकरालवदने शिरोमालाविभूषणे बाली, मुरुड का वध करने वाली चामुरुडारूपी 
सम न्ने महानि दध षटि धे पूवे । माया खरूप नारायणी ! रापो नमस्कार दै ॥२९॥ 

हम पर प्रसन्न ह, छ्ापको नमस्कार है ॥ २२ ॥ हे 
भयेभ्यच्चाहि नो देयि दु देवि नमोऽस्तु ते ॥२३॥| फो नमस्कार करते ह ॥ २३॥ श्र॑पका ये सौम्य 
परतुनः सववभूतेभ्यः कात्यायति नमोऽस्तु ते२४॥ हे भद्रकाली ! निकाल ज्वाला वाला, त्यन्त उग्र 
त्रिशूलं तु गो पीतभद्कालि नमो तु ते । २५" हे देवि ! श्रापकरा बह धरया जो समस्त संसारको 


-हिनस्ति दैत्यतेजांसि स््नेनापूयं या जगत्‌ । | श्नपने शब्द से भर कर दैत्यो क तेज को हरता है 


सा धणएट परत नो देवि पपेभ्यो नः एुतानिष।।२६॥॥। मारी पुतो के सभान पपो से रता करे ॥ २६॥ 


२१६ 


भाकेरडेयधुराण 


श्र° &? 


ग्रसुराखग्बसापट्-घर्चितस्ते करोज्ज्वलः । 
शुभाय खड्गो भवतु चरिदके त्वां नता वयम्‌ ॥२७। 
रोगानगेषानपहंसि तष्टा स्रा त कामान्‌ 
पकल्लानभीष्टान्‌ । खामाश्रितानां न विष्रराणं 
त्वामाभिता द्याश्रयतां भयान्ति॥२८॥ 
एतत्‌ इतं यद्‌ कदनं स्वयाय धम्पविषां देवि 
महासुराणाम्‌। सूपैरनेकेवेहुधात्मभूर्स कृत्वाम्बिके 
तत्‌ भकसोति कान्या ॥२६॥ 
वि्ाघु शाकेषु पिषेकदीपेष्वाय घए वाक्येष च 
का त्वदन्या } ममलमर्तेऽतिमहान्धकारे 
विभ्रामयत्येतदतीष षिश्वम्‌ ॥३०॥ 
रक्षसि यत्रोग्रविषाश्च नागा यत्रारयो दस्यु- 
वलानि यत्र | दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र 
स्थिता त्वं परिपासि विश्वम्‌ ॥२१॥ 
शरश्वेश्वरि त्वं परिपासि षिष्वं विश्वात्मिका 
धारयसीति पिश्वम्‌ । विश्वेशवन्या भवती 
भवन्ति विश्वाश्रया ये तयि भक्तिनम्राः ॥३२॥ 


देवि भसीद्‌ परिपालय नोऽरिभीतेनित्यं 
यथाऽसुरवधादधुनेव स्यः । पापानि सन्य॑नगताश्च 
शमं नयाश्च उत्पातपाकजनितांश मदोपसगान्‌।।३२॥ 
भणतानां प्रसीद खं देवि विष्वा्चिहारिणि । 


४ १ मीख्ये [४ 1] 

त्े्तोक्यवासिना लोकानां वरदा भव ॥२५४॥ 
देव्युवाच 

घरदाऽहं सुरगणा वरं यं मनसेच्छथ । 


त यध्वं यच्छामि जगतायुपकारकम्‌ ॥२५॥ 
देवा उच 

सन्वावाधाप्रशमनं त्रे्लोक्थस्याखितसेश्वरि । 

एवमेष 

। देव्युवाच 

वैवस्वतेऽन्तरे प्राम अष्टा्धिशतिमे युगे । 

शम्भो निशुम्भववान्यनुत्पतस्येते महारो ॥२७॥ 

, +^ ५४६ जाता यशोदागर्भसम्भवा । 


त्वया काय्यमस्मदरिविनाशनम्‌ ॥२३६॥ 


हे चंडके ! ्ापका उञ्यलहाथ जोश्यसुरो के रुधिर 
श्नौर मंससे सना इचा चह हमारे लिये कट्यास॒ . - 
कारी हो, हम आपको प्रणाम कसते है ॥२७॥ याप 
संतु होकर शश्नेष रोगो को नष करती है नौर 
यदि अप्रसन्न होजांय ठो सम्पूणं कामनाश्रौं कां 
नाश कर देती है, आपके ्ाधित मस्य विपत्ति 
मे नदीं पड़ते बरनर उनके दी ्राधित श्रौर मघुष्य, 
भीषशोजतेहै॥ २८) हे देवि ! आपने जो इस 
धकार घमेद्रोदी रात्तसों का नाश अनेक रूप धारण 
करके किया है, रेखा कोन दृखरा करः खक्रता है ॥ 
विया, शाल,विचेक तथा वेद छैर उपनिषद श्रादि 
के वाक्यों के होते हष भी ममता के अन्धकारपूणं 
गर्त मे विश्व को श्रापके अतिरिक्त रौर कौन 
गिरा सकता है ॥६०॥ जदं पर राच्तस हों अथवा 
महाविष या सर्पका भय हो, जदं पर. वैरियों 
दथवा चोसे खे पाला पड्जाय, जहाँ पर दावानल 
या खमुद्रजन्य भय हो, वह्यंपर आप जाकर भक्ता 
कीरक्ताकरती हं ॥ ३१ ॥ विश्व का पालन करने . 
फे कारण श्राप विश्वेश्वरी है, विश्वको धारणकरने 
के कारण चाप विश्वात्मिका कटलाती है, अप 
देवताश्रोंसे वन्दितं रौर विश्वके आधित मद॒ष्य 
आपको भक्ति से नघ्र होकर पूजते है ॥३२॥ हे 
देवि ! जिस पकार आपने इस समय रक्षसा का 
वध करके हमारी रक्ता की है उसी भकार सदैव 
भय से हमारी रक्ञा करे ) सव जगत के पापोँको 
श्नौर उत्पात करने बालि महाविभ्नोँ को भी शमन ` 
करके ्राप हमपर प्रसन्न हों ॥ ३६॥ दहे चिश्व की 
विपत्ति का नाश करने वाली देवी ! तीनो लोक के 
रने वाल्ञे ्रापकी वन्दना करते ! हम विनीते, 
आप हमपर प्रसन्न होकर हमको वर दं ॥ २७ ॥ 
देवी वोली-- 

हे देवताश्रो ! मँ चर देनेवालरी ह, जो तुम 
इच्छा हो वह बर मुभसे मांगो, म जगत के 
कट्याशाथं चरी चर तुमको हगी ॥ ३५ ॥ 
देवता वोज्ते- 

हे प्रखिल्िश्वरी ! जिस प्रकार आपने चिलोकी 
की वाधा इस समय शान्त कर दी है उसी तरद 
हमारे वैरियों का नाश किया करे ॥३६॥ 
देवी वोली- 

अद्धाईसवें युग मे चैवस्वत मन्वन्तर कै भरगरः 
ह्रोने पर जव दृसरे णुम्म निशुम्भ दैत्य उत्पन्न गे ` 

तव ॥ ३७ ॥ मै नन्द्‌ गोप के घर यशोदा के गभे से 

उत्पन्न होकर उन दोनों का नाश करूंगी श्नौर 


भ्र° ६२ माकरडेयपुराण ३१७ 


४ 


ततस्तौ नाशयिष्यामि दिन्ध्याचल्लवासिनी 1 ३८ विन्ध्याचल प्रैत पर रंग ॥ ३८ ॥ इसके वाद्‌ 
पुनरप्यतिरोद्रेष रूपेण पृथिवीतले । ¡ अत्यस्त भयह्भुर स्प धारणकर पृथ्वी पर शरवतार 


^ मयित ~, लेकर विप्रचित्तिवंशी दानवोका वध करेगी ॥३९॥ 
परवती्यं हनिष्यामि वैभचिततासतु दानवान्‌ ॥३२॥. उन यिचि राचसों को म्स करने के कारण 


भक्षयन्त्याश्च तानुग्रान्‌ वेमचित्तान्‌ महासुरान्‌ | ; बेरे दात नापे फलके समान र्कवरं दोजार्ेगे 
रक्ता दन्ता भविष्यन्ति दाडिमीङ्कषुमोपमाः ।५०।॥ ॥४०॥ उस समय खगं लोक मे देवतां रौर मत्यै 
` ततो मां देवताः स्त सत्यलोके च मानवा; ] | लोक मं मचुप्य स्तुति करतेहुप समको स्दम्तिका 
्तुबनतो व्याहरिष्यन्ति सततं रक्तदन्तिकाम्‌॥४१।|| चाम से पारे ॥ ४६ ॥ किर पथ्वी पर सौ वपं 


तक वर्था नदीं होगी, उख स्मय मै सुनियो से 
भूयश्च शतवार्पिक्यामनाषृष्टयामनम्भसि 1 व त 


युनिभिः संस्तुता भूमौ सम्मपिष्याम्ययोनिजा॥४२॥ जागी ॥ ४२॥ किर जो क्रि सौ मेनो से उन 
ततः शतेन नेत्राणां निरीक्षिष्यामि यन्छुनीन्‌ । | सुनीश्वरो फो देंगी श्सलिये दुप्य समको 
कौीतत॑यिप्यन्ति मदुजाः शताक्षीमिति मां ततः॥४३। | शताक्षी नाम से गान करेगे ॥ ४६॥ हे देवता्रो | 
ततोऽ्मखितं ज्लोकमात्मदेहसगुदरैः । ! उस समय मेँ ्रपने देदह से उत्पन्न शाको की बृष्टि 
भरिष्यामि सुराः शाकैरा्ेः भाणधारकेः ॥४४॥| से महप्यों का भार्‌ वचाऊ भी ॥ ४४ ॥ इसी कारण 
शाक्रम्भसीति पिरूयातति तदा यास्याम्यहं श्वि । | से मँ पृष्व पर शाकम्भरी नामसे विस्यातदोऊ*गी 
तत्रै च वधिष्यामि दुगंमार्यं महापुरम्‌ ॥४५॥ व 

९ पः दुगं करके 
टमा देवीतिषिख्यातं तन्मे नाम भृषिष्यति । | प्रसिद्ध होगा । फिर भे हिमालय पर मुनयो फे 
पुनहं यदा भीमं सरूपं कृत्वा हिमाचले । | परिवाए फे लिये भीम रूप धारण कर रक्षसो का 
 रकासि क्षथयिष्यामि युनीनें श्राणकारणाद्‌ ।॥४६॥| वध करगौ ॥ ४६॥ उस समय सव सुनि लोग 
भीमा देवीति विख्यातं तन्म भा भविष्यति॥॥४७। न शखर नाम का रास स छ्त्यन्त 
यदारुणाख्ययैलोक्ये महावाथां करिष्यति । | क उत्पतन करेगा तव शै रामर रूप धारण करके 
तदाहं भ्रामरं सूपं कृतवासद्धंययपटपदम्‌ ॥४८॥| जिसमे कि श्रसंख्य भरे मेरे चरणों मे ज्िपरे इ 
त्रैलोक्यस्य हितार्थाय यपिष्यामि महासुरम्‌ । | दंगे ॥ ४॥ उस श्रघुर का भ्ेलोक्य के हितार्थं 


र सन्बतः वध करूंगी, उस खमय सुमको चामरी कद्टकर 
भ्रामरीति च मां लोकस्तदा स्तोष्यन्ति सत्वतः ४६ सखव लोग मेरी स्तुति करगे ॥४६॥ इस प्रकार जव 


दत्थ यदा यदा वाधा दानवोत्था भविप्यति । जव दैत्यजन्य बाधा उपस्थित होगी तव-तव | 
तदा तदाध्वती््याहं करिप्याम्यरिपंक्षयम्‌ ॥५०॥ श्रवतार लेकर शलुश्चों का य करू गी ॥ ५०॥ 


, इति श्रीमाररडयषुराएमे सावरिक मन्वंतरके देवीमाहासम्यम देषीस्तुति नाम ६ वां अ०स० । 


-- सक" स्फर 
बानपेषां अध्याय 
देव्युवाच देवी वोली-- ६ 
एभिस्तपैध मां नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः । जो व्यक्ति दत्तचित्त होकर इन स्तोत्रस मेरी 


वंदना करेण उसी सव वाधाग्रोका मै निस्संदेड 


5 सकलां बाधां शमयिष्याम्यसंशयम्‌ ॥ १॥ ध द 
तस्याहं सकलां वधां शमयिष्याः भू नाश कर दूँगी ॥ ६ ॥ जो लोग मधुकेटम का नाश 


सुकैटभनाश्श्च ` मदिपामुरातनम्‌ । 


३१८ धरद॑रडेयषुरसे ०२ 


1 2 


ष्यं 


कीसयिष्यन्ति ये तद्दवधं श्ुम्भ-निशुम्भयोः ॥ २।॥| महिपादुरका वध चौर इसी श्रकार्‌ शुम्भ-निशस्म ` 
याच तुर्य ~+ याञ्पैकयेतसः का वध आदि कथाका कीतेन करगे ॥२॥ अथवा 

ष्यन्ति चेव ये भक्स्या सम माहात््य्ुत्तमम्‌॥ २॥| दोक भलपूर्वक भेर उततम मादातम्य को सुग ॥ 

न तेषां दुष्कृतं फिचिऽद्ष्डूतोर्था न चापद्‌ः । उनको कोई पाप, विष्व, ्ायत्ति या दरिद्रिवान 


भविष्यति न दारिद्रय न चेवेषटवियोजनम्‌ ॥ ४ || न होगी श्नीर न कमौ उनक प्रियजनों से वियोग 
देगा ॥ ४ ॥ उसको गु, चोर, राजा, यख, अनि \ 


शतुतो 1 (१ दस्युता बा न राजतः। चैर जल श्रादि किसी सेभीमयन दोगा ॥५॥ 

न शखानलवोयापात्‌ कदाचिद्‌ सस्भविष्यति॥ ५॥| जतः एकाम्चित्त ोकर भक्तिपूर्वक मेरा भाडातम्य 
= . ४4 = [* क. [न्र्‌ ्व्‌ 

तस्मान्मभेदन्मादहासम्यं एडितव्यं समाहिते । पटना शरीर उनना चोष्िये क्योकि यह परम 


कल्याण का कारण है ॥ ६1 मेरा माहात्म्य महा- 


श्रोतव्यश्च सदा भक्त्या प्रं स्वरत्ययनं हि तत्‌॥ ६ : र 
ध द्द्‌ मारी से उत्पन्न श्रनेक उपसर्गो को तथा तीनों 


उपसगानशेषांस्त॒ , महामारीसुद्रवान्‌ । | पकार के अयौत्‌ दिक, दैचिक ओर भीिक 
तथा त्रिविधसत्पातं माहासम्यं शसयेन्मम ७ ॥| उत्पातो को शमन करता ह ७) जिस गृ मेरा 
तरतसपठ्यते सम्यडनित्यसायतने मम । | पाठ नित्य पढ़ा जाता उसमे मेरी स्थिति होजाती 
सदा न तद्विमोक्ष्यामि सानिष्यं तत्र मे स्थितम्‌॥८॥| है रौर मै बलँ फे निबासियों को नदीं छोडती हं 
वलिष रने पूजायामथरिकास्यं महोत्सवे । ॥२॥ वलिप्रदान, पूजा, हवन श्रथवा महान्‌ उत्सवों 


सव्वं ममेतचरितणुचाय्यं श्राव्यमेव च ॥ ६ ॥| क अवखर पर मेरा चरि पटना तथा सुनना 
नानताऽनानता वापि बलिपूजां तथा कृताम्‌ | | चादिये ॥ ६॥ ज्ञानी दो अथवा अज्ञानी जो को 
भ्रतीच्छष्याम्यहं भरत्या बहठिहोमं तथा छतम्‌ १०।॥| वलि या पूजा करता है उसकी पञ श्रौर ठोमको 
शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी । | मै प्रसन्न होकर स्वीकार करती हैँ ॥१०॥ शर्त 
तस्यां ममेतन्माहातम्यं भुता भक्तिसमन्वितः ११ | मे जो । शा व | शा 
मावापानि्ुक्तो भनधान्यसुतान्वितः । व व 
परबुप्यो , मलान भविष्यति न संशयः ॥१२॥| चूटकर धन-धान्य शौर पुतं से युक्त दोग ॥१२॥ 
रता ममेतन्माहात्म्यं तथाचोदयत्तयः शुभाः] | मेरे इस माहात्म्य, शभ उत्पत्तियों श्रौर युद्धो मे 


पराक्रमश्च युद्धे जायते निर्भयः पुमान्‌ ॥१३॥ अ व क ध 
; संक्षयं या ए 4) मष्त्स्य खनन वालं मछष्या क. शनुनाश कत 
रिपवः संक्षयं यान्ति केरयाणञ्चोप्पद्यते । | तात ते ह तथा उनको बलयारा उत्पल डता है 


नन्द्त च लं पूषा माहत्स्यं मम भृताम्‌ ॥१४]॥| श्नौर उनके छल को श्ानन्द दोता है ॥९७॥ गान्ति 
शान्तिकम्मंशि सव्र तथा दुःसमशने। | कमो मे, ड॒ सपो के दीखने मे तथा उम्र ग्द 
प्रहपीडसु चोग्रा माहास्म्यं शृणुयान्मम ॥१५।॥ पीडनो मे मेरा मादयत्म्य नना चादिये ॥ १५॥ 
उपगाः शमं यान्ति ्रहीडाश्च दारुणाः । तपल व 1 ; 
॥ ९. - र मद्युभ्या के दसं हप दुःस्वप्न उत्तम 
क दभि ४ सस्वभयुपनायते ॥१६॥| स्वप्नो मे बदल जते ह त आदि वाल- 
वालग्रहाभिभूतानां बालाना शान्तिकारकम्‌ । | श्रो से ्रसित वालको को मेरा माहात्म्य शाम्ति- 
पंपातभेदे च वणां मेरीकरण्ुत्तमस्‌ ॥१७।॥| कारक है तथा मचुष्यो के परस्पर बिरोध म यद 
ध तानामश्ेपाणां बलहानिकरं पम्‌ | मेजी कराने बाला ५५ ॥ १७ ॥ इसके पटृनेसे अशेष 
( दुष्ट जानवरों कां ओर रक्त, भूत, पिशाचो का . 
पो-मूह-पिशाचानां पठनादेव नाशनम्‌ ॥१८॥| चल न होजाता ह 1२८] चद मर माहालय मेर 
-५ गमतन्मादात्म्यं मम॒ सन्निधिकारकम्‌ । सामीष्यता उत्पन्न करता है । वलिदान, पुष्प तथा ` 


-~--- 
४ 


्र० ६२ भाकंर्डेयपुराण ३१९ 
----------------------------~---------------- ~~~ 


~+ ^~ ~~~ 


भ ष € ~ ~ 
पश-ुषपाव्य-धपे् गन्धदीपिस्तयोत्मैः ॥१६॥॥| उत्तम अर्य, धूप, मन्ध दीप आदि से ॥ २९॥ तथा 


विमाणां भोजनेहोमैः भक्षणीयेरह्विशष्‌ । | ब्राह्मणों को भोजन, ह्यन. रात्रि दिन भोक्त तथा 

अन्ये पिवियैमनिः भदनिः अन्य पविविध मागां से श्रथदा उखाभूप्ण देनेसे 
च्‌ गेः मरदानेवत्सरेख या ॥ र्ण] जितनी सुकरो श्रीनि होती है उतची उस 
पीतिम ज्रियते सास्मिन्‌ सदत्‌ सुचरिते भरुते। | म्य सेहोती दै जो णक दिन मेरे चरित्र को 
रुतं हरति पापानि तथारोग्यं ्रच्छति ॥२१॥| खनता दै । मेरा चरि नने से पाप दूर देकर 


०. (० 4 श्रायोग्य वदता है ॥ २९ ॥ मेर कीर्तन मतुष्यों की 
रां करोति भूतेभ्यो जन्मनां व पचनं मम्‌ ॥२२| भूत भेतादि से रा. यरा है २२॥ इय द 
युधे चरिते यन्मे दुषै्यनिवहेणम्‌ । | वय ॐ निमित्त ओ चरि रन युद्धो भं या है 
स्मिन्‌ भुते बेरेषतं भयं पुंसां न नायते ।॥२३॥ उसके सननेसे मर्यो वैरियोे भय नदीं होता 
ुष्पाभिः स्तुतयो याश याथ ्रह्मपिमिः कृताः ! है ॥२२॥ श्रय देवता्नों ते, चह्मपिय ने श्रथवा 


ध ब्राह्मणो ने जो स्पुति की है उससे मुष्यो दो शुभ 
ब्रह्मणा च कृतास्तास्तु भयच्छन्ति युमा मतिम्‌॥२४ बुद्धि उत्पतन दोगी ॥२४॥ जंगल मे अथवा चञ्चि से 


अर्ये प्रान्तरे पापि दावराभचिपरिवारितः। पिर जनेकी दशाम, चोय से धिर जामे पर, 
दस्युभिर्वा शतः शनये गीतो वापि शत्रुभिः ।\२१५॥| धवा पान्त मे शनुशरों से सुापिला हो जाने 


-व्याघ्राहयातो वा घने घा वनहस्तिभिः ! | पर ॥९॥ सिह, व्या था वन भे जङ्गल हाधी की 
ब लपेट भें श्रते पर, राजा के कोधित होकर यधकी 


राज्ञा कुद न बाजञसत बध्यो बन्धगतोऽपि वा ॥२९) | अथवा दारा की शाका देने पर ॥ २६॥ समुद्र 
आघूर्णितो बा पातेन स्थितः पोते महाणवे। | मे जान पर अरकते की दशा मे अथवा हता की 
पत॒ वापि शेषु संग्रामे भृशदारुणे ॥२७]॥| चपेट मे अते पर अथवा दारण युद मे असमो की 
 सर्व्वावाधाघु घोरासु वेदनाभ्यर्ितोऽपि बा । | दर्पा होते पर ॥२अ। इन खव घोर वाधाञ्चों श्रौरः 
स्मरन्‌ ममेतषवरितं ससो इच्येत चङ्कटात्‌ ॥२८॥| कणे मे मेरे चरिभ ऋ स्मरण करने से मलुष्य 


सिंहाय दस्यवो ३ सङ्कट से शूट जातादै ॥ २८॥ मेरे चरिजका स्मरण 
मम भावात्‌ पिहाया दस्यवो भरिणस्तया। करते ही मेरे पमाव से किह, चोर शरीर शुश्रादि 


दूरादेव पलायन्ते स्मरतशवरितं मम ॥२६॥) दूर ही से भाग जाते द ॥ २६॥ 


ऋषिरुवाच चपि वोत्ते- 
इत्युक्तवा सा भगवती चण्डिका चण्डविक्रमा । य॒ कद्टकरः प्रचंड पराक्रमं वाली भगवती 


पश्यतामेष देवानां तत्रैवान्तरधीयत ॥३०) | चंडिका देनी ५ के देखते देते ॥ पर 
॥ । निराङ्काः शन्तर्ध्यान सयोग 1३०] चे देवता भी निभय दोकर 
तेऽपि देवा ¦ खाधिकारान्‌ यथा पुय । श्रपने श्रधिकायों फ! उपयोग करने लगे, शुं 


यज्ञभागथुजः सर्व चक्र्विनिहतासयः ॥२९। का नाश सजाने के कारण वे यक्ञमाय ङा भोग 
दैत्याश्च देव्या निहते शुम्भे देवरिषौ सुधि । | करे लगे ५३१ जव देवी नेदेव के शङ शम्भ 


ध्वं महोग्रेऽहुलपिक्रमे ॥३२॥ प्रोर मद्या पराक्रमी निशुम्भ को उस उद्र भौर 
क निध्वंसक युद्धमे वथ कर दिया तो शेप दैत्य 


निशुस्म च महावीय्य शेषाः पातालमावषुः ॥३३॥| पातात अय खये ॥ ६२३३ ॥ हे रान्‌ ! देदी 
ववं भगवती देवी सा नित्यापि पुनः पुनः । | नित्या है रीर ह पुनः पुनः अवतार लेकर जगत 


सम्भय स्ते भूप जलगतः परिपालनप्‌ ॥२४॥| की रक्ता करती र त उसी देवी ने प द 
तयैत्मोदते विश्वं ॐ विश्वं मोहित कर रक्खादै ओर वही इस विद्व 
न्मोद्यते षिश्वं सेव विश्वं भरसूयते । त 


सा याचिता च विज्ञानं तुश ऋद्धि प्रयच्डति।२५॥ न प दयं भवन कसती ६॥२९॥ द 
महाकरार्या महाकाले महामारीखरूपया ॥३६॥॥ व्याप दै र प्रलयकाल मँ मदामारी. स्वर र इसी 


३२० साकंण्डेयपुराण -श्र० &३ ` 


= „~~ सैव सथः | भे वह लय दोजातादै ॥२द। वदी महाकाली पलय 
सेव काले महामारी = 4 तल मे सदार शक्ति, उत्पत्ति काल मे खष्टि शक्ति 
स्थितिं कोति भूतानां सेव फाले सनातनी ॥२७१ जजर स्थिति काल मे सनातनी श होकर बतठी, 

"क ९ है ॥ ३७ ॥ मदष्यों के टेश्बयं काल मे वदी भगवती 
भवकाले कणां सेव रक्ष्मीह दधिषदा शे । उृद्धिदायिनी लध्मी होती है तथा रभाव के समय 
सेवाभावे तथाभ्लकष्मीर्िनाशायोपजायते ॥३८॥ विनः ॐ देत बही दार्टिधरूप दोजाती है 1 | 

> ९ नड भगवती स्तुति ओर पुष्प, धूप, गन्ध आादिसे 

सतुता सम्पजिता पुषपथुपगन्धादिभिस्तथा । पूजन करने पर धन, पु चौर धर्माचरण करने के . ` 
ददाति वित्तं पुत्रंध मतिं धम्मे तथा शुमाय्‌ ॥२६॥ लिये शभ बुद्धि भदान करती है ॥ ३६॥ 


इति श्रीमार्ण्डेयपुराणके सव्रशिक मन्वन्तरमे देवीका चरित्र माहात्म्य नाम रवां अ° समाप . 


--स्य-च्छन- 

तिरानवेवा अध्याय 

छपिरुवाच | चपि दोक 
एतत्‌ ते कथितं भूप देवीमाहास्म्ययुचमम्‌ 1 हे राजन्‌ ! इख पकार मैने राप से देवी ३ 
५ उत्तम माहात्म्य को कहा ! यह उख भगवती का 


म ययेदं र्यते 
(वम्मभावा स) देवी ययेदं धाय्यते जगत्‌ ॥ १। भमव है जिखने कि समप जगत को धारण कर 
वेया तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया । अ ५ 
देश्य त्ेषान्ये विवेद; माया है ओर उसी से तुमको, इस पैश्य को मौर 
या तमेष ध तथान्ये ; अन्य बिवेकियो को चान उत्पन्न होतादै तथा उसी 
रन्ते युहिताशैव मोहमेष्यन्ति चापरे ॥ २॥॥ से दूसरे लोय मोहित सोरे है, हण है ओर रोगे॥ 
सरह ध हे महाराज ! आप उस परमेश्वरी की शरण मेँ 
शुरण ४] ५, € 
सुपाह्‌ ४ परमेश्वरीम्‌ । जाइये 1 आराधना करनेपर बह मवुप्यों को रेश्वर्य 
पररधिता सेव खेणां भोग-खगापवगदा ॥ ३।॥ स्वर्ग चनौर मोक्त भदान ऊरती है ॥३॥ 
माकौरुडेय उवाच मकरडेयजी वोल्ते-- 
उनके यह चचन सुनक्तर राजां ने उन 
ति तस्य वचः भुला घरयः स॒ नराधिपः | | गामानय पनास ते 3 
व =. तपि शसि यः जती ऋषिं को णम क्रिया ॥४॥ हे. 
म्व श, तसात व ॥ ४ ॥| करोषुकिं सुनि ! ममत्व तथा राज्यापदर्णते दुःखित 
ेन्विणोऽतिममत्वेन राज्यापहरणेन चे | | होकर बह राजा श्र वैशय दोनों तपस्या करे 
गाम सचस्तपसेस च वेश्यो महासने ॥ ५।॥ को चले ॥ ५॥ अस्विकाक्ते दर्शन करने कते त्यि. 
न्दशंनाथंमम्वाया नदीपुलिनसंस्थितः ! | वे दोनों नदी के किनारे वैठ गये नौर परम देवी- 
: च वैश्यस्तपस्तेपे देवीसक्तं प्रं जपन्‌ ॥ ६ त करने लगे ॥६॥ उन दोनों ने ५ 
ध पुलिने दैव्यः "महीमयीम्‌ के केनारे देबा जी मिद्ध की भतिमा वनाई चौर 
न्‌ देव्या $ त्वा सि ४ [द [द ~ (~ ‡ 
। तस्मन्‌ ब ध । ष्य, धूप, अधन चाद्रि सखे उसका पूजनं किया 1. 
हिणं चक्रतुस्तस्याः इषम > 1 ७।|| चे निराहार नौर नियताद्यरी होकर देवी मे मन 
नरादार यताहारो - तन्मनसो समाहितो । | लगाकर रखने .लगे नौर वे अपने शरीर से निकाले 
दस्त च्तिव्‌ निजगान्राखगुशषितम्‌ ॥ ८ ॥ इ र्भर से देवी को चलि कु 
द॑ चवाराभयदोखिभिवेरे$तालमोः भकारः नियम खे आराधन करते इए जव उन्दं 
*। घ २ ॥॥ ६०३ क ॥ 
च सक्रासमसवराणजानृत रत्सत्‌।, । चीन घपे भ्यतीत द्यगये तव जयत की मालय ` 
~ । जगद्धनी त्यक्षं पाह चण्डिका | & ।॥ चंडिका देची पकर दोकर उनसे वोली ॥ ६॥. :. 


५३४ ५ 1 


अ०६४ ४१ माकेरठेयपुराण ३९१ 


देव्युवाच देवी बोली- 
दे राजन्‌ तथा कुलनन्दन वैश्य { जो छ .. 


यद्‌ भ्यते लया भूप लया च कृलनन्दन । 

मत्स्तत्‌ भाप्यतां सव्वं परितुष्टा ददामि तत्‌ ॥१० श र ध म मको दू । मै तुमसे 
| . माकरडेय उवाचं मा्वरडेयजी वोे-- 

ततो यत्रे एषो राज्यमविभरंशयन्यन्मनि | तव राजा सुरथ ने दुसरे जन्म मै धुत काल 
श निजं [] | तक रान्य †ँ जन्म 

अव्र चैव निनं राज्यं हतशनुबलं वलात्‌ ॥११॥ व ह | 

सोऽपि वैश्यस्ततो त्नानं वत्र निर्धिए्णमानपः। 


प्रकट की ॥ ११॥ उस वैश्य ने विरक्त होकर "वद 
ममेत्यहमिति प्राहः सङ्ग-विच्युतिकारकम्‌ ॥१२॥ का विच्छेद के फे तसक्षान का वरदान मागा ॥ 


मेरा है" श्नौर भ ह रादि इस सांसारिक बन्धन 


र देव्युवाच देरी योली-- । । 
र पते स्वराज्यं प्राप्स्यते भवान्‌ । दे रजन्‌ ! थोड़े दी दिन मे तुम श्रपना राज्य, 


पाश्नोगे चीर अपने शबो को मार कर पकचयुघः 
राज्य करोगे ॥ १३ ॥ मरने पग तुम पुनः विवस्वान ' 
के पुत्र होकर पृथ्वी पर जन्म लोगे श्रौर साव्णिक 
मु फे नाम से परसिद्ध दोगे ॥ १४॥ हे वैश्यवर्य | 


इत्वा रिपूनस्खलितं तव तत्र भविष्यति ॥१२॥ 
मृतथ भूयः सम्पाप्य जन्म देषादिवस्वतः । 
सावणिको नाम भसुर्भवान्‌ धरि भवपिष्यति ॥१४॥ 


, वैश्यवर्य त्वया यश्च वरोऽस्मत्तोऽभिवाज्छितः। | ठुमने मी जो सुभे वर मगा है वह तत्व कञानरूपः 
तं प्रयच्छामि संसिद्धये तव ज्ञानं भषिष्यति ॥१५॥| सिद्धि भ ठमको देती ह ॥९५॥ 
माकंरुडेय उवाच माकंडेयजी योले-- ननाद + 

देवी उन दोर्नोको म फल देकर श्रौर : 


इति दत्वा तयोर्देवी यथाभिलषितं बर्‌ । 
` बभूवान्तर्हिता सथो भक्तया ताभ्याममिष्डुता॥१६॥ 

एवं देव्या षरं लब्ध्वा सुरथः प्व्रियप॑भः। 

सु्रयाञ्जन्म समासा सावणिभेषिता मदः ॥१७॥ 


इति श्रीमाकैरठेय ० सावर्णिकमन्वन्तरमे देवीमाहात्म्य समाश्षि नाम ६३बोँ ° ० | 
>< 


चौरानवेगों अध्याय 


ार्करडेयजी बोले- 
जा अतति दे करौषटुि सनि । ने हमसे सावरिका मंव॑तर 


साषणिकमिदं सम्यक्‌ भोक्त मन्वन्तरं तव । तथा देवी भादात्स्य नौर मदहिषाखर वध को भली 
तथव देवीमाहात्म्यं मदिषासुरघातनम्‌ ॥ १॥ भति बशैन फिया ॥९॥ भगवती की उत्पत्ति, मदा 
{~ उतपत्तयश्च या देन्या मादृणाश्च महाहये। | युद्ध मे शक्तियो का भक होना, तथा उसी प्रकार 


तथैव सम्भवो दैव्याथायुर्डाया यथा भव; ॥ २ ॥| चाुरडा रादि देवियोँ की उत्पत्ति ॥२॥ शिबदूती 
का माहासम्य, यस्भ निशुम्भ का वधं तथा रक्तबीजं 


शिषदूत्याथ माहातमयं वथः शुम्भ-निशुम्भयोः । क 
रक्तयीमवधग्ैवं सर्वमेतत्‌ तथोदितम्‌ ॥ २ ॥| का नन यद खव भने तमस का २1 ठ च 

९ दुखरे सावदिक मन्वन्तरमे ददते पुत्र सावशं 
भूयत शृनिशादृदूल सावशिकमथापरम्‌ । | गग भ मच होगे उनको सुनो ॥४॥ श्रव म 
दक्षु सावो भावी यो नवमो मुः ॥ ४॥| उस मड के देवता, सुनि ओर राजान्नं को 
कथयामि मनोस्तस्य ये देवा सुनयो दपा । ` 1 बतलाता दै । उल मन्वन्तरं मं पाण, मरीचि, भगं 


शरीर उनके भक्ति पूवक किये हुण स्तो को सुन ` 
कर शीघ्र छन्त्ध्यानं होगई ॥ १६॥ देवी से इस 
अकार वर पराप्त फर क्तत्रियो मे धेट राजा सुस्थ 
सूयं के पुत्र दोकर साचरिक म हए ॥ १७॥ 


३२२ | साकणडेयपुराख । श्नर० ६४. 


. एराभरीचिमर्गाखि सुध्माणस्तथा सुराः ४ ५॥ कौर धमां नाम देवता होगे ॥ >॥ ये देवत्ता तीन 
एते विधा भविष्यन्ति स्वव द्यादशका गणाः ¡ ! भकार ॐ भे ओर भत्येक मे वारड-वारह गर 
तेषामिन्द्रो भविष्यस्तु सहसरक्षो महावलः ॥ ६ ॥ दोगे 1 इनके इन्द्र महली खख गे ॥६॥ 
ताम्पतं कार्यो यो वहविधु्रः षडाननः | | इख खमय यडानन जो वदु का्तिकेयजी द 

` अतो नास शक्रोऽघौ भावी तस्यान्तरे मनोः ॥७।|| वे उस मन्वन्तर मै अदधत नाम इन्र गे ॥७॥ 
मेधातिथिः सत्वो ्योतिष्यान्‌ च तिांस्ता । | ेवातिधि, उछ, सत्य, ज्वोतप्मा, धूमान्‌ 
तक्षयोऽन्वः सवलष्तथान्यो हव्यवाहनः 11 ८ ।|| क्था सवल ञनौर इव्यवाहनं ये उस मन्वन्तर मेँ 


सप्पथि ह्मे (8-3। धुश्केत, चहकेतु, पश्हस्तः, 
धषठकेठवहकतुः पवहस्तो निरामयः । | निरामय, पुथ॒श्रवः, विषमान्‌, भूरि म्न श्रीर 


पृथश्रवास्तथार्चिष्मान्‌ भच रिम्नो इद्रः ॥ ६ । इृद्दधधय 1 ६॥ ये राजा लोग उस दक्म्युज कीः 
एते व्पसुतास्तस्य दक्षपुत्रस्य दें वरषाः। । सन्तान रूप से उस मन्वन्तर मेँ राज्य करगे । दे 
सनास्तु देशसस्यान्यच््सु मन्वन्तर द्विज 11१०॥॥ दिल ! अच दवं मन्नन्तरः का इल खनो ॥ १०.॥ 
मन्वन्तरे च दशमे नह्पुत्रस्य धीमत; ! | दसवें मन्वन्तर मै बहा के पुत्र धीमान्‌ मजु होगे । 
सुखासीना निरुद्धा वरिभकाराः सराः स्पृताः) ११॥ वासन श्रौर निरुद्ध नामके तीन प्रकारके देता . 


शतसंख्या देवा मदिष्या भाविसो सनो; उस मन्वन्तर मै रोमि ॥९९॥ उस मन्वन्तर मे देच- 
स | हि ते देवा षयाः सोः । व था 
स्माणिनां शतं भावि तदवानां तदा शत्‌ ॥१२।| की गरना उतरी दी ह जितनी कि मलु्योकी ह ॥ 


शान्विरिन््स्तथा भावी सर्वदेरिनद्रुणयततः! | इन्द्र के खव शुरो से युक्त शान्ति नामं इन्द्र॒ उस 
स््षीस्तान्‌ निवोध लवं ये भविष्यन्ति वै तद्‌} १३।| मन्वन्तर मे दोगा ञ्जौर अव उख मन्धन्तर मँ होने 
आपोमृरिषिष्मांथ सुतो सत्य एव च । | बलि सपि को खमस छनो ॥ १२॥ आपोमूतिं 


हविष्मान्‌, नाभाग, अधतिम शीर 
नामागोऽमतिमसवेव अशिव समः ॥ १४; | च 1 २४॥ ग उ्नीजा 
` सुेत्रघोत्तमौनाथ मूभिसेनव वीर्यवान्‌] | कछ दा सन, ^ खदेन, उत्तमौज 


भूमिदेन, शतानीक, दषभ, अनमि,जयद्रथ ॥९.९॥ 
५४ 1 [ ६ 
शतानीकोऽथ हपभो दयनभित्रो जयद्रथः ॥१५। दथा भूर्‌ जव छर शप ये खघ यरे पुजदोने 
भरिच म्नः सुपव्वां च तस्यते तनया मनोः} 


व घसं के पच सावं का जो स्यार मन्वन्तर 
भ्दिभ्या षस्भुत्रस्व सावरस््ान्तरं शृणु ॥१६॥ दोग उखकोरनो॥दाविदद्धम,+कामय ओर नि्मांण- 
विहङ्गमाः कामगाथ॒निम्मांणएरतयस्तथा । | रति चे दीन भकार ॐ देवता होमे जिनसे अव्येकके 

तरिभकारा भविष्यन्ति एकेक्िशते गणाः 11१७1 तख दीख स॒ होगे।॥९अ॥ माख, तु मौरदिनिये 
: मासततरदिवसा ये तु सिम्पाणरतयस्तुते। | निर्माणरति कडलायेगे । विदङ्गम रानियां रौर 
विहङ्गा रात्रयोऽय मौहूरचाः कासगा गणाः; ॥१८।| कामग गर्‌ सुहं कला्ेगे ॥ १८॥ उन देवताश 
इन्द्र षस्य भविता तेषां भरख्यातयिक्रमः । | ॐ भखिद्ध परानमी छपनाम इन्द्र होमे 1 इविष्याय्‌,- 
र हषिष्मांथ वरिष्ठ शषटिए्यस्तथारुणिः .॥१६॥| वरि तथा अरुफःयुज छि ॥ १६॥ शरोर निश्वर 
निथरधाचयश्चेष वरिष्टश्चान्यो सहानि; ! | श्रनघ, विटि तथा अ्चिदेव यहो लात उस मन्वंतर 
स्ष॑योऽन्तरे -तस्मिन्नभिदेवश्च स्मः ॥२०।॥ मे रुपं होये ॥२०॥ स्चनगा, खुष्टमां, देवानीक, 
~ पच्त्रभ्‌ः स॒शम्मां च्च देदी्तीकः घुरूदहः पुरुद्वह, ठेमधन्दा, डाय ये सद राज्ञा लोय उस 
श हेमघन्या दद्युश्च भाविनस्तत्सुता तरपा; 1॥२१।॥ गद = वंशज दमे ॥२९॥ ङ खख मन्वन्तर मे श्द्र 
“-दादन्े दद्रुतरस्य प्राप्ते मन्वन्तरे मनोः | के पुज सावर नाम मदु दोगि 1 उख मन्वन्तर के, 


~ 


६५ , ` ` माकंर्डेयपुराख । | १२३ । 


सत ९ 
णांख्यस्यये देवा युनयश्च श्ुगुष्व तान्‌ | देवताश्च श्चौर स॒नियों को मुस छुनो ॥ २२॥ 
स॒धम्मांणः सुमनसो ` हरिता सहितास्तथा । | धमां, खमनस, हरित, शेदित रौर खुर यद 


१ शकर 2. > दैवत हँ ^ जिनमें 
सवर्णाश्च सुरास्तत्र पवते री पाच भकार के देवता गे जिनमें प्रत्येकं प्रकार 
एपस्तत् प्ते दशका गणाः ॥२२॥| सवख गणु होंगे ॥ ३ ॥ उनका इन्द्रं मावली 


तेषामिन्द्रस्तु विहय थामा महावलः | | ऋतधामा लोगा जो मि इन्र दोन दै सव शृणो से 
„.सब्रिनदरगुणेयुक्तः सर्पीनपि मे शरु ॥२४॥॥ यक्त दोगा । श्रव उस मन्बन्तर के सपर्पियो फो 
य तिस्तपस्वी सुतपास्तपोमूर्िस्तयोनिधिः । | यमसे सुनो ॥२० च तिःतपस्बी, तपातो, 


तिस्लवाम्यः तपोनिधि, तपोरति तथा दपोधति य 7 
तपार।तस्तथान्य; सप्मस्तु॒तपोधतिः ॥२५॥| सति होर ॥ २५॥ देववाम्‌, उपदेव, व 


0 देवश्रेष्ठो विदरः । विदूरथ, मित्रवान्‌, मिच्नदिन्द थे सव उस मुके 
व व भाषिनस्तत्सुता नृपाः २६।॥| वंशज राजा गे ॥ २६॥ अव तेर मन्वन्तर ॐ 

दशस्य पर्याये रोच्याख्यस्य मनोः सुतान्‌ । भत रौच्य के पुत्रो, सर्पियों भौर राजान्नं को 
सपीश्च टृपांशैव गदतो मे निशामय ॥२७॥॥| सुभे सुनो ॥२७॥ ह सुनिसत्तम । सुधमा, कमा, 
1 सपर्ण; रास्त्रं युकर्म्माणस्तथापरे । प्रर खुशमां यही तीन प्रकार के देवता उख 
सशम्माणः सरा देते समस्ता अुनिसत्तमं ॥२८॥॥| मन्वन्तर मेँ दंगे ॥ ८॥ महावली श्रौर पराक्रमी 
महाबलो महावीय्यैस्तेषामिन्द्रो दिवस्पति; | | दिवस्पति नाम उनके न्द्र होगे, अरव उस मन्वंतर 
भविष्यानथ सप्तषीन्‌ गदतो मे निशामय ॥२६॥ फे सप्तपियों को सुभसे खनो ॥ २६॥ धृतिमान, 
धरतिमानव्ययश्चेव तत्वदर्शी निस्त्युकः । ॥ ध निखत्सुक, निमोटः छा शीर 
। सु ४ प्रकम्प यदी सातों उस मन्वन्तर म सपि 
क स । ५५ होगि ।॥३०॥ चिजसेन, दिचिध, नयति, निर्भय, दक्‌, 
प १ खनेच, चबयुद्धि शौर वत यदी उस मु के 
एने; क्ष्रयुदधिश्च सुवरतश्चेव तत्सुताः ॥२१॥ पुर राजा ोगे॥ ३१॥ 


इति श्रीमाक॑रुखेयपुराण मे रौच्य मन्वन्तर नाम € धवं अध्याय समघ्र। 
--अ>च>१८६,८६- 


परि्ानवेशं च्या 


मार्कर्डेयजी वोले- 

पूं काल मे प्रजापति रचि निर्मम श्रौर 
निरभिमानी होकर इधर उधर पृथ्वी पर घूमते थे 
तथां वे शयन भी वडुत कम फरते धे ॥ १॥ विना 
चभ, विना गृह, एक वार भोजन करते हुए, विना 
प्राश्रम, विना सद्गति पेसे उख मुनि को देखकर 
पितर लोग उखसे बोलते ॥ २॥ 
पितर बोले- । 


। माकंर्डेय उवाच 
रुचिः मनापतिः पूवं निम्मैमो निरदस्कृतः । 
शत्रस्तो मितशायी च चचार पृथिवीमिमाम्‌ ॥ १॥ 


ˆ श्रनधिमनिफेतं तमेकाहारमनाश्रमम्‌ । 

विभुक्तसङ्ध तं दृष्ट भोञुस्तपिततरो निम्‌ ॥ २॥ 

“ ` पितर उचुः 

वत्स कस्मात्‌ लया घा न कृतो दारसंग्रः । | ` दे वत्स ! तुमने विवाद करक बुरय कय! न 
¢. ए ` हेतुलादुवनध स्तेना = ५ पिना किया । विवाह स्वगे -प्मौर मोत्त क्रा कारस्‌ दे, 

1 ॥ २ ॥ विवाह ॐ विना जीव बन्धन से नदी चयूटता ॥ ३ ॥ | 

गरही समस्तदेवानां पिकणाश्च तथाहंणाम्‌ । = गहस्थी लोग समस्त देवताश्च, पिते, पियो 

षीणामतिथीनाशच द्वन लोकालुपाशुते ॥ ४॥ श्रौर भ्रति की पूजा करक उततम लोको को 


३२४ बाकएडेयपुरण ५ अ० ६१ 


ए । प्र करते ह ॥ ४ ॥ स्वाहा का उच्चारण करने से 
स्वाहोचारणतो देवान स्वधोचचारणतः पिर्‌न । देवता, स्वधा कने से पितर तथा अन्न का भाग 


विभनत्यजदानेन भूताहूयानतिथीनपि ॥ ५॥ देने से भूत श्रौर श्रतिथि ्रादि दप् होते दै॥ ५॥ 


४ ाद्बन्धं वन्धमस्महणाद रतः तुम देवताश्रोँ के, हमारे, मनुष्यों के शरीर 
सत्वं दैवाद पि। भूतो के ऋण के वन्धन मे दिन प्रतिदिन वंधते हो 


ग्रवामोपि सदुष्येभ्यो भूतेभ्यश दिने दिने ॥ ६।॥ ॥ ६॥ पुत्रौ को उत्पन्न किये विना, देवताश्नों का ` 
~ पूजन किये विना, पिते का तपण किये चिना तुमः ~ 
अजुलाच तान देवानसन्तप्य पि तया । इस मूखता से किंस प्रकार उत्तम रत्ति को प्रात 


अर्ता च कथं मौल्यात्‌ सुगति गन्तुमिच्छसि ॥७।|| करोगे १॥७॥ दे पुज ! हम यद्‌ जानते है कि 
करोशयेकै मोऽ भवेत्‌ तव । वम्दारे विवाह न करने से हमको शौर तुमको 
कंतेशमेदोककं पुत्र सन्यामोऽ भवेत्‌ प 


शृतस्य नरक तद्वत्‌ क्लेशमेषान्यजन्मनि ॥ ८ ॥| दूखरा जन्म लेने पर भी तुमको दुःख रात होगा ॥ 


रुचिरुवाच रुचि वोरे- ् 1 
परिग्रहोऽतिदुःखाय पापायाधोगतिस्तथा | विवाह से अत्यन्त दश्च श्नौर पाप होता 
हद श्नौर उस पाप से मचुष्य ्रघधोगति को प्राप्त होता 


भवस्यता सया पूल्वं न छतो दारसंग्रहः ॥ & । है, श्सीलिये मैने विवाह नदीं किया ॥ ६॥ भती ' 
आत्मनः संयमो योऽयं क्रियते सुनियन्त्रणात्‌। | पकार नियन्बण्‌ करके जो श्ात्मा का संयम किया ` 
ह 8 द्‌ जाता है उससे मुक्ति योती है, पिवाह करने से 
ख ॒शुक्तिहेठुनं भवत्यसावपि परिग्रहात्‌ ॥१०। रेखा नीं दो सकता ॥ १०॥ भिबाह न करने बाले 
पर्ास्यते्तुदिवसं यदात्मा निष्परिग्रह । | भरति दिन अपनी आत्मा की ममत्व रूपी कीचद्‌ 


ममत्वपङ्दिग्धोऽपि चित्ताम्भोभिर्वरं हि तत्‌।११५ 1 व 
अनेकमवसम्भूत-कम्द्ङ्गितो बुधः ग । सनी हरै श्रात्मा को सदुवाखना रूपी जल से “ 
आत्मा सद्दाखनातोरयेः क्षारयो नियतेन; ॥१२।॥ घोते है ॥ १२॥ 


पितर उचुः पितर बोत्ते- 


[- [; कर्चमात्मनो नियतेन्द्रिय 
युक्तं पालनं ( नियतेन्द्रियैः । यह ठीक है कि आत्मा को जितेन्द्रिय दोकर 
ध ४ व ९. स्वच्छं किया जाता है । किन्तु हे पुज ! जिस मामं 
वन्तु मोक्षाय मार्गोऽयं यतर सवं पत्र वतसे ।॥१२॥| का लुम अलुखरण करते हो बह मो का हे | 


प्र्त॒॒दानिरथमं लु्तेऽनभिसन्धितैः । | ऋणो को अदा करने खे पाप का चय होता दै 1. 
योपम परवकमीथमाधे पूर्वं जन्म के कयि हप शुभ श्चौर अथ्भक्मौ का 
फलेस्तथोपभेगेश्च पूष्वकम्मशुमाशुमेः ॥१४॥ उपमोग विना किंसी फल की इच्छा के करना 
एवं न वन्धो भति इर्त; करुणात्मकम्‌ ! चाहिये ॥ ९४ ॥ विना कारणके कमं करनेसे श्रात्मा 
को वन्घन नदीं होता! बिना फल की इच्छा से 
न्‌ च वल्धायतत्र्‌ कम्मे भवत्यनमिसन्धितम्‌ | १५॥। किये हुए कमे से भी आत्मा को चन्धन नदीं दोताˆ~. 
पूर्व्यम कृतं भोगै; क्षीयतेऽरसिंशं तथा 1 | ॥९५॥ मलु्यौ का पाप-पुर्यात्मक पूवे जन्म छत । 
सुख-दुःखात्मक भोगोँसे दिन रात सीर होता 
सुखदुःखात्मकेवेत्स पुएयापुण्यास्मक खेणाम्‌॥। १६ हे ॥ १६ ॥ इसी धकार बुद्धिमान लोग आत्मा का 
एवं प्रयते माङगैरात्मा बन्धै रष्यते। | मक्षलन करते दै जोर बन्धनो से वचते दै, ओर 
विवेकेन त इख प्रकार उनकी आत्मा अविवेक श्नीरः पापरूपी -. 
न ल्येवम पापपङ्कन ग्रदयते ॥१७।। कीचड़ मे नदीं एंसती ॥ ९७॥ | 
. खचिर्वचच ` रुचि वोज्ते-- . | 
५१५ पठ्यते वेदे कम्पेमागेः पितामहाः । दे पितंसोः ! यदि वेद-कथित करम माम से -. 


अ० ६१ -ाकेर्डेयपुराश . ३२१ 


न 


ततं कथं कमणो मिं भवन्तं न्ति अधिया होती है तो किस प्रकार श्राप सुभे उस 
॥ भवन्तो योजयन्ति माम्‌ १८॥ मागं मे पेरित करते है ?।१८॥ 


पितर अदुः पितर वोल्ञे- 
शरषिद्या सत्यमेवैतत्‌ कम्भणेतन्मृषा वचः । ३ चत्स ! यह सत्य है कि कर्ममार्गे रविद्या 
| ८ होती है परन्तु इसमे सन्देह नदीं करि कमेदी चिद्या 
किन्तु पि्ापरिमाहो दतः कम्मं न संशयः ।॥१६॥ प्रातिका हेतु दै ॥ १६॥ सत्‌ पुर्पों से वेद के 
{८ बिहिताकरणाद्‌ पंभिरसद्नः क्रियते तुय;ः। | विरुद्ध किया जातादै बह, तथा चह संयम जो पेसे 
संयमो शक्तये सोऽन्ते परुताधोगतिमदः ॥२०॥ ल्लोग मुक्ति के लिये करते हँ नरक का देने बालादै 


॥ २० ॥ 
प्रक्षालयामीति भवान्‌ वत्सात्मानन्तु मन्यते । ठ व र ट 


पिहिताकरणोदुभूतैः पापस्चन्तु पिददचसे ॥२१॥| विदित कमे को न करने के पाय से दध होते हो॥ 
अविधप्युपकाराय धिषवञ्जायते देणाम्‌ । व 
अुष्ितभ्ुपायेन बन्धायान्यापि नो दि सा॥२२॥ दषस त ५९५ 
तस्मात्स रुष्य लं॑बिधिवदारसंग्रहम्‌ । | दे वत्स 1 इसलिये ठम विधि पूवक विवाह करो 
मा जन्म विफलं तेऽस्तु असम्भाप्य तु लौकनकप्‌२२। व स क 


। रुचिरुवाच खचि बोले-- 

दृदोऽहं साम्मतं को मे पितरः सम्पदास्यति । हे पितरो ! मै इस समय बरदह सुभको कौन 
कस्या देगा दरिद्री को विवाह करना वडा 

भाया तथा दरिद्िस्य दुष्करो दारसंग्रहः ।।२४॥| दुष्कर होता है ॥ २४॥ 

उचुः पितर वोले- 
रस्माकं पतनं वत्स भवतशवाप्यथोगतिः। हे वत्स ] यदि तुम हमारे कथनाञुसखार न करोगे 
नूनं भावि भवित्री च नाभिनन्दसि नो वचः ॥२५।॥ चो हमारा पतन शौर तुम्हारी अधोगति दोगी ॥ 

` भाकरडेय उवाच भार्वरडेयजी वोले- 

इत्युक्त्वा पितरस्तस्य पश्यतो यनिसत्तम । दे क्रुकिसुनि ! पितर लोग उससे यद फट 


रः इख प्रकार सहसा श्रदश्य दोगये जिस तरद 
वभू वुः सहसाऽया दीपा बाताहता इव ॥२६॥ क्रि वायु के लगने से दौपक बुभ जाता दै ॥ ४६॥ 


इति श्रीमाक॑र्डेयषुराणमे रुचि उपाख्यान नाम & वाँ अध्याय स०। 
"केतवः ~ध" 


चियानवेषां अध्याय 


मार्रदेय उवाच मार्करडेयजी वोत्ते- 


स॒ तेन पित्वाक्येण भृशगदधि्मानसः। पितरों ह से = ध र 
विप्राष कन्या को देच्छा कर्त इष प्रथ्चा पर धूम 
कन्याभिलाषी विमर्षः परिबभ्राम मेदिनीम्‌ ॥ १ । लगे ॥ १॥ कोई खी न मिलने पर वह पितरों के 


कन्यामलभमानोऽसौ ` पिदधाक्याभनिदीपितः। | वाक्यो की अभ्र से दग्ध दोकर श्रतयन्त चिन्ता 
चिन्तामवाप महतीमतीबोदि्नमानसः ॥ २ | को. धापत हृ श्रौर उनका चित्त उद्धिद्च दगया ॥२॥ 
दि करोमि क्व गच्ामि कथंमे दारसंग्रहः । | वह फटने लगे कि मै क्याकरू, काँ जाँ 


, . कषिभं भवेत्‌ मसिहणौ ख चाभ्युद्यकारकः ॥ २॥ सुशको खी क्रिस प्रकारं मिलते जिससे कि 


६३२९६ ^. 


माकरडेयपुराण 


+ 
^ --------------------~-------------- न ााििणकणे 
<~ ~~~ 


इति चिन्तयतस्तस्य मतिर्माता महात्नः ] 


तपसाराधयाम्येनं 
ततो वर्षशतं दिव्यं तपस्तेपे घ वेधसः 


श्राराधनाय स वदा परं नियममास्थितः ॥ ५॥ 


ततः स्वं दशयामास बह्मा लोकपितामहः 


उवाच तं परसननोऽ्मीध्युच्यतामभिवाच्छितम्‌॥ ६ ॥ 


ततोऽसौ भणएिष्स्याह ब्रह्माणं जगतो गतिर्‌ । 
पिदा वचनात्‌ तेन यत्‌ कसमभिवाज्चितम्‌ । 


ब्रह्मा चाह सचि विप्रं रुला तस्यामिगाञ्छितम्‌ ।\७॥। 


ब्रह्मोवाच 
प्रजापतिस्त्वं सविता खषटन्या भवता प्रजाः | 


स्ट भ्रनाः सुतान्‌ बिष समुत्याच क्रियास्तथा। ८॥ 


कृता हताधिकारस्तवं ततः सिद्धिमवाप्स्यसि । 


त चं तथोक्त पिभिः इर दारपरिग्रहम्‌ ॥ ६ ॥ 


कासश्वेपमभिष्याय क्रियतां पितृपूजनम्‌ । 
त एव तुष्टाः पितर! प्रदास्यन्ति तवेष्ठितान्‌ । 


पततीं सुतां सन्तुष्टाः फन द्‌ ¦ पितामहाः॥१०॥ 


भाकरडय उवाच 
इतयषेवंयन श्रुता ब्रह्मणोऽन्यक्तजन्मनः । 


नद्या चिविकते पुलिने चकार पितरपत्पणप्‌ ॥११॥ 


तष्टा च पितृन्‌ पिपर स्तवैरेभिस्तथाहतः 


एकाग्र; भयतो भूत्वा भक्तिनमरातकन्धरः 


रंचिद्वव्य 
नमस्येऽहं पित्न्‌ श्रा ये वसन्त्यपिदेवताः । 


देवैरपि हि तप्यन्ते ये च श्राद्धे स्वधोत्तरैः ॥१३॥ 


तमस्येऽं पितृन्‌ स्वगे ये तप्यन्ते महर्षिभिः । 


आरद्धैमैनोमयेभदत्या युक्तिषुक्तिम्थीप्सुभिः ॥१४॥ 


नमस्येऽहं पितृन्‌ गे सिद्धाः सन्तवयन्ति यान्‌ 
भाद्धूु दिव्यै 
नमस्येऽदं पितन्‌ भक्स्या येऽच्च्यन्ते गुह्यकेरपि 


। तन्मयत्येन वाञ्बद्भि्छ द्धिमात्यन्तिकीं पराम्‌] १६ 


नमस्येऽदं पिवरन मर्यरच्च्यन्ते शुम ये सदा । 


६, ` शरद्धयाऽ्भीषटलोकपक्षिपदायिनः ॥ १७।॥ अभी 


बरह्माणं कमलोद्रदस्‌ ॥ ४ ॥ 


सकसंरुपहाररलत्तमः ॥१५॥ 


पिस का उद्धार हौ ॥२॥ इस प्रकार चिन्ता करते 
हुण उन मद्यात्मा को यदह मति उपजी किं कमल- ` 
योनि ब्रह्माजी की तपस्या द्धाय अ्ासयधनां कीजाय 
॥ ४ ॥ फिर नियम पूर्वक उन्दने सौ दिव्य चर्पो 
तक तप करके ब्रह्मा की आआसधना की ॥ ५॥ तवं 
जगत्पिता बह्याजी ने उसको अपना दशन दिया 
छोर कटा, “मं ठमये पसन ह, ठम्हारी इच्छा 
क्या दे यद सुमे वताघ्चो *॥६॥ फिर रुचि ने 
जगत की यति ब्रह्माजी को प्रसाम कर पितयं के 
चभ्बनों ॐ श्रयुसयर उनको ज कुद अभीष्ट था चह 
कह सुनाया दौर ब्रह्माजी उनक्मै इच्छा को 
सुनकर योक ॥ ७॥ 
ब्रह्माजी योत्ते- 

हे चिप ! तुप रजापति हदोगे रौर परजा उत्पन्न 


करोगे । प्रजाश्च को उत्पन्न करके तुम विहित 
क्रियाओं कतो कसे सिद्धि को प्राप्त करोगे अतः 


तुम पितसें के कशथनाछ्ार खी महण करो ॥ ६॥ 
खी की इच्छा करके तुम पितरो का पुजन करो । 
वदी पितर संतुष्ट होकर ठुम्दारे इच्छित पत्नी 
छ्नौर पुं छो भदान करे ॥ १०॥ 
मार्रुडेयजी बोक्ते- 

हे सुनि कौषएकिजी ! अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजी के 
वचन सुनकर श्चि ने नदी के किनारे पितरों का 
तप्‌ किया ॥ १९॥ फिर एकाग्र चित्त ढोकर ओओौर 
क्ति से प्रणाम करते हए रुचि ने श्माद्र पूर्वक 
स्तोर्चोः से पितसें को सस्तुप्र किया ॥ ९२॥ 
रुचि वोल्ते-- 


मे उन पितरे को पणम करता हं जो भाद्धमें 


'देवता दोकर निवास करते है शआ्रौर जिनका कि 


श्राद्धो मे देवठा भी स्वधा कहकर तपर करते दँ ॥ 
मे उन पितयं को नमस्कार करता ह जिनका कि 

स्वर्गमे युक्ति ओर मुक्तिकी इच्छा करनेवाले महर्षि 
लोम क्ति एवेक श्रद्ध से तपण करते हे ॥ ४ ॥ 

उन पितरों को प्रणाम करता ह जिनको कि 
स्वं भे सिद्ध लोग श्राद्धो मै दिव्य श्रौर उत्तम 
उपहारो से दपर करते दै ॥ ९५१ जै उन पितसेंको 
नमस्कार करता ह जिनको च्छद्धि छी इच्छा करते 
हुए परम एकाग्र चित्त होकर शगुद्यक भी भक्ति 
पूवे पूजते दै ॥१६॥ मै उन पितते को प्रणाम 
करता ह जिनकी किः पृथ्वी पर मद्ुष्य लोग सदैव 
टं लोकों की पाति. की इच्छा से अद्ध पूर्वक 


माकंररेय 
पुराण 


राद्धं मे अर्चना करते दै ॥ १७॥ मै उन पितसें 
को प्रणाम करतारहजो फि ब्रह्मलोक को पाप 
करते हे श्रौर जिनको कि प्ृथ्वीपर श्रमीएट साधन 
किये ब्रह्मश लोग पूञते द ॥१८॥ मै उन पिते 
को प्रणाम करता हँ जिनको कि वनवासी, निष्याप 
तपस्वी शरीर यतादारी लोग श्राद्ध करे वन के 
फूलों से पूते है ॥१६॥ मै उन पितरोको नमस्कार 
करता ह जिनको फि निष्ठा चत वि ब्राह्मण श्रौर 
जितेन्द्रिय लोग समाधियो से सदा वप्त करते है॥ 
उन धिलोद्ीका फस देनेवाले पितसें को प्रणाम 
करता हं जिनको क्षिय लोर श्रशेष कव्य पदार्थौ 
से विधि पूर्व श्राद्ध करके ठप करते हं ॥२१॥ ` 
म उन पिव को रणाम करता हँ जिनो पने 
कामों मे लगे दुष वश्व लोग पृथ्वी धर छदा पुष्व ' 
धूप, श्रघ्र, जल श्रादि से दृष्ठ करते है॥ २२॥ भै ' 
उन पितते फो नमस्कार करतां जो षस संसार 
मै साली नास से परसिद्ध दै ्ीर जिनको कि 
श्र लोग भक्तिपूर्वेक श्राद्ध मे दप् करते हैँ ॥२२६॥ 
म उन पितसं को नमस्कार करता हं जिनको कि 
पातालम महान्‌ रा्तख लोग दम्भ श्नौर मद छोड़ 
करः खधा कटकर श्रद्धां से ठप करते है ॥ २४॥ . 
मै उन पितयं को भ्राम करतां ह जिनको कि 
रसातल मेँ नेक कामना की इच्छायां से नाग 
लीग विधिः पूवद शनेक भोगं से पूजते हैः ॥ २५॥ 
मै उन पितर्य फो प्रणाम करता ह जिनको कि 
वदां रसातल मे हौ सपं सदा भन्न, भोग छर 
खम्पसियों से विधिवत्‌ दृप्त किया करते दै ॥ २६॥ 


ममस्येषटं पितृन्‌ विमेस्त््यन्ते यवि ये सदा । 
वाज्छिताभीषटलाभाय प्राजापत्यप्रदायिनः ॥१८॥ 
नमस्येऽहं पितृन्‌ ये वै हप्यन्तेऽरए्यवासिभिः। 
वन्यैः भद्ध ताहारेस्तपोनिधूतकिखिवपैः ।॥१६॥ 
नमस्येऽहं पितृन्‌ दिने षिकत्रतनारिभिः । 
ये संयतामभिर्नित्यं सन्तप्यन्ते समाधिभिः ॥२०। 
नमस्येऽदे पिवन्‌ श्राद्धे; राजन्यास्तपयन्ति यान्‌] 
कन्यैरपेर्विधिवह्धोकत्रयफलपदान्‌ ॥२१॥ 
नमस्येऽटं पितन्‌ पेषयेरच््यन्ते शुषि ये सदा । 
सकम्मामभिसेर्नित्यं एपप-धुपाच-वारिमिः ॥२२॥ 
नमस्येऽहं पिवन्‌ श्राद्ध यं शप्ररपि भक्तितः 
सन्तप्यन्ते जगत्यत्र नाम्ना स्थाता पुकालिनः २२॥ 
नमस्येऽहं पिर्न्‌ शराद्धे, पाताले ये महासुरे । 
सन्तर्प्यन्ते सखधाहारास्त्यक्तदग्भ-मदैः सदा 1रश 
` नमस्येऽहं पिदन्‌ श्राद्ध रस्यन्त ये रसातले । 
` भोगीररीपर्विषिवन्नागैः कामानभीप्सुभिः ॥२५॥ 


नमस्येऽहं पिन्‌ श्राद्ध; सपः सन्तर्तान्‌ सदा । 
तैव पिपिचन्मन्र-भोगसम्पत्समन्वितेः ॥२६॥ 


पितन्‌ नमस्ये निवसन्ति साक्षाद्‌ ये देवलो 
च तथान्तरे । महीतले ये च सुरादिपूर्यास्ते 
मे प्रतीच्छन्तु मयोपनीतम्‌ ॥२७॥ 

पितृन्‌ नमस्ये परमारममता ये पै विमाने 
निवसन्ति भृतताः । यन्ति यानस्तमलभ॑नोमि 
योगीश्वराः क्लेशविषक्तिहैवूम्‌ ॥२८॥ 

परिद्न्‌ नमस्ये दिवि ये च मृत्तौ; स्वधायुनः 
काभ्यफलामिसन्धौ ।भदनिशक्ता; सकलेप्सितानां 
विमुक्तिदा येऽनभिसंहितेषु ॥२६॥ 

वृष्यन्तु तेऽस्मिन्‌ पितरः समस्ता इच्या्वता 
ये भरदिशन्ति कामान्‌ । सरघ्मिन्दर्मतोऽधिकं 
चा सुतान्‌ पशुन स्वानि वलं श्हाणि ॥२०॥ 

सोमस्य ये ररिमषु येऽवतरिये शुक्ले विमाने 


नै उन पदसं के प्रणाम कर्ताहं ओ किं देवलोक 
द्राकाश श्रौर पृथ्वीतल पर रते है शौर जोकि 
देवता श्रादिकों से पूजित दं । चे पितर भेर श्रषेण 
क्रिय हुए उल फो प्रहण करं ॥ २७॥ ओँ परमात्मा 
खरूप उन पिव को भ्राम करता ह जो विमानो 
पर चढ़कर शरन्तरिक्ष म निबा करते हं श्रौर 
जिनको कष से मुक्ति पानेके अरभिभ्रायसे योगीश्वर 
विमल चित्त से पजते दै ॥ २८॥ मै उन पितरस फो 
नमस्कार करतार्हजोकि खं म रते ह श्रीर 
खधाभोजी है तथा जो कामना बां को इच्छा 
पूरी करते शरीर निष्काम लोगों को सक्ति प्रधान 
करते दव ॥२६॥ इससे वै सव पिवर दप हो जो 
कि इच्छा करने वालो की सय इच्छायं पूणं फरते 


है ओर देवत्व, शन्द्रत्व तथा इससे भी अधिक, 
| ब्रह्मस्व तथा पुत्र, पश्च वल श्रौरं गृह श्रादि पदान 


करते दै ॥ ३०॥ वे पितर जो चन्द्रमा शी किरणों 


1 


३२८ 


माकंरुदेयपुराखे ` 


च सदा वसन्ति तृप्यन्तु तेऽस्मिन्‌ पितरोऽ्रतोये- 
गन्धादिना पुष्टिमितो व्रजन्तु ॥३१॥ 

येषां हुतेऽशौ हमिपा च रियं यज्ञते 
विप्रशरीरसंस्थाः । ये पिर्डदानेन युदं प्रयान्ति 
वरप्यन्तु तेऽस्मिन्‌ पितरोऽन्नतोये; ॥२२॥ 

ये खदिगमांसेन सररभीैः इृष्णेस्तिलेर्दिव्य- 
मनोहरेथ । कालेन शफेन महर्षिवर्यैः 
सस्पीणितास्ते युदमत्र यान्तु । ३३॥ 

कव्यान्यशेषाणि च यान्यभीष्टान्यतीव 
तेषाममरार्धितानाम्‌ । तेषान्तु सा्निध्यमिहास्तु 
पुष्पगन्धान्नमोव्येषु मया कृतेषु ॥२४॥ 

दिने दिने ये पतिश्हतेऽचां मासान्तपूज्या 
धषि येऽष्टकासु । ये व्छरान्तेऽभ्युदये च पए्ञ्याः 
भरथन्तु ते मे पितरोऽत्र तकषिम्‌ ॥२५॥ 

पज्या द्विजानां इदेन्दुभासो ये प्षवियाणाश्च 
नवकेवणाः । तथा विशां ये कनकावदाता 
नील्तीनिभाः शृ दरननस्य ये च ॥३६॥ 

तेऽस्मिन्‌ समस्ता मम पष्यगन्धधपान्न-तोयादि 
निवेदनेन । तथाभिहोमेन च यान्तु दप्ति सदा 
पतिभ्यः भणतोऽस्मि तेभ्यः ॥२७॥ 

ये देवपुव्बाण्यतितृकिहेतोरन्ति कल्यानि 
श्यभाहुतानि । रप्ता्च ये मृतिखनो भवन्ति 
व्रष्यन्तु तेऽस्मिन्‌ परणतोऽसिमि तेभ्यः ।३८॥ 

रक्षांसि भूतान्यसुरास्तथांग्रान्‌ निनाशयन्त- 
स्त्वशिपं पजानाम्‌ । आचा सुराणामसरेशपूल्या- 
स्वप्यन्तु तेऽस्मिन्‌ प्रणतोऽस्मि तेभ्यः ॥३६॥ 
शश्िष्वात्ता वर्हिषद आ्राज्यपाः सोमपास्तथा । 
व्रजन्तु तप्चि राद्ध ऽस्मिन्‌ पितरस्तर्ता मया॥४० 


` अश्चिष्यात्ताः पितरगणाः प्राचीं रन्त॒ मे दिशम्‌। 


तथा बर्हिषदः एन्तु याम्यां ये पितरः सताः ४१ 
प्रतीचीमान्यपास्तद्रदुदीचीमपि सोमणः। 
रक्षो-मृत-पिशाचेभ्यस्तथेवासुरदोपतः ॥४२॥ 
सव्वेतश्वाधिपसोपां यमो रकां करोतु मे। 


९ विश्वो विशवयुगाराध्यो धर्म्मो धन्यः. शुभाननः । . 


1] 


>) 


शरीर सूर्यं की ज्योतिमे तथा श्वेत. विमानो मे. सदैवं . 
निवास करते ह इन शन्न, जल, गन्ध ्ारिसे तप्त ` 
टोकर पुष्र हों ।३९॥ जो पितर छश्चि मै इतिष्य 
प्रदान करने से ठप दते तथा जो बाह्मणएके शरीर 
मै स्थित होकर भोजन करते है श्रीर जो पिरड 
दान से प्रसन्न रोते दैवे पि लोग इन श्रन्नश्रीर 


श्र ६६ . 


जलो से सन्तु हँ ॥३२॥ जो पितर गेडेके मांस `, 
से थता देवताश्रों के दिये हुए कलते तिलो से ^ 


अथवा दिव्य मृष्ूतं मे महर्षयो केदिये इुप शाक 
से प्रसन्न होते है वे यद्य मुकपर प्रसन्न दो ॥२३॥ 
जो पित्तर लोग देवताश्च से पूजित -टोकरः श्रशेष - 


क्व्यों को अभीष्ट मानते ह ते मेरे खान्निध्यसे | 


पुष्प, गन्ध तथा अन्न रादि को ग्रहण करं ॥२९॥ 
जो पितर लोग नित्य.प्रति अरध्यं श्रदण करते दै 
तथा पृथ्वी पर जिनकी अभ्युदय काल मे शका, 


मासान्त शौर वषं के अन्त की पूज्ञाहोतीदै, वे ,, 


पितर याँ ठति को प्राप्त हों 1३ जो पितर्‌ लोग 
चन्द्रमा के समान प्रकाशित होकर ब्राह्मणों से, 
वाल सूर्यं की दर ज्योतिष्माय्‌ दयोकर कश्रियों से 
सुव के समान कान्तियुक्त होकर वैश्यो से श्रीर 


श्यामचरं होकर श्रो से पूजित ह ॥.३६॥ बे सव ) 


मेरे पुष्प, गन्ध, धूप, अन्न, जल श्रादि के निवेदन 
से तथा छधिमे होम करने से तक्ष्य, मे. उन 
पितरं को सदा परणामं करता ह ॥ २७ ॥ मै उन 
पितयं को भणाम करता ह जो यथि मे दवन कयि 
हृष कव्य को खाते है नौर जो ठप्त होकर देश्वं - 
पदान करते है ॥ ३८॥ म उन पितो को प्रणाम 
करता हँ जो राक्तरसो, भूतो श्रीर पभ्रचरड दैत्यो का 
नाश करके प्रजा का कस्याण कर्तेद! जो पितर 
किं देवताञ्नौ के पूर्वत्र ज्ौर उनसे पूज्य है चै 
त हों ॥३९॥ वे पिनर जोकि अशचिष्वात्ता, विष॑द . 
श्राज्यपा ओर सोमपा है बे इस श्राद्ध मेँ सुभसे 


तर्पित्त टोकर ठप्ति को पाप हो ॥७०॥ श्रश्निष्वावा ` | 


पितर जो बदिषेदं कटलाते ह मेरी दक्षिण दिशामे 
रक्ता करं ॥ ४२ ॥ श्राज्यपा पितर पञ्िम दिशा मे, 


तथा सोमपा उत्तर दिशा मँ रात्तसल, भूत, पिशाच , . 


तथा अघ्यं से मेरी रक्ता करे ॥ ४२॥ उन खव 
पितरो के स्वामी यमराज मेरी रक्ता करे विश्व, 


विश्वभुक्‌, आराध्य, धर्म, धन्य, मानन, अूतिद, । 


1 "“भ-८ 


` ०६७ २ 6 भाकरुेयपुराण द 


भूतिदो भृतिकृमूततिः पिणं ये गणा नव ॥४३॥ भूतिकत्‌ शरौर भूति पितरे के ये नौ गणु ॥ ४३! 
कर्याणः कर्यताकतता कल्यः करयतराश्रयः | | कल्याण, कल्यताकत्ता, कल्य, करयतराश्रय 
कस्यताहेतुरवधः षड्भि ते गणाः स्पृताः ४४] कस्यास्‌ देतु भौर अवध, ये छम्य गण ॥४४॥ बर 
वरो परेयो परदः पृष्टिदस्तुषटिदस्तथा । | वरेदध, बरद पुथ्टदिव॒रिड्‌, विश्वपाता तथा धाता 
पिश्वपाता तथा धाता स्वत तथा गणाः ॥४१॥॥ ये पितरे के सात गण ॥ ४५॥ महान्‌, महात्मा 
महान्‌ महात्मा महितो महिमावान्‌ महाल मित, मदहिमावान्‌ श्रीर मदावल थे 7 
गणाः पंच तयेवैते पिणं पापनाशनाः ४ पितरो के पाच गर्‌ ॥ ४६ ॥ सुखद, धनद, . ^. 
पुखदो धनदथान्पो धर्म्मदोऽन्यथ भतिद; श्र भूतिद ये पितसौ के चार गण ॥४७॥ शस 
पिणं कथ्यते चेतत्‌ तथा गणचतुष्टयम्‌ ॥४७॥| भकार छकन्तीस पिटगणों से सम्पू जगत व्याप्त 
एकर्वंशविदृगरण येव्यप्नमसिलं जगत्‌ । | दै। ये सव पितर्‌ ठप होकर क सदा भेयी 
ते मेष्वतृ्ासतुप्यन्तु यच्छन्तु च सदा हित्‌॥४८॥ रक्ता करे ॥४॥ । 


॥ 


एति श्रीमाकणएडेय०्ये ₹वि-उपाख्यानमे शचिष्ठत पित-पुरप स्तोत्र कथननाम्‌ ६ अ० स० | ` 


न 


~~ 94 ०१-€<--~ 

सतानवैवों अध्याय ॑ 

माकौरडेय उवाच माक॑र्डेयजी वोले- 

„ एवन्तु स्तुवतस्तस्य तेजसो राशिरुच्छतः रचि के इस प्रकार स्तुति करने पर एक तेभ- | 


समूह सदा परग हुश्रा श्नौर आकाश मे व्या 
८ ्रदुन्बभूत्रे सहसा गगनव्याक्षिकारकः ॥ १ श त 


तदृदष्ा सुमहत्‌ तेनः समासाच्च स्थितं नगत्‌ । | इरा देखकर खचि ने पृथ्वी पर घुटने ठेककर यद 
जानुभ्यामवरमिं गत्या सुचिः स्तोत्रमिदं जगौ ॥ २॥| स्तोत्र गाया ॥ २॥ | 


रुचिरुवाच पटृपि क म 
ग्र्बि पि णा जरम्‌ | म प्रचित, अभूते, दप्त-तेज बलि ४ 
४, दिव्यचञ्चु चल्ञे पितरों को नमस्कार करता ह २॥ 


नमस्यामि सदातेपा ध्यानिनां दिव्ययकषुपाम्‌॥ २॥| नै डन श्रभिलापा पूं करने बाले पितरो को । 
हनद्रादीनाश्च मेतारो दक्षमारीचयोस्तथा । | नमस्कार करता द जो इन्द्‌, दत्त, मारीच, सपपिं 


पर्पीणां तथान्येषां तान्‌ नमस्यामि कामदान्‌) ४ | त्था ५ तक 8 ॥॥| व 
मर सय्याचन्द्र सुनीद््रौ ओर सयं चन्द्रमा तक लेजाने बलि तथा , 
मन्वादीनां युनीन्द्राणां सु यांचन्द्रमशोस्तथा । स नतो 0 


तान्‌ नमस्याम्यहं सव्वान्‌ पिठ्न्सूदधावपि ॥ ४॥ करता ह ॥ ५॥ त दाथ जोड़कर उन पितरों को 


नक्षत्राणां ग्रहाणाश्च वायवनन्यानेभसस्तथा । प्रणाम करता हं | नच्तत्र (८ 1 
श्र तथा नमस्यामि छताञ्चलिः॥ | द्ाकाश, स्वगं शरीर पधनी आदि भ्रा करते ६ ॥ 
धावापषिनयो ५ हार जोड़ कर उन पितरो को परमाम करता हं 


दवपरणा जनिय सव्वलोकनमरृतान्‌ । नो देवत्ता रौर ऋषियों के पिता दे तथा जिनको | 
्क्षय्यस्य सदा दात्न्‌ नमस्येदं कृताञ्जलिः ७।॥| लव अगत्‌ नमस्कार कता दै शौर जो श्रचयंशल 
परजापतेः कश्यपाय सोमाय वरुणाय च । | के देनेबलि दै ॥७॥ मै हाथ जोड़ कर प्रजापति, | 
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताज्ञलिः ॥ ८॥|| व्यप, सोम, वर्ण श्नौर योगश्वरं पितयं को 
नभो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तपु | । प्रणाम कर्ता हं ॥८॥ मै सतिं लोक के साते गें 


३३० भाकंरुडेयपुराण ्म० &७ 


खयम्युे नमस्यामि अद्ये योगचुषे 11 & ॥ ता स्वप्यस्चुव रौर योगचच ब्रह्माजी को प्रणम 


। करता ह ॥ ६॥ मै सोम ओर योगमूतिं को धारण 
6 गणान्‌ यय था 
सोमापारान्‌ पिदेगणान योगसूतिषरास्तया । करने बल्ञे पिये तथा समस्त संसार के पितर ` 


; समस्पामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्‌ ॥१०।॥ चन्द्रमा को राम करता ह ॥ ९०॥ मे अन्न खूप - 


ञअधिरूपांस्तथेवान्याःन्‌ नमस्यामि प्तिनषम्‌ ¦ उच दुरे पिद को नमस्ार करदा हं जिनसे 


्रप्ीपोसमयं विश्वं यत॒ एतदशेषतः १ १॥ कि यद्‌ सम्पू जयत्‌ श्र्चीपोसमय दोर्दद्धे ॥९१॥ ` 
ये तं तजि ये चतं सोपरय्याचिपत्तेयः चे पितर जो क्रि तेजसं चन्द्रमा, सय ओर अधिक 


समान दै तथा जगवदस्वरूपी श्रौर अह्स्वरूपी है ॥ 
मगतस्वरूपि ; 
८ पशव तथा बल्लस्वरूपिणः ॥१२॥ सच योनी, नियतात्मा छौर स्वधामोजीपितरयो 


तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्यः; पितृभ्यो यतमानसः । | को मै वार-वार नमस्कार करता ह, वे सुख पर 
नमे नमो नमस्ते मे भसीदन्त॒ खधाधुनः ॥१२॥ भरुक यों 1 १३॥ 
माकग२ड्य उचष्ठि साकेरडेयजपी चाल-- 
एवं स्तुतास्ततस्तेन तेजसा अुनिसततम । 1 
करनं पर एपतरग््य उस तजस दशा दलान्ना 
निवक्रमुस्तं पितरो भासयन्तो दिशो दश ॥१४. | धकासित कर्ते ह निवल ॥ ९४॥ सचि ने जो 
निवेदितञ्च यत्‌ तेन पुष्पगन्धादुलेपनम्‌ ! | इद पुष्य, गन्ध. चन्दन श्रादि निवेदन किया था 


तद्भूषितानथ स पान्‌ ददो पुरत स्थिता्‌॥1 १५) रचि ने उस सव से उनको षित हा अपने 
२ 1 मने खड हप देखा ॥ ९५॥ फिर मक्तिपूवेक हाथ 


मणित्य पुनभेक्त्या पुनरे छृताञ्धलिः। | जोड़कर शीर प्राम करके रवि उ्की श्रादर 
नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यमित्याह पृथगादतः ॥१६॥ पूर्वक परथक्‌-पथ्‌ पूजा करने लगे श्रौर आपको 


ततः सन्नाः पितरस्तम्‌चुर्निसततमम्‌ रराम है ठेसा वार-वार कहनेलगे ॥१६॥ तव प्रसन्न 
दणीष्येति एलमूच र| द्योकर पितरों ने सुनिश्रे्ठ रुचि से कहा कि वर 
चर्‌ हएाष्वतं सं तसुवाचानतकन्धरः; ।१७) सामो 1 इसपर चह परणामकर उनसे योत्ते ॥९७॥ 
रचर्वाच रचि बोजे 
1 ष ए दिष्ट 
साम्पतत सगकत्त्‌ त्वमादिष्टं ब्रह्मणा मम । इस समय ब्रह्माजी ने सुमे खष्ठि रचनेके लिये 
च्मादेश किया है अतः मे प्रजावतीः सुन्दरी पति 


०५ 


सेदं 0 परनावतीम्‌१८| जता खी की अमिलापा करवा ह ॥ ८८॥ 
< पपठर क्-- 

तरेव स॒च्ः पत्नी ते भवत्वतिमनोरमा | यँ ही शीध ठुमको एक उन्दरी द्धौ मिलेगी 

तस्या पुत्रो भविता भवतो मतुरुत्तमः ॥१६॥ उससे कम्द्य पक युच दोगा जो कि उत्तम -मलु. 

मन्वन्तराधिगो धीमास्तवनराम्नेवेःपलक्षितः } | दया ॥९९॥ चट मन्दन्तरका स्ना | स्यां 

रे ष्यत सयात यास्यति जगलये ॥२. | 0 

तस्यापि वहवः पुत्र महावलपराक्रसा; ! | पराम श्नौर पृथ्वी.पालक चुतं से महत्या पु 

भविष्यन्ति महात्मानः पृथिवीपरिपालकाः; ॥२१।॥ दमे ॥ २६॥ चुन मी प्रजापति होकर द्र पकार ` 
` संच भनापतिभूत्वा मनाः खषा चतुथा; 1 | = उ उत्यन्न करोगे 1 हे धमैक ! उस अधिकार 


क्षीणाधिकारो धर्म्मज्ञ ततः सिद्धिसवाप्स्वसि॥२२। ॐ चीख होने पर तुम सिद्ध हो जः्रोगे ५२ इस 
` स्तोत्रेणानेन च नरो याऽ्स्मान्‌ स्तोष्यति भक्तितः] | स्तो से जे महप्य भक्ति पूर्वकं सारी स्तुति ' 
त्स्य तुष्टा चयं भोगानात्यजञानं तथोत्तमम्‌ ॥२३]| करेगा उससे सन्त दोकर दम च्छे सग ओर 


उत्तस आत्मज्ञान 1२३) शरीर की ्मासेग्यताः छन 
शरीरारेग्यमर्थश्च पुत्रपौत्रादिकं ठया । युभ, सादिक कगे । विष जोग श शाशा 


"द्धिः चतं स्तव्याः स्तोवेणानेन मै यतः॥२४।| छो न्द निरन्र इत स्तोजसे दमपय स्॒चिूरनी 


~ ----- ~~~ ~~~ ~~ 


५=यचप्यशनत्रयं श्राद्ध यद्यप्युपहतं भवेत्‌ | 


. ्न्यायेपात्तपितेत यदि वा कृतमन्यथा ।॥२७।॥। 


" श्रशरद्धया षा पुसपदम्भमाधित्य षा कृतम्‌ । 


॥ 6, 


॥ 


भम्लोचा नाम तत्वङ्गी तत्समीपे वराप्सराः ॥ ९ ॥ न्नर मनोहर अप्स भ्र 


क 


श्रद्धः चय हमं भवत्या ग्रस्मलीतिकरं स्तयम्‌ । | चादिये ॥२७॥ हमको प्रसन्न करने बाले इख स्ते 
को यदि मनुष्य श्राद्ध मै भोजन करते हु ब्राह्मणो 


पटिष्यति द्विजाग्र्याणां युज्ञवां पुरतः स्थितः॥२५॥ ॐ श्रागे खडा होकर भक्तिपूर्वक पटे तो ॥ २५॥ इस 
सोत्रभवणसम्मीत्या सनिषाने प्रे छते । | सोम ॐ नने को दम मसज दोक अट रे 

1 । र हमा वह श्राद्ध श्रद्तय होगा, इसमें सन्देह 
श्रस्माकमक्षयं श्राद्धः तद्रषिष्यत्यसंशयम्‌ ।॥ २६ नदीं ॥ २६॥ चष श्राद्ध मै परिडत न हो, श्रथवा 
कोई विष्न दोजाय, अथवा छन्यायसे संचित धन 
से श्राद्ध र जाय ॥ २७ ॥ तथा चाहे श्राद्ध के 
= 3 __ श्रयोभ्य श्रौर जंरे पदार्थौ से उसको सम्पन्न किया 
भम्राद्धादर्पहतस्पहारस्तथा छृतेम्‌ । | जाय श्रौर उसे समथ. छदेश ओर विना बिधि 
श्रफालेऽप्यथवाडदेशे षिपिहीनमथापि वा '२८।। ॐ ही किया जया ॥ २८॥ च्रथवा चाद उसे श्रद्धा 
करे चिना, दम्भ का श्रा्रयज्ञेकर दी किसी मदुष्य 
॥ ने किया हो परन्तु रेसे द्ध से भी यदि उसमे 
शस्माकं तृप्तये श्रद्ध' तथाप्येतदुदीरणाद्‌ ॥२६॥ यद स्तो पदा जायगा तो हमारी दृति दोजायगी 


यत्रेतत्‌ पल्य 2 मतसुखावहम्‌ ॥ २९॥ हमको सुख देने वाला यद स्तोघ्र जिस 
त्‌ पठ्यते श्राद्धं स्तोत्रमस्मसुखाषहम्‌ । क 


श्रस्माकं जायते वृप्िस्तत्र द्वादशवार्षिकी ॥२०।॥ तक तृपति रहती २० ॥ हेमन्त रतु मे भ्राद्द 

| करके इस स्ता को पटने से दमारी वार वपं 
मनते द्ादशाब्दानि दप्तमेतत्‌ भयच्ति । तक वक्षि रहती है तथा शिशिर तुमे पेखा 
शिशिरे दविगुणाव्दांश दपि स्तोत्रमिदं शमम्‌२१॥ करते से यद स्तो चौवीस वप तक हमको तप्त 
रखता दे ॥ ३९ ॥ वनन छतु म धाद करके श्ल 


वन्ते षोड़श समास्वृप्तये श्राद्धकम्मणि । | स्तोत्र को पटने से सोज्ञद वपं तक श्रौर उसी 


म $ पकारं श्रीप्म ऋतु मे भी पेखा करने से यद स्तो 
प्ीपमे च पोदृश्॑तत्‌ पठितं वृष्तकारणषू ॥२९॥ हमको सोलह वपं तकः दृप्त रखता है ॥३२॥ दे 
विकलेऽपि कृते श्राद्धं स्तोत्रेणानेन साधिते । रचि ! चदि श्राद्ध मँ कतां को विकलता दोजाय. 
तो मी दस स्तोत्र की साधना से रीर वर्प ऋतु 


वपासु तप्तिरिस्माक्रमक्षया जायते श्च ॥२३।॥ ये रद्ध कर्फे इसको पद्ने से हमारी शक्तय ठि 


शरतालेऽपि परितं श्राद्धकाले भरपच्छत्ि। | दोती है ॥ ३३ ॥ शरद ऋतु मे श्रादध-समय पदा 
हश्मा यह स्तोत्र दम ल्लोगों को पन्द्रह वपं तक 


अरपाक्मतवर लपसि पचदशाब्दिकाम्‌ ॥र४। । ठप्ति-कारक दै ॥ २४॥ जिस घरमे कि इस स्तोत्र 
यस्मिन्‌ ग्रहे च लिखितमेतत्‌ तिष्ठति नित्यदा । | फो लिख कर रकखा जायगा व्हा दम श्रद्ध म हर 
सन्निधानं कृते शराद्धं तप्ास्माकं भविष्यति ॥२५।॥ समय समीप दैग ॥ ३५ ॥ इसलिये दे महाभाग , 

> 2 तुमको श्राद्ध मै भोजन करते हृ बरहम र; 
तस्मादेतत्‌ ल्या शराद्धं विप्राणां शजं पुरः । | शरे खड़े दोकर इस स्तान्रको हमारी पुष्टिफे लिथे 


„अवयं महाभाग अस्माक पष्पितुकम्‌ ॥२६॥॥ सुनाना चादिये ॥ २६॥ 


नि 
५५ 


इति श्ीमारकण्डेयघुराण के रौच्य मन्वन्तर मे पिद्वरभदान नानं &७ौ अ० समाप्। 


--- ~~ 
अटानवेवों अध्याय 
मार्कंडेय उवाच मार्करडेयजी वोरो-- 
ततस्तस्पान्दीमध्यात्‌ सयुत्तस्थौ मनोरमा । “ इसके अनन्तर नदी के मध्यमे से प्क छन्दर 
लोष्चा नास निकली ॥॥ 


सा चोवाच महात्मानं रुचि सुमधुराक्षरम्‌ । वड न्दर अष्लरा अम्लो चिनय पूर्वक मघुर' 


३३२. साकंण्डेयपुराण ०.६६ 


कक 


--------- 


1 # ५ ~ न ("श 
प्रश्रयावनता पुरः भस्लोचा पै वराप्यराः ॥ २ ॥ बाणी से महात्मा सुचि से वोठी ॥२॥ मेरी णक 
¦ अरतीव रूपिणी कन्या मत्सुता तपतां बर । | ज्रतयन्त छन्दसी वन्या है जो कि यदस ॐ षु 


~+“ 


जाता वरुणपुत्रेण पुष्करेण क ॥ २ ॥| महात्मा पुष्कर से उत्यन्न हुई ह ॥ २॥ उस सुन्दर 
तां गृहाण सया दत्तं मायया वरपर्णिनीम्‌ । | ब चातर कलया चाप पती सपसे पद कर. 
मटुमहामतिसतस्यां सश्पू्यति ते घतः ॥ ४ ॥ उखे शपते णक प्र महाविमान मड या । 
माकडेय उवाच माकरडयजी वेल्ते- ५१४ 
तथेति तेन साप्युक्ता तस्मात्‌ तोयाद्वपुष्मतीम्‌। "देखा ही होगा" इस प्रकार खचि फे फटने पर 


¡ मालिनी ॥ उस छष्सया ने मालिनी नाम एक सुन्दर कन्या 
उञ्जहार तत्‌; कन्या 1 नाम्‌ नामतः ५॥| को जल भे से निकाला ॥५॥ ुनिवर रूचि ने 


नद्या पलिने तस्मिन स॒रुचिष्ठुनिसत्तमः । | वडुत से सुनियों को खुला कर नदी के किनारे 
जग्राह पणि विधिवद्‌ समानाय्य सहामुनीन्‌।। ६ ।| विधिवत्‌ उस कन्या से पाणिघरहण किया ॥ ६॥ 


। 6 महावीर्यो महामतिः । | उख कन्या से उसके मदावलबान्‌ नौर ुद्धिमान्‌ 
तस्या ¢ सुतो जहे महा हामि; 01 
रऽ पिनाम्ना ख्यातो बरुधातले ॥9॥|| नाम पर सोच्य नाम से परसि हा ॥ ७॥ -उसके 


तस्य मन्वन्तरे देवास्तथा सुपत्षयश्च ये। | मन्वन्तर मे देता, सप्त ऋषि तथा उसके पुज जो 
राजा लोग इणः उनको मे भली 
तनयाश दपा ते सम्यक्‌ कथितास्तव ॥ ८ ॥ य सो इ उनको नं मलौ भकार तुमसे क 


र । का ह ॥ ८ ॥ इख मन्वन्तर के सुनने से मञुपयो 
दवस्तथारोग्यं धनधान्यसुतोद्धवः । | के लिये निस्संदेह धम की चदधि, आ्रासेम्य, धन,. 


दृणां भवस्यसन्दिधमस्मिन्‌ मन्वन्तरे श्रते । & ।॥| धान्य अर पुत्रादि कौ पाति दोती है ॥६॥ दे 
त्‌ पर रा महानि करष्ुकिजी ! पितरो तथा गसो की स्तुति. 
पितरस्तव तथा श्रुत्वा पिदणाज्च तथा गणान्‌ । | खनने से उनः भसाद से सव कामना सफ़ल 


सर्व्वान्‌ कामानवाभोति तससादान्महाञुने ॥१०॥॥ सेठी ह ॥९०॥ 
इति भ्रीमाकैण्डेयपुराणएके रौच्य मन्वन्तर मे मालिनी परिणय नाम ६८ ० समा । 


- प - म क्ः - | 


निन्यानवेवं अध्याय 
माकैरडय उवाच माकेरडेयजी बोत्ते-- 
ततः परन्तु भोस्यस्य समुत्पत्ति निशामय । इसके वाद भौत्यः मञ्ु की उत्पत्ति तथा उने 


देषादीस्तया पुत्रास्तथैव वरुधाधिपान्‌ ॥ १॥ त ९ भ्र स 
चभवाङ्किस्वः शिष्यो कोपनः {न हप उनका खन! ॥९॥ अङ्गिरा मुनिके शिष्य 
राज्ञ्यः शिष्यो मूतिमाम्नातिकरोपनः | , सूति बड़ बोधी ये । चे निक बात व दनः 
चणएडशापभदोऽलयेऽथं शुनिागस्यसम्यवाक्‌|। २ ।। के लिये उदयत होजाते तथा वड़े कडवादी थे ॥२॥ 
तस्याश्रमे मातरिश्वा न॒ अवावतिनिषटुरम्‌] | उनके भयस उनके छाम पर पवन कोई उत्पात 
नातिदापं रविशक्र पज्जन्यो नातिकरमम्‌ | ३।। चच चरता था, खयं अधिक ताप नदीं करते तथा 


निभींच शीतां ती . | मेघ इतना जल न वरसाते जिससे कीचड़ हों ॥ 

2 १ १1 ह| । । असत्‌ $ ५ 
॥ परिपूर्णोऽपि र ममि । | उन क्रोधी सुनि के भय से चंद्रमा पूर होकर भी 
चकार भीत्या वं तस्य कोपनस्यातितेनसः ।। ४ ।॥ अधिक शीत न करता था ॥ ४ ॥ ऋतु भी उनकी 


ऋतवश्च क्रमं त्यक्त्वा शृक्ेष्वाभ्रमजन्ममु । | आह्ञा से अपने करमको छोडकर चराम के आस 


„ =+ छ सार्वकालिकम्‌ त 
. ` . एष्पफलं चक्रुसक्चया सा ॥ ४ \\। पासके चष्तो म सव कालके फूल श्नौर . फल दिया 


शभ्र° &£ 


हप्र अन्देन तस्याभ्रमसमरीपगाः । | 
कसणएदलुगताभ्रव भूतेभीता महासनः ॥ ६॥ 
नातिक्लेशसहो पिपर सोऽभवत्‌ रोपनो भृषम्‌ । 
प्रपुत्रश्च महाभागः स॒ तपस्यकरोननः॥७ 
- पु्फामो यताहारः शीतवातानलादतः | 
तपस्यामि विचिन्त्येति तपस्येव मनो दधे ॥ ८॥ 
त्येन्दुलातिशीताय नातितापाय भास्करः । 
छ्मभवन्मातरिष्वा च षयो नाति महामे ॥ & ॥ 
अआीड्यमानो इन्दे स भृतियुनिसत्तमः 
श्रनवाप्याभिलापं तं तपसः संन्यवर्तत ॥१०॥ 
तस्य भ्राता पुव्वाभटयघ्तं तेनाभिमन्तितः 
यियासुः शान्तिनामानं सिप्यमाह महामतिम्‌॥११॥ 
मशान्तमक्षप्रतिमं विनीतं गुरुकम्मणि 
सदोहृयुक्तं भावारशृदारं पुनिसत्तमम्‌ ॥१२॥ 
भूतिर्चाच 
प्रहं यङ्ग गमिष्यामि भ्रतुः शान्तं युवः 
तनाहूतस्तया चह यत्‌ कत्तव्य शृणुष्व तद्‌ ॥१३॥ 
प्रति जागरणं यद्र स्त्वया काय्यं ममाश्रमे 
तथा तथा प्रयत्नेन यथाभिनं शमं त्रभद्‌ ।'१४॥ 
मा्करडेय उवाच 
हृ्यात्ताप्य तथेत्युक्तो गुरुः एिष्येण शान्तिना । 
जगाम यज्ञं तं भरातुराष्रतः स यवीयसा ॥१५॥ 
स॒ च शान्तिवेनाहुयाषत्‌ पमिरपुप्पफलादिकम्‌ । 
उपानयति भूस्यथं गुरोस्तस्य महात्मनः ॥१६॥ 
स्रन्यश्च कुरुते कम्म गुस्मक्तिवशासुगः 
परशान्तस्ताषदनलो योऽसा मुतिपरिग्रदः ॥ १७ 
तं दृष पोऽ शान्तं शान्विरत्यन्तदुःखितः 
भीतथ भूतेवहुपा चिन्तामाप महामतिः ॥१८॥ 
क्रि करोमि फथं वात्र मवित्तागमनं गुरोः । 
मया प्रतिपत्तव्यं फं एते सुरतं भवेत्‌ ॥१६। 
प्रशान्ताधिमिमं पिष्टयःपदि पश्यति मे गुरः । 
ततो माँ. विषमे घय व्यसने सननियोक्ष्यति ॥२०॥ 
यद्यन्यमधिमत्राहमधिस्थाने करोमि तत्‌ 


भाकंर्डेयपुरार 


३२२ 


करते धे ॥५॥ जल भी मदात्मा भूति केभ्य 
स उसके श्रम के पाख तथा कमरडलु मे सदा 
भरा रहता था ॥दि। हे विप्र क्रौष्टुकिंडी ! चट _्ेश 
को सदन न करता तथा उसको श्चत्यन्त क्रो 
वेना रहत्ता था } पुज न होने के करारण॒ उस मदा 

भाग ने तपस्या करने का विचार किया ॥ ७॥ 

की इच्छासे जाड, गमी, वाग सदकः श्रौर मिता- 
हारी रहकर तपस्या करूंगा फेस पिचार किया ! 
दे करौष्रकिं शुनि ! उसके तपस्या करते हृष न ` 
यद्रमा ने अत्यन्तं शीतलता उत्पत्रकी श्रौर न सूर्यं 
ने शति उष्णता, तथा वाटर नेभी कोई उत्पात च 
किया ॥ ६॥ ङरेशों को क्षदकर तपस्या करने प्र 
भी भृति मुनि की श्रमिलापा पूणं न इहै तव उन्हों 
ने तपस्या करना छोड दिया ॥ १०॥ तव उनके 
भार सुबच्यां के यहां यज हुश्ा श्रौर निमन्बितत होने 
पर उन्होने ब्म जने की इच्छा से श्रपने शान्ति 
नामकः शिप्य से कटा 1२) बह शान्ति सतोगुणी 


विनीत, गुसक्म मे तत्पर, शभ कम मे रत श्चीर 
उदार श ॥१२१ 


भृति वोले- 

हे शान्ति ! श्रपने भाई सुवर्चा फे निम॑चण के 
कारण म उसके यप मे जाङंगा, अव जो तुमको 
करना है चह खनो ॥१३॥ मेरे आश्रम पर अचिको 
जाग्रत रखना तुम्दाया कायं दोगा, तुम प्रत्येक 
प्रयत्न ठेसा करना जिससे श्रन्नि शांत न दोनेपाते॥ | 
माक॑रडेयजी वोले- 

दस श्रान्ञा को सुनकर शिष्य शान्ति ने कहा 
किरेसादी होगा । शरीर ठेव भूति सुनि माङ के; 
निम॑ज्ण प्र उसके यज्ञ को चलते गये ॥ १५॥ शाति 
भी बन से समिधा श्रौर फल फूल लाकर गुरूदेव 
की श्ाज्ञानुसार कार्यं करने लगे ॥ १६॥ गुरूकी 
भक्ति के बशवरती दोकर उन्होने दसय कर्ममी : 
किया परन्तु भृति से परिग्रह की हदे भश्चि किसी 
प्रवर से शान्त दोग ॥ १७ ॥ उस श्रचिको बुभ 
छा देखकर शान्ति को वङ्ञा दुःख हु्रा श्रौर बह 

भूति के उर से अत्यन्त चिन्तित हृष ॥ ८ ॥ तै 

कटने लगेमे क्या करू, गुरं के आगमन पर 
क्या उत्तर दगा, अव मै क्या करः जिससे फि नभ | 
घृत हो ?॥ १६ ॥ जव गुरु इस चभ को बुरा | 
हृश्या डेसंगे तो चै सुपर क्रोध करेगे जिससे मुमे( 
बडा दुप्व दोगा ॥ २० ॥ यदि इस अच्च के स्थानः 
मे दसरी अथि लाकर रक्खं तो सर्वदशी मेरे २. 


यण्व प्रत्यक्षरग्मस सार्य म्‌ करिष्यति ।॥२१।॥ अव्या युको भस्म कर डालगे १२१॥ मै घदड़ा 


` ३९४ 


सोऽहं एप मुरस्तस्य निमितं फेप-शाप्याः | 
तथात्मानं न शोचामि यथा पएावं कृतं गुरोः . 


षट अ्रशान्तसनलं नूनं शप्स्यति मां गुर । 
अथवा पावकः करदधस्तयाभी््यो हि स द्िजभौ२३॥ 


यस्य प्रभावाहिवभ्यन्तो देवास्िष्टन्ति शासने । 
छतामसं घ मां युक्त्या कथा नाधषयिष्यति।।२४॥ 
माकडेय उवाच 

बहुधैवं षिचिन्स्यासौ भीतस्तस्य सदा युरो; । 
धयो मतिमतां श्रेष्ठः शरणं जातषेदसम्‌ ।२५॥ 
परचकार वदा स्तोत्रं सपार्देयेतमानसः। 
प चेकचित्तो मेदिन्या न्यस्तनानुः कृताञ्जलिः २६॥ 

शान्तिरवाच 


प्रो नमः सव्वेमतानां साधनाय महात्मने | 
(कदिपश्वधिषटयाय राजसूये पडात्सने ॥२७॥ 
मः समस्त देवानां इत्तिदाय सुपक्चसे | 
क्ररपाय जगतामशेपाणां स्थितिप्रदः ॥२८॥ 
शुखं सन्यदेवानां त्यात्तं भगवान्‌ हषिः 
' 0णयर्यखिल्लान्‌ देवान खलाः सव्यदेवताः 
तं हविस्खष्यमलमेभुपगच्छति । 
तश्च जलरूपेण परिणामशपेति यत्‌ ॥३०॥ 
नाचिल्लौषधीजन्म भवरत्यनलसारथे । 
गपग्रीभिरशेपिः सुखं जीदन्ति जन्तवः ।३१॥ 
्रेतन्पते नरा यन्नान्‌ त्वतष्टारओोपधीषु च | 
तिरदेवास्तथा दैत्यास्तद्र्षासि पवक ॥३२॥ 
पाप्याय्यन्ते च ते यत्नास्खदाधारा हताशन ] 
तः सन्वष्य योनिस्त्वं वह सच्पमथस्तया ॥३३॥ 
वता दानवा यक्षा त्या गन्पव्वेराक्षघाः। 
दपा; पशवो एृक्षा गमपक्षि-सरीरपाः ॥२४॥ 
प्यास्यन्ते खया स्यं संवध्यन्तेःच पाक | 
त्त एवोद्वं यान्ति स्यन्ते च तथा लयम्‌॥३५॥ 
पः छनसि देव सं खमस्सि पुनरेव ताः 


स्यमानारत्वया ताश्च पराणिनां पष्टकारणम्‌॥३६॥| दारा 


तेनोरूपेए कान्ध्या सिद्धेष्यदस्थितः 


कै ~-- ~~ ~ 


1 
म 


माकरुडैयपुराण 


श्र० ६६ 
पापी जो कि गुर फे कोच श्रौर शापका निमित्त 
हा | मेने ङ्स वातकोन सोचा जिससे यद 
पाप हुश्या ॥ २२॥ इख श्रग्नि-को धुमा इमा -देख 
कर शुर सुभको शाप देंगे श्रौरः मै उनके वल से 
इस प्रकार भस्न हो जाऊंगा निस प्रकार कद्ध 
होकर अग्नि प्रत्येक वस्तु को भस्म कर देती है ॥ 
जिखके पाव से देवता लोय भी डर कर शासन 
मे रदतेहै रे गु्का सुमे शाप न लगे चह उपाय 
कौनसा हे 1४" 
नाकीरडेयजी दोले- 
गुरु के डरसे वदहुत चिन्तित टोकरः बुद्धिमान 
मे श्रेष्ठ शान्ति सुनि ने अग्निक्ीशरण ली ॥ २५॥ 
एकाग्र चित्त होकर, धुखले पृथ्डी पर टेक कर 
श्मौर हाथ जोड़कर रग्नि की स्तेजो से स्तुति 
करने लगे ॥ २६॥ 
शान्ति चोले- 
सव जीवों के साधक, महात्मा पकदिपंच- 
थानी, राजसूय यज्ञ मे पडङ्त्मा अभिनि को पम 


है ॥२अ। मै उस अग्नि को रणाम करता हं जोसव | 


देषताश्नों को वृत्तिदायक हे श्रौर कान्तियुक्तयुक्र ` ` 


रूप, अशेष जगते की स्थिति फा कारण दे ॥२८॥ 
हे अभिनि ! तुम खव देवताश्रो के सुख द्ये । तुम्हारे 
दारा हविष्य भक्त करके भगवान्‌ सवं देवताश्रों 
को ठृत करते है रतः तुम सव देवता के प्राण 
हो ॥२६॥ आपके भीतरः दवन करिया हुआ हवि 


समलमेधत्व को पाक्त होकर परिणाम म जलरूप ` 


होजाता है ॥६०॥ हे अनिलसारथे ! उस जल से 
समस्त श्रौपधियां तथा खाद्यपदाथं उत्प दोते हँ 
जिनसे कि सव जीव सखपूरवंक जीदित है ॥ ३६॥ 
हे पाचके ! ्रापकी उत्पन्न श्रौषधियों से मयुष्य 


यज्ञ करते हँ रौर उन यज्ञो से देवता, दैत्य श्रौर ` | 


राक्तख ॥ ३२ ॥ तक्ष होते ह 1 हे हुताशन ! श्रापही 
यको के आघार 
तथा सर्वमय ह ॥ ३२ ॥ देवता, दानव, यन्त, दैत्य 


गन्धव, राप्तस, मदच॒प्य, पथु, चन्त, सग, पकती तथा 


} सतः आपी सव के कारस्‌ ` 


खपे रादि ॥ ३४ ॥ सव श्राप दी द्वारा ठक्च - होते . ` 


हे ! हे अग्नि! आपी इनका संवरद्ध॑न करतेहै वथा 
आपह से इनका उत्कपं रौर आपी मे इनका 
लय हे ॥ २५ ॥ डे देव ! आपी जलो को उत्पश्न 
करते तथा आपी उनको पो जाते है 1 आपके 
पचाया ह्र जसं दी प्राणियोकी पुष्टिकरता 


है ॥३६। देषताशरो मे तेज रूपसे, सिद्धो म कान्ति ` 


श्र° ६& 


-------*~ 


विषरूपेण नागेषु 
महर्नेषु भवान्‌ कोधो मेदः पक्षि-मृगादिपु । 


अबष्टम्भोऽसि तरुपु काटिन्यं सवं मदीं रति । । 


जले द्रवल्यं भगवान्‌ नलसूपी तथानिले ! 


व्यापित्वेन तथेषाप्रे नमस्यास्म च्यवस्थितः॥३६॥ 


त्वभग्र सल्वभूतानामन्तश्वरसि पालयन्‌ । 


त्वामेकमाहुः कषयस्त्वामाहुखिविधं पनः (४०॥ 


त्वामषटपा कट्पपित्या यज्ञमाद्यमकत्पयन्‌ | 


त्वया खष्टिमिदं पिशवं बदन्ति पर. †यः॥४१॥ 


त्वामृते हि जगत्‌ सव्वं सद्यो नयेद्धत।शन । 


तुभ्यं छता द्विजः पूजां खकम्मपिहिता गततिम्‌४२॥ 


भरयाति हव्यकव्यावे; स्वधास्वादाभ्युदीरणात्‌ । 


परिणामात्मवी्थां हि पाणिनाममरार्धित ¦ ४३॥ 


दहन्ति सववभूयानि ततो निष्क्रम्य हेतयः । 
जातवेदस्तववेय विश्चखषिमहाय्‌ ते 
तवैव वेदिकः कर्म्म स्व्भूतार्मकं जगत्‌ । 


नमस्तेऽनल पिद्ाक्ष नमस्तेऽस्तु हुताशन ॥४५॥ 


पावकाग्रे समस्तेऽस्तु नमस्ते हन्यदाहन । 


त्वमेव चुक्तपीतानां पाचनादिश्धपावकः ॥४६॥ 


शस्यानां पाककत्तां तं पोष्टा तं जगतस्तथा । 


त्वमेव मेधस्तवं बाथुस्तवं वीजं शस्यहेत॒ङम्‌ ॥४७॥ 


पोषाय सर्वभूतानां भूतभव्यभवो हयसि । 


तं ज्योतिः सच्येभूतेषु त्वमादित्यो विभावु॥४८॥ 


त्वमहस्त्यं तथा रारिरुभे सन्ध्ये तथा भवान्‌ । 


हिरण्यरेतास्त्वं ,ह दिरण्योद्धवकारणम्‌ । ४६॥ 


हिरए्यगरभश्च भवान्‌ रिरस्यसदृशममः । 


ल हू क्षण खं तवं बरुटिस्त्ं तथा लवः ॥५०॥ 


कला-काष्ठा-निमेषादि-रूपेणासि नगसमो । 


स्वमेतदसित्तं कालः परिणामात्मकेा मवान्‌ ॥५१॥ 


या निष्ठा मवतः काली कालनिष्ठाूरी प्रभो । 


भयान्नः पाहि पापेभ्य एेदिकाच महाभयात्‌ ॥५२ 


कराली नामं या निष्ठा महाप्रलयकारणम्‌ । 


तया नः पाहि पापेभ्य पेहिकाच् सहामयात्‌।।५२॥ 


मनोजवा च या जिष्ठा क्षधिमागुणएलक्षणा । . 


॥4:1. 


भाकंण्डेयघुराण २३५ 


वायुरूप; पतग्रिषु ॥२७॥ सूपसे, नागो सँ विष सूपसे तथा पक्ियों मे वायु 


रप से ॥ २७ ॥ चप्यं मे रोध रूप होवःर, पशु. 
पत्तियां मे मोह रूप होकर, बृतों मे श्रवष्टम्भ रूप 
होकर श्चौर पृथ्वी म कडोरता रूप होद.र ॥ ३८॥ 
जले दवणरूप ओर वायुम चेगस्प त्रा आकाश 
मं व्यापकता रूप होकर दे भगवान्‌ च्चम्नि ] श्राप 
स्थित है ॥३९॥ हे श्रग्नि श्राप सव जीर्वोक्रा पालन 
करते हप उनके श्रंतस्तल मे धि चरतेह } आप एक 
दे, परन्तु कतियों ने ्रापको दीन प्रकार का कटा 
है ॥४०॥ परम छपर आपको यज्ञ के श्रादि मँ आड 
भ्रकार का कटिपतत करते हैं शरैर यह कते है फि 
संसार चापे दी उत्पन्न है ॥ ४१॥ हे इुताशन ¦ 
श्रापके मरनेषर सव जगत्‌ नए टोजायगा । श्चापकी 
पूजा करके ब्राह्मण श्रपने बिदहित कम को ॥४२॥ 
स्वधा शरीर खाद्य रादि का उश्चारण करके व्य 
कव्य रादि से पाप्त होते है । हे देवतताञओंसे पूजित 
श्रग्निदेवे ! सच प्राशियों का आत्मा रौर पराक्रम 
्रापटी से दै ॥ ४३॥ हे जातवेद ! हे मदाद्‌ नि 
श्रापदी की ज्वालाये सव भूतें को जलातीरै तथा 
इस विश्व की खष्ि श्चापदी से है ॥ ४६॥ पदी 
वैदिककर्म श्नौर सव जीवो से युक्त जगत्‌ रूप है । 
हे अनल! हे रपिगात्त ! टे इतागन ! आपको मेँ 
वार वार भ्रणाम करता ह ॥ ४५) हे श्रादि परचक। 
हे हव्यवाहने ! आपको नमसकार है । आपदी खमे 
पौर पिये हुए को पएचाते है अतः आदी दिभ्व- 
पायक है ॥ ४६ ॥ श्रापी अश्नोका पाक करते रौर 
जगत्‌ का पालन करते है । आपी मेध्‌, वायु, 
शरोर श्र के वीजरप ॥४७॥ सय जीनो के पालन 
श्रौर कल्यांर फे क्तिये चापा जन्म हा है । श्राप 
ही सव जीयो मे ज्योति भौर शादी खयं है ॥४२॥ 
मापी दिनरा्नि तथा दोनों संध्यापे ह! हे अभ्र! 
श्रापी दिररयरेता अौर खुवणं को छार ६ै॥०६॥ 
छ्मापदी हिररयगर्भं है ्रौर आपकी कान्ति वणं 
के समान.हे । मुह, चण, पुटि तथा लव पदी 
ह ॥ ४०॥ हे जगत्‌ के प्रु ! पडी कला, काष्टा, 
निमेष आदि रूप से मस्त कालके स्वरूपं चीर 
श्रापही परिणामस्प है ॥५१॥ हे प्रभु! आपकी 
काली जिद्धा कालचिष्ठा करने चाली है ! उसी के 
दवाय आप सांसारिक भय तथा पाप से हमारी 
रक्ता कीजिये 1२ आ्रापकी कराली माम की जिह 
म्टापलय करने बाली है, उससे श्राप हमारे पापों 


छीर सांसारिक मय से हमारी सदा कर ॥ ४२॥ 
लधिमा शण लक्तशबालतौ जौ ्रापक मनोजा {ह्या 


-माकरडेयपुराण 


है उसके दाय अ्पःहमारे पापौ श्नोर सांसारिक 
भय से हमारी र्ता करं ॥ ५४॥ च्रापकी सुलो- ` 
दिता नाम जह्वा ओां की कामना पृं करतीहै 
उसीसे श्राप हमारे पापों चनौर सासारिक भय से 
हमासीं रक्ञा करं ॥ ५५॥ पारियों के सग नाशकरते . 
वाली सधूम्रवणं नाम जिह्वा के द्वारा श्राप हमारे 
पापो श्रौर सांसारिकिभयसे हमारी रक्षा करं ॥ 
सव संसार का मन चंचल रख्ने वाली जो स्फ 
सिगिनी नाम श्रापरी जिह्मा दै-उसके दारा दमारे 


३३६ श्र° ६६ 
तया नः पाहि पापेभ्य एेहिकाच महामयात्‌ ॥५४॥ 
करोति कामं भुतेभ्य या ते जिह। सुलोहिता । 

तया नः पाहि पापेभ्य रएहिकाच महामयात्‌॥५१५ । 
सधूम्रबणां या निहा प्राणिनां रोगदाहिका । 

तया नः पाहि पापेभ्य पेदिकाच महामयात्‌॥५६॥ 
स्फुलिङ्धिनी च था निहा यतः सकलपुद्गलाः 
तया नः पाहि पापेभ्य पेटिकाच्च महाभयात्‌ ॥५७॥ 


या ते पिश्वा सदा जिङ्व प्राणिनां शम्दायिनी | 


तया नः पाहि पपेभ्य देहिकाच्च महाभयात्‌॥५८॥ 


पिङ्गाक्ष लोहितग्रीव ृष्णवणं हुताशन । 


राहि गां सरव्यदोषेभ्यः संसारादुद्धरेद माम्‌ ॥५६॥ 


परसीद बहे सप्तार्चिः शानो हग्यभादन । 
छ्रभि-पावक-शुक्रादि-नामाष्टमिस्दीरितः 
श्रभेऽे सव्वंभृतानां सथुदम्‌त पिभावसो । 


प्रसीद हव्यवाहाख्य अभिष्टुतं मयान्यय ॥६१॥ 
समृद्धिमान्‌ 


त्वसक्षयो वद्विरचिन्त्यरूपः 
दुष्मसदोऽतितीवः । खमव्ययं भीममरेषलोकं 
समुर्तको इन्त्यथवातिवीय्यैः ।६२॥ 

त्वयुत्तमं सक्वमेषसत्वहर्पुरदरीकस्त्वमनन्त- 
मीख्यम्‌ । त्वया ततं विश्वमिदं चराचरं 
इताशनेको बहुधा समत्र ॥६३॥ 

स्वमक्षयः सगिरिवना वञुन्धर। नमः ससेमाक- 

महर्दिषाखिलम्‌ । महादपेजररतश्च षाडवो 
भवान्‌ धिभृस्या परया करे स्थितः ॥६४॥ 

हताशनस्त्षमिति सदाभिपूज्यसे महाकतीं 
नियमपरेमरर्षिभिः । त्रभिष्टूतः पिविसिच 


-सोममेध्वरे बषटकृतान्यपि च हवींपि भूतये ॥६५॥ 


त्वं षिभः सततमिहेज्यसे फलाथं वेदाद्धष्वथ 
सकलेषु गीयसे तभ्‌ । खद्ध तोयजनपरायणा 


-द्वजेन्द्रा-वेदाङ्न्यधिगमयन्ति सन्वंफाले ॥६६॥ 


त्वंब्रह्मा यजनपरस्तथेव ` पिष्णुभतेशः 
सुरपतिरय्यैमा जलेशः । सुध्यन्दु सकलसुरासुराथ 
हव्येः .सन्तोष्याभिमतफलान्यथाभ्रवन्ति ॥६७॥ 
~ शर्बिर्भिः परममदोपघातदुषं संस्पृष्टं तव शुचि 


॥६०॥ 


पापा श्र सासारकः महामय स हमार रत्ताकर 


॥ ५७॥ प्रणियो को कल्याण देनेवाली अपनी 
विश्वासदा जिद्या से हमारी पापों नौर सांसारिक 


भय से स्ल्ञा करं ॥५८ हे पिगाक्न,हे लोहिनम्रीव ! 


कृष्णवसं हुताशन ! मेरे सव दोषो को दूर करके 
दस संसार से मेरा उद्धार कसो ॥ ५६॥ हे श्रभ्नि। 
श्राप प्रसन्न दयं, आप सत्ता, शान, दच्यचादन, 
अग्नि, पावक, शुक रादि आठ नामों से पुकररे 
जाते दै ॥ ९०॥ दे श्रग्नि ! श्राप सव जीवसे पटले 

त्पन्न इष्टे । हे हव्यवाहनःहे अभिश्रत डे अव्यय! 
राप प्रसन्नं ॥ ६२॥ श्राप श्रच्तेय अग्नि, शरचित्य 
रूप, सरद्धिशाली, दुष्पसद, शरतिती्र, ` छ्रव्यय 
श्नौर भीम ह । आप मूर्तिमान्‌ दोकर श्रशेप लोकों 
को नर करते दै तथा अति पराक्रमी है ॥६२॥ 
आप उत्तम जीच रहै, प्रत्येके जीव के हदय कमलम 
रहते ह, श्राप श्यनन्त स्तुति करने योभ्य तथा सव 
जगत्‌.के व्यापद । हे हुताशन ! श्राप पक हं परतु 
श्नेक प्रकार से संसार मे स्थित दै ॥ ६३॥ श्राप 
श्रक्षय है तथा पवेत, यन, पृथ्वी, काश, च॑दमा 
सय, दिन, राति ये सव श्ाप्रदी है) समुद्रे -वडः 
वानल च्रापही हँ तथा परम विभूति को आप सदा 
हाथ मे लिये रहती है ॥६९॥ हुताशन कहकर यक्षो 


भ श्रापकरो महान्‌ ऋषि लोग पूजे । यज्ञम श्राप 
कीं स्तु्पि करके सोमपान करते तथा षट्‌ 


उच्चारण करके हतिप्य भद्चण करते ह ॥ ६५॥ 
फलार्थी दोकर बराह्मण सदैव आपका पूजन करते.“ 
ह तथा खच चेदाज्ञं मे आपस गान कर्ते हं। 
ब्रह्मण लोग आपके निमित्त य्ञपरतयण . दोकर 
सदा वेदाङ्गो. का अध्ययन करते ह 1 ६६ ॥ यक्ष 
परायण दोच्छर जह्य, विष्टु, महेश, इन्द्र, शर्मा, 
चर्ण, सूयं ओर चन्द्रमा श्रादि, सव देवता ब 
राक्ञस ध्नाप्रको हविष्यं से संतुष्ट कर श्रमितफलें 
को पाते दँ ॥द७ चाहे दिते दी वञ्च उपघात से 
दूषित क्यो न दो गया हो -श्मापकी उ्वाला्नो -कै 


प्र १०० ४३ माकंरडेयपुराण ३३७ 


जायते समस्तम्‌ । स्नानानां परमसतीव भस्मना । स्पशे से सव शुद्ध होजाता ह । संध्या समय = 


स्‌ सन्ध्याया तीव सेष्यरं उपरान्त सुनि लोग श्रापकी भस्म शरीर ` 
त्‌ यां एनिभिररी सेष्यस तत्‌ ॥९८॥ लगाते दै एद हे म्नि ! है शुचि ! हे वायु ! „ 


परसीद वद्वं॒शुचिनामधेय प्रसद्‌ वायो | निमलातिरीपि ! हे पावक ! वैय त ! हे य 
विमलातिदीके । पसीद मे पाचक वच्‌ ता | दे हव्याशन ¦ श्राप प्रसन्न हो शौर मेरी रक्षा करे 


प्रसीदं हन्याशन पाहि भां त्वम्‌ ] ।६६॥ ॥ ६६ ॥ हे श्मनि 1 श्रापका जो कल्यायमय < 
यत्‌ ते बह शिवं रूपं ये च ते सप्त हेतयः । क 1 व हमारी < 
तः पाहि नः स्तुतो देव पिता पुत्रमिवास्मनम्‌।७०।॥ रक्ता करता है ॥ ७०॥ ~. 


इति श्रीमाकणटेयपुराणके भौत्य मन्वंतरमे अग्नि स्तोत्र नामं ६६्वां भ०्स०। 


~व अ ~व ~ 
सौशं अध्याय 
माकैरडेय उवाच माक॑रडेयजी वोल्े- 
एवं स्तुतस्ततस्तेन भगवान्‌ हग्यषाहनः । इस प्रकार शान्ति सुनि द्वारा स्तुति किये 


लामालातस्त || जाने पर भगवान्‌ चिदेव वहुतसी ज्वालां से 
स्वा च तस्यासीदग्रतो यने ॥ १। युक्त होकर शान्ति सुनिके सन्मुख चाये॥१॥ स्तोत्र 


वेभावसुः र यः म 
देवो बिभावघुः भरीतसतोरेणानेन वै हिन । | से असन्न दोकर चदेव शानत सुनि से मेष क 
त॑ शान्तिमाह प्रणतं मेघगम्भीरवागथ ॥ २॥| खदश गम्भीर बाणी से वोते ॥२॥ 
अग्निरुवाच छि वोज्े- ॥ 
परितुष्टोऽस्मि ते बिभ भक्त्या या ते स्तुतिः छता । | = दे विभ । भक्ति १ स्तुति तुमने की है 
। ६ उससे मे खंतष्ट हआ मे तुमको बर देनाचादता 
वरं ददामि भवते पराध्येतां यत्‌ तवेप्ित्तम्‌ ॥ ३॥| ह, जो वम्दारी इच्छा हो बद मांगो ॥२॥ 
शान्तिरवाच शान्ति बो्ते- 
भगवन्‌ ृतङ्कस्योऽस्मि यत्‌ त्वां पश्यामि रूपिणम्‌ । | दे भगवन्‌ । का देखकर नँ 
- „| कृतकृत्य ह । रव भक्तिसे नस्र मे जो $ कहता 
तथापि भक्तिनमरस्य भवता श्रयतां मम॒ ॥ ४।| बह ५ 8२ 
भ्रातुयङगं गतो देव ममाचारययो निजाश्रमात्‌ । | से भाई ॐ यक मे गये दै, श्राप सा यत्न कीजिये 
श्रागतश्चाभ्मं धिष्व तत्सनाथं स पश्यतु ५।| कि जिससे वे श्रा्चमको श आपको थञ्च- 
ममापराधात सन्तयक्तं धिष्टय' यत्‌ ते बिभावसे । | लित पावे ॥५॥ दे विभावसु ¦ मर चपर से जो 
छितं सोऽच पव्ववत्‌ पश्यतं दविनः॥। ६ श्रभ्नि शान्त होई थी उसको मेरे गुरु लटने पर 
तत्‌ स्वयाधिष्ठितं सोऽथ त्‌ पश्यतां दविनः॥।8; पूयवत्‌ भजमलित दे ॥ ९॥ दे देव 1 यदि शराय 
तथान्यदपि मे देव सादं इषे यदि! | प्कश्चौर शषा सुमपर करं तो रे निषु गुड को 
` पुत्रो पिशिष्टो भवत्‌ तदपुत्रस्य मे गुरोः | ७ ||| एक उन्तम पुत्र उत्पन्न दोजाय ॥७॥ श्नोर मेरे गुर 


# ४ +) 4 < [> (4 ५ यैस ४ 
स करिष्यति \ जरी ्रीति उस पुज से रक्खं वेसी दी समस्त 
व जीवों से कोमल भावयुक्तं होकर रक्ख ॥८॥ हे 


तथा समस्तसत्त्येु भवत्वस्य मनो मृदु ॥ ८ ॥| व्यय ! यदि भरे इछ स्तो से श्रापको भीति 
पश्यतां स्तोभ्यते येन परीतं यातोऽपि मेऽन्यय । । उत्प दुई है तो यदी स्तोत्र मेरे गुख की कामना | 
सतो्रेण तस्थ वरदो भवेथा मत्मसादितः ॥ ६ ॥| पूं करे ॥॥६ 


५ € रडयजी 
भाक्षीरडेय उवाच माकं वेले- प 
इस प्रकार उस व्राह्रु भ्रष्ट क खन चुनकर 


एतच्छुत्वा वचस्तस्य तमाह द्विजसत्तमम्‌ । | ओर नके स्तो्से श्रारधित र्दन शान्ति 


३३८ माकैर्ठेयपुराण भ्र° १०० 


सरोक्रेखरायितो भये गुर्भक्त्या च पावक; ॥ १०. मनि की युख्भक्ति देकर कटने लगे ॥० 
‡: छष्वस्वाच । श्रते चोले- 
सरवै यतो बह्मन्‌ याचितं ते बरद्वयम्‌ । |. दै वहन्‌! आपने शुके लि दो वरमनि परंतु 
भीतिस्वय्वतीव महासने ॥११; ङ्च भ न मागा, इस हे महासुनि ¦ 
५ द ममे मेरी प्रीति ओौर भी अधिक होम हे ॥ ९९॥ ` 
भिष्यत्येतदखितं गसंयत्‌ प्रार्थितं तया । तुमने जे ङ्ध युर ॐ लिये माँगा दे चह सव पृणं . । 
प्री समस्तभतेषु एुज्रथास्य भरिष्यति ।॥१२॥| दोगा ! सुनि की रूष व से प्रीति य 
-पन्वन्तराधिपः › तथा उनको पक पुज भी होगा ॥ १२॥ तुम्दार शुर्‌ ` 
व १ 2 १ के भौत्य नाम प्क पुत्र होगा जो कि महली, 
2 ॥॥*५॥॥ पराक्रमी, विद्धान्‌ करीर मन्व्तयधिप दोगा ॥ १ 
अनेन यञ स्तात स्वाप्यते सां समाहितः 1 | जो कोई एकाग्र चिच्च होकर इस स्तोत्र से मेरी 
पतस्याभित्तपित्ं सव्वं पुण्यश्वास्य भदिष्यति । १४ 
भ ४५१ [99 त्‌ ४४ 
यजु पव्यैकालेषु वीर्ेज्याहोसकम्मसु । 


स्तुति करेगा उसढी सव मनोकामना पृश दसी ॥ 
यज्ञो, पौ, सीथो, दोमकमौ आदिमे धमे केलिये - 
पधस्मत्य पटतामेतन्मम पुष्टिकरं परम्‌ ।१५॥ 
अहोरात्रकृतं पापं श्रतमेतद्‌ सङृ््िन । 


इख स्तोत्र को पटने से मेरी परम पुटि दोमी॥९५॥ 
हे द्विज ! जो मेरे इस तुषटिकारक स्तोत्र को एक 

नाशयिष्यत्यसन्दिग्यं मम तुष्टिकरं परम्‌ ॥१६॥ 
अहोमकालदोषादीन्‌ नयाम्येरपि तच्छतः 


वार खुनेगा उसका क दिन रान्न का किया हा 
पाप निस्संदेह नर दोजायगा ॥६६॥ इस स्तो को 
ये दोषास्तानिदं सयः शमयिष्यति संभृतम्‌ ॥१७। 
पणमास्याममवास्यां पन्वसखन्येु परस्तवः । 


भली प्रकार सुनने से अटोम, काल श्रौर श्रयोग्य 
कर्म सम्बन्धी सव दोप न्ट होजायेगे ॥ १७॥ 

4ममेष संश्रुतो मचैभविता पापनाशनः ॥१८॥ 

+ । माकरडेय उवाच्‌ 


५ 
¢ 0 
३ ॥ 


। 


पूर्णमासी, अमस च्रथवा अन्य पवो मे जो पुरुप 
मेरे इख स्तो को सुनेगे उनके सम्पू पाप नानत 
को पपत गि 1२८ - 


भाकरञ्यजी वोते- 


त्युक्त्वा भगवानमिः पश्यतस्तस्य वै युने । दे ऋष्क सुनि ! मगवान्‌ अञ्चि यह कद कर 
¢ [५१ क ५, 
वभूवादषानः सयो दीपस्यो निद तो तथा 1१६॥ उसके देखते-देखते इस यकार श्रय दोगये जिस 


भकार दीपक बुभ जाता है ॥ १६॥ अग्निदे के 
अडभ्य दने पर शान्ति सुनि ने भी प्रसन्न चित्त 
तथा रोमांचित शसीर होकर गुर के आश्म मे 
भरवेश व्या ॥२०॥ हाँ पर गुद कौ रग्नि को पूर्व 
वत्‌ भञ्वलित देखकर उनको चड़ भखन्नता इ ॥ 
इसी अवसर पर उनके महात्मा गुरख्मी अपने भाई 

के यज्ञ से लौटकर श्राथम पर पचे ॥२२॥ उनके. 
सिष्य स्तान्ति मुनि ने गुड के -आगे जाकर उनके 
चरणो मे प्रणम किया तथा उनकी पूजा कौ! .` 
गरहीतासनपूनय तमाह स॒ तदा गुट ॥२२।। व व 

वत्सातिहाढं तयि मे तथान्येषु च जन्तुषु ! | अपेद अधिक पदि दोग ह ! भ नदी चानः , 
न वेति ज्िमिदं चब्वेदत्सेतद्‌ कथयाञ्च मे ॥२४।॥ यह च्योकर हुई, यदि वुम्दे ङु मालुम हो तो 
ततः स लान्तिस्तत्‌ सव्वंमाचाय्यांय महासने! | शी को 1२9 तच विगर शान्ति ने अपने आचायं 


चभिनाशादिकं विः समाचरे यथात्यस्‌ १२१ महामुनि ऊे भति श्रम्नि दुमः जाने श्रादि का सव ` 


व चन्तान्त पृणंत्या छनादिया 1२४ यह खनकर शुर ` 
नछत्वा परिष्यज्य - सनेहद्रनय॒नौ गुर 1 | स्नेद से नयनो मे जल भरलाये थोर उन्होने शति 


पच शान्तिगेते बहौ परितुषेन चेतसा | 
हष॑रोमाश्िततदुः भ्रषियेशाभ्रमं गयोः ॥२०॥ 
जाज्वल्यमानं तत्रास गुरुषिष्टय हुताशनम्‌ । 
ददश पव्येवह्‌ प्राप त रमां सदस्‌ 1२१। 
एतस्मिन्नन्तरे सोऽपि गरुस्तस्य महात्म; । 
भ्रातु्वीयसो यङ्ञादानगाम खमाभमम्‌ ।२२॥ 
तस्याग्रत्थ शिष्योऽ्पा चक्रे पादाभिवन्दनम्‌ । 


-प्र० १०० माकंण्ठेयपुराण २३२६ 


शिष्याय परददौ वेदान्‌ साङ्गोपाङ्गान महाने॥२६ ॥ को छाती से लगा लिया श्रौर उसके सम्पू २ 


भतेरनाय बेदाङ्खो का ज्ञान करा दिया ॥ २६॥ फिर भूति „^ 
भौत्यो नाम मड्तस्य पत्रो त। | के भौत्य म नाम को पुत्र उत्य्न हुञा । श्रव ध 


तस्य मन्वन्तरे देादषीन्‌ भूषांथ मे शृणु ॥२७॥| ॐ मन्वन्तर कै देवता, ऋषि तथा राजा्को _; 
भविष्यस्य भविष्यांस्तु गदतो मम विस्तरात्‌ । ` | से खनो ॥ २७॥ उस मन्वन्तर के जो देवता ए 
दवन यश्च भविता तस्य विख्यातकरम्मः ॥२८॥| तथा उनके जो बि्यातकर्म इन्ोगे उनको < 


॥ २८ चाद्युप, कनिष्ट, पवित्र ्राजिर तथा ५. 
चाशुपाथ कनिष्ठा पवित्रा भाजिरास्तया । छृक ये पाँच देवगण होगे ॥ २६॥ उन देवताश्नो ` 


धाराफाशच हत्येते पञ्च देवगणाः स्पृताः ॥२६॥ महावकषी, पराक्रमी. तथा इन्दर होने ॐ सव _ श 
शुचिरिनद्रस्तदा तेषां त्रिदशानां भविष्यति। | युक्त शचि नामक इन्र दोगे ॥३०] श्चग्नीभर, -भम्न 
महावलो महावीर्यः सन्ैरिद्रगुशौुतः ॥३०॥| वा, थचि, सक्त, माघव, यक ओर अजित ५८ 


ीधशामिाहु् शविधक्तो + खातों उस मन्वन्तर मे सप्तपिं होगे ॥ ३९॥ शुर; 
अरोधि श्चछुक्ताऽय माधवः | गभीर, ब्रध्न, भर्त, असुग्रह, स्ीमायी; गहीतः 


शक्रोऽनितथ स्तेते तदा सप्तयः स्मृताः ॥२१॥ बिष्णु श्नौर संकरन्दन ॥ ३२ ॥ तथा तेजस्वी श्रीर 
गुरुगभीरो नरघ्रध भरतो्लुगरहस्तथा | | वल यद भौत्य मघु के पत्र होगे । हे कौटि |: 


स्ीमाणी च प्रतीर विष्णुः संकरन्दनस्तथा!\॥२२॥ इस प्रकार मने श्रापसे चौद मन्वन्तरों का, 
सवलगैव भौत्यस्यैते मनोः सताः घत्तान्त वैन किया ॥ २३॥ हे मुनिसत्तम ! इन । 
तेजस्वी सुवलशैव भौत्यस्यैते मनोः सुताः । न व 8 अ 


चत्श मयैतत्‌ ते मन्व्तरदाहृतम्‌ ॥३२।| तथा सन्तति भा करगे ॥ ३९॥ पिते मन्बनर 
शरुत्वा मन्बन्तराणीत्यं क्रमेण पुनिस्तम । ` | को सुनने से मलुष्य को घम भ्रात होता दै तथा 


पुएयमामरोति याऽप्रीणाञ्च सन्ततिम्‌२४॥ स्वारोचिप मन्वन्तर कौ कथा खनने से खव काम- 
व नयिं पूरी होती है ॥३५॥ ओीत्तम मन्वन्तर को 


(1 धम्ममाभो 
चत्वा मन्वन्तर पूवं भोति मानवः । | घुनने से धन, तामस के छनैने से कान तथारवत 
खारोचिपस्य भवणाद्‌ सव्व॑कामानवाभुते ॥३५॥| को छनने चे बुद्धि शौर खन्दर स्री मिलतीदै1३६॥ 


श्रोत्तमे धनमाप्नोति ज्ञानञ्चापरोति तामसे । जर व 
रेते च | वत व 
रवते ध ५ धि ५ खयम्‌ । ।२ ९ ॥ प्रल्वन्तर के सुनने से गुणवान्‌ पुत्र श्नौर पौत्र भात्‌ 
४ चाभुषे ५4 रते बैवसते बलम । होवे दै ॥ ३७॥ ब्रहम साबणिक मन्वन्तर को सुनने 
गुणवत्पुत्रपात्रन्तु सूख्यसावर्गिके रते ॥२७।॥ से माहात्म्य, धमेसावरसिक के सुनने र 
माहात्म्य व्रह्मसवर्शे धर्म्मसावणिफे शमम्‌ । | तथा सुद्सावरिक को सुनने ० ८ १ 
व प्राप्त होती है ॥ ३८॥ दक्ष-सावशिक मन्वन्तर 
मविमाशोि त 11 सुनने से मलुप्य अयनी जाति मे भरष्ट तथा गुरा 
हातिभे्ठो १. द्साबणिके, भुत | से युक्त दो जाता है । रौच्य मन्वन्तर को सुनने से 
निशातयत्यरिवलं रौच्य शरुखा नरोत्तम ॥३६॥| मर्यो ॐ शबं का "बह घट ध दै ४२ 
* नौत्ये ० चु क्र 
देबमसादमारोति भौत्ये मन्वन्तरे भरते । मौत मन्व 1) 
तथाधिहो्रं॑पुत्रा गुणयुक्तानवाभुते ॥४०॥| भाल करमा ह ॥४०॥ ह क्रटकि सुनि] जो कम खे 
सर्व्वाण्यलुक्रमादेयश्च श्रृणोति युनिसत्तम । | खवन्वस्तरो को सुनते उनको जो उमकश | 
मन्वन्तराणि तस्यापि श्रयतां फलुत्तम्‌ ।॥४१।| मिलता दै वह छने (1 . 
त्ते देवाषीनिनरान्‌ मरनस्तत्तनयान्‌ चपान्‌ ॥ सव सयो दथा उनके वंशं का दाल ' 
संशारच शरुता सर््वभ्यः पापेभ्यो विप दुच्यते॥४२॥ नकर सय पापों से सक्ति हरोलाती &५४२॥ 
दवेवषीन्पाश्चान्ये ये तन्मन्वन्तसधिपा;। । देवता, ऋषि, रजा तथा मन्वन्तरे के स्वामी 


२४० मार्डेययुराण | अ० १०१ 


श ्ीयनतेतथा भीताः भयच्छन्तिशभां मतिमू॥४३। मस दोकर खनने बालों को शम मति भदान . 


र. ॥ करते ह ॥४७२॥ फिर शुभ मति पाकर उखके द्वारा 

त्तः शुभां मति राप्य ठता कम्मं तथा शुभम्‌ । | मडप्य शभ कम करता है जिससे कि चौदों 
४ ९ 

मा रिमवामति वाषदिन्ादचुध्य । ५६ | ह ॥ ४९ ॥ करम से खव मन्वन्तसो की कथा सुनने 

व्य स्यु तवः कषम्याः सन्वं चाम्ास्तथा गरहाः। | से सव ऋतुरे कल्याणकारी तथा सव प्रह म 

स्मवन्त्यसरश्यं भरता कमान्मन्वन्तरस्थितिम्‌ ।४५॥. दोजाते दँ इसमे संदेह नटीं ॥४५॥ 


> इति शीमाकेण्डययुराणमे चतदंश मन्वन्तर फथन नाम १०० अध्याय स० । . . 
- स्थ दू 
एकसोएकगं अध्याय 
क्रौषएटकिरुबाच क्रोपएटकिजी वोल्ते-- ,. 
भगवन्‌ कथिता सम्यक्‌ त्वया भन्वन्तरस्थितिः हे भगवन्‌ ! श्रापने मन्वन्तरो की स्थिति करम 


से विस्तार पूवेक मुभ से कटी तथा मेने उखको 
ह व १ सुना ॥ १ ॥ हे माकरडेय जी ! ब्रह्माजी जिसके 


१ श्रोतुं ममेच्छतः सम्यग्भगवन्‌ भत्रवीहि मे ॥ २॥॥ चाहता ह, श्राप भली भोति कटे ॥२॥ 
| - माकेरडेय उवाच माकंण्डेयजी बोल्ञे-- - ` ` ` ` 


रए वत्स दृपाणां खमङरेषाणां सञुद्धवम्‌ | हे वत्स, कौधुकि ! जगत ॐ कारण ब्रह्मा जी 


¦ चरितं जगन्भूलमादौ इत्वा भनापतिम्‌ ॥ ३॥| जिख चं ॐ चादि मं द उसके शेप राजां की , 


उत्पत्ति रौर चरित्र तुम सुनो ॥२॥ यह वंश श्रनेक 

[अयं हि वंशो भुपा्तरनेककरतुकतु भिः । | यज्ञ करते चे, संम विजयो ओर धर्मन नेक 
संधरामनिद्धिधभ्पज्ञः शतसंख्येरलङ्कृतः ॥ ४।॥ राजां से श्रलंकृत हे ॥8॥ इन महात्मा राजां 

| श्रुत्वा चैषां नरेन्दाणां चरितानि महात्मनाम्‌ । | की उत्पतति शरीर चरि घुने से मसुप्य सव पापों 


॥ से मुक्त हो जाता है ॥ ५॥ इस वंश मे मञुश्पवाकु 
 उतपत्तयश्च पुरपः स्यपापः भुच्यते ॥ ५।| अनरण्य भगीरथ तथा अन्य सैको राला पेते 


& ५१ ९ (~ मेने गि 2: 
! मुत्र तथेक्ष्वाह्करनरण्यो भगीरथः हुए है जिन्दोने थली भांति पृथ्वी का पालन किया 
न्ये च शतशो भाः सम्यक्‌ पालितममय!।। & ॥| दै ॥ ६॥ वे राजा घर्म्ञ, यज्ञ करने बले, चीरश्रौर 
। धम्पजञा यज्विनः शूराः सम्यक्‌ परमवेदिनः संव प्रद्र वेदं के परम्‌. ज्ञाता थे उनके वंशका 


रुते तस्मिन्‌ पुमान्‌ वंदे पापोाद्धिषुच्यते ॥ ७॥ 


 भिचन्ते मयुजेन्द्राणामवरोहा यथा वरात्‌ ॥ < ॥| है जिख मकार कि बड़ फे पेड़ से दज्ञारौ ` शालायें 
। ब्रह्मा प्रनापतिः पुन्यं सिरुकषर्धिविधाः परजाः । | निक्रलती दै ॥५॥ दे कौषटुकि जी ! पजापति जहा 


गष्टादक्षिणादक्षमखनतद्विनसत्तम ॥ ६ ॥ ने पसे टी पिले विविध प्रकार के प्रजां . 


की ष्टि उत्पन्न करने की इच्छा से अपने 
वामागष्ठाचच तत्पत्नीं जगत्सूतिकरो षिः दाहिने र मूढे से दच् को उत्पन्न किया ॥ ६ ॥ जगत 


` सञ्जं भगवान्‌ व्रह्मा नगतां कारणं परम्‌ 11१०] ऊे परम कारण मगवान बह्मा ने वायि श्ट से 
अदितिस्तश्य दक्षस्य ऊन्याऽनायत्‌ शेभना । | रन्त व पत्नी चे उत्पन्न किया ॥ १० ॥उस खी से 
` . . - कश्यपो देवं मा्रडं समनीननव्‌ ॥९१।१| दक ` अत नाम कन्या उत्पलकी शरोर अदिति 


से उख पत्ति कश्यप ने स्यं देवता को उव्यन्न . 


1 ध 
"------------------- 


+= ^~“ ~~~ 


दिम, उस ्वंशके राजाच को मे सुनना. 


इन्द्रो की अवधि तक उसको शुभ गति प्रा दोती 


चरि सुनने से मदष्य .पापसमूह से दूर जाता - 
1 व है ॥ ७ ॥ इस लिये अव इस वंश का हाल सुनो । ` 
¡ तदयं श्रयतां वंशौ यततो वंशाः सहस्रशः! | इस वंश से द्यो नौर वंश इस -कार निकले 


भअ० १०९१ 


बरहम्तररूपं जगतामरेषाणं रवंखदम्‌ । 


आदिमध्यान्तमूतंच सगस्थि्यन्तकम्म॑सु ॥१२॥ 


यतोऽखिलमिदं यस्मिन्नशेषञ्च स्थितं द्विज । 


यतुस्रूपं जगक्वेदं सदेवासुशमासुषम्‌ ` ॥१३॥ 


` यः स्नवभूतः सर्व्ातमा परमात्मा सनातनः । 


अदित्यामभवद्रास्वान्‌ ूलवमाराधितस्तया ॥१४॥ 


करषटुकिसवाच 
भगवन्‌ श्रोतुमिच्छामि यत्‌ स्वरूपं विवस्वतः । 


यत्कारणञ्चादिदेवः सोऽभवत्‌ कश्यपात्मजः १५॥ 


यथा चाराधितो देव्या सोऽदित्या कश्यपेन च। 


श्राराधितेन चोक्तं यत्‌ तेन देवेन भास्वता ॥१६॥ 


भरभावंचावतीर्णस्य यथविन्धुनिसत्तम । 


भवता कथितं सम्यक्‌ श्रोतुमिच्चाम्येषतः ॥ 


॥ माक॑रडेय उवाच 
भिस परमा बिद्या ल्योतिमां शावती स्फृदा । 


माकणडेयपुराण ३४१ 


करिया ॥ ११ ॥ पिर बह्याजी ने उत्पत्ति, ` पालन, 
श्नौर प्रलय करने फे निमित्तः आदि, श्रन्त ्रौर 
मभ्य मे रहने बाले, जगत के वरप्रद खकूप को 
वनाया ॥ १२॥ हे द्विज्ञ | उस खरूप मे देवता, 
श्रसुर श्रौर मनुष्य युक्त यह स्पूं जगत श्ररोष 
रूप से स्थित है ॥ ९६॥ जो सर्वभूत, सबौत्मा, 
परमात्मा, सनातन भास्वान्‌ सूर्यं ह ते छदिति से 
जिसने कि पित्ते उनकी श्ाराधना की थी 
उत्पन्न दए ॥१४॥ ` 
करोटुकि जी वोलेः-- 

हे भगवन्‌ ! विघस्वान्‌ के उस खर्प को 
सृनना चादता हव॑ जिसके कारण कि श्रादि देव 
कश्यप के पुत्र दोकरः उत्पन्नः ॥१५॥ जिस प्रकार 
कि दबी दिति नौर कश्यप ने उनकी आराधना 
की थी श्रीर ्राराधित होने पर जो इ सूयं देव 
ने उनसे कहा था वह किये ॥ १६॥ हे सुनि 
माककरडेय ओ ! उनके अवतार का प्रभाव.आ्आपते 
पटिले श्रच्छी तरह कटा था, वमे उसको विस्तार 
पूवक सुनना चाहता ह ॥ १७॥ 
माकैरडयज्ी येते - ५ , 

स्पष्र परम विद्या, शाश्वती शौर प्रकाशित 


, कैवस्थं हानमाबिम्‌ः प्राकाम्यं संविदेव च ॥१८॥| ज्योति, केवल्य क्ञान, आविर्भाव, भाकास्य श्र 


` बोधश्चायगतिश्चैव स्िर्िञानमेव च । 


इत्येतानीह रूपाणि तस्य रूपस्य भास्वतः ॥१६। 


भूयतान्य महाभाग विस्तसद्रदतो मम। 


यत्‌ पृष्टवानसि रेराविरभावो यथामवत्‌ ॥९०॥ 


 निष्पभेऽस्मन्‌ निरालोके सव्य॑तस्तमसाते । 
दृददण्डमभूदेकमक्षरं कारणं 
तद्धिभेद तदन्तःस्थो भगवान्‌ प्रपितामहः । 
पद्मयोनिः स्वयं ब्रह्मा यः सृष्टा जगतां भश 


ततो महरिति स्थतं जनं स्थूलतरं ततः । 


ततस्तपस्ततः .सत्यसिति भू्चानि स्था ॥२५। 


स्थितानि तस्य रूपाणि बन्ति स्‌ भवन्ति च । 


।.२२। | खयं परभ बरह्माजा 


संविद ॥९८॥ वध, अरवगति, स्मरति श्रौर पिक्षने, 


|| ये षव भगवान्‌ सूयं के रप दै ॥१६॥ हे मदमाग | 


जो तुमने सूयं का प्रकट दोना पृष्ठा सो धुभसे 
विस्तार पूर्वक सुनो ॥२०॥ शख प्रभादीन स्पूं 
लोक मे जव चां चोर श्न्धकार धा.उस समय 
परम कारण श््तर रूप एक वृहत्‌ श्चरड उत्पन्न 


दरम्‌ ॥२१॥| इभा ॥ २१॥ उस श्ररडे के फटने पर उसके न्दर 


से भगवान्‌, पडयोनि जगतफे खश्िकिर्ता,पितामह 
# उत्पन्न हए ॥ २९॥ दे कोषटुकि 
मुनि ! ब्रह्मा केमुख से श्रम्‌" पेखा महान्‌ श्र्द्‌ 
हु छरीर उसी से भूः युवः च्रीर स्वः शष्ठ का 


सखमावभाषयोर्भावं य॒ती गच्छन्ति संशयय्‌ ॥२६॥ से संशयात्मक मात्र खमात्रतया न ह्ोजति है२६॥ 


-३४२ आकंर्देयपुराण ५ श्र १०२ 


शराः हे विप करौष्कि जी ! सव खष्टि -के आदि अरन्त 
न्तं यत्‌ परं सुष्मरूपं परमं स्थितम्‌ । | परम सं य परम श्रये ह, उन्दी को रोमता 


्नोमिस्युक्त' मया विप्र तत्‌ परं ब्रह तद्वु; ।।२७॥॥ दूसरे नामं परह्य से पुकारते द ॥ २७॥ 


इति श्रीमाक॑ण्डेयपुराण मे वंशानुकीत्तन नाम १० वाँ यध्याय समाप्त । 
६ ~~ थेठ ओः ^<, €^ -- 
र , एकपोदोदां सष्याय 
माकरडेय उवच | माकरडयजी वोज्ञे -- पि 
तस्मादण्डाद्विमिन्नात्‌ तु जद्यणोऽन्यक्तनन्मनः । सुनि फिर श्रणडे-के फटने पर अव्यक्तजन्मा 
रेचो घम्‌ व्‌; भयं प्रथमादरदनान्षुते ॥ १॥ बह्माजी > पूवं सुख से ऋगवेद की. चाये उत्यज् 


इई" ॥१॥ वे चायं शुडदलं के फूल के समान 
जवापुष्यनिभाः सस्तेनोरूपान्तसंहताः । . | -अरलगभग्रलग रजोगुी रूप धारण किये हुपः थी 


प्रथक्‌ पृथग्िभिन्नाश्च रजनोरूपवहास्ततः ॥ २ ॥| नौर वे सव श्रंत भाग मे. तेजयुक्त थीं ॥२॥ ्ह्माजी 
धमि दक्षिणादक्लादनिरुद्धानि काञ्चनम्‌ । | के दक्तिण मुख से यजुवद के मंत्र उत्पन्न हुए । उन 
यावं - तथा वर्णान्यसंहतिधराणि च ॥ २ ॥ का वणं सुवणं के समान था ॥ ३ ॥ परमेष्टि बह्माके 


पिमं यद्विभोवेक्छं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः । ` | पश्चिम मुख से सामवेद के मन्ब तथा छन्द उत्पन्न 
आविभूतानि सामानि ततश्न्दासि तान्यथ ॥ ४॥ हष ॥ ४॥ श्रथर्ैवेद के भ॑ज जो श्रभिचारिक श्रौरं 
भ्थवांणमशेषश्च भङ्गाज्जनचयमभम््‌ । | शान्तिक मिया फो वतलाते है, भो के समूह 


थावद्धोरस्वरूपं तदाभिचारिकशान्तिकम्‌ ॥। ५॥| के समान छृष्ठवर तथा भयानक स्वप वाले ॥ . 
उत्तरात्‌ भकटीमृतं वदनात्‌ तस्य वेधसः । ` | बह्माजी ॐ उत्तर सुख से भगट इष । वे मनं संते" - 


| श्नौर तमोगुण युक्त खुम्दर वकुत्सित आरति 
५ 1 ॥ ९॥| बाले थे ॥ ६॥ दै रोषटुकिसुनि ! ऋभवे सजय 
यणा सत्व चञाज्च गुणा छन । ; | युक्त, यजुवद सतोशणयुक्त, सामवेद तमोगुखयुक्त 
तसोगणानि सामानि तमःसत्वमथव्वसु ।॥ ७॥ 


! | तथा अथववेद सतोगुण ओर तमोगुण युक्त ह ॥ 
एतानि स्वलमानानि तेजसाऽपरतिमेन वै । श्रतुल तेज से जाज्वल्यमान्‌ होकर इ २ 


पृथक्‌ एृथगवस्थानं भाज्जि पूर्व॑मिवाभवन्‌ ॥ ८1|| पषटिते की आति पयं इ 
ततस्तदा यत्‌ तेज आओभितयुक्त्वाभिशब्दयते । ` | के साथ श्नोम्‌ शब्द ब तेज मिथित होकर स्थित 
तस्य स्वभावादुयत्‌ तेजस्तत्‌ समाघ्रर्य संस्थितम्‌॥ ६ | इच्रा ॥ ६॥ ह मदासुनि ! फिर बह मिशधिततं तेज 
था यज्ुम्मयं तेजस्तदवत्‌ साम्नां महामुने । | यजुवैद के तेज के साथ मिला श्नौर इसके याद 
एकत्वयुपयातानि परे तेजसि संश्रये ॥१०॥ सामवेद ऊ तेज के साथ मिल गया ॥ {८ ॥ ह 


(1 


-शन्तिकं पीष्टिकञ्चेव तथा चेवामिचारिकम्‌ ।- | बहमन्‌ ! फिर शान्तिक पौष्टिक श्रौर ` अभिचास्कि 


च्छगादिपुं लयं अद्मन्‌ त्रितयं त्रिष्वथागमत्‌ ॥११॥| तेज य्‌, यञ्चः श्नौर साम भे मिलगये ॥ ११॥ ह 
ततो विश्वमिदं सचस्तमोनाशात्‌ सुनिम्मलम्‌ । व ! तम के नाश होजाने से यद जगत्‌ निर्मल 
्िमावनीयं विप ति्ययहुध्व॑मथस्तथा ॥१२॥ ग्या । इसीभकार तियेक्‌ श्रौर उद्धतं तथा 
निम्न आदि को समना चाहिये 
+ततस्तन्मणड्तीमूतं छान्दसं तेन उत्तमम्‌ | ८ 
इसके वाद वेद का बढ उत्तम तेज जो एक दुसरे 
परेण तेजसा ब्रह्मनेकलतवशुपयाति तत्‌ १३ 


। आदित्यसं्ञामगमदाद्विव यतोऽभवत्‌ । ` , आदित्य नाम से विख्याता 1 हे महामाग-] - 


के साथ मिलकर पकर समू मे होगया था} १३॥. ` 


श्र० १०३ माकण्डेयपुराण ३४३ 


& िवििििििनििििनिितििििषनिि५  य [वान 
न~~ ~ ~ 


विश्वस्यास्य महाभाग कारणल्वान्ययात्मकम्‌॥ १४; 'यदी तेज.बिश्व का श्र्ययात्मक कारणः है ॥-२४॥ 
अग्‌, यजुः श्नौर साम तेज क्रमशः प्रातः, . मध्याह्न 


भातम्यन्दिने चेव तथा चेवापराहवि । | श्रपराह्न काल मे तपित होता है ॥१५॥ हे सुनि 
यी तपति सा काले ऋग्‌-यज्ञः-सामसं हिता ॥१४।॥ सत्तम ! ऋग्ेद की ऋचाये पूर्वा मे, यश 
` ऋचस्तपन्ति प्याह मध्याहे च यजूषि चै। | भध्याह चनौर साम छन्द अपोह मे तप्तदोते है ॥ 


६ नेसत्तम ॥१६।॥ -णन्तिङ फ्रमे ऋर्तेज के समगर रवाह मै, पौष्टिक 
सामानि चापराह वै तपन्ति मुनिसत्तम ॥१६॥ वा निति 


शान्तिक ऋषु पूनवष्डं यजुःन्तरपाटिम्‌ । कमे श्रभिचारिक मन्व से सामततेजके खमय संध्या 
विन्यस्तं साम्नि सायाह आमिचारिकमन्ततः।\१७। | को किये जति है ॥१९७॥ ` ्रभिचारिक कर्म पूर्य 
मध्यन्दिनेऽपराष्ो च समे चेवाभिचारिकिम्‌ । | मध्याह श्नौर श्रपराह मँ भी कियां जाता है परन्तु 


अपराह्ग पिदृणान्त॒ साम्ना कार्याणि तानि वै१८॥| पितरों का कम सामवेद के मन से अपरा भराज् 
न स्थित विष्णुर्न मही किया जाताहै॥ १८॥ खष्टि करने बले ब्रह्मा 

रजोगुसी ऋग्तेजमय दहै, तथा पालन करने वाक्त 
रुदः साममयोऽन्ते च तस्मात्‌ तस्याशचिध्वनि;१६॥ | तिष्य सतोयसी" यजमेय है । साम तेजमय रद्र 
तदेवं मगवान्‌ भास्वान्‌ वेदात्मा वेदसंस्थितः शन्त करने वाक्ते दमोगयुणी. है, अतः; सामवेद की 


वैदविव्ात्मकयैव पर. पृष. उच्यते ॥२०॥| ध्वनि अपवित्र दै ॥ १६॥ इस भकार भगतन खयं 
वेदात्मा, बेदसंस्थित, वेदव्ि्यातमक प्रम 


सग-स्थत्यन्तहैतु रनःसत्वादिकान्‌ गुणान्‌ । | कदलाते है ॥२०॥ उत्पतति, पालन ` रौर परलयं ॐ 
आधित्य व्रहम-विष्ए्वादि-संज्ामभ्येति शाश्वतः२१॥ श्रचुखार वे रजोगुरी, सतोगणी श्रौर" तभोय॒ी 
देवैः सदेख्यः स तु पेदधूर्िरमूर्पिराचरोऽसि- | दोकर करमशः जहाः विप्ठश्नर मदेशः कटे जाते दै 


ह ॥२९॥ देवताश्रों से सवा पूजित, वेदमुि,. रादि 
लमरत्यमूिः । विशवाश्रयं ज्यातरिरेचधम्मां क 


„ वेदान्तगम्यः परमः परेभ्यः ॥ २२ ॥ प्रौर वेदान्तगस्य भगवान्‌ सूर्यं परे से भी परे है ॥ 


इति श्रीमाकण्डेयषुराणमे भाण्ड माहात्म्य नाम १०२ अ० स०। 
। 


एकसोतीनगों अध्याय क 

माकैरडेय उवाच माकरडेयजी बोल 
। ४. सूर्यं के उख तेज से. समस्त.आआाकाश.तथा 
तस्य सन्ताप्यमाने त तेनसोद्यमधस्तथा । | पृश्वीतल को संवस होता देखकर पद्मयोनि पिता 
पिरक्षथिन्तयामास पद्मथोनिः पितामहः ॥ १।| मह ब्रह्माजी खषटि रचने की चिन्ता सै न्थाङकलं 
0 वापि े नां यतततयभतेनयः हः ॥ १॥ उत्पत्ति, पालन श्नौर परलय ,के कारणं 
सृष्टः कृताप म नाश म्र # भगवान्‌ सूयं स तेजसे मेरी र्चीहु शष 
भासतः स्टिसंहार-स्थितिरैपोमहात्सनः ॥२। | नाश को प्राप्त दोजायगी ॥ २॥ इस तेज से खव 


; + शुष्यन्ति रेनसः। | भराणियां के प्रा निकल जगे श्रौर जल सख 
साति व जयगे श्रौर इस संसारकी खष्टि जलके विना नदीं 


न चाम्भसा बिना खषटिर्धस्यास्य मृष्यति २॥ चक्तेगी ॥ २॥ यदह सोचकर लोकपितामह भगवान्‌ 


इति संचिन्त्य भगवान्‌ सतोघरं भगवो रेः । | ब्रह्मा ने एकाय चित्त दोक “सूयः भगवान्‌ शी 
चकार तन्मयो भूत्वा ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ४ ॥| स्तुति की १५ ॥ | 
वा .| मै उन विश्वमूर्ति, परमज्योति सेको नमस्कार 


नमस्ये यन्मयं सरन्यमेतत्व्वंमयश यः । करता ह जिनमे यह सम्पूणं जगत्‌ व्याप्त है शरीर 


२४४ 


माकंरुढेयपुराण 
भाक्ण्डेयपुराण 


०१०३ 


विश्वमूर्तिः 
य ऋडम्मयो यो यदेषां निधानं साभ्नाश्च या 
. योनिरचिन्त्यशक्तिः। ज्रयीम॒यी स्थलवयाद्वमात्रा 
परस्वरूपो गृखयारयोग्यः ॥ ६॥ 
तं स्वेत परमेख्यवेचमादौ प्रल्योतिरबहि 
रूपम्‌ । स्थूलश्च देषात्मतया नमस्ये भास्वन्त- 
माधय परमं परेभ्यः ॥७॥! । 
एष्ट करोमि यदहं तव शक्तिराचा तत्मेरिते 
जस-मरी-पवसाभिरूपाम्‌। तदेवतादिविषयां मरण- 
नाद्शेषां नास्मेच्छया स्थितिलयावपि तद्रदेष॥८॥ 
वहिस्सखमेव जलशेषणतः पृथिव्याः 
खष्टं करोमि जगतांच तथाद्यपाकम्‌ । 
व्यापी त्वमेव भगवन्‌ गगनस्वसूपं 
त्वं पंचधा जगदिदं परिपासि पिश्वम्‌ ॥ ६ ॥ 
यद्गेयैनन्ति परमात्सविदो भवन्तं 
विष्णुस्वरूपमखिलेष्टिभयं पिवस्वन्‌ । 
. ध्यायन्ति चापि यतयो नियतात्मचित्ताः 
सर््वश्बरं परममात्मवियुक्तिकामाः ॥ १० ॥ 
नमस्ते देवरूपाय यत्ञरूपाय ते नमः । 
परत्रह्मस्वरूपाय चिन्त्यमानाय योगिभिः ॥११ 
उपसंहर तेजो यत्‌ तेजसः संहतिस्तव । 
खषटरविधाताय विमो खष्टौ चाहं सयुचतः 
भाकरडेय उवाच 
इत्येवं संस्तुत माखवान घरह्मणा सकन णा । 
उपसंहृतवांस्तेनः परं स्वरपमधारयत्‌ ॥१३। 
चकार च ततः खषटि जगतः पृद्मसस्भपः। 


तथा तेष महाभागः पून्वंकरपान्तरेष षे ॥१४।॥ 


देवास्॒रादीन्‌ मस्या पश्वादीन्‌ इृक्षवीरुषः 


॥१२॥ 


रं व्योतिरयत्त्ध्यायन्ति योगिनः।। ५।| जो सर्वेमय है तथा जिनश्न योगी ध्यान करते है॥: 


च्रीर जो ऋग्‌, यजुर, साममय शरीर श्रचित्यशक्ति 
ह तथा जो तीनों वेदमय स्थूलरूप शौर चअरद्ध॑मात्रा ` 
संदुक्त परम खरूप श्नौर श्पार शुर बले दँ ॥ ६॥ 
मै उन सूयं भगवान्‌ को प्रणाम करता ह जो सव 


| जगत्‌ $ कारण श्रौर परम स्तुति के योभ्यदहै, जो 


श्रादि मे परम ज्योतिखरूप रौर अर्चि से पृथक्‌... 
है तथा जो स्थूलरूप, देवताश्नों के श्रादि भौर परे ८“ 
से भी परे है ॥७ ॥ मै आपक्री आया शक्ति प्रेरितः 
होकर जल, प्रथ्वी, वायु, अभिरूप, देवतां तथा 
प्रणव श्रादि से संगुक्त, खष्टि को सचता हृ, इसी 
प्रकार स्थिति ज्ौर प्रलय भी मेरी इच्छा से नहीं 
होता वरन्‌ पकी शक्तिसे दी होता है ॥८॥ पृथ्वी 
के जल को शोषण करने के लिये जलं ्रापदीहै, 
आपके प्रथ्वी को संतनत करने पर म खष्टि रचत 
हे भगवन्‌ ! श्राकाश रूप होकर श्रापदी व्याप्त है 1 
श्राप पाच रूप से शस विश्च का पालन-करते है ॥ 
हेः विवखन्‌ ! परम आत्मन्ञानी यज्ञ करके आपको 
पूते है श्नौर यती लोग ्रपनी सुक्ति की इच्छा 
से एकाग्र चित्त दोकर विष्णु स्वरूप. सवं जगत्‌ 
सर्वेश्वर परम रूप श्नापका ध्यान करते हँ ॥ १०॥ न 
देवरूप, यज्ञरूप, परब्रह्म स्वरूप श्रौर योगियोँ से 
चित्यमान्‌ ! अपकरो नमस्कार है ॥११॥ हे विभो! 
मै खष्टि रचने मे तत्पर ह, परन्तु श्रापका यह तेज 
समूह खष्टि का नाश कर रहा है, प्रतः श्चाप इस 


| 


को हरण कर लो'जये ॥ १२९॥ 


माकेरडेयजी वोले- 
खष्टि सचते इण ब्रह्माजी से इस प्रकार स्तुति 
ये जामे पर गवाम्‌ सूयं ने अपने तेजको शमन 
करके थोडा सा तेज शेप रहने दिया ॥ १३ ॥ पिर 
पद्मयोनि बह्माजो ने उसी प्रकार सृष्टि की रचना 
जिस प्रकार कि उन्होने पष्टिज्े कल्पा खी थी 
॥ १५ ॥ हें महानि कौष्टकिजी ¡ बह्माजी ने पिले 


ससज्जं पूल्य॑वटव्रह्मया नरकाश्च महामुने ॥१५।। नरक इत्यादि का निर्माण किया ॥१५॥ 
इति श्रीमाकण्डेयपुराण यँ रादित्य स्तव नाम काः १०३बां अध्याय समरष्ष। ` 


~ 7 स 4 -- 


की तरह देवता, श्रघुे, पच, बृ लता श्रौर 


"० १०८४ ४४ । मावरदेयपुराण । २४५ 


एफपोचारवां अध्याय 
` माकडेय उवाच | माकैरडयजी वोत 
सृष्ट जगदिदं ब्रह्मा भरविभागमधाकरोच्‌ । ` बह्माजी ने इस जगत्‌ की स्वना करके वं 
दाभमः ५ 6 त्‌ वणं 
-वणान्रेम-सयुदरदवि-दीपासां पू्ववद्यथा ॥ १ ध शराश्रमके २ तथा.परिते 
दषरैत्यरगादीनां रूपस्थानानि पर्व्यवत्‌ । क तरह सुद्र, दे प.चा! की रचना की ॥ १॥ 
देवेभ्य एव भगवानकरोद्‌ कमलोदर; ॥ २॥| पनि बहाजीने देवतात ओ सप दिको 


के स्वरूप श्रौर स्थान पूर्ववत्‌ निर्मा कर दिये॥२॥ 
स बिशरुतः । | ब्रहम के पुत्र मरचि.या.कथ्यप नाम से विख्यात 
कश्यपस्तस्य पुत्रोऽभूत्‌ फाश्यपो नामं नामत ॥| हप तथा मरीचि फे पुज काश्यपे हप ॥३॥ दे 
दस्य तनया ब्रह्मन्‌ तस्य भाय्यीस्रयोदश्‌ | | बहान्‌ ! दद्ठ की तेरह कन्याये ` काश्यप की लियां 
बहवसततुाथासन्‌ देव दैतयोरगादयः ॥ ४॥| इद जिनसे कि देव, दैत्य 9. ५ 
चदितिर्चनया ४ देवां चिव एज उत्पन्न हुए ॥ ४॥ अ 1 ध 
मास॒ देवालि्मनेश्रान्‌ । | सकि त वमव मोन 
दैत्यान्‌ दितिददुबोभराद्‌ दानवादुरुषिक्रमान्‌॥ ५ ॥ 


॥ (त दानवो फी उत्पत्ति हुई ॥५॥ `विनतासे गरुड शौरे 
गरुडारुणौ च विनता यक्षसनांसि वै खसा । | श्ररुण, खला से यत्त श्रौर यचस, कषटुसे नाग 


कुः सुषाव नागा गनधर्यान्‌ सुषवे एनिः ॥६ ॥ शौर भुनि से गन्ध उतपन्न ह ॥६॥ क्रोधा -से 
करोधाया जहिरे इरया रिष्ठायाधाप्सरोगणा;ः। | समस्त कुल्या, रि से छव श्रप्राये तथा-या 
पेराबतादीन्‌ मातङ्गानिरा च सुपुषे द्विज ॥ ७॥| देदाचत श्रादि दाथी उत्पन्न हए ॥ ७॥ `हे द्विज! 
ताभ्रा च पुपुवे श्येनी-पमुखाः सन्यका द्विज। | ताघ्रा ने श्येनी भादि कन्याश्च को जना जिनसे 
यासां सूतां खगमाः श्येन-भास्-शुकादयः। ८ || कि वाज्ञ, कतर, तोते श्नादि पर्तीगण उत्पन्न हु 
इलायाः पादपा नाताः भायाः पततां गणाः | ॥॥ इला से सव छृ्तो का जन्म हतर रौर गरधासे 
श्रदित्यां या सषुतपन्ना कश्यपस्येति सन्ति| ६ ॥| सव ताला का । क्यपकी श्रदितिसे जे संतान 
तस्याश प्रदो; पौन-दौहित्रिकादिभि! । | इहै 181 उनके पुथ, धेवते, नाती शोर भो 'से 
वयामेतन्नगत्‌ सूत्या तेपां वासां वै ्ुने॥१०॥| तथा न्य लियो की व संसार व्य 
तेपां कश्यपपुत्राणां मघाना देवतागणा; । | चणय ॥ ० ॥ क्यप कु म मान दवता 
सास्िका रानपास्तते तामसा शे गणा॥११॥| जो सतोशर, रजो शरीर तमोयु से युक्त धे ॥ 
देवान्‌-यतरयनशवकरे तथा त्रि्वनेश्वरान्‌ । | जापति परमेष्ठी ब्रह्माजी ने देवताश को जिुवन 
ब्रह्मा ब्रह्मविदां शरे; परमेष्ठी प्रजापतिः ॥१२॥ पति तथा यक्ञभोडी वनाया॥ १२॥ उनके सौतेले 
तानवाधन्त सिताः सपत्ना दैत्य-दनवाः । ` व व व 
> शरोर उनका यु 
रक्षा तया धुं तेषामासीत्‌ इदारणम्‌ ॥१३॥ ) १३॥ ह विप] एकं वो 
दिव्यं वरषसहसन्तु पराजीयन्त देवताः ' । | होन ॐ वाद, देवता परास्त हए तथा वलवान्‌ दैत्य 
जयिनधांभवन्‌ विर वत्तिनो दैत्यदानवाः ॥१४।|. रौर दानव २ इए ॥ १४॥ पिर दितिके पुव 
ततो निरातान पुत्रान्‌ दैतयैदानवेस्तया । , | दैत्यो च 4 ध 
भ देति । राहत त्‌ । ट 
हतवियवनान्‌. द अदिरनिपत्म । ॥११५॥ दुःख हा ओीर उसने देववाश्रं का यक्षाय चिना , 
भ्ाच्छ्नयङ्ागांष शचा. पम्पीदिता भृशम्‌ । , | इत्र देखकंर गजान संकी चाराधनय करने का 
पराराषनाय घवितुः "^, ;मचक्रमे .॥1१६॥ यज्ञ कियो ॥ १६ उसने, नियमे. ते. नियत्रादारी 


ध + 
द" °. 


२४६ 


: एकाग्रा नियताहारा परं नियमास्थिता । 


¦ तुष्टाव तेनसां राशि गगनस्थं दिवाकरम्‌ ॥१७॥ 


नमस्तुभ्यं पशं सृश्षमां सौचणीं विभ्रते तदुम्‌ । 


श्रदितिरुचाच 


धाम धामवतामीशं धाम्नामाधार शाश्त ॥१८।। 
जगतारपकाराय तथापस्तव गोपते । 


माकंरडेयपुराण 


श्र° १०४ 


शौर एकाग्र चित्त होकर श्राकाशस्थ तेजराशि 
भगवान्‌ सूर्यं की स्तुति की ॥ ९७ ॥ 
श्रदिति. वोली- 3.4 
हे ईश ! मे श्राप के सौचणीं रौर परम सत्स , 
शरीर धारण करने बाले धामाोंँ के धाम, शाश्वत 
को नमस्कार करती ह ॥१८॥ ह गोपते 1 जगत्‌ 
के उपकार के लिये किरणों द्धाय जल -खींचनेवलि 


आददानस्य यदरपं तीत्रं तस्म नमाम्यहम्‌ ॥१६॥॥ श्रापके स्वरूप को नमस्कार है ॥ १६॥ श्ाठ मीने 


ग्रहीतुमष्टमासेन कालेनेन्दुमयं रम्‌ । 
बिभ्रतस्तव यद्रपसतितीत्रं नतास्मि तत्‌ ॥२०॥ 
तमेव युश्चतः सव्वं रसं वे वषणाय यत्‌ । 
रूपसाप्यायकं भास्वंस्तस्मं मेघाय ते नमः ॥२१॥ 
वार््य॑त्सगंविनिष्पन्नमरोषश्वौषधीगणम्‌ । 
पाफाय तव यद्रपं भास्करं तं नमाम्यहम्‌ ॥२२॥ 
यच्च रूपं तवातीव हिमोत्सगादिशीतलम्‌ । 


तत्कालशस्यपोषाय तरणे तस्य ते नमः ॥२३॥ = 


नातितीवरश्च यट्रपं नातिशीतंच यत्‌ तवे । 
वसन्तत्तौ रे सौम्यं तस्मे देव नमो नमः ॥२४॥ 
्माप्यायनमश्ेषाणां देवानांच तथा परम्‌ । 
पितरणाच नमस्तस्मै शस्यानां पाकटेतवे ॥२५॥ 
यद्र पं॑जीवनांयेकं वीरूधाममृतात्मकम्‌ । 
पीयते देषपित्रमिस्तस्मं सोमान्सने . नमः ॥२६॥ 
आभ्य यदकरूपाभ्यां खपं विश्वमयं तव । 
समेतम्ीपोमाभ्यां नमस्तस्मे गणात्मने ॥२७' 
यद्रपमृगयज्ुःसाम्नामेक्येन तप्ते तव । 
विश्वमेतत्‌ अ्रयीसंजञं नमस्तस्मे विभावसो ॥२८॥ 


यत्‌ तु तस्माद्‌ परं रूपमोमि्युक्त्वाभिशब्दितम्‌। 


.परस्थूलानन्तममलं नसस्तस्मं सदात्मने ॥२६॥ 


माकेरडेय उवाच 


` : एवं सा नियता देवी चके स्तोत्रमहर्मिशम्‌ 1 । 


: निराहारा 
` ` ततः कलेन महता भगवांस्तपनोऽस्बरे । 


॥ 
॥ 4 


विवस्न्तमारिराधयिषूुने ॥३२०॥ 


1; भरयक्षतामगरादस्या दाक्षायण्या द्विजोत्तम ॥३१॥ 


{7 । ददश महादं .तेनसोऽमत्ससश्रितम्‌ . । 


४ 
> 
^ 


तक अति तीन रूप से जल खींचने बालि श्रापके 
रूप को नमस्कार करती हु ॥२०॥ दे भास्वन्‌ ! उस 


जल को ्राप मेधो द्वारा वपां करक दोडते हं पेसे 


श्ाप्यायक मेघरूप श्रापको नमस्कार है ॥२९॥ फिर 
वर्धं ह जल्ल को भास्कर रूप से . पचाकर आप 
श्रीपधियों को उत्पन्न करते हैँ । मै आपके शस 
भास्कर रूपको नमस्कार करतीं ॥२२॥ हे तरणि । 
शस्य की बृद्धि के लिये श्राप जो हिमवत्‌ शीतल 
रूप धारण करते हँ उस शीतल रूप को नमस्कार 
॥ २३॥ हें रवि ! वसन्त ऋतु मे जो आपका न 
रति तीन अौरः न श्रति शीतल सौम्य रूप. होता 
है उसको नमस्कार है ॥२७॥ देवताश्नों वथा पितसं 
को तृक्च करने के लिये श्रनाजोँ को पकाने बाल 
श्रापके रूप के निित्त नमस्कारदै ॥२५॥ देवतान 
पितयं रौर पारियों के पीने के लिये जो श्राप 
श्रसृतमय सोमसूप धारण करते है उस आप के 
सोमात्मा रूप को प्रसाम है .॥ २६॥ - छि श्रीर 
चन्द्रमा के सित जो विश्वमय.आपका स्वरूप है 
उस गणात्मक रूप को मेँ नमस्कर करती हँ ॥२७॥ 
हे चिभावष्ट ! फक, यजुः चीर समके सम्मिश्रण 
से.जो चयखंक्ञक तेज उत्पन्न होकर संस्ारको ठप 
करता है उस श्रापकरे स्वरूप को प्रणाम दै ॥२८॥ 
श्नौर उससे परे आ्ापक्ने सदात्मारूप को जो प्रशव 
से क्त तथा सूक्म, अनन्त श्रौर अमल है मै 
नमस्कार करती इ ॥ २६॥ । 

माकंर्डेयजी बोक्े- 


हे कौषटकि ! इस प्रकार श्रदिति निराहारी 
छरीर नियमित रूप खे सूर्य॑ की दिन `रातनि स्तुति 
करने लगी ॥ ३०॥ बहुत समय भ्यतीत होने पर 
भगवान्‌ सूयं ने श्राकाश में प्रकट दोकर दन्ञखुता 
श्रदिति को दशन दिया ॥ ३९॥ उसने ्ाकाशमें 
स्थित उस तेजपुञ्ज रूप सूर्यं को पृथ्वीतक ज्योति ` 
फौलाते दप देखा । उनका स्वरूप अत्यन्तः जज्व- . 


प्र०. १०१५ 


माकंरटेयपुराण 


२४७ 


भूम च संर्थतं भाखन्ज्ालामालातिदुहरशम्‌ ३ र्‌ 


त्टरसातदा देवी साध्यं परमं गता । 
जगाद मे प्रसीदेति न लां पश्यामि गोपते ॥२३॥ 
यथा इष्टवती पूर्वमम्बरस्यं सुद्र शम्‌ । 
निराहारा विवखन्तं तपन्तं तदनन्तरम्‌ ॥२४॥ 
संघातं तेजसां तदरदिह पश्यामि भूतले । 
प्रसादं इर पश्येयं यद्रपं ते दिवाकर । 
भक्तासुकम्पक विभो भक्ताह पाहि मे युतान ॥२५॥ 

त्वं धाता विद्धजसि विश्वमेतत्‌ 

त्वं पासि स्थि्तिकरणाय सम्मटृत्तः 

त्वय्यन्ते लयमलिल्ं प्रयाति त्तं 

त्वत्तोऽन्या न हि गतिरस्ति स्यंलोफे ॥३६॥ 

त्वं चर्मा हरिरजसंतनितस्त्वमिन््रो 

`चिततेणः पितरपतिरम्बुपतिः समीरः 

सोमोऽपिर्मगनमदीधरोऽन्धिः 

कि स्तव्यं तव सकलारंमरूप धाम्नः ॥२७॥ 

, यज्ञेश॒त्वामलुदिनमात्सकम्मैसक्ताः 

 स्तुधन्तो विधिपदर्टिना यजन्ति । 

ध्यायन्तो पिनियतचेतसो भवन्तं 

योगस्थाः प्रमदं प्रयान्ति योगमूत्यां ॥१८॥ 

तपसि पचसि विश्वं पासि भस्मीकरोपि 

प्रकटसि पमयखहादयस्यम्बुगभः 

खजपि कमलजन्मा पलयस्यच्युतार्यः 

क्षपयसि च युगान्ते रद्ररूपो .त्वमेवः ॥३६॥ 


मान्‌ होने के कारण देखा न जाता था ॥ ३२॥ बद 
उस रुपको देखकर त्यन्त दुःखित हुई ओर 
कहा, “हे णेपते ! शाप प्रसन्न ह, म ्रापको नदीं 
देख सकती ।३३ ॥ हे सूयं ! ददश प्रापको जिस 
प्रकार ग्रै पिले देख सकती थी उस अकार चव 
निरादार होने के कारण नदीं देख सकती हँ ॥२७॥ 
हे भक्तों पर उया करने चाले बिभो ! जैसा तेज का 
समूह आपका च्राकाश भे हैं वैसारी रूप तर पृथ्ी 
पर देखती हं । हे दिवाकर ! सुपर पा कर्मे 
दस रूप को मेरे पुत्रों को दिखादये श्रौर उनकी 
रक्ता कीजिये ॥ ३५॥ तुम भ्रह्मा होकर ` श्सख जगत्‌ 
को उत्पन्न करते दो, पालन करने फे सिये प्रघत्त 
होकर रक्ता फरते हो तथा श्रन्त में यद जगत्‌ तुम 
मे दी लीन होगा, सर्वलोक मे तु्दारे विना कोर 
गति नदीं दै ॥ २६॥ तुम घ्रह्मा, बिष्णु, शिव, इन्द्र, 


कवेर, यम, चर्ण, वाण, चन्द्रमा, अग्नि, श्राकाश, 
पृथ्वी, परतन, समुद्र सच हो । आपकी कया स्तुति 
करू" रप सकलात्मा रूप हं ॥ ३७॥ हे यक्षेण | 
प्रतिदिन श्रपने कमो मे प्रदत्त ब्राह्म लोग श्रनेक 
पदो से चापका यजन करते है तथा योगी प्काग्र 
चित्त होकर आ्रापकी योगमूतिं का ध्यान करते हष 


परमपद को प्राप्त करते है ॥ २०५॥ संसार को श्राप 
ही तप्त करते, पाते श्रौर भस्म करते है तथा 
श्मापदी उसकी स्ता करते ह । आमयुखे किरणे 
प्रग करने तथा श्म्बुगभं किरणों से हृषित करते 
ह । श्राप व्रह्मा होकर उत्पत्ति,विष्णु होकर पालन 
छ्री९ रुदर टोकर कल्पान्त मे प्रलय करते ह ।३९॥ 


इतिं श्रीमाक॑एडेयपुराण मे दिवाकर स्तुति नाम १०४बां अ° सम्न। 
[1 न~ 


एकसौरपाववां अध्याय 


माकण्डेय उवाच 
ततः. स्यतेनसस्तस्मादाविभृतो विभाषसुः । 
श्रदश्यत ` तदादित्यस्तप्तताप्रोप्मः पथः 
ग्रथ ता प्रणतां देवीं ठस्य सन्दशनन्भुने । 


प्राह भाखान्‌ इृणेषटं बरं मतो यमिच्छसि॥। २॥ 


अणता शिरसा सा च. जानुपीडितमेदिनी । 


॥ १॥. 
| हुई अदिति से भगवान्‌ खयं ने कदा कि जो इच्छा 


। मार्करडेयजी चोक्े- - 


उसःसमय सूर्यदेव ने श्रपने तेज से तप्त तान्न 
कै मान रप धारण कर श्रदिति को दशनं दिया 
॥ १॥ ह बरौष्टकि ¡ उनके दशन पाकर भरणामक्ररती 


हयो वर मागो ॥ २॥ फिर घर देने के लिये उपस्थित 
हप सुदेव से .शिर छुकाकर तथा पृथ्वी पर घटम 


4: 


साकंएठेयपुराण 


भसयुवाच विवसन्तं वरदं समुपस्थितस्‌ ॥ ३ ॥ 


दैव प्रसीद पुत्राणां छतं धिशवनं सम 


यज्ञमागा ददे दानवै वलाधिकेः 1! ७ ॥ 


तन्विमित्यसादं खं ङ्र्प्व यम गोपते । 
अहेन तेषां रावत यत्वा नाशय तद्विपन्‌ ॥ ५। 
क्था से ततया य॒ज्ञपागशुजः पथं 
भ्रचुरधिषयैव न्रलाक्यस्यं 
तथासुकस्णं त्राणं सुप्रसचो खे सम । 


छर भरपन्नातिहर स्थितिता खरुच्यते ! ७ ॥ 


माद्तैरडेय उवाच 
ततस्तामाह भगवान्‌ भास्करो दारितस्करः 
प्रणतामदितिं धिर भसादरुमुखो बिः 
सहवासेन ते गभं सम्मृयाहमचेषतः । 
त्वप्पत्ररग्रलदिते नाशयास्याश्चु निद ता! 
इत्युक्तवा भगवान्‌ भास्वानन्तद्धानुपागमत्‌ । 


[1 


निषत्ता चापि तपसः सम्पाप्रासिलवाञ्चिता।॥ १०) 


ततो रश्मिसदसखन्तु सौषुम्णाख्यो से ररः | 
विपराषतारं संचक्रं देवमातुरथोदरे 
कृच्छुचन्द्रायणदीति खा च चक्र खमारिता ! 


शुखिनी धारयामास दिव्यं गर्भमिति हिज ५१२॥ 


ततस्तां कश्यपः प्राह ईिवि्कोपप्लुताक्चरम्‌ 1 


ईः मास्वसि गभांण्डमिति नित्योपवासिनी) १३२॥ 


सा च तं प्राह गर्भाण्डमेतत्‌ पर्यसि कोपन 1 


न मारितं विपक्षाणां मस्यवे तद्धिष्यति 1१४ 


माकैर्डेय उवाच 
4 ¢ 
इत्युक्ा तं तदा गभसुत्ससल्जं सुराघनिः । 


जाज्वस्यमात तेजाभिः पल्युचेचनकोपिता १५ 


तं द्ष् ऊर्यपो यपुचद्धगस्करउदखम्‌ । 
तष्टा भरणतो भृता ऋष्मिरक्राभिरादरत्‌ 1१६ 
संस्तूयमानः उ तदा गभाण्डान्‌ पक्टोऽभवत्‌ । 
पदमपत्रसवणाभस्तेनसा न्वसदिङ्ुखः ॥१७। 
अयान्तरीक्षादामाध्य क्यप सुनिस॒त्तमभ्‌ 1 
सतायसवगम्भार-वायुवाचाक्षरीरिणी १८] 
मारितं ते यतः पोक्तमेतदण्डं त्वया यने । 
~: सुतस्तेऽयं मात्तण्डाख्यो भविष्यति १६॥ 


दिवाङर ॥ ६! 


1८1 


॥& ॥1 


११ 


1 
2 1 
(५ 1 

# 
१.८. 
४ 
१ 
५ 


| 

(५ 

0 
~“ 


& 8 
< ॥ ¬ 
र 
५.५५ : 
¬ & 4 
4 + 

. | 

५, त्‌ | 
24 24 ‹ 


॥। नि 
> 
| 
14 
| 

6 २ 

1“ + 
| 
4 
८ 


मोयज्तां ओर, 


> । 
| 
^ ८4 
| 
|| 
> 
[न्‌ 
२ 
£ 
“८4 
+| 


4 „1 
। 4| 
॥ 
2 ५ 
2 
411“ 
) (9. 
4 
न्धे 


24, 


रए (स्ध्प्ठद्ता विदधत 
इस्यि 1७१ 
मक्तैर्डेयजी .चोले- - 

हे विग्र ! यद सुनकर भगवाम्‌ यास्कर प्रसन्न 
द्योकर पाम करती इई अदिति खे बोले ॥८॥ 
डे छदिति ! नै खरल अंश से वुस्दरे सभे म पराप्त 
होगा शोर जन्म लेकर तुम्ढार पुज ऊ शबं 
का नाय करटा १९१ यद कहकर खर्यदेव अतद्धौन 
दोयये ओौर अदिति भी पनी सनोक्छमस्य पाकर 
तपं से निच्रत्त इ 1.९०॥ इसके वाद्‌ सयुपु्खा 
आदि दासं क्रिररों खे खयं ने देदमाता अषिति 
के गथ से अवतार दिया॥ ९९१ हे ऋरौषटकरिजी ! 
अदिति ने पवि दोकरं श्नौर च्छ चन्द्राय 
आदि जत करके उस दिव्यं गं ङे धारण किया 
१९२ 1 तच च्छ्यप नं इदु ज्चधयक्तं दाकर उस्र 
कडा क्ति नित्य उपवास करके क्या तुम गभे को 

मारोगी ॥ १२! अदिति ने कहा कि इसत गभेको 
कोड नदीं सार सक्ता ) यह तो ग॒च्श्यो की सत्य 
ङे लिये उत्पन्न दोक ४ ९४ ॥ 
सकतैरडेयञ रोले- 

पति के जचन से कुपित इट देवमाता अदिति 
ते यह हकर उस तजय राभं च्ते अपने पतिको 
दिश्या ए ध्थ्‌ कश्यप ने सये दी कान्ति के समान 
देस्दकर उसे परसामद्धिय तथा ऋग्वेद ` - 


"1 


की छचाञ्नं से दर पूवक उसकी स्तुति की॥ 
इ प्रकार स्तुति को पाप ङ्य चह गभं कमलप 
के समान रक्तवस जौर अपने तेजसे खव दिष्वा्यो ` 
को य्॒तप्टत स्ता इ अर्डसे भकृट इचा २७ 
उुनिमरेट ज स्यप को लकय करके मेध सदश्च गंभीर 
अाक्ाशाचारीं हुड श्य तुमने जो अदिति 
से चह क्था क्ति इदे मारोयी क्या १ इसलिये 


पु मातस्ड नाम से विख्यात होगा ॥ 


ध° १०६ माफेएडेयपुराणे २४४ 


“----------------------------------~-- ~ ------------------~~----------- ~ 


हयाधिकारंच विभुनगत्येष करिष्यति । | थह वम्हारा सामथ्यंवान्‌ पुत्र सूयं का धिकार 
हनिष्यत्यमुरांश्वायं यज्ञभागहरानरीन्‌ ॥२०॥ स्वयं करेगा तथा यज्ञ भाग के हरने वाले राक्षसं 


देषां निशम्येति षयो गगनात्‌ सुपागमन्‌ । का हनने करेगा ॥ २०) उस श्राकाशृवासी कोस्ुन 
कर देवता्ोंको अपार हप हु नौर दानव वल- 


४४ ७ 
मदपमतुलं याता दानवा हतौजसः ॥२१॥| हीन होगे ॥ २१॥ फिर इन्द्रे त्योको देवताश 


ततो द्धाय दैतेयानां त्रुः । | से युद्ध के के रिथ शामित किय शरोर दानल. 
देवैषंदा युक्ता दानवा सुमभ्युः ॥२९।| युद करने किच उपस्थित हप ॥२२॥ पिर देव- 
तेषां ए देवानामघुरे सहे । | तानो श्नौर असुरं का तुसुल युद्ध इुश्रा । उनके 


शस्रास्रदीप्रिसन्दीप्तं समस्तथुगनान्तरम्‌ ॥२३२॥ शरखशसत्ं से चिभुषन मे उनाला दोगया ॥२३॥ 
तस्मिन्‌ युद्धे भगवता मार्चर्डेन निरीक्षिता | उस युद्ध म भगवान मा्तंरड के देखते ही सव 


तेनसा दबमानास्ते भस्मीभता भाषाः ॥२४।| पक्षस उनके तेन से जलकर भस्य होगये ॥ २४॥ 
> उस समय समस्त देवता परम रषं को प्राप्त हए. 


तत्‌! ८: 4 # ४ गक ¶ (स 
; भहपमठुलं पराप्ता; स्ये दिवकसः | | श्रीर उन्होने तेजयोनि मातैरड श्रौर श्रदिति की ¦ 
तष्टुवस्तेजसां योनिं मात्तेएडमदितिं तथा ॥२५॥ स्तुति की ॥ २५॥ फिर देवतां ने पूर्वत्‌ पने , 
स्वाधिकारोस्तया भ्राष्ठ यज्ञमागांध पून्वेयत्‌। अ ५४ + वा 
९, च भातेर्ड श्रपते श्रधिकार मे प्रदत्ति.फी ॥२६॥ 
भगवानपि साण्डः स्वाधिकारमथाकरोत्‌ ॥२६॥॥| कदभ्य पुष्य के समान ऊपर नीचे उनका शरीर. 
कदम्बपुष्पवद्वास्वालधश्वोदुध्वच रर्मिभिः । | गोल अन्निपिंड की तरद होगया ! उन्दनि श्रत्यन्त 
टृत्तापरिपिर्डसदशो दधे नातिस्फुरदपु ।॥२७॥ प्रगट शरीर धारण नदीं किया ॥ २७॥ 
इति श्रीमाक॑रुडेयपुराण मे मातंश्डोतत्ति नाम १०४बां भ समाप्‌ । 


- ० -@७45-- 


एकसौद्बा अध्याय 
,  माकंरडेय उवाच माकरडेयजी बोले _ _ 
श्रय तस्मै ददौ कन्थां संहं नाम विवस्वते । इसके वाद प्रजापति चिभ्वकमनि भरत होकर 


विश्वकर्मा श्रपनी फन्या जिसका किं नाम संक्ञाथा विवस्तान्‌ 
प्रणतो भत्वा विश्वकम्मा परजापतिः ॥ १॥ ४ 
1 (अ सयं को विवाह दी ॥१॥ उख कन्या के विवस्वान्‌ 


वैवस्तसत सम्भूतो मदुस्तस्या अ । . | से वैवस्वत मञुनाम पुत्र उत्पन्न इपः। उसकी विशेष 
पूर्वमेव तथाख्यातं द्सवरूपं विरोपतः ॥ २ ॥| कथा दम पिले कद डु ह ॥ ९॥ गोपति स ने 
ी्यपतयान्यसौ तस्यां जनयामास गोपतिः | उससे दो भ्या पुन र युना नाम की यक 
. दवौ पुत्रौ इमहामागौ कन्यांच यथना एने ॥३ कन्या ये सन्तान उत्पन्न कीं ॥ ३॥ उनमें ज्येष्ठ पुत्र 
म्ैवस्वतो ज्येष्ठः शाद्धदेवः प्रजापतिः । | श्राद्धदेव प्रजापति वैवस्वत्‌ मल इथ शौर इसके 


ततो यमो यमी चे यमलौ सम्बभूवत; ॥ ४॥| वाद यम्‌ पौर युना नाम पक पुत्र शरीर कन्या | 
सेनो ५ € ^ (त वि त तरडये .अधिक 

} ` | जुडँ पेदा इषः ॥७॥ विवस्वान्‌ भतरडके अधिक | 

यत्‌ तेजोऽभ्यधिक तस्य माकतणदस्य मिवत तेज से चर श्रौर श्रचर युक्त तीनों सोग अत्यन्त ( 


तेनातितापयामास ्रीन्‌ लोकान्‌ सचराचरान्‌॥५। | संतत होगये ॥ ५॥ गोलाकार विवस्वान्‌ महान्‌ | 
गो्लाकारन्तु तं शटा संञा रूपं विवस्वतः । | तेज को सदन न कर्ती दुई संज्ञा श्रपनी छाया 
गरसहन्ती मह तेन स्वच्यायां परेष्यः साऽतरवीत्‌)॥९।॥ से वोली ॥ ६॥. , गि 


, ३५१. माकश्ठेयपुराण । ०१०६. 


खंलोवाच संज्ञा बोली- ; न 

इहं यास्यामि भद्रं ते खमेष भवनं पितुः । म अपने क ५ हं ठम मेरी आक्षा 
ना तयान न से निर्विकार होकर यद्धं रहो ! तुम्दास कल्यार्‌ं 
कारं 9 मच्छासनाच्ुम । होगा ॥ ७॥ इन दोनों बालकों श्रौर खुन्दर कन्या 
मोच बालका मह सन्या च वरषणिनी | | की स्ता करना श्नौर इस भेद को भगवान भारवरड ` 
भाव्यो नैव चाख्येयमिदं मगवते त्रया ॥ ८ ॥| से न कना ॥ ८॥ । 
छाया बोली- प 

हे दैवि } जव तक किं सूयं मेरे केश न पकड्गे 
या शाप देने को उद्यत न होंगे तव तक तै तुम्हारा 
भेद नदीं करेगी, तुम्दयरी जदं इच्छा दो जाश्रो ॥ 
छाया से इस प्रकार कटे जने पर खंक्षा पिता. के 
धर चली गहै चौर वद्यं पिताके घरपर कुदं काल : 
तक री ॥१०॥ पिता क घ्रार वार कहने पर कि. 
शपते पतिके घर जाञओमो, संज्ञा धोड़ीका रूप धारण ` 
करके उत्तर दिशा मे खे को गई ॥ ११॥ हे 
महापुनि कौष्टुकिंजी ! बद्धां उसःसाध्वीने निराहार 
रहकर तपस्या की ॥१२॥ संज्ञा के .पिदर-गृद चले 
जने पर छाया उसका रूप धारण करके भगवान्‌ 
सयं फे पास रटने लगी ॥९३॥ भगवाय्‌ सूर्ये उसे 
संज्ञा समकर. उससे दो पतर श्रौर पक कन्या उत्पन्न 
किये॥श७दे द्विजश्रेष्ठ ! उन. दोनों पुमे जो पदि 
उत्पन्न इरा चे वैवस्वत मयु के समान साचि 
नाम मच हुश्रा ॥ ९५॥ दृखसा पुन शनैश्चर नाम श्रह 
इशआ्रा रौर कन्या तपती नाम इद जिसका विवाह 
राजा सस्वरण के साथ इश्या ॥ १६॥ द्धाया रूपी 
संज्ञा जितना प्यार श्रपने पुत्रो से करती उतना ` 
संज्ञा के पुरो से न करती ॥ १७॥ मने तो दस 
चात को क्षमा करदी परन्तु यम ने इसको न संहा ` 
यद्यपि दुःखित होकर छायां ने यमं को वहत सखम 
भाया॥ श्ट हे सुनि! होने वाली चात बड़ी 
वलवान्‌ होती है, यम ने लडकपन से कोधमे श्रा 
कर छाया संक्ञाको मारने के लिये लात दिख, 
जिखसे श्नत्यन्त क्रोधित होकर छाया संज्ञा ते यम 
को शापदिया॥ १६॥ ` - 
छाया वोली- 

जोत्तूपिताकी दी को लात दिखाकर मारना 
चाहता था इसलिये तेरा यह चरण गिरेगा, इसमें 
संशय नदीं ॥ २०) यमने भी शाप से अत्यत्त ` 
पीडित दोकर धमात्मा मनु के साथ सव वृत्तान्त 
पिता से निवेदन कर दिया ॥२९॥ 
यम वोजे-- 


` हे देव ! मासी माताको स्नेह दयपरतुर्तय नु 


छायोवाच 

रा केशग्रहणादेषि शापान्नैव कर्हिचित्‌ । 
प्राख्यास्यामि मतं तुभ्यं गम्यतां यत्र | 
ह्युक्ता च्छायया सन्ना जगाम पिदिमन्दिरम्‌। 
राव्‌ पितुगेहे कचित्‌ कालं शुभेक्षणा ॥१०॥ 
र्तः समीपं याहीति पित्रोक्ता सा पुनःपुनः। 
प्रगच्छद्इवा भत्वा इरन्‌ विभोत्तरांस्ततः ॥११॥ 
तत्र तेपे तपः साध्वी निराहारा महामुने ॥१२॥ 
पितुः समीपं याताया! संज्ञाया वाक्यतत्परा । 

द्र पधारिणी छाया भास्करं सथुपस्थिता ॥१३२॥ 
तस्यांच भगवान्‌ सूयः संज्ञायामिति चित्तयन । 
तथेव जनयामास द्वौ सतौ कन्यकां तथा ।'१४॥ 
पव्वेजस्य मनोस्तुरयः साविस्तेन सोऽभवत्‌ । 
यस्तयोः प्रथमं जातः पुत्रयोर्दिजसत्तम ॥१५॥ 
द्वितीयो योऽभवच्वान्यः स ग्रदोऽमच्डनेथरः 

पस्था भूत्‌ तपती या तां घ्रे संवरणो दपः ॥१६॥ 
संजा ठु पार्थिवी तेषामात्मजानां यथाकरोत्‌ । 
स्नेहन पू््य॑नातानां तथा कृतवती सती ॥१७॥ 
मुस्तत्‌ कषान्त्ास्तस्या यमधास्या च चक्षमे । 
वहुशो यन्यमानस्तु पितुः पर्या सुदुःखितः॥१८॥ 
स वै कोपाच वार्था मापिनोऽयैस्य वै बलाद्‌ । 
पदा .सन्तज्ज॑यामास चायासंतनां यमो सने। 
ततः शशाप च यमं संज्ञा साअमर्षिणी भृशम्‌ ॥१६॥ 

छुयोवाच 

पदा तर्जयसे यस्मात्‌ पिद्माय्यां गरीयसीम्‌ । 
तस्मात्‌ तवेव चरणः पतिष्यति न संशयः ॥२०॥ 
यमस्तु तेन शापेन भृशं पीडितमानसः । 
मनुना सह धम्मात्सा सव्वं पिते न्यवेदयत्‌ ॥२९१॥ 
। पम उन्रान्च 
"`. तुल्यमस्मासु माता देव न व्तते । 


 श्र०,१०६ भरयषुरण २५१ 


नौर मेरे वड़े भाईकी श्रपेक्ा बद दोना छोटे 
मायो को अधिक प्यार: करती है ॥ २२॥ उसको 
नै लड़कपन श्रथवा मोह से उसे लाठ्से मारनेको 

उद्यत हुखावस्तुतः मेरी लात उसके शरीरम नदीं 
लगी, इसको शाप चमा करते के योग्य ह ॥ २३१ 
मुमको जोकि मै उनका पु ह उन्दोनि क्रोध वश 
शाप दिया है इसलिये भँ समभता दह कि ते मेरी 
मराता नदीं ह ॥२९॥ हे पिता यदपि पुज दुी 
हो तो भी माता उसके साथ दुशुंण नदीं करती, 


[ 


उन्दने यह किख प्रकार शाप दिया 


विदल्यज्यायसोऽप्यप्मान्‌ कनीयांसौ ुमूपंति२२॥ 
-तस्या ` मयोचतेः पादो न तु देहे निपातितः । | 
वायाद्रौ यदि षा मोदात्‌ तद्वान्‌ पन्तुमहति॥२३॥ 
शत्ोऽहं तात कोपेन जनन्या तनयो यत; । 
ततो न मंस्ये जननीमिमां वै तपतां चर ॥२५॥ 
विगुशेष्वपि पुत्रेषु न माता विगुणा पितः । 
पादस्ते पततां पुत्र कथमेतत्‌ परवक्ष्यति ॥२५॥ 
तव भसादाचचरणो न पतेद्भगवान्‌ यथा । 
आतृशापादयं मेऽद्य तथा चिन्तय गोपते ॥२६॥ 
क रविरुवाच ` थं वोले- 
-्रसंशयमिदं पुत्र भविष्यत्यत्र कारणम्‌ । निस्पन्द यद कोई कारण है जिससे हे पु! 
येन ल्वामाबिशत्‌ क्रोधो धम्मं सत्यवादिनम्‌॥२७॥ ठुम जैसे धमक ्ौर सत्यवादी को रोध उत्प 
स्वेषामेव „ भरतिघातो हि निदे हुश्रा ॥रओसब शापो की निवृत्ति दो सकती हे 
सन्वषामिय शपान ९ पर्व॒ माता के दियि दु शाप की कभी निदृत्ति 
नत सात्राऽयिशपाना कयचिर्बापनिवततनम्‌। २८॥ नदीं दोखकतीं (प ॥ हे पुत्र ॥ तुम्हारी माताके 
न शवयमेतन्मिथ्या त॒ कतु मातुबचस्तव । | दिथे हष शाप को मँ मिथ्या नहीं कर सकता परु | 
विचित्‌ तव विधास्यामि पत्रसनेदाद्हभ्‌ ॥२९। सेदव होकर त्रे अपर अनस्य कच यमद | 
ध न्ति महीतलम्‌ । करूंगा ॥२९॥ जव मि माँस लेकर पृथ्वी तलपर | 
कृमयो मांसमादाय प्रयास्य^्त म तलम्‌ ज्वगे वव उसका वचन सत्य होगा शौर तुम्हारा 
छृतं तस्या वचः सत्य्‌ न्च रातो भदिप्यसि।॥०।)| भी परित्राण दोजायगा ॥२०॥ नए 
माकंरडेय उवाच माैरडेयजी वेत्त ध | 
श्रादित्यस्तव्रबीच्चाया किमथै' तनयेषु वै । सूने क ४ कडा, स पुषँ मेँ म ॥ 
त्येष्वप्यधिकः सेद एकव क्रियते त्वया ॥२३१॥ क ध त | 
नलं नैषा 1 सं व ॥ | सि टूनकी माता नदी धे) ठग दरी 
बिगुरेष्वप्यपत्यषु कथ माता शपेत्‌ खतम्‌ संज्ञा वनकर आग के पक माता, 
सा तत्‌ परिहरन्त [ च्च ताचचक्े विवखतः । छ्मपने द्वगुरी पुत्रको ५ नदीं देती ॥ ३२ 1 
„ चातमानं संमा ह ॥२३॥| पर छाया ने विवस्वान्‌ को ङु न चताया! तच 
सं चारमान दमा एक्तस्तत्वमपर्यत २ | सूर्य ने ध्यान किया प्मौर सच वात को जान लिया 
तं शरप्तुयु्यत दद्रा च्ायास्ा दिवस्पतिम्‌ । त व ५ सूं र शाप 
.. भयेन -कम्पती ब्रह यथात न्यवेदयत्‌ ।॥४॥| देने क उथत कर भय हु जो कु, 
भयेन र ¢ ४ सत्य वात थी निबेदन करदी ॥ २७ ॥ यदह नकर | 
;विवस्वास्तु ततः करुद्धः शरुत्वा शवशरमभ्यगात्‌। | । 
५॥ णै वैरि = 1 
व चापि तं यथान्यायम्प्वत्व दिवाकरम्‌ । 
निरग्धुकामं रोषेण संन्लयामसि सत्तः ॥२५॥ 


देया कि तेरा पाँब 
भिर जायगा ॥ २५॥ दे भगवन्‌ गोपते ! आपकी 


कृपा से माता के शापे कारण मेरा पावन गिरे. 
फेखा उपाय सोचिये ॥ २६॥ 


दिवाकर का द्चन कर उनको गन्त किया ॥२५॥ 


वुगदारे रति इुःखद तेजस्वी रूप को खदन.न 
| ् । ` | कर सकने के कारण खंकञा वनम तपस्या कर ६ । 
असहन्ती ततः संहा वने, चरति वै तपः , ॥३९॥ हे ॥३६॥ प देखिये कि आपकी -छमः अचरं 


३५२ । मोकरुडेयपुराण ५ अ०-१०६ 


्रष्यते तां भवान सभाय शुभचारिणीम्‌ । | वाली भायां अएपके रूप की शान्ति के निमित्त-वन 
रूपा" भवतोऽरए्ये चरन्तीं सुमहद्‌ तप; ।॥\३७१॥ म घोर तपस्या कर रदी है ॥ ३७१ दे देव ! सुभे 


स्पृतं मे ब्रह्मणो वाक्यं यदि ते देव रोचते। | ब्रह्माजी का वाक्य याद्‌ है । यदि आपकी रुचिो 
ख्पं निवर्तयाम्येतत्‌ त कान्तं दिवस्पते ॥३८]॥ ते भँ ्ापके.रूप का निवक्त॑न कर दूँ ॥ द८॥ 

। भाकैरुडेय उवाच माकंरुडेयजी वोले-- १ 
यतो हि भास्वतो रूपं पागासीत्‌ परिमण्डलम्‌ । तव भयचान्‌ स्ने विश्वक्मां से कहाकरिजो † 
ततस्तथेति तं माह टार भगवान्‌ रविः ॥३६॥॥| चाप कहतं है वही दोगा ॥३९॥ विश्चकमां सूये की 
विश्वकर्मां ललुङञातः शाक्रीपे विवखतः । आज्ञा पाकर शाकद्वीप मे मये श्नौर वहाँ जाकर 


उन्होने तेज को धमार उसको अलग करने का 
यत्न क्रिया ॥४०॥ विश्वक्मा की नाभि में स्थित 
स्यं के घूमने से सम्पू जगत श्रौर समुद, परैत 
वन से युक्त पृथ्वी आकाश मे पर्ह॑च गरे ॥ ४९॥ 


श्रभिसारोप्य तव्‌ तेजः शातनाथोपचक्रमे 119 | 
भ्रसताऽ्येषजगतां नाभिभतेन भास्ता । 
सथुदराद्विवनोपेता सारसुरोह सही. नभः ॥४१॥ 


गगतश्वाखिलं बह्मन्‌ सचन्द्र -ग्रह-एारकम्‌ । दे जह्यन्‌ ! चन्द्रमा, ग्रह्‌, तथा तारागणं संहित 
अधोगतं सहभाग वभृवाक्षिप्तमाङृलम्‌ ॥४२।॥ सम्पूणं आकाश नीचे जाकर व्याकुल रोरहा धा ॥ 
पिक्षिष्ठसलिलाः सव्यं चम्‌ बुश तथार्चिषः 1 | उपयोक्त सव जल मे निमञ्न होगये तथा बड़े-बड़े 


व्यभिद्यन्त महाशेलाः शीणंसासुनिवन्धनाः }७३।॥| पवत रट गये ॥ ४२॥ हे खनिसन्तम ! जिन स्थानों 
धुवाधाराए्यशेपाणि धिषठयानि सुनिसत्तम 1 | के अगार धुव थे वे हजारे राशियों के अलग 
तुव्यद्रशिमिनिवन्धाति अधो जग्ुः सदस्नशः ॥४४॥| दोजाने से नीचे गिर पड़े ॥ ४४॥ मण्‌ के वेग से 


वेगभ्रमणसञ्ञात-वायुश्षिप्ताः समन्ततः । उत्पन्न इई चाय से वादल धोर गर्जन करते हप 
व्यशीय्यैन्त महामेधा घोररावविचारिणः ॥४५।| चास ओर फैल गये 1 ४५॥ हे सुनि सत्तम ! सर्य 
माखट्भ्रमणपिभ्रान्तं भूम्याकाश-रसातलम्‌ । | ॐ घूमने से भूमि आकाश॒ ओर पाताल सव धरुमने 


जगादालमत्यथैः तदासीन्युनिसत्तस | 1 


र इरा ॥ ४६॥ हे विम ! सम्पू बेलोद्य ॐे घ्रूमने 
ब्रलोक्ये सकले विप्र॒ भ्रसमाणे सुरषयः । पर बह्याजी के साथ देचता्मं तथा ऋषियों ने 


देवाश बरह्मणा साद भाखखन्तसमितुष्टवुः 1९७} सर्यकी स्तुति 1४७ हे सूर्यं ! ्रापके इस स्वरूप 
श्रादिदेवोऽधि देवानां ज्ञातमेतत्‌ स्वरूपतः । से ज्ञात होता है फ आपदी देवतां के आदिदेव 
सरमस्थि्यन्तकालेष विधा भेदेन तिष्टसि ॥४८।|| द तथा खष्टे. पालन तथा अलय रूप दोकर छाप 
व क दी तीन पकार से स्थित हं ॥ ४८॥ हे जगन्नाथ ! 
| । ् त्‌ € € 
स्त म्मवप-दविमाकर आपका कल्याण हो 1 हे धर्म-वर्पा-हिमाक्तर, हे देव 
जुषस्व शान्ति लोकानां देदेव दिवाकर ¦ ४६॥ 


देव देव दिवाकर ! इन लोकों को शान्त कीजिये ॥४६॥ 
इनद्रधागत्य तं देवं लिखूयसानं वथाऽस्तुवत्‌ । | इन्द्र ने भी उख समय श्राकर उनकी सूक्ति तैयार 


जय देव जगद्व्यापिन्‌ जयाशेषनगरपएते ॥५०]॥| करके स्तुतिकी । "हे देव ! जगत्‌ग्यापी } जयत्प्ते 
पय ततः सप्त च शिष्टात्िषुरोगमाः । = | पक जय हो »॥ ९०१ नशि ओर अनि के 
ठदु्िचिैः स्तोत्रैः सस्तिसस्वीपिवादिनः५१।॥| > भे खस ऋषि ने स्वस्ति २ कहते 


नेक स्तेजो से सूयं की पूला की ॥ ४९॥ वालि 
वेदोक्ताभिरथाग्रचाभिवालिखिटयाथ ठव खिल्य भी वेदोक्त आदि ऋषि प्रसन्न चित्त होकर 


भाखन्तंऋग्मिरावाभििरख्यमानं यदा युताः ५२॥॥| सूयं ऋ सूति की स्तुति करने लगे ॥५२॥ हे नाथ ! 
न्वं नाय मोक्षिणां पोषो ध्येयस्त्वं ध्रानिनां पर, ] । मोक्ताथियो के. लिये आप परमध्येय है तथां कर्म 


श्र १०७ . ४१ माकएदेयषुराण ३५३ 


-----------------------------------------~-~ 
त्वं गतिः सव्व॑भूतानां कम्मैकाण्डेऽपि वर्तताम्‌ ५३॥ कारड मे तत्पर लोगो की श्राप गति हे ॥ ५३॥ ह. 
शं भजाभ्योऽस्तु देवेश शं नोऽस्तु जगतांपते। | देवेश ! हे जगत्पते | श्राप हमारा, प्रजा काश्रीर 
शं नोस्तु द्विपदे नित्यं शं नश्चास्तु चतुष्पदे॥५७। इपायों खा कल्याए करं ॥ ५४॥ इसके अनन्तर 
ततौ षिचाधरगणा यक्षराक्षस-पत्रगाः । | विधो, यतो, गकस शौर नागोने हाथ ओट 
कृताज्ञलिषयाः सर्व्व शिरोभि; भणता रविम्‌॥५५।| कर संयेदेव को प्रणाम किया ॥ ५५॥ चे सब मन 
-~-उुरषपिधा वाचो मनःभरोत्रहचलावहाः । | श्र कान को शु देनेवाले इस भकार वचन धोले 
` सदं मबतु ते पेन भूतानां भूतभावन ॥॥५६॥, £ भूलभावन ! श्रापका तेज खव प्ापियोको स 
ततो हाहाहहयैव नारदस्तम्ुरुस्तथा । | दो" ॥५६॥ इसके वाद हादाहह नाम गन्धवैनारद 
उपगापितुमारब्या गान्धर्ववङुशला रविष्‌ ॥५७॥ श्नौर तुम्बु ह जो गान-बिद्या मे निपुख थे भगवान 
पदून-मध्यमगन्धार्ामयविशारदः । का गुण गान करने लगे ॥ ५७॥ पडजामध्यम, 


यामि ध गान्धार, तीन भ्राम, मूर्छना, ताल श्रौर प्रयोगके 
४ तासेश्च समयोगः सुखदम्‌ ॥५८॥ साथ वहाँ पर सुखदायक सृत्य होने लगा ॥ ५८॥ 


विश्वाची च धृताची च उव्व॑शयथ तिलौचमा। | विश्वाची, भृताची, उर्वशी, तिलोत्तमा, मेनका; 
1 सहजन्या च रम्भाश्चाप्सरसां षराः॥५६॥| सहजन्या श्नौर रम्भा रादि सुन्दर श्रण्तसये॥५९॥ 
ननू सिखूयमाने षिभावसौ । | जगत्‌ ऊ स्वामी सुर्य की भूतिं ॐ सामने दाव.भाव 
हावभावभिलासाब्यान्डव्वनत्योऽभिनयान्वहन्‌ ६०॥| विलास के साथ बहुतसे अरमिनव करती दः त्य 
` परावाचन्त सरस्तत्र वेणीणादिदददुंः । | करे लम ॥ ९० ॥ वदँ पर चेणु, वीया, पुव, 
पणवाः पुष्करभैव मृदङ्गाः पर्दानकाः पुखरज, शद्ग तथा देवतार्थं की सैकड़ों इन्दु 
{ देवदुन्दुभयः शंखाः शतशोऽय सहस्रशः ॥६१॥ भियां शरोर हजारों शंख यजने लगे ॥६९॥ गन्धो 


गायद्िश्वैव गन्धव्वैनत्यद्विाग्परोगरेः । | के गान, ण्स के यत्य, श्नौर वाजो के शब्द 
तू्यवादित्रधोरेश्च सव्धं कोलाहलीकृतम्‌ ॥६२॥ से जगत्‌ मे कोलादल मचगया ॥ ६२॥ तव सब 
ततः कृताञ्जिलपुटा भक्तिनम्ात्मूतेयः । | देवताश ने दाथ जोड़ कर तथा भकं से नघ्र हो 
लिख्यमानं सदसा पणेः संव्वदेवताः ॥६३॥| कर सयं की मूर्ति को पणाम किया ॥ ६३॥ तव 
ततः कोलाहले स्मिन्‌ स्वदेवसमागमे । | कोलाहलो देवताश्च के उस समागम मे विश्व. 


1 क कमां ने धीरेघीरे सरथं के तेज फो शमन करके कम 
तेजप्तः शातनं च॑के विकर्मा शनैः शनैः ॥६४॥| कर टिया ॥ ६४ ॥ जो लोग दिमःजल-उप्यकाल के 


इति दिमनलधमपेकालहेोहर-कमलाघन- कारण तथा विष्णु, ब्रह्मा र महेशः से मूतिं रूप 
पिष्णुसंस्तुतस्य । तनुपरिलिखनं निशम्य भानी- | भे स्वुतति विये गये सूयं के चरिज को खनते है 
व्रजति दिवाकरलोकमायुषोन्ते ॥६५॥ चे श्रपनी श्रायु के श्रन्तमें सूये लोक को जाते है ॥ 
इति श्रीमाकैरडयपुराण मे भादुतद लिखनेनाम १६ वा श्रध्याय समप । 
- +ॐ-;०-€५-- त 
 एकसोषातबां अध्याय 
, मार्करुडेय व क माकंरडेयजी बोले-- क स 

लिख्यमाने ततो भानौ रिश्वकमां प्रजापतिः । किर प्रजापति विश्वकमनि पुलक्ञयमान ोकर 
उद्धुत स्तोत्र भिदं चक्र विस्तः ॥ १॥ सूय की मूर्तिं की इस प्रकारः स्तुति शी ॥ १॥ 


स 
(२ ४ ५४ 


४६ _. 


४.४ भर 
ध । ३ ४ 
० 


श्र° १०७ 


धिवस्वते प्रणतहिताजुकभ्पिते महात्मने सम- 
वरप्तसप्त्ये । सुतेनसे कमलङ्लाववोधिते 
नमस्तमःपटलपटावपारिने ॥ २ ॥ 
पावनातिशयपुणएयकस्मते . नैककामपिषय- 
दायिने'। भास्वरानलमयखशायिने सब्व॑लौक- 
देतकारिणे नमः ॥ ३॥ 
अनाय लोकव्रयकारणाय मुतात्मने गोपतये 
प्षाय. | नमो महाकारुणिकोत्तमाय सूर्य्याय 
शषुःपरमवालयाय,॥ ४ ॥ | 
! विवस्वते. ्ञानभृतान्तरात्मने जगत्पतिष्ठाय 
गगद्धितैषिणे. । . ख्वमस्धवे .लोकसमस्तच्ुष 
परोत्तमायामिततेनसे भमः ॥ ५॥ 
“क्षणएषुदयाचलमौलिमालः सुरगणसहितो हितो 
। स्वयुरुमयखसदस्षवपुजेगत्ति विभासि 

मासि दन्‌ ॥ ६॥ । 
भवतिमिरासवपानमंदात्‌ भप॒ति षिलोहित- 
ग्रहात्‌ । मिहिर विभासि यवः सुतरां तिुषन 
पराविनभानिकरः ॥७.॥ ; 
रथमधिरुह्य समावथवं चार्‌ विकभ्पितपुर 
चिरम्‌] सततमखिलहयेभंगवन्‌ चरसि जगद्धिताय 
वेतेतग्‌ ॥८ ॥ 

श्रमृतसुरधाश्चरसेन समं वियुध पिद्रनपि तपयसे। 
प्ररिगिणस्चदन तेन तव॒ प्रणिपत्य क्िखामि 
7गद्धिताय ॥ £ ॥ 

शकसमयणहयमयितं तथ पदपांशुपवित्रतलम्‌ । 
पतजनेवत्सल मां प्रणतं तरिशेवलपावन पाहि रे १० 
इति सकरलजगल्यसरूतिभूतं अिुवनपावनधास- 
पतम्‌ । रविमखिलनगत्यदीपभूतं देषं प्रणतोऽस्मि 
वश्वकम्माएखर्‌ ॥११॥ 


है प्रखतपाक्न ! सव ल्ञेगो फे हितकारी, महात्मन्‌ | 
खक्तफिरण, तेजवान्‌, कमल-वन प्रकाशक, अंधकार 


` | नाशक विवस्वान्‌ ! मै श्रापको प्रणाम करतां ॥२॥ 
'अतिशय-पावन, ` पुरयकंमी,. अनेक ` अभिवादित 
 विपयों के भ्रदान करे वाक्ते, .श्ि-किरणधारी, 
 सं्वलोकटितकारी सूर्यदेव को नमस्कार है ॥ २॥ 


जन्मरहित, तीनों लोक के कारण, भूतात्मा, गोपति 
चष, महा कृपालु, सवच ॐ चजलुखो म निवस करने 
त्राते स्थं को प्रणाम द ॥ ४॥ ज्ञानात्मा, जगत कौ 
प्रतिष्ठा, जगत्‌ के हितकारी). स्वयम्भू, समस्त 


, लोक. फे चल्ल, खसोेत्तम, अमित तेजस्वी . सथं 


भ्रति नमस्कार है ॥ ४॥ हे देव..! श्राप उदयाचलं 


. पचेत से निकल. कर देवताश्रों खहितं समस्त 


संसारं का कल्याणा करते के लि श्न्यकार को 
नाशःकरके हजारों किरणों चे प्रकाशवान्‌ होते. है 
॥६॥ संसारः के अन्धकार रूपी आसव को पान 


करने. के कारण आपका-शरीर रक्तवशं .दोगया है, 


श्प अपनी किरणो से नरिभुवन को प्रकाशितं 
करते हुए इच्छा पूर्वक धमण करते है ॥७॥- है 
भगवन्‌ ! श्राप अपने धोङ्धं से युक्त रथ.पर संवे 
होकर शरीर को कर्पित करतेहप जरातेकी भला. 
के लिये सव दिन श्रमण करते है ॥८॥ दे शुक्रे 
नाश करनेवाले ! श्राप श्रमुतग॒क्त रसदेकर दे बताश्रो 
तथा पितसें को दश्च करते दह । आपको प्रणम 
करके जगत के हित के लिये दी आपकी प्रत्तिमा 
यनाई गई हे ॥ ६॥ हे त्रिभुवन पायन ¡ ्रापके घोड 
का रङ्ग तोते र्ङ्धॐेसमानदटै श्रापकरे चरां 
करज से हम पयि होते हँ | हम आपको प्रणाम 
करते दै, हमारी रक्ता कीजिये ॥१०॥ समस्त जगत्‌ , 
के उत्प्िकारकं, त्रिभुवन फे पठिच्न धाम, सकल 
जगच्‌ के दीपक, समस्त संसार्‌ की रचना करने 
चलति सूर्य को तरै प्रणाम करता ह ॥६१॥ 


इति भीमाकर्टेयपुराण मे शयं-स्तवन नामं का १०७बां अध्याय समाप्त) 


> य -- 


भ° १०८ | माकंण्डयणुरास ` १ 


एकसोभाव्वं अध्याय 
मकेरडेयजी चौत्ते- . `. ; `“ 1. ^ "4 
"एवं सय्यस्तवं इयन्‌ विश्वकम्मा दिवसयतेः , शख भकार सूयंकी स्तुति करते हय ` . ` 
तेजसः पोडशं भागं म्रणडलस्थमधारयत्‌ ॥ १॥ प तेज के व भाग को .मगडलस्थ, १ 

शाति ; या ॥१॥ उस तेज ॐ पन्द्रह भागों के; कटः 
शातितेस्तेनसो भायेदेशभिः पतवमिस्तथा । से सृं भगवान्‌ का शरीर शति 'कान्तिगुक्त ` ८ . 
-श्रतीवि कान्तिमचार्‌ भानोरासीत तदा वपुः॥ २॥ उन्दर दोगया ॥ २॥ जो पन्द्रह भागं तेजं... 
शतितश्चास्व यत्‌ तेजस्तेन चक्रं विनिर्मित । | क्रिया गया था. उससे चिम्यु "का सदशन चक्र 


विष्णः शूलंच श्वस्य शिविका धनदस्य च | | मद्ादेच का टल, इवेर की पालकी। थमराज,-क 
ठरड, देवतां के सेनापति की शक्ति ॥३॥ तथा 


दडः पेतपते; शकतदेवसेनापतेस्तथा ॥ २॥ शरीर देवतां क अनेक आयुष विश्वकर्म ने 
दन्येपाञ्येष देवानामायुधानि स विश्वत्‌ । | के उस तेज से श्रुरोका नाश करलेके क्िये.वनेयि 
चकार तेजसा भानोभासुरणए्यरिगान्तये ॥ ४॥  ॥ प्रधिक तेज ध दोजाने र का, 
इतिं शात्तिततेनाः स शुशुभे नातितेनसा | अ सद्यं दाग्या श्रार शछत्यस्त शोभायमान 
वपुदधार मात्तेए्डः सरव्यामियवशोमनम्‌ ॥ ५ ६५ स 
स ददश समाधिस्थः सां भाय्यां वडुवाकृतिम्‌। | घोड़ो के रूप म सव प्राणियो से.श्रलग तप म, 
छध्रष्यां संव्येभतानां तपा सियमेन च ॥ ६ ||| लबलीन देखा ॥ ६॥ फिर सूयं घोडे का रपःधारण। 
उत्तरा इरन्‌ गत्या भुत्वाऽ््वो भानुरागमत्‌ । 


कर शदेन उत्तर दिशा मे जहां करि. उनकी 
सीधी गये 
सं चच तमायान्तं परु विशङ्का ॥ ७॥ # गये ओर संश्षामी उनको श्राया श्रा देख 
जगाम सभ्ये तस्य ' पृष्ठरक्षणतत्परा । 


माकर्डय उवाच 


कर परपुरय की श्रा से ॥ ७॥ ्रपने.पिचजे 
भांग की र्ता करती इई उनके सम्मुख श्रा; तंव । 
ततश्च नासिकायोगं तयोस्तत्र समेतयोः ॥ ८} 
वडवायश्च तत्‌ तेनो नासिकाभ्यां ‡ 
1 तनो नासिका था विवस्त उदरमरे गया उ५८ से दैवताश्रोके वैद्य दोनों श्रश्िनी 
कुमार उत्पन्न हए ॥ ६॥ शश्वरूपधारी ' मातेरड के 
मात्तएटस्य युतायेतावस््ररूपधरस्य दि १० ठ ५ क 
प चीर्यःसे खग श्रोर घलुप धारण श्रश्व-परः |. 
रतसोऽनते च रेवन्तः खड्गो धन्वी तलुत्रधक्‌ | चदे हुए, वाण च्रौर . तरकश लिये सेवन्त नाय 
> । खूप को देखकर अत्यन्त श्मानन्द को .पाप हुः ॥ 
| ६ समालोकय सा रूपं ुदमाददे ॥६९॥ फिर संज्ञा ने भी. अपना असली. खरूप्‌.धारणं 
स्वरुपधारिणील्चेमां स निनाय निजालयम्‌ । 
ततः पूर््वुतो योऽस्याः सोऽमृदषस्वतो मतुः रहने लगी ॥ १३॥ उनका सवसे ग्येष्ठ पुत्र वैवखत 
हितीयथ यमः शापादरमरषटिरयुमरात्‌ ॥१४॥| मच इना नौर दूसरा पुत्र यम शापके कारण पिता | 
धर्मोऽभिरीचते यस्माद्धम्मेराजस्ततः स्मृतः ।१५॥| उनकी धर्म मे खमि होने के कारण वे धर्मराज कह | 
कमयो मौसमादाय पादतस्ते महीतलम्‌ । | लाये ॥६५॥ उनके पित नेथ ककर कि तमार 


वद्यं उन दोनो फी नाक से नाक - मिलगई ,॥८॥ । 
सयं भगवान्‌ का जो तेज नाक. मागं से धोडीक्रे 
देवौ तंत्र समु्न्नावश्िनौ भिषजां षरो ॥ ६ ॥ 
सत्यदया तनयाचश्ववक्लाद्धिनिगतां । | नात्य रौर दख नामक दोनों पुत्र श्रग्विनीः के 
मुख खे उत्पतन ष {1:१० ॥ . तथा . यन्तःमे' उनके | 
भरश्वारुढः समुद मृतो बाणतृएसमन्वितेः ॥११॥| ३ उत्पन्न इरा ॥ {५ ॥ किर सूर्यं ने अपने निम॑ल । 
ततः  सरूपमयलं दशयामास भालुभान्‌। | खरूपं को दिखाया अर संञा उनके उस शान्त ` 
४ श ध ष फिया च्रौर स्यं भगवान्‌ उसको यपने धरः लि 
सन्नं भाय्यां प्ीतिमतीं भास्करो वारितस्करः॥ १२॥ कर केगये 1. फिर संञा श्नौर सयं मे परस्पर प्रीति 
५ अश्र से घम दि इश्चा ॥ ६॥ छाया | 
यमस्तु तेन शापेन भृशं पीडितमानसः । ` | थ से यमराज के चिच को चह कषे इरा । | 
च २६४६ 


३५8 भाकण्डयपुराण अ० १०६ 


पिष्यन्तीति शापान्तं तस्य चक्र पिता स्वयम्‌।।१६॥ पाच के मांख को कीडे प्थ्वीवल पर जे जोयगे, ` 
वर्मरषटियतथासौ समो मिरे तथाऽहिते। | उनके शाप का अन्त कर दिया ॥ १६॥ उस समथ ` 


। से यम धर्मणि होकर शच्च श्रौर मिच्रको समभावं ` 
ततो नियोगे तं याम्ये चकार तिमिरापहः ॥१७। से देखने लगे तय रयं त नक ददति दि 


तस्मे ददौ व भगवान्‌ लोकपालताम्‌ । | ले जाकर ९७ लोकपाल बनाया तथा भगवान्‌ 
पिव परितुष्टो दिवाकर; 1१८॥॥| दिवाकर ने यरुन्न होकर उन्हे पितरों का -्रधि-. 
यष्ुताश्च नदीं चक्रे कलिन्दान्तरवाहिनीम्‌ । | पत्य भी दिया ॥९८॥ फिर महात्मा पिता ने यमुना 


शनौ देवभिषनौ महात्मना को कलिन्द देशमे नदी के रूप मे वहने की श्राज्ञा 
अनौ देवमिषनौ तौ पित्रा त ॥५६॥ दी तथा दोनो अ्रिविनी कमारो को देवताश्रों का 
ुदयकाधिपतित्वे च रेवन्तो विनियोजितः वैय वनाया ॥१६॥ रेवन्त को गुह्यको का स्वामित्व 


एवमप्याह च ततो भगवाह्टोकभापितः दिया तथा भगवान्‌ सूर्यं ने उससे यह भी का, 
तमप्यदेषलोकस्य पूज्यो वप॒ भविष्यसि ॥२०॥| “2 वत्स । क भ दवाय पूजित होगे" 
अरण्यादिमहादाव वैरि स्मय च॒ | | व स ५६ 
त्व स्मरिष्यन्ति ये मत्यां मोक्ष्यन्ते ते महापदः।२१॥| से हुखकारा पावे ॥२९॥ जो मनुष्य वुग्ारा 
मं शुद्धि सुखं राज्यमारोग्यं कीर्तियुननतिम्‌ । | पूजन करेगे उनको तुम प्रसन्न दोकर केम, वुद्धि 
नराणां परितुष्टस्तवं पूजितः सम्पदास्यसि ॥२२। | उख, राज्य श्रारोग्य, कीतिं श्यौर उन्नति -पदान 
ायासं्ञासुकशवापि सावणेः सुमहायशाः । | करोगे ॥२२॥ श्रौर छाया के पुज जो महान्‌ यश 
भाव्यः सोऽनागते काले मयु; सावणंकोऽषमः॥२३॥| बाले सावर्णिक है वे भविष्य मे रावे मज होगे ॥ 
अरुषृष्ठे तपो धोरमध्यापि चरते भुः सावरिक प्रमु मेरु पवैत पर अव भी तपस्या करते . ) 
भ्राता शनैशवरस्तस्य ग्रहोऽभृच्छासनाद्रषेः ॥॥२४॥ द । उनके भाई शनैश्चर उनकी आज्ञा से ब्र हप „ 
यवीयसी तु या कन्यादित्यस्याभूटृद्विजोच्तम। |॥ २०॥ दे दविज श्रेष्ठ ! सू्॑की जो छोटी कन्या 
भरभवतं सा सरिच्छ्रेष्ठा यघ्ना लोकपावनी ।२५॥॥ यञना थी बह लोको को पवित्र करने बाली ष्ठ 
यस्तु येष्ठो महाभागः सगो यस्येह साम्बतम्‌ | | नवौ इर ॥२५॥ यष्ट पुत्र वैवखत मनुका 
विस्तरं तस्य ब्यास मनोववसतस्य ह ॥२६।॥ यद समं दै, सका भं विस्तारशूवक वंन करूणा 
दं यो जन्म देवानां शूृषएयाद्वा पठेत बा. | 1२६ विवस्वान्‌ ऊ पुं के जन्म श्रौर भगवान्‌ ` 
विवस्वतस्तनूनानां सपेमाहासम्यमेव च ॥२७।॥ सर्य के मादात्म्य को जो पढ़ता या नता है ॥२७॥ 
आपदं प्राप्य मुच्येत प्राभुयाचच महायशः । | चट आपत्ति से मुक्त होकर महान्‌ यश को पराप्त 
अहोराननकृतं पापमेतच्छमयते श्रुतम्‌ । करता है । आदिदेव महात्मा मार्वरड के मादात्म्य , 
1त्म्यमादिदेवस्य भातंश्डस्य महात्मनः ॥२८॥ को दिन रात्रि सुनने से पापका शमन होतषै ॥ र्न | 


इति भरीमाकेणडयपुराणएमें रवि-माहास्म्य नाम १०८ अ० स० | 


~> द व्दन्- < 
एकसोनोवाँ अध्याय 
क्रोष्रकिरुबाच .. | करो्कि वोक्े- 
भगवन्‌ कथितः सम्यरभानोः सन्ततिसम्भवः | | हे भगव्रन्‌ ! श्रापने आदिदेव सूर्य की खन्तति ` 


{ाहारम्यमादिदेवस्य खरूपञ्चातिविस्तरात्‌ ।। १॥ माहात्म्य तथा स्वरूप का विस्तार पूरक. वरन . ` 


† =. 


अ० १०६ माकेण्डेयपुराण ११७ 


भूयोऽपि भावतः सम्यडमाहारमयं ुनिष्म। किया ॥१॥ हे सुनिसन्तम ! फिर मी मै मली भांति 


भरोतमिचाम्यहं सूर्यं का माहात्म्य श्रौर सुनने की इच्छा करता हं 

प्यहं ववतुमैरि | 

च्छाप्यहं तन्मे प्रसन्नो से ॥ २। श्राप सन्न होकर उसको कदने के योग्य ह ॥ २॥ 
मार्करडेय उवाच माकेरडेयजी वेलि- 

श्रयतामादिदेवस्य माहात्म्यं कथयामि ते । श्रादिदेर भगवाय्‌ सुर्यं ने मसुष्योकरे चाराधना 


` विपस्तो यद्वकार पूल्व॑माराधितो जनैः ॥ ३॥ व न ५ तम 
दमस्य पुत्रं षिख्यातो राजाभुदराञ्यवद्धनः म का पुत्र राज्यवद्धन 


नाम राजा विख्यात हुश्रा । उस राजान प्थ्वीका 
स सम्यक्‌ पालनं चक्रं पृथिव्या; पृथिवीपतिः ४ ॥| भली माति पालन किया 19] दवि ! उस, मदा- 


धर्मतः पाल्यमानन्तु तेन राट महात्मना । | त्मा रजा दे घमं पूर्वक पालन किया इुश्रा बद्र 
पषेश्नुदिनं विप्र जनेन च धनेन च॥५। सास्य दिन पर दिन जन श्रर घन से वदने लगा ॥ 
हषटपटमतीवासीत्‌ तस्मिन्‌ राजन्यरेषतः। | समस्त पृथ्वी पर उसके राज्य भ॑ नगरनिवासी 
राजकं सकलश्व्य॑थां पौरजानपदो जनः ॥ & !॥| पजाजन श्रत्यन्त हृष्ट पुष्ट थे ॥६॥ दम फ पुत्र 
नोपसर्गो न च व्यापिनं च व्यालोद्भवं भयम्‌ । | राज्यवर्न के राज्य मे कोई विघ्न, व्याधि, सयो: 
न वबाषृष्टिभियं तत्र॒ दमपूत्र महीपतौ | ७ ||| का भय श्थवा श्नाघृषटि भय कमी न श्रा ॥ ऽ॥ ¦ 
[२। हने च्‌ महायतैददौ दानानि चार्थिनाप्‌ ] उसने प्रहान्‌ यत्त किये तथा श्रधया को दानादि 
एुधम्स्यानिरोधेन शुभूने भिषयानपि ॥ ८ ॥| दिये तथा निर्वेध दोकर उसने विषयों का मोग, 


तस्यैवं इन्यत राज्यं सम्यक्‌ पालयतः मनाः । | किया ॥ ८॥ उसको राज्य हप तथा भली | 
प्रकार स भरजा का पालन करतत इए सात हञ्जार 
सप्न॒पप॑सहन्नाणि जग्ुरेकमहोयथा ॥६॥ वर्षं एफ दिनफे समान व्यतीत होगये ॥६॥ दक्षि | 


विदृरथस्य तनया दाक्षिणात्यस्य भूभृतः । | देश के राजा विदूरथ की कन्या मानिनी नाम उस 
तस्य पत्ती वभूवाथ मानिनी नाम मानिनी ॥१०॥| की खी हु ॥१०॥ प्क दिन वह सुन्दरी मानिनी 
कदाचित्‌ तस्य घा सुभः शिरसोऽभ्यञ्जनो्ता । | सोते हणः राजा के शिरः पर एक भ्वेत बालको देख 
पश्यतो राजलोकस्य युमोचाश्रणि मानिनी ११ | कर शश्र रवाहित करने लगी ॥ ११॥ उसके अशरुः{' ' 

पते; विन्टु जव राज्ञा फे शरीर पर पड़े तो वे जगे '्ौर। 
तदश्विन्दवो गात्रे यदा तस्य मदी त 
तदा वी्याश्रवदनां तमपृच्छत मानिनीम्‌ ॥१२॥ मानिनी को रोते हुए देखकर उससे पचने लगे ॥ 


राज्यवद्धन ने उसको मौन होकर अश्रु प्रवाहित, .. 
शब्दमशरुमोेण रुदती तां षिल्लोकय वे । | कते देवकर पू, दे निनी} कया ११, 


, यमं स सहीपतिः॥।१७॥| कष कपपर पना न किर रः 1९४१ । 
स सुमध्यमा ॥ के हृत पृद्छने पर उस खुन्दर कमररघाल्ली :; 
दशयामास पलितं ` केशमारान्तरोद्भवम्‌ ॥१५॥| > पके हप चाल को दिखाया ॥ १५॥ हे राजन्‌ 
एतत्‌ पश्येति भूपाल किमिदं मन्युकारणम्‌ । _ | देखिये, चहं क्था मवी ५ । द न 
ममातिमन्धभाग्याया जहासाथ वरपस्ततः ॥१६॥ कर पज हसे ॥९६॥ उस समय जितने राजा र 
स विहस्याह तां पत्नीं शृएषतां सच्वभूमताम्‌ । श्राये थ उनके तथा नारको के 1 | 
पौराणा्व महीपाला ये तत्रासन्‌ समागताः ॥१७।| कर पल से कटने लगे ॥ १७ ॥ ह विशत ५५८ 
शोकेनालं पिश्वालाक्षि रोदितव्य न ते शुमे। | शमे ! शोकं करक सेना चथा है । सव प्रासि 


३५८ माकेर्डेयपुराण ० १०६ 
= -------------------------------------------------------------~----~--~----------- 
जंनसरदधिपरिणासात्रा विकाराः स्यजन्तुषू ॥१८।\ देश्यं के अन्द दने पर बिकररों क उत्पत्ति होती 
अधीताः सकला वेदा इए यज्ञाः उदह्खशः । ¡ 2 ॥९८॥ हे वरानन ' येने खसस्त वेर्यका अध्ययन 

व स्ुखच्च ¡ क्वा, हजनायें यज्ञ कयि, व्राह्मण को दान दिया 

द्विजानां पुत्राधं सदत्पत्ना दरानन ॥ ० था रे पुत्र भी उत्प्न हृष ॥ २६॥ मद्यो -फो 
1 

| 


अति इभ मोर सी तस्हारे खाथ भोगे! पृथ्वीका 
[स्त्वया खाद्‌ ये म्यरतिदलंयाः ) ति डलभ मोन भी तुस्द 

मक्ता भोगास्त्वया छादय मर = भली धातरि पालन क्या ओौर युद्ध मे बीरता -से 

स्यद्‌ च पालिता पृथ्वी साधु युद्धष्वु्टतम्‌ २० काम किया 1२०1 इषमिनो के साथ खी मज्ञाक 


२1 
सितैः सरैै्सितं विहृंव वनान्तरे ! | क्रिया तथा उनोपवनो मे विद्र क्रिया 1 मैने भ्नौर 
[> चभ 
भी क्या वही किया जो तुस अखेत वालं को देखकर 


किमन्यन्‌ छतं मद्र पलितेभ्यो भिभेषि ॥0 ९। डरती हो ॥२९॥ हे सुभे ! भले दी मेर सच-वाल 
भवन्त्‌ केशाः पलिता उलयः सन्तु म शुभ । पक्त कर श्वेद दोजावें चनौर देहभी भिथिलं होजाय 
रैथिस्यमेत मे कायः कृतकृत्योऽस्मि मानिनि।॥२२।| खमे ङ नदीं करना है मे खव इदं कर खकरा ॥ 

द्धि यहिं भद्र भवत्या पलितं मस । 


चकित्वामेष तस्याहं क्रोमि वनसंश्रयात्‌ ॥२२।॥ म करू गा ¶ २३ ॥ बाल्यस्य व कुमारावस्था 
। मे बालक्रिया, यौवन मे उरूके योग्य क्रिया तथा 
स्ये वाक्रिया पूच्व तद्वत्‌ कामारक च या । | बुदा नै बनका आशय लेना रा चाहिये ॥र्था पटली 


पवने चापि या यार्या काद्ध वचस्या ॥ २७ तीन अवस्थाश्यें चरी स्ियाय तो मे उनके अनुसार 
(च॑ मस्प््वैकेभंद्रे इतं तखव्येकेख यत्‌ | | ऊर इका 1 श्रव चौथी वस्था उपस्थित होने पर 


किचित्‌ परयामि कारण्‌॥२४| उम्बारे सेने ऋ > तोहे जारण नदी देखत *॥२९॥ 
ष = द हे सद्धं ! छत्र रोने से कया है, इससे तेर कल्याण 


मलं ते मन्युना भे नन्दभ्युदयकारि मे । न होया } भवेत वाल को देख कर रोना निस्मयोः 
शनं पतितस्यास्य मारोदीर्निष्मवोननस्‌ ॥२६९} जन है १२६॥ ` । 
सार्करडेय उत्राच साकेर्डेयजी योत्े- ६५ 

तः प्रणम्य तं भृः पौराथेव समीपगाः ` हे मह्यिं जोकि ! राज्यबद्धैनकी यह. वात 
स्ना मोचमहीपातता महे राज्यवद नम्‌ ।२७॥|| नकर पल वेड इए रजा ` लोग ` था नागरिक 

त कवि | महीष्ल से यह बोलते ॥.२७ 1 हे राजन्‌ 1 आपको 
रो नया तव प्रल्या चप चादिये कि आप अपनी खीक्ो. हमक्ते त्था न्य 
१दितन्यभिहास्पाभिरथवा सव्वेनन्तुभिः || ५ सव प्राशिर्या स्ते रोनेनट॥ २८ नाय 1: अपि 


गं तरवीषि यथा नाथ दनवासाश्चितं कचः ॐ यह कहने से कि दम वन का आश्चयं लंग 
| लोगों क {चक्य क सपने पाल्लचे क्या =9 भ्रार 


तन्ति तेन न्‌ प्रशा सालितानां च्छया सुप्‌ 1 २६। ॥ १६२२ र 1} ६६ || चाद ड्णप दन को जाते ह तो 
व्व यास्यासह ययय प यति भवान्‌ घनम्‌ ] | हमव लग कदत््ा जयथ खौर उस दश्च मे 


सपय समस्त एध्वी क निवासंयां री शेष क्रियाओं 
ऽलषक्रियाहापि चत वरीतिवासिनाय्‌ | 
तोऽशेषक्रिः निः नान्‌ ॥२० | की हानि दनी ॥ ३० ॥ हे नाय ! आपके वनवास 


विष्यति न सन्दहस्त्वाय नाथ उनाश्रये | | करने पर यद सानिनी नी धर्म से च्युत होजाय 
प च धरम्मोपधातायं यदि उत्‌ पविशुच्यताम्‌)।३ १।॥ तो ङ श्चर्यं नदीं 1३९ ॥ आपते -सात हज्ञार 


तसमुत्यं माघुए्यमालोकय नगाधिप ।३२॥ यरे उत्पन्न मदाणुर्य को अव- देखिये ॥ ३२ ॥ 
2 डे सदहाराज ! छप जो चमे नमे रहकर. तप करणे तो 
नि वसन्‌ महाराज चं करिष्यत्ति यत्‌ तपः | 


उका पुरय एएथ्नी-पालन के.पुरय रा सोलहवां 
न्मदीपात्तनस्यास्य कता नदन्ति पोडशीम्‌ 1३२११! भाय मीर दीं ई ॥ ३३॥ (1 


५ 


(व्॑सहस्राणि त्वयेयं पालिता मही | चप तक्‌ इस पृथ्वी का पालनं करियाहै ! दे राजन्‌ ! 
| 


4 
~ < माकौर्ठेय ^ 
श्र १०६ | पुराण- - --३५६ . 
~~ ----------------------~~-~~ 
राजोवाच वोले- 0 
सर्घषसदस्राणि भयेयं पातिता ही । ९ मैने सात हजार ९ इस पृथ्वीं का ४ 
¶ी तः ) अव यह समय मेरे वनवासि का श्रागथा 
स्दाने। वनवापषस्य म॒म काला्यमागतः ॥३४। ॥ २४॥ यह देखबर कि रे त्र होगे श शरीर 
ममापत्थानि जातानि दृष्ट्रा मेऽपल्यहन्ततीः त भी सन्तति दो चुकी दै, यमराज मेरा, थोडे 
-खयैरव म्‌ भी इस संसार मेरहना न ४ 
हालेभिरन्वको हि दना न सह सकगे २१॥ 
पररय महाहामरन्वका न सरिष्यति ॥२५॥ ह नागरिको ! भरे शिन य लो यह वेत वालं 
यदेतत्‌ पतितं मूर तद्विजानीत सागराः) | निकला ड इसदी प्रोगि त्रि असे जने क्त 
दूत्तभूतमनाय्यस्य पत्योरद्युप्रकम्णः ।॥२६॥ 
सोऽहं राज्ये सुतं त्वा भोगांस्त्यकत्वा वनाश्रयः। 


वत समम॥ इदा अतः 
से श्रपने युत को राज्य देकर तथो सन मोगों क्रो 
तपस्तप्स्ये समायान्ति न यावहूयमसयनिका; ॥२७॥ 
माकैरडय उवाच 


त्याग कर वन्‌ से आसा शौर जव तकक्ि यमः 
राज के सैनिक शां म वह्यं पर तपस्या कर गा॥ । 
माकीरडेयजी बोले ~ 

ततो यियायुःस बनं दवज्ञानवनीपतिः। तथ चन जने की इच्छा करके महाराज ने 
पधररार पुत्र के राज्याभिपेक के लिये व्योतिपियों से शभ 

पुतररार याभिपेकाय दिनलप्रान्यपृच्छत ॥३८॥ व 

श्रुता च ते त॒ सृपतेर्वचो व्याङलयेतसः 

दितं लग्रन्च होरा न षिदुः शासनदृएटयः ॥२६॥ 

उखं तं महीपालं दैवज्ञा वाष्पगदवदप्‌ । 

जञानानि नः भनष्टनि श्रुतवत्‌ ते वचो दप ॥४० 


व्याङ्कुल होगये कि घवरादर मे शाख की दष्टं । 
ततोऽन्यनगरेभ्यश्च भूत्यराटभ्य एव च । 


से वे दिन, लश्न, होरा दि कृ भी च वतां स्के" | 
॥ ३६ ॥ ज्योतिप्री लोग हिलकी वाध कर रोते हण 

ततस्तस्माचच नगरात्‌ ाचुस्येखाभ्युपागमन्‌ ॥४१॥ 

सथुस्पत्य महीपाले तं यियामुं शुने नम्‌ । 


राजा से वोक्े, “दे राजन्‌ ! श्रापके यह च्चन सुन 
कर हम स धि भूल गये हैः » ॥४०॥फिर मा 

प्रकभ्पिशिरसो भत्वा पोचु्द्यणएसत्तम; ।।४२॥ 

रसीद पाहि नी राजन्‌ पाक्तित्राः स्म यथा पुरा) 


राज ने दृसरे नगः च श्रधीन राज्यँ से 'ज्योति- 
पिँ को बुलवाया प्नौर घे प्रचुर सेख्या भे धराये 
1४१॥ हे मुनि } उन लोगों ने आकर जव यह सुना | 
कि राजा वन जने की श्च्छा करते है तोः उनके 
शिर हिल गये श्रीर वे शे ङ्ज राजासे घोल्ते ॥ 
हे राजन्‌ ! छुपा कर श्राप उस प्रकार स्का. कर| 
जिस यकार कि श्रापने थव तक पालन किया है \ । 
सीदिष्यत्यसिलो सोक्षस्त्वयि मुय नाश्चये ॥४२॥ र व अ व त | 
यथा न ॥ दस के | 
४ १९११ नो सीदते जगत्‌ । जगत्‌ को क्शटसदो। हे बीर! जिस थोडे काल 
यावस्जीवामहे पीर खरपकारमिमे वयम्‌ । | तक भी हम जीवित र्दे, हम दिदयासन कौ शाप, 
नेच्थामश्च भवच्छुन्यं द्रष्टं धिंहासनं विभो ॥४४॥ से खाली न दैखं देसी हमारी इच्छा है ॥४४॥ 
सार्करुडेय उच्च !| माकरुडेयजी बोरे-- कि 
म रदी सव ब्राह्यणो, नायरिकोराजार्थो 
ष्वयेवं तेस्तथान्येश्च द्विजः पारपुरःसरः । ईस भ्रक । 
सेवकं श्रौर मन्नियों श्रादि ने वार २ कदा ॥५५॥ 
भुैभृत्येरमात्यैध भोक्त भोक्तः एनः एनः ४५ ॥ वी त 
वनवासविमि््वन्यं नोपसंहरते यदा { || श्रीर उन्दने यदी उन्तर दिथा कि यमराज दमाः 
मिष्यत्यन्तको नेति द्दाति च तथोत्तरय्‌ ॥४६।|. डना नही 1 र १ 
चृ्ध नागरिको न | 
ततोऽपाया भूतया पारदास्तथा दिनाः विवार किया कि अव सया करना चाये ॥४७॥ 
समेत्य मन्येयामाघुः किमत्र क्रियतामिति ॥४७॥ दे विप्र ! उन लोगो का उस धर्मात्मा रजा 
हेषा _ मन्यतां विप्र॒ निशवयोऽयमजायत्त | । अत्यन्त अहराग था इसलिये उन्दने श्रापस ` 


, तम्सिचरारधतं भानोः क्रियतां सुसमाद्ेः ! ! पन्ने यं च आराचन कना चाद्ये 1 उस 
 सिदक्षतरं हिवं त्त्र सव्वस्ममानवराप्स्यय ; १८] छिदि चेच जापकी सद कामनः पृं नी. १ , 


३६० माकंरुडेयएुरण श्र०१०६., 


~ ~ --------~- 


गरतुरागवतां तत्र॑ महीपाततेऽततियाम्मिङ ॥४८॥ परामर्थ चवर यह निचय किया ॥ ४८॥ कि भी. 
माति ध्यानावस्थित दोक पक्ताग्र चित्त चे स्वं 


18 


सम्यगध्यानपरा भला भाययायः समाहिताः | ऋ आराधन कर 
तपसाराध्य भाखन्तमायुरस्य सरीपते ।४६। पाथना कर ॥ ४६१ इ थ्लर एक निच्चय कर 
तत्रेरनिथयाः काव्ये केचिद्ये भास्करम्‌ | इच लोग तो पते 


कन 


ऽथर १. 
द््गृ्ापच ४] ५ <~ 
अपरे मौनिनो मूला ऋग्लापेन तयाभ्यरे । | सोतन से नं डो त्ति करने मे १ 
यङ्ुपामय -साम्नाश्च तोषयान्यदरिर रविम्‌ ।\५१।॥ नाहर ल्लेग निराहार गकर श्नौर नदी ॐ क्रिकर 
अपर च निरादाय नदीएुलिनशायिनः | { एवन दक सवंदेर कमै ्ारायनाद्ध लिये तपस्या , 
तपा चक्ररायस्ा भास्करारायन द्विः ॥ करने लये शने लाग यचिद्टतर म पारङ्तयेते 
अगहेवपरयान्ये रवियत्तान्यहिशम्‌ । | सं > च जि गन जप करने लते आर | 


जषुस्तत्रापरे तस्युभाग्करं॑न्यस्च्छयः ५५२१ यये 1४२ ॥ संकी उपासना यति जि वियान 
इत्येवमतिसिव्डन्यं भप्कगारायसं पति ¦ क्री च्रादभ्य््ता थ उक्तो दी शनक . अकार से 
वहूमकारं चङ्रस्ते तं तं विधियुणथिताः ॥५४।} चर लोन ने दर्यकी छरत्वन्त श्राराधना की शथः 


4 
तया ठु यततां तयां भास्कराराधनं भ्रति | , खर्वं की आराधने यल्तवान्‌ ठन लोमोसे छदामा . 


सदसि नाम गन्धव्यं उरगम्पेदमच्रवात्‌ ॥५५।५ नाम यन्य चे च्नाकर यह चदा ॥५५॥ दे जद्यसे ! 


च द्पश्ना कट्‌ यन्त कर्ता जह्य हेये ‡नद्छस एक 
चृद्दत्र पन्न दा 1४६ इसालयं अपि लाय दाम 


य्ररधनमिष्टं यो भास्करस्य धिनातयः | चदि श्राप लो क्तो ख्यं ऋ श्राय हीं श्रमी 


तदेतद्‌ क्रियतां येन भासुः प्रीपिुपेष्यति ॥४६॥ 
तस्माद्युरुषिशात्लाख्यं वनं सिदधनिपेदित्म्‌ ! 
कामरूपे महार गम्यतां तत्र रें घ्र ॥५७} वन में जाच्ये 1५७५ वद्य पर प्क चित्त दोकर 


साकरडंय उदाच | माव्न्ट्डयया वाद- 


इति ते तद्वचः श्रता गत्वा तन्‌ काननं दिनाः ! 


ददथभांछछतस्वत्र पुरयमायतनं शुभम्‌ 1५६1५ बान जीर छम सचा नन्विर देखा १५९ दिल } ` 


1 1 ९१ 

; चहं ब्द आद दद च्या च क्तोय तयतः. ` 
ठर ते निवत्तदारा चणा वरिषादयो दिन! [ उद ° डस्‌ श्रद्‌ खव चख = ताय नयत: 

स 


धप-एष्णोपहारान्यां पनां चक्ररतदिताः ६० 


च्नौररजाकी श्ये ब्दिकः 


ते-्पते घरति अघाप्दार च उप 
सस्यग्योपवाराचंस्पहाररपूजयन्‌ 1१०} इष्यत चूल क्म पा करन लने 1४०॥ दुसरे मौन. 
जत घान्॒ करके कत, ययुर्वेद श्रौर सामवेद के , 


सय की चोर दष्ट लगाकर स्थित टो. 


ङ्प पठेत पर एसद्धा ल सत्त युन्चशात्तं चाप. 


५.1 


| 
पुष्याबुलेपनाव्रे प्रणवन्याटिक्स्तय | हे व्य्‌ 1 उन द्विजाति्या दे चिवस्व्य्‌ की पुध्य; 


[सि 1 


(: दि स्ितंच देवेशं चोतयन्तं समन्ततः 1 


हासान्न-दापय ; प्रजनं ते ममाहिताः । व शा ९ र 
एकार चित्त देकर पजा ङी छीर उनको सस्तुषट 
, इ्वन्तस्तष्टुवतरंहन्‌ विवस्वन्तं दविजातयः 1६१॥ 1६्२॥ ` 


हस 11 
देव-दानव्‌-यक्षाणां ग्रहाण ज्योतिषामपि! 


तेजसाभ्यतरिकं देवं बनाम शरणं रविम्‌ ॥ 


५५ "५५५०१ व्याप्तुचन्तं मरीचिभिः 1६३} 


अ०,१०६ ४६ माकंणएढेयपुराण ३६१ 


श्रादित्यं भास्करं भानुं सवितारं दिवाकरम्‌ । , ॥ ६३ ॥ त्था जो आदित्य, भास्कर, भानु, सविता 
पषाणमय्यमाणञ्च स्वभानुं दीघठदीधितिम्‌ ॥६४॥| चिवाकर, पूषा, अर्यमा, . स्वाद्‌, दीकषदीधिति ॥ 
चतुयुगान्तकालागनिं दुपमेक्ष्यं प्रलयान्तगम्‌ । | चलुयुंग के थन्त छौ कालाश्च,-दुर, प्रलयांतग, 
योगीश्वरमनन्तंच रक्त' पीतं सितासितम्‌ ॥६५ योगीश्वर, श्रनन्त, रक, पीत. सित, शरसित ॥६५॥, 
छपीणाममनिहोघ्रेष यह्ेवेषववस्थितम्‌ “| | ऋपियो के श्िहोत्रं शौर देवताश्नो फे यष मे 


अक्षरं परमं॑गुद्यं मोक्षद्वारमसुत्तमम्‌ ॥६६॥ । व. ध मः 
५ ुक्तरिहङ्गम ॥ ( र । हकर 
घन्दोभिरवर्पेव सदृदणुकतेर्धिहङ्मम्‌ । | उदय श्र स्व सीते भ सदेव मेर पव॑त की, 


उदयास्तमने युक्तं सदा मेरोः भदक्षिणे ॥&७॥ प्रदक्षिणा करते ह ॥ ६७॥ श्नीर जो श्रसत्य, सत्य, 
अदृरत॑च छतञ्चैव पुएयतीयं परथग्िधम्‌। | पुरयतीर्थं होकर पृथक्‌पथक्‌ विश्व मे स्थित दै 
विश्वस्थितिमचिन्तयंच भपन्नाः स्म भरमाकरमू|६८।|| उन चित्य भरमाकर सुदेव की दम शरण है ॥ 
यो व्रह्मा यो महादेषो यो विष्णुः परनापतिः । | जो बरह्मा, मदादेव, विष्णु, प्रजापति, चायु+आकाश, 
वायुराकाशमापश्च पृथिवी-गिरि- सागराः ॥६६॥| जलं है शरीर एथवी, पर्वत, सागर ॥६६॥ श्रः 
ग्रह-नकषत्र-चन्द्रा्या वानस्पत्यं ्॒ुमौपधम्‌ | || नकघ, चश्मा, आदिक तथा ननस्पति, दक, 


व्यक्तारं + ।५०॥| श्रौपधि, व्यक्त श्रौर न्यक्त प्रारिर्यो मे धम शीर 
व्यक्ताव्यक्ते भूतेषु धम्पधम्ममव्क; ॥७०॥ द्मघर्मं फे अवर्तकदँ ॥७०॥ श्रौर जो पाह्य, मादैभ्वरी 


म्ली मादैश्वरी चेव वैमएवी चेव ते तरुः । = | तथान इन तीन स्वरो स स्थित हे स 
त्रिधा भर सखरूपन्तु भानोासवान भसीदत्‌॥७१।॥ हम पर सन हो 9१ ॥ शौर जिन जगत सारम 
ग्रस्य सन्वमजस्येदमङ्कभूतं जगसभोः । सयं ॐ श्रमे यद संसार स्थितै रौर जो जगते 
स नः प्रसीदतां भास्वान्‌ जगतां यश जीवनम्‌॥७९॥| ढे जीवन ह वे सयं भगवान्‌ हम पर प्रसन्न हो ॥ 
यस्वेकमाश्वरं सूपं, प्रभामरदलदुशम्‌। | जो एक इश सूं ख्प से मभामरडल मे स्थतै 


द्वितीयमैन्दवं सौम्यं स नो भावान्‌ भरसीदतु ॥७३॥ तथा दूसरे सौम्य रूप से 1 दै 
पिः भाखान्‌ सूयं हम पर प्रस 
ताभ्याञ्च यस्य रूपाभ्यामिदं मिग मिनिम्मितम्‌ । | इन दोनों सो सेह संसार चना है देते श्निरप 


अश्रीपोममयं भास्यान्‌ स नो देवः भसीदतु ॥७४॥ शीर चमद्रमा रूप सूं म पर भसन हों ॥७६॥ 
माक॑रुडेय उवाच माकैरडेयजी योक्त ( 
इत्यं स्तुत्वा तदा भक्त्या सम्यक्‌ पूजयतां तथा । हे द्विजोत्तम ! शख पकार भक्ति पूर्वक स्येति 


तौ [चिमिमसिर्हिनोच् करने श्रीर भली भांति पूजा करने पर तीन मदीने 
तुतोष भगवान्‌ भास्वांखिमिमासेरदिजोत्तम ॥७५॥ ० 


ततः स मण्डलाद््ननिजविम्बसमभभः । भगवान्‌ ने श्रपने मणडल से निकल कर श्रपने 
न विभ्बके समान प्रत्यक्त होकर उन लोगों को श्रपना 

ग्वतीर्यं ददौ तेभ्यो दु्शो र्नं रविः ॥७६॥ हद दन विया ५७६॥ तव उन बराह न मकि 
ततस्ते स्पषटरपं तं सषितारमनं जनाः । ! से नघ्र भौर एल शरीर होकर उन स्पष्ट 
युलकोत्कम्पिनो विप्रा मक्तिनम्राः भ्रणेमिरे 1७७11 रज व सूयं २ ध ॥ ॥ ८५ 
् ~ . का फं ह सदस वाक्ते, सव के कारण 

नमो नमसतऽु सहस्रम २ ेहस््ः ` समस्त जगत की पताका, खव यक्षो के धाम 
मरोपकेतुः । पातात्‌ स्वमीख्योऽखिलयङ्ञपाम योगियो के ध्येयः स्यः मगधान्‌ ! श्राय हम प्‌ 


'ध्येयस्तथाभ्योगविदां पसीद ॥५८॥ परसन्र ह ॥ ७८ ॥ 
इति श्रोमर्करेयपुराण मे भानस्तवःनाम १०४बां अ०,०। 


~~ ~~ "~~ 


. ३६२ मकेश्देयपुराण. | श्र०११० . ` 


एकसोदसवां अध्याय 
माकरुडेय उवाच माकेरडेयजी वोले-- , क | 
तत; प्रसन्नो भगवान भाद्वराहाखिलं जनम्‌ । तव उन सय लोगों से प्रसन्न दोकर भगवानं 


-यदमिमेतं भक्तः भप्त ४ सूर्य वोते, “हे ब्राह्मसो ! वोलिये, श्राप लोग सुक 
रयता यदभिभेतं म्तः भाषतु दविजादयः ॥ १ ॥| स वया गत रने की इच्छा स्ते ह ॥ १।द 


ततस्ते प्रशिपत्योलुविष विमाद्यो जनाः। | परत ब्ाह्मणादिक लोग सर्य भगवान्‌. को शान्त, 
ससाध्वसमशीतांशुमवलोकय पुरः स्थितम्‌ । | रुप से अपने सन्मुख देखकर उन वरदायी जगदी. 
ततस्तं . .भणिषेत्योचुवेरदं जगदीश्वरम्‌ ॥ २॥| श्वर को प्रणाम कर वोज ॥ २॥ ॥ 
| प्रजा उचुः प्रजाजन बोल्े- । 

भगवन्‌ यदि नो भक्त्या भसननस्तिमिरापह । हे अन्धकारनाश॒क त {यदि श्राप हमारी. 
पला तो चं २५।२ न 
निरामयो जितारातिः सुकेशः स्थिर यौवनेः। | मांगते दँ किं राज्यवद्धंन निरामय,शनुजित, केश 


नीयतां  श्नौर स्थिर यौवन चाले होकर दस .दज्ञार.वर्षं 
दशवर्षसहघ्राणि जीवतां रा्यवद्धनः ॥ ४॥| नीर जीबित रै ॥४॥ ` क 


-  .भाकरडेय उवाच माकैरडेयजी वेल्ते-- ८ 
तथेत्युक्त्वा जनान्‌ मास्वान्‌ दुह शोऽभृन्पहाुने । हे महानि ! “पेखा दी दोगा” यद उन लोगों 
तेऽपि लब्धवरा हः रमान्ु्नेष्वरय्‌ ॥ || से कदे कर भगवान्‌ सूये अम्य होगये श्रोरं वै, 
1 इभः ४ लोग भी वर धराप्ति के कारण शआ्आनन्दित होकर 
यथात्ञ्चं , त तस्मै नरेन्राय न्यवेदयन्‌ । | राजा ॐ पास गये 1॥ हे दविज ! फिर उन लोगों 
र लब्ध्वा! ; सकाशादख्िलं ने सूयं भगवान्‌ से जिस श्रकार वर प्राप्त किया था 
भर तन्व सहसशिः सकाशादलिलं दिन ॥ ९ ॥ वह सव कथा राजा से कट सुना ॥ ६ ॥ हे दिज | 
तच्छत्वा जहूषे तस्य सा पत्नी मानिनी द्विज | | उख चृत्तान्त को सुनकर राजा की पत्नी मानिनी 
सच्‌ राजा चिरं दध्यौ नाह किंचिच्च तुं जनम्‌। । ७ ॥ कीं अत्यन्त हषं द्रा श्मौर वह्‌ राजञा किसी से 


। ६ ९ ङ्द न कहकर ध्यान करने लगा ॥७॥ हषं षे 
ततः सा मानिनी ४५ हषापूरितमानसा । ` उत्फुल्ल ह्योकर वह मानिनी राजा से बोली, “हे 


दिषव्यायुषा मदीपालवदधस्वेत्याह त पतिम्‌ ॥|*८ ॥| खामिन्‌ ! बड़े माम्य से आपकी श्राय वही है यद 
, तथा तया शरदा मत्तां मानिन्याथ सभाजितः | | नौर भी वद ॥५॥ मानिनी के भसन्न होकर इस 
नाह रिचिन्महीपालघिन्ताजदमना दविज || & ॥ भकारः कने पर भी राजा इच्छ न बोले बरन्‌ वे 

रं विन्तयानमधोलम्‌ चिन्ता ओर भी जङ्‌ होगये ॥६॥ फिर वड अपने 
सा ल" माह भत्ता पचन्तयानमधायखम्‌ । | खामी को चिन्ता से सुख नोचा किये हप देखकर 
कस्मान्न. हपमभ्येषि परमाभ्युदये द्रप ॥१०॥| बोली, “हे भगवन्‌ ! इस खुशी ॐ समय मे -भी 
दशबषेसहस्ाणि नीरुनः ` स्थिरयौवनः । हषं नीं होता” ॥१०॥ दस दजञारवपं-तक निरोग . 
भवौ लमचमसूति पिं तथापिं न हृष्यते ॥११॥ शर स्थिर थौवन रढने की खवर पर भीं श्रापको 


व हर्षं क्यो नदीं द्योता है १ ॥११॥ टे राजन्‌ ! इस 
किन्तु तत्कारणं बूहि - यच्चिन्ताकृष्टमानसः । `; श्रभ्युदय ॐ समय मे भी आपका चित्त चिन्ता से 
परसाभ्बुदयेऽपि त्व सम्भा . पृथिवीपते ॥१२॥ युक्त हा दै, इसका कारण मुमसे कद्िये ॥ ९२॥ ` 
स `. राजोवाच राजा वोल्त-- व 
थमभ्युदयो भद्रे किं समाजयसे च माम्‌ । द भद 1 यड भर्ता किख अकार इद्धः तुम 


प्राप्त + - - १. स टजां तव 
प्राप्नो दुःखस्दख्राणां त कि समाननयिष्यते ॥१३॥ व रन क त जन । 
नशवपेसहस्ाणि ` "नीविष्याम्यहमिककः --1..; | पड्गे ॥ ९२॥ प अनि स सनत 


^ 


नं 


-येमैदथं तपस्तप्तं कृशेधमनिसन्ततेः । 


. सोऽहमयममृत्याद्रिं गत्वा नियतमानसः 


इत्युक्ता सा तदा तेन तथेत्याह नराधिपम्‌ । 


अः ११० माफेण्डेयपुराण २६३ 


न स्वं तव विपत्तौ मे किंन दुःखं मदिष्यति ॥१४] 
प्रान्‌ पौनान्‌ प्रपत्र तथान्यानिषएटवान्धयान्‌। 
परश्यतो मे मृतान्‌ दुःखं किभसपं हि भविष्यति।१५॥ 
भृत्येषु चातिभक्तेष्‌ भित्रषगे तथा पते । 

भद्रे दुःखमपारं मे भविष्यति तु सन्ततम्‌ ।१६॥ 


रहेगा परन्तु तुम तो बीचमे दी भर जाश्रोसी ॥९४॥ 
पुत्र, पोत्र, प्रपीच, इमि्र.शोर वान्व को. मरते 
देखकर कया सुभक्रो कम दुःख होगा १॥ १५॥ हे 
भद्रे! अत्यन्त भक्त, सेवको ओर मित्रवर्गो के 
निरन्तर मरते रहने से सुभको अपार 'दुःत होता 
रहेगा ॥९६॥। जिन ल्लोगों ने मेरे लिये अत्यन्त छश 
होकर तपकियादहैवेतो मर जय श्रौर मै भोय 
भोगै, यदि मै पेला कर तो मुभे धिक्षार है ॥१७॥ 
हे वरारोहे 1 यह अभ्युदयः नहीं वरन्‌ आपत्ति । 
तुम इसे पेखा क्यो नदीं मानती दहो जो युभको 
समाने का प्रयत्न कर रदी दो ॥ १८॥ 
,मानिनी वोल्ी- 
हे महाराज ! जो श्राप कते ह बह सव सत्य 
है ! यद्‌ मेरा श्रौर नागरिको का दोषटहै जो कि 
हम लोभो ने पिके परेम मे श्राकर न देखा ॥१६॥ 
हे राजन्‌. ! पेसी दशा मे कया करना चचवादिये यहं 
सोचिये, जो क भगवान्‌ सूयं ने प्रसन्न होकर 
कदा है बह मिथ्या नदीं ्ो सकता ॥२०॥ 
राजा बोले- 
भरत्यो श्नीर प्रजाश्रों ने यडे मरेम.से.जो उपकार 
किया हैसो उन भोगां को म उगके मरनेपर किस 
प्रकार भोगंगा ॥२९॥ रतः मै.श्राज से.दी .पवैतपर 
जाकर नियम से निराहार रहकर, स्यंकी आरा- 
तपस्तप्स्ये निराहारो भानोराराधनोधतः ॥२२॥॥ घना मे १ क ५ ह इजार 
चप तक स्थिर यौवन दोकर जीवित रहने का घर 
दशबपदनञाणि पया स्विरयोवनः पाने के कारण म श्यदेव की रूपा से पेसी.दशामें 
तस्य॒ भसरादाह्वस्य जीविष्यामि निरामयः ॥२२॥| भौ सकुशल जीवित रहेगा ॥ २३ ॥ यदि.खव भजा 
तथा यदि प्रजाः सर्वया; भृत्यास्त्वश्च सुताश्च मे | । | सेवक, तम, पुत्र, पौत्र, भौत, इष्टमित्र २५॥ 
पुत्राः पौत्राः ` भोजा सुहुदश्च वरानने ॥२४॥॥| जीवित रद देखी रुपा भगवान्‌ सूयं करदं तो मँ 
जीभन्त्येवं भरसादं नः कयोति भगवान्‌ रविः । | सद राज्य करर भोगों का उपयोग करू गा ॥ र 
ततो "हं भविता राज्ये भ्ये भोगांस्तथा मुदा ॥२५।॥| हे मानिनी ! यदि सयेदेव पेली रूपान करेगे तो 
न चेदेवं करोतयकस्तदद्रौ तत्र मानिनि] | में उस पर्वत्तपर जीवन निराहार रहकरं तपस्या 


तपस्तप्स्ये निराहारो यावल्जीवितसंक्षयः ॥२६॥| करता रहेगा परा 
भाकरडेय उवाच मार्वरडेयजी बो्ते-- 
याजाकरे इसधकार कहनेपर मानिनीने भी "एेसादी 


यह कदा वह भी राजाके साथ तप करनेको गहै॥ 


ते मरिष्यन्त्यहं भोगी जीवामीति न धिक्‌ कथम्‌॥१७ 

सेयसपदरारोहे प्रा नाभ्युदयो सम। 

कथं वा सन्यसे न त्वं य्‌ सभानयसेऽ्च माम्‌॥१८॥ 
मानिन्युवाच 

महाराज यथात्थ त्वं तयैवं नात्र संशयः । ` 

मया पौर दोषोऽयं भीत्या नालोकितस्तव ॥१६॥ 

एवं गतेऽत्र पि काय्यं नराय षिचिन्त्यताम्‌ । 

नान्यथा भावि यत्‌ पाह परसत्नो भगवान्‌ रषि५॥२०। 

यजोवाच 
उपकारः इतः परः प्रीत्या भरत्येश्च यो मम । 
कथं भोक्ष्याम्यहं मोगान्‌ गत्वा तेषामनिष्कृतिम्‌ २१ 


जगाम तेन च समं साऽपि तं धरणीधरम्‌ ॥२७॥| े' 
स तदायतनं त्वा भार्यया सह पार्थिव हे द्विज ! उस राजाने त्री सित उस मन्दिर मे 
मानोराराधनं चक्रे शुश्रूषानिरतो द्विन ॥२८॥| जाकर सेवा बै निरल होकर सूयदेव की व 
निराहारदशः सा च यथासौ पृथिवीपतिः कि ! उस राजान विना आर ऋ छश दोकर, रौर 
तेपे तपसथेषोप्रं शीतवातातयक्षमा ॥२६॥॥ शीत, वायु नौर धूप को सहन करके उग्र श 


( तस्य पूजयतो भानं तप्यतश्च तपो महत्‌ । 

» सप्र संवत्सरे याते ततः प्रीतो दिवाकरः ॥२०॥ 
सुमस्तथत्यपौरादिःपुत्राणाश्च कृते द्विज । 

६ ददौ यथाभिलषितं षरं द्विजवरोत्तम ॥२ 

९ सष्ध्वा घरं स दरपतिः समम्येत्यात्मनः पुरम्‌ । 
चकार दितो राल्यं परजा धर्म्मेण पालयन्‌ ॥३२॥ 
ईने यज्ञान्‌ स च बहन्‌ ददौ दानान्यहर्िशम्‌ । 
मानिन्या सहितो भोगान्‌ बुध्ने चस धम्मेषित्‌ ३३॥ 
दशवषसहक्षाणि पुत्रपौत्रादि; सह । 

; भूरयः पौत्रैः सथुदितः सोऽभवत्‌ स्थिरयोवनः।॥३४॥ 
तस्येति चरितं दृष प्रमिनाम भागवः। 
विस्मयाकृषटहूदयो गाथामेतामगायत ॥३५॥| 
पानुभक्तेरदो शक्तियंद्राना राज्यवद्ध॑नः 
आयुषो बद्धनो जातः स्वजनस्य तथात्मनः ॥३६॥ 
इति ते कथितं षिपर यत्पृष्टोऽहं सया विभो । 
श्रादिदेवस्य माहातम्यमादित्यस्य विवस्वतः ॥२७।। 
विपेस्तदसखिलं भरुत्वा भानो्माहास्ययुत्तमम्‌ | 
पटं पच्यते पपिः सृप्तरत्रृतेः नरः ॥२८॥ 
श्ररोगी धनवानाल्यः इले सहति धीमताम्‌ । 
नायते च महाभाज यथैतद्धारयेदुबुधः ॥३६॥ छ डल 
मन्दाथ येऽत्रामिहता भास्वतो युनिसत्तम । 


। | देव के सव मन्व को कटा है 1 उनमें से एकं 
जापः प्रत्येकमेतेषां त्रिसन्ध्यं पातकाः ॥४०॥| एक मन्व तीनों काल मेँ पापो करा नाश करनेवाला 
सुमस्तमेतन्माहा्म्यं यत्र॒ चायतने रेः। हे ॥ ४० ॥ जिस घर भः भगवान सयं का यह .मा- 


पठ्यते ततर मगवान्‌ सान्निध्यं न वियुश्ि. ॥४१॥| भात पडा जाता द वां से.भगवान्‌ सख, अपना 


४ 4 सान्निध्य 'नीं दछ्योडते ॥ ४१ ॥ हे ब्रह्मन्‌ ! इसलिये 
तस्मारतत्‌ स्ववा जलन्‌ मानामाहत्स्यषुतसश्‌ । ` | शपि सूयं के इस उत्तम माहात्म्य को मनम धार्‌ 
धाय्यं मनसि जाप्यंच महत पुणयमभीप्सत्ता॥४२।॥| कीजिये, इससे त्रापच्रा महान्‌ पुरुय दोगा ॥ ४२॥ 


सुषणभृङ्गीमतिशोभनाङ्गी पयस्विनीं गां | दे ढस्य. ! खुब के सग वाली अत्यन्त 
। ददादियो दि । शृणोति चेन रय्दम न्मन स >) फल छतां ड बही फल तीन दिन तक शस 
नरः समं तयाः पुण्यफलं द्विजाग्रच ॥४३॥ : । मात्स्य को सुनने से दोना है ॥ ४३॥ `" 


सव सेवको, प्रजा श्नौर पुत्र पौँ के लिये जो 


यज्ञ किये श्रौर दिन रात्रि खघ्र दान दिये ! उसने 
मानिनी सित बहुत से भोगों का उपभोग किया॥ 
पु, पोच, भूत्य , रौर प्रजाश्मों सदित. वह दस 
हजार वषं के किये स्थिर यौवनवाला दोगया॥२४॥ 
इसका इस प्रकार चरिज देखकर भरगुवंशी प्रमति 
नाम विप्र ने विस्मय से श्राङ्ृष्ट चित्त होकर इस 
प्रकार गीत गाया ॥ ३५॥ श्रा ! सूर्य की भक्तिमे 
वङ्ग शक्ति है जिससे कि याजा राज्यवर्धन की उस 


के स्वजनों सहित श्रा बढगङ ॥२६॥ हे कौष्टफि ! 
, `| जो श्रापने आदिदेव सयं भगवान्‌ का मादात्म्य 
प्रधा सो मैने इस प्रकार वसन कर दिया ॥ ३७॥ 
जो मन॒प्य सूर्यैरेव के इस उत्तम मादात्स्य को 
ब्राह्मणों से खनते है वे सात रात्रि तक एेसा'करने 


इति श्रीमाकएटेयपुराण मे माञुमाहासम्य नाम ११० अ० समाप्ठ। 


वर राजानेर्यांगा था.सर्यदेवने वही प्रदान क्रिया 
॥३१ वर पाकर यजा अपने नगर में श्राया. श्रौर 
प्रसन्न होकर प्रजाका धर्मपूरवैक पालन करता इश्रा. ~ 
रास्य करने लगा ॥२२॥ उस ध्मक्च राजा ने वहुतसे. ` 


३६४ माकटेयभुराण ० १९४ 


की ॥ २६॥ इस प्रकार स्यं की पूजां श्रीर मदान्‌. 
तप करते हुए राज्ञा को पूरा एक वं व्यतीतः; टो, 
गया तव सुयेदेव प्रसन्न हुए ५३० ॥ दे द्विज धेषठ ! 


1 


पर पापों से छूट जाते है ॥ ३८॥- जो ्ञानी.लोग - ` 
^| इस माहात्म्य को धारण करगे वे नीरोगी, घन्वान्‌ 


खुन्दर शरीर ली भौर-डधारू गायके दान करने - 


श्र०१११ माकण्डेयपुराण ३९ 


, एकसीग्यारद्वो अध्याय 

“ भसकररडय उवाच माव॑ एंडेयजी च | 
एवम्पभावो भगवाननादिनिधना रविः । | हे व भगवान्‌ दय का जिन 
य॑स्य खं क्रोष्टुक भक्त्या माहात्म्यं मयि पृच्छसि १॥| का मात्स्य तुम भक्ति पूवक पचते दो प्रभाव इ 
परमात्मा स योगीनां युञ्जतां चेतसां लयम्‌ । प्रकार दै ९॥.बह्‌ योगियों के परात्मा चरीरः 
4. सांस्ययोगानां यज्ञो यञ्विनामपि ॥ २। व भोर व इ | व 
हस्याधिकार बहतो पिष्णोरीशस्य पेथसः ति 

५ परिव्ययः । वहन करतें । सावि नाम उनके पुज सव संश्य 
मन्वन्तराधिपो (4 यस्य स॒पषममन्तरम्‌ ॥ ३॥ का नाया कर सातवे मन्वन्तर के खामी मु हप 
इष्वाङ्नाभगो रिषो महाबलपराक्रमाः । | ।२॥ इवा ! नामग, रिट तथा महावली श्र 
नरिष्यन्तोऽथ नाभागः पथो धृष्ट एष च ॥ ४॥ पराक्रमी नरिष्यन्त, नाभाग, पृपन् च्ौर धष्ट॥ 9७ 
एते पुत्रा मनोस्तस्य पृथगुरा्यस्य पालकः | | साव मके यद विच्यात कीरिवाि ओर गख 
विरूयातकीतयः सर्व्व सर्व्वे शाखाक्वपारमाः ॥ ५ । | विशारद पुत्र पृथक्‌-पएथक्‌ राज्य कै पालकं हे [9] | 
पिशिष्टत्रमन्विच्छन्‌ मजः पुत्रं तथा एनः । फिर मघ ने श्रौर श्रधिक सन्तान उत्पन्न होने की । 
भित्रायरूणएयोरिटिं चकार कृतिनां घरः ॥ ६॥ इच्छां से मिजावखुण नाम शेष्ठ यज्ञ किया" ॥६॥ 
यत्र॒ चापहूते होतुरपधारान्महाणुने । | दे ्ोषटुकि सुनि ! यक्षम होम करनेके खंमय दोता 
इलां नाम घुलन्ना मनोः कन्या सुमध्यमा ॥ ७।॥| क उपचार से मजु के इला नाम की एक ' सुन्दरी. 
तां दृष्ट कन्यकां तत्र सयुतन्नां ततो मलः । कन्यां उत्पन्न हु ॥ ७ ॥ फिर मदु ने उख कन्या को 
ताव मित्रावरुणौ बाक्यश्दयुवाच द ॥ ८॥ 


उत्पन्न हुई देखकर मित्रावख्ण को सन्दु्टःकियी 


~ | श्र यह कडा ॥ ८॥ श्रापकी छपा से मेरे प्क 

भवल्मसादात्‌ तनयो विभिष मे भवेदिति । | प्रे पुत्र उतपन्न दोषे । यज्ञ के करणे पर भरे. एक 
ते ससे सत्यजा तनया र धीमतः ।। £ ॥| कन्या उतपन्न इड ॥६॥ यदि रप प्रसन्न होकर सुभे 
यदि ` भसौ, वरदौ तदियं तनयां सम । | बर देना चाहते ह तो यह कन्यादी आपके भस्ाद्‌ 
भाद्र; तो भवत्वपुणान्ितः ॥१०॥| से,अति शरी पु दाय ॥ १०॥ मिजावसय नाम 
तथेति चाभ्यञुक्ते तु देवाभ्यां सैव कन्यका । | दोनो देवताशनों के "तथास्तु" कने,पर वह कन्या 
इला समभवत्‌ सद्यः सुचम्न इति 4 ॥११॥ र पुत्र दोकर उ र ल मि ॥११॥ 
{पुनश्च यृगव्यामटता बने} |.फिर पक दफतावनम्‌ श्रा हं खय्‌, 
ुनचैशवरकोपेण ५ = , |` महादेवजी के कोप से सरीत्व को प्रास्त होगया ॥ 
क्षीतवमासादितं तेन मलुुतरेण धीमता ॥१२॥ 
+ ईन | | चन्द्रमा के पुतन बुध ने उससे पुरूरता नाम.म- 
पुरूरषसनामानं ` चक्रवर्भिनमूञ्ितम्‌ ४ | क 

„म ततं यत्र सोमसुतो धुधः ॥१२॥ यली श्रौर चक्रवती युत उत्पच्च क्षिया ॥ १२॥ 
अनयामास तनयं च युता 1“. ` ^ | क उतपन्न होजाने पर उसने श््वमेथ नाम : ८ 3 
जाते सुते पुनः दत्वा साऽश्वमेथं महाक्रम । ` | किया जिखसे खय्‌ म्न फिरसे पुरूपत्व पाकर -ग 
पुरषत्यमलुप्ाप्नः स॒च्‌म्नः, पार्थिवोऽभवत्‌ ॥१४।॥| हश्रा ॥९७॥ पुखपत्व घात होनेपर महाराज छद 
सुध.म्नस्य चयः पुत्रा उत्कलो विनयो गयः! | के उत्कल, विनय शौर गरय नामक तीन पुः व 
षते महावीस्यां यच्च ृथुौनसः ।।१५। पराकमौ, यहञ करने वति शरीर तेजस्वी हय ॥९। 


^“पुरूषतयै तु ये जातास्तस्य राहल्वयः सुताः. -. । पुरुषत्व पाने पर.जो तीन पुत्र राज्ञा उच्‌ स्न. 


३३ भङेरुडेयषुराण अ० १९२ 


4 


इष्ट उन्दने घर्मं मे चित्त को स्थित करे इख 
। पृथ्वी ऋ पालन क्या ॥९६॥ राजा के सीत्तकी 
दश्षा मे जो पुरूरवा नास पुत्र उत्यन्न हुश्रा उसको 
बुध चा पुनर द्योने के कारख राज्य का कोड भाग 
न मिल्ला ४२७ परन्दु युर दशि के कटनेसे राजाः 
उचस्न ने पर्वा च्छे प्रतिष्ठान नामक क 


बथुञस्ते सहीमेतां धम्मं नियतवेतस्ः ॥१९६ 
खीभूतस्य तु ये जातस्तस्छ सहतः एुख्य्वाः 1 
नस ल्मे महीभागं यतौ बुघसुते टि सः ॥ १७११ 
इतो वशिष्ठवचनात्‌ परतिष्ठानं पुरोचम्‌ । 
त्म दतं घ॒ रानामूद्‌ ततरातीवमनोदरे ॥१८॥ मनोडर न्नर ऋ राजा दोय र्न 


इति भरीमाक्तरठ्यपुराण मे वंशालुक्रम नाम ११शां अ० समाघ्च । 


-- स्क = 
एकसोवारह्या अध्याय 
माकररडेव उवाच ¡ मार्करुडेवजी वोक्ते- ` 
पषधराख्यो मनोः पुत्रो मृगव्यामगमद्रनम्‌ ! | सारि मु क पुज राजा पूर एक वार 


तत्र चक्रममाणाभसा विपिने निल्नने वनं} १ ॥ ग्या के लिये चस मृगये छभैरवे ५ पर धरूमवे ः 
तातसांद शरमं कञ्चिद्धायुदीधितितापितिः ! ! त हत र प्क नजन 


घत्तट्ापतरीताङ् ऽतर्देतय चंक्रमन ॥ २ । गी से दत ओकार शयरदधर वममे शमे ॥ २१ 
ष ददश तदा त होमषेनं मनेाहराम्‌। ! उनको दर से एक दोमयेल दील पदम जोकि 
त तादता च घम्द्धां बाह्चणस्यापिदयत्रिणः ॥ ३1 बस्तः एक अशरिद्टोनी अह्यर की थी ॥३॥ 
स॒ मन्यमानो गवयमिषुखा तामताइयत्‌ । राजा पथश्च ने उसक्रो नीलगाय समकर उसे 


प्क चार माया जिखके लगते दी उसकी चती 
पपात सापि तद्धाण-पिभिच्रह्दया श्वि 1 ४ 1॥| एट य ओर वह पृव्वी पर भिर पड़ी ॥४॥ दव 
ततोऽग्निहाविणः सुतरां बह्मचारी तपोरतः ! | उस अधिढोतरी क बद्मचारी छौर तर्द पु् ने 
शप्तवा्‌ स पित टरा हैमधेनं निपातितांम्‌ 1 ५। पिता दी द्योमधेख को देखकर राजा को श्वाप दिवा 

=> =! नाप उस 

गापालः यवित; एुत्रो नया नास नामतः ! ॥५॥ ट सुनि; वाभ्व्व नामं उस एव कशाय 
५ पामर्षपराथीनदित्ृत्तिस्ततो ऋका { न्तिम्ततो मुने चचराच ङः ष्लय्‌ सजार्वाथा डतन्म च्चिः चुत्ति 
कोपाम॒षपर्‌ाः ह्स्ते युन ्ोधयुक्त छोगई ओर गुस्से से उसे पीन रा 


चुकोप पिगलदखंद-नललालात्रिलेक्षणः ॥ 8 1, या तथा उसके नेञ चंचल होगये ॥६॥ राजा 
कं भेत्य स दपः पूमभ्रो इनिदारम्‌ | | शुग जसम चो धित ह्या देखकर 
म उस कहन लय, ` प्रसन्न हूजयें, अषप ग्ुद्रकी 
न्मा ऋ रुषम्‌ ४ <~ 
भ्रसीदति जमं क इए १४ ॥५७। जोध क्यो करते है £ 1 51 दिलिष्ट जद्यण 
न क्षत्रियं न वा बड्वमेवं ऋय उपेति षे] 
युधा चं शद्रवन्नातो विशिष्टे नलणः इल ॥ ८ ॥ ऋच तो क्ञ्िय श्र वैश्य 
चाकदट्डय उद्व ¢ मच्र्ड्च्जा चोत्े-- 


ति निभत्सितस्तेन घ राज्ञ मौलिनः सुतः ¦ ¦ जव रजाने मोलि युज बाध्य ऋी इस तरद 
‹ भत्सेनएकी तो उन्डोने राजासे ऊह्य, “हे दुरात्मन्‌ ! 
शशाप तं दुरात्मानं शद्र॒एव भविष्यति 1६ ए; त शद दी दोगा" ॥ ६॥ चक्ति तुमने मेरे यरु की 


यास्यति क्षयं ब्रह्म वत्‌ तेऽ्धातं मुरयुखाद्‌ । ¦ दोमचेच को मारा है इसलिये चो द्ध वेद-वाक्य 
मवेनुमम गुरोयदियं ईसि त्ववा 1१०४. लमने अपने युदसे पड़ ह बे ठुम खव भूल जाशनोगेशव 


मी नदीं करते } = ॥ 


| उन्दर ननर दे छया अओौर बह उसी अत्यन्त _ 


[ परन्तु उनको ऋोड मिला जौरवे चवं की ` 


ल में उत्पन्न द्येकर भी आप श्रवत्‌ दोगये.रेखा ` 


~ श 


~~~ 


न 


` श्रन्नानतः रते दण्डं पातयन्ति बुधा यदि । ॥ १८ ॥ यदि क्षानी लोग श्क्षान से क्यं हय कायं 


० १२ भाकंर्डेयघुराण ३६७ 
<~ 
एवं शप्तो छरपः रतद्धस्तच्छापपरिपीडितः । इस प्रकार शाप दिये जाने पर राजा को दुञ्श्नौर 


परतिशाप्परो पिपर तोयं जग्राह पाणिना ॥११॥ व व क ध ह 


सोऽपि राज्ञो विनाशाय कोपं चके दविजेत्तमः। , ५ व ने भी राजा के नष्ट कगनेके कतय को 
तमभ्येत्य तवराुक्तो धारयामास वै पिता ॥१२॥ छ भ 


{८ कत्सालमलमत्य्थं॑कोपेनायतिवैरिणा । `| कदय कि हे पुज । व्यथै इतना ` कोध मतकरो, 


क्रोध 
पेहिकायुष्मिकहितः शम एव द्विजन्मनाम्‌ ॥१३॥ ने क 1 


फोपस्तपो नाशयति क्रुद्धौ भ्रश्यत्यथायुषः। | कोप तप को नष्ट करता दै । क्रोभी का जान तथा 


रुद्धस्य गलते ज्ञानं क्रदधधारथाच रीयते ॥१४ धन नाश य १ ॥९७॥ त का 

४ र नोति । रहता ओर न उसको धन दी पिल्लता ६ 
न ध्मः क्रोधशीलस्य ना्श्ामोति रोषणः । | अभिलाषा पू होने पर भी क्रोधियों को खल नहीं 
नातं खाय कामाप्तिः केपेनाधिटवेतसाम्‌॥॥१५।॥| मिलता है ॥ १५॥ यदि राजञा ने श्रनजान मँ इस 


यदि राजा हता धुरं विह्नना सता | _ | गय श मार दिया १ का 
+ ५ ष्वार इन परः दया केरना चाद्ये ॥ शद 
युक्तमत्र दयां कमात्मनो हितवोधिना ॥१ ५ अत्‌ जव इनन मिना जे मूलसे भीरो गाय | 


भ्रयवाभ्ननता धसुरियं व्यापादिता, प्रम । । मार दिया हतो यद शाप के योग्य किंस प्रकार दै । 
तत्‌ कथं शापयेम्योऽयं दुष्टं नास्य मनौ यतः १७} कारण इनका मन शुद्ध है ॥ १७॥ वे मदष्य दखरे ¦ 


त „_,, | दै जो श्रपनी मलाई ॐ क्लिये दूसरे को दुःख देते 
आत्मनो हितमन्विचछन्‌ बाधते पोऽपरं नरः । | ह जो लोग करतवय का कान न होने परं रात्‌ | 


चन्या मदविश्चाने दया तत्र दयाल्भिः ॥१८॥ भूल से श्रपराध करते दै वे केवल.दया के पामर ह 


ुधेभ्यस्तमहं 4 को दरिडित करं तो उन क्ञानियो से म अक्ञानी 
ुपेभ्यस्तमहं मन्ये बरम्ञानिनो नराः ॥१६॥| लोगो को.अधिक अन्वा समसत ह ॥ ६६। 
४04 देयः पार्थिवस्यास्य पुत्रक | | पु 1 तुम्दे जाको शाप नदीं देना चाहिये कार , 
सकस्पैणेव पतिता गौरेषा दुःखमृतयुना ।२०॥| इ भौने अपनी आयु सर्मा करके तयु पार ६॥ | 
माक्ररडय उवाच मारककरडेयजी वोले-- क 


॥ 
प्षधोऽपि शनेः पुत्रं परणम्यालम्रकन्धरः | इसके वाद पूषध ने भणाम कर सुनिङ्धमार से ¦" 
कदा, “राप प्रसन्न हो" मैने भ्क्ञान मे .इसं गय 


स जगाद 
भसीदेति रङञानादधातितेति च ॥२१॥| को शारा ह» ॥१॥ हे सुनि ! मैने विना जाने 'श्ूः 
मया गबयबुद्धधा गौरवध्या घातिता छने ! | या गायको नीलगाय सममकर मार दे । देसि] 


अङ्नानादधोमपेदुस्ते परसीद सश्च नो शुने ॥२२९॥ आप सुपर्‌ छपा करे ॥ २२॥ 


ऋषिपुत्र उवाच ऋषिगुप्र वो्े-- ष 
हे राजन्‌ ! मेने आजन्म कमी मिथ्या नदीं बोला 


व्याहतं मृषा । < 
आ जन्मनो महीपाल न मया व्याहृतं भ ञ्चतः हे महाभाग | मेरा कोच भूढान होगा ॥ २३॥ 


त भ षा | श्रत: अनव सै इस शाप को श्रन्यथा नदीं करसकती 
तत्नाहमेनं शक्नोमि शापं कत्तु वरपान्यथा । परस्तु दूखरा शाप जो कि प देने को उत था अव 
य॒ते सघ शापो द्वितीयः स॒ निवर्भितः ॥२४॥| न गा ॥ २४ ॥ इस प्रकार कटते ` हण उस सुनि 
्ुक्तवन्तं तं बालमादाय स पिता ततः । | मार को उसके पिता आशचममे.लेगये भरर 
लगाम स्वाश्रमं साऽपि पूषधः शुदरतामगा्‌ 1२४ पृषध्र भी शापवश श्र गये ॥ रशा "^ 
“ „ हि श्रीमारकरुडेयपुराणमे पूष. उपाख्यानं कथन नामे ११२ अध्यायस्य > 


३६2 माकंरङ्यषुसर अ० ११३ ` 


एकसोतेरहवां अध्याय र 


कारूषाः प्त्रियाः शमय: ङस्वस्वाभन्‌ सुताः 1 | करूप क पुज सातन्तौ कार्य द्नरिय हु, उन 


१ के्प्के शु त र 
ते ठ प्रशत वौरास्तभ्यन्ये सहत्तरः ॥ १।४ सतस शीतं ठे इद्वा कतरि उत्प दुप॥ ९1 
दिएतरस्त नामानः स्कः परयमयंत्नं 1 दि के पुज नाभाग ने अगते ययम यौवन में एकं 
ददतं वैर्वतनथामदीव उमनोहयास्‌ ॥ २ ४, अत्वन्त न्दर वैव कन्या को देगा 1२ ॥ उक्र 
तस्यां चर एमाय सदनाक्षिप्रमानसः } | देखते दी राज्छ्खमार काम क वश्च में द्येकर इउरडी 


चभूद भृएवनया निर्वाद्ात्रषत्यरः ॥२३॥ 
तस्या स्र गता नक्‌ वने ता वरृयक्तन्यकेनम्‌ | कन्या ओर को 
तठाऽ्ज्ञपरायान-पनाद्त्ति दषात्सनप्र्‌ ॥ 1४ ॥ (17118, यैश्च नं रलयार ङो चामार । देखकर 
तच्छा स पिता तस्या राजपुत्रं कताञ्चतिः ¦ 
` चिभ्यव्‌ ठस्य पितुिम परधयावनतं वचः ॥ ४1] चह का ॥ ४ ॥ आप सला हं तथा दम श्राप 
 : वन्ता भूना मत्या चय वः रदायक्राः ! | सेवक छीर ऋर देने बले ह ! हम जोर अगि 
: क्यं. सम्बन्यमभेरस्मामिरमिवाज्यसि ॥ ९॥ च्रसमान ह, दमा पका सम्बन्ध कैसा 1 ६ 
॥ व राजत ऋले- 
: दास्यं मादुषठेदस्य काममोद्यदिभिः छतम्‌. ! | सखव नदुप्यों के देह मे म जोर मोद समान 
प = छ्यते मातुष षपुः है 1 समय पाकर काम सभी के शर म अवल 
¢ त्तपि {समास यु ¬ ट । ५9 
। ताप काल तरव च॑ ध ८०५ देत द? ७॥ ची प्रकार काल पातर ऋ रादि 
\ तयेव चापक्नाराच जायन्ते तस्य तान्यपि । मरष्यो के यर का उपकार चरते हे छर अलग 
` अन्यानि चान्ये जीवन्ति भिनच्ननातिमवां घतामर्‌।+८॥| चरकषय जाणत न्‌ णक गररर काम दूखरे शरीरं 
! तथान्यान्य्वयोग्यानि येन्वठां यान्ति कालतः से याह्रदोता दहे! = इसी भकार काल पाकर 
१ ध त ध्यव पव, 1 च्योम्य मदुष्व योग्य अय्य दयोजतिहे 1 वस्तुतः 
या्वान्प्यार्यता यान्त कसवन्या हि या््यत्नाी&| योग्यता ्नलकेव्शयेहे < जे श्तरीरकि 
, आप्वाय्यदे यनच्छरीरमादारादिभिसीप्सितेः ! | इच्ित आदार आदि से दस क्रिया जाताहं समय 
४ 1 
| 


181} उनसे छाय जोड़ कर तथा राजा के इर स 


{क 


दने त्यय 


1 


॥ (स दादा त्या शुक्त तञ्व्‌ परिकिष्यते || १ © ॥ पाकर चह ह क जात द्रा आच्या जातद 
४ < छतः समय द्ाचतदानदं २०} मयमत इस 


तवचा द {यतां (स्या) ॐ र 


ध्र 
^ श्रन्वया मच्छमीरस्य वियत्ति्यलक्ष्यते ११ 1 मेरे श्वयैर क्तो भास ्रापत्ति की आशज्च है 1६१॥ 
|] चेड्य उचाच २ | कष्य वोल्ल- । त व 
९ प्रतन्न्रा वयं तच्च परतन्त्रो मदीश्वुनः | ! . आप ओौर इन राज्य के चमे दै यदि प 
3 ¦ के पिता जज्ञ देतो मे अपनी चन्या अपकरो 
पित्रा वेनाभ्यलङगास्तं यहाण्द्दाम्बहम्‌ ॥१२५ इ कन ॥ २२॥ 
| सल्पयु उवाच । राजपुत्र वोले-- 7 
३ भष्न्याः सर्ववकार्वयष मुरो युवभिः | समसन कायौ भ यख्जनों से पूष्ना चादिये 

प केः = ज 9 
र परन्तु इस तरह के कार्यो को बलं तक पर्हुवाना 
त्वीद्मेष्वर्र्व्यषु गड्णां बाक्यनोचरः न 5 >, >~ 

र श्यां वाकयनोचः १९३ | ॐ न्दी ॥ २३१ जद लो ऋामदेव की कथावाौ 
“* नन्मयकथालतापे -गुरूरं अवयं कवम्‌ ¡ .. चौर व १ "यद्‌ 
2" ` ' दोनो परस्पर दिसो द. चरतः मवुष्यों को चादिये 


अ०.११३ `" ४७ माकैर्डेयपुराण ३६६ 


=> ~ 


विरुद्धमेतदन्यत्न भषट्यां गुखो यृभिः ॥१४॥ कि दूसरे मामलों मे गुख्जनोँ से पूं ॥ १४॥ 
| वैश्य उवाच वेश्य धोला-- 
एवमेतत्‌ स्मरालापस्तवायं पृच्छतो शुष्‌ । दे राजङमार) आपके लियेतो ये वात पिताजी 
से पूना कामालाप होगा परन्तु मेले तो पेसी 
अहं पृच्छामि नालापो सम कामकयाश्रयः ।१५॥ इच बात नही दै, मै पृहंगा ॥ १५॥ 
साकंर्डेय उचाच माकंरडेयजी वोले- 
इत्युक्तः सोऽभवन्मौनो राजपुत्रः स चापि तत्‌। उसके यद्‌ कढने पर राजकुमार मौन दोगये 


६ र फिर वेश्य ने राजकुमार का मत पिता दे 
तकतित्रे सच्ंमाचषट राजपुत्रस्य यन्मतम्‌ ॥१६॥ भरकर किया॥ श्दै॥ फिरराजा दिष्ट ने तीर 


ततस्तस्य पिता षिप्रानृचीकादीन्‌ द्विजोत्तमान्‌ । | रादि उत्तम ब्राह्मणों को दुला कर राजङ्कमार की 


। उपस्थिति भ॑ खव वृत्तान्त उनसे क सुनाया ॥ 
भवेश्य राजपूत्रञ्च यथाख्यातं न्यवेदयत्‌ ॥१७॥ इख प्रकार निवेदन कर उसने मुनियां से कडा कि 


निवेद्य च तत्तः प्राह भुनीनेवं व्यवस्थिनः। | इस प्रकार की व्यवस्था है, अव याप जो श्रदेश 
यत्‌ कनतव्यं तदादेष्टुमरन्ति द्विजसत्तमाः ॥१८॥| दे' बह मै करू ॥१८॥ 

षय उचुः ऋषि वोक्ञे-  _ | 
राजपुत्रानुरागस्ते यद्यस्यां वैश्यसन्ततौ । हे राजङ्मार यदि तुम्दयस अरञुराग इस वैश्य 


की कन्या दी से दै तो यद धमे$े ्युरूपं है परभ्तु 
तदस्तु धम्म एवैष किन्तु न्यायक्रमेण सः ॥१६।॥| यद ोनाचादिये च्यायके क्रमसे॥१६॥पदिले आपका 


हधाभिषिक्तनया-पाएि्ाह विवाद त्य की कन्या के साथ दोना चादिये। 
मू पाण भेत्‌ एय । उसके वाद्‌ थह तरैश्य कल्या पकी खी दोसकती, 


भववनन्तरञ्पेयं तव भार्यां भविष्यति ॥२०॥| हे ॥२०॥ इस भकार इसमे दोष न दोगा श्रौर राप 
श । इस प्रेर्य कन्या से भोग भी कर सरकगे ! न्यायकर। 
एवं न दोषो भवति तथेमामुपशचजतः । विरुद कम करने से दोष दोगा, करोमि आपकी 
अन्यथाऽभ्येतिते नातिरुकछृष् बालिकां ह२म्‌॥२१।॥ जाति उच्छ है शौर यद कन्या निम्न वणं को है॥ 
। माक॑रुडय उवाच माकैरडेयजी योक्त 
इत्युक्तस्तदपास्येव वचस्तेषां महात्मनाम्‌ । 


दम प्रफार कहे. जाने पर भी उस राजङुमारने 

महात्मानो की वातो पर कच ध्यान न दिया रोर, 

विनिष्क्रम्य शृहीत्वा तामु्ताभिर्थाव्रवीत्‌ 1 २२। वार निकल कर दस कन्या को पकड़ लिया, 
प्रीर हाथ मे तलवार ल्ेकर चोला ॥२२॥ मैने इस ' 


राक्षसेन भिवाहैन मया वैश्यसुता हृता । | कन्या को हरण करे राक्तस विधि से इसके खाः 


यरय सामर््यमत्रास्ति स एतां मोचयलितति॥२३॥| विवाह किया है जिसकी सामथ्यं दो बद इसे ` 
¦ च दैशयसतांद्ाशृदीता तनयां दर कर बुव ॥ २३ ॥ दे करोषटकिजी ! उस कन्या २ 
ततः स वैश्यस्ां दष्टा शृदीतां तनयां दतम्‌ । इखं प्रकार रण किये जनेपर उसका पिता = .~ 
्राहीति पितरं तस्य प्रययौ शरणं हिज ॥२४।५ जादि व स की 6 ५4 
. ॥२७॥ तव उसके पिता दिष्ट ने क्रु होकर पक 

ततस्तस्य पिता कुद आदिदेश लं महत्‌ । हान्‌ सेना को च्यक्ञादी करि धर्मदोपी दुष्ट + ।५ 


हन्यतां हन्यतां ष्टो नामागो धभयदूषकः ॥२५॥ को भारो ॥२५॥ चव वह सेना राजकुमार के - 
ततस्तदयुयुषे सैन्यं तेन भृृत्ुतेन घ॒ | | युद्ध करने लगी शौर .राजङमार ने श्चएने शख से 


कृतास््रेण तदास््रेण तत्‌ प्राच येण पातितम्‌॥२६॥ उस स्व सेनाको काट डाला ॥ २६॥ 3 
न राजपुत्रेण 4 ऊ हार्थो सवं खेना कानाश हुन. नकर स्वयं 
< ल महाराज श्रपनी सेना लेकर उंससे युद्ध करने कोः 


स्वयमेव ययौ योदुं स्वसेन्यपरिषारितः ॥२७॥ गये ॥२9॥ इसके वाद्‌ राजा का पुत्र के साथ. ५ 
ततोः युद्धमभूत्‌ तस्य भून स्वसुतेन यत्‌ । , ' इश्ा नौर उस युद्ध मे सजक्मार ने अपने शख 
॥२ 


| ३७० 


माकंरख्यषुराण 


भ०. ११४ 


` तजयुप्रेण शचखातैस्तत्रापिशयितः पिता ॥२८ ॥ 


तोऽन्तरीक्ादागत्य परि्राद्‌ सहसा शनिः । 
पत्युवाच महीपालं विरमस्ेति संयुगात्‌ ॥२६॥ 
लत्ुत्रस्य महाभाग विधभ्मोऽयं महात्मनः ! 
तवापि वैश्येन सह न युद्ध ध्म्मबनुप ॥२०॥ 
बरह्मणो बाह्मणीपव्वं व्येन दारपरिग्रहम्‌ । 
बरह्यस्यात्‌ सर्ववर्णेषु न हानिषुपगच्छति।॥३१॥ 
थैव प्षव्रियमुतां कषत्रियः पूव्वयुद्हन्‌ । 

इतरे च ततो राजंश्वयवन्ते न स्वधम्मंतः ॥३२॥ 
एत्वं वैश्यस्तथा वेश्यां पात्‌ शृदरहलोद्रवाम्‌ । 

त हीयते वेश्यङलादयं न्यायः क्रमेदितः ॥२३॥ 
ब्राह्मणाः कषत्रिया वेश्याः सवर्णापाणिसंगरहम्‌ । 
श्कृत्वाऽन्यतरापाणेः पतन्ति दप संग्रदाद्‌ ॥२४॥ 


यस्या यस्या हि दीनायाः इर्ते पाणिसंग्रहम्‌ । 

अकृता बणसंयोगं नापि तद्रस्तुभाग्भवेत्‌ ॥३५॥ 
सोऽयं वैश्यत्वमापन्नस्तव पुत्रः घ मन्दधीः! 
नास्याधिकारो युद्धाय क्षत्रियेण त्वया सह ॥३ 


वयमेतन्न जानीमः कारणं दरपनम्दन | 
यथा भविष्यतीदंञ्च निवर्त रणकम्पतः 


अलो से पिता को वहतं पीडित किया ॥२८॥. 
इसके अनन्तर परिव्राट्‌ नाम मुनि सहसरा आकाश 
भागं से आक्र महाराज दिये बोले कि श्राप 
युद्ध न करं ॥ २६ ॥ हे राजन्‌ ! आ्रापक्ा पुत्र धर्मस 
च्युत होकर वैश्य होगया है श्रौर वैश्य के -साथः 


आपका युद्ध करना उचित नदीं ॥ ३०॥ पक ब्राह्मण्‌ 


बाह्मणी के साथ परिग्रहण करने के पश्चात्‌ अन्य 
वणौ की च्ियों के साथ विवाह कर सकता है, 
पेखा करने मे उसको कोई दोष नदीं लगता है ॥ 
इसी भकार क्षिय पृदिले स्क्जिय कन्या से विवाहः 
करे फिर इतर बणे अथात्‌ वैश्य रौर शुद्र की 
कन्या के साथ चिवाह कर सकता है ॥ ३२॥ इसी 
पकार यदि ब्य वैश्य की कन्या से विवाह करने 
चैः वाद शुद्र की कन्या के खाथ विवाह करते तो 
वेश्य कुल से हीन नदीं होता है ! यह मैने क्रमसे 
न्यायकमं कटा ॥३२॥ हे राजन्‌ ] जो ब्राह्यण्तचिय ` 
या य ध ध कपे कन्या से विवादं 
करने के पूवं दुसरे वणं कीः कन्याय से विवाद 
कर ता है वह पतित होजाता है ॥ ३४॥ अथात्‌ 
जो व्यक्ति पष्िले पने वणँ की कन्या से तिरा 
न करके हीन वर की. कन्या से विवाह कर लेताहै 
उसकी जाति पतित होकर उसी दीन-वणँ कन्या 
की जाति हो जाती है ॥२४॥ श्रापका यह बुद्धिदीन 
पुज वेश्यत््र को पराप होगया है । आप चत्रिय दै, 
आपके साथ दस वैश्य को युद्ध करनेका श्रधिकार 
नहीं है ॥३६॥ हे चपनन्दन ! हम इसका कारणनदीं 
जानते है किं यह किख प्रकार हश्रा, . परन्तु रपु. 
इसके साथ युद्ध क्म से निचृत्त हो पेसा हमारा 


1२७ अदेश दै ॥ ३७॥ 


इति श्रीमाकंरुडेयपुराण मे नाभागचरित (९) नाम ११२बं अध्याय समप्त। ` 
-प>-म>८<, ६६ -- 


एकसोचोदहषां अध्याय 


माकडेय उवाच 
निदृत्तोऽसौ ततो मृषः संग्रामात्‌ खरुतेन वे । 


उपयेमे च तां वेश्य-तनयां सोऽपि तत्सुतः 
ततः स वैश्यतां भप्त सयुतपत्याह पार्थिवम्‌ । 


साकंर्डेयजी वे्े- ५ ५. + 
तव परि्ार्‌ सुनि के कटने पर राजा दिष्टने 
अपने पु्रसे युद्धं करना छोड़ दिया श्रौर उस पुत्र 


॥ १॥ ने भी फिर वैश्य कन्या के साथ विवाद .कर लिया 


॥ १॥ किर वह पुत्र वैश्यता को भ्रात दोकर राज़ 
के पास आया ओर कहने लगा, “हे राजन्‌ ! अव 


(व ~. ओ 
भूपाल यन्संया काय तत्‌ समादिश्यतां मम्‌ ॥ २॥| जो कुच सु कतैव्य है वह वताय" ॥ रा 


ध , राजोवाच 
. ,५%९.. युक्ता वाभ्रव्याद्यास्तपस्िनः । 


~~ ~ “~ ~~ -* -~ ~~, 


राजा बोते- ~ 
चाभ्रव्य आदि तपसी लोग धमाधिकर् के 


माकर्टेयषुराण ३७१ ` 


ऋ क्षाता टै, उन्दी के दाया तुमको अपना धर्मया 
यदस्थ कम्म पर्म्माय तद्वदन्त॒ 1 

यद्‌ व तद्वदन्तु तथा चर ॥ र कतेज्य मालूम होगा, जैसा चे कटे कसे ॥ ३॥ 

डेय उवाच 


माकरडेयजी वोले- 
ततस्ते भुनयस्तस्य पाशुपास्यं तथा पिम्‌ । ध ध ५4 ५ को गोपालन, पि 
च. ॥ श्ओीर वाशिज्य श्रादि जोकि वैश्योचित परम प्त 
बाणिब्यंच प्रं व समाद; ॥४॥| सो वा 
- तथा च चक्रे स॒ सुतस्तस्य रा यथादितम्‌ | धमं से च्युत दोकर राजा की आ्ञाञुसार उन 
ममबादिभिधमं ९6 ९ ( ४ धमे द्वारा श्चपने धर्म-कर्म को पू कर उसी मे 
तम्मा च्युतस्य ‡ ॥ ५ ॥| ्ङुसार्‌ आचरण करने लगा ॥५॥ नाभाग 
तस्य पुत्रस्ततो जात नाम्ना स्याता मनन्दनः । | के उस वैश्य श पु उत्पश्च डा त 
धौ फा नाम भनन्दन प्रसिद्ध हु । भमन्दन के पू 
स मात्रा प्रदितोऽगच्छद्वोपालतो भव पुत्रक ॥ ६॥ ष उसकी माता ने उससे गोपालन का कार्यं करने 
मात्रा तथा निषुक्तोऽथ मरणिपत्य खमातरम्‌ । कटा ॥ ६॥ माता से शस प्रकार श्राज्ञा पाकर 
। ॥ ` | उसने श्रपनी माता को प्रशाम किया श्रौर किर 
रानर्पिमगमननीपं 
तं समेत्य च जग्राह तस्य पादौ यथाविधि । 
प्रणिपत्याह चैवे नं राजर्पि' स॒ भनन्दनः ॥ ८॥ 
गस ॐ श्रादेश किया है कि मै गोपालन कर, परन्तु घुम; 
भ्रादिष्टो भगवन्‌ मातरा गोषालस्त्व भवेति । | ठो पृथ्वी छा पालन करना चादि, श इनका 
मया च प्रलनीया क्ष्मा तस्याः स्वीकरणं कथम्‌ ६।॥ कथन किख अकार मानु ॥६॥ भुम उन गीश्रौं काः 


अ०.११४ 


हः 


उनके पास जाकर उसने विधि पूर्वक उनके चरण 
पकड़ लिये श्रौर फिर वह भनन्दन उनको प्रणाम । 
कर योला ॥ ८॥ दे भगचन्‌ | मेरी माता ने सुभको 


दिमवतपन्वंताभयम्‌ ॥७॥| हिमालय पव॑त पर स्थित राजपिं ॐ परास गया ॥, 
मया हि गौः पालनीया सा यदा सवीता भवेद्‌ । | पान ची करना चादिये जिनकी कि सुभको 


शाक्रान्ता वलपद्धिः सा दायादैः पृथिवी मम्‌॥१०॥| भी 


तां यथा प्राभ्यां पृथवीं त्वत्मसादादहं विभो । 


श्राक्ता मिली है, तथा सुभे उस पृथ्वी रूपी गौ को 
पालना चादिये जिसको कि भेरे भाद्योने छीन 
लिया है ॥ ९०] ह भ्रमो ! मै आपको प्रणाम करता 
हं । श्रापकी पा से उस पृथ्वी को मँ फिर भाः 


तथादिश करिष्यामि तवाननं भरणतोऽस्मि ते ।॥११॥ कर पेखा रदिश कीजिये ॥ ११॥ ॥ 


। माकेए्डेय उवाच 
ततः समीपा रानर्षिस्तस्मे निरवशेषतः । 


माकरडेयजी वोल्े- 0 
हे ब्रह्मन्‌ | फिर सजर्पिं ने निमेष रूपसे संपूण 
शख विद्या भनन्दन को सिखलादी ॥४२॥ हे द्विज! 


वसुरातादिकान्‌ पुत्रानादिष्टः स महात्मना ॥१३। भादयो के पास गया ॥१३॥ फिर उसमे अपने चाप 
श्रयाचत स राज्याद्धं पिवृपैतामहोचितम्‌ | 
त चोनचुरश्यपुत्रस्त्वं कथं भोक्ष्यसि मेदिनीय्‌।।१४। 
ततस्ै्ुदमभवद्रनन्दस्यात्मवंशनेः । 


५५ 


.; ३७२ 


माकीर्डेयपुराण 


अ०.१९४ .. 


` प्रवेदयामासि ततस्तलिता जगहे न च। 


परन्तु उसके पिता नाभाग ने उसे ज्नीकार नदीं. 


त्युवाच च तं पुँ भार्याया; पुरतस्तदा ॥१७।॥॥| करिया ओर वे अपनी खीके सामने पुत्र से कहनेलगे॥ 


नाचाग उवाच 
}नन्द्‌ राज्यमेतत्‌ तै क्रियतां पल्वे; छतम्‌ । 


श्यतान्तु पुरस्छृत्य तथबाज्ञाकरः पितुः 


नामाय वोले- | 
हे सनन्दन ! पूवज का यह रज्य तुम्हारी 


39 ^ 


प्रहन्‌ कृतान्‌ राज्य नासामथ्ययुतः पुस || १८॥ | मने पादह कभी रस्य नीं क्या, मतः | ९ 


इसका सामथ्यं नदरा रखता ह ॥६८ ॥ वेश्य कन्या 
के साथ विवाह करने ङे कारस्‌ ते पितकरी श्राक्षा- 


हत्वाऽपरीतिं प्तुरहं वेश्यकन्यापरिहाव्‌ १६।॥ चख व्यता को पा दोगया ह ॥९९॥ जव तक, 


१ पृण्यलोकभाग्राजा यावदाहतसंषुवः 
गछङ्यज्ञां पुनस्तस्य पालयामि महीं यदि । 
नास्ति मोक्षस्ततो मूलं भम कदाशतेरपि ॥२१ 
परचापि युक्त तदवाहु-निञ्जितं मस मानिनः | 
एल्यं मोक्तमनीहस्य दुव्वलस्येह कस्यचित्‌ ॥२२॥ 
ज्यं कुर्‌ स्पयं यावदायादेभ्ये वियुश्च वा | 
प्माज्ञापालनं शस्तं पितुनं क्षितिपालनम्‌ ॥२२॥ 
माकरुडेय उदाच 
ततः अहस्य तद्राय्यां दुप्रमा नाम भाविनी । 
पत्युवाच पतिं भूप ग्रहतां रान्यमूर्जितम्‌ ॥ 
न तवं वैश्यो न चैवाहं जाता वैश्यङकले टप । 
त्रि यस्त्वं तथबाहं क्षत्रियाणां इलोद्धवा ॥२५॥ 
[व्वमासीन्महीपालः सुदेव इति विभ्रतः 
परस्यामच्च सखा राज्ञो धम्राश्चस्य सुतो नलः॥२६॥ 
प्र तेन सख्या सहितो जगामाम्रदणं वनम्‌ | 
पत्नीभिः स समं रन्तुं माथवं मासि पार्थिष॥२७॥ 
तेतः पानान्यनेकानि भक्ष्याणि वरुन तथा । 
माय्याभिः सहितस्तारभिस्तेन सख्या समन्वितः२८ 
ततः पुष्करिणीतीरे ददर्शातिमनोरमाम्‌ । 
पत्ना च्यवनपुत्रस्य परमतः पार्थिवात्मजाम्‌ ५२६. 
पखां तस्य नलो मत्ता जग्रह ताञ्च दम्मति! । 
-पश्यतस्तस्य राज्ञ त्रात त्रतिपिवादिनीम्‌ ॥३०॥ 
-आक्रन्दित्तं निशुम्येवे स तस्याः प्रमतिः पतिः 
` प्राजगाम त्वरायुक्तः किमेतदिति वे वदन्‌ ॥३१॥ 
ततो ददशं राजानं सदेवं तत्र संप्थितम्‌ । 


२०] करि वे सुखकर न बुला ओर सुपर असन्न हो 


तव चेक मुभे परयलोक नदीं मिन्ञेगां ॥ २० ॥ उन" 
की आन्ञा क्रा उरलंघन कर यदि मेँ पृथ्वीका पालनं 

करूयातो मेरी सी कल्पतक भी कमी मोक्तन 
होगी ॥ २९॥ तंम्हास जीता इुश्रा राज्य मुभको 
न भोगना चाये । में दुवेल होने के कारण राज्य, 
के भोगने की सामथ्यं मी नदीं रखता ह ॥२२॥ . 
तुम चदि स्वयं राञ्य करो श्रथवा शपने भाइयों 
कोदेदो,मै ते पिता. की आक्षा पालन करता 
हश्ना सज्य नदीं कर्गा ॥ २३॥ 
माकंरडेयजी बोले-- , 

तव खुपभा नाम उखकी खरी दंस करः पने 

पति से वोली, “हे राजम्‌ } जीते इए राज्य फो 
श्राप ग्रहण कर” ॥ २ ॥ हे सद्याराज } न तो शाप `; 
वै्य है छरौर न यैं टी वैश्यङ्कन मे उत्पन्न हई ह । | 
श्राप च्षत्रिय है श्रीरै भी क्षिय कुलोत्पन्न ह ॥ 
पूर्वं काल मे खुदैघ नाम क पक राजो हु जिखः 
का मित्र राजा धूथ्ाश्व का पुत्र नलथा॥२६॥ हे. 
राजम्‌ ! सन्त तु मे पक दिन ते राजा अपने 
भि्नोँकेसाथञ्मामङे वन मे चि्योँ के साथ. 
क्रीड़ा करने को गये ॥२७॥ ब्य उन्दने उन खिर्यो 


ओर अपने मित्र के साथ मोजन शौर मद्यपान 


श्चादि दिया ॥ २८ ॥ चरँ पुष्करिणी के किनारे पर 
उन्होने एक अत्यन्त न्दरी राजा क्री कन्या. क्रो 
जो च्यवन के पु ध्रमत्तिकीसखीथी देखा ॥ २६॥ 
खदेव के मित्र दुर्मति नलने जो उस समय उन्मत्त 
दोरद्यथा उख दी को पकड़ लिया श्नौर वह. 
राजा को देखकर चाहि-बाहि' कटने लगी 1 ३०॥ 
उसके रोने की ाचाज्ञ सुनकर उसके पति प्रमतिं 


"वद्ध शीधता से वहाँ पचे भौर कमे लगे कि 


क्रया वात है ॥ ३१ ॥ वहां पर उन्दने देखा कि 
राजा सुदेव वैे इए हैँ ओर दुरात्मा नल उनकी 


(हाताञ्च तथा पत्ना नेन रुदुरात्मना ॥३२॥ द्व कौ एक्डे हप है ॥ ३२ ॥ फिर मति सदेवं से 


पतः सुदेवं भमतिः ` प्राहेदं ` शास्यतामिति-। 


वोल्ते, “ह राजन्‌ } श्राप दुष्टौ का. शासन करने के 


भ०° १११ मादैरडेयषुराण ३७३ 


= ---------- 


तवच शास्ता भवान्‌ राजा दुष्ट्ायं नलो नरप,३३॥| हि द, ओर यद नल ददै, इसको शान्त 


जिये" ॥ ३३ ॥ 
॥ माकैरडेय उवाच माकरडेयजी वेले- 
तस्यास्य वचः श्रुता सुदेवो नलगौरवात्‌ । दुःखी भमति के बचन सुनकर राजा सुदेव 


श १ नल का प्च दरफे बोले, भर वैद्यह, ्पच्रिसी 
प्राहु वेश्योऽस्मि गस्छान्य क्षत्रियं त्राणकारणात्‌ ध सिथर स कहकर श्रप्तीशखीदयी र्त्ता कराये" 


:१ ततः । दद ॥ ३४ ॥ इस पर भ्रमति क्रोध की श्रि से जलने 
"१८ स॒ भिः हुसेन तिणि | लगे श्रौर श्चपने को बेश्य वताने वाल्ञे राजञा सुदेव 
भयुवाचाय राजानं बैश्योऽस्मीत्यभिभापिणम्‌ ३५।!| से बोले ॥ २५॥ 
भ्रमतिरुचाच प्रमति बोक्ते- 
एवमस्तु भवान्‌ वंश्यः क्षत्रियः प्षतरक्षणात्‌ । देखा दी दो, क्रियोचित स्क्तण कार्यं न करने 


कारण श्याप चेध्यरी दंगे । क्षत्रियां के शखर 
त्रियेधाय्यते शासं नार्तशब्दो भवेदिति। | थद करते ष दिस ची च्रातंयासी नहं सुनाई 


६ = धमः॥२६ देती हे । त॒म वस्तुतः क्षत्रिय नदीं दो, तुम ङला- 
स स्वं नकषत्रियो भावी वेश्य एव इृलाधमः॥३६॥| धम वयय ही होने ॥ २६॥ 


इति श्रीमाकर्टेयपुराण मे नामागचरित (२) नाम ११४ अध्याय समाप्त । 


~~ ग्द: ०-€4-- 


एकसोपंद्रहवों अध्याय 
माकरडेय उवाच माकरडेयजी वोलत- 
{स्मै द्वा ततः शापं नलं क्रद्धोऽत्रवीष्धिन। हे ब्रौषुषिजी ¦ राजा सुदेव को शाप देकर 


र श्रगु बेशी अमति श्रपनी कोधाभि से तीनों लो्कोको 
मम॒तिभांगवः कोपात्‌ लोक्यं निरेहनिव ॥ १॥ दश्ध करते हुए नल से बोलते ॥१॥ मदोन्मत्त होकर 


मदोन्मत्तो यदा भाय्यीं भवानत्र ममाश्रमे । | ओ तुमने रे प्राम सेमेरोख्लीको पकड 
वलादशृ्ासि भस्मत्वं तस्माद्रजतु मा चिरम्‌॥ २॥| इस पारण तुम शीघ्र भस्म दोजाश्नो ॥ २॥ अमति 
तेनोदाहृतमात्र घ वाक्ये तस्मिन्‌ तदा नलः के इ प्रकारः क्टते दही नल श्रपने शरीरसे निकली 


दुई श्रनि फौरन भस्म होगया ॥३॥ उनका 
देहनेनाभरिना सथो भस्मपुजस्तदाऽमत्‌ ॥ २॥ प्रभाव देखकर यजा देव का नशा उतर गया 


ष्टा परमाव तत्‌ तस्य सुदेवो बिमदस्ततः । | छरोर वे नघ्रला पूर्वैक प्रणाम करते हुए उनसे चो 
परणामनम्रः प्राहेदं क्षम्यतां क्षम्यतामिति ॥ ४॥।| कि कमा कीजिये, चमा कीजिये ॥ ४ । हे भगवन्‌ ! 
यदुक्तवां सत्वं भगवन्‌ सुरापानमदाङ्लम्‌ । | चुगपान के मदगे जो छ मैने श्रापसे -कहा है 


उसे त्तमा शीलिये जिससे श्राप्रके दिये हुए शप 
तत्‌ क्षम्यतां भसीद लं शापोऽयं विनिवर्त्यताम्‌ ।॥५॥ | ठी निषत्तो ॥ ५॥ राजा खदेव फे स भकार 


एवं परसादितस्तेन भमतिः प्राहं भागवः । धार्थ॑ना करनेपरः भ्रगुव॑शी भ्रमति जिनका कोप नल 
गतकोपो › नले दग्धे भावहीनेन चेतसा ॥ ९ ॐ भस्म हो जने से शान्त होगयाया व्रिकाररहित 
नान्यथा माबि तद्वाक्यं यन्मया स्ुदीरितम्‌। | चित्त से वोते॥ ६॥ जो छख मने कहा हे बह तो 


)| ७ ||| मिथ्या न होगा परन्तु मे प्लन्न होकर तुमपर एक 
0 श्सुगरह कर गा ॥ ७ ॥ श्राप वेश्य तो विना संशय 


भविता वैश्यनातीयो भवान्‌ नासतयन् संशयः । | क हमे ही परन्तु उसी जन्म मै फिर शीष चनव 
भविता श्रियो भुयस्तस्मिन्ेवाश जन्मनि ॥ ८ ॥ दोजावेगे ॥ ८॥ जव तम्दारी कन्या को वल पूरक 
्रीष्यति मलात्‌ कन्यां यदा ते कत्रसम्भवः । ।। फक क्षत्रिय क्ते जायगा तव तुम पुनः वैश्य से 


३७४ साङेरडेयपुराण । अर -११५ 


[ययक यायाय 


वदा लं षयो वैर सहीरो भिष्यति ॥ ६ दव को लो ॥९। द जम्‌ री रजा 

६ दयो ऽमवत्‌ | पिता वैश्य इप । हे महाभाग } अच मेरा 
एवं स वश्यो पास इदवोऽमलिता ४ चुत्तान्त खनिये ॥ १० ॥ प्राचीन काल मे गंधमादन 
अहच्च या महाभाग तत्‌ सव्व श्रूयता त्ववा ॥१०॥ पर्व॑त पर राजपिं खुरथ तपस्त्ी, मिताहारी, विर . 
सुरथो चासं राजर्षिः परागासीद्रन्धमादने ] 


शौर वनवासी होकर रहते थे ॥ ११॥ उन्दने चाज्न 
` तपखी नियताहारस्तयक्तसङ्खो वनाश्रयः ॥११ | ॐ सँ से दूटकर एव्व पर गिरीहुईे एक शारिका 
ततः श्येनयुखश्रष्टां शकं शारिकां यि । 


पर ख्या की द्रौर उसे मच्छां से जुडाया ॥ १२॥- ५. 
उसकी सूच्या समाप्त होने पर उसके शरीर से मे : 
करपाऽभुज्जतिता भुच्छा तथा तस्य महात्मनः|॥१२॥| उतपन्न होगई ओर चे राजप - सुभे देखकर मेम 
ततो मूच्छोवसानेऽदं तस्योतन्ना शरीरतः । | पूर्वक सुभे अपने आश्रम पर जे गये 1 १३॥ मेरे 
स मां दृष्ट्रा च जग्राह ल्लिद्यमानेन चेतसा ।१२॥ व से जो इसका र डरा 
~ यह मेरी पुजी होकर कृपावती नाम वा ध 
० छृपाभिभूतस्य १ एेखा उन राजर्पिमे कटा ॥१७॥ फिर मै उस भाश्रम 
तस्मात्‌ पावती नान्न भविष्यतयाह स मभो।१४।॥| पर रहकर -दिनति दिन वदने लगी श्चौर श्रयने 
ततोऽहमाभ्रमे तस्य बद्धमाना दिवानिशम्‌ । समान अवस्था बाली सचियों के साथ वनाोँरमे 
सखीभिः सह ठुखयाभिर्विचरामि वनानि च ॥११॥ र लमी 1 इसके अन्तर जगस्य सुति 
गो पनेरगस्त्यस्य ` भ्रातागस्त्य इव्‌ अतः | के भाई जिनका नाम भी पः था, वन 
वतौ अनेरगस्तयस्य , व स के फलो को खोजते इष बं पहुचे श्रौर कसी 
स चिन्वन्‌ काननेवन्यं सखीभिः ऽशपत्‌ १६॥ 
: यनां वैश्यमिति पराह भवति तेन ते श्पे । 
; भविष्यसि दैश्यजा तु इत्युक्ते च तमव्रवम्‌ ॥१७॥ 
नापराधं कृतवती ववाह द्विजसत्तम । 


कारणवश्च सखियों समेत सुभको शाप दे दिया ॥ 
उनके यह कने पर क्रि जो तुम लोगो ने मुसूसे 
अन्यासामपराधेन किमथं शुपवानसि ॥१८॥ 
ऋषिरुवाच 


वैश्य कहा है इसलिये तुम निस्संदेह वेश्य कुल मे 
षतां दुषटसंसरमाददुष्टमपि गच्छति । 


ही उत्पन्न होगी, मैने उनसे का ! १७॥ दे दिज- . 
खत्तस! यने श्रापका कोई पराध नदीं किया दुर्यो ˆ 

पसविन्दुनिपातेन पश्वगन्यघरी यथा ॥१६॥ 

[सिपत्य न दृष्टास्मि यत्‌ तयाहं परसादितः । 


के अपयाध ङे लिये आपयुे क्योंशापदेते है 
पि वेते- # 
शठ भी दुष्ट 3 संसगे से दता को मा भी दष्ट संसग से दृष्ता को पात. 
होता हे. जिस प्रकार कि पंचगव्य का घडा प्क - 
चद मदिरा क्री गिर जाने से धट दोजाता है ॥१९॥ ` ` 
श्रोर जो तमने प्रणाम करफे कहाहै कि नै दुष्ट 
अ ध नदी तो हे वाले ! मै ठम पर अनुग्रह करके जो 
स्माद्नुग्रं बले शृणु यत्‌ त करोम्यहम्‌ ॥२०॥ कहता हं बह समो ॥ २०॥ वैश्य योनि मे होकर. 
†श्ययोनो यदा जाता लवं पुत्रं बोधपिष्यसि | | जव तम ज्य ॐ किये अपने पुजको बोध करोगी 
गम्याय जातिस्मपतां तदा तवं समवाप्स्यसि ॥२१॥| उसी सूय ठुभको अपनी जपति का स्मर्स दो 
तो भुयः पषत्रनातिं परापत त्वं प्रतिना सह । 
देव्यानवाप्स्यसे भोगान्‌ गच्छ भीतिरपेतु ते ।॥२२॥ 
एवं शपरास्मि राजेन्द्र॒ तेन पूव्यं महर्षिणा । 
[क प्व॑मेवं ४.4 
पेता च मे पूल्वंमेवं शपः परमतिनाऽपृपत्‌ ॥२२॥ 
& च्रे, _ ५ = = न ष 
एव श्य न राजंस्तव न च वश्यः पिता मम । | पिदा । मेर साथ विव्राह करनेसे आपको दोष नहीं 
त्वंहि मस्यदु्टायामदुशे दुष्यसे क्म्‌ ।॥२७॥| लगा कारण चत्रियह, ओर आपमी रेसेदीकार४ 
भ्रीमाकंण्डयपुराण ३ [न % | $; त 
इति ड मर सुदेवचरित्र नाम का ११५बां अध्याय प्रमाप्त 1. --; 


जावेगा॥ २९ ॥ फिर तुम पति के साथ चतियत्व 

को प्राप्त होकर दिव्य भोगों का उपभोग करोगी । - ~ 
जान्नो, अव तुमको कड सय नदीं हे ॥,२२॥ हे ` 
राजन्‌ ! मे इस पकार से महिं दारा शापितं 

थी श्नौर मेरे पिता को पिज्ते भरमति ने शाप दिया 

था २३॥ इस तरद नतो मँ वैश्य ह श्रीर न मेरे. 


#। 


अ० ११६ माकंरडेयपुराण ३७५ 
एकसोसोलहवों अध्याय 
माक॑रडेय उवाच माकैरडेयजी वोत्ते-- 


शतिं तस्या वचः श्रुत्वा पुत्रस्य स च पार्थिवः। 


पुनः भोवाच षम्म्गस्तां पत्नीं तनयां तथा ॥ १॥ 
भयन्मया पितुरादेशाव्‌ त्यक्त राज्यं न तत्‌ एुनः। 


राज्ञा नाभाग श्रपनी स्री श्रौ पूजे ये वचन 
सुनकर श्रपनी 1 छर पुत्र से कहने लगे 
॥१॥ जो राज्य कि मने पिता की आक्षा से चोडा 


दे उसको म श्रव ब्रहण्‌ च करूंगा । तुम दृथा दी 


ग्रहीष्यामि दृथोक्तेन फिमात्माऽदृष्यते त्वया ॥२॥ मेरी श्रात्मा को च्चाकर्पित करना चाहते दो ॥ २॥ 
श्रहं ते सम्भदास्यामि करं वैश्यत्रते स्थितः । मे ७ रह कर वु क देता ग | 
द्व राल्यमरोषं लमिच्छया वा परित्यन ॥ ३॥|| चादे अपना राज्य भोग को या ्वागो, सुम 
व र र क ॥ इच नदीं डना दै ॥२॥ पिता के इस प्रकार 
शयुक्तः स तदा पत्रा राजदुत भनन्दनः कदने पर राजछ्कमार भनन्देन धर्म पूर्वक, विवादं 
घकार राज्यं धम्मेण तददारपरि्रहम्‌ ॥ ९ ॥| करके राभ्य करते लगे ॥४॥ हे चिज ! मनन्दन 
शरव्याहतं तस्य चक्र पृथिव्याममबटृद्धिन । न त उनका ध र 

५ 9 की श्रोर कमी नदीं यया श्रीर सव लोग उन 
~ च्‌ [र ४ है, 
न चाधम्मं मनो ५ स त ५ ५.५ वश में होगये ॥ ५॥ उन्होने विधि पूरव॑क यज्ञ कयि 
नष्टो विधिवद्यः सम्यक्‌ शास्त बुन्परामू्‌ । | तथा भली भांति पृथ्वी पर शासन किया 1 बह 
स्‌ एवैकोऽभवद्रतां पृथिव्यां व्याप्शासनः ॥ ६॥ सम्पू पृथ्वी के पालक हुए श्रीर उनका शासन 


मतः सब श्चोर व्याप्त था ॥ ६॥ उनका वत्सी नाम पक 
 भजायत सुतस्तस्य वत्सथीनांम नामतः । व अ सी 


पु 

पितातिशयितो युन शुणौपेन मदात्मना ॥७॥| अधिक उक्छष्ट था ॥७॥ विदूरथ की पुत्री सौनंदा 
"{ स्यापि भायां सौनन्दा विदूरथुताऽभवत्‌ ! व इ ष 
पतिव्रता महाभागा सा भक्षा तेन वीर्यतः। | पर्रम से व 
हत्वा एरन्द्ररिषुं छनम्भं दितिजेश्वरम्‌ ॥८ ॥| मार कर जीता था॥ ॥ 
। क्रीषुिरवाच कौषटकिजी वोक्ते- । 
भगवंस्तेन सम्पाता इुजुम्भनिधनात्‌ कथम्‌ | कौरडेय 
एतदाख्यानमाख्याहि प्रस्नेनन्तरात्मना ।॥ ६ ॥ 

माकडेय उवाच माकैरडेयजी वले - 
विद्रथो नाम दपः स्यातकीपिरूदयषि। पृथ्वी प्र विदूरथ नाम का एक राजा हुश्रा 
तस्य पुश्रयं जातं सुनीतिः मतिस्तथा ॥१०। जिसके ५५५११५७ सुमति ध 

< + दूरथः पकं वार राजा विदूरथ सरुगया के चन 
४, 1 चात ५ | गये तो उन्होनि प्क विशाल गड्ढा पृथ्वी म जैसे 
{ ददश गतत इम भूमलमिव तम्‌ ॥१९। मह होगया दो वैखा देखा ॥ १९१॥ उसको देखकर 
म न्तयामा्च किमेतदिति भेखम्‌ । | उन्दोने सोचा कि किस भकार यद भीपण गततं 
१ = क ५ पाताल की तरह होरददि जौर यद श्रधिक पुराना 
धातालविवरं मन्ये नेतदभूमेधिरन्तनम्‌ ॥१२॥ 
९ विजने 

चिन्तयन्निति तत्रासौ ददशं परजने वने । 


भी नीं मालूम दोता है ॥१२॥ जव वै उस पकान्त 
दने इख प्रकार सोच विचार कर रदे थे तव 

ब्राह्मणं सुव्रतं नाम॒ तपसिनमुपागतम्‌ ॥१२॥ 

स तं पच्छ च्‌ वरूपः किमेतदिति विस्मितः, 


होकर भुभसे कदिये ॥६॥ 


उन्दने सुबत नाम एक तपसी ब्राह्मण. को अति 
हप देखा ॥ १३ राञा ने उस व्राह्मण से कदा कि | 
यह कैसे त्रा्चय॑.की वात है किं यदा एक अति 


दे माकर्डेयजी ¡ कुजुम्म दी मृत्यु से किंस । 
प्रकार सौनन्दाकी धाति ई १ उस कथाको प्रसन्न ¦ 


शतु दैत्यराज जम्भ ओो 


[द] 


, ३७६ माकण्डेयुराण अ०११६ 


=-= 


दिखाई ~ = ] 
अतिगम्भीरसवनेद दर्शितान्तगंतोदस्य्‌ 11१९] गम्भीर गड्ढा दिखाई द स्ह ठ ॥१४६॥ 
ऋपिदचाच ऋषि वोल्े- 
हे राजन्‌ ! पृथ्यी ॐ पालक्त होकर आप यद 


ङि न वेत्सि महीपाल वागथस्त्वं हि स सतः। | 


चाच क्यो नदीं जान्ते है. पृथ्वी मे.जो कछ मोजूद 
ञेयं स्व॑ नरेन्रेण वर्तते यन्पहीतले ।\१५॥ दं जानते हे. पू इच मोजः 


है चह एक राजा को अवश्य जानना दाहिये ॥९६५॥ 


दानवः समहाबीय्यां उसद्युग्रं रसातलं । पाताल मे एक त्यन्त उद्र श्चौर पराक्रमी ' दानव 
स जम्भयति यत्‌ प्व इुनस्भः परोच्यते तत11१६1| रहता है, चकि चह पृथ्वी का जुम्भन करता रै 
क्रियते तेन यत्‌ किधिहभूतं भतं महीवले ! | इथे वटं ऊयुग्भ कहकतावा है ॥२६, उख दैत्य 


नेजो ङ्ध प्रथ्वीयास्वगं म च्या है उसको 
आप क्यों नदीं जानते ? 1९७ पूवे कलमे खुनन्द 
नाम सुशल जो विभ्वक्मां ने कनाया था उसको 


त्रिदिवे बानरथते तं थं वेत्ति नो भवान्‌ ॥ १७ 


सुनन्दं नाम रुषलं तष यन्निस्मितं पुर । 
उस दु राक्तस ने दीन किया है श्रौर अव वह 
हन्तरय 1 = 
तठ्जहार स दष्ठासमा तेन हन्ति रणं रिपून ॥१८। उससे श्रयं को मारतः है ॥९८॥ पावालके अद्र 
पाताललान्त्मतस्तेन भिनत्ति बरुधामिमाम्‌ । | से वह इख पृथ्वी को उरः मूसल से फाडता है 


4 श्रौर राक्षसो के ल्िये ्राने जाने का मार्गं वनाता 

नो दाराणि कुरुते ऽसुरः ॥९६॥ 
ततोऽषुराणां सर्व्वंषां द्वाराणि इ ९ हे ॥ २६॥ उख सनन्द नाम मूखल से राक्तस ने 
तेन॒ यिन्नात्र सुया सुनन्दद्षलायुधा । | इस पृथ्वी को फाड़ा है ! उस राक्तसक्ो जीते विना 
भोक्ष्यते बषुधासेतां तमजित्रा कथं भवान्‌ ॥२०॥| राप इस पूवी का उपभोग क्सि भकार करेगे ॥ 
यान्‌ विष्वंसयलयुगरो देवानाघुपरोधकः 1 | उख मूलं रूपी हयियार से बह उ राक्चस 


; भ ध ध देवताश्च प्र च्राक्रमख कर उनके यज्ञो को नए ` 
आप्याययति दतेयान्‌ स वली एुपलादुधः ॥२९॥| करता है ओौर दैत्यों क पालन करता है ॥ २९.॥ 


यचि घातयस्येनं पातालान्तरों चरम्‌ । | यदि आप पाताल मे जाकर इस शत्रु को -मारेगे ` 
ध 1 तो निस्संदेह राप इस समस्त पृथ्वी के यधिपति ˆ 
ततः समस्तवसुधा-पतिस््वं परमेश्वरः {२२ होगे रा उस वलवान्‌ दैत्य कुच लोग सौनन्द 
रुषं तस्य वलिनः सानन्दं भोच्यते जनेः । | ओौर चछ ज्ञानो लोग वक्तवान्‌ कते है ॥ २३॥ डे 
तया वलावलज्यैव तं षदन्ति विचक्षणा; ॥२३॥॥| राजन ! उस मूसल के विषय यें यद पसिद्धै कि 
निवीता क यदि चह किसी खी इस छ लिया जाय तो ` उस 
तद्‌ तु निवीय्यतां याति संस्पष्ं योता दप । विन घ निवल होजाता ह परन्तु दूसरे दिन प्र 
तस्मिन्‌ दिने द्विरीपेऽदवि वी््यैवत्‌ तदुदीय्येते॥।२४)। वलनान दोजाता है ॥२९॥ मुसल के इख पभाव को 
त स वेचि दुराचारः मभावं शुषलस्य तत्‌ । वह दुराचारी दैत्य भी नहीं जानता है कि यह खी 


त दाथ के स्पशं से ही निर्वल दोजाता है ॥ २५॥ 
पशं दपि वीव्ववृरातनम्‌ (॥२६॥ हे राजन्‌ ! मेने आपसे उस दए दानव नौर उस 


एवं तस्य वल्ल भूप दानवस्य दुरात्मनः । मूखल ॐ चल का यह हाल कदा, अव आप ` वह 
युषलस्व च ते भोक्त यदुक्त तत्‌ समाचर ।२६।| कीञ्यि जिसको करने = किये भने आपसे कदा है 


। र दत 1 २1 हे राजन्‌ ! अपके नगर के पास दी उस 
भखमतद्गव्त ध _ पविवीपते । राच्तस ने यह दिशास्त गतै वर्या है, अतः श्राप 
कृतं तेन महीरन्धं निशिन्तः 8 भवान्‌ यथा ॥\२७।॥| को निचिन्त नदीं रहना चाहिये ॥ २७ ॥ यद कड 
इत्युक्त्वा तु गते तस्मिन्‌ पुरं गत्वा महीपतिः । | कर बह ब्राह्मण चते गये ओर राजा ने भी अपने 
मन्त्रयामास मन्व; पुरमध्ये तु मन्विभिः ॥ . नगर मे जाकर चतुर मन्जियो से परामश करिया ॥ 
यथाशरुतमरेषं ठत्‌ कथयामास मन्विणाम्‌ । डद रन्डनि मूल के. भभाव ओर उसके 


निवेल होजाने के विषय मे सुना था चह. सव 
बलस्य प्रभावञ्य वीय्यशातनसेव च २६|| मन्वियों से कड दिया ॥ २६॥ "जबकि चे रला 


मन्त्रं क्रियमारन्तु मन्तिभिस्तेन भृता । | मन्नियो से परामन्षं कर रटे थे उखं समय उनके 


अ० ११६ ४८ माकर्टेयपुराण ३७७ 
स 


पास वैटी हुई उनकी कल्या मुदावती ने बद खव 
छृत्तान्त सुन लिया ॥ ३०॥ फिर क दिन वाद्‌ 
जव कि वह कन्या सखियो के साथ उपवने गई 
थी उसे समय छुजुम्म ने उसको रण करलिया ॥ 
श्सको सुनकर राजा पिदूरथ के नेन क्रोध से 
चंचल दो उदे शरीर न्दने श्रपने दोनों पुं से 
जो वन जाने मे प्रवीर थे जाने ॐे लिये कदा ॥२२॥ 
निर्विन्ध्या नदीके तटः पर जो गड्ढा दै उसमे 
होकर तुम पाताल मै जाग्नो श्रौर घां जाकर 
सुदावती के दरण करने वाले उस दु्द्धि राक्तस 
का चध फरो ॥ ३६ ॥ 
माकंरडेयओी वेले- 

तच वे दोनों पु श्रत्यन्त क्रोधं करके अपनी 
सेना को साथ लेक्रर उख गर्तं के मागं से कुजम्भ 
से युद्धः फरने को गये ॥ ३४ ॥ फिर परिघ, शक्ति, 
थाविसतं च शल, परशा श्रीर वाणो से उन दोनो का भीषण 
110 यद्ध तेषामासीत्‌ सुदारुणम्‌ ॥३५ युद्ध निरन्तर होता रहा ॥ ३५॥ माया के वलसे 
ततो मायावलवता तेन दैत्येन तायुभी | | उस दत्य ने समस्ते सेना को मारकर उन दोनों 
राजघु्रौ रणे बद्धौ निहवाेपतैनिकौ ॥२६।॥| रज्छमारो फो चन्द वना लिया ॥२६॥ दे न्ोधुकि 


परेद सर्वसेनिकान्‌ सुनि ! उन पुरो फे यन्दी दोजाने की खवर सुनकर 

तच्छत्वा स महीपालः परिदं सव्वसनिकान्‌। राजा विष्ूरथ को बहुत दुभ हुश्रा भीर उन्नि 
बद्पु्ः परामार्िषपेतो एनिसत्तम ॥३७॥] सव सैनिको को दुलाकर कडा ॥ २७॥ जो पुय 
यस्तां निहत्य दैतेयं मोचयिष्यति मे सुतौ । | उस 1 क करके व 1 वहां से, 
५ हावेगा उ मे श्रपनी सुदावती नाम कन्या 
तस्याहं व व ॥२८॥ 10. 
हत्येवं घोषयाथ्क्रं स राना ६ ता । | की सक्ति से निराश होकर राजा विदूरथ ने उप- 
निरः पुत्र-तनया-चन्पमोक्षायं वे शुने ॥३६।॥ रोक्त घोणा श्चपने नगर म कयादी ॥३६॥ उस 
ततः श॒श्राव बत्समीरभनन्दनघुतो हि तद्‌। | घोषणा को व ४ क 
ं कृताखः शी्यसंयुतः चीर चत्सपी भनन्दन के पुत्रथे शना 
भ्ाचोप्यमां = 6 ॥४०] उन्दोनि पने पिता के मित्र राजा विदूरथ के 
स चागम्याभिवाधनं प्राह पाथिवेसत्तमम्‌ | पासे आक्र उनफो प्रणाम करे विनय पूवक 
विनयावनतो भूत्वा पितर्मिमलुत्तमम्‌ ॥४१।| कदा ॥४९॥ श्राप सुमो शाला कीज्यि, वै धापके 
श्गापयाशच मामेव तनयौ मोचयामि ते! | परताप से उस राख को मारकर श्रपके पुं | 

तुचैव तेजसा इत्वा तं दैत्यं तनयाञ्चे ते ॥४२॥ श्रौर कन्या को चुद्ालाऊगा ॥४२॥ 
माकरुडेय उवाच माकौरडेयजी ोले-- (2 

५ राजा विदूरथ ने अपने मित्रके पुत्र को छाती 

स हं दा परिष्वज्य मियरस्युसयात्मनम्‌ । ते लगाया शौर कदा, ५ हे वत्स ! शीघ्र जाश्नो 
गम्यतामिति संसिद्धे वत्सेत्याह स पार्थिवः।॥४२॥ शरीर मेरी पुरी को भय से छुदाश्रो ”॥ ४३ ॥ दै 
वत्स ! यदि वम्दारे भन मे उत्साह है तो उसी | 
स्थाने स्थास्यति मे वत्सो यवं कुरुते विधिम्‌ । / 


शकार खच जच्छ जिस प्रक्र वचा गायके 
वत्सैत्‌ क्रियतामाश्च यच त्साहि मनस्तव ।॥४४॥ 


तत्पाश्वेवसिनी कन्या शु्रावाथ गुदावेती ॥३०॥ 
ततः फतिपयाहे तु तां कन्यां वयसान्विताम्‌ । 
नहारोपथनाहैत्यः इुनुम्भः स ससीदताम्‌ ॥२१॥ 
तच्छुत्वा स महीपालः प्रोधपर््याङलेक्षणः । 
पुत्र बुषाच तरितं गच्छतं वनकोषिदो ॥२२॥ 
निखिन्ध्यायास्तरे गरतैस्तेन गत्वा रसातलम्‌ । 
स हन्यतां योऽपहर्ता सुदावत्याः सुदुम्पतिः।।३२॥ 
मार्करुडेय उवए्च 
ततस्पौ तत्सुतौ राप्य तं गत्तं ततदायुगौ । 
युयुधाते ्वनुम्भेण स्सेन्येनातिको पितौ ।२४॥ 
ततः परिध-निसिंश-शक्ति-शूल-परश्वपैः । 


पास से जाकर. शी्र उसके पासं चापि, 
श्राजाता दै ॥ ४४॥ 


३७८ माकंण्डेयपुराण अ०. ११६ 


माकंरडयजी वोत्ते- । 

` फिर बत्सभ्री श्रपना कवच धारण करके श्रौरः 
चद्धप वार्‌ तथा तलवार हाथ मं ज्लेकर उस गततं 
के माग से शीघ्र पाताल में गये ॥ ४५॥ उन राजं 
कमार वत्सी के धुप चदृते की इतनी श्रावाज्ञ 
इहे कि उससे समस्त पादाल गूँज उठा 1४द। किरः 
उनके धुप ष्वद़ाने की श्रावाज्ञ सुनकर अत्यन्त 4 
कोप करता श्रा दैत्यराज कुजम्भ श्रपनी.सेना के 
साथ वदां श्राया ॥ ४७॥ फिर दोनों की वलचान्‌ 
सेना्रों सहित छुजुम्भ श्रौर राजङ्कुमार चत्खंभी . 
का युद्ध द्यने लगा ॥ ४८॥ जव उस दरैत्यको लते 
लते तीन दिन होगे तच वह कोधित हो मूल 
लाने के लिये दौड़ा ॥ ४६॥ विश्वकर्मां का वहं 
मूसल गन्ध, माला शीर धूप श्रादिसे पृजित देकर 
महलके भीतर रक्खा रहता धा ॥५०॥ परन्तु सुदा- 


वती ने जो सूसल के पभाव को जानती थी उस 
श्रेष्ठ मूखल को नम्रता पूर्वक प्रणाम करफे स्पश. 
कर लिया ॥ ५१॥ फिर जव तक कि वह दैत्य उस 
मसल को ले तव तक उसने बन्दना करने के 
वाने उस मूसल को ्ननेक वार सूप कर लिया- 
॥५२॥ फिर उख दैत्यराज ने जाकर भूखल दे यद्धं ` 
क्त्या परन्तु शन्मों पर उस मूखल ब्धा ङ्च 
श्रखर न हा ॥ ५३॥ हे सुनि ! उस परम शद 
सनन्द नाम सूसखल के निर्बल द्योजाने पर रान्तस 

ने चन्य शरद्य, शस्ते शचुंपर बार किया॥९४॥ 
जव बह श्रद्धुर सव्र य्न, शखरा को राजङ्कुमार 
वत्समी पर चला खुंका ठव उसने.क्रिरः मूखल को 
तपने हाथ यं लिया परन्तु चह व्यर्थं हुश्रा ॥ ५५॥ 
फिर तो राजज्कमार ने उस दैत्ये खव अख शसो 
करे काट डाला शौर उसको ` रथन. करदिया | 
स पर बद्‌ च्त्य ढाल तलवार लेकर राजङ्कमार 
प. दौड़ा ॥५६॥ फिर उस्र राख को कोपयुक्त, 
अपशब्दे कहते इष तेः देखकर राजकुमार ने 
उस इन्द्र के नु को अध्चिवाण॒ से मारा ॥५अ जव `` 
रधिवाण उसकी छाती मै लगा तो अत्यन्त दुःख 
उस देवतानां के शत्ुने प्राण्‌ त्याय कर" 
दिया. । उखके मरने पर "पाताल के.नामो -ने वद्धा; 
उत्सव मनाया ॥५८॥ फिर राजकुमार पर पुष्पोंकी 
वपां दोने लगी, गन्धर्वं लोग गान करने लये तथा 
देवत वाजे व॒जाने लगे ॥.५६ ॥.उस साजछुमार ने. 


माक॑रडय उवाच 

ततः सखदगः सधलु्व॑द्धगोधाद्रुलित्रवान्‌ ] 
जगाम वीरः पातालं तेन गर्तेन सत्वरः ॥४५। 
ततो ज्यखनमत्युग्रं स चक्रं पार्थिवात्सनः। 
येन॒ पातालमखिलमाधीदापरितान्तरग्र्‌ ॥४६॥ 
ततो ज्याख्नमाकण्यं इनुम्मो दानवेश्वरः ] 
्राजगामातिकोपेन स्वसेन्यपरिवारिपः ॥४७॥ 
ततो . यद्धमभूत्‌ तस्य तेन पार्थिवूचुना । 
परसैन्यस्य ससेन्येन विनो बलशालिना ॥४८' 
दिनानि त्रीणि स यदा योधितस्तेन दानवः 
ततः कोपपरीतात्मा अुषलायाभ्यधावत ॥७६॥ 
न्धेमा्यस्तथा धुप पूज्यमानः स तिष्ठति । 
्रन्तःपुरे महाभाग प्रनापतिविनिर्मिमितः ॥५०॥ 
१तो विज्ञानयुषल भ्रभावा सा अदावती । 
स्पशं  सुषलशषठमतिनम्रशिरोरा ॥५१॥ 
एनयावत्‌ स शाति षसं तं महासुरः । 
1वरत्‌ सा वन्दनव्याजात्‌ पर्पशनिकशः शुभा।।५२॥ 
तः. स॒ गत्वा युयुधे युषलेनासुरेश्वरः । 
यथां शुषलपातास्ते संजग्ुसतेषु शघरुपु ॥५३॥ 
(रमार त॒ नि््वीय्यं सौनन्दे युपल घ्ने | 
 । मे शस्त्रे दैतेयः सोश्युध्यत रणेऽरिणा॥५४॥ 
शासनं समस्तस्य राजपुत्रस्य सोश्रः । 
(पलेन वलं तस्य त्च धुद्धया निराङ्रतम्‌ ॥५५ 

ततः पराजित्य स भृपस्रस्राणि शृश्चाणि 
च दानवस्य 1 चकार स्यो तरिरथं तदथ सचम्प- 
घदगः पुनरप्यधावतं ॥५६॥ 
` तमापतन्तं शभसाऽभ्युदीणं विस्पषटकोपं 
म्रदशेनरशनरुम्‌ । अस्रेण बहे भमि राजपुत्रो 
घान कालानलसमपरयेख ॥५७॥ 

स पावकारतरेल हदि क्षतो भृशं तत्याज देहं 
्रदशारिरात्मनः । वभूव सदश्वं महयेरगाणां 
सातलान्तेपु सह्यनथोत्सषः ¦ ५८॥ 
१ऽपतत्‌ . -- पुष्यदृष्टिमहीपालदुतोपरि ` । 
(ग॑न्धव्वपतयो देववा्ानि सखदुः ॥५६॥| 


~ 


भ० ११६ भाकंर्टेयपुराण ३७६ 


877 । ~~ ~~ ~ 


प चापि राजपुत्रं चता तौ त्रुपतैः सुन । 
मोचथामास तनद्गीं तश्च कन्यां मदावृतीम्‌ | ६० | 
तश्चापि युपल तस्मिन्‌ कृन्म नितिन | 

जग्राह सागापिपतिरनन्तः शेपमतिनः ॥६६॥ 
_ तस्याम परितृष्रोऽा कैः सर्वयोसोश्वरः। 
मृदाव्रस्या मदा प्रयात-मनोषटनिस्तोधनः ॥६२॥ 
युनन्दपूपतस्परों वचकार पुनः पनः। 


दैत्य को मारफर याजा विदूर कर दोनों पु 
भोर सन्दर कल्यं फो वन्धन से चुटाया ॥ ९०॥ 
छजुम्य नेः गर्ते परर उस शृसल को साग के 
श्रधिपि श्ननन्ते शेप भगवान्‌ ने ले किया ॥ ६१ ॥ 
नागा न ह्वर नपोधत गेषजी सुदाजती से बहुन 
भसन चण्‌ ॥६९॥ चह यद्र जानती थी कनि खी के 
स्पशं स मृप्रल का पाव घर जातां है मौर इसी 
कास्ण स उसने बार वार उस भूप्रल करो शरूफर 
॥ तं उसका तेज प्रय पा ॥ ६३ ॥ हे हिज ! सौनन्ड 
योपि्कप्तनसश-मभावत्रातिमोभना = ॥६३॥ माम शूसल के गुण को जानने क कारण भुदा्ती 
यृदावरर्थास्ततो नाम नागरानस्तदक्रसेत्‌] | का चाम यसन्न होकर भोजी ने सुनन्दा रख 
सुनन्दासिति सानन्दं सोनन्दुयुएजं द्निन ॥६४॥ चया | यट राजङ्कमार त्स उन दोनो पो 
स चापि राजषु्रसं भाभ्यां सिना पतुः । | भीर फल्या परो हेकर व $: 

वला प्रार्‌ उलन प्रणाम करे बोले ॥६५॥ द तान ! मे 

समीप शु र 1 9 $, ( 
पमीपमानिनाया ॥1 पवर तम्‌ ॥९५॥| श्राप पत्र शीर कल्या गुदाचती को तो ले श्राया, 
छानानां तनयो ताति तथ्यं गृदावती | | श्र श्राप पया श्राप दै सो शरीर सुम 
¢. ८ 
तवानया मयान्यदरेयत्‌ कत्तव्य तत्‌ समादिश ॥६६॥ करिये ॥६६॥ 
मा्फरटेय उवाचं माक॑च्टयजी चो्ेः- ॥ 
ष्‌ श्नं € भ होक 

ततः भहर्प॑समयणं-ह्यः स॒ महीपतिः । ४ 


वात वटर ऊंधचि खर शे ने लगे, “ हे वत्से | प्रापने 
साधु साधित्ययाहो्चवत्स वत्सेनि शमनमू्‌।।६७।॥| वदा उत्तम पार्यं फिया "दभ “ हे घस | यमो 
समाभिनोऽस्मि चिदरोवत्पह फारणंस्चिषिः | | तीन फागु से देवताश ने सम्मानित किया हे ।! 
। त प्क नो यद करि तुम मेरे जामाता द्रुण, दसरे यद 
त्वं जमले च यत्‌ परा यचारिर्धिनिपातितः।&८॥ 
प्रागनान्य्तान्य्र यचापत्यानि मे पुनः| 


करिशन्रु क्रा वधंदहोगया॥ ६ ॥ श्रौर तीसरे मेरे | 
पुत्र शौर पुर कुजम्भं से चचकर रागये । श्रव 
तदरग्रहाणाय शस्तेऽषटि पाणिसस्या मयोदित्‌६६॥ 


तुम उन्तम युद मे मेस प्रतिाचसार इस कन्या | 
क साथ प्रारिग्रहण फरो ॥ दे६ ॥ तुम रजयुत्रद्यो ! 
ं ) # श्रीर्‌ मेरी यद सुन्दरी कन्या है| इस सुदावती - 
स गजपृत्रं च्विः कन्या ददि श्रारम ध स: 
क = ८ नाम भेरी कन्या कर साथ विवाद करके मेरे वचन 
रालशरत्र उयाच राजप बोल्ेः- 


तस्याप्ता 1 यव्रवीपि कगे ह तात ¦ जे शरापने श्रापा दी वह मैने भिया 
ततस्याक्त सया काय्या यहतरवीपि कगेमितत्‌। स | 


ˆ द्यम तात जानीषे नेयत्रायिकृता ययम्‌ ॥७१॥| श्रापकी श्राप का उल्लंघन नदीं कर सकता॥ ऽ१॥ 
माक॑रुडयजी वोक्ते- 


तव राजञा विदूरथ ने सनन्दनः व्री का 


मार्ग्डय उवाच 
ततस्तया; स॒रनन्दरधक्रे पेवाहिकं क्रमम्‌ । 
गृदावत्याश्च ददितु्भनन्दनमुतस्य तै ॥७२॥ मुदाचती के साध विधि पूरवैक विवाद कर धा 
ततः मह तया रेमे व्यप्रव । | फिर य़ बत्ती ने रमणीक देशो शौर मलं | 
रमणीयेषु देरेए भासादशिखरेषु च ॥७३॥ मं खुदाबती के साय विहार किया ॥ ७३ ॥ समय | 
चातन गच्छता दृध; पिता तस्य नन्दनः | । व्यतीत दोने पर भनन्दन -ठदध इ शरीर बत्सपरी 


३८० भाकेर्डेयपुराण अ° ११७ 


¦ वनं जगाम वत्सी; स बभूव महीपतिः ॥७४।| को सज्य देकर वनको चते गये ॥७४॥ उसने अनेक 
याज यक्ञान्‌ सततं भरना धर्म्मेण पालयन्‌ । | यक किये श्नौर घरमम-ू्बक भजा का पालन क्रिया । 
पत्रवत्‌ पाटयमानास्तु भनास्तेन महात्मना ॥७१।| मदात्मा बत्सभी ने प्रजा को पुभवत्‌ पाला ॥ ७५॥ 
वद्धर्धिषये तस्य॒ न चाभूदरणेसङ्रः उस राजा के शासन मेँ चोर, सपं, श्रकालका. 
न दसयु-व्यालदु् त-भयमासीच कस्यचित्‌ । | कभी मय न इमा रौर सव लोग विनासे रहित 
नोपसगेभयल्चेव तस्मिन्‌ शासति भूपतौ ॥७६॥| दोकर जीवन व्यतीत करते थे ॥७६॥ 4 


इति श्रीमाकंरडेयपुराण मे भनन्दन-वत्समी षयि नाम ११६वां अ० समाप । 


 ' 


-- स्यच 
. एकसोत्ररहवां मध्याय 
माकैरडेय उवाच माकर्डेयजी वोक्े-- 
तस्य तस्यां सुनन्दाया पुत्रा दादश जरे । फिर वत्सथी से सुनन्दा के वार पुज उत्पन्न 
` भः भवीरः शूरश सुचक्रो पिक्रमः कमः ॥ १ ॥| डप जो कि क्रमशः भां, परवीरः शर,ुचक् विक्रम 
| बलो बलाक्थर्द्च प्रचण्ड सुिकरमः । क्रम ॥ १॥ चल, वलाक, प्रचरड, सुविक्रम, श्चीर 


। 7 स्वरूप थे । ये सब भाग्यवान्‌ तथा संग्राम जीतने 
। खरूप्च महाभागाः सव्व संग्रामनित्तमाः ॥ २॥| वाले घे ॥ २॥ इनमे सवसे व्यषठ महापराक्रमी राजा 


¦ तेषां जयेष्ठो महावीय्यः पररासीन्रामिपः । | भां ये । उनके श्न्यम्यारह भाई सेवक की तरह 
| इतरे भत्यत्‌ तस्य॒ बभू वुवशवतिनः ॥ २ ॥| उनके वशवती थे ॥ ३॥ उनके यज मे ब्राहमणो तथा 
` तस्य यज्ञे द्विजत्यक्तैरनेकेदरन्यराशिभिः । | सेवको द्वारा छोड़ी इई धन राशि से प्रथ्वी पूर 
 न्युतवणंनिख्ैथ सत्यनामा वसुन्धरा ॥ ४।| छोकर श्रपने वन्धा नाम को सार्थक करने 
` सम्यक्‌ पालयतस्तस्यं भाः पुत्रानिवौरसान । | लगी ॥ ४॥ ते भजा को पुत्रवत्‌ पालन करते थे 
¦ योऽभूद्नचयः कोषे तेन निष्पादितास्तु ये ॥ ४॥ श्नौर कोष मे जो धन दका दोता था ॥५॥ उससे 
¦ केतवः शतसाहक्लास्तेषां संख्या न विद्यते] | वे सैको, दज्ञारो, करोड़ ्रनगिनती यज्ञ करते 
 -अयुताय न कोटीमिनं च पञचादिभिरयुने ॥ ६ ।॥| थे ॥ ६॥ इनके सवसे वड़े पु् प्रजाति हण जिनके 
¦ प्रजातिस्तस्य ु्रोऽभूहुयस्य यज्ञे शतक्रतुः । | यच मे इन्द्र ने देवतां सित अतुल ठसि प्राप्त 
` ¦ अवाप्य तृ्षिमतुलतां यज्ञमागेः सुरै; सह ॥ ७॥| कर ॥ ७॥ जम्भ आदि महापराक्रमी दानवों तथा 
¦ दानवानां इुवी्य्याणां जघान नवतीर्नव | | उनकी बलवान सेनर््ो सहित निन्यानवे पराक्रमौ 
। ! बलश्च विनां शरेष्ठो जम्भन्चामुरसत्तमम्‌ । गाकछसों को मारा तथा अन्य भी अनेकों देवज 
' ¦ श्न्यांथ ॒सुमहावीरव्यानाजघानामरद्धिषः ॥ ८ वात्‌ स १ | 


। " (4; प्रजाति के खनिज आदि पाँच पुत्र उत्पन्न हए । 
| 4 ¶च॒सनितभषखा ने । | उनम सब से वड़े खलिव राजा हुए ॥६॥ ते खनि 
`¢ तेषां खनित्री राजामत्‌ भर्यातो निनविक्रमेः।। ६। | शान्त, सत्यवक्ता, वीर, खवकी भला चाटनेवलि, 


| शन्तः सत्यवाक्‌ श्रः; सब्वभाणिदहिते रतः। । सदैव अपने धमे पर चलने चले, चड़ की सेवा 
[स्वधम्मामिरतो नित्यं घृद्सेवी बहुश्रुतः ॥१०॥ करने बाले तथा पवेद्धान्‌ थे ॥१०॥ वे वक्ता, विनय 
1 वाग्मी विनेयसम्पन्नः कृतास्चोऽ्यविकस्थनः | सम्पन्न, शख शख मे बिशारद्‌, श्रपनी बड़ 


0 कभी न करने बाते तथा सव संसारके प्रिय थे. 
¦^ प्येलोकभियो नित्यषुवाचेतदहर्निशम्‌ ॥११।| शरीर दिनरात यद का कर्ते ॥ ११॥ सव भाणियों 


० ११७ मापैरदेयराण 


~~~ न= ~ = = ~~~ = ~ ~~~ ~ ~~ 


नन्दन्तु सरव्वभृतामि सदन्तु 


~ ज भ < ०७ 


पिजनेष्यपि | 


को श्चानन्द दो श्रीर्‌ पैसे मे भी भीति सक्स। 


२९१ 


-न------------ ~~~ ~ 


स्पस्त्यस्तु सव्वमतेषु निरातद्रानि सन्तु च ॥१२। | सव जीवों का कल्याण दो श्रौर वे श्राङ्क रहितं 


मा व्वाधिरस्तु मूतानामापयो न मन्तु च । 
मंत्रीमवरेपभूतानि पुष्यन्तु सकले जने ॥१ 
शिवमस्तु दिजातीनां भीतिरस्त॒ प्रस्य । 
समृद्धिः सन्यवरणानां सिद्धिरस्तु च कर्म्मणाम्‌॥।१४॥ 
हे लोकाः सर्वभूते शिषा योऽसतु सदा मतिः। 
ययास्मनि तया पुत्रे हितमिच्डय पव्वंदा ॥१५॥ 
तया समस्तमृतेषु वर्तध्वं हितयुदधयः । 
एतदो हितमत्यन्तं फो वा कस्यापराध्यते ॥१६॥ 
यत्‌ करोत्यहितं किश्चत्‌ कस्यचिन्मूदमानमरः । 

तं समभ्येति तन्नूलं कलु गामि एलं यतः ॥१७॥ 
इति मत्या समस्तेषु था लोकाः कतयुद्धयः | 
सन्तु मा लौकिकं पापं लोकान पराप्स्यय तर युधा;१८ 
यो मेय सिते तस्य गिचसस्तु सदा यत्रि । 

यथ भां दरि लोकेऽस्मिन्‌ भोऽपि भद्राणि र्यतु १६ 
एवंसवरूपः पुत्रोऽभूत खनिन्रस्तस्य भप । 
समस्तगुणसम्पन्नः श्रीमानन्नदलभणः ॥२०॥ 
तेन ते श्रातरः गीत्या पृथग्राज्येपु योजिताः । 
स्ययश्च पृथिवीमेतां दुधूनं सगिराम्बरम्‌ ॥२१॥ 
भाच्यां तेन एतः शारिदिक्षिणायमुदावसुः । 
दिनि प्रतीच्यां मुनय उत्तरस्यां महारवः ॥२२॥ 
तेषां तस्य च भूपस्य पृथमोत्राः पुरोहिताः । 

यम्‌ ुमुनयत्रैव मन्विव॑शक्रमागताः ॥२३॥ 
गौरिरविलोदभूतः ुहोघ्रो नाम पै द्विनः। 
उदावसोः कृणावर्तो गोतमान्वपजोऽपवत्‌ ॥२४॥ 
काश्यपः प्रमतिर्नाम सुनयस्य पुरोहितः । 


सहास्यस्य वाशिष्ठः पुरोधाऽमृन्महीभूतः ॥२५॥ 


युभु्सते खराज्यानि चल्रारोऽपि नराधिपाः । 
खनित्रशवाधिपस्तेपामरेपवदुधाधिपः ॥२६॥ 
तेष भ्रारप्यरेषेपु खनित्रः स मरहीपतिः। 


प्रनायु च समस्तासु पुरेव सदा हितः ॥२७1 


पकदा मन्त्रिणा शौरिः स प्रोक्तो विश्ववेदिना। 


विपिक्ते पृथिमीपाल िचिद्क्तव्यमस्ति न; ॥२८॥ सजन, | 


हो जावे ॥ १९॥ ध्राशियो को कोई श्राधि, व्याधि 
नो रौर मनुष्यो म परस्पर भरी दो तथा सव 
लोग फल फूल ॥ १६ ॥ ब्राह्मणो का कल्याण हे 
श्रीर उनम श्रापस में श्रीति हो तथा सव वौ को 
पेभ्व्यं श्रौर उनके कमो म सिद्धि हो॥ ४॥ ह 
लोगो ! श्रापकी बुद्धि लव प्राणियों मे कल्यारबती 
हो । जिस तरह श्रपना हित लोग चाद उसी तर 
श्रपने पुरो का भी ववाह ॥ १५॥ सय प्राणियों मे 
परस्पर दित करने बाली युद्धि फी धरद्धि दो । जव 
प्क कादृसरेमे हित होगा तो श्रपराध कीन 
करेगा १।९६॥ यदि कोई किसी काभूढुतावश 
श्रो भी श्रदिन कर्ता है तो उसका फल उसको 
प्रत्यन्त दुःखदा होता ह ॥१अ॥ ये वात मान कर 
लोग श्राप मे पक दुखरं फ हितैषी हो, इस तरह 
लीफिक प्राप न दोया श्रौर लोग उत्तम लोकोंको 
पराप्त करगे ॥ १८॥ इस पृथ्वी पर जो सुसे भीति 
श्रता दै उसका तथा जो मेरे विरद्ध है उसका 
भी कल्याण दो ॥ १६॥ राजा प्रजाति के सप्रकार 
सर्वं गुण खम्पश्न रीर कमज्ञ के समान नेत्र वाले 
पुत्र खनित्र दप ॥२०॥ उन्न श्चयने भायां क 
पृथक्‌ पृथक राज्य देकर श्रलग कर दिया शौर, 
स्यं श्स समुद्र से धिरी दु पृथ्वी पर राज्य करने) 
लगे ॥२२॥ उन्होने पूवं दिशा का राज्य शौरिको,' 
दक्षिण फा उदाबस्ु को, पश्चिम का सुनय श्रौर 
उतर का महार्थ को दिया ॥२२॥ उनमें से रेक 
राजा के पृथक्‌, पृथक्‌ गोत्र, परोत, पुज श्रौर 
मन््ी गग द्ुप ॥ २२॥ शौरि फे पुरोद्धित 18 
एल भ उतपन्न सुदो नाम बराल दुष श्रीर्‌ ˆ 
चश मे उत्पन्न शावतं उदाबष् फे पुरोहित इ 

॥ २४ ॥ क्यप कुल मे उत्पन्न प्रमति खुनय ¬, 
रीर वशिष्ट ुलोतपत् वाथिष्ठ जौ राजा महारथ 
द्धे पसेदित हुए २ वे चारो जा श्रपने 

राच्य फा उपभोग करते परन्तु खनित्र उन सव 
श्चयिपति श्रीर खभस्त पृथ्वी के स्वामी थे॥२^ 
उन चारों मायो पर तथा समस्त भजा पर 
मदाराज खनि पुत्रवत्‌ स्नेहं कर्ते थे ॥२अ | 
मार शीरि से उनके मन निम्बमदि ने का, ५} 


ग श्रापसे कुद कदना दशर ^ ८ 


(11 


३८२ ` माकंरुढेयषुराण  श्र° ११७ ` 
>: वशायाः यदह समस्त प्रथ्वी है उसी क वशवर्ती सव राजा 
यस्य भृपा वदादचया, श | = 

व ५ धा | है वथा बह स्वयं शौर उसके. पच, पौचच उदि) 

प राजा तस्य पुत्रश्च तत्पौत्राशान्वयस्ततः ॥२६॥ उसके राजा रेने ॥ २६॥. उसके भा, तो पिले 

इते भ्रातरसत सर धपा; दीस टे छोटे देशो के राजा है 1 उन सदय! 

इतरे भ्रातरस्तस्य प्राच्‌ सस्पविपयाधिपः ता 

तत्पुत्रधासपकस्तस्मात्‌ तत्पात्रा्ाखकारकाः २० पुरो सेमी क्म र्य रह जायगा 1३० ॥ वहाँ 
तकत करि पत्र, पौत्रो के चाद जे सन्तति होनी बद 


कातेन हासमासाश् पुरुषाद्‌ 'पुरूषान्तरम्‌ । 


सवय पार प्रटते घय्दे खेती . पर जीवघन निचा 


रम्योपजीव्रिनौ भप भवन्तीति तदन्वयाः ॥३१।॥ करते उली रट जायगी 1ेर॥ मा कमी भाई 


तोद्धारं ङरते भाता भ्राटस्तेहवलापंशः ।! 
सलेहकः एथिवीपाल परयोभ्रवृपुत्रयो; ॥३२॥ 
त्पुत्रयो; परतरा सतिर्भवति प्यर्थिव। 
तस्त्र; केन कार्य्येण प्रीतियुक्तो भषि्यति {३३॥ 
अ्रयघा येन तेनेव सन्तोषं इर्ते दषः । 
क्रियते तत्‌ पिसरथन्तु भूपन्विपरिगहः ॥३४॥ 
भ्यते सकलं राज्यं मया ते मन्त्रिणा सता। 
त्‌ मधा धारयसे सन्तोषं इर्ते यदि ॥३५॥ 
ा्यैनिष्यादकं राञ्यं करणं कचतरिष्यते । 
एव्यलब्धुश्च ते काय्यं तवे कर्ता करणं षयम्‌ ।॥३६।॥ 
गोऽस्माभिः करणै राज्यं पिठ्पैतामहं इर । 
षमदा भविष्यामः परलोके न ते वयम्‌ ॥३७।॥ 
राजोचाच 


येष्ठो राजा महीपाल षयं तस्याचुजा यतः | 
तः स युडमत पृथ्वीं वयञ्वाल्पवसुन्धराम्‌ ॥३८॥ 
यन्तु भ्रातरः पच पृथ्वी चैका महामते] 
तोस्याः पृथोश्वव्यं कथं छत्सनं मतिष्यति॥२६॥ 
दिश्ववेच चाच 
वमेतद्भवांस्तत्र य्या वसुधा त्रप। 
† चमेवाभिष्यस् व्येषठः शास्तु महीं थवान्‌॥४०॥ 
व्वाधियत्यः स्वैभ्यो भय त्रसखिलतेशवरः 
तन्ते च ययाऽहं ते तेषामादितमन्विणः ।४१॥ 
५ , भजोचाच ` 
.. छा सना चया पीत्या भनतऽस्परान्‌ सुतानिद 


परेम करफे उसका उद्धार नदीं चाहता । हे राजन! 


पिर भार श्या माई के पनां पर तते मेनकडौसे 


श्राया 1३) हे राजम्‌ ! तच भाई क पतं सं भीति 
नदीं होती है तच उसके पञ्च क य॒तां यदि मे छां 
से होगी ॥२२॥ हे यजन्‌ ! यदि श्राप यहं कद हनि 
आपको इतने पर दी सन्तोप टै तो फिर राजां 
दारा मन्तियों ह्ला रक्वा जना तथां उनसे खलाह ` 
लेनः व्यर्थं हे 1३४ मेरी आप्ते यदीं मन्त्रणा है 
करि ्ाप खमस्त राल्य का उपभोय करं मौर यदि 
श्राप सन्तोष करगे तो आपको खख पान्त न दोगा 
॥ ३५॥ राज्य सव खिद्धि का देने बाला है.परन्तु 
उसके लिये उपाय करता चाद्ये । आपक्रौ राज्य . 
पराप्त करना चाद्ये, उसमे ्राप्र कता होगि चीर .: 

इम साधक 1२६॥ इसक्तिये दमक साधन वनाकूर 
श्राप श्रपते वाप दादा क्रा रज्य पाठ रीजियि. हय 
इस लोक मे दीं आपके कम आमे परलोक. मं 
तीं ॥ २७ 1 
राजा बोल्ले- ` | 

वड़ा भह दी समस्त प्रथ्वी का मालिक डोता 
हे, हम नो दछोरे भह है! अतः चदहदही पृथ्ीपर 

राज्य करते दै ओर हम छोटे छोटे सर्व्योङे . 

स्वामी हँ ॥ ३८1 हे नहामति ! हम तो पाच भह 
हे परन्तु पथ्य एक ही हे रतः एक एक.के पास 
समस्त पृथ्यी का रान्य किख भकार होया 1३६॥ 
चिश्ववेडि मन्त्री वोले- 

डे राजन्‌ ! जिस प्रकार आप कते हें पृथ्ी 
एक डी है} उसका स्वामित्व श्मापद्ी अहर करं 
श्नौर वड़े भाई क्ते रहने दें ॥ ४०1 ज्चाप ही सवके 
अधिपति चौर स्वामी हजिये, तथा जिस पकार 
मअ यत्न ञ्ूरता ह उसा पक्नर अपक्त भारयाक 
मन्त्री भी उनकी राज्य पाति ज्िये यज्ञ करते है ॥ ` . ` 
राजा वोजेः- र | 

हमारे ज्येष्ठ राता मपर पुत्रवत्‌ स्नेह करते 


भ्र° ११८ माकुदेयषुराण ३८३ 
कथं तस्य करिष्यामि ममत्वं जगतीगतम्‌ ॥४२॥ है, हम उनके स्य पर किस धकार दष्ट उा्त॥४२ 
, विश्वे बाच विश्वचेदि वोले-- 
राल्यस्थितः पूजयेथा व्ये भपाणैनपेः | राज्य मे स्थित होकर श्राप र्डे भर द्ये तरह 
# चख श्र श्राभूषशों द्वारा, एमित होगे ! राज्य 
कनिटलयेषठता केयं राज्यं पराथैयतां दृशाम्‌ ॥४३।॥ की ध्च्छा कूरने गालो को वड़े छोटे क दात 


न्‌ देखनी चाहिये ॥४५३॥ 
माकरडेय उवाच माकरडेयजी वोक्ते- 
तथेति च तिहते भुना तेन सत्तम हे क्रौषुकि जी राजा शौरि फे पतिका कर 


विर मन्त तृननयद सेने पर मरनत्री विश्वेदि ने उनके भादरयो फो धपते 
विश्ववदी ततो  तदाद्लनयद्शम्‌ ॥४९॥ वश मे कर लिया 1891 इसके पश्चात्‌ उनके पुरो- 
तेषा पुरोहितांधेव आत्मना शाम्तिकादिप्‌ । | दितो को खनित्र पर शान्तिक श्रादि भथोयो द्वारा 
नियोजयामास पत्त; खनित्रस्याभिचारे ॥४५॥ अभिचारिक कर्म करने फे लिये तत्पर किया ॥४९॥ 


साम, दाम, दरड, मेद श्रादि दवाय उन पुरोदितों 
विभेद तस्य निभृतान्‌ सामदानादिभिस्तथा । को श्रपने वश मे किया तथा श्रपते दरड का भय 


चक्रे च पएरमोहुयोगं निनदण्डमबाधने ॥४६॥| दिखाकर उच्योग मै तत्पर करा! ॥ ४६ ॥ नित्य 
छाभिवाणिमदग्रमहस्यहनि ह्वता्‌ । | रति चार पुरोदितो ने महाराज खनिज के नाश 


१ होने के निमित्त श्रभिचारिक कमं किया जिससे 
परोधसां चतुणोज्च नके एत्या चतु्टपम्‌ ॥४५७॥ चार ङृत्या उत्पन्न हुए ॥ ४७॥ वै विकराल थे तथा 


पिकं महायक्रमिभीषणदशेनम्‌ । | देखने मे भयानक पुखचले थे । महाश्ल धारण 

समुचतमदहाशतं ममूतमतिदारुणम्‌  ॥४८॥| कर वे महाराज के नाश कएने को उत हए ॥४॥ 

ततस्तदागतं त्र खनिभो यत्र पार्थिवः | ओर बे वदाँ परे जहां महाराज खनित्र थे परन्तु 

निरस्तभ्चाप्यदुषटस्य तस्य पुर्यचयेन तत्‌ ॥४६। उनके पुरय समूह के कारण उनकी एक न चली ॥ 

कृत्याचतुष्टयं तेषु॒निपपात दुरा्मषु । | फिर वे कृत्या चारो भ्यो के दुतम पुरोहितो 

परोहितेषु भूपानां तथा सै विश्वेदिमि ॥१० | श्रीर मन्त्री विश्ववेदि पर गिरे ॥५०॥ उन इत्याश | 
तो निहन्लो निकषा; कृत्या ते पुरोहिताः । | के गिरने सेवे पुरोहित भ्रौ शौरि का इध मनव 

दिश्वेदी तदा न्त्री स शौरुमनतेदः ॥५१॥|| विश्ववेदि जल कर भरम दोगये ॥५९। 


इति भीमाैरडेयपुराण मे खनित्र चि (१) नाम ११७ अ स०। 
-- रः णक 


एकपोधमरद्वा अ ५ 
९ माकरडेयजी वोले-- हितो 
- ततः समस्तलोकस्य पिर्पयः सामवे रौर मनी चिश्वयेदिके एक दी समय भमर 


यद्ैककालिं नेशस्ते पृथक्‌ पुरनिवासिनः ॥ १ ॥| जाने पर समस्त भजा को वद आच श्रा ॥ १॥ 
ततः श्राव निधनं यातान्‌ शराहपरोहितान्‌। | मादो ॐ पुरोदितो शरीर शौरि नामक माई के 


6 अन्न विश्वतैदि से एक साथ भस्म होजानेका 
मन्विशब्च तया रहं तं मशववदिम्‌॥ ९ समाचार सुनकर ॥२॥ हे कौधुकरि सुनि ¡ महाराज 


किमेतदिति सोऽतीव विस्मितो एनिसत्तम । ५ स 1 
निवोऽभृनमहाराजो नाजानात्‌ तच्च कारणम्‌ ९। 6 चह कया रा । परु सका कार्‌ उदं पा 
ततो वशिष्ठं पच्छ स॒ राना शरहमागतम्‌ । | न हा ॥ २॥ इसके अनन्तर वरिष्ठ सुनि के घर 


. ३८४ ` माकंरढेयपुराण ` श्र ११८ 


ध श्राने पर महाराज ने उनसे भादा के पुरोदितो . 
यत्कारणं विनेश्॒स्ते भराठमन्तिपुरोहिताः ॥ ४॥ नौर विश्ववेदि मन्त्री के एक साथ भस्म दोजाने 
ह तं त का कारण पूञा ॥४॥ उनंके पृच्ने पर महामुनिं 
तेन पृष्टस्तदा पाह यथतत महामुनिः । - | वरिष्ठ ने जो ङ च्तान्त था वह तथा जो कृ 
यच्डौरिमन्बिणा ोक्तं यश्च शौरिस्वाच तम्‌॥ ५॥| शौरिके भन्न विश्ववेदि ने शौरिते श्नौर फिर शौरि 

चां त ॥ ड विश्ववेदि से कटा था वह सव कह सुनाया ॥५॥ 
यथा चालुष्ठितं तेन भ्रादृणां भेदकारि बे । तथा जिस प्रकार उस दुष मन्त्री ने भादयों मे सेद - 
मन्िणा सैन देन यचक्रथ परोहिताः ॥ & ॥| कराया ओर पुरोहितो को मन्त्रणा दी ॥ ६॥ ` 

मितं विने त क नासी | चनौर चकि राजा खनिज पापीन थे चनौर शश्र 
यन्निमित्तं विनेशस्ते अपापस्यापकरारणः पर भी दया रखते थे इसलिये वे पुशोित खयं न्ट 


पुरोदितास्तस्य राज्ञः शत्रावपि दयापराः ॥ ७॥| दोगये॥ ७ ॥ इस सव वृत्तान्त को सुनकर मदा 


^~ > राज खिच्ने का, “ हा ! म मारा गया !* श्नौर 
"६ हृतो $ ॥ । “श [> - 
प तच्छत्वा ततो राना हा हतोऽस्मीति बै बदन्‌ उन्दोने श्रपनी ही द्विज वशिष्ठ के सन्मुख ख्व 


निनिन्दात्मानमत्य्थं वशिष्स्याग्रतो द्विजः ॥ ८ ॥| निन्दा की ॥ ८॥ 
राजोवाच राजा वोज्तेः- | । 
धिङ्परामएु ए्यसंस्थानमरपभाग्यमशोभनम्‌ । सुख पापी. मन्दभागी, दष्ट को धिक्कार 


हैवदोपङतं पापं सर्व्वलो जिसके कि दुर्भाग्य से यद्‌ संसार मे निन्दा करने , 
द पापं कविगर्हितम्‌ ॥ ६ ॥ न 


तन्निमित्तं विनष्टं यत्‌ तदुत्राह्मणचतुषटयम्‌ । | ब्राह्म मारे गये इख पृथ्वी पर मेरे बराबर दसरा 
र्तः कोऽन्यः पापतरो भविष्यति पुमान्‌ भुवि ॥१०॥ पापी फौन हे १॥१०॥ यदि तै थ्वी पर इस तरः 
नाभविष्यं यदि पुमानहमत्र महीतन्ञे। | का पापी मचुष्य न होता तो मेरे भादयोके पुरोदित 


तस्ते न बिनश्येयुमैम भातुपरोहिताः ॥११॥ भयो मारे जाते {॥ ११ ॥ मेरे राज्य .करने, जनम 


न प लेने शौर कुल को धिक्कार है कि जिसके कारणः 
धगृराज्य धिक्‌ च मे जन्म भूना महता इले । | मै चार गह्मशो के नाश का हेतु हुञ्रा॥१२॥ घेतो, 


कारणत्वं गतो योऽदं विनाशस्य द्विनन्मनाम्‌॥१२।॥ अपने स्वामियों का जो कि. मेर भाई है कायं कर 
व्यन्तः स्वामिनां तेऽथं भ्रातृणां मम याजकाः। | रदे थे, ते मेरे लिये नाश को भ्त हप । अतः वे 


५ व इष्ट नदीं वरन्‌ उनके नाश का कारण रूप दु 
गश ययुनं इष्टस्ते दुषटोऽदं नाशकारणे ॥१३ ॥ ह ॥१२॥ क्या कर १ कटां जाड ? र समान शस 
कैकरोमिक गच्छामि नान्यो मत्तो हि पापड््‌। पृथ्वी पर कोह पापी नहीं है जो कि अओ बाह्यशों के 
[थिव्यामस्ति हेतुं द्विजनाशस्य यो गतः ॥१४. | नाश का देत इया.॥१७॥ यदह विचार कर महाराज 
त्थदवि्हृदयः खनित्रः पृथिवीपतिः । | खनिन बडे व्याङल हषः चरर बे पुत्र को राज्य ` 
नं यियाघुः पुत्रस्य कृतवानमिषेचनम्‌ ॥१५।॥| तलक देकर वनको चलते गये ॥ १५॥ महाराज 


५ । खनित्र ्रपने चुप नाम पुज का राज्याभिषेक करके .. 
प्रमिषिच्यं सुतं राज्ये. पसजञं महौपति;। | तीन पत्नयो सित तप करने को वन मे गये॥१६॥. .; 


आ्याभिस्तिमिः साद्ध तपसे स बनं ययौ ॥१६॥| वहाँ जाकर उन ग्रेष्ठ राजा ने बानथस्थ विधान सेः; 
प्र गत्वा तपस्तेपे वानस्थविधानवित्‌। | सादरे तीनसौ वर्प तक तपस्य! की ॥ १७॥ हेः 


शृतानि त्रीणि वषाणां साद्धानि दृपसत्तमः ॥१७॥ सा के कास्य 


तपसा क्रीणदेदस्तु राजवरयों द्विजोत्तम । | से स्नान करके उसी वन भे भय त्याग. दिये ॥९॥ ` 
नेग्रह्य सर्व्वसोतांसि तत्याजाघुन्‌ ` वनेचरः ॥१८।। पराण त्यागने पर वे सव कामनान्नो को पूणं करने. 
ततः प्यानूययो लोकान्‌ सन्वेकामदुहोऽशषयान्‌ । | बाले उन शर्य पुर्यलोकों को भां हृष जो कि 
“११६ ^...“ मे नराधिपैः 11१९] शेष शादि करने पररा म, 


० ११६ ४६ 


माकण्डेयपुराण ३८१ 


~~~ 


भाय्याश्च तस्य तास्तिसः समं तेनैव तत्यजुः 


० 


खसं महात्मा सजा ॐ खमन उसकी तीनां शिया 
उसके साथ साथ प्रणो. को त्याग श्रत्तय 


भाणन बापु; समालोक्य तेनव सुमहात्मना॥२०॥ लोको यो आ किया ॥ २०॥ हे षटि जौ) 


एतत्‌ समित्रचसितं भरतं कर्मषनाशनम्‌ । 


महाराज खनि का यदह चरित्र सुनने श्नौर पढने 
पापां का नाश करता! अव श्रापलुपका 


भठताञ्च महाभाग क्षुपस्यातो निशामय ॥२१।॥ वृत्ताम्त सुनिये ॥२१॥ 


इति श्रीमाकंर्डेयपुराण मे खनित्र चरित्र (२) नाम ११८ अ० सर । 
-# क < 


एकसोरननीषवों अध्याय 
माकंरडय उवाच | माकरडयजी वेहे-- 


रुपः खनिन्रपुत्रसतु भराप्य राज्यं यथापितति] | _ खनिन् पु राजा छने राज्य र पिता की 
(4 ५ भाति परजा का घमं पृक पालन [किया॥१। 
तथव पातयामास भरना धम्प्रए रज्ञयन्‌ ॥ ९ महाशज चुप घडे दानी तथा यञो के करने चाले 


स दानशीलो यष्टा च यज्ञानामवनीपततिः। || हण । व्यवहार म वे एथ श्रौर मित्र को समान 
समः श्रौ च भित्र च व्यवहारादिवर्त्नि ॥ २।॥| इटि से देसते थे ॥२॥ हे सुमि ! एक वारःजव त्रं 


एकदा स महीपालो निजस्थानगतो पुने । | महाराज छप श्न स्थानप्र यैडे इषः थे तव पौरा 
५ पिष ी शिक बाह्यो ने उनसे कदा कि पूर्वकाल भी 


तेरो यथा पूवव पो गाना तथाऽमवत्‌ ॥ ३॥| पवः महाराज चुप हप थे ॥३॥ जिस भकारं परहा ओ 


ब्रहमणस्तनयः पष्य शरुपोऽभूत्‌ पृथिपरीपतिः ! "| क पुच उन महाराज लुप का चरि था उसीपरकार 
^. यदक्‌ उरितमस्यासीत्‌ तादक्‌ तस्यंव चेष्टितम्‌ ॥४॥| ्ापका भी होना चाये ॥५॥ 
राजोवाच राजा वोले-- 


श्ोतमिच्ामि चरितं करुपस्य सुमहान; । म महातमा छप शा चरि गने पी ध्व 
ह करता ह, यदि मेरी शक्ति भी उनके अनुसार होगी 


यदि तादडमय। शक्यं चेष्टितुं तत्‌ करोम्यहम्‌ ५ तोम भी वैसी ही चेष्टा करूंगा ॥५॥ 
सूता उवुः पौराशिकरों ने कदाः-- 


ध है राजन्‌ ! उने महाराज ज्षपने गो बाह्म्ेको 
स चकाराकरान्‌ भूप राजा मात्राह्यणान्‌ पया। 


इतना न दिया फि वै ध बे । उन 
८ त्मानेश्रजासे छदा भाग लेकर श्रनेकों यज्ञ 
पषटेन कृता चो्व्यामिषटसतेन महात्मना ॥ ६॥| वथ १८ छन 
राजा वोक्तेः- 


मुभ खरीखा राजा उने महत्मा राजा का 
कहां नक श्यनुकरणं कर सकेगातयापि म उन घ्रष्ठ 


जाश्रो के कार्या्खरए की वेषा करेगा ॥७॥ 
प्रतः महाराज ज्चुप के चरि कां श्ुकरणा करने 


्षयस्याचुकरिष्यामि महाराजस्य चेष्टितम्‌ ॥ ८ ॥| फे निमित्त जो प्रतिक्ञ तै वारवा टँ बह सुने॥ 
ग्रसन्‌ यज्ञान्‌. करिष्यामि शुस्यापाते गतागते । | जव जव पृथ्वी पर थक्काल पडेगा तव तव म तीन 
पृथिव्यां चतुरखायां भरतिजञेयं इता मथा ॥ & । | तीन यज्ञ करूंगा ॥६॥ पूव काल मे गो ब्राह्मण न 
यश्च गोब्राह्मणा ूर्मददन्‌ भूषत रम्‌ | | जो कर रजा को दिया है ही गो (रौं को 


तमेव प्रतिदास्यामि ब्राह्मणानां वथा मबाम्‌।।१०॥ दान के सूप मे दगा ॥ १०॥ 


~~ 


राजोषान्व 
तैषां महासमनां रान्ना कोड्टुयास्यति मदिधः | 
तंस्याप्यु्ृषटवेष्टानां वेषटापरु्मवान्‌ भवेत्‌ ॥ ७॥ 
तच्छ यतां परतिज्ना या साम्प्रतं क्रियते मया | 


३८६ । माकैर्डेयघुराण ,  श्र०१२० 


। माक॑रुडेय उवाच , | माक॑रुडेयजी वोक्ञे-- ` 
ति प्रतिङ्गय षच; क्ुपस्तत्‌ कृतवांस्तथा ! ¦ ` राजा चुप ने अपनी इस. भतिश्षा के अ्रचसार 


[स्यापाते स ॒यत्गस्रीनयजद्यजतां वरः ॥११ ||| अकाल पड़ने परः तीन तीन शरे्ठ यज्ञ जयि ॥ ६९ ॥ 
इ 


तत्राह्वएः तै मो ब्राह्मणों ने जो. कर पदिले राजा को दिया था 
; युराा्ञामददद्यन्च १ फम्‌ । _ | वही महाराज े गो ब्राह्मो को दोन मंदे दिया 


1वत्सहूल्यमदाद्वि्तमन्यद्वोनाह्यणाय सः ॥१२।॥| ॥६२॥ उनके पमथा नाम पत्ती से एक पुज बीर 
[स्य पुत्रोऽमवद्रीरः भरमथायासनिन्दितः । नामक हुए जिनक्ता ष्वरित्न निन्दा रहित था तथा 
पस्य मताप-शौ्याभ्यां कृता वश्या महीभृतः॥१३॥ 1 भ्रताप से ध ० 
स्यापि नन्दिनी नाम वैदर्भी दयिताभव्‌। 1 
विवशं तनयं तसां जनयामास स भयुः ¦ 1 
धिरविशे शासति महीं महीपाले महौजसि 1 | राजा विविंश पृथ्वी का शासन करने लगे तच उन 
पहीतलमभूदरयाभ्नं निरन्तरतया नरैः ॥१५।॥ तेजस्वी राजा के शासन मे समस्त पृथ्व पर भजा 
ववं काले पञज्जन्यो मही शस्यवती तथा | ने खुल शांति का ्रयुभव क्रिया ॥ १५॥ उनके 


वाति शाखन मे समय पर षां होती, खुन्दर श्रौपधियां 
एफलानि च शस्यानि रसवन्ति फलामि च ॥१६।॥| पृथ्वी से उत्प होतीं, लू फसलें ोतीं नौर फल 


रसाः पृष्टिकराथासन्‌ पुष्ि्नेन्मादकारिणी ! | रखदार उत्प होते ॥९६॥ वे रख पुट करे बाले ` 


। गी होते थे परन्तु वद पुष्टि उन्माद पैदा न करती थी । 
ल वित्तनिचया छृणां प्रभूता मदहेतवः ॥१७ | लोगों का धनैश्वर्यं उनके मद का कारण न होता 


तत्पतोपेन रिपवो भयमापुमेहाषने । | था ॥९७॥ उनके ताप से शुरो को भय लगा 
स्वास्थ्यञ्च नः सुदृद्गो यदमिष्टाभिरिकाम्‌ ॥ १८। | स्ट 8 र 1 | 
स॒बहन्‌ स्वस्थ रहते ॥ १८.॥ राजा विविंश बहुत से यज्ञ + 
धा ति [1 मेदिनीमू्‌। करके तथा भली भाँति पृथ्वी का पालन करके 
सगरा नं माप्य शक्रलोकमिततो गतः. ॥१६।॥| संग्राम मे सृत्यु पाकर स्वरग-लोक को गये ॥ १६॥ 


इति श्रीमाकंर्डेयपुराण मे विर्िंश चरित्र नाम ११९बँ अध्याय समाप्त । 


-> >>, ८< - 
एकसोबीसवां अ्याय 
माकरडेय उवाच | माक॑रडेवजी वोत 
तस्य पुत्रः खनीनेत्रो महावलपराक्रमः ) | राजा विवश के पुत्र खनीनेन्न वड़े वली श्नौर 
यस्य यं्ञेष्वगायन्तं गन्धव्वां विस्मयान्विताः॥ १।, पराक्रमी हप । उक यज म गन्धवा ने निस्मित 
खनीनेत्रसमो नान्यो शचि यज्वा भविष्यति । होकर यह गाया ॥.९॥ खनीनेत्न के समान पुंथ्वी ६ 


५ पर दख यज्ञ करने वाक्षा राजा न दोगा जिसने " 
तेन यायते पूरणं दत्ता पृथ्वी ससागरा ॥ २॥ दख हञ्ञार यज्ञ समार करक ससुद्र सदित सम्पूणं 


द्त्वा च सकलां पृथ्वीं ब्राह्मणानां महात्मनाम्‌ । | पृथ्वी दान कर दी ॥ २॥ उन्होने सम्पूखं पृथ्वी को. 
तपसा -्रन्यमासाच मोचयेत्‌ साधितेन यः ॥ ३ ॥| मदात्मा ह्मणो को दान मे देकर तपस्या द्रा 


यतश्च पराप्य वित्तद्धिमतुलां पुनः व्य भाक्त कर पृथ्वी को किर जेलिया ॥२॥ - 
जगरहुर्ाह्यणा विष नान्यरा्ग व । उस धनैश्वर्य को जो कि राजा ने दान मे दियारा 
न ` बतग्रहम्‌ ॥ ४ ।| भ्र कर ब्राह्मण लोगों ने भिक्ताडृत्ति छोड़द॥ ४॥ 


."-षपष्टसद्नाणि समृषष्टिशतानि च । | महाराज खनीनेव ने सडसछ दज्ञार, खडङ्सट सी 


० १२० माक॑एडेयपुराख । १ 


सप्तपष्ट्च यो यज्चानयनद्भरिदक्षिणान्‌ ॥ ५ ॥ ओर सड़सट कल इतने यज्ञ कयि , ओर ““ : 4 
। को थचुर दक्तिणा दी ॥५॥ दे मदासुनि ¡ वद « 
अपुत्रः स महीपालो मृगयाुपचक्रमे । अषु थे, श्रतः उन्दने पुत्र-प्रासि के लिये ˆ ८५४ 
९ । का विचार सिया श्रौर यज्ञ के लिये “. 
पुत्राथं पितृयज्ञाय मांसकामो महान ॥ ६ ॥| लाने के निमित्त राखेट करनेका विचार करिया ६॥ 
शशादो षिना सैन्यमेक एव महावने । घोड़े पर व होकर पिना टी सेना के कवच 
"वा लित्ाणो कर श्नीर धनुषवाण खड्ग दाथ मे सच 
` बद्धगाधाङ्यु वाणखद्गधयुद्धरः ॥ ७।|| बे महावन मे प्रविष्ट इए ॥७।॥ जवकिवे मोड ह 
तं ब्राहयन्तं तुरगमन्यतो गहनाद्नात्‌ । 


दौड़ते हए चले जारहे थे उस समय एक दुसरे 
गहन वन से पक हरिण निकला श्नौर उनसे वोला, 
विनिष्कृम्य मृगः माह मां हत्वाभिमतं इर ॥ ८ ॥ 
यजोवाच 


"मुके मार कर आप अपना कार्य खाधिये ।"॥ ८॥ ` 
न्ये मृगाः पलायन्ते महाभीत्या विलोक्य साम्‌ । 


राजा वो्ेः- । 
दूसरे रिण तो सुभे देखकर डर से भाग । 
कथमातरदानं त्वं मृत्यवे कलभिच्सि ॥ ६ ॥ 
मृग उवाच 


जाते ह । त॒म किस कारण गया के देतु श्रात्म , 
ञपुत्रोऽ्ं महाराज था जन्ममयोजनप्‌ । 


खमर्षर कररहे दो १॥६॥ 
सग वोलाः- 
विचारयन्‌ न पश्यामि प्राणानामिह धारणम्‌ १०॥ 
माकरडेय उवाच 


हे महाराज ! मे निपुत्री है, धस कारण मेर 
श्रथाभ्येत्य भृगः पराह तसन्यो वसुधाधिपम्‌ । 
/ मृगस्य तस्य ॒रसयक्षमलमेतेन पार्थिव ॥११॥ 


जीवन वृथा है, इस संसार मे अपने भाणोके रखने 
की सुमे कोई श्रावश्यकता भतीत नदीं होती॥१०॥ 
मार्करडेयजी वोल्ते-- 5 
इतने मे दी पक दुखं मूग रजा क पास 
श्राक्षर बोला, “महाराज । इसको न मारिये" ॥११॥ 
~ घातयसति ० 
घातयसेति मां मपिर्भमकम्मे समाचर । 
यथा कृतार्थता ते स्यान्मम चाप्युपकारि तत्‌ ॥१२ 
पुत्रां तं महाराज स्वपितन्‌ यष्टुमिच्छसि । 
ञ्रपतरस्यास्य मांसेन लप्स्यसे वाञ्छितं कथम्‌॥१३॥ 
याद्‌ कमै विनिष्पाच तादगृह्ययुपाहरत । 


मुभ मार कर मेरे मांस से अपना कार्य कीजिये 
लिखसि कि ्रापके कार्य मे सिद्धि दो शरीर मेरा 
दन्नं सुगन्ानां गन्धङ्गालविनिणंयः ॥१४॥ 
राजोवाच 


भी उपकार हो ॥१२॥ हे महासज ! आप पुचप्रापि 
के लिये अपने पितरों का यज्ञ करना चाहते हे, 

वैराग्यकारणं प्रोक्तमनेनापुत्रता मम । 
~ कथ्यतां भराणसन्त्यागे यत्‌ ते वैराग्यकारणम्‌॥१५॥ 
६ 


इख शग ने वैराग्य का कारण सुभे ्रपुनता 
बताई, अव ठम्दारा पराण त्यागने मै क्या वैराग्य 
काटेतु है वह कदो ॥२५॥ 
सृग वोलाः- (ता 
ह राजन्‌ ! मेरे बडुत से पृ श्रौ पुत्रियां ट 
उन्दी की चिन्ता रूपी अधि मेँ मै जला करताहं 
॥१६ हे नरेन् ! खग जाति को सव लोग अपना 


रेत दशा मै इस निपुत्री खग के मांस से श्रापक्रा 
सरग उवाच 


कार्य किस प्रकार सिद्ध दोगा ॥ १२॥ तैसा कमे 
हो उसके लिये वेसा दी चव्य उपस्थित करना 
चाहिये । दुर्गन्ध से कभी सुगन्धि की प्राति नदीं 
दो सकती ॥९७॥ 
सजा बोले 
वहवो मे सुता भूप वहो दुदितरस्तवा । 
यचचिन्ताटुःखदावाग्निव्वालामध्य वसाम्थहम्‌)।१६॥ 
सव्वसाध्या नेर मृगजातिः सुकातरा । खाघन चना क्ञेते द तथा यद छ्यति निर्बल है शस 
तेष्वपत्येषु मे चातिममतं तेन दुःखितः ॥ १७ कार्ण सुभे श्यपनी सन्तान का वडुत ख्याल रहता 
मनुप्य-सिह-शदुदूल-हकादिम्यो विभेम्यहम्‌ । | है शरोर इसी से भर दित हं ॥१०५.९ भमो ! चूकि 


. ३८८ भाकेरुडेयषुराख ` श्रं०.१२० 


दर्शि सव जीघों से याँ. तरक कि कुरो श्रौर 
ीनाद्यत्‌ सव्वसतवैभ्यः एव-भृगालादपि भमो॥१८ सियार से भी कमज्ञोर है मै मचघ्य, सिह, चीता, ` 


निमित । यन्या व मेडिया श्रादि सवसे डरता रहत ॥१८॥ इसलिये 
गोश नि बन्धूनामिमां (न्या वछुन्धराम्‌ । | ञं अपने वाल व्यो जौर भाई बन्धुश्च. के निमित्त 


र सर््वामिर | षड्‌ यह्‌ चाहता ह किये मडष्य छर सिह ्राददें के 
्-सिंहादिभयात्‌ सत्वामिच्यामि सुभृशं सकृत्‌।॥१६| मय से रहित हो ॥ २९॥ ससे खग थास खाते ह 


घ्नो ~ 
पृणान्यन्येऽ न्ति गोऽनाबितरगादिकाः । | उसी तरह, गाय, वकरी, मेङ्‌ छरौर घोड़े भी घास 
। पि खादन्ति गो ठ्रगादि खाते है शसत्िये मेरी इच्छा यह रहती दैकि 


तस्तिषां पोषणायाहमिच्यामि निधनं गतान्‌॥२०॥॥| मडप्य इन दूसरों पथश को दी सारा कर, मृगं 
को नहीं ॥२०॥ जव मेरे पुत्र, पौचादि श्रलग होकर 

निष्करान्तेषुं ततस्तेष ममापत्येष्‌ वै पृथक्‌ | | चस्ते के लिये निकल जाते है उस्र समय उनकी 
किः रज्ञा के विचर से मेरा चित्त वडा चिन्तित रहता 

भवन्ति चिन्ता; शपशो ममस्वाहतचेतसः ॥२१॥ दे॥ २९॥ कदी मेरे पुत्र किसी व्याध के पा भेन 
कि कूटपाशं किं वज्र वागुरां दि सुतो सम॒ 1 | फंस जय चथवा किंसी पेे वन मे चरते हद न 


नर ध १ चके जाय जहां कि वे मनुष्य या सिहकेवशमे 
रापनधरन्‌ बने किं वा च-सिंहादिवशं गतः ॥२२॥ हो जाय यही चिन्ता रहती हे १२२॥ ` जिस वन मे 


्राप्रोऽयमेकः सम्पराप्ास्तेऽवस्णां कीरशीं मम । किन पक हं बद्ध तो मेरी यद्‌ दशाहै परन्तु जिस 
पास्तं विचरन तो घं ये गताः सुमहावनम्‌ २३) ए्वश्षाल्ल चल म वे सव होगे वहा द्या दश होगी ॥ 


1 
षा तान ममाभ्यासमहं तानालमनान्‌ डप | | बाते (५ ५ क ० 
रषदुच्छवसितः पेममिच्चामि रजनीं एनः ॥२४।| उनी मडलनकासना किया कसा ह २७॥ भात, 


परभाते दिवसं ॒कषेममस्तगेऽके निशामपि | | सन्ध्या, दिन, रानि भत्येक समय भँ यदी सोचता 
वाञ्छाम्यहं कदा कषेमं सर्वकालं भविष्यति ।२५।॥| रहता ह कि उनकी शल किस अकार रे ॥ २५॥ ˆ 
एतत्‌ ते कथितं भूष॒ ममोद्वेस्व कारणम्‌ | | दै राजन} यड शने आपसे अपने उद का कारण 


कला, रब श्रापए पेखी छपा करं जिससे किं आपका 
तः पसादं इर मे बाणोऽयं पात्यतां मयि ॥२९।| चह ना मेरे ऊपर गिरे ॥ २६॥ हे राजन्‌ ! जिस 


इपि दुःखक्षताव्िष्टः भराणानपि त्यजामि यत्‌ ! | क्लिये कि मै डुःखित होकर इन भाश को त्यागा 
तत्कारणं निवोध त्वं ब्रुवतो मम पार्थिव ॥२७।॥| चाहता ह उसका कारण समसे खनो ॥ २७॥ दे 


म ! जे लोग आत्मघात करते हँ वे श्सूर्यानाम 

द्मसूय्या नासते गच्छं 1 : ॥. 
प {पत त्त्रा यान्‌ गर स न | लोकौ को प्त होते ह छ्मौर यज्ञ के उपयोगमे ये 
यज्ञ।पयुक्ताः परावः सम््यान्त्युच्छताः; भ्रम।॥ २८ | इप्‌ पयु उत्तम गति को प्राप्त होते है ॥२८॥ पदिले 


प्रधिः पद्युर भूत्‌ पथं पशुरासीन्जलाधिपः | यि, चर्ण श्रोर सूयं पथु ये परन्तु यज्ञ मे वधको 
मस्वरानयोच्छितीः भप्तो यज्ञे निष्टाुपागतः॥२६)५ भा टकर वे उच्च गति को पड ॥२६॥ हे राजन्‌ ! 
तन्ममेतां दवा कृतया नय मघुच्छितिं प । इसलिये मेरे उपर कृपा करके सुको वध कीजिये 


जिरूखे म उत्तम सति को परच्‌ श्रौर श्राप पुत्र \ 
आत्मनशेप्सितं कामं पूत्रलाभादवाप्स्यसि ।३०॥ प्राप्त करं ॥ ३० ॥ भ त 


पूववंस्रग उवाच पिला सग चोलाः ५, 
राजेन्दु नेप हन्तव्यो धन्योऽयं सुकृती मृगः.। दं राजन ! इस पुख्यवान्‌ शग को न मासि 
यह धन्य हे कि इसके इतने पु है । राप तो.मुक 


वहवस्तनया यस्य॒ हन्तव्योऽदमसन्तततिः ।॥२१॥ चिना पुत्र के सरग का वध करे ॥२९१॥ 
उन्तरण्ग उवाच | दूखरा खग वोला | 


कदेहभवं {खं धन्यः = ध 
-एकदहभवं यस्य दुःखं धन्यः से वें भवान्‌ | जिसको एक शरीरः का ही दुःख ` है. चह धन्य ` 


भ्र० १२१ ` माक॑रडेयपुराणए ३८६ 


वहूनि यस्य देहानि तस्य दुःखान्यनेकधा ३२] ॥ ६। जिसके अनेको वेद द उसके दुःख भी अनेकों 
| दारज्वर्मणकथातो सुमे श्रपने शसीरकादी 


एको यदाहमासन्तु भाक्‌ तद्‌ देहनं मम । | दुप्ठ या षिन जव मेरी स्री छा तव बही मेरा 
दुःखमासीन्ममल्ये त॒ भा्यायास्तदं भृद्‌ दिधा॥२२॥ भ्ल दुगना सोगया ॥दशापरम्तु जय सरीसे मेरे पुत्र 
यदा यातान्यपत्यानि तदा यावन्ति तानि ष। पुन्या उत्पन्न हुए तव उसो प्रकार मेयद्‌ ख 
तावच्छरीरभभीणि मम ॒दुःखान्यथाभवन्‌ ॥२३४॥| वदता गया ॥ ३४ ॥ तुम घन्य हो फि तुमको इस 


सकृता्थो भवान्‌ यस्य नातिदुःखाय सम्भवः । संसारं तु र ५८ ५ 1 जने ह 
इस लक श्रौर परलोक दोनों मे दुखदाथी है ॥ 
१६ दुःखाय म॒तिः परत्र च परिरोधिनी ॥२५॥| चूंकि रँ शरपनी संतान की रकता नोर पालन आदि 


यतो रक्षणएपोपा्थमपत्यानां करोमि तत्‌ । की चिन्ता म लगा रहता हृं इश्चलिये हरिस्मरण 


चिन्तयामि च सम्भृतिस्तेन मे नरके धवा ॥२६॥ न करने के कारण श्रवश्य नरकमे जाड गा ॥ ३६॥ 
| साजोधाच्च राजञा वेल्े-- 


न यबि भिं सन्ततिमान्‌ धन्योऽ्रोऽवर कं गग । ।. दे गो नदीं जानता नि. ठम दोनो 
| धत्य कौन दै सन्तति घाल्ला या निपु्ी । परन्तु 


पत्ार्थश्चायमारम्भो मम दोलायते सनः ॥२७]। पुत्रास के क्तिये सृगका वध करने को मेरा चिन्त 


स्थिए् नहीं ॥ ३७ ॥ यह खत्य है कि सन्तति दस 
दुःखाय सन्तति; सत्यमेरिकाशुष्मिकाय तत्‌ । | लोकत रौर परलोक मेँ दुल का कारश है। तथापि 


तथाप्यतनयान्‌ यान्ति छणानीति श्रतं मया।।२८॥ सने सुना है कि निपुधी लोग ऋणी रदते.दै॥ ३८॥ 


इसलिये मै रेखा यज्ञ करूंगा कि पुत्र भासिक्रे लिये 
सों पतिष्ये यमृत भािवरधं पग | सरग कावधन करके प्रचरड तपदही करू जेसा 


तपसेष प्रचण्डेन यथा पूष्वेमहीपतिः ॥३६॥ कि पूर्वकाल मे राजाच ने किया था ॥ ३९॥ 
इति शीमार्करुडेयपुराण मे खनोनेत्र चरित्रं नाम १२.०्ब अध्याय समाप । 
~~ भ#दरे-०-€<-- 


एकपोदकीसवाँ अध्याय ^ 
माकरडेय उवाच . माक॑र्डेयजी बोत्ते- | 


| 

परि्ग तीं नन्तः नेन ने पापनाशिनी 
ततः ख रृपतिगत्वा गोमवीं पापनाशिनीम्‌ । इसके श्रनन्तर राजा खनी ५ 
र १११ गोमती नदी के किनारे पर जाकर नियत चि 


तवर एष्व नियतो चत्वा देवं पुर्दरम्‌ ॥ १॥ सोकर इन्द्रदेव की आराधना की ॥ १॥ पुन्न पिं 
तप्यमानस्तपो यतवाक्कायमानसः । | के क्ये महारावे प्राण श्रौर शरीर को निद्र 
तष्टा भयतः शक्रमत्याथं महीपतिः ॥ २॥| करके उतर तपस्या करते हष इन्द्र॒ की स्तुति क 
तस्य स्तोक्रे तपसा भक्त्या चापि सुरेश्वरः । | हे करौष्टकि सनि ! उनकी स्ठति, तपस्या, 
त॒तोप भगवानिन्द्रः प्राह चैनं महाधने ॥ २॥| भक्ति से प्रसन्न होकर इनद्रदेव ने महाराज 
अनेन तपसा मत्या स्तोतरेणोशवारितेन च । | कदा ॥ ३॥ आपडे भक्त पूवैक तपस्या रीर सत ॥ 
परितुष्टोऽस्मि ते भूप व्रियतां भवता षर; ॥ ४।॥| करने व संद है । श्राप वर मौगिये ॥ ४॥ || 
राजोवाच राजा चन्ति ३ 
अर्य इलो मे सवशसमृहा वरः । |, = सिसता त 


सदा चाव्याहतैश्वस्योः धर्माषदढधस्मविद्‌ इती॥। ५।॥ ज्ञानी ओर पुए्यात्मा दो ॥५॥ 


२३६० 


माकेर्टेयपुराण 


अ० १२१ 


_-___ ~~~ 


५ माकरडेय उवाच 

तयेति चोक्तः शक्रेण राजा प्राप्रमनीरथः 
प्रनाः पालयितुं भप आजगाम निजं पुरम्‌ ॥ 8 ¦ 
तत्रास्य कुव्वती यज्ञं खम्यक्‌ पालयतः प्रजाः । 
श्रनायत सुतो पिपर तदा शक्रमसादतः ॥ ७॥ 
तस्य नाम पिता चक्रे बल।श्व इति भूपतिः । 
ग्रस्म्राममरोषश्च ग्राहयामास तं सुतम्‌ ॥ ८ ॥ 
पितस्य॑परते पिभ सोऽधिराज्ये स्थितो दषः 
स॒ वक्लाश्चो वशं लिन्ये सुवि सन्वमरीकषितः ।॥ ६ ॥ 
करश्च दापयामास सारग्रहणपूल्वंकम्‌ । 
प॒ सव्वंभूमिपान्‌ राजा पालयामास च परनाः॥१०॥ 
श्रथाखिलनरेन््रास्ते दायादस्तस्य दुस्मदाः 
न चाभ्युत्थाय सततं ते चास्मे प्रददुः करान्‌॥। ११. 
वयुसथिताः स्वेषु राषटषु न सन्तोषपरास्ततः। 
धुवं तस्य सरेन्रस्य जग्रहुस्ते नराधिपाः ॥१२॥ 
ष॒ गहीत्वा स्वकं राज्यं पृथिवीशोऽवलो यने 1 
तस्थौ स्वनगरे भपर्विरोधो वहुभिः कृतः ॥१३॥ 
पमेत्य सुमहावीर्या; ससाधनधनास्ततः । 
एरुधुस्तं महीपालं पुरे तत्र॒ नरेश्वराः ॥१४॥ 
पुररोभेन तेनाथ पितः स॒ महीपतिः) 
स्वस्पकोषोऽट्पदरूडथ वे्छव्यं परमं गतः ॥१५। 
अपश्यमानः शरणं सवललो द्विजसत्तम । 
कसौ युखाग्रतः छता निशश्वासात्तंमानसः ॥१६॥ 
ततोऽस्य हस्तविवरान्धुखानिलसमाहताः 
निज्जेगुः शवशो योधा रथ-नाग-तुरङ्गमाः ॥१७॥ 
ततः क्षणेन तत्‌ सव्वं नगरं तस्य भूपतेः । 
व्याप्रमासीदलीपेन सारेणातिवलान्धुने ॥१<) 
ग्रथ सोऽतिवलोपेन महता तेन संतः 
निर्गम्य नगरात्‌ तस्मात्‌ तान्‌ विजिग्ये नराधि;१& 
जित्वा च वशमानीय चकार करदान्‌ पुनः| 
यथा पूव्यं महाभाग महाभाग्यो नरेश्वरः ॥२०॥ 
धुतयोः करयोर्जज्े यतस्तस्यारिदाहदम्‌ । 
घलं करन्धमस्तस्पात्‌ स वलललाश्यो ऽभिधीयते ` २१॥ 
स॒ धर्म्मात्मा महात्मा च स मेः सर्व्वजन्तुषु । 


) 
= अक, 


[1 


माकंर्डेयजी वोकज्ते- 

इन्दर ने कटा कि पेखा दी .टोगा श्रौर राजा भी 
अपना मनोरथ प्राप्तकर प्रजा पालन के लिये अपने 
नगर मे राये ॥ ६॥ हे विश्र } बद्य यज्ञ कस्तेश्नौर 
भली भांति भजा का पालन करते हए राजा खनी 
ने के इन्द्र की पासे एक पुत्र उत्पन्न ह्या ॥ ७ ॥ 


राजा ने उसका नाम वलाश्व रक्खा, श्रौर उसको > 
सम्पूणं अख, श्स्रोकी विया पठादी॥प८॥दहे-. 


विप्र ! महाराज खनीने्न के भरने पर वलाश्व राजा 
हप जिन्होने कि पृथ्वी के सम्पुणं राजार्रौको पने 
चश मे कर लिया ॥ ६ ॥ महाराज चलाश्व ने सच 
राजां से कर वसूल किया तथा प्रजाका पालन 
किया ॥ १० ॥ परन्तु क्छ काल वाद उन राजार्थो 
ने तथा अन्य कर देने वालों ने मदोन्मत्त होकर 
वलाश्व को कर देना वन्द्‌ कर दिया ॥ ११॥ उन 
राजाश्रों ने ्रपने ्रपने राज्यों पर सन्तोष नकरके 
महाराज वल्लाश्व का राज्य दधीन लिया ॥ १९॥ हे 
सुनि ! परन्तु महाराज चलाश्व ने श्रपने राज्य को 

; वापिस क्ते लिया च्रौर राजाश्नों के अत्यन्त 


विरोध करने पर भी वे पने नगर मे सज्य करने .. 


लगे ॥ ९२३ ॥ परन्तु फिर उन पराक्रमी राजा ने 
नेको साधनों से युक्त होकर बहुत-सी सेना 
इकटी री नौर राजा बलाश्च के नगर को धेरलिया 


४ 


॥१४॥ नगरः के धिर जाने से महाराज बड़े कद्ध हुए ` 


तथा खजाना खाली होने शीर प्रभाव कम होने से ` 


मी उन्हे वड़ी विकलता इर ॥१५॥ हः द्विजसत्तम ! 
जव वल्लाश्व को बचाव की कोह सूरत दीखी 


तव वै दुःखी मनसे अपने सुल पर दोनों हाथ रल 


कर लम्बी लम्बी श्वस लेने लगे ॥ १६॥ फिर 


महायज वलाश्वके मुख की वाथू से उनकी ँगु- - 


लियो के वीच दी जगह से सेक योद्धा, रथ 
दाथी ्ौर घोड़े निकल पड़े ५ १७॥ हे सुनि ] फिर 
तो उन महाराज वलाश्व का नगर एक वड़ी सेना 
खे व्याप होगया ॥१८। तव वे उस विशाल सेना 


को ज्ेकर नगर से वाहर निकत्ते ओर उन शचश्मों “ 


को परास्त किया ॥ १६ ॥ फिर वडभागी महाराज ,. 


वल्लाश्व ने उन राजाश्रो को जीत कर उनसे पषिले 


की भोति कर वसूल किया) २०॥ कंपते हप ` 


उनके हाथो से जो शचश्रों को दग्ध करने वाली 
सेना उत्पन्न हुदै थी इसलिये वलाश्व को करन्धम 
भीरा जाता दहे ॥२१॥ महाय करन्धम वड़े 


धमात्मा, महात्मा तथा सच जीवां के मिन होकर 


अ° १२२ माकंर्डेयपुराण ३६१ 


तीनों 9६8 
कर्पमोऽमवदपिषु लोकेषु ॒पशूुतः ॥२२।] सीन लो सयात य ॥ २९॥ बद सेना जो 
सम्भार्य परमार. ददावरिषिनाशनम्‌ । व पथ पी स 
बलं धम्मण चाक्षिप्तमभ्युपेत्य खयं दप; ॥२३॥ मे ही विलीन दोगई ॥२३॥ ` 
इति शीमाकंर्टेयपुराण मे करन्धम चरित नाम १२१ अ० समाप्त । 


एकसोवाहसपां अध्याय 


भाकक॑रडेय उवाच माकरुडेयजी बोत्ते-- 
मीय्यचनद्रुता सुभूर्वीरा नाम शभवता । राजा वीरययचन्दकी शभवतवाली श्रौर सुन्दरी 


यवर 0 पु वीरा ने स्वयम्बर मे महाराज करन्धम को 
स्पव्र सा नशे महारानं करन्धमम्‌ ॥ ‹ वरण द्विथा ॥ १॥ महाराज करन्धम ने उस पल्ली 
तस्यां पत्रं स राजेन्द्रो जनयामास पीय्येवान्‌। | चे एक पराक्रमी पुत्र उत्पन्न किया जिसका नास 
अरवीक्षितमिति सख्यातिष्ुपेतं जगतीतले ॥ २॥| इस प्रथ्वी पर अवीित ्रसिद्ध इरा ॥ २॥ उस 


दे्रारपच्छत । पु के उत्पन्न ने पर राजा नेज्योतिपि्योते पूषा 
नाते तस्मिन्‌ सुते राना स दैवकनानपृ कि मेरा पु प्रशस्त नक्त शौर लपन मै पैदा हा 


पचत्‌ मशस्तनक्र शस्ते छतो मम्‌ ॥ २॥| या नहीं ॥ ३ ॥ तथा मेर गुज का जन्यस्थान शम 
कचचिच्चालोकितिं जन्म मस पुत्रस्य शोभनैः! | रहो दवारा दण है थवा दुष प्रदो दास यह श्राप 
ग्रहः कच्चिन्न दष्टानां अरहाणं सक्‌पथं गतम्‌ ॥ ४ ॥| लोग वतारे ॥ ४॥ राजा ॐे षस भकार कने पर 
युक्तास्तेन दैव्ास्तमूचुदर पतिं ततः । | ज्योतिषिय ने उनसे कदा, “ देमदाराज आपका 
शस्ते धततं नक्षभे रमे चेव एुतस्तव ॥ ५॥| यह पत्र मशस्त सुहत, नतन श्रौर लञ्च मेँ उत्पज 
सुयतो महावीर्यो महाभागो महावलः । हुश्रादै । यदह अत्यन्त वलवान्‌, भाग्यवान्‌, पराक्रमी 


तनः ॥ ६॥ श्रौर राजाश्चो मै महाराजा होगा ॥५-६॥ बृहस्पति 
भविष्यति महाराज महाराभस्तवातमनः ॥ ९ श्रोर शुक्र इसके सप्तम स्थान मे तथा चन्द्रमा 


भवेत देवाना युर + + पमः । ्वतुरथं स्थान मेँ इसको देखते है ओर इसकी रक्ता 
सोमशतुर्स्तनयं तवेनं॑ समपेक्षते ॥७।॥| करत ह ॥ ७॥ दशम स्थान भ स्थित दोकर घुध 
उपान्तसंस्थितश्चैव सोमपुत्रोऽप्ययक्षते । | इसकी रक्ता करते है । सूयं, मङ्गल श्नौर शनैश्चर 
तावक्षतेमं सविता न भोमोन शनैथरः ॥ ८ ॥ श्रादि पापग्रह दइसके जन्मस्थान को नहीं देखते 
तव प्रं महाराज धन्योऽयं तनयस्तव । | ह ॥ ८॥ हे महाराज ! ्ापका य पुत्र धन्य दै । 
सर्व्वकस्याणसम्यत्तिसमवेतो भविष्यति ॥ ६ ॥| यद क्यारा शौर सम्पत्ति से यक दोमा ॥ ६॥ 
माकंरडेय उचप्च माकैरडेयजी तोले-- 

इति दैवज्ञवचनं निशम्य वूपुधाधिपः। अ्योत्तिषियो के यह वचन सुनकर महाराज 
रषपणमना; माह निजनस्थानगतस्तदा ॥१०॥ कर्थम सच्च चित्त होकर बोले ॥ १०॥ चकि 

कषतेम ¡ . गरू सोभयुतो बुध; । बदस्पति, शक श्रौर बुध इसको देखते है ओर 
भरवेक्षतेमं देवानां ` गुरु सोमछता बुध, 

म सिनं ¦ | ११ स, शनिश्चर श्रौर मङ्गल नदीं ॥१६॥ देखते पेखा 
ना्ैकषतनमादिरयो नाकंसूतुनं भूमिनः ॥१९॥ ॐ“ क ध 
्रवेक्षतेति यद्‌ परोक्त भवद्रिवहुशो षच { | श्राप लोग कते ह इसतलिगे इसका नाम रवीति 


्रवीक्षितैति तेनास्य ख्यातं नम भविष्यत्ति॥१२॥ प्रसिद्ध दोगा ॥ ९२॥ 


[दयं 


्रचग्राममरेषं स॒ कंण्वपुत्रादया ग्रह 
घ स्पेणाति भिषजौ देवानां पार्थिवात्मनः 


दधया वाचस्तिं ऋन्त्याशशाङ्कं तनसा रविर्‌ १४ 


रव्येणाच्धिं ठथोर्व्वी्च सहिष्छतन वीस्यवान्‌ । 


9 व ; 
हव्यैर न समस्तस्य कथिदासान्महात्मनः ॥१२]} 


लयंवरे तं जणे वेमधम्पात्मजा वरा । 
पुदेवतनया गारी सुभद्रा उल्िनः रुत ॥१६ 
हीलए्वती वीरसुता वीरयद्रुतानिभा । 
रीमा्मजा मन्यती दस्म 


माकंर्डेयघुराख 


द्र [१द 


कषद 1१७१, 


प्येवं नाभिनन्दन्ति स्वय्रकृतक्षणाः। | 


०९१२२ 


चैर बरदा 
स्स केम स्तम्पृद् 
साला । {३ क्ह 


#| 
[न 
41 | 3? 
व 2, 
44 थ 


7 
५ 1 
<) 
„ | १४ 
पः 
4 ; 
११ 


सूरं कः सरमानश्रा , 
क्ते समानः सहिष्णुता - 


मे श्रध्वीदे सान था ओर दीरता यें उसके समान 
पृथ्वी पग ङोङ्न वथा १५॥ स्वयस्बर मे टेमधमं 
की कल्या वरा, खुदेच इी गौरीं श्रौर वलि 
चती कन्या घुभद्राते उसको वस्स क्रिया॥ १६॥ 


न्या दीक्लाल्ती, वीरसद्र ङी एनी निमा, . 
प कन्या मान्यदती. दम्ब की पुनी छमुदती 

७! स्वरम्यसे में अवीत्तित्त को अपना पति 
चुना च्मैर अवीक्चिव ने उनको वलपृर्बैक गहर 


ष्य 


तधापि स॒ वल्ला्रयो नग्राद दरप्तः सत्तः | १८] क्त्य (3 खद पत्नियोक्रो उरसंन उव राजास्मा 


नराकरत्य ठृपान्‌ सव्वोस्तासां पिवृङ्लानि च। 
ठकं हि शरीयव्यसाभित्य वलवान्‌ स वलोद्धतः.१६॥) 
एकदा त॒ विशालस्य वेदिशाधिपतः सुताम्‌ । 
[शालिनी च सुदतीं खयंवरद्धतक्षणाम्‌ ॥२०॥ 
[रिभेयाखिलान्‌ भृशन्‌ खेच्छया त इतस्तया | 
लाञ्जग्राह पिपपं यथान्या कमन्छितः ॥२१।) 
[तस्ते भभतः सव्ये वह्रश॒स्तेन मारिता] 
नेरङृताः सुनिच्िख्णा ोचुरन्योन्ययाङ्घला२२ 
मतं ललनामेतायेक्रस्पादवलभ्रालिनाम्‌ ! 
हूनामेकवर्णानां जन्म पिन्धो महीगतम्‌ ॥२२॥ 
पियो यः क्षतन्राखं वध्यमानस्य दुस्पेदैः | 
सोति त्तस्य तताम दयेव्ये हि बिभ्रति ॥ रणो 
्रात्मनोऽपि कतत्राणं दृषटादस्मादङव्वतराम्‌ । 
पचतां क्षत्रियङ्घले जातानां रीव्शी सतिः ॥२५]] 
एवाय्यते स्तुतियां च शरूत-मागध-वन्दिभिः 
¶ सत्वा सा इृथा वीरा भक्तरिषिनाशनात्‌॥ 
परतां मा घृयवंषा मृपदन्दो दियन्तरः 
(स्षाश्रयिखः सव्वं विशिष्ट्लसम्भदाद्‌ ॥२७॥ 
बेभेतिं को न मरणात्‌ का युद्धेन पिनाऽमर्‌ः।! । 
बरेचिन्त्येतन्र हातव्यं पास्षं शत्धटत्तिभिः ।२८! | 
तन्निशम्य ते भूपा विस्यष्टामपधूरिताः। - | 


न 1 


[1 


< ~~ = ° ~+ 


पत्नियों क पित्पश्ों के कुल चालं को अपने 
परात्रमे से परास्त ऋरक्ते ग्रहण क्रिया ॥६६॥ एकं 
वार छयीन्नित ने वैदिश के राजा विशाल की एची 
वैशाल्िनी को स्वय्रम्बर मे देखा ।॥२०॥ हे क्रौण्कि. 
जी! उख चन्या सव राजाच्या की उपेत्ताकी . 
ञ्नौर जव वट @र्वक्तितको भीन वरकते दृसरे की 
च्नोर की तव वीक्षित ने उसको वल पूर्वकः 
पकड़ लिया ॥२९॥ इख प्र्ञार अपमाचित दयेकर वे . 
राजा वडुत डुः इ ओर व्याकुल दाकर रपस. 
मे प्क दृखरे खे कहने लगे ॥ २२॥ चम वलवान्‌ 
च्च्यो क होते इए यदि इख भकार इस लकना 
हरण दोजाव ओर हम हर्य करलेचाले के 
चमा करटं तो ह्मःरे जीवन को धिक्कार है॥ २३॥ - 
चचिय वदी हैकि जो अन्याचियों से पीडित 
स्युष्या का जार करता दहै) जो पेखा नीं करता 
ह उखक्ा कविय नाम चथा है [रछा जो इम लोगों 
इस दृ से अपनी रक्ताचकी तोक्तत्रिय कुलः 
म उत्पन्न हम लोयां की मतिञणहो र्षदहरेख 
जानना खाय स्थी क हमारा स्तुतं सूत, 
सागधं च्यौर वन्दीजन करते ह वह सत्य द्योते हुए 
भीरसवरीकोन मारनेसेच्चथा द्योजादमी धरश्षा 
हम लोग चीर हं आर स्व सभ्य इलमे उत्पन्न 
ष्देन्दिगान्तरों मे हमारा सन्य पला हुश्च 
सच त्तं च्या इव्या चाहती है ्जासंसार 
कौन नदीं मरता है तथा युद्ध न करते पर भी 
न ्यसर रहेगा यह विचार कर क्तव्िंयों कोः - 
छोड्ना चाद्ये गस्य वह खुनकर वे ` 


( 


क नि 


[ज 
पुख्पा न 
4 


-अण्‌१३ ५० . भाकरदेयषुराण , ३६३ 


व 3 + सव राजा क्रोध से युक्त दोगये रौर खव {` 
‡ परस्पर प्व सरत्तस्थश् १ ॥२६॥ ६ सव २ 
उड; परस पं सचसुष षायाः ॥२६।| ण 0 
केविद्रथानारुरुहुः फेचिन्नागांस्तथा हयान्‌ । ध तथा धोद एर वैठकर श्चौरं ड». 
प धस उन्मत्त दहो पदल के 
अन्येऽमषेपराधीनास्तयुपेताः | पदातयः ॥२०॥ पहुचे ॥ ३० ॥ दोपल दी अवक्त के '. 


इति श्ीमाकौरुडेयपुराएमे शरवीित चरित्र (१) नाम १२२ अध्याय स० । 
-- स्य" 


एकोतेरंसां चध्याय ^ 
माकरडेय उवाच मार्क॑रुडेयजी वोत्ते- 
इति संग्रामसष्नास्ते भुपा भृषसुतास्तथा । तव बहुत से राजां शरोर रजको > 


निराकृता सुबहुशस्तत्कान्च ; ॥१॥|| संमराम के क्तिथे खुसन्ञित दोकर अनीकतितःके 
सबहुशस्तत्कासव्चाप्यवीक्िताः ॥१॥ सुल गमन किया ॥ १।३ युनि व 


् + =+ | 
पदा चरमूव त क ४ दरण; । , । उस शरफेते राजङुमार का उन वहुत-से राजाशरोके 
एकस्य वहुमिभुपमुपपुत्रवरमुने  ॥ २॥/ साथ दारुण युद्ध हया ॥ २॥ वे सव दुमद होकर | 
तेऽसिशक्तिगदावाण-पाणयस्तं॒सुदुममैदाः। | वलवारःशक्ि.गवा,बाण ्रादि अवीततितपर चलाते 


मिषन्ता ॐ यमसैरसाद | थे श्रौर अवीक्सित भी केले उन राजा से युद्ध. 
रन्तो युयुधिरे तेः समस्तेरसावपि ॥३॥ क र 


स तान्‌ ,. शरशतेररिमेद दरपनन्दनः । | तीब वाणो से छेदा तथा उन राजान ने भीश्रपने 
कृतास्रो वलवान्‌ बणेस्ते च तं बिभिदुः शितैः वाश से वीक्षित पर दार किया ॥४॥ यल 
कस्यचिचिच्छिदेः वाहुमन्यस्य च शिरोधरम्‌ । | छमार श्रमीकतित ने किसी राजा की बाहु, ^..! 


च † का शिर, फिखीका हदय श्रौर किसी का वक्तःस्थलः 
व्या वन्पसन्यं 9 + 
इदि दि्याष च श्स्वताईयत्‌ ॥ ५ ।| काट डाला ॥५॥ उसने हाथियों की सड श्नौर घोड़ों 


करं चिच्छेद करिणस्तुरगस्य तथा शिर! । | के सिर काट इत्ते तथा दुखरे र्थो क धोडं रौर, 
तथान्येषां तथेवाश्वान रथस्थान्यस्य सारयिमू्‌।॥६। सारथियों फो भी मारा ॥ ६॥ शकु के ति इय, 
वांणानापततशत्ो द्विधा वाशैस्तथा द्विषाम्‌ । | बाणं को अरवीकतित ने इकडे टुकड़े कर दिया, 


+ * ति 
चिच्छेदान्यस्य खदगञ्य धसुरन्यस्य ७॥|| तथा उसने किसी के धुप भर किसी की तलवार |“ 
1 व को काट डाला ॥9 राजङ्मार अवीकितने शुभं | 


तलत्रे तेन॒ ननाशन्यो दृपात्मनः की सेनाको नष्ट कर डाला, इद तो उसके वाणो | 
-शवीकषिताहतश्वान्यः पदातिः प्रजहौ रणम्‌ ॥८॥ से मारे गये श्रौर ल युद्ध से भाग गये॥ ८॥ इस। 


हया #कृते तस्मिन्‌ समप राजमएहत्ते | | प्रकार राजङ्कमार से व्याकुल किये जानेपर समस्त 
त्याङलिति न्‌ राजमरुडलं के सात सौ वीर मरनेका निश्चय करके 


1 बीरा ५ तनयाः ॥ ६ ॥ वदाँ श्राये ॥ ६॥ सव सेना के पराजय दोने श्रौर 
. आमिनात्य-बयः-शौरय-लञ्जाभारसमन्विताः } | पलायन करने पर उन घो को अपनी जाति तथा 
निर्जिते सकले सेन्ये परलायनपराये ।।१०॥| पराक्रम पर लजा आहे ॥१०॥ उन सव राजर्च से 


तैः समेत्य महीपालः स तु एतो महीभृतः । | रजडमार अनीदित त ६४ 
। > ६ करने लगे ॥ ११९॥ हे मदाश्रुनि क्रोपकि जी ! जव | 
युधे धम्य, तेन , तेनािकोपितः ॥११॥| कणन द १.१६ कच गये बौर | 


बिच्छित्यनत्र कवचान्‌ स तानपि भावतः | उनके भी मारे जाते की चारी छह रव तैनरुद्ध | 
कनु ्यवस्थितस्तं च ततः करुदध्वा महायुने॥ १२॥ द्चेकर ॥१२॥ ध्र को छोड़ कर अधीत से ५ 
धमुस्छज्य युयुधुयध्यमानेन पभ्मृतः । कि धर्म पूर्वक युद्ध कर रदा था युद्ध करने लगे, 


३६४ माकैरडेयपुराण | भरण १२६१ 


= 


| सरेनदरपुत्राः प्रश्वेद-जलसष्िन्ाननाः सम्‌ ॥ १३।॥ उस सम्य उनके मुख पर पसीना श्रारदा था॥१३] 


अर भ, 


किसी ने उसको बाणो से वेधा शरीर किसीने उनके 
विव्याध कविद्राणोयेः कथिचिच्छेद्‌ कास्ुक्‌। | चुप को काटा । पक कर वरन त जनो 


ध्वजसस्थापसे षौणेरिद्वा भूमावपातयत्‌ \' १५४) को काट कर पृथ्वी पर गिरा दिया ॥१४॥ प्क नीरः 
जघ्ररन्ये तथेघाष्वान्‌ वभज्ञश्वापरे रथम्‌ । ने उनक्ते घोड़ों को मारा, दुसरे नेस्थ को तोडा 
गदापातेनाय . वान्ये “वारैः ` पृष्ठमतादयन्‌ ॥१५।॥ वा तीसरे ने गदा से र चये ने वाशोंसे 


मो ते दमयन्ति दी पीट मे मास॥९५॥ ज्व उनका धष 
धिते पदुपि सक्रोधः स तद्‌ दृपतेः सुतः टर गया तो अवीक्लित ने करधितत हकर दाल 


जग्राहासि तथा चम्मं तद्प्यन्योऽन्यपातयत्‌ ॥१६॥ रौर तलवार को उखाया परस्तु उनको भी किसी 
च्टिन्रसिषचभ्या जग्रह स गद१ गदिनं दरः राजञा ने काट शिराया ॥१६॥ जव ढाल श्रौर तलवार 


॥। 


तामप्यन्यः भुरण चिच्छेद कृतदस्तत्‌ ॥१७॥ भी ट्रुर गये तच गदाधारिथों मे श्रे अचीकरत ने 


~ € गदा उख परन्तु उसको भी शवुश्रों ने काट 
भन्ये शरसहस्र ए शतेनान्ये नराधिपा; | | डला ॥ १७॥ फिर उन .राजाशनो ने धम से विधु 


बिभिदुः कोष्टकीश्चत्य धम्मयुद्धपराद्ुखाः ॥१८॥ दोकर एक साथ मिलकर अकेले ्वी्चित पर 
स॒विहलः पपातोव्यमिको बहुभिरर्दितः दज्ञासे वाण द्ोडे ॥१८॥ वहुत-ते राजाश्रोके श्राक्र 
राजपुत्रा महाभागा ववनधुस्ते च तं ततः ॥१६ | भण को श्रकेला न सदह सकनेके कारण वह विदल 


स र परीत होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा श्रीर फिर जाओ ने 
तमधस ते सर्वं श्रीत्वा दृतेः सुतम्‌ । | उसे वाध ज्तिया ॥ १६॥ वे सखव राजा उस रा 


विशालेन शमं र्ना वैदिशं विषश्च पुरम्‌ ॥२०॥॥| कमार को अधमं से वाच कर राजा विशाल के 
हृष्टाः भथुदिता वद्धं तमादाय वृपात्मञम्‌ । पाख जे श्राये ॥२०॥ राजङ्कुमार को वाध कर तथा 
स्वयंवरा च सा कन्या न्यस्ता तेन ततः परः| २१।। उस स्वयम्बय कन्था को नगरम लाकर राजालोग 


(1 । वड़े प्रसन्न इण ॥.२९१ ॥ इसके वाद राजा विशाल 
एनः नश्च पित्रोक्ता तथापि च पुरोधसा । | तथा पुरोहितो ने वारं चार कन्या से कदां किं इन : 


आलम्बयतामिति धरो यस्ते राजसु रौ चते ॥२२॥| राजां मै जिखको लुम चादों बर लो ॥ २२॥ दे 
यदा सा मानिनी कच्चिन्न जग्राह बरं यने । सुनि ! जव कि उस मानिनी ने किसी राजाको 
तदा पच्छ दैवज्ञं पिवाहा्थं नरेश्वरः ॥२३॥|| इरन स्वीकार न किंथा त सजा विशाले उसके 


चिबाह के विषय मँ ज्योतिषी से पृच्छा ॥२३] इसके 
पिशिष्टतरमेतस्या विवाहाय दिनं वद्‌ | विवाद केः लिये च्छा भुहत्तं चतताश्ये । इस म॒ह 


ग्रं तदीदक्‌ सजातं युद्ध विध्घोपपादकम्‌ ॥२४।। मे तो इतना युद्ध रादि विध्न उपस्थित दोगया॥२४ 


माकंणडेय उवाच माकर्डेयजी वोल्े-- 
इति पृष्टो नरेन्द्रेण स दैवज्ञो धिभृष्य तत्‌ । ` राजा विशाल कत पृदधुने पर परमार्थे के जानने 
मनाः भाद विहञत-परमा्ो महीपतिम्‌ ॥२५।| वले ज्योतिपी ने विचार करके उदास दक्र 
भविष्यन्त्यपराणीह दिनानि पृथिदीपते। | या < कदा ॥९॥ हे राजन्‌ ] बहुत शीर प्रशस्त 
परशस्तलश्रयुक्तानि शोभनान्यचिरेए च 1 लच्-गुक्त दिन श्राने वाले ह ॥२६॥ हे सम्मान. 
करिष्यति विवाहा तेषु भ्रष्ठ मानद्‌ | = [दैन बले! उन ध > शाने पर विवाह का 


बताऊ गा, इस खमय जव कि यह महाविष्न 
-अतलुमेतेन यज्रापयं, -मविश्च रष्स्थर्‌ः २.७ | उपरिस्त इ ह इसपर विचार करना दीक नदीं 


इति श्रीमाकण्डयपुराण -मे अवीक्षित चसि (२) नाम का १२२बां अ्रध्याय समप} ` 
| -- 7 उफ -<4=-- | ॥ 


श्र° १२४ माकंणडेयपुराण ३६५ 


एकसोरीवीसों अध्याय 
भाकरडेयजी वोक्ते- 


भाकैरेडेय उवाच 
ततः थश्राव तं बद्धं तनयं स करन्धमः। दके वाद श्रवीक्तित के वन्दी होजने ५ 
समाचार महाराज करन्धम, उनकी पत्नी ˆ 


तस्या पत्नी तथा वीरां श्रन्ये चापि महीमृतः॥ १। तथा श्रन्य राजाश्रोँ ने सुना ॥९॥ ह क्रौष्कि श्नि ! 
् [५ ८ ति करर ते कि नने [र 
तमधम्मण तनयं वद्ध श्रुत्वा महीपतिः । राजा करन्धम ने सुना कि उनके, पुत्र फो श्रन्याय 


द से राजां ने वाध लिया हे । इख पर तरे विचार 
समन्ते पएथिवीपालेचिरं दध्यौ महाष्टने ॥ २॥| करने लगे ॥ २॥ कषठ राजां ने घ्ाकर महाराज 


फेचिदृचुरमहीपाला वध्याः सव्य महीभृतः । 
यरे संयुगे 

कः संयुगे वद्धः 
युञ्यतां बाहिनी शीव्रमूचुरन्येः किमास्यते । 


से काकि वे राजा जिन्हे त्रधर्म स श्रकेले 


, राजङछ्कमार को वांधलिया है कैद किये जानेके 
[र न ४ [। कनं ॥ प 
समस्तस्तरधम्मेतः ॥ ३॥ योग्य है ॥ ३॥ दूसरे राजानो ने कदा कि श्राप 


चुपक्यायैठे है शीघ सेनाको इट कीज्यि| 
श्रौर दुष्ट विशाल व उसके साथी राजा को ' 


विशालो वध्यतां दुष्टस्सतर येऽन्ये समागताः ॥ ४ ॥| पकडे ॥४॥ दूसरे राजानो ने कदा कि राजानँ 


श्न्ये तथोचुधंम्मोज त्यक्तः पलप महीक्षितः । 


ने ुपित होकर धमे इसलिये द्ोडा कि श्रवीक्षित , 
ने अन्याय से उस कन्या को वलपूृवंक पकडलिया | 


न्यायेन वलादूमेन गृहीता तमबाञ्डती ॥ ५॥| जो कि उसे शरद्रीकार नदीं कर रही.थी ॥॥ श्नौर 


स्वयंबरेष्वशेपेषु तेन॒ राजमुतास्तदा । 
खलीकृतास्ततः सव्व समेत्य स॒ वशीकृतः ¦, ६॥ 
तेपामेतद्वचः शरुत्वा वीरा बीरभनावरी । 
बीरगो्र्ुदुभुता धीरप्त्नी मरहर्पिता । 
उवाच भुः भ्यकषमन्येपाश्च महीक्षिताम्‌ ॥७॥ 
भद्रं एतं भद्रुना मम पत्रेण पार्थिवाः। 
गृहीता यदूवलात्‌ न्या जिला सर्वय॑महीक्िनः॥ ८॥ 
तदथं युध्यमानोऽय युद्ध एको न धर्म्मतः। 
तदप्यस्मत्सुतस्याजा सन्ये नापचयपदपर्‌ ॥ & ॥ 
एतदेव हि पौरुष्य यदधम्मेवशान्नरः । 
नीतिं न गण्यत्येवं जिघांसुखि केशरी ॥१०॥ 
स्वयवराय विन्यस्ता ममर पुत्रेण कन्यकाः । 
व्यो ग्रहीता भूएानां पश्यतामतिमानिनाम्‌ ११ 
ढ़ क्षत्रियकुले जन्म फ़ याश्चा हीनसेविता । 
वलादेव समादत्ते क्षत्रियो बर्िनां पुरः ॥१२॥ 
लोहृहलवद्धा वा न वशं यान्ति कातराः । 
्रसद्यकारिणो यान्ति राजानो धम्पंशालिनः१३॥ 
तदलं दौम्म॑नस्येन श्ोध्यमेवास्य बन्धनम्‌ । 


युष्पाकमप्वायुधानामङ्गभू्धु पानम्‌ ॥१४॥ इ 


भी सवयस्वसें मे अगीक्लित ने राजकन्याध्रों को , 
र्ण किया है इसीलिये राजाश्रों ने णका करके । 
उस वाध लिया है ॥ ६ ॥ उनके ये चचन सुनकर | 
चीर कुल मे उत्पन्न वीर जननी, चीर रमणी महा- , 
गनी बीरा वहुन भरसन्न हई श्रौर दूसरे राजानो 
के सामने श्रपने पति स बोलीं ॥ ७॥ दे राजानो | 
मेरे पुतन न खव रात्नाश्रां को जीतकर जो वलपू्वक 
कन्यापं हर्य कीं ह यह वहुत श्रच्छी वात है॥०॥ । 
उनके निमित्त ¬ करभे से चाहे वह युद्ध न्याय । 
पू्व॑फ नहुश्ादो मे श्रषने पुत्र कौ दस्मे 
कोई श्रयोभ्यना नदीं देखती है ॥६॥ पौरय यदी दै 
कि येन केन धकरेण शच को जीते, मारते समय | 
सिह गीति दो नदीं सोचता ॥ १० ॥ मेरे पुत्र ने 
स्वयस्वस< मे याह दहै कन्याश्रां को अत्यन्त मानी 
राजानो क देग्बते देखते वलपूरवेक श्रद्‌ कियाहे ॥ 
कहाँ तो चत्रिय दुल मे जन्म शरोर कटां दीनां 
हारा किये जाने वाली भिन्ाचरत्ति ! बलवान के 
सामने चश्रिय दी वलपूवेक कोई वस्तु से सकता 
है ॥ १२॥ लो की जंजोसं मं वेध कर भी प्त्रिय 
वश मे नदीं होति, बश मभ तो कायर होजाते द । 
धर्मात्मा राजा लोग भी कमी कभी हट पूर्वक एेसा 
कर जेते है ॥ १३॥ इसलिये थव चिन्ता करने से 
क्या है १उखक्रा वन्दी दोना तो प्रशंसनीय हे। 
श्राप लोमों ॐ श्रद्ध तथा शिरो पर श्र शखर लगे 
ह ॥ ९९ ॥ दरण कणनेदी से सजाश्रौ को पृथ्वी 


३६६ 


हदव पृथिवीशानां पृथ्वी पुत्रादिकं बसु । 
भार्य्या चा्यनिमितच्चानि ततो यातानि मोरवम्‌ १५ 


त्त्‌ चय्व॑तां रणया स्यन्दनान्यधिरोहत । 
सन्जी्ुरुत नायाश्वमदिरेण ससारथिम्‌ ।१६॥ 
मन्यध्वं फं महीपालेवहुभिः सह विग्रहम्‌ 


माकेर्देयधुराण 


श्रं १२४ 


„~~~ ~ 


~~ ~ 


पुज, घन खी आदि मिलती है, जर इन चस्तुश्ों 
परास्त करने से दी उनका गौरव वदता ह! ९५॥ 


इसलिए रण ॐ निमित्त शीघ्रता से रथा पर सतार 
दोद्ये तथा धोड श्रोर हाथियों को उनके घाटकां 


सदित तयार होने की आज्ञा दीज्यि ॥ ९६॥ क्या 
श्माप हीं मानते करि युद्ध चडुत-से राजां के 
खाथ होना छर उस युद्ध में वडुत-से राजाद्मो को 


भूता एव तोषाय शूरस्यालपरणे क्रियाः १७ शरपनी बीरता से संद करना पड्म 1९७) चोड 


क्स्य नाव्येष सामथ्यं नरेन्धादिष जायते । 


यद्धे दौनसे रजा पेखे है जो अपना जोहर 
नहीं दिखलते १ चीरचेदीहैजो शव्यं से नदीं 


येभ्यो न षिद्यते भीतिः कातरस्यापि शत्रष |१८।॥ उस्ते ह ॥ १८॥ श्चरवीर लोग सवको अपने चश 


व्याप्तलोकान्‌ समस्तान्‌ यो ह्यभिभुय यतो नरः 

न्यरोचतेति शूरः स तमांसीव दिवाकरः ॥१६॥ 
भमाकूस्डय उवाच 

इत्यगुदर्धितो राजाऽनया पल्या करन्धमः | 


चकार स वल्लोदयोगं हन्तुं युत्राहितान्‌ युन ॥२०॥ 
ततस्तस्य समं भपेर्विशात्तेत च सङ्गरः ! 
वभूव वद्धुपुत्रस्य तेरदेषेमहायुने ॥२१) 
दिनभेयमभह्युद्ं तेल रज्ञा समं तदा | 
करन्मेन भृषानां विशालस्यासुङ्व्वेताम्‌ ।२२॥ 
यदा पराजयप्रायं तं सच्चं यभृपमण्डलम्‌ । 
तदा विशा्तोऽघ्यकरः करन्धसयुपास्थितः ॥२३॥ 
करल्थमऽपि सम्प्रीत्या तेन राज्ञाभिपूनितः 


विमुक्तं तनये तत्र निशां तां सुखमावसत्‌ ।*२४॥ 


ताञ्च न्यञुषादाय विशाले समुपस्थिते | 


म करके अपना प्रकाश उसी रकार सव लोकों मे 
पलवते जिस अक्रार क्ति सूर्यं अन्धकार कोहरा 
कर पक्राश्च फलते है ॥ ९६1 
माक॑ण्डेवजी वोलेः- 

हे सुनि ! जव रानी वीरा ते महाराध. करन्धम 
को इस प्रकार समाया तव उन्दने अपने पुत्रके 
शचरद्यों को मारने के लिये सेना तयार की ॥ २०॥ 
हे महासुनि ऋरौष्टकिडी ! तद उनमें श्नौर वीक्षित 
को न्दी करने बाले विशाल के साथी राजां में 
घोर युध होने लगा एर राजा दिशालके समर्थक 
राजाच्ों के साथ महाराज करन्धम को तीन दिन 
तकर युद्ध होता रहा 7२२ जद वे सव राजा लोग ˆ 
करीव करीव पसास्त होञुके तव राजा विशाल 
ध्यं तेकर महारज करन्धम के सम्मुख उपस्थित 
इए ॥२२॥ राजा विशाल से पूजित होकर महाराज ` 
करन्धम वड़े पन्न हप श्रोरः पुज क्ट जाने परं 
उन्दने चह राति हाँ दी सख से विताई ॥ रथाद 
विधरपिं ! विचाद के क्तिये उस कस्या को लेकर 
राजा नि्टाल के उपस्थित होने पर अवीक्षित ने 


अ्ीषित्‌ माह विमं विवाहाय पितुः रः २५|| अपने पिता क सन्पुख विशाल. से कडा ॥ २५॥ 


नाहमेतां प्रहीष्यामि न चान्यां योषितं देप | 
परये्या निरीकन्स्याः संग्रासेऽहं पराजितः ॥२६॥ 
अन्यस्पे सस्पयच्छमामियन्चान्यं हृणोतु तस्‌] 


डे राजन्‌ ! म अव इसको अथवा किसी दससेखी 
क्तो भी ग्रहण न कूरूगा र्योकि भै इसके सामने ` 
युड्‌ म परास्त श्चा ह २ इस कन्या का किरी 

रेखे पुरुप के साथ विचा कर दीजिये ' 


लिसक्रा यश शौर पराक्रम अखरिडत हो नौर जो ` 


खण्ठितयशो वीर्यो यः परोदापमानितः रज जसी क दास अपसानित न किया यथ हो रजा 


परानितोऽ्ं यत्‌ कातरेयं यथाऽवला | 


किमत्र मानुषत्वं मे न तस्या मम चान्तरम्‌ २८ है | 
¡ स्वतन्त्र होते है तथा खियाँ अवला होनेके कारण 


! 
1 
1 


स्वतन्त्रता सुष्वाणं परठन्वा सदाचल्ला 
नरप परतन्त्रा यस्तस्य कीटङ्मनुष्यता । २६। 


खरा खे पयाजेत कया इञा इह इसलिये यह 


अवला दुःखित देसी । सुमे नसुस्यत्व दी क्या 
म॑ ज्र इसमे वड़ा. अन्तर है 1२८) पुरुप ` 


परतत् < 
वहाँ दी स्या रह गई १॥२६॥जे कि. ` 


अ० १२४ भाकण्ठेयषुराण ३६७ 


~~~ 


=== ~~~ 
सोऽहमस्या पलं भूयो चं दयिता कथम्‌ | | रसे खामने टी मे राजाभं ने परास्त करके 
यो क नौ परै पृथ्वी पर गिरा दिया इसलिये मै किस प्रकार 
उमस्याः पुरो भूमा परेमूपः सिलीकृतः ॥३० स भ से दिखाऊ" \ ३०॥ 
~ + अचीत्तित के एेसा कहनेपर राजा विशालने श्रपएनी 
जगतापतः ५ ध. 
स्क तेन ४ जगतीपतिः । कन्या से का, “ह चतस ! जो ऊख महात्मा श्रवी- 
शरुतं ते वचनं षत्से षदतोऽस्य महात्मनः ॥२१॥| कित ने कदा वद तुमने शुना या नदीं १,।३१॥ हे 
वरयान्यं परति त शमे ¡ श्रव तुम किसी दृसरे पुरुप को जिसको कि 
वयं वासं ५. यभ । तम चाहो वरलो श्रन्यथा जिसको हम क उसको 
ना य वि वार्ताः श्रपना पति चुनो । हे खु्दर सुखवाली ! इन दोनों 
एतयोर्घेकमातिष्ठ मागेयो रुचिरानने ॥२२॥| माग मे से एक मार्ग का श्रवलस्बन करो ॥२२॥ 
कन्योवाच कन्या वोलीः- 
पराजितोऽ्यं वहुभिनं सम्यक्‌ सम्यमाबरन्‌ । दे पिता ! यह यदुत से राजान्नं दारा श्रकेले 
कामे ^ परास्त दु है, इस कारण युद्ध मे इनके यश रर 
संग्रमे यहूयशोवीय्यै-हानिकारिणि पार्थिव ॥३३॥ ५ की हानि नरी सखमभी जायगी ॥३२॥ यह 
एको बहूनां युद्धाय गतानामिव केशरी । | भ ही युद्ध म उन सव के सामने सिंहकी तरह ¦ 
४ हू यख शौ ॥ पेश रीक्‌ टे रहे इससे दी एनकी वीरता परगर दोग ॥२७॥ 
यत्‌ संस्थितः परं शोय्य तेनास्य प्रफटीकृतम्‌॥।२४॥| उन राजा ने दी केवल इनको नदीं जीवाद वरन्‌ । 


न केवलमयं तस्थौ युद्ध तेऽ्यखिला भिताः । | इन्दने भी कई वार उनको जीता है इसलिये इनका | 


वशे तेन विक्रमोऽपि प्रकाशितः ॥२१।॥| पराक्रम तो स्पष्ट दी है॥ ३५॥ शौर्य ओर पराक्रम 
शोऽनेन यत तेन विक्रमोऽपि मकारितः ॥२५। से युक्त इनको यदि सव राजाश्मौ ने धर्मयुद्ध भें | 


शोव्यनिकरमसंुक्तमिमं सन्वमहीक्षितः । | शरघमं से जीत भी लिया तो समे इनके रिथ 
धम्मयद्धमधर्म्मेए जितवन्तोऽर का त्रपा ॥२६॥| कौन-सी लज्ञा की बातदै ॥२६॥ हे पिता । मै नके 


४ ॥ रूपसे दी एन पर आसक्त नदीं ह । इनके शौर्य, 
न चापि रूपमाह सोममस्य गता पितः । पराक्रम श्रीर्‌ धैर्य ने मेरे मन को हरण कर क्षिया 


शोयिकरम-ेय्याणि ह्न्त्यस्व मनो मम॥२७॥| ५ ॥ २७॥ हे पिना ! वदत कदने से क्या दै, तुमतो 
तत्‌ किगुक्तेन बहुना याच्यतां मृते षः । | इनसे भेर लिथे पाथना करो । इनके सिवाय कोड 
त्वया महाुभावोऽयं नान्यो मे भविता पतिः ३८) (अ रेरा पति नहीं होसकता हे ॥ २८ ॥ 


। 
उवाच वेशाल चोले-- ४ | 
हे राजकुमार ! मेरी पुत्री ने फितने छुन्द्र 


२ + ६ 

राजघुत् सुता भ्रा मभेतच्छोमनं । दचन कदे है । आपके समान पराक्रमी राजकुमार |` 

एवन्पैव तरया तुयः हमारो न महीतलं ॥२६॥| दूसरा इस पृथ्वी पर नदीं हे ॥३६॥ आपका शौ 

ग्रविसंवादि ते शय्य॑मतीव च प्राक्रमः। | श्नौर पगक्रम श्रकथ॒नीय है । दे बीर ! मेरी कन्या , 

परावयास्मललं भीर दुहित परिग्रहात्‌ ॥४०।| का परिगरदण करके मारे छलक पविभ करो 
राजपुत्र उवाच राजय नोहेः + ९ 

ता हे रजन्‌ ! न तो प्र इसको ग्रहण करं गा शरीर 

नाहमेतं अरहीप्यामि न चान्यां योषितं टप । | न किसी शरस्य पती छो । कारण फ इस ~ “ 

आसन्येव हि मे बुद्धिः सीमयी मलुजेश्वर॥४१॥| स्वयं मँ जीवत्‌ होरदा ह ॥४९॥ | 
माक॑रुडेय उवाच माकंरुडेथजी चोक्ते 6 

वतः कर्यमः भाद पेयं शृता लया । | मो क भद्रो ५ । 


वरंशालतनया सुभरुस्लयि हादवती दम्‌ ॥४२।॥| यद तुमारी भीति मे इट्‌ है ॥४२ 
राजपुत्र उवाच राजकुमार वोले-- 
ना्ाभङ्गः कदाचिद्‌ ते छृतपूव्वो मया भ्रमा ॥ हे प्रमो ! मैने पदि कभी श्रापकी आज्ञा 


-३६८ 


मार्करुढेयपुराख 


":अ० १२४ , 


उल्लंघन नदीं किया है । अतः आप भुमे पेसी 


तथाज्ञापय मां तात अथाज्ञां राणि ते ॥४३ आज्ञा दु जिखको कि यै भङ्ग न करर खक ॥४३॥ 


भाक्दडय उवाच 
अत्यन्तनिथितमतो तस्मिन्‌ राजसुते सुताम्‌ । 
ताष्वाच विशालोऽपि व्याङलीडृतमानसः ॥४४। 


निवर्त्यतां मनः पुति एतस्माच भयोजनाद्‌ । . 
अन्यं वरय भर्तारं सन्त्यनेके वपात्सनाः ।,४५॥ 

कन्योताचं 
बूरं ृणोम्यहं तात ॒भासेष यदि नेच्छति | 


तपसेऽन्यो न मे भत्ता जन्मन्यस्सिन्‌ भविष्यति॥०६ 
भाक्भ्एडय उदि 
इत! करन्धमो राजा षिशात्तन समं छदा ! ` 
स्थित्वा दिनत्रयं तत्र निजमभ्याययौ पुरम्‌ ॥४७॥ 
म्रदीक्षितोऽपि तेनैव पित्राज्ये्च नराधिपैः, 
नेदशनैः पराषततेः सान्तितोऽभ्यागमत्‌ पुरम्‌॥४८' 
उपि कल्या वनं मत्वा निखष्टा निजवान्वैः | 
[पस्तेपे निराहारा वैराग्यं प्रमास्थिता 11४६॥ 
नराहारा यदा सातु सासव्रयम्रस्थिता। 
पम्थाप परमामासि छशा धमनि्न्तता ॥५०॥ 
मन्दोतसाहातितन्वङ्ग सुमूषुरपि वालिका । 
त्यागाय सा चक्रे तदा इद्धि वरपात्मजा ।५१॥ 
प्रात्पव्वागायं तां त्राचचा क्रतधुद्धि सुरास्ततः 
पमेत्य॒प्रेषयामासुदेवद्तं तदन्तिकम्‌ ॥५२॥ 


पपितश्विदरेस्तभ्यं यत्‌ काय्यं तच्निशामय ॥५३॥ 
मृ भवत्या परित्याज्यं श्रीरसतिदृलथय्‌ । 


उपेय स तां प्राह दृतोऽ्दं पार्थिवात्मजे ) | 


. न्धा बरत 


माकरड्यजी वोले- 

राजङ्मार अवीक्तित का अत्यन्त निशित मत 
जानकर राजा विशाल ने व्याङ्कल होकर अपनी 
पुत्री से कहा (४५ हे पुजी { श्रवत" श्रपना मन ` 
इनकी ओर से. दलि किसी दूसरे पुरुप. को 
अपना पति चुन ले, संसार मे वहुत-से रसज- 
कुमार हैँ ॥४५॥ 

हे पिता ! मे इन्दी को श्रपना पति वनाङगी 
यदि वे युभ्भ्को.न.चाेगे तो मे. तप.करं गी 1. स्स 
जन्म म कोर दूसरा पुरुप मेय पति नदीं दोगा 
माक्रड्यजीं वोले- १ 

फिर महाराजं करन्धम प्रसन्नता पूवक राजा 
विश्राक्त क यदा तीन दिन .ठर कर अयने नगरको 
गये ॥ ४७ ॥ जच च्रची्तितं को उनके पितां तथा ,. 
न्य राजायं ने चहूत.ॐ च नीच समायो तो वें 
भी उलके साथ श्रपने चमर को गये ॥४८॥ वद 


,| कन्या भी च्रपने चनु वांधवों को छोड़ कर. वनृको 


गर चौर बरहा वैराग्य मे स्थितः दोकर निरष्ार 

इकर तप करने लगी ॥४९। चह तीन मदने तक 
नियादार रदी ओर इससे वह शचत्यन्त छृष्त होगई 
तथा उस्ने वरइत कष उ्छाया.॥ ५० ॥ चह वालिका 


` उत्खाहरित दोकर सत्राय डदोगई ! फिर उस 


राजङ्मारी ने दे त्यागने का चिचार किया॥*५१॥ 
जव देवत्ताश्रो ने चह जाना किं वह्‌ अत्मधातत करने. 
पर उच्यत हेतो उन्टोने इक्र होकर एक दवदत ' 
को उसके पास मेज पया बह डत उसङफे पास. 
छ्राकर गोला, “हे यजङ्कमारी ! सु तुर्हारे पास 
देवताश्नो ने भेजा है, अव जो कर्यै वह छुनो ए" 
श्राप इस इुलंभ शरीर को न छोड़ 1. डे कल्याशि ! 


चं भरिष्यसि कर्याणि जननी चक्रव्तिनः ॥५४॥| ठम चक्रवत सदाराज को माता होञ्योगी ॥५९॥ हे 


रेण च सहमिगे भोक्तव्या निहतारिणा ) 
प्रञ्याहताज्ञेन चिरं सप्रदोपती मदी 1५१ 
षन्तव्यस्तेन तरुजिद्रेवानां पुसते रिपु 
प्रयशश्घस्वथा करो धम्म स्याप्यास्ततः पजाः॥५६ 
[सिषासनीयसखित्तं चातुव्यणएयं स्वधम्मतः | 
नन्तव्या दस्यवो म्लेच्छा ये चान्ये दुषटवेष्टिता\ ५७. 
व्यं विविधेयजञः समा्त्रदक्षिेः । 


२. 


महाभागे ¦ आपका पुज अपने शच्रश्रोः को मार कर 


सात्द्धीयों से युक्त पृथ्वी सा अखरड राज्य करेगा॥ 


वड पुज देवताघ्चाँ ॐ सामने शव तंरजित्‌ तथा 
श्रयम्शंज्को मार कर परजानन को धर्म्मे 
स्थत्त करेगा ॥५६। चह चासं चरको अपने २ धर्म॑ 


म स्थित कर उनक्रा पालनक्तरेगा तथा चोर.म्लेच्छ 
श्र दुषो का चध करेगा ॥५गहे भद्र ! वह अनेकों . ` 
| यज्ञ करेगा तथा उन यको को . उत्तम दक्षिणं 


अ+ ६२१ माकरेयपुराण | ३६६ 


वानिमेधादिभिर्द्रे पटसदसरे संख्यया । ५८॥ व ।वह ्श्वमेधादिष्ध 


माकररडेय उवाच माकरुडेयजी वोक्ते- 
त्ष सान्तरीक्षस्थं दिव्यञ्चगनु्ेपनम्‌ | दयाकाश मे स्थिते तथा दिव्यमाला पिनेश्रौर 


चन्दन लगाये उल देवदूत को देखकर राजफन्या 
दैवदूतष्वाचेदं राजपुत्री . ततो गदु; ॥५६।|| कोमल वारी से यदं वचन वोली ॥५६॥ देवदूत | 


“सत्यं स्वमरागतः . सगादेषदूतो न संशयः । ` | ठम स्वग से श्रये दो, यद निस्संदेद सत्य है 


प परंतु पति के विना मेरे पत्र किख प्रकार होगा॥६०॥ 
न्तं मघा विना धुतः स कथं मे भविष्यति।।९०॥ मैने पने पिता के सामने धरतिक्षा की है किश्चवी 


शरवीशषितृते भत्ता मम नीन्योऽज जन्मनि | | पतित को छोडकर इस जन्म मै मेश को दूसरा 
भवितेति पतिन्नातं मयैतत्‌ सन्निपौ पितुः ॥६१।॥ पति न दोगा ॥ ६१॥ यद्यपि मेरे पिता विशाल ` 


था उसके प्त राजा करन्धम ने उससे कदा है 
स च नेच्छति मां ोक्तो मित्रा जनकेन च । तथा मैने पार्थना कीदैतो भी वह सुभे नदी 
करन्धमेनाय सम्यगृयाचितश्च मया तथा ॥६२॥॥| चाहता ड ॥६२॥ 


देवदूत उवाच देवदूत वोला-- 
किमनेन महाभागे बहुनोक्तेन ते सुतः। । | , हे मदामागे । बहुत कटने से कया ? तुम्हार 
समुत्पत्स्यति; मा त्याकषीस्तमात्मानमधस्मेतः।॥६३॥| ए अवश्य होगा, ठम अधमे से पने शरीर रो 
त्रैव कानने तिष्ठ तन्‌. श्षीाश्च पोषय । : | = त्यागो ॥ ६३ ॥ ठम इसी बन मे रहो शर पने 
| कृश शरीर को पोपण॒ कर्के स्वस्थ करो । तपस्या 
तपःपमावादेतत्‌ ते, सव्वं. साधु भविष्यति ॥६४।॥ के.भमाब से तुम्दारा कल्याण होगा ॥६४॥. , ,.- 
माकरडेय उवाचं - ; | माकरडेयजी वेले 


इत्युक्तवा ऽतौ यथागतंमगच्छत { । | ` यह ककर वह देवदूत ज से राया था 
तो न वहां चला गया श्रीर वह रजङ्कमारी भी दिनि 


चकारानुदिनं घुभ्रः साप्यात्मतलुपोषणम्‌ ॥६५।॥ थति दिन श्रपने शरीर का पोपण्‌ करन लगी ॥६५॥ 


इति श्रीमाकंर्ढेयपुराण मे अवीक्ित्र चख (३) नाम १२४बां अ० स०। 
--.-खठ -5 ~~~ 


एकपौपचीसगो अध्याय 


भार्वर्डेयजी वेले- 


- भमाकर्डयं उच्च र ग ञी > र 
री इसक याद्‌ कार जनन \4। शुभ द्रन 
श्रथ साऽवीक्षितो माता वीरां वीरपरजावता । त 


पुर्येऽ्नि समाहूय भाह पुत्रमवीक्षितम्‌ ॥ १॥ तुमरे महात्मा पिता की श्राक्ा से भ पक दुष्कर 
पुत्राहमभ्यनु्नाता तव पित्रा पंहदास्सना। उपवास करू गी जिसका नाम किमिच्छुक दे ॥२॥ 
उपवासं करिष्यामि दष्करोऽयं किमिच्छकः ॥ २॥ यद वरव वु्दारे पिता का वताया हा है, इस्तिये 

यह मुभे शौर क्दै दोनों को साधना चादिये। 
स चायत्स्त पितुस््वया साध्यो भयापि च । | परनठ मने पिता के रागे पवक की दै, इसलिये 
परति्ञाते त्या पुत्र ततस्तत्र यताम्यहम्‌ ॥ २॥ भं यतन करती ह ॥ ३॥ मै तम्दारे पिता के सज्ञाने 
्व्यस्यादध महाकोषाद्‌ तव दास्याम्यहं पितु; । . | सा आधा धन तुमको दंगी ओौर पेखा करने के 


लिये तभ्डारे पिता ने शमे आज्ञा दे. दी है ॥४॥ यद 
धनं तै पिहुरायत्तमलुञाताऽस्म देन ` च ॥४॥ त्रत कष्ट साध्य दोगा परन्तु यद शत्यन्त धे चत 


हेशसाध्यो मदायत्तः स हि श्रेयो भविष्यति! -:' | । यदि तुम अपना वल, परक्रम दित फेगे 


१५ ९ ११ 
१,९ 


४०० माकण्डेयपुराण अर १२५ . 
साध्यो भवेद्रा यदि ते कथिद्धलपराक्रमे ॥ ५ तो यह बत सफल दहो जागा ॥ ५॥ यह वत. 
स तेऽ्षाध्यो चन्यथा वा दुःखसाध्यो भविष्यत्ति। | साध्य हो चथवा प्रसाध्य १ हे पु ! यदि तुम. । 
तद्‌ तं प्रतिज्ञां हरषे यदि पुत्रघ्र चेव ते। प्रतिज्ञाकयो तो म बत आरम्भ करू अथवा जो 
तदेतदहमावाप्स्ये कथ्यतां यन्मतं तव ॥ ६ ॥| वुम्दाया मत हो बह कटो ॥ ६॥ ., । 

सरचीत्तित उवाच असीक्तित ने कदा क 
वित्तं मे पितुरायत्तं मतुस्वाभित्वं न तत्र बै । धन तो मेरे पिताका है, उस पर मेसा स्वामि 1 


र नहीं है, जो मेरे शरीर के योग्य हो उसे किये 
यन्मच्छरीरनिष्ाय तत्‌ करिष्ये लयोदितम्‌॥ ७॥ कर'गा ॥७॥ हे माता ! श्राप निथिन्त होकर पिता ` 


किमिच्छकं व्रतं मातरमिथिन्ता भव निव्यैया । जी दारा आक्ञा किये गये किमिच्छक चत को 
राज्ञा पित्राऽभ्यनुज्ञातं यदि वित्तेश्वरेण मे ॥ ८ ॥| कस्थि ॥ ८॥ भि 
माकरडेय उवाच । माकंरडेयजी वोक्ते-- 


फिर उस रानीनेराजाकी ्ज्ञायुखार बत 


॥ पूना ४ करना श्रारम्भ फिया शौर उसने राजा का ॥ ६॥ 
यथोक्तां साकरोत्‌ पूजां राजराजस्य संयता ॥ ६॥ सम्प निथियोका तथा निथियोक पालक गरापति 


निधीनामम्यशेषाणां निधिपालगणस्य च। | का श्नौर लच्मीजो का भन, वचन शरीर कर्म॑से भक्ति 
लक्म्याश्च परया भक्त्या यतवाक्कायमानसा।।१०।॥ पूर्वक पूजन किया ॥ १०॥ जव महाराज करन्धम - 
विविक्त तु शहस्थोऽयमथ राजा करन्धमः । . | घर मे चैठे हण थे उस समय नीति श्रौर शासख.ॐ 
आसीन उक्तः सपिवेनींतिशास्तयिशारदैः ॥११।| जानने बलि मम्बियों ने कडा ॥ ११॥ .. , , 
सचित्राउचुः .. १ 

; .परिएतं तवैतच्ासतं यजन्‌ ¡ इख पृथ्वी पर शासन करते हु प 
राजन्‌ वयः -परिणतं तवैतच्चासतौ महीम्‌ । आपकी अवसथ व क 
एकस्ते तनयोऽीकषित्‌ त्यक्तदारपरिगरह; ॥१२॥| आपके पक पुज है रौर उन्होने खी व 
अपुत्रः स च ते निष्ठां यदा भूष गमिष्यति । 


छोड़ दिया ह ॥१२ निरसंतान दहदोते इए जव व `. 
तदारिपक्षं पृथिवी निथितं तव यास्यति.॥१३॥ 


ततः सा रानमदिषी वदतं सयुपोषिता | 


राज्य सिंहासन पर वैठगे तो निश्चय ही शत्रु लेग , 
श्रापके राज्य को उनसे छीन लेंगे ॥१३॥ पितरो को ` 
वशक्षयस्ते भविता पतृपिण्डोदकक्षयः । | पिण्ड श्रौर जल देने वाला न र्डने से श्राप करा ॥ 
एतन्महत्‌ तेऽरिभयं क्रियाहान्या भविष्यति ॥१४॥| व व त 0 क 
पि तथा करिया की हानिं भी ॥ १७ ॥ ह राजन्‌ ! इस 
१ ते तनयः घुनः। „| लिये पेखा यल कीजिये जिससे श्रापके. पुत्र की , 
करोति सततं दधि , पटृायुपकारिणीम्‌ ॥१५। | रेसी बद्ध दो जिससे पितरों का हितं छो ४१५॥ ` 
भाकरडय उवाच माकरड्यली बोजे । ए † 
एतस्मिनन्तरे शब्दं शुश्राव जगतीपतिः इसी ्रवस्र पर महाराज ने पनी सी वीरा ; 
पुरोहितस्य वीराया गदतो शर्थिनं परति ॥१६॥ के ध त स क करि याचका से ५: 
क सिगिषयति वषय य कड रदे धे ॥ १६॥ बोलो, कौन. कया चादता “` 
; किमिच्छति व किं साध्यतामिति। दै! दसाय दो अथवा साध्य, सव.मकतेगाः महा, 
करन्धमस्य महिषी कि च्छकमुपोपिता ॥१७॥ राज करन्धम की रानी नीरा किमिच्छक वत कर ` ` 
सजपुत्रोऽप्यवीक्िद्‌ तु भ्रत्वा पोरोहितं वचः | रदी द ॥१७॥ पुरोदितके वचन सुनकर राजकुमार , 
रस्युवाचार्थिनः सर्व्वान्‌ रजद्वारमुपागतान्‌ ॥१८॥ अवीक्तितने भी राजदधार पर राये हष सव याचो . 
मया साध्यं शरीरेण यस्य भिचिहूब्रवीतु सः। | स कदा ॥१२॥ मेरी सोमाग्यवती माता किमिच्छक ५ 
५ | ८ नत कर रही है, जो मेरे शरीर से सम्भव हो बह ` - 
` माता महाभागा. किमिच्छकयुपोपिता ॥१६॥| मनो दगा ॥१३॥ -- ^~ ~: ,* "2.4 


~ ------ ~ "~------- 


०१६५. ११ माकेरढेंपुराण , ४५१ 


शृएन्तु मेऽ्थिनः स्वे ्तिङनातं मया तदा} | ३ याचको! घ्नो ! मैने यद भरतिकषा कीषदैकि 
- ० किमिच्छक व्रत के श्रवसर पर जो कोई जो कचु 
किमिच्छथ ददाम्येष क्रियमाणे किभिच्छके ॥२०॥॥| इच्छा करेगा वद मै पूरी करंगा ॥ २०॥ 
; माकंरडेय उवाच माकैरडेयजी बोले 
ततो राजा निशम्यैतदा्यं पुम्ष्वाच्चयुतय्‌ । इस समय पुत्र फे मुख से यद वचन सुनकर 
राजा करन्धम पुत्र के पास गये श्नीर बो, ५ हे 
~ सयुत्पतयात्रवीत्‌ पुत्र महमर्थी भरयच्छं मे ॥२१॥ पुत्र | मै याचक ह, सुमे दो" २९॥ 

। श्रवी्धिटुबाच श्रवी्तित वोलेः-- । 
दातव्यं यन्मया तात भवते तद्ब्रवीहि मम्‌ । दे तात | सुमे श्रापको जो इ देना चादिये 
४ । वह श्राप मुभे वता, बह चाहे साध्य हो अथवा 
कत्तवयं दुष्करं वाऽति साध्यं दुःसाध्यमेव घा॥२२॥ दुःसाध्य श्रीर कितना ही कठिन क्षयो न हो ॥ २९॥ ; 

। राजोवाच राजा वोले- (५ 
यदि सत्यपरतित्स्त्वं दापि च किमिच्छकम्‌ । यदि तुम सत्यति हो श्रीर्‌ ज कोह जो 
त कृ याचना करता है उसे वदी देते दो तो सुमे 
पौत्रस्य दशय युखं ममोत्सद्धगतस्य तत्‌ ॥२३॥ मेस गोद भ पौन का मुख रिखलाश्रो ॥ २द॥ ` 
श्मवीक्षिदुवाच अवीदित वोले- 0 । 
थं तवैकस्तनयो ब्रहमच््यैशच मे शप । हे राजन्‌ मै श्रापका पक दी पचर रीर 
॥ ॥ . मेरा ब्रह्मचर्यं जीवन है । मेरे को पुत्र नदीं है यतः 
नमे पुत्रोऽस्ति पत्रस्य दशंयामि कयं एुसखम्‌॥ २४ म श्रापको नाती का सुख किस प्रकार दिखलाॐ॥ 
राजोवाच राजा वोक्त-- ` ५ 
परपाय ब्रह्मचय्यं ते यदिदं धाय्यैते ल्या । दमक बरहमचर्थारण से पाप दोगा श्रतः ठम 
| । ५ ॥ श्रात्मा का उद्धार करके शुके नाती का मुख 
.पस्मात्‌ त्वं मोचयात्मानं मम पौत्रश्च दशंय||२५।| दिखलाश्नो ॥२५॥ 


 ्रवीक्षिद्वाच श्रवीक्तित बोलेः- ध ९ । 
विषमं स्यान्महाराज यदन्यत्‌ तत्‌ समादिश । दे महाराज ! यद्‌ किन दै, श्रौर जो 
अ लीसम्ोग्व द शराक्ञा हो वट मे कर । मने वैराग्य से ली संमोग 
वैराग्येण मया त्यक्तः तथास्तु स५॥२९६ छोड़ दिया है ॥ २६॥ 
न साजोचाच राजा वो्े-- ६ (3 
वहुमिर्य॑ध [| ५ » य ५ [व राना न] ॥ 
यमानानां दो बै वैरिणां नयः। वहु से राजाश्ों ने मिलकर तुमको युद्ध 
१ जीता है शसलिगे तुमको वैराग्य न होना चाये । 


तत्रापि यदि वैराग्यमुपेपि ` तदपरिडतः ॥२७॥ यदि इससे वद वैराग्य होता है तो यहु वम्दारी 


६ ` ९ मूता है ॥ २७ ॥ वडुत कहने से क्या दै १ ठम 
फिवानो वहुनोक्तेन ब्रह्मचय्यं परित्यन। नमय को छोड़ कर श्रपनी माता ््ारलार 


मातुस्त्वमिच्यया वक्वं पौत्रस्य मम दशंय । ।२८॥ मुम नाती का भुख दिखलाञ्रो ॥ रल ॥ । व 
क माकरुडेय उवाच मार्करदेयजी वोल्ते-- । 


$ पार्थिवः] यद्यपि श्रवीक्तित ने सजा को वहत सपरभाया 
यदा स बहुभिस्तेन परोक्तः पुत्रेण पार्थिवः। व 


नान्यत प्रथयते किञ्ित्‌ ५६ ु्रोऽत्रवीद्‌ पुनः २६ कौ इच्छा सी म वीरि ६ 
त्वा किमिच्चकः तुभ्यं भरष्ीऽं वाद्‌ सङ्कटम्‌ । | तात। वा परतिक्षा क ( 

तद्‌ करिष्यामि निसेज्नो भूयो दारपरिग्‌॥२०॥ < १ श ८ 
शियः समक्षं बिभि. पातितो धरणीतले। | परथ्वी पर गिर पड अव उख दी का परति शेष 
सी -पतिर्भषिता -. भूयसतातैतदिदु्करम्‌ ॥२१॥ सु वद्र दुष्कर भुम दोला हि॥२१॥ पनत 


४०२ माकंरटेयपुराण “. ० १२६ 


न तिति क्या कर १ सत्य फे पशमे वधार्हं, जो श्रापने ` 
थापि कि करोम्येष सत्यपाशवशं गत श्राक्ञा दी ह बही करूंगा । आप श्रपना राज्यं 


हरिष्यामि यथास्य तं युज्यतां निजशासनम्‌॥२२॥( कीजिये ॥२२॥ | 
हति शीमाकर्डयषुराण मे अधीक्षित चरित्र ध) नाम १२ ° स०। 


~> प्र - र 
` एकसोधम्बीसवो अध्याय 
भार्व॑रएडेय उवाच माकरडेयजी बोले- 
्दायिद्रानपुत्रोऽपौ गृगयामचरदने । एक वार समया ॐ लिये .गये इए राजङ्ुमार 


\॥|१ ।|| चवीक्तित वन म विचर रे थे श्रौरदरिण, शकर, 
व सालार दष्ट! सिह, चीते श्रादि का शिकार कर रहै थे ॥९॥ वदाँ 


श्राव सहसा शब्दं वाहि ब्रादीति योषितः र उन्दने वड़े ऊचे स्वर से पक ल्ली के रोनेकी 
विक्रोशन्त्या; सुबहुशो भयगद्गदश्ुचकः ॥ २॥| आवाज सुनी । सुभे वचाश्नो, सुमे वचाश्रो, पेसी 
भराम मैरिति दन्‌ राजपुत्रः स वेगितः वाज्ञ श्रारदी थी ॥ २॥ मत डरो ] मत डरो | 
चोदयामास तुरगं यत; शब्दः समागतः ॥। ३ ॥ यद कहते इ रजङकमार ने उधर दी धोडेको 
, ध शीधता से वढ्माया जिधर से श्रावाज्ञ आरदी थी॥ 
ततश्च सापि चुक्रोश कन्यका विजने षने । | फिर उस निन वने दसुके पुत्र द्केशसे पकी 
रदीता दजुपुतरेण दृद्केेन मानिनी | ४॥ हुई बह कन्या रोती इ इस प्रकार कद रदी थी॥ 
छरन्धमसुतस्याहं भायां चाहसवीक्षितः | | मे महाराज करण्धम के पुत्र श्रवीक्धित की सी ह । 


। 4 मुकको यद दु र्ण कर लिये जाता है ॥५॥ 
हरत्यनार््यो विपिने पृथिवीशस्य धीमतः ॥ ५ दा सो 


यसय स्य महीपालास्या गनधव्यंगुद्काः । | ग्यक खड़े होने को समथ नदी ह उसकी ली 
न समर्थाः पुरः स्थातुं तस्य भाय्या हृतार्भ्यहम्‌ ॥६।| इस भकार हरण की जा रदी ह ॥६॥ जिसका. क्रोधं 
यस्य गृत्योरि कोधः शृक्रस्येष पराक्रमः] | रत्यु के समान श्रौर पराक्रम इन्द्र के समानदै उस 
करन्धमसुतस्यैषा तस्य भार्या हृतासम्यहम्‌ ।। ७।|| महाराज करन्धम के पु कौ पत्नी मे इस प्रकार 
| ् हरण की जारदी ह ॥७॥ 
माकंरुडेय उवाच माक॑रडयजी चोले- 

हस्याकएयं महीपाल-तनयः स॒ शरासनी । इस प्रकार यह सुनकर धरुपधायी . ्रवीक्लित 

चन्तयामास किमिदं ) ~ यह सोचने लगे क्कि इस वन मे मेरी खी कट से 
त मास किमिदं मम भाग्या कानने ॥ ८ ॥ श्राई ॥ ८ ॥ वेसा प्रतीत होता. है कि यह वनम 
मयेयं रक्षसां नूनं दुष्टानां काननीकसामू्‌ । रहने बलि द रा्तसों की माया हे परण्तु जव 


॥ किमे यदो पर आदी गया ह, म्र इसका कारण 
अथचागत एवाहं सव्वं वेत्स्यामि कारणम्‌ ॥ ६ ॥ जान लंया ॥ ६॥ 


सरितः स ततो गत्या ददशंतिमनोरमाम्‌ । फिर शीर ही उन्दने उस वनमे पहुंच कर 

कानने कन्यकामेकां स््वालङ्ारमूपिताम्‌ ।|१०॥ च आभुपणो से ध पक रत्नत मनोहर कन्य 
गृ < को ॥१० 

गृहीतां दयुपुत्रेण द्द्केेन दण्डिना । देखा ॥९०॥ उसको दुक पुज केश न पक 


रक्ला था श्रौर वह रोती हई “वचान्नो, वचोश्रो" 
त्राहि त्राहीतिकरणं विक्रोशन्तीं पुनः पुनः १९ सा वार वार कट रदी - थी ॥ १९॥ `उन्टोनि उस 


मा भेरिति स तामाह हवोऽसीपि च तं दन्‌ | ˆ | कन्या से न डरे के हिये.कह कर उस यक्चस 


अ ९९६. माङएटेयपुराण ९० 


शासरीमां महीं दष्टः को भूपेऽ् कन्यसे । ¦ चा. ^ दुम मारे जाये, लिन महाज करल्यम 
{ कै म्रताप सें सच राजा सोय न्धे होकर र्ते 
प्रतपएविचता महीक्षितः उङ्‌ रस्य स्य भ क्ते चछ (य 1}; 
यस्य भतापवनता यदि सर्द मीत क उनके सालय मं कोई इ नदी र सकता ११२1 
| [- ४३ >= उनसे छः न हप उद्धर उखं 
सतस्तमागतं दृटा शदीतवरक्मुकम्‌ । | चनव न अ स स इ 
। { सुर म्ह 1 सुरू च्चाद्य्‌, यह सुभ्पे 
मां जारीत्याह तन्वङ्गी हतास्स्येषेति चासङ़र १३॥ व 1 ०२५ 
हात्याह्‌ तन्वङ्ख हतर , द्रण कूर ७ तात्य हं ॥१दः चे सद्यसयज करत्धस 
~ ठ मा्व्याप्यवीिरं † इी पु्रवश् च्चैर वीन्ित दी खी ञ्चौर च्छ 
रजः ऋर्वमस्वांस्टुषा भा््या्यवीमितः । | वल य को ह 
२९ प तरह स इ दस हस्र क 
हतास्म्येतेन दषेन सनाथाऽनायवटरमे ॥१४:} जा रदी हं र 
4 अ [* + 
माजैरडेय उदां | माकतरडेवजी बोले- 
याक्यमबीक्षिद्‌ तथोदितम्‌ 1 उद (-प1। = = 1६ खनकर 
ततो विममे च स तयोदितम्‌ | | च न्य ‰ थे वाक्य नकर ज्ङ्खनार , 
छीक्तित यह सोचते त्ये त्ति यह महारज ष्टी 
कथमेषा हि मे भाय्यां स्तुषा तातस्य प्रा क्यम्‌ १४. पलोह शौर नेरी ल किल भकार च ॥२५॥ किर । 
अय चा मोचयान्येतं न्वं त्वामित्‌ एनः । | सचान पचते इते इलं ओर र यह सष 
मालूम करे या । सिय लीग पीडितां की सताके 


कषतरिरैधारययते ५१ ५ ५ व्राणकारणाहं ॥ £ ] 
= न ॥। नि हः 
ते पमान गखकारणाद्‌ ॥१९॥ निनित्त ही तख थःस् करते & ॥ १६१ बे कृद 
ततः कृदोऽत्रवीद्वीये दानवं तं सुदुम्मतिम्‌ । स 
७] चर छपे रर अन्द््या वुन्हयसं उपक्र से 
जीवन्‌ च्छं विद्च्येनामन्यया स भविष्यसि ॥१७] रहेगा !* ¢ ३७१ चह दैत्य उस क्त्या को छोड़ ¦ . 
ततः स्र तां विहायोबैदंण्डयुदक्षिप्य दानवः कर पर ऊं चा दरु हकर इवीर्िते की रोर ` 


भैर दौड श्नौर वीक्षित ने भी उसको सैन 
तयप्यधवित्‌ य्‌ घृ र र्‌ ५१. ॥ [4 | ्‌ च [शव ह तीयं 
तमप्यषवत्‌ सोऽप्येनं _ शरषरवा करद्‌ ॥१ दक दिया 1८ उन दासों क्तो चिवारस्‌ चरते . 


त 


९ 
दृ दानर स चलि, ' इसका 
एने श्वर = = 


2 


- स॒ वार्व्यमाणो दाणौवेदानबोऽतिमदान्विठः 1 | इए उख मतननतत यक्तर ने सल्छमार पर दीस 


राजपुत्राय दिक्रेष दण्डं शंडस्ताढतम्‌ ।\१६| स ठे हए उस दरड को चला दियः ५९६1 उस 


9 न्द छिरते इषः दरड को राजङ्यार ने दासो तः "~क 
तमापवन्तं॑ चिच्छेद श्रभषुतस्तवः ! |= ना चा 
सोऽप्यासन्नं क, डाला र एर उह दैत्यं एङ ॐ चे पेहको उड़ 
ऽप्वासन्ं दीत्वोबेह ममान व्यचस्यितः ॥२० | कूर चां पर स्थित हृष्या ॥ २०॥ बड पेड उस दैत्य 
त द्रभस्‌ दासय की शि दः) सीदित ऊ ऊपर र 
छजतः शसवपांणि तं चिप्ेप त्तो हेमन्‌! | नेवलोकौ ध कते 1 
ऋाम्यंकमोवितेः ॥ फा 1 परन्तु छपने धर्ष सं कङ्‌ इष्ट वाराद्वास 
स च सं पिलशबने भ; काम्युकमोितेः ॥२१।॥ शरदीकित ने उर पेढ्‌ को इकडे २ कर दिवा२॥ 
शिसां = = राजकमार ल कषक 1 प्तक [ 
ततधिष्षिप इ शसा राजपुत्राय दानव | कि द्त्पनं कः पक्त प्ति के ४) 
प्रक उक्तं साच्तुख च्म त्व्दता <= सज्ङ्नार्क् 


सापि साधा पपारोज्याशुनूमिला ध्‌ त्त्तन सापच्‌॥ रर यं कर्‌ ष्डापर गिर पड{ ॥ 2२ दः दाकर 
राजप्त्ाय कपि यदुवचिघ्षप दानवः । दानद्धने ञे ज्ते हथियार यञज्खमार पर फक्त उन 
ठ्‌ तच्िच्डेदं शणोवेभयृत्मरडुः स लासग ॥२२॥ अ स व व सं 
ट कड १९२ ता चद इ्टघाल चष्ट: 

ततो विच्छिकदर्डोऽसा विच्छितकलायुषः) | - व स 
मुष्टिष्ठचम्ब सक्रोधो रानदुजमधावत ॥२४॥ दौड ए०॥ राज्कमार अवीक्तित ने उस दैत्य 
तस्यापतत एवासौ रन्यमसुतः शिरः ह्वर ल्वपर से ट कर पथ्य पर विरा 
त 1 ्५1उस दष्टं दा क्ते चरने परं सदं ' 


दित्या वेतसपत्रेख पातयामास वै सुदि ॥२९ 


त्सिन्‌ विनिहते देवैदांनवे दषटदेटिं ! । 
करल्धमसुतः सर्वैः सा साध्विति मावितः १\९६॥४ दिवा ॥ रद देवत च चः ५ हे रज्र ' 


1) 


0 7) 


च ग्‌ 9 
^“ ~ 
>| | 


दवतां ते राजङ्खनार अदीक्तिति को सषु 


अ । 
1 
| 


५ 1 [| छ 


वर इृणीष्वेति तदा देकेरक्तो पात्यः! 
वरे पुतं महावीयं पितुः भियचिकीषया 
देवा उखः 
भषिष्यति हि ते पूत्रशकरवत्ती महावलः । 
अस्यामेव हि कन्यायां मोक्षितायां त्रयानघो।२८' 
राजपुज उवाच 


पित्राहं सत्वपारेन वद्ध इच्छाम्यहं सुतम्‌ । 
राज्भि्नि्नितेनाजो स्यक्तो मे दारयंग्रहः ॥२६॥ 


सा च मे यावता त्यक्ता विशालदपतेः सुह 1 


तया च सक्छरते त्यक्तो मापते नरसङ्गमः ॥२०॥ 


तत्‌ कथं तामपस्या्च विशालठनयामहम्‌ । 

चशंसात्मा करिष्यामि अन्यनारीपरिग्रहय्‌ ॥३१॥ 
द्वा अः 

इयेष हि ते भाय्यां शछराप्यते या तया सदा । 


विशास्व सुता घुभृस्त्त्ृते याभिता तपः; ॥२२॥ 
तस्यायुत्पत्स्यते वीर; सप्द्रीपपसाधकः । 
यष्टा यत्तसदक्षाणां चक्रवत्तीं सुतस्तव ।२२) 


माकंरडेय उचाच 
इत्यास्य ययुर्देवा करन्थसपुतं द्विज | 
सोऽप्याह तां तदा पत्नीं कथ्यतां भीरु र त्विदम्‌२४ 
सा चास्मे कथयामास त्यक्ताहं भवता यदा । 
त्वक्तबन्धुजनारण्यं निव्वदात्‌ स्ुपागता ,३५॥ 
तत्राहं तपसा बीर क्षीणमायं कलेवरम्‌ | 
त्यक्तुकामा समभ्येत्य देवदूतेन वारिता ।२६॥ 
भविष्यति च पुत्रस्ते चक्रवत्तीं महावलः | 
प्ीएयिष्यति यो देवानसुरांश्च हनिष्यति ॥३७ 
इति देबाज्ञया तेन देवदतेन वारिता | 
न ॒सन्त्वक्तवती देहं तत्सङ्गसमनोरथा ५२८॥ 
प्रच सहामाग लात गङ्हदं गता । 
अवतीणां धिङ्ष्टास्मि इदनागेन केनचित्‌ ३६॥ 
ततो रसातलं नीता तेनेत््रच मे प॒रः 
नायाः 


पू 
+ 


माकण्डेयपुराण 


भ. १२६ 


चर सगो!" छवीच्ित ने पिदा की इच्छादुखार ` 


देवताश्च खे पक पसक्तमी पुत्र मया ॥ २७ ॥ ` 
देवता वोज्ते- 
हे निष्पाप ! इस कन्था से जिसको किं तुमने 
ुडायः है, तुम्हारे एक महावली पु द्योमा रना. 
राजङ्कमार वोले- 
पिता के परति सत्य ज़ पाशमेर्वेध करने पुत्र 
की इच्छा करता हं ! राजाश्नों द्रा परस्तं होने 
पर मेने खी न अहर करदेदी प्रतिज्ञा की थी रधा 
मेने राजा विल्ाल की कन्या कोलो किं मेरी 
याचना कर रदी धी छोड दिया, परन्तु उसने 
मेरे कारय क्रिखी दसरे पुरुप से चिवाह न किया 
अतः किंस भकार याजा विश्लालकी कल्याको छोड 
कर नै कठोर हदय दोकूर दसरी स्री को अरहर 
कर ?१॥३१॥ 
देवता बोले- - 
यह दी तुम्हारी खल्द्र पत्नी विशालकी कन्या 
जिसक्ती कि तुम सदा पशंसा करते रहते हो 
श्नौर जिसने कि तुम्हारे कारण तपस्या की है ॥२२॥ 
हे वीर ! इसी से तुम्हारे एक पुज होगा जो सातो 
द्वीप का चक्रवती राजा दोगा तथा बह हङ्ञासं 
यज्ञो का करने वाला दोगा ॥ ३३॥ 
माक॑रडेयजी वोले- 
हे कौषएकरिंजी ! देवता लोग श्रवी्तिति से यह 
कह कर खल्ले गये । इसके वाद अवीक्तित ने उस 
समी खे क्य, “हे भीरु } तुम अपना चृत्तान्त 
खुनाद्ो" ॥३०॥ स्री ने अचीक्तित से कटा कि जव 
अपने सुभे छोड़ दिया तो डःखी होकर मैने भारं 
वन्धुरो को छोडकर वन की राह ली ॥३९॥ हे 


= 


|! 


१.५ 
॥ 


चीर ! वहाँ तप से मे शरीर क्षीण दोगया, नौर ` . 


जव मैने शीर त्यागने कां विचार किया तव प्क 
देवदत ने श्राकर सुभे येका ॥ ३६॥ देचद्तने मुक 
से का कि ठुम्हारे एक महाबली चक्रवती. पुव 
होगा जो देवताश्नों को प्रसन्न चौर अये का 
संहार करेगा ॥ ३७॥ देवताच की चा्ञाडसार 
उस देवदत ने सुभे रोका चौर तुम्हारे मिलने की 
स्ाशासेमेनेदेहकात्याय न किया डद] ह 
महाभाग ` एङ चार र गङ्गा कृरड पर स्नान करने 
ग रौर जव म जल मेँ उतरी तो प्क बद्ध नाग 
सुभे जल मेँ खींच क्र लेगया ॥ ३६ ॥ फिर बह 

नाय सुभे रसातल मे ज्ेगया, जहां कि हजारों 


सरलश्स्तस्युनागपल्यः -इमारकाः ॥४०॥। नाम, नागपत्नी श्नौर नागकुमास्थे ॥४०॥ कुड नामों 


४. 


॥ 
१५१ 
(१ 


भ० १२७ माकंण्ठेयघुराण -४०५ 


तष्टा समभ्येत्य ॒मामन्येऽपूजयंस्तया । ने मरी श्नाराधना कौ श्नीर छु ने स्तुति । मुभ 
ययाचिरे सविनयं नागा मामङ्गनास्तथा ॥४१॥ से उन र श्र नागपलनियां | नभ्रतापुवक 
। ५ ४ -याचना की ॥४९॥ श्ापका पुत्र १ कि 
भरसाद्‌ इर स्वप त्वमस्माकं सुतस्त्वया श्रपराध करेगे जव हमको मारने को उदयत हो त 
शमपराघषटुपेतानां सन्निवार्य वधोन्ुखः ।॥४२। | श्राप उसे ेखा कएने से रोके की छपा करं ॥५२॥ 
भरपराधं करिष्यन्ति त्वर्स्पामिलाशनाः । | दम नाग सोग शरापके भुज का श्रपराघ करगे, उस्‌ 


. विमितं (र को श्राप निनारण्‌ करद, श्रापकी यदी छपा हमको 
तिमित नवार््योऽसा सादः क्रियतामिति॥४३।| चाये ॥४॥ जव दने धनं देखा करनेको खीकार 


तेयेति च मया परोक्ते दव्य पातालमूषलं ‡ | करलिया तव उन्न सुभे पाताल के दिव्य श्रा 
भूपितताहं तथा पु्मगन्धवासोभिरुत्तमेः ॥४४॥॥| षणो तथा पुष्य, गन्ध शौर उत्तम वद्य शादि 
समानीता तथालोकमिमं तेनानिलािना । | से विभूषित क्रिया 1७४ फिर वी इद्ध नाग सुमे 


पपा षस लोक मँ पर्चा गया श्रौरमे पटिजलेकी तरह 
पृरा यया फान्तिमती पूव्ववद्रपशालिनी ॥४५॥ कान्तिमान्‌ तथा रूपवती हेग ॥ ४५॥ सव श्रा. 


इति रूपवती म रा सव्वलङ्कासभूषिताम्‌ । | भूयरो सुक छम रूपवती फो देखकर धन दुष 
जग्राह दृदृकंशथ्यं हसुकामः सुदुम्म्तिः ४ दके ने दरण करने फी शच्छा से सुमे पकड़ 
युपादवाहुवलेनादं पत्र विमोतत | | लिया ॥५६॥ दं राजङमार | मसा इच्छाया आप 

४ र , याहुवरल स दुध्रा है । हे महावा ! एसि रपा 
तत्‌ सीद महावाहो मां भरतीच्छ लया तमः । | कर युको शरद कीजिये । सत्य कती ह, 


भूक सजपत्रोऽन्यो नास्ति सत्यं ब्वीस्यदम्‌ ४७ संसार मे श्रापके तुल्य दूसरा सजङ्खमार नदीं है ॥ 


इति शीमाकंरुदेयपुराण में श्रवीक्षित चरित्र (४) नाम १२६ श्रध्याय समाप । 
~ 7+०"€4-- 


एकपौक्चाहसमों भष्याय 
माकंरुडय उचाच । व १ ६ | 
{ । ध्रवीरचित्त ने विशाल्लिनी के वचन सुनकर 
इतत स्या वचः भुता स्मता पिदेवचः म्‌ । श्रएने पिता फे वचनो को याद्‌ किया जोकि उन्दो; 
किमिच्छके यदुक्त' तेन भूभृता ॥ १॥| ने श्रगीषठित से उसके किमिच्छक वत के अवसर, 
त ४ पर भरतिक्षा करने पर कटे थे ॥१॥ किर राजङमार | 
्त्युवाच स तां फन्यामवीक्िचुपतेः इतः । | श्रवीक्तित ने उस कन्या से जिने कि उनके कतये| 
४ सखव भोगो को छोड दिया था शरीर जिसका कि। 
साद्रागसनाः कन्यां त्यक्तभोगाश्च तच्छते ॥ २॥| ्रुराग श्रवीदतित मे था यद कहा ॥२॥ हे सुंदरी !' 
यदाहं [सन्वीं सा ¦ जो किमने तुमको शतरर्रोसे दार जाने पर छोड़ 
दाहं स्यक्तबांस्तन्वां श | वा न भाय १ 
. विजित्य शतरन्‌ सम्प्रा लं मयात्र करोमि किम्‌ सीकार न कद्ग तो क्या करूंगा {॥३॥ 
५ कन्या बोली-- 
व से रभरीय चन मेँ श्राप मेरा पारिग्रहण करो, 
मम पाणि शाण त्वं रमणीयेऽत्र कानने । स व 
सकामायाः सकामेन सङ्गमो गुणवान भवेद्‌ ॥ ४ ॥| दोता दै ॥४॥ | 
राजपुत्र उवाच राजङ्कमार वोले-- | 
४ + त्र | ठम्दारा कल्याण दयो, पेखा ५ । इसका 
एवं भवह मं तै गिरवा कारणम्‌ । कारण विधाता दी दै, नन्यथा यहाँ < 


जन्या कथमन्यत्र त्वमहञ्य समागतः ॥ ५॥ पास केसे राता {॥५॥ 


न= ~ =" ---------- --------------- 


¡ 


४०६ माकंरडेयपुराण ० १२७ 


माकंरडेय उवाच माकरडेयजी वोक्े- ह 
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्नो गन्धव्वस्तुनयो रने । दे कोषटुकि मुनि ! इसी अधघसर पर नय नाम 


प्क गन्धर्वं वहाँ बहुत से गन्धर्वौ शौर श्रष्सराश्ं 
के साथ श्राया ॥६॥ " "द - 
गन्धं बोला- । 
„ ह राजङ्मार ! यह मानिनी मेरी पुत्री भामिनी 
है जो फि अगस्त्य सुनि के शाप से विश्षाललकी 
पुत्री इई ॥ ७ ॥ खेलते हुए इसने बालकयन मे पक 
चार ्रगस्त्य सुनि को कुपित करदिया जिससे कि 
उन्होने इसे मनुष्य दोजने का शाप दे दिया ॥ ८॥ 
फिर हम लोगों ने सुनि .को प्रसन्न करके कहा, 
“यह श्रवोध वालिका है इसे इसने श्रापका श्रप- 
राध किया है, श्राप प्रसन्न होकर कृपा कर” ॥ ६ ॥ 
वह महामुनि फिर भखन्न होकर हमसे ` यदह बोले 
कि वालिका समभाकर ही दमने यह थोडा सा 
शाप दिया है, यह श्रन्यथा नहीं होसकता ॥ १०॥; 
श्रगस्त्य के शाप से दी यह मेरी खुन्दर पुत्री 
भामिनी सजा विशाल के घर उत्पन्न हुई ॥९१॥ तँ 
इसके लिये ही यहाँ राया ह, श्राप मेरी एनी इस ` 
राजकुमारी को ब्रहण कीजिये, इससे आपका एक 
चक्रवतीं पुत्र उत्पन्न दोगा ॥ १२॥ 


वराप्वसेभिः सष्टितो गन्धर्ैरपरैदतः ॥ ६ 
गन्ध्व्वं उवाच 


राजपुत्र सुतेयं मे भामिनी नाम मानिनी । 


ञ्रमिशापादगस्त्यस्य विशालतनयाऽमवत्‌ ॥ ७॥ 
वाज्लभावेन योऽगस्त्यः कोपितः क्रीडमानया । 
ततस्तेन तदा श्रा भादुषी खं भविष्यसि ॥ ८ ॥| 


लियमकविविक्ि ०३ 


प्रसादितः स॒ चास्मामिवालेयमविवेकिनी । 
तवापराधाद्धिमषं प्रसादः क्रियतामिति ॥ 8 ॥ 
प्रसायमानः सोऽस्माभिरिदमाह महयुनिः। 
लेति मत्वा शापोऽ्पो दततोऽस्या नान्ययेष तत्‌ ॥ 


षति शापादगस्त्यस्य विशालमवने शुभा । 
नातेयं मतमुता सुभ्मामिनी नाम॒ नामतः ॥११॥ 
स्याहं ते प्राप्नो श्हाणेमां दपास्मजाम्‌ । 
पमातमजां सुतस्तेऽत्र चक्रयत्ती भविष्यति ॥१२॥ 
माकरुडेय उवाच आकरदेयसी वोक्ते- 
पित्ुक्त्वेति तस्याश्च स पाणि पार्थिवात्मजः । | राजङ्कमार ने उस गन्धव से कदा कि पेसादी 
ग्राह विधिषद्धोमं चक्रे तत्र॒ च तुम्बुरुः ।॥१३॥| दोगा नौर विधिवत्‌ उस कन्या का पारित्रदण 
पजयुरदेव-गन्धव्वां नचतुश्वाप्सरोगणाः । क्रिया, उस समय तुम्बुरु खनि ने वहां पर वन 


छया ॥ १६३॥ उस श्रवसर पर देव भौर गन्धर्व, 
(प्पाणि सखबुमघा देववाचानि सखन; ॥१४॥| गाने लगे, श्र्सरायें नाचने लगीं. मेध पुष्य वषां 
वेवाहे राजपुत्रस्य तया तत्र समेयुषः । 


करने लगे तथा देवता लोग वाजे बजने लगे ॥१५; 
पमस्तवसुधा्ाण-कतुंकारणमूतया = ॥१५॥| चूक उस कन्या का विवाह. राजछमार ॐ. साथ 
[तो गन्धर्न्यलोकं ते सह तेन महात्मना ! समस्त पृथ्वी के अण के लिये हमा था इसलिये 
५ र्‌ ये सव मंगलक्ृत्य बह पर हुए ॥ ९५॥ हे करौष्टकरि 
निःशेषेण ६ ने ॥१६॥ सुनि ! फिर उस महात्मा गन्धव के साथ ते सव 
पमिन्था शदे पादं सथीक्षिनरुपनन्दनः | तथा राजक्कमार श्नौर कन्या गन्धर्वं लोक को -गयेः 
रा च तेन सम ततर भोगसम्पर्समन्विता ॥१७॥| ॥ १६॥ वहाँ खव भोग सम्पत्तियं से युक्त दोकर 
पदाविदतिरम्येऽौ नगरोपवने तया । | सजछमार अवीक्ित श्रौर भामिनी ने.खूव विहार 


क्रीदति समं क्रिया ॥१अ अवीर्तित अपनी स्री ॐ साथ कभी 
दति समं तन्वया कदाचिदपपन्वेते ॥१८।| अत्यन्त रमरीक नगर या उपवन म ओर कमी 
दाचित्‌ एलिने नधा हंससारसशोभिते । | पर्वत पर क्रीड़ा करते॥१ कभी दंस चनौर सारस, 
(दाचिद्धवनस्यान्ते भासादे चातिशोभने ॥१६॥ से युक्त नदी ॐ किनारे ओर कभी भवन के अन्त 


महारदेेष्व्येषु बहम मे रति सुन्दर महलमे ॥१६॥ तथा श्रौर भी विहार 
भारदेशेषन्येषु रमणीयेष्वदनिशम्‌ । करने योग्य रमणीक देशों म राजकुमार वीक्षित. 


रेमे स हितस्तन्वया सा च तेन महात्मना ॥२०॥| शरीर विशाल-कन्या दिन रात रमण करते ॥ २०॥ 
` ख. १ वर्षं सकूपानादिकटुत्तमम्‌ । . | सुनि, गन्धव श्नर किन्नरः आदि उन दोनो ॐ लिये 


उपनह्‌ स्तयोस्तवर युनिगन्धव्वकिन्नराः (२१ भोजन की (सामी, चन्दन, वख, माला श्रौर 
तथा च रमतस्तस्य भामिन्या सह दरे । शरनेकों पेय पटाथं उपरिथत करते थे ॥२९॥ किर 


त उस भामिनी के मभ गन्धव 
गन्धन्वंलोके वीरस्य पुत्रं षा सुषवे शमा ॥२२॥ त व क 


तस्मिन्‌ जाति महावीयं गन्धर्वाणां महोत्सवः । | इश्या ॥ २९॥ उस महापराक्रमी पुरुपसिदे उतपन्न 
वभूव सनुजन्याप्रे तेन काय्येमवेक्षतामू्‌ ॥२२॥| होने पर गन्ध मं वडा उत्सव हृा,कारण्‌ गन्धव 
लगु; फेचित्‌ तयैषान्ये सृदङ्ग-पटदानफान्‌ | | उससे श्रपना काम निकलना चाहते थे ॥ २३॥ 


दिकास्तथ कर गन्धर्वं गाने लगे, छ शदङ्ग वजाने लगे 
अवादयन्त चैवान्ये वेशु-चीणादिकांस्तथा ॥२४॥ तथा शुध वरु श्रौर वीएा' बजाते लगे ॥२०॥ बहा 


नरृतुच तया तत्र वहवोऽप्रसां गणाः । | बहुत सी च्रण्सरान्रो ने दत्य किया तथा मेधो ने 
पष्पृटषठिचो मेधा नग्ने दुनिस्वना; ॥२५।॥| मीठे स्वर से गरज कर पुष्प-बपां की ॥ २५॥ उस 
तथा दोलाह सिन्‌ यत॑माने तम्यरः। फोलादल के वत॑मान होते हुए भी नय गन्धव ने 


व तुम्बर सुनि को वुत्ताय! रौर युनि ने वालक का 
तनयेन स्पृतोऽभ्येत्य जातकम्माकरोन्ुने ॥२६।॥| जातक संसार किया ॥२६॥ उस उत्सव भं सव | 


देवाः समाययुः सर्व्वे तथा देदर्पयोऽमलाः । देवता, देवरं तथा पाताल से शेप, वासुकि श्रीर 
पाताल्‌ प्रगनदराथ शेपयासुकि-तक्षकाः ।२७॥| तच्तक चादि नागेन्द्र श्राय ।२७॥ दे द्विजोत्तम |; 
तथा देवासुराणाश्च ये प्रधाना द्विजोत्तम | | इनके श्रतिरिकत देवतार्थो, अयो, यक्तो, शको , 
य्राणां गुद्कानाश्च वायवश्च तथाखिला; ॥२८॥| शौर समस्त वायवो मं जो भधाने वे सव अये, 
तदाऽतैरोपरपिदेव-दानव-पकौः | | उन श्राय हृण ऋपि, देवता, दानव, नाग श्नौर 


नियो क ४ } 

ग्पर्वयासां । | सनियो से गन्धर्वो का बह मह्या नगर एक दम; 
निबा्तममूमन्वम^ण 1 अरा) इसके श्ननन्तर तुस्बुर मुनि ने! 
ततः स तुम्बुरुः कृतवा जातकम्माद्का करयाम्‌ । | उस वालक की जातकं आदि करिया कर स्ुति 


चक्े स्वस्त्ययनं तस्य वालस्य स्त॒तिपूल्येकम्‌ ॥२३०॥ पूव स्वस्तिवाचन क्रिया ॥ ३०॥ शौर कदा कि: 
चक्रवत्तीं महावीर्यो महावाहमहावलः । | दुम चक्रवर्ती, मदापराक्रमी, मदावाहु, मदाबली, 


४ ५ + होकर बहुत काल तक समस्त पृथ्वी का राज्यं, 
महान्तं कालमीरित्वसेपायाः क्षितेः इर ॥२१॥| करो 1 आसत शादि सवं तोपा 


एमे शक्रादयः स्च लोकपालास्तथपयः । तथा सतपि तुम्दास कस्याण कर रौर तुम्दाय, 
सस्ति कर्व्न्तु ते वीर वी्॑ञ्चारिविनागनम्‌ २२॥| पराक्रम शवुश्रों का नाश ५ हो २१ 
मर्द तव पिवाया् बाति लयो न यो रनः । || की बा कमार कवय = ८ ० 
मर्‌ ते विमलोऽक्तीणोऽ्वपम्यायास्त द क मर ॥ पश्चिमी वायु दको 
पथिमस्ते मच्दीय्यषुत्तमं ते प्रयच्छतु । उन्तम परगक्रम प्रदान करे तथा उत्तर कीवायुः 
वत्तं यच्चतु चोक्षं मरत्‌ ते च तथोरः तुम को उच्छृ वल दे ॥ ३५ ॥ स्वस्ययन के .. 
इति स्वस््ययनस्यान्ते धागुघाचाशएरीरिणी । | श्राकाशवासी इहै कि शु नुम ने जो मखत शबद | 
मरत्‌ पवेति बहुशो यदिदं गुरुर्रवीद्‌ । | वदु उपयोग किया हे इसलिये य थवी पर सुच ( 
मरुत्त इति तेनायं शपि ख्यातो मथिष्यति ॥२५॥| नाम से विख्यात होगा ॥३५॥ पृथ्वी पर सव सज 
मि चास्य महीपाला यास्यनत्य्ञावशा यत । | लोग लकी घाल ॐ चले शरीर चह वीर उन, 
एप सर्व्वक्षितीशानां घीरः स्थास्यति मुद्धनि ॥३६॥ सव राजानो का शिरभौर दोगा ॥ ३६॥ यद चक्र 
चक्रवत्तीं महावीर्य; स््रीपवतीं मदम्‌ । | वर्ती मदाराज दोगा रीर सातो दीप 1 
क्म्य पृथिवीपालानयं भोधष्यत्यवारितः ॥२७।॥ को यजासि केकर निर्विषय रन्योपमोग्‌ क 


# 


०८ 


घान; पृथिवीशानां मनिष्यत्येष यञ्विनाम्‌ । 


माकंण्डेयपुराण 


यज्ञ करने चलज्ञे यजाश्चाँ मे यह प्रघान देगा तथा 


इखकी चीस्ता श्रौर पराक्रम अन्य राजार्थो. की 


प्रपिकयं शौ्यवीरययेण भविष्यत्यस्य राजघु\।३८॥ श्रपे्ता अधिक होगे ॥ २८ ॥ 


भाकैरडेय उवाच 1 
स्याकण्यं वचः स्वै ेनापयक्त दिवौकसाम्‌ । 
[तषर्विम-गन्ध्वांधास्य माता तथा पिता ॥२६॥ 


माक॑रडेय वोज्ते- 

` हे विप्र} देवतानाम से किसी के दासं के 
हुए एनं शन्दों को सुनकर वे सव गन्धव तथा उस 
बालक के माता पितता बहुत प्रसन्न इए ॥ ३६॥ 


इति श्रीमाकण्डेयपुराण मे अधीक्ित चरित्र (६). ताम १ २७बँ शरध्याय समाप्त । 
= नढन2ः << ~~ 


एकसोअटाह एवा अध्याय 


माकरुडेय उवाच 
त; `स रजपुत्रस्तमादाय दयितं पतम्‌ । 
(५५ 

द्धाज्चाञुगतो विगर गन्धर्ववैराययौ परम्‌ ॥ १॥ 
र. पितुर्मबनं प्राप्य चन्दे पितुरादरात्‌ । 
रणौ सा च तन्वङ्गी हीमती दृपतेः सुता ॥ २॥ 
याह राजपुत्रोऽपौ श्दीत्वा बालकं सुतम्‌ । 
म्मासनगतं सूपं रज्ञा मध्ये ऊरन्धमम्‌ ॥ ३ 
[खं पौत्रस्य पशयैतदुत्सङ्गस्थस्य यन्मया । 
केमिच्छके परतिङ्गातं तुभ्यं मातुः ते पुरा ॥ ४॥ 
स्यक्त्वा पितुरुत्सङ्ग तं कत्वा तनयं ततः । 
पथारृत्तमशेषं स कथयामास तस्य तत्‌ ।॥ ५॥ 
¶ परिष्वस्य तं पौत्रमानन्दास्राषिलेक्षणः । 
पमाग्योऽस्मीत्यथारमानं प्रशशंस पुनः पुनः; ॥ & ॥ 
[वः सोऽध्यादिना सम्यगन्धर्व्वान्‌ सथुपागतान्‌ | 
मम्मानयामास युदा वपिस्पृतान्यपयोजनः ॥ ७॥ 
तः पएरे महानासीदानन्दः पौरषेश्मसु । 
रस्माकं सन्ततिनाता नाथस्येति महा्रुने ॥ ८ ॥ 
पुष्टे पुरे तस्मिन्‌ गीतवाचयवराङ्गणे । 
वेलासिन्योऽतिचाव्वंडगचो नशतलास्यत्तमम्‌ ॥६ 
तजा च दिजघुख्येभ्यो रतनानि च वसूनि च । 

` ` षश्नाएयलङ्कारानददुहृष्टमानसः ॥१०॥ 

स बालो वष्रपे शुह्छपक्षे यथा शशी } `. 

`  भ्ीतिजनको जनस्येष्ट्च सोऽभवत्‌ ॥११॥ 
्राचाय्यांणां सकाशा स परा्ेदान्‌ जगह ने । 
त; शाद्लाण्यगनेषाणि धलु्जदं ततः परम्‌ ॥१२॥ 


माकैरडेयजी वोले- 
हे करौषएकि जी ! फिर राजक्कमार अवी्ितं 
प्रिय पुत्र को लेकर गन्धर्वौ के साथ शछपने 
नगर को श्राय ॥ १॥ पिर उन््ोने पिता के भवन 
म पहुंच कर बड़े आदर से पिता की बन्दनाकी 
तथा लंजायुक्तं विशाल-कम्या' ने भी अपने श्वसुरं 


चरणों मे शिर नबाया ॥२॥ फिर राजकरुमारःने ` 


चालक को द्य नै ज्लेकर राजान्नं फे मध्यम 


धर्मांसन प्र वैदे हु महाराज करन्धम से कदा॥२॥ 
जेसी कि मैने माता के किमिच्छक चत के ्रवसर 


पर श्रापसे प्रतिज्ञा की थी आप श्रव पनी गोद 

लेकर नाती का मुख देखिये ॥४॥ यह कट कर 
उन्होने पुत्र को अपने पिता की गोद मँ देदिया 
तथा जो कुच इत्तान्त जव से श्रवतक टुश्रा था 
उनको सुना दिया ॥ ५॥ उस पौत्र को छातीसे 
लगाकर महाराज करन्धम फे नेव श्रध्र से पूं 
होगये ओर उन्होने वार चार अपने भाग्य की 
सराहना फी ॥ ६ ॥ फिर सहाराज करन्धमने प्रसन्न 
चित्त से श्रये इष गन्धर्वो की श्यं श्रादि देकर 


` | भली भाति पूजा की॥७॥ दे महामुनि कौष्टकिं 


जी | फिर उस नगर के नागरिको के घरमे महान्‌ 


उत्सव हुश्रा  प्रजाजन कहतेधे कि हमार महासज' ` 


के सन्तान इद ॥ ८॥ फिर उस दर्षोन्लासयुक्तं ` 


नगर मे विलासिनी वराङ्गना गीत वाय सहित 


म + 


उन्तम नृत्य कर रहीं थीं ॥६॥ महाराज ने भी हित ` 


होकर ब्राह्मणों को रल, धन, गाय, वख शरीर 
अलङ्कार आदे दिये ॥११॥ फिर पितरों को प्रीतिः 

दायक श्रौर मदुष्यो को परिय वह वालक शुक्लपक्त 
के चन्द्रमा के समान वदढृने लगा ॥ ११॥ हे सुनि 


श्राचा्यो के पास उसने वेदो, समस्त शाखो न्नौरं ` ` 


धयवेंद की शिक्ता प्राईे ॥१२॥ ८ 


०१२८ ५२ मूकेर्डेयषुराण ४०६ 


छृतोदयोगो यदा सोऽभूत्‌ सङ्गकाम्युककम्पैणि | 
छन्येषु च तथा बीर; शसु पिनितश्रमः ॥१३ 
ततोऽन्वाणि स जग्राह भागंबाहभूयुसम्भवात्‌। 
विनयावनतो धिप गुरो; प्रीतिपरायण; ॥१४॥ 
ग्रहीता छती वेदे धनुर्ववदस्य पारगः । 
निष्णातः सव्यिद्यासु न वभूव ततः परः ॥१५॥ 
विशालोऽपि सुतावात्ताुपलमभ्यासिल्लामिमाम्‌। 
हष॑निर्भरचित्तो ¢ 
ऽभूदौहि्िस्य च योग्यताम्‌ ॥१६॥ 
अथ राना शत्ुतं दष्ट माध्रमनोरथः । 
यङ्गाननेकान्‌ निषाद्य द्त्वा दानानि वार्थिनाम्‌१७॥ 
छृताशेषक्रियो युक्तः पवर्शथ्पतो महीम्‌ । 
परिपाल्यारिविनयी वलुद्धिसमन्वितः ॥१८। 
स॒ यियासुर्वनं पत्रमवीक्षितममापत । 
पत्र हदोऽस्मि गच्यामि वनं राव्य श्दाण मे॥१६॥ 
छृतङृत्योऽस्मि नास्त्यन्यत्‌ किंचित्‌ खदभिषेचभात्‌ 
दुनिष्पन्नमतो राज्य तवं शृहाण सयार्पितम्‌ ॥२०॥ 
इत्युक्तः पितरं भा सोऽवीलिन्दरपनन्दनः 
मरश्रयावनतो भूत्वा यियासुस्तपसे वनम्‌ ॥२१॥ 
नाहं तात करिष्यामि एृथिन्याः परिपालनम्‌ । 
नापैति दयम मनसो राज्येऽन्यं त्वं नियोजय ॥२२॥ 
तातेन मोक्षितो बद्धो न स्वी््यादहं यतः । 
ततः कियत्‌ पौरुषं मे पुरुषैः पारयते मही ॥२३॥ 
योऽहं न पालनायालमात्मनोऽपि षडुन्धराम्‌ । 
स कथं पालयिष्यामि राज्यमन्यत्र विक्षिष ॥२४॥ 
मन्वी सथम्ैः पुरूषो यथान्येनावहूते । 


श्रात्माऽमोहाय भवतो बन्धनादुयेन मोक्षितः । 
सोऽहं कथं भविष्यामि श्ीसधम्मां महीपतिः ॥२५॥ 


व ते प्रि शौर प्रिता से पुत्र भिन्न नहीं दै। 
॥ रपति 
न भिन्न एव पत्रस्य पिता पुरस्ता पः हे व! ञ्गर तुमको पिता ने न्धन से चुद्राया 


नान्येन मोक्षितो वीर यस्त्वं पप्रा विमोक्षितः॥२६॥' ठो किसी ठसरे ने नदी छद्ाया 1२९॥ 


फिर उस वीर ने खड्ग, धठुप तथा ्रन्य श्ल, 
शख की विया जानने की इच्छा की ॥ १३॥ हे 
विग्र । फिर उस्ने विनय से नम्र होकर तथा शुख 
का प्रीतिभाजन वनकर भृगुचंशमे उत्पतन शुक्राचार्यं 
से सखो की धिया प्रह की ॥ १४॥ वह श्र. 
विया का क्ञाता, वेदों का परिडत तथा धुरवेद मे 
पारगामी दुआ । बह सखव विधां मे कुशल हया, 


श्रपनी पुत्री का सव दृत्तान्त जानकर तथा श्चपने 
धेवते की योग्यताका हाल खुनकर त्यन्त प्रसन्न 
हप ॥१६॥ फिर महाराज करन्धम ने पौत्र रूप मेँ 


यज्ञ करिये नौर याचकोंको दान दिये ॥१७॥ उन्दने 
पने छुटुम्वियँसे युक्त होकर भ्रेष क्रियाच्रों को 
किया तथा धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन करते हप 
वल श्रौर बुद्धि से युक्त होकर शतुश्रों को जीता ॥ 
फिर वन जाने की च्छा से उन्होने अपने पु 
्रवीक्तित को लाकर कडा, “हे पुत्र | अरव मँ 
वृद्ध ह्या, मै श्रव वन को जाता ह, तुम राज्य को 
ग्रहण करो" ॥ १६॥ मै कतछृत्य ह, तुमको राज- 
तिलक देने के अतिरिक्तं मुभे ङ्ध अर नीं 
करना है, श्रव तुम मेरे दिये हए स निष्कंरक 
राज्य को प्रहरण करो ॥ २०॥ फेला कटे जाने पर 
राजकुमार अवीक्लितने विनेयसे नम्र दयोकर तपस्या 
के किये यन जाने की इच्छा करनेवाले श्रपने पिता 
से कहा ॥ २१॥ हे तात ¡ मै प्रथ्वी पालन नहीं 
करेगा, मेरे मनम बड़ी लज्ा श्चाती है, श्राप 
किसी दूखरे को यह राज्य दीजिये ॥ २२॥ जब 
राजाश्नो ने मुभको वाध लिया था तव मै श्रपने 
वल से न ्ूटकर पिता के दवाय हुडया गया था 
तो इसमे मेरा क्या पौरुष हु ? पृथ्वी का पालन 


मै अपनी आत्मा का भी पालन न कर खका तो मँ 
पृथ्वीका पालन किंस तरद कर सकृगा १ इसलिये 
ये राज्य किंसी श्नौर को दे दीजिये ॥ २४॥ मन्ी 
धर्मात्मा पुरुप बही है जो किसी के आधीन न दो, 
मेरा तो भमत्ववश श्रापने चन्धन छुडाया है अतः 
खली के सदश धर्म वाला मँ राजा किंस प्रकार 
हो सकता हं १॥ २५॥ 

पिता बो्ते- 


उससे कोहं विद्या न वची ॥१५॥ राजा विश्वा भी \ 


श्रपने मनोरथ को सफल हुश्रा देखकर अनेकौं , 


पुरुपाथयुक्त मद्य ही कर सकते द ॥२२ ॥ जोकि , 


४१० .याकंरडेवपुराख | । श्रमः १२६ ` 


पुज उवाच पुत्र बोला-- 


हृदयं नान्यथा नेतुं मया शक्यं नरेश्वर | दे रजेश्वर ! श्राप मेरे दय को नदीं बदल 


। सकते है, आपके द्वारा चन्धन से दुड्ये जने की 
हृदये दीममातीव यस्त्वं भोकषितस्त्वया ॥२७।॥ भर द्वद वदी लज्ञ दै ॥२७ जो पिता के उपा- 


पित्रोपात्तां भियं यन्तं पित्रा ङृच्छात्‌ सदुः । | जित घन से जीविकोपाजेन करते है, पिता द्वा 


कष्ट से छुटकारा पते दँ थवा उनके नाम सेदी 


विन्नायते च यः पित्रा मानवः सोऽस्तु नो इले २८।॥ ज्ञात होवे हे वे पुरुप हमारे ल मे नदीं दोते॥२८॥ ^ 


मस्वितवितानां सयात जो श्रयते दी द्वारा उपासित धन से जीविकोपाजनं 

स्वय स्याति स्वयद्पुषाम्‌ । | करते है त श्रपनी ही करनी से ख्याति पाप 
| निस्तीणंहृच्छाणां या गतिः साऽस्त मे गति; || करते है तथा जो श्रपने वल से ही कटं से चुर 
म ५ हिसा मेगतिः॥ कारा पाते है पेसे पुरूषो की गति म चाहता दहं ॥ 
माकरुडेय उवाच क मा्करएडेयजी वोल्ते- ०8 

इत्याह बहुशः पित्रा यदाप्युक्तोऽप्यसौ शुने । यद्यपि पिता ने वहत कुद कहा परन्तु श्वी. 
तदा तस्य सुतं राष्ये मरुत्तमकोन्टरपम्‌ ॥३०॥ 4 वदी र 1 महाराजने  मलीध 
+ महात्‌ पुत्र मरुत्त को राज्य 7 ॥२०॥ उसने पिता 

स पित्रा समरुङातं राज्यं भाष्य पितामहात्‌ । की आदा दे पिवागद दाया राज्य भात कर मि 
चकार्‌ सम्यक्‌ सुदामानन्दयुपपादयन्‌ ॥२३१॥ चगो को चहुत श्रानन्द्‌ पर्टुचाया ॥ ३९ ॥ राजा 


राजा करन्धमेश्चापि वीरामादाय तां तथा| | करन्धम भी अपनी खी वीरा के साथ शरीर श्रीरं , 


वनं जगाम तपसे यतवाक्कायमानसः; ॥३२।॥| मन को वश मे करके तप करने फे लिये बनको 


तत्र वषहस स तपसपता पुड्वरप्‌ । | किन तप कर ्रयना शरीर त्याग कर इन्द्रलोकं 


हाय देहं दपतिः शस्याय सलोकताम्‌ ॥३३। को गये 1२३] दौष्क । इसके वाद उनकी सी - 


सास्य पत्नी तदा वीरा वषांणाममरं शतम्‌ । | वीरान श्रपने शरीर पर भस्म रमा कर देवतार्भौ 
तपश्चधार॒विपरपं जटिला मलपङ्किनी ॥२४॥ के सौ वषो तक तप किया ॥ २४॥ उन दिनों बः 
सालोक्यमिच्छती भः स्वगेतस्य महात्मनः । फल, सूल भक्तण करती हुई, शुक्राचार्यं के श्रा्रम 
फलमूलकृताहारा॒भागवाश्रमसंभ्रया । | पर ब्राहमशियों के मध्य भ बिभसेत्राभै ततपर 
द्िनातिपत्नीमध्यस्था द्विनशुशरुषणारता ३५|| होकर रहती थी ।३५॥ | 


इति शीमाक॑ण्डेयुराणमे अ्रवीक्षित चरित्र (७) नाम १२८ अध्याय स० | ` 
~ स्फ स्कर 


एकपोऽनतीस्वां अध्याय 
जोषटुकिर्वाच जोषए्किजी बोलते धः 
भगवन्‌ विस्तरात्‌ सव्वं ममैतद्‌ कथितं त्रया ] ` ` {हे मगवन्‌. । आपने शमस मदाराज .करन्ध 
करन्धमस्य चरितमवषीकि्रितष्व यत्‌ ॥ १॥| व रजछमार्वीच्तित का चरित्र विस्तार परवद 


¦ -.- १. दपेतस्य महात्मनः | ` व रत, 
श्रोतुमिच्छामि चरितं भयते सोऽतिचेधितः ॥ क) खुनना चादता हं । मेने खुना है कि महागज मर्त 


चक्रवर्ती महाभागः शूर; कान्तो महामतिः] 
ध्म॑षिद्धम्मङच्चै 


९ श्रवीर, रूपवान्‌, बुद्धिमान्‌, धर्मज्ञ, धर्मात्मानं 
च्चेव्‌ सम्यक्‌ पालयिता भुवः क । 


चलते गये ॥ ३२ ॥ वह पर वे एक हजार बं तकं . 


कहा ॥१॥ रव मेँ श्मवीक्षित के पुज मर््तका चरि, . 


चड़ चेष्टावान्‌ थे ॥ २॥ - उन चक्रवती, महामाय, 


पे. 


॥ २॥ श्वी कामली भांति पालन किया ॥ ३॥.. ~: ` 


° १२६ - माकएटेयपुराण ४११ 


माकँरडेय उवाच माकंरडेयजी योल्े-- 
स पितरा समलुङ्गतं राज्यं भाप्य पितामहात्‌ । पिनाकी श्रान्ानुखार उन्दोनि पितामहसे ° ०५ 


न प्राप्त कर प्रजाकाश्रौरख ति ५५ 
; प्रलयामास पिता पुत्रानिवौरपान्‌ ॥ ४ ॥| पालन किया ॥ ४ ।न ह ध 


इयान सुहृन्‌ यत्तान्‌ यथावत्‌ स्वाप्नदक्षिणान्‌। | परोहित श्रादि के श्रादेश से प्रसन्न चिन्त दं ५ 
ऋलिकूपुरोहितादेश-रम्यचित्तो महीपति; ॥ ५ | वहत से यजञ किये शरीर ब्राहमणो फो दकधिराः दौ ॥ 


क उसका राज्य सातां दीपो म भ्रखरड था तथा 
तस्यामतिहतं चक्रमाघीदुदधीषेए स्स ] श्राकाश, पाताल श्नौर जल श्रादि मे उसकी गति 
गतिधाप्यनवच्छित्ना ख-पाताल-नलादिपु ॥ ६॥ = थी ॥ ६॥ हे विप्र ¡ पिर उन्दने धन संग्रह 

। व \ यथावत्‌ अपनी क्रियाश्रो म तत्पर होकर 
० बि ५ स्क्गियापरः । महायक् कयि शरोर इन्द्र आदि देवताघ्रों का पूजन 
रयन्‌ स महायङ्गदेवानिन्द्रपुरोगमान्‌ ॥ ७॥| करिया ॥ ७॥ उनके राज्य मे चारों बरं ्रपने-्पते , 


इतरे च यथा वणां; से स्वे फम्मेणयतन्दरिता; | | वणं चौरः श्रानम मे प्रदत्त होकर महाराज सरे धन | 


तदुपाचधनाधक्ररिष्टप्तादिकाः \ ॥ ८ ||| लेकर अरिटनाशक क्रियाय करते थे॥ ८॥ दे श्रेष्ठ 
दुपा्भनानुरिष्ापृतादिकाः क्रियाः ॥८॥ दविज ! उन महात्मा मरुत्त ने पृथ्वीका भली प्रकार 


पार्यमाना मही तेन भरुत्तेन महात्मना । | पालन किया । उनके द्वयस इन्दादिक देवताश 
परस्पद्धं॒त्रिदशावासपासिमिर््विनसत्तम ॥ & ॥| को महाराज से स्पा होने लगी ॥ ६॥ उसने सव , 
„~. ॥ श्रजाश्रों को धन श्रादिं देकर पने से भी अधिक 
तेनातिशायिताः स्वे केवलं न महीक्षितः; । | कर दिया, अन्तर कवल इना ही था ते राना 
यज्विना देवराजोऽपि शतयङ्ञामिसन्धिभिः ॥१०॥ न कदलाते थे । रम्दोने सी यक्ञ करके देवराज , 
संवतो वि इन्द्र को भी श्रतिक्रमण किया ॥ १०॥ दे चिप्र | 

ऋलक्‌ तस्य तु संवतो वभूवाङ्गिरषः सुतः। | उसके ुरोदित श्र्गिा सुनि के पुत्र, बृहस्पति फे , 
भ्राता दस्पतेर्िपर महातमां तपतां निधिः ॥११।॥ भाई. ठेषोनिधि मदाप्मा संवत इय ॥ ६१॥ देव" ` 
{तः सुरसेषितः तारों से सेवित युश्जवान्‌ नाम पर्वत वणं का 
सौवर्णो युञ्जवान्‌ नाम पच्येत; ¡1 | था! महाय भवच उसका धिखर होकर श्रते 


पातितं तेन तच्छङ्ग हतं तस्य महीपते; ।*१२॥| घर जे ये ॥ १२॥ दे द्विज । उन्दने उस सुवणं 


क गादिकं से यक् का भूमिमाग तथा मदल त्यादि सौने के 
तेन यस्याखिलं यज्ञे भूमिभा हिन । चनवाये ॥ १३॥ मर्त के चरि की इन गाथां 


¢ $ 4 
भासादाशच कृताः श॒भ्रास्तपसा सव्वकाश्चनाः॥१३॥| को ऋषि लोग श भरकर गाते थे जिस भकार कि 
गाथाश्चाप्यत्र गायन्ति मरुत्तचरिताभ्रयाः। | वेदाध्ययन किया जाता है ॥ १४॥ दख प्रथ्वी पर 


सातव्येनषयः सर्व्व ्ुव्वन्तोऽध्ययनं यथा ॥१४।॥| मरुत्त के समान कोरे यक्न 5 राजा नदीं 
तेन समो नाभुदयनमानो भीते । | इ जिसकी कि यतालाच छ ९ दल शचः 
५ के चते इए थे ॥१५॥ उनके यक्षा म इन्त सोमपान 


सदः समस्तं यद्यजते मासादाधरैव काश्चनाः ॥१५॥ वके उन्मत्त होगे शरीर बराह्मसों फो जो द्या 


श्रमायदिन््रः सोमेन दक्षिणाभिर्दिजातयः। | दीगर स व व 
काणां ४ ¦ हृषः ॥ १६॥ जिख प्रकार राजा मस्त कै यत दप , 
६ परिवेष्टारः शकाघाचचिदशोचमा ॥ ४.५ उस प्रकार किसी श्न्य राजा के न हष, कारण ` 
यथा यक्ते मरुत्तस्य तथा कस्य महीपतेः । | ब्रह्मणा लोग जिनके घर 1 से पृं थे 
एव्म (५ ७ * रलपूर्णे चि ९ रदी छोड ऽ ॥ १७ ॥ उन्न 
; ॥१७॥| खबर को यञो मं दी चाड चोट 
इवबणमसिलं सक्त स तलो रौ । | मदत श्र यक्षो मँ व्राहरों दारा चोद्धे, ह उस 
भासादादिं समस्तश्च सवण तस्य यत्‌ खसं को शरन्य चरके लोग लेग्राय श्र उनदोन 
रयो पणां द्ललभ्यन्त तस्माद्‌ केचित्‌ तथा ददु; १८॥| उसमे से दान पुरय किया ॥ १८॥ उस छोड 


क कषः नये ग =. 
तेने त्यक्तेन शिष् ये- जनाः पूणमनोरथाः। । घन को पाकर उन लोगे मनोरथ सफल होगये 


[ 


ण 


भ 


४१२ माकेश्टेयपुराण ` अ्०१२६ 


-----------~------------------------------- न ~ 


छरीर उन्द्यँने उख धन के द्वारा देश-विदेर्शो में 
१ च यक्ञान्‌ यनन्तयव देशे देशे पृथक्‌ पृथक्‌) १६।। श्रनेकं यद किये ॥ ९६॥ डे छनिसत्तम !. उसके 


[स्यैव छव्वंतो राज्यं समस्यर्‌ पालयतः एनाः 1 | इस पकार प्रजा को पालते तथा राज्य क्ररते इष 


सत्तम ॥२०]॥ किसी दपस्वी ने चाकर उसे कला ॥ २०॥ हे 
वी कनि ववा ३ | नरवर ! तुम्हारे पिता की माला ने तपस्वियो के 


परतुमाता तवष्ठिदं श्रा तापसमरडलम्‌ । | समू कतो मदोन्मत्त खौ के विय से व्याङल देख 
[र पाभिमतदरममदोन्मतनैरेश्वर क ¢ ० दः 
चेषाभिमूतमुरगेमंद , 1२१) कर ज ङ्ध सुमते का. है बह खनो 1 २१९॥ 


देतासहस्ते ख्यातः सम्यक्‌ सस्पारय मेदिनीम्‌ । 
पेतामहस्ते स्यातः स दिनम्‌ स्वम को गये चौर मै चौन्वंजी के आश्रम पर रह 


तपथरणशक्ताऽ्टमिह चोव्वा्रमे स्थिता ॥२२। कर तपस्या कर्ती ह ॥२२॥ ओँ देखती हं कि 


पाह पश्यापि वैकल्यं तव राज्यं परशासतः । । उम्दारे सन्य मे जो विकलता पितरो को 

पितामहस्य ते नभूदुयत्‌ पूर्वेषाशच ते दप ॥२३॥ | ठम्दारे पितामदहके राज्यमे न शी ॥२३॥ त॒म निश्चय 
तासहस्य ततं नाभूहयत्‌ ए | भोगों म उन्मत्त हो रदे हो थना इन्द्रियों के 

तूलं भमत्तो भोगेषु सक्तो बाऽषिजितेन्द्रिवः । | बश्षीभूत होकर इतने अन्धे हो रहे हो किं साधु 


चारान्यठा यतस्तेषां दृष्टां न वेत्सि यत्‌ ॥२४॥ ओर अखाु को नदीं पदिचानते ॥२8॥ पाताल से 
चारान्यता यतस्तेषां दां न ेत्ि यच्‌ आकर सपो ने सात सुनि इमो क्षो काट खाया 


[नन भुजगैद॑शशालिभि ४१ । 
पातातादभ्युप्तस्तु दशशासतभिः । | ह तथा जलाश्रयोको अपने विषसे पित कर दिया 
दषा निदुताः सप्र दृषिताश्च जलाशयाः ॥२५।॥ ई ॥२५॥ चकि पदिलेखे दी नागों की वक्िदी जाती 


सवेदपूरीे षितं हृतं हे अतः इसको अपराध समकर सपो ने रोम 
दमूत्रपुरीपेण दूषितं हतं हविः । | ओर वियः को श्रपने पसीने, मून रौर बिठा से 


अपराथं सयुद्विर्य दत्तो नागवल्िशिरादत्‌ ॥२६।॥ पित किया हे 1२६॥ बे सुनि उन सपो व 
एते ससर्था मुनयो र भस्मीकत्त युनङ्गमान्‌ समथ हं क्रन्त इसका उनको अधिकार 
विन्ते ना षावि अ इसका अधिकार केवल तुमको ही हेर 
किन्तेषां ना त जब तक राजकुमार का जभिपेक नदीं होता है 
तावत्‌ सुखं भूपतिजेमोगनं प्राप्यते चुप | | तव ही तक्र उनको सुख दो सकता ॥२८॥ राज्या- 
अभिपेकजलं याचन्नभूर्हि षिनिपात्यते ॥२८॥ 1 पर व सोचना ८ 
मच क्न €, श्न कनिषहं तथा लेना 1 
8 श 
कानि मित्राणि ऋः शृध्रमम शबरोवं्ं कियत्‌ । कितनी ह, द श वथा भरे पद कनया 
पिरक्तो वा परेरभिननः प्रेपासपि कीदशः । कोन उनमे मिला हा है १ इस नगरमे कौन 
कः सम्यगत्र नगरे विपये घा जनो सम ॥३०।॥ मदुष्य तिषय भोय भ लि दै १५२०॥ चदं कोन 
, कम मे प्रवृत्त ह तथा कौन मूख है १ किसको 
धम्मंकस्माश्रयी सुदुः कः सम्यगपि वत्तते | | दरड देना चाहिये, कौन पालन करने योग्य दै 
`को दरञ्यः परिपास्यः कः ॐ बा पे तथा क्रिस मदुष्य को निवांसित कर देना चाहिये 
क दर्ज्यः परि वप | तातान विम स कोय ५ 
` उन्थिथेदभयाद्र दैशकालसवेक्षता । | रेण करते इ देश्व काल का विचार रखना चाहिये 
` चारांथ॒ चारयेदन्येरज्ञातान्‌ भृपतिषरेः ।\३२॥| वथा दूतो ची भी नियुक्ति कर पजा का इल 
चादि सवदे चरान्‌ दचानहीपरि जानना चाष्ठेये ॥द२ सव मन्वियो पर भी राजा 
न ददयान्हयपठिः ॥२२॥|| को चादिये कि शुचो को लगा दे 1३३ आरस्म 
रपपादा भृपतिनित्यं कम्मंस्यासक्तमानसः । | से दी सजा को इन कार्यो मे ध्यान देना चाहिये, 
नयेदिनं त्था सार्ध त भोगपरयणः। उसको दिन राति भोगों मे लिप्त न रहना चाहिये 


भोगाय ३७॥ हे राजम्‌ ? राजान का 
_ स्ना श्सस्ण्हण खं न भोगाय `मदीपते। नहीं दत दै | अ 


मर १३० भाकंरदेयपुराण ४१३ 


------------------_-----~----------- 
छ्ेशाय महते पृथ्यीखधर्मंपरिपालने ॥३५॥ पृथ्वी का पालन करने मे वड़ा कलेश होता ॥३५॥ 


राजाश्रौं को भली भांति पृथ्वी 
सम्यक्‌ पालयतः पृथ्वीं स्वधम्भ॑श्च महीपते । | का पालन करते हप स ॥ व । 


इह छेशो सान्‌ खगे परमं घुखमकषयम्‌ ॥ । शाला प 9 प क त स 
तदेतदवधुष्य त हि ना ठ २ # र सख होता =) 1 २६1 ५ नरेऽ्वर ! शतः यह सब 
हेत्वा भोगान्‌ नरेश्वर । समकर तुमको भोगोको छोडकर पुथ्वीके पालन. 
„ पालनाय शितेः केशमङगीकतुमरादसि ॥२७॥ के व क्लेश व चादिये ॥२७ 
एदगषीणां त तुम्दारे शासन : व्यसन है उसके कारण ' 
इति णं यद्य त्यि शासति । | श्पिया की यह दा हे । दे यजन्‌ 1 ठम सर्य 
धनङ्केतुकं भूप चारान्धो नापि वेत्सि तत्‌ ॥२८॥ न सुनि माये के ररण्‌ का चत्तान्त भी नदीः, 
स. जाने दो १२८ ॥ अधिक कदने से क्या है, दु 
बहुनात्र किगुक्तेन दुष्टे दण्डो निपात्यताम्‌ । को व प्रौर सजनो का पालन कीजिये 
= सख राजन्‌ ! उनके धम का छटा. भागः ` 
शिष्टान पाय वा । तुमको मिलते ॥३६॥ यदि तम भजा की रताः न 
शररक्षन्‌ पापमखिलं दुष्टेरविनयात्‌ कृतम्‌ ] करोगेतो जो पाप दु के दुर्विनय से होगा "उस 
५ क निस्संदेद तम भागी दोश्रोगे, भ्रव.जो तम्द्रारी 
समवाप्स्यस्यसन्दिग्धं यदिच्छसि इुरुष्व तत्‌ ॥४०॥| च्छा हो करो ॥५०॥ हे पृथ्वीपति ! यद मैने श्राप 
एतन्मयोक्त' सकलं यत्‌ तवाहं पितामही । से ज पकी 4 व 
इत्यैरं कदने के लिये भुभसे कदा था 
रुष्व स्थिते यत्‌ ते रोचते वसुधाधिप ॥४१।॥ श्रापको अच्छा लगे चह करे ॥७१॥ 


इति भरमाररडेयषुराण मे मरुत्त चरित्र नाम १२६ां अ० स०। 
-- मत ~< 


एकतौतीसवो अध्याय 


माव उवाच ( बोले- 1 
ए तपस्वी के इख प्रकार वचन सुनकर राजा ' 


इति तापसवाक्य स शला लञ्नापरो रप; । | मर्त वड़े लजित हप उन्दनि श्मपनेको श्रविवेकौ | 
पिखमां चारान्धमिल्युक्त्वा निश्वस्य जगहे धनुः १1|| नौर अन्ध श्चादि ककर लम्बी खास ली रौर 


, स लसितं गत्वा तमौ्वस्यशरमं धुप उढा लिया ॥ १॥ फिर उन्दोनि. शीर वव, 
ततः स त्वरितं गत्वा तमोौवव्यभरमं प्रति । | सुनि क श्ाशरम पर पेच कर पनी दादी वीर 


ववन्दे शिरसा वीरां मातरं पितुरात्मनः ॥ २॥ कोशिरसे व किया क वा 
॥ प केषाशीर्भि + स्वियौ को प्रणाम किया जिन नि किञ्च 
तापसाथ यथान्यायं  तेशाशीभिरमिष्ुतः । 1 वाभि व 
टा च तापसान्‌ सक नागेदं्ात्‌ एतान्‌ मि ॥ २॥| स द्य काटे जनि से नी पर पद दादे 
निनिन्द्रात्मानमसषद एरसतपां महीपति; । | फर ।सिचन्दन शमपने को बहुत धिकार चीर ४ 
=  मद्रीयपमवमन्यताम्‌ ॥ ४ || महाज मस्त ने उनसे कहा कि भाप लोगं ऽ # , 
श रे पराक्रम को देखिये ॥ ४॥ अव इन व्राणा के 
यत्‌ करोमिष्यनङ्गाना दाना ब्राद्यणद्धिषाम्‌। ४ 


| शनन दुष्ट सपौ काजो क मे करता ह वह देवताः, 
तत्‌ पश्चतु जगत्‌ सव्यं संदेवाषुरम पप्र ॥५॥ भु जर मद्य सदित सव जगत्‌ देके ॥५॥ | 
मार्करडेय उवाच अ 


मार्क॑रुडेयजी वेले- 
\| यद ककर मद्यराज मर्त ने क्रोध 
| पाताल शौर थ्वी मे निवसने वाे.नागो का : 


इत्युक्त्वा लश -कोपाद्ं संवसतकं तपः । 


४१४ 


माकृण्डेवेषुराण 


न ल~ -~-~-~-~-~~~~~~-~~_-~ ॥ व ककत 
=-= 


नाशायारोषनागानां पात्रालोव्वीवितारियाग्‌ ॥६: 


ततो जच्वा् सहसा नागलोक! समन्ततः] | लोक ते श्रो 
महान तेनसाविम दद्यमानोऽन्विारिवः \{ ७} अमि = निवारण करने 


हा शा तातेति हा मावहां हा वत्ति सम्परभे ! 
तस्मिनदछरते बावः पन्नगानामयामदन्‌ ॥ ८ | 
फेचित्‌ ज्वलद्विः एच्या्रः एशेरन्यथ्रुजङ्गमा; । 
गहीतुत्रदाराथ त्यक्ताभरणवाससः ॥ ६ ॥ 
पाताल्खज्य ययुः शरं भासिनी तदा ] 
स्वमातरं पूल्वं यया दत्तं तदाऽ्भयम्‌ ॥१०. 
राएपेत्वोरगाः सव्वं समणामं भयातुराः ! 
वगहदमिदं मोदः स्मच्येतां नः पुरोदितम्‌ ॥११॥ 
१रमाभ्यर्चितं पत्वं यदत्माभी रसातले । 
स्व सालोऽयमायातच्वाहि बीरमनायिनि ॥१२॥ 
रो निवाचयतां राति मारः सायोन्यमस्ु नः । 
दयते घकलो लोको नागानामचवहिना ॥१३॥॥ 
चं सन्दह्मानानामस्पाकं तनयेन ते। 
[भते शश्णं नान्यत्‌ छां इर यशसिनि ॥१ 
भाक्र्डय उचा 
ते रुला वचस्तेषां संस्पत्यादौ च भाषित । 
तारमाह सा साध्वी ससम्रममिदं वचः ।१५। 
। भामेन्युवाच - 
वमेव तवाख्यातं पाताले धद्गङगमैः | 
कमभ्ययनापूलवं ममासीत्‌ तनयं भति ॥१६॥ 
इमेऽभ्यागता भीता दन्ते तस्व तेनसा } 
भते शरणं ूल्वं दत्तमेभ्यो मयाऽभवम्‌ ॥१ आ 
मां शरणमाप्नास्वे तवां शरणमागताः | 
[वगबम्मचरसा याताहं शरणं त्व ॥4५॥ 
भार्य प्र तवं मरुत्तं वचनात्‌ तव ! - 
। चाभ्व्ितोऽवश्यं शममभ्युपयास्यति ॥ १६॥ 
अचीष्ठिडुवएच । 
।:५५ , नियतं मरुत्तः. ऋोधमागतः 2 


{ क्रसेके 


० 


लिये सम्बतं नाम असख क्रो उडा ल्लिया॥ ' 


क्न ्रयत्न करिया गया तोः 
मा तड जलता दी रहा ॥अ॥ उख श्रद्ध से उत्पन्न । 
इष विंभ्नम से हा तात! हा माता! या घत्स ! 


श्रादि कट कटकर नाग ल्लोच चिल्लाने लगे 1८ ॥ २.४ 


ङ सौ ऋी पृ जलय श्र ङ्द के एर . 


श्र १३* ` 


~ भः 


पेसी दशा मे ते शपते चखा को छोडकर ` ` 


च्रपने खी पुत्रों के खाथ ॥ €] पाताल द्ोडकर 
दारान मचत ऋी माता भामिनी छी शररमे गये 
जिखने करि पददिले उनको अभमयदान दिया थााद्णा 
उनक्ते पास पहं कर भय से 
थराम करते हए मड्गद वारे भामिनीसे कटा, 
श्रापने जो हमसे पदिले भतिन्ना की धी उसको ` 
स्मरण कीजिये ॥९९॥ हमने जवं 
करफ़ आपकी पूजा की थी तो श्रापने हमको वचन ` 
दिवा धा, उसका समय व श्राया - है । देनी; 
जननी ! अव मारी रक्ता कयो 1 महारानी !. 
च्रपने पुत्र को रोक कर इमारे थार की. र्ता 
कीजिये । ्रापके पु के श्रख की द्धि से समस्त 
नागलोक जल रहा है ॥१३॥ श्रापकरे पुज हम लोगो 


को दग्च कर रहे है, आपके पिरि हम किस `` 


की शरण मं जव 1 ह य्स्िनी ! 
मक्तरडेवजी वोक्ते-- 
उनके य़ वचन सुनकर उस साघ्वी ने अपनी 
त 9 (1 ६.४१ [8 
तन्ना स्मरक्रिया ओर पने. पति त्वीक्तित, 
॥ # ने 


छपा करोश्धा 


चोली 
भामिनी 


म ्ापसे पटले ही क चुकी ह कि किंस 


मेरी पूजा करके हमारे 

५ 

ॐ तेज से दग्ध होते हय मयभीव होकर यँ पर 
मय श्ण मे चाये हं ओर मै इनको श्रम दान 

दे चुकी ट 1२७) चंकियेमेरी शस्य मे येद 

इसलिये ये आपकी शुरण मे इए कारण-मेरा श्रीर्‌ : 

अपक्न चमाचरण क दी दै जरम भी ` श्रापकी ` 

क इसलिये ॐ श्राक्नासे 

शरण ह २८) इसलिये आप ञ्रपनी ३ अपनेः 

पुज मर्त को रोक्षिये 1 साय दी मेरे कने परभीः 
जद अवश्य न्त होजाययाः ॥९६॥ 

वीक्षित वोले- ४ ( = 3) 

नागो क महान्‌ अपराध करने दरं मरतः कोः 


श्रतुर हए सपो ने 


पाताल मं पराम . - 


के यति अपने भय को का था ॥ श्धाचैडउसं ` 


रि ; (व = ५ 


नि माकंर्डेयष्ण ११५ 


= सिव्तीमहं पं | कोध हुमा ह । मै समता ह कि तुम्हारे पुत्रका 
दु मन्ये तसय ब्रोधं स्य ते ॥२०]||ोध निवृत्त ना थिन & ॥२०॥ ^ श 
नागा ऊचु नाग 'वोज्ते- ` ि 


शरणागतास्तव षयं प्रसाद; क्रियतां वरप । हे राजन्‌ ! दम श्रापकी शरण मे राये है, हम 
पर दया कर । स्षिय लोग दुःखीजनों की र्ता के 
कषतस्यात्तपरित्राणए-निमित्तं शसखधारणम्‌ ॥२९। निमित्त ही श धारण करते है ॥ २१९॥ . - 
#- . , ` माकैरडेय उवाच , | माकंरडेयजी वोले-- " 
नागानां तदचः श्रता भृतानां शरणेपिणाम्‌ । शरण मेँ श्राये हप नागों के वे वचन तथा 


॥ ५,।२२ भ्रपनी पत्नी कीं प्राथेना सुनकर यशसी अवीक्तिते । 
तया चाभ्यर्थितः पल्या भाहाषीक्षिन्महायशा॥२२ > 1 


गत्वा = बरवीमि तं भद्र तनयं त्वरया तव । | र्ञाऊे लिथे तुम्दाे पुनं से कहता ह! शरा 

परित्रणायं नागानां न त्याज्याः शरणागता;॥२२॥॥| गों को त्यागना उचित नदीं ॥२३॥ यदि मेर कहने 

नोपसंहरते शसं यदि म॒द्चनान्टरषः। | पर राजा श्रपने शरस को शान्त न करेगे तो मैं तेरे । 

तदसेवारयिष्यामि तस्यास्तं तनयस्य ते.॥२४॥ पुज के श्रलो को श्रपने श्रखंसे निवारण करदुगा॥ । 

` भाकरुडेय उवाच माकंएडेयजी चोक्त 

ततो गृहीत्वा स धलुरवीक्षित्‌ पषत्रियोत्तमः फिर चत्रिय भेष अवीक्सित धलुप को उदढाकर 

भय्यैया सहितः भायात्‌ त्वरावान्‌ भागेषा्रमम्‌ २४। सी खदित शीघ्र भागेव सुनिके श्राश्चम पर पटे ॥ | 
इति श्रीमारैर्डेषठराण मे मरुत चरित (२) नाम का १२य्ब अध्याय समाप्न।" 

- 7 ॐ 


एकसोहकतचीसवां अध्याय 


। € रदेयजी ४ ^ 024. 
मार्वरडेय उवाच - माकं वोज्ते- 


। | 
दुतं द्रा श्दीतवरकाम्मकम्‌ । वीक्षित ने पने पुत्र महाराज मरुत्त क 
स त॒ तस्या, इत ध पर्‌ धुप हाथ में लिये हप तथा उग्र ज्वालासे समस्त 


पद्विरन्तं महाव दीपिताखिलमूतलम्‌ । व के र निकली ५ क 
(२1 या, वह अ 
पातालान्तमतं भापस घोरभीपणम्‌ ॥ २।॥ (८ ड अश्रि पाताल के भीतर 


| तक फलं वर श र ८ भीष्ण 
सतं द } न थी॥२॥ राजा को क्रोध भरकुसेः 
तं श्न महीपालं ृटीडटिलाननम्‌ । किये देखा 1 फिर भ्रवीक्तितजी ने राजा से. कदी; 
भा क्रधस्तवं॑मरु्तास्ुपसहियतामिति ॥ २॥| हे मर ! क्रोध न करो, अपना अस्र सींचलो ॥ 
प्राहासंकृत्‌ त्वरालुध्बणएक्रमय॒दारधीः । 2 के १ उनको देखकर जल्दी 
4 से मरुत्त ने वीक्षित से ङ कटा परन्तु बहे 
‡ स निशम्य शुरोवाकयं दष त्च एन ॥ ४ || उनकी समम मै न आया 19 हाय मे घुष लिथि। 
हीतकाम्दकः पित्रोः भणिपत्य सगोखम्‌ । ` | इ, ही उन्दोनि गौरव खदित पिताको अणामकया 
भरसुबाचापराद्ध मे सुभृशं पर्णाः पितिः ॥१ श्रौर उत्तर १1 प पिता र ५ ने ५ 
शासतीमां मयि महीं परिभूय बलं ममं ।. - | वडा श्मपराच करिया दे ॥५॥ पृथ्व! प्र 
मेरे बल की उपेच्ता. करके इन्टोनि याँ ्राकरः 
रकममयुपागमय , वषा धृनङमारकाः ॥ ६॥| भलवान. लो ` कराया दै ॥ १ 
ऋषीणा माभ्रमस्यानाममीषामवनीपते 1 * ¦| मेर.शसन ` करते इषः इन ( 
अयि शपति दुदु पितानि हवींषि च ॥७॥। ऋषियों के हविष्यो को दूषित कियाहै ॥9॥,..-, 
। 


४१६ मोकैरुडेयपुोण |  -अ०१्द१ 


जलाशयास्तयाप्येतेः सव्वं एव टि दूषिताः खव जलप्खर्योको भौ दधित करदिया है ६ पिताः 

च्व इस ऋरया पक्त द्ध न कंदना चादिये । इन 

तदेतत्‌ कारंख ङ्खिन्न चक्तन्यं स्वय पितिः ब्वधाततौ नायं के कध करनेखे आप सुस्को 
न निवारयितन्याऽहं वरह्यघान्‌ पति पन्नगा॥ ८ | न सेक्रिये ॥ = ॥ ` 

अवाङडनाच अवीकिति बोक्ते 9 ~ - 

वृताः ` इनन्य वध करते खे तः मरे इए सुनि कुमारं 

भिर्चिहता विप्रा यास्यन्ति नरकं सृताः । | नसकन जवे इसरिये मेस कन मानकर पते 
पृमैतद्‌ क्रियतां बल्यं दिरसाच्धपयोगतः !} & ।॥ अच को शान्त चत्तो 1 ६१ 

व वर्च वोते- 


[२-1-18 
्रह्सेव सभिष्यामि नरकं यदि इन पापियां का वध करने से अयर दुरे भी 
+ मि ० । नरक मे जाना पड़े तो यै जाडं ना, मै इनके पकडने 


न निरे यताम्येषां सां निवारय मा पितः ]} १०]! चन चल न करूंगा, हे पिता ! चापसुे न रोक्षिवे 
अचापदहदरष्य | अवाप्ठित बल्ल- 
समेते शरणं प्ताः प्रत्नगा मम गोखाद्‌ | ये नाय मेरी शरण मँ आकर घाप इए है 1 हे 


| खडच्‌ ! मेरे सम्मानार्थं दी तुम च्ल को शान्त 
उपसंहियतामखमलं कोपेन ते टप ॥१९११ क्ये 
मस्त उवाच । स्तत योहि 
| तेहन 
। 
५ 


^~ 


ञ्रोर ऋोध न क्रो ॥९९॥ 
नाहमेषां क्षमिष्यामि दुष्टानासपराधिनाम्‌ | ङ ्रपराधिर्यो को चन्न न करा, 
अपने धं का उल्लंघन कर म आपके वयर्नो का 
स्वम्पमुष्डय्य सथं ङरिष्यामि वचस्तव 11१२१ पालन किल तरड कद १९२ ओ राजा दंडनीयों 
देता श्नौर खनो का पालन करता ह 
पुर्व लोद्धां को पाता है तथा इसक्ते विपरीत ` 
इन सिद्धान्ता की उपेच्ता करता है बह रक 
जाता दे1२३॥ 
माकंर्डेयजी चोल्े- क, र 
इख पक्र पिता के बहुत छं समश्ाने पर 
¦ भी जद एने अस्य =॥ पिस तं हिका तवं 
अदीक्ित ने मस्त से कटा रेणा 


॥ 


दण्ड्ये लियातयन्‌ दण्डं मुएः शिष्य पालयन्‌ । | 
 पुण्वलोकानवाभोतति नरकांधाप्युपेक्षकः ॥१३। | म 
साक्ट्डय उराच ॥ 
त्वं € बहशः पित्रा बास्यैमाणो यदा सुतः] | 
नेपसंदसे सोऽत्र॒ततोञ्सां इुचरव्रषीर्‌ 1१४ ॥ 
अवतता हि ४ 
हिखसे प्गान्‌ भीतान्‌ समेतान्‌ शरणं गतर्‌ । | ध जो ठम मेरे मना करने पर भी भयभीत इष 
{ ५ चोर मेरा श्स्सम्‌ आये हए इन नासा का चख कर 
बाग्यमाणोऽपि तस्माद्‌ ते करिष्यामि मतिक्रियाम्‌ ॥ र दे श्ट मे इसका भतिकर करू. 1९५ 


1 > ४ 


प्रयप्यदवास्ववाक्षनि न स्वमेकोऽधविहुवि । | मने अस्र विच्ा पदै, दु दी ज़ला वदी पर 
अस्त का जानने ताला नदीं है! देद्ष! मेरे 
धमाग्रतः सुदु त पांहषञ्च कियद्‌ तव 11 १६।४ श्राने देया पौदय क्या ह -- 


ॐ 


नाक्म््डयं उवाच † साकयडवजी 


उड्यजा उद्धः 
तः काम्मकमासेप्य कोपवाम्रदिलोचनः | ` इ सुनि = १ पिर क वाश्चव्रो 
जग्राह कालस्य नेन दोरहे ह जिनके, एेसे अवीक्िद ने धतु `क ` 
कनीक्षिदले 4 सन्षिद्गव ॥९७॥ संयान कर कालार के उडायः ॥ ९७1 भदा. 
परो चज्वालापरीदारमरिसड्धशतच्मम्‌ । | ज्ना-संयुक्त उस सम्बतं स्न क्रा संदार.कररने 
के हेव उन्होने उत्तम श्रर खट्‌ चाल्यरन चछ 


हलाक्नन्ठ महावोय्यं याजयामात्र काम्बुकं 1१८; 
तभ्तोम ` ` जगती ` सयत्तस्पतापिता 1 ~ वतं 


र 
॥ि 


चाया १.६८ दे विप्र ! खमुदर नौर. 
सहित चह एवौ जो कि सम्वत स्व सै 


१५५ 
2 4 
4 


अ० १२९१ ५९ 


भाकंएटेयपुराण 


४१७ 


साग्धिशेलाऽसिला चिम कालस्पास्् सणुचते॥१६॥ तप दोरदी. थी ऋालास्् के उपस्थित -होते ही 


कालासू्ुचतं पित्रा मरुत्तः सोऽपि वीक्ष्य तत्‌ । 


भाहोचेरखमेतन्मे दुषटशास्तिसएुयतम्‌ 


न तहूवधाय कालास्व्ं मयि ुष्चति फ भवान्‌। 


सद्धम्म॑वारिणि रुते सदैवाङ्ञाकरे तव ॥२१॥ 


मया काय्यं महाभाग भरनानां परिपालनम्‌ । 


त्वयैवं क्रियते कस्मान्मदरधायादपुयतम्‌ ।२२।. 


। परवीर उवाच 
शरणागतरसन्त्राणं कत्त व्यवसिता बयम्‌ । 


तस्य व्याघातकत्ता त्वं न मे जीवन्‌ पिमोध्ष्यसे॥२३ 


मां षाहत्वास्वी्येण महि दुष्टानिहोरगान्‌ । 


धिक्‌ तस्य नीवितं पुषः शरणार्थिनमागतम्‌ । 


यो नामचुशषठाति वैरिपक्षमपि धुवम्‌ ॥२५॥ 


्त्रियोऽहमिमे भीताः शरणं माघुपागताः । 


पक्ता त्मेवैपां कथं पध्यो न गे भवान्‌ ॥२६॥ 


मस्त उवाच 


भित्र वा वान्धयो घापि पिता वा यदिषागुर। ` 
भ्रनापांलनविध्नाय यो हन्तव्यः स भूमृता ॥२७॥ 


सोऽहं ते प्रहरिष्यामि न कोद्धग्यं सया पितः । 


स्वधर्म; प्रिपासयो मे न मे कोधस्तयोपरि॥२८॥ 


मार्करदेय उचाच 
ततस्तौ निथितौ दृष्टा प्रस्पस्वधं रति । 


सुतयतयान्तरे तस्यु्॑नयो भागेवादयः ॥२६॥ 


उदु्ैने न मोक्तव्यं खयास्रं पितरं परति । 


त्यया च नायं हन्तन्यः पुत्र; प्रस्यातचेष्टितः॥२०॥ 


मरत उवाच 
मया दष्टं नन्तव्या; सन्तो रक्षया महीक्षिता । 


मे च दुष्टा युनगाः कोऽपराधो मे दवनाः॥३१॥ 


सवीक्षिटुवाच 
शंरणागतंघन्त्राणं प्रया काय्येभयज्च मे। 1 


कम्पायमान होगई ॥१६॥ अपने पिता कालास्् 
लिये हुए देखकर मरुत्त ने उच स्वर से कदा, 
“यद भख मैने दु के शासन ॐ लिये चलाया है" 
॥ २० ॥ यद श्रापके चथ के लिये नदीं चल्लाया है, 
फिर श्राप धरम मे घचरत्त श्रौर ध्राक्नाकारी. श्रपते 
पुत्र पर कालाख कर्यो चलाते है १॥ २९॥ हे महा- 
भाग | सुभको तो प्रजाश्रों का पालन करना है । 
श्राप दस प्रकार मेरा वध, करने के लिये अख 
किंस लिये उटाते ई १॥२२॥ 

श्रवीच्ित वोक्ते- 

„ दम शरश मे श्राये हु््ोकी स्तता.करना चाहते 
है रीर चकि तुम उन्हीं का वध करना चाहते हो 
इसलिये हम तुमको भी जीवित नदीं छोडंगे ॥२२॥ 
यातो तुम श्रप॑ने ्रख-वल से सुभे मार फर नं 


॥ ५. ४ | दु्ट नागों ऊो मासो अथवा मेँ तुमको मार कर इन 
तां वा हताऽ्हमस््ेण रक्षिष्यामि म्यरगान्‌॥२४ 0 


नागों की र्ता फर ॥२४॥ उस मदष्य का जीवन. 
धिक्षारदहै जो शरण मे आये हुए पर दयान करे, 
फिर चाहे चह शरणाथीं वैरी ही क्यो न दो ॥२५॥ 
मे त्षतिय है, ये भयभीत हुए नाग मेरी शरण पन 
श्राये है, तुम इनके विरोधीदोऽश्रव वताश्नो तुम्दाय, 
वध क्यों न क्षिया जाय १॥२६॥ `: ` ८! ;. 
मरुत्त वोले- ; 
परजा-पालन मे विष्नकारी यदि मिचर; चान्धव्‌, 
पिताय। शुरुभी दौ तो बह राजा द्वारा बध करियि' 
जने योग्य है ॥२अ॥ चरतः मै श्रापक्रे ऊषर प्रहार, 
करूंगा ! दे पिता ! श्राप फिर कोध न क्रमे तो। 
श्रपने धर्मं का पालन करता है, राके ऊपर , मेसः 
क्रोध नददींदे॥ख॥ , 
माकएडेयजी वोल्े- ४ 
फिर उन दोनों को प्क दूसरे के बध करंने पर 
उतार देखकर भार्गव रादि मुनि वहां आकरः 
उपस्थित दुप ॥ २६॥ उन्ोने पुत्र से का कि उस 
क्रा पिता पर श्र चलाना उचित नदीं तथा दसी 
रकार पिता से भी श्रये धमात्म( पुत्र को, , 
करने का निपेध किया ॥३०॥ ४ 
मरुत्त चोले- ह | 
ह ब्राह्मणो ! साजा होने के कारण मेरा कतंब्ध, 

कि मँ दु्को मारं श्रौर सजनो की र्ता करः: 

चे नाग लोम इट है, मेय इसमे क्या च्रपराध दै, 
श सुमे शग्ण मे अयि इषए-की र 


_करना-चादिये । मे.मेप, त. मेर. शरणागत , 


1 ४१८ र माकंरदेयपुराण अ०.१३१ 


५ 
1 
॥ 


भरपराध्यः सुतो विप्रा यो हन्ति शरणागतान्‌ ३२॥| च्च व इसलिये ये मेय च्रपराधी है २२ ॥ 
# ऋषय उचुः ऋषिगण वोते-~- व 
भूमे बदन्ति शनगाखरासलोलविल्लोचनाः । भव हे चच दोर है नैव विलके, पले ध 
+ च प्तः ।॥२२॥ नाग लोग कहते है कि दुष्ट सपो दवाय कारे हष ` 
प्जौवयामस्तान विमान दष्टा दुष्टपत्नगः वनगते ् जिल मे ॥२२॥ सिय 
तदलं भौ राजवर््यी प्रसीदताम्‌ | | राप दान। राजवय असन्न हा आर युद्धं क वद्‌ 
प ए र्म॑सोमिदै ० करे । यद्यपि प दोनों धमं क्ञाता द परन्तु व्यथं ` 
उभावपि षिनिमूहु प्रतिहतो धम्पेकोविदौ वातो की प्रतिज्ञा पर ्रारूढ्‌ है ॥ २४॥ 
† माक॑रडेय उवाच माकैर्डेयजी वोले- 
सातु बीरा समभ्येत्य पूत्रमेतदभापत। मदारोनी चीरा भी श्रपने पुर अवीचित के 
१ ते पत्रो इनं नायान्‌ कृतोचमः।।२५॥ पास च्राकतर बोलती, “मेरी आज्ञा से दी तुम्हारे धुत्र 
मद्ाक्यादेषःते पुत्रो हन्तु नागान्‌ कृतोचमः ॥२५॥ ने सर्पौ को मारने का उदयम किया है" ॥ ३५॥ इस 
तन्निष्यन्नं यदा विप्रास्ते जीवन्ति तथा शृता; ] | लिये णेखा उपाय करो जिससे ये त तपस्वी 
8. ५ । प जीवित होजांय ! उनके जीवित शोनेपर दी व॒म्दारे 
<स्संजीवन्तशच पच्यन्ते र गताः ॥२६॥| शरणार्थी चरूटेगे ॥२६॥ 
भामन्य भामिनी बोलीः- 
¢ श्रहमभ्यर्थिता पूल्वैमेभिः पातालस्य; । पक यार पष्िले इन पातालवासी नागों ने मेरी. 
३? ्मिततमयं पूजा की थी, उसी विचार से ्रपनी प्रतिक्ञाजसोर 
| ४ मत्तौ मयात्र विनियोजितः ।३७॥॥| दनी रक्ता करने को यनि श्रपने खामी को भरित 
द्ितदास्नद ्ुभयोरपि शोभनम्‌ । | किया दै ॥ ३७ ॥ इसलिये शन दोनों के जो कि मेर 
एम मव ततोबसालनल च ॥८॥| त 
१८ श माक॑रडेयजी वोले-- । 
; ततः सञ्जीवयामासुस्ान्‌ विभासते जङ्गमाः । फिर उन सर्पौ ने भरे इय सुनिङ्कमारौ को विष 
दिव्येसोषभिजातेश्च विषसंहरणेन च ॥३६॥| के शमन करनेखे व दिव्य श्रौपधियों से पुनर्जौ- 
पोना चरणौ स ततो नगतीपिः | | हता 
> { . ख॒ श्षर्न ३ 
: मरुत्तश्च स तं भीतया परिष्वज्येदमवरवीत्‌ ॥४०॥| छती से लगाकर यद्‌ योते ॥४०॥ तम ओं का 
ूलमानहा मन शृनु चिरं पालय मेदिनीम्‌ । | मान खएडन करने बालत दोशो, पृथ्वी का पालन 
१. पत-तय मोदस्वमा च ते सन्तु पिद्धिषः ॥४१॥ क्रे तथा चत सं घु, पौँ के साथ श्रानन्द 
तो द्वितो वीरया च नरवरो । | मगो चीर द्र को दन लो १६ ॥ भिर 
< र {8 य मरुत्त 
# क पथ सा च भामिनी स्वपरं मता ॥४२।॥ श्नौर भामिनी रथ पर चैठकर अपते नगर कौ. गये 
५ प ४ महत्‌ तपो धम्मभृतं वरा । | ॥४२॥ इसके वाद संहामागा, पतिता वीरा कठिन 
¢ भततुः सलोकतां पापा महाभागा पतित्रता ।।४३॥| तप करके अपने स्वामी के लोक को गह ॥ ४३॥ ` 
रुमरुत्तोऽपि चकारोव्यां धर्म्मतः परिपालनम्‌ । मरूते भी (४ प्रकारके शचुश्रोंको 
(रविनिनितारिषदतगो भोगां शुने नरष । जीतकर पृथ्वी का धर्मपूर्वक पालन क्या शरीरः 
त 4 र] तृप्‌; ॥ 41|| € । 
तिस्य पत्ती महाभागा बिदभतनया तथा । अनेक भोगों को भोगा ॥ ४४॥ विदर्भं की' कन्या 
[मभमावती इदीर्य सौवीरी सौभाग्यवती प्रभावती तथा सुवीर कौ कन्या 
म्य री चाभवत्‌. सुता ॥४५।| सौवीरी चे दोनों उनकी रानियां इरः ॥ ४५॥ मगधं 
५५ केतुवीय्यस्य मागयस्यार्मनाऽभमवत्‌ । | देश के राजा केतुषीयं कौ कन्या सङेशी, मद देश 
#, च सिन्धुवीय्स्य मद्रराजस्य केकयी 2 ब श्‌ 
८ ॥४९॥' के राजा सिनधुवीयं को कम्था केकयौ ॥४६॥ तथा 


भ> १२२ माकरुडेयपुराण ४१६ 

केकयस्य च सारिन्धी सिन्धुम चपुप्पती । | रना केकय की पुत्री सैरिन्धी श्रीर सिन्पुपति - 

पेदिराजणुता चामुद्ा््या तस्य सुशोगना ॥४७॥| कन्या वपुष्मती तथा चेदिराजञकी कन्या. : 
तासां सत्व चासन भूोऽाद् दिन | | ची ननी मरा व 
तेषां मधान ष्य नरिष्यन्तः सुतोऽभवत्‌ ॥४८)| से प्रधान श्नौर वड़े नरिष्यन्त हुए ॥ ४२॥ महाबली 
एवंवी््यों मरुत्तोऽभृन्महारानो महावलः । | महाराज मरुत्त का पराक्रम इस प्रकार का ६.५ 
पस्थामतितं  चक्रमासीददीपेषुसप्षु ।॥४६॥ कि सातं दीपो मे उनका अखएड रज्य था ॥४६॥ 
यस्य तुरयोऽपरो राजा न भतो न भविप्यति । उनके समान कोई दृखरा राजा न हश्रा रौर नं 
सत्तपिक्मयुक्तस्य रानपैरितौनर \ ॥५०॥ दोगा । बे पराक्रम चौर सत्व से युक्त, राजाश्र मे 


तवरितं छ्पि शरोर घडे तेजसी थे ॥ ५०॥ हे द्विज शरेष्ठ 
पस्यतच^त शत्रा मरुत्तस्य मात्मनः | | क्रौषफिजी ! मदात्मा मखत का य चरि शरोर 


जन्म चायं दविजश्रेष्ठ पुच्यते स्व॑ किल्िपः॥५१।॥ जन्मकथा सुनने से सव पाप न्ट रोजते दै ॥५१॥; 
ति श्रीमाकंएडयषुराण मे मरुत्त चरित्र (३) नाम १३१ ग्र स०। 
~> -< । | 


एकसोवचीषगोँ अष्याय | 


करीषएकि जी वो 


्रीषुशिसयाच । 
भरुत्तचरितं क्रत भगवन्‌ कथितं त्वया । है भगवन्‌ [आपने महाराज मरुत्त का सविस्तर, 
चरित्र तो कदा । श्रव मेरी इच्छा उनके सन्तानकः ` 


तत्सन्ततिमेपैण भरोतुमि | १,९ 
४ ६ ९॥ चस सुनने फी टै ॥९॥ टे महामुनि माकैरडेयजी! 
त्वन्त तीशा ये रागाद वीव्यशातिनः | | उनकी सन्तान म जो राजा पराकमी हु ण । 
तानहं श्रोतुमिच्यामि तयारूयातान्‌ महाघुने॥ २।॥ कथा रँ सुना चाहता ह, श्राप कहनेके योग्य है (| 
मापगदेय उवा माक॑रंदेयजी वोले-- ज | 
`नरिष्यन्त इति सयानो मरुत्तस्माभवव सुतः । गह त श 6 
४ ~ रेष्ठ नरिष्यन्तं नाम से विख्यात हुश्रा ॥२। 
प्र्टादणानां पृत्रा्ां स च्येषटः शरे एव च ॥२३॥ शौर भ्रष्ठ नरिप्यनत € 


+ सषतरियों मे धरेषट महाराज मर्त ने समस्त पूर्व 
याणा स्हसाणि सक्ति दश॒ पच च| पर पिष्यासी हज्ञार वर्षं तक राज्यं किया ॥ ४ 


बुयुजे पृथि करत्छां भरतः ्त्रियम॑मः ॥ ४॥ ३ धर्मपू्ैक राज्य शरीर उत्तम यर्शेको फरफे श्रपा 


शस्यं { ध्वधमण रमर दृष्या यत्तानुत्तपन्‌ | वड़े ५। नरिप्यन्त को राजतिलक देकर चन केः ॥ 
कल्ला | य स्व त र्‌ त बनम्‌ ॥५॥ गये ॥ ५ ॥ एकाग्र चित्त होकर बां जाने महा 
नरिष्यन्तं सुतं ज्ये्पमिपिच्य ययौ षमम्‌ ॥ ५ ॥| तय किया शीर ल पकार श्रपने यश को समस्‌ 


एकाग्रचित्तः च तृप्त्या तत्र तपौ महद्‌ । पृथ्वी पर फेला कर वे स्वम को गये ॥६॥ ५, 
श्रहरोह द्वियं वरिम याय रोदसी ॥ ६ ॥| महाराज मरुत्त ऊे युद्धिमान्‌ पुत्र नरिष्यन्तवे श्चपः 


: सतः सोऽस्य र दमान्‌ पिता चथा श्रन्य पूर्वज राजाश्चां के चरिच प्‌, 
-नरिष्यन्तः सुतः सोऽप्य चिन्तयामास बुद्धिमान्‌ । ल वा ५०॥ भरे भे रैः 


+ च म ् 
॥८ॐ क व नो र महात्मा श्रीर पराक्रमी राजाश्रों नै बड़े वड़े यः. 
भवर व महात्मानौ रानानो भग पलना हे तथा घ्ेपूर्वक पृथ्वी का पालन किया है 

 यभ्विनो धस्मतः पृथ्वी पलयामाुसिनता५॥८॥ र हुल धन के दनेवाते थे तथा संम मँ च 
वितानं संग्ामेष्यनिवतिनः । पीठ नदीं दिखी, उन महात्मार््रोफे चरिः 

. दातास्थापि वित्तानां स्रा्म्यन कभी पीठ 4 

तेषां कथरितं शक्तस्वदुयातं महात्मनाम्‌ ॥। £ ॥ का शकर करन क चव कनन 


; "&२० माकण्डेयपुराण अ १३२ 


हता हु कि यज्ञादिक जो धर्मकर्मादि उन्दने 
करये थे वहे भी कर, परन्तु. मुममं सामथ्यं 
नहीं है, म क्या करू ११० पृथ्वी को घर्मसे दी 
पालन किया जातादहै, इसमे राजा का गुणदी 
फा है ? भली प्रकार पालन न करनेसे पापी राजां 
नरक को जाता है ॥१६॥ घन होने पर राजा को 
महान्‌ यज्ञ करते दी चादिये, इसमे श्राथयं की 
क्यावातदै, दरिद्रौकातो ईश्वर ही मालिक दै 
॥ १२॥ अपने करल की मान-मयांदा को स्थिर 
रखना, वैरियों पर क्रोध करना, प्रजाश्च को श्रपने 
श्रपने धमं मे पच्त्त करना, संम्राम मे पीट.न 
दिखाना ॥ १६॥ ये खव हमारे पूर्वंन राजा लोग 
तथा मेरे पिता महाराज मरुत्त कर गये है, स , 
प्रकार फौन करने को खमर्थं है १॥ १४॥ जो उन 
पूवज ने किया उसको श्रव यदिमं न कर तो 
क्याकरू ? वे वड़े यज्ञ करने चाके, जितेन्चिय 
तथा युद्धम पीन हरने वाते थे ॥ १५ ॥ उन्होने 
वड़े शद्ध किम श्रौर उनके पुरपार्थं की चर्चां ्राज 
क है । उनके अनुरूप कमे हम कहं तक कर ॥ 
तथा उन पूवं पुरुषों ने स्वयं यक्ष कयि थे, किसी . 
दुसरे से न करये थे.अतः भै भी यक्ञ करू गा॥१७॥ 
माकरडेयजी वेले- । 
पेखा 2 मदाराज नरिष्यन्तने पकस 
यज्ञकेया जिसकी त्तिणा कः 
यादशं न चकारान्यो वित्तोत्सर्भोपशोभितय्‌॥१८॥| नै न दी गई थी ५५ स 
द्विजानां जीमनायालं दत्वा त॒ महाधनम्‌ । | जीवन भरके लिये पचर धन दिया तथा उससे 


ततः शुं तेषां यङे्ममदवनरपः ॥१ 1 


। किन्तु तेन छृतं कम्मं धम्मयमाहवनादिमिः 
 तदंक्त मिच्यामि तच नास्ति करोमि किम्‌॥१०॥ 
धम्मेतः पादयते पृथ्थी को गुणोऽ महीपतेः 
असम्यकपलनात्‌ पापी नरेन्द्रो नरकं व्रनेत्‌ ॥११॥ 
सति पित्ते महायज्ञाः फत्तव्या एवं भृता । 
दातव्यज्चात्र कि चित्रं सीदतामीश्वरो गतिः| १२॥ 
` आभिनात्यं तथा लज्जा कोपथारिजनाश्चय; 
कारयन्ति स्वधम्माश्च संग्रामादप्लायनम्‌ ॥१३॥ 
? एतत्‌ सत्वं यथा सम्यडमतपव्वैः पुरुषैः इतम्‌ } 
“पित्रा च मे मरुतेन तथा तत्‌ फेन शुक्यते ॥१४॥ 
६१्तद्हं फं करिष्यामि यन्न तैः पृव्वजे; छतम्‌ । 
४३ये यज्विनां वरा दान्ताः संग्रामाचानिषर्तिनः॥१५॥ 
तमहत्संग्रामसंसमां पिपंवादितपीरषाः .। . 
कम्मणाहं करिष्यामि कम्मे चानभिसन्धितम्‌॥१६॥ 
अथवा तः स्वयं यज्ञाः कृताः प््वजनेश्वरः 


शविशरमद्भिनान्यस्तु कारितास्तद्‌ करोम्यहम्‌॥१७॥ 
माकरडय उवाच 


दु 
९ 
“इति सञ््दिन्त्य यङ्ग स चकारेकं मरेश्वरः 


(ठ गाया बस्नाएयलङ्कारं धान्यागारादिकं तथा | 


तथा परत्येकमददत्‌ तेषां पृथ्वीनिवासिनाय्‌ ॥२०॥ 
ततस्तेन यदा यञः प्रारब्धो मधुजा पुनः 


, यान्‌ यान्‌ दृणोति स दषो विभानार्धिञयकम्मसि । 
ते ते तभूचय्नाय वयमन्ये दीक्षिताः 


माकर्डय उचाच 


भन चाप ऋत्विजो विरंस्तदारेषक्षितीश्वरः 


५५ जगृहुनेव धनसम्पूशंमन्दिराः 


भूषण, धान्य श्रादि दिये गये ॥ २०॥ इसके बाद 
जव राजा ने दसरा यज्ञ करने का विष्वार किया 
तो उस यज्ञ का श्चारम्भ कर्ने के क्िये भी उनको 


। पार्ये स मखे यष्टं ततो नालमत द्विजान्‌। ।२१॥| बाह्मण न मिले ॥२९॥ राजा जिन ब्राह्मो को -यञ् 


कम के किये वरणे करते वे ही उनसे कह देते कि 
हम दुसरे यज्ञ के लिये नियत हो घुके है ॥ २२॥ 


॥२२।|| वे लोग कते, ^र राजन्‌. | श्राप किसी. दृसरे ` 
१.अब्यं परय यद्वित्तं त्वयास्माक विवर्ितम्‌ । 


दतस्यान्तो नास्ति यजे दस्तु पते षनम्‌॥२३॥ मै विय 
पः 


राह्मर को दह लीजिये, हमको घन की इच्छा 
ं है, कारण-जो धन आपने हमको पिले यज्ञ 
वही नहीं घटता है ॥ २३॥ 
माकंरडेयजी वोल्े-- 

जब राजाको कोर पुरोहित.न मिला तो'उन्दों 


६, 
, "शिवां तदा दानं स॒दातुषुपचक्रमे ॥१४॥ के घरों पर जाकर उनको. दान देने -की .. 


जना की ॥२७] फेला करने पर भी किसी ब्राह्मण - 
ने धन ग्रहण न किया, कारण उनके धर घन-घन्थ ,. 


क, 


४० १३३ माकंर्टेयणुराण ४१ 

द्विजाय दातं भुयोऽसों निन्विएण इदमन्यत्‌ २५॥ पडे थ क राजाने निध्िन्त होकर कहा 
पक 4 / ॥ शहा * कितनी सुन्द 

भहभतथोमनं पथ्यं यदवो नाधनः एचद्‌। | प ५ (० 

प्रभरोभनल्च यत्‌ कोपो पिफलोऽयमयन्विनः॥ २६ | चच्छी नीं य़ न करने के कारण यद धन 


4 [र प च क निष्फल ] सा 
नाकषिज्यं कुरुते फविद्रयजमानो्जखलो जनः। | नहीं ह ८९ व 
क - ए |] <$ | । 


त न ८ 


द्विनानां न च नो दानं ददतां सम्भतीन्छते | ब्राह्मणों के दिये हुए दानको फो नदीं लेता ॥२७॥ ! 


र माकैरडेग् उवाच माक॑ण्डयजी वोले- | 
ततः धदद्िजान्‌ भक्त्या परणिपत्य पुनः पुनः। | . इसके श्रनन्तर राजा ने छु ब्राह्मणों फो भक्ति 
सखयहे कलिनकरे ते भचर्महामलम्‌ 1 २८॥| स वार वार भशाम फर ्रपने य क ्रो्ित 
सयस्‌ ऋ मस होना खीकार कया श्चौर उन्होने उस महायक्षकी 


प्रत्यदभुतमिदञ्चासीदयदा तस्य महीपतेः | | तयारी की ॥२८॥ यद श्रत्यन्त श्रश्वयं की वात हु 


स योऽभुद्‌ तदा पृथनयां यनमानोऽखिलो जनः २६| उस (व स 


द्विनन्मनामभूासीत्‌ सद्यस्तत्र कथन । | यथे ॥२९ रां भै को$ दान लेने बाला न हा 
यजमाना द्विजाः केचित्‌ केचिद्‌ तेषान्तु याजकाः ३०| सव ब्राहमणो मं इच्‌ तो यजमान दोगये शौर छु 


रिबन्तो नरपतिरियान स यदा तदा । | नके यप करनेवाले हय ।३०॥ मदारान नियत 
र्‌ न्तो रि {1 तद्‌ ने जो पदिलते यक्ष किया था उससे पृथ्वी फे. सद 


२ ९ पु ) ४ 
तसदातुधनयागं शयुः पथ्न्यामरपतः ॥२१। | ब्राह्मण धनवान्‌. टोकर स्वयं यक करते लगे ॥३९। 
्रान्यां कोय्यस्त॒ यज्ञानामासमष्टादशाधिकाः । | हे सुनि ! पूर दिशा मे श्शरह फरोड्‌, पश्चिम > 
पतीच्या [9 क्षि [1 ¢ ^~ 
चया सक्च द कोयो दक्षिणायां चतु ॥३२॥ सात फरोड्‌, दिस मे चोद फरो श्र उत्त 


२ < पचास फसोड य साथ : 
उत्तरस्याल्य पञ्चाणदेककालं तदाभवन्‌ | १ र त ् | 


ने त्राञचण यानां नरि्यन्तो यदायन्‌ ॥३३॥| यप किया ॥३२॥ ३३। दे नौदुकिजी | (र 
एवं स राजा धम्मात्मा नरिष्यन्तौऽभव्‌ एरा । | मर्त के पुत्र धर्मात्मा राजानरिप्यन्त की कथा दख 
भरुतततनयो विप्र विख्यातवलपौ स्प; ।॥३४॥ रकारं । उनका वक छनौरः पुरुपा विख्यात था ॥ 


इति श्रीमार्करुटेयुराण मे नरिष्यन्त चरित नाम ९ ३२वोँ श्र° समाप्त। 
दर श द ^~ ~ 


एकसोतेतीसवां अध्याय 


भार्कर्डेयजी वेत्ते- 


व [ज नरिप्यन्त के पुत्र दुष्ट ्नीर वैरि, 
9 महार | 
नरिष्यन्तस्य तनयो दुष्टारिदमनो दमः । ध 
स शीलं शनैरिव ॥१॥ का द्मन करने चाके दम नाम इए ! उनका चल 
शक्रस्येव बलं तस्य दया पल भु शनद्रके समान तथा शील सुनियोके सदश था ॥९॥, 
वाभ्रन्यामिन््रसेनायां स जगे तस्य भूतः । | महाराज नरिष्यन्त ने इनको वा्व्य की कन्या \, 


वर्प हायशाः तेना से उत्पन्न किया श्नौर ये यशस्वी श्रपनी 

स्थत्वा मातुमहायशाः ॥ २ ॥| दन्दसना ९,०९९.५ ५ 

नन पारि भढ क व स्थितः] | माताके ग्म मे नौ वप तक स्थित रटे ॥२॥ चकि; 

यट्ाहपामास द्म माति । च ्चपनी माता के उदरं मे नौ वषं तक स्थिव रे 

दमशीसशच भविता यत्रायं दृषात्मन" ॥२॥ प्रतः यह स्प्टही टि 1 पनी दम र 

॥ तदितः रिचिय गर्मसे 1 ॥२॥ शसः 
सिकालविन्नानः स हि तस्य पुरोदितः । | शरीलता का परेचय गभ -२॥ श 
छ # इत्यकरोन्नाम नरिप्यन्तसुतस्य ठं ॥४।। कार्ण महराज नरिष्यन्तके तिकालद्शीं ., ॥ ` 


४२२ 


स॒ दमो रानपुत्रस्त॒॒धदु्व॑दसरेषतः । 


लगे सरराजस्य सकराशादुृषपव्वेणः 


॥ ५॥ 


दन्दुेदैत्यवय्यैस्य तपोवननिवासिनः । 
सकाशार्जगहे इत्छमचग्रामश्च तततः । 8 ॥ 
शक्तैः सकाशद्धेदांबेदाङ्गान्यखिल्लानि च । 
तथार््एिषेणादराजर्षेजेग्रहे योगमात्मवान्‌ ॥ ७ 
तं खरूपमहात्मानं गृहीतास््रं महाबलम्‌ । 
सखय॑वरे ता पित्रा जगहे सुमना पतिम्‌ ॥८॥ 


सुता 


दशा्णाधिपतेर्वलिनधारकस्पणः । 


पश्यतां सर्व्वमतानां ये तदथंशुपागताः ॥ & । 
तस्याश्च सानुरागोऽमृन्मद्ररानस्य वै सुतः 
सुभनायां महानादो महाबलपराक्रमः ॥१०॥ 
तथा विदभाधिपतेः पुत्रः संरन्दनस्य च। 
वपुष्मान्‌ राजपुत्रश्च महाधदुरूदारधीः ॥११॥ 
तेऽ्थ तया इतं शष्ट दृष्टारिदमनं दमम्‌ । 
मन््रथामासुर्योन्यं तत्रानङ्कतरिमोहिताः ॥१२॥ 
एतामस्य वलात्‌ कन्यां गृहीत्वा रूपशाल्तिनीम्‌। 
ग्रहं प्रयामस्तस्येयमस्माकं यं ्रदीष्यति ॥१२॥ 
भतत ुद्ध्या घरारोह्या॒स्वयंवरपिधानतः 


तस्येच्छया नो भवित्री भाय्यां धरम्मोपपादिता\ १४ 
श्रथ नेच्छति सा कञशिदस्माकं मदिरेक्षणा । 
ततस्तस्य भवित्री सा यो दसं घातयिष्यति ॥१५॥ 
माकरड्य उताच्‌ 

इति ते निश्चयं त्वा त्रयः पार्थिवनन्दनाः। 
नश्हुस्तां सुचाव्वज्गी दमयाश्वाुवर्भिनीय्‌ ॥१६॥ 
ततः केचिन्तृपास्तेषां ये तत्पक्षा पिचुक्रद्युः 
चुक्गधुश्वापरे मपा; केचिन्पध्यस्थतां गताः ॥ १७ 


ततो द्मस्तान्‌ भूपालानवलोक्यं समन्ततः । 


अनह्तिमना ` 


वाक्यमिदमाह महाघरने ॥१८} 
` दम उवाच 


भो भूपा धर्म्येषु यद्वदन्ति  स्वयंरम्‌ । 
 अपरम्मों वायवा धम्मो यदेभिषं ते बलाद्‌॥१६॥ 


५ ~ 
न 


` न मे काच्यैमन्यमाय्यां भविप्यति । 


.ाकंरुडेयपुराण | 
~~ 


अ० १३३ 


ने इनका नाम दम रक्ला ॥४॥ राजङ्कमार दम नें 
धनुवैदकी निःशेष चिदया महाराजे वरृषपवासे सीखी 
1५॥ तथा उन्होने तप्रोवन निवासी दैत्य श्रेष्ठ 


दुन्टुभि से तत्वपूर्वक समस्त चिद्या ग्रहण की ॥६॥ 
शक्ति से उन्होने वेद श्नौर वेदाङ्गो को सीखा तथा 


राजर्पि श्रष्िषेण से योग विया प्रात कीः ५७॥ 


फिर उन स्वरूपवान्‌ महात्मा, शस्धारी, महावतीं 


॥ 


दम को सुमना ने श्चपने पिता द्धाय र्चेहुएः स्वयंवर 


मे अपना पति चुना ॥ ८ ॥ वह खुमना दशाणं के 
राजा चास्कमां की पुञ्नी थी । उस स्वयस्बरम उसं 
के निमित्त वहत लोग रये थे ॥६॥ मद्रदेशके 
राजङुमार महानाद का जो फि बड़े वली श्रौर 


पराक्रमी थे उस सुमना मेँ अरग होगया ॥१०॥ 
तथा यदी हाल विदर्भ देश के राजा सखंक्रल्दन के 
पुत्र राजङ्कमार बपुष्मान का जो बड़े धधांरी श्रौर 
उदार बुद्धि बाले थे इमा ॥ १९॥ दँ का नाश 
करने वाते दम को वहां आया हुश्रा देखकर कामः 
देव के वशीभूत होकर उन्दने भापस मे विचार 
किया ॥ १२॥ इस रूपवती कन्या, को वल पूरक 
ग्रहण कर हम धर के चलं छनन्यथा येदमक्ो 
चरण करलेगी ॥ १३॥ इसकी इच्छा स्बयम्बर के 


का वध.करेगा ॥१५॥ 
माकर्डयजी बोज्ते- 
उन तीनों राजक्कमासें ने इसं पकार निश्चय 


-करफे उस सखन्दरी कस्या को जो दम के निकर थी 


पकड़ लिया ॥ १६॥ तव कुक राजालोग जो उनके 
पत्त म 9 चिल्लाये, दृसरे इख व्यवहार से रुष्ट 
इए तथा ङ मध्यस्थ होगये \ १७॥ हे महासुमि 


करौष्रकरिजी } फिर उन राजान्नं को चासो श्रोर ,, 


देखकर राजकुमार दम ने उदास मन होकर यदह 
वचन कटे ॥ १८ ॥ 
दम 


+ 


न 


.विधानसेदमको वरने की हैःश्नीर उस दशा मे ` 
धमानुङ्रल उसकी पत्नी होजायगी ॥१४॥ यह ` 

मदिरा के खे नेर बाली हममे से किसी.को नदीं. 
` चाहती है । यह तो उसी की भायां होगी जो दम 


~. 


हे राजानो ! स्वयस्वर की गणना धर्महृत्यो मै ` 


दे. जो इस कन्या को इन लोगो ने .वल पूर्वक 
ग्रहण किया है यह धर्म है या धर्मं ? यदि यं 


घमं है तो यह कन्या किसी 1 1 
होजावे, परन्तु यदि अधर्म है तो उन लोगों को - 


अर १३९ मारंरुेयपुराण ४२३ 


धिक्षारहै जो धम का उत्लंघन होते इण पने भाणो 
की रक्ता करे' ॥२०॥ हे क्रीष्टकिजी । इसके अनन्तर 
दशाणं देश के स्वामी, राजा चारुघमां ने वहं 
शोरगुल को शान्त कर यह वध्वन. कटे ॥-२१॥ 
हे जाघ्यो ¡ राजङमार दभ ने धर्म व अधमर का 
निय करने फे हेतु जो कदा है उसपर श्राप ज्लोग 
श्रपना मत प्रगर करो जिससे हमारा शरीर इनका 
धरम सुप न दो ॥ २२॥ । 
माकेरडेयजी योले- 

तव कुद राजा लोग राजा -चारुक्मां से बोले 
“परस्पर प्रेमं होजाने से गन्धर्वं विवाद की विधि 
हे ॥२३॥ परन्तु यह क्षनियोँ मे दी उचित हैः वेश्य 
शद्ध श्रौर ब्राह्मणों मे नदीं । शस तिचारसे आपकी 
पुत्री का विवाह राजङ्कमार दम के साथ दोक ॥ 
हे राजन्‌ ! इख न्याय से आपकी वह कन्या राजः 
कमार दम की होचुकी । जो मोदवश इसके विषः 
रीत चलता है बह कामी है ॥ २५॥ ह निर | फिर 
दशां क राजा के पन्च मे जो महात्मा राजा ल्लोग 
थे उनसे दुसरे यजा यह वचन वोत्ते ॥२६॥ क्षत्रियो 
के लिये गान्धर्वं चिधि को उचित बताना सनम दै । 
च्चियोँ के लिये तो राक्षसी विधि दी. उचित टै ॥ 
हे राजाश्चो ! शत्रश्रों को मारकर वलपूर्वक जो स 
कस्या को प्रहरण करतारैः वदी इसके साथ णक्तसी 
चिधि से विवाह फर सकता है ॥२८॥ स्रियो मे 
यरी विवाह विशेष रूप से धिष्ठित है । महानन्ड 
श्रादिनेजो षस कन्याको हरण करने का छायं 
किया है वह स्षचियोवित है ॥२६॥ 
माकैरडेयजी बोते-- 

फिर वे राजा श पिले घोल व पुन 

०|| मरेमपूर्वक जातिधम के असार बचन वोल्ञे ॥३०। 

परस्परातुरागेण नातिम्माभरितं वचः ॥२०॥ यह सत्य है फि चतरियोफे लिये विवादकी राक्षसं 
स्यं शस्तो राक्षसोऽपि क्षत्रियाणां परो निधिः। | विधि भेष हे परन्तु कल्या ने श्रपने पिता की जान 
किन्लसौ जनकस्वाम्ये इमाप्यानुमता यरः ॥ १।॥| कारीमे सजकङ्कमार दमको अपना पति चुना है ३१ 


उसके पिवा फे सम्बन्ध को विच्छेद. करके 'ज 
हता तु पिदसम्बन्धं बलेन हियते हिया। | कन्या.वलपू्॑क हरण की जाती है उसे राच्रस 


भृतक स्थिता॥।२२॥| विधि कदते है, दुसरे को पति मानकर उव 
ध ध व दमः पास वैटीहुई के लेजानेको नदीं ॥२२॥ सव रजाश्च 
पश्यतां सन्वभूपा द्‌ कतके हस कल्याने दम को पसन्द किय 
गान्धर्ववस्येह निष्पत्तौ मिवा रक्षसोऽत्र क५॥॥२९॥| तो यद गन्धनं विवाद इ्ा, इसमे . ात्तसी विरि 
परिवाहितायाः कन्यायाः कम्यासवं मैव विधते । | ्रव कैसे चलेगी ॥ ४ दे ५ र 
॥ र नदो रहता, विवाह दजा पः 

कन्यायाश्च रिवाहेन सम्बन्धः पृथिवीश्वराः ॥२४॥ 


कन्या का सम्बन्ध दोजाता है ॥ ४॥ जो कि यः 
त इमे. ये बलादेनां - दमादादातुश्चताः 


धम्मो वा तदलं पराणे रश्यन्तेऽरिलङ्गने ॥९०॥ 
त्तो दशार्णाधिपतिशारूपम्पां नराधिपः । 

ने४शब्दं कारयित्वा तत्‌ सदः पाह महान ॥२१॥ 
दमेन यदिदं भोक्त धर््सापरम्माभितं दृपाः । 


तद्रदध्वं यथा धर्म्मो ममास्य च.न क्ष्यते ॥२२॥ 
माकडेय उवाच 

ततः .फेचिन्महीपालास्तमूचुवेसुधाधिपभ्‌ । 
परस्परानुरागेण गन्धर्व्यो विहितो विधिः ॥२२॥ 
क्षत्रियाणां परमयं न ॒षिदशुद्रदविनन्मनाम्‌ । 
दममाश्चित्य निष्पन्न; स चास्या दुहितुस्तव ॥२४॥ 
इति घर्मादमस्येपा ददित तव पार्थिव । 
योऽन्यथा वर्तते मोहात्‌ कामात्मा सम्पवर्तते॥२५॥ 
तथाऽपरे तदा पोचुमंहात्पानो हि मुभृताम्‌ । 

पते ये भृथृतो विप्र दशाणापिपतेवंचः ।॥२६॥ 
मोहात्‌ किमाहुषंम्मोऽयं गान्धर्व ्ष्नन्मनः । 

न त्वेष शास्ता नान्यो हि राक्षसः शखजीषिनाम्‌२७ 
. धलादिमां यो हरति हत्वा तु परिपन्थिनः । 
तस्पैवाप्तौ राक्षसेन विचहिनाषनीश्वराः ।२८॥ 
प्रथानतर एषोऽत्र विवाहद्धित्तये मतः। 


्षत्रियाणामतो धर्म्मो महानन्दादिभिः कृतः ॥२६॥ 
माकरडय उवाच 


श्रथ प्रोचुः पुनभपा येः पूब्वष्टदिता एषाः 


सजा ल्लोम वलपू्वक. दम से सं कन्या को 


२४ माकंरुडेयपुराण ०१२३ 


भ य उचत दै यह उचित तो नदी दै परन्तु ये वलवान्‌, 
व्रूलिनस्ते यदि ततः व्यन्तु नातु साधु तद्‌ ॥२५॥ ह इसलिये रसा करते ह ॥ ३५॥ | 

9 मा्करडेय उवाच माक॑रुडेयजी चोक्ते ` ५ 
तच्छुताऽ्पौ दमः कोप-कषायीकृतलोचनः । यह सुनकर राजकुमार दम के नेन: कोच सेः 


। (मा ऋका, लाल होगये श्रौर ते धयु्र को चडकर यदह वचन 
आरोपयामास भञुबचनजदमन्रषीद्‌ ॥२९॥ वोत ॥२६॥ यदि मेरी पनी इनं बलवान्‌ यजानो 


मापि भ्यां बलिभिः पश्यतो हियते यदि । | से मेरे -देखते-देखते हरण की जाती है तो मुभ 


स्ञेसे ॐ ५ र शणं 
त्तेन नाभ्यां वा को गुणः छीवजन्मनः॥२७॥, जसे नपुंसक के डल भौर युजा का क्या गुण 
नाभ्यां बा क गुणः छीवनन्म है ॥ २७॥ फेखी दशा मे मेरे शसन, श्रता, बाणो 


पिद्माल्ञाणि धिक्‌ शौयय धिक्‌शरानधिक्शरासनम्‌ श्रौर धुप को अनेक वार धिक्कार है वथा महात्माः 
पिगृन्यथं मे दले जन्म मरुत्तस्य महात्मन; २८॥| राजा मरुत्त के बर मे मेरे जन्म लेने को धिक्कार 
यदि भार्य्यामिमे मृदा; समादाय बलान्विता; । | हे ॥ २८॥ यदि मेरे जीते जी ये सूं राजा लोग 
भयान्ति जीवतो धिक्‌ तां मम व्य्थैपतुप्मताम्‌।।३६| मेरी खी को वल पूवक हेजय तो मेर इस धनुषः 


। धारीपन को धिक्वार है ॥ ३६ ॥ यद कहकर शुरं 
इत्युक्तवा तान्‌ मरीपालान्‌ महानन्दशखान्‌ वली । | का नाश करते वात, वलवान्‌ दम उन महानन्द 


अथात्रवीत्‌ तदा स्वान्‌ महारिदमनो दमः ॥४०॥| रादि राजानं से य बोले ॥४०॥ , 

। दम उवाच दम वोक्ते- "ता ५ 
एषातिशोभनां बाला चाव्वह्धी मदिरेक्षणा । यद्‌ ्रत्यन्त सुन्दरी, मदिरा के से नेन वाली. 
यय कल्या जिसकी भायां न. ठो उसके जन्म लेने श्रौर 
षि तस्य जन्मना भाय्यां न यस्येयं लोदधवा॥४१॥ त्रिय कुल मे उत्पन्न होने से स्या लाभ है १४१; 
इति सञ्चिन्त्य भृपालास्तथा यतत संयुगे | इसलिये हे मानी राजा ! युद्ध मे श्राप पेखा 

2 व नौ यत्त कर जिससे कि सुरे जीतकर चाप इस कन्या 
यथा निर्जित्य मामेतां पः रुत मामिनः।॥४२॥ को पनी पल्ली वना सके ॥४२॥ ५ 
¦ माकेएडेय उवाच, माकरडयंजी चोले- क 
इत्याभाष्य ततस्तत्र शरवपमशञ्चत । यह ककर राजकुमार दम ने वाणो की वषां 


(८ पा करः उन राजाश्चां को इस प्रकार ठक दिया जिखः 
ादेथन्‌ पृथिषीपालस्तमसेव महीरुहान्‌ ॥४२॥ तरह च्न्धकार दृक्तौ को ठक देता है ॥ ४३ ॥ ` $ 


| तेऽपि वीरा महीपालाः श्र-शक्त्यष्ठि-युद्ररान्‌ | चीर राजां ने भीं वाणः शक्ति, ष्टि, सुहूगर 

ध त श्रादि उन परः छोड़ जिनको कि राजङ्कमार दम ते 
| यषडस्तत्मयुक्तध दमचिच्छेद सीलया ॥४४।| खेलन मा मे कार अला ॥ ४९ ॥ हे ककि सुनि 
, तेऽपि तत्महितान्‌ वाणंस्तेषाज्चासो शरोत्करान्‌ । | राजङ्कमार दम ॐ चलाये हुए वाणो को राजालोग 
¦ चिच्छेद पृथिवीशानां नरिप्यन्तात्मजो ने ।॥४।| वथा राजान्न के वाोँ को ररि्यन्तःपुज दम काटे 


१ । रहे थे ॥ ७५ जिस समय कि राजकुमार दम -श्रौरः 
वदा ४ तपाल र दम जीर 
तदा युद्धं दमस्य क्षितिपात्मने; | | राजाच्नो का युद्ध दरहा था .उसर समय महानन्दः 


| विवेश महानन्दः खद्गपाियतो दमः ।॥४६।॥| दाथ मे तलवार लिय प वं पचे जाँ किं ` 


(1 राजङमार दम धे ॥ ४६। मे तलवारं 
¦ तमायान्तं दमो ष्ठा खढ्गुषाणि महामृधे । | लेकर मषटान्द्‌ को न ते उस 


४ मोच शरवर्षाणि £ पुरन्दर १ ॥ ४ 

; मोच शरपाणि वषाणीव ; ॥४७॥ पर इख भकार वाश क वर्णा की जिस प्रकार नि 
‡ तद्स्नाणि ततस्तानि शरजालानि ततुक्षणात्‌ । | इन्द्र जल की वपां कसते दै ॥9७॥ फिर महानन्दं ने 
! महार्न्दः भयिच्छेद खद्गेनान्यानवंचयत्‌ ।॥४८॥| अपनी. तलवार से राजकुमार दम केः श्रसरौ. शौर 


6रतो रोषाद्‌ समार तं दमस्य तदा रथम्‌ । | को चा लिया ॥४८] किर महावीर महानन्द क्रोध 


%@ [9 


वाणो को उसी क्तण॒ काट कर दखरे राजकुमार - 


< 


५ ५ + -महावीर्थयो दमेन धुयुधे सह ॥४६॥| से रथ पर सवार दगया श्र दम केः साथः युद्धं 


` ०१३३ ५४ माक॑ररैयपुराण 1 


| करने लगा ॥४६॥ महानन्द के 
बहुधा युध्यमानस्य महानन्दस्य लाघवात्‌ । न्द को साथ युद्ध करते हप 
हो हषा चुः । ९ उसकी कमजोरी का लुभव करफे दमने उसे 
दमो मुमोच हृदये शरं कालानलमभम्‌ ॥५०।| दव म पक वाण मारां जो कालरूप धिके 


समान था ॥५०॥ उसके हृदय म छिद जने पर 
तं लक्ममात्मनोक्कृष्य विभिन्नेन ततो हृदि । महानन्द ने तत्ततण उसे निकाल डाला श्रौर दमके' 


दमं भरति विचिक्षेप महानन्दोऽसिधुज्ज्यलम्‌ ॥५१। ऊपर एक तेज्ञ तलवार पकी ॥ ५१॥ उस तलवार 


। ध , च्छेद तं दमः विजली की तरह श्राते देखकर दम ने उसे 
पतन्तञ्चैनमुल्कामं शक्त्या चिच्छेद तं दम; । | शक्ति से काट डाला तथा शरपनी तलवार से महा 


शिरो वेतसपम्रेण महानन्दस्य चाच्छिनत्‌ ॥४२॥| नन्द का शिर काट लिया ॥ ५९॥ महानन्द के मरने 
तस्मिन्‌ हते महानन्दे माचरययैण परादुसाः। | ५० बिसुख होकर भाग लड हप, 
५) हिति = 


| केवल ऊुरिडन देश का राजा † 
बभूवुः पार्थिवास्तस्थौ वपुष्मान्‌ हुण्डिनाधिपः५२॥ रदा भ्राया ॥ १ वह व शमर । 
दमेन युयुधे चासौ बलगन्व॑मदान्वितः। चल केगर्वं से उन्मत्त होकर दम के साथ युद्ध 
दाक्षिणात्यमहीपाल-तनयो रणगोचरः ॥५४॥ करने लगा ॥ ५४॥ उस युद्ध मे दम ने वपुष्पाग्‌ द) 
युध्यमानस्य तस्योप करवालं स वै लघु । हाथकी तलनार, सारथी ला शिर तथा उसके रथ 


चिच्छेद. सारथेषेव शिरः संख्ये तथा ध्वनम्‌॥५५॥ की ध्वजा को कार डाला ॥ ५५॥ तलवार के द्ूटने. 
। पर वपुष्मान्‌ ने वहुकंडक नाम गदाको उशकिया, 


धिञ्नखद्मो गदौ सोऽथ जग्राह बहुकणएटकाम्‌ । | परन्तु जव तक किं वह गदा उसके दाय दी में थी, 
तामप्यस्य स॒ चिच्छेद करस्थामेव सत्वर; ॥५६।॥| दम ते उसे काट कर गिय दिया ॥ ५६॥ जव तकं 
यावदन्यत्‌ समादत्ते स वपुष्मान्‌ बराुधम्र । | बुच्‌ किसी दूसरे हथियार को श्रदण करे उस 


॥ 
च्छरेण तं भूमावपातयत्‌ ॥५७॥ कतो दमने वाण से वेधकरः प्रथ्वी पर गिरा दिया! 
तं पिदध्वा दमो 8 # थ्वी पर गिरते ही उसका शरीरः व्याकुल दोगय। 


स पातितस्ततो भुमौ विष्लाङ्गः सवेपथुः । | श्रौर कंपने लगा । तव उस राजछुमारने भी र 
विनिःतमलियदा्मूव॒क्ितिपानमनः ॥५८॥|कस्ना न्द कर दिया ॥ ४८॥ उसको इ भमः 
तमालोक्य तथामूतमयुद्धमतिमात्मवान्‌ | | युद्ध से नित होते देखकर राजङुमार ठम भरस् 
उतश्ञ्यादाय सुमनां समनाः प्रययौ दमः ॥५६।॥| चित्त से खमना को जेकर वर से चल दिये॥५९ 


; तयो; | | तव दशां देश के राजा ने धीति युक्त दोकरः दम, 
व ० नौर सुमना का विधि पूरकं विवाद करदिया1दे०। 


1 मबा विषिप्वम्‌ ९ विचा दोजाने पर कु काल तक राजकुमार दम 
कृतदासो दम्त्र॒दशाणोधिपतेः पुरे । _ | दयाय देश क यजा के नगर मे गर र 
स्थित्ाऽखपकालं प्रययौ सभार्यो निजमन्दिरम्‌ ६१| खी सदित श्रपने धर को चले ॥६१॥ चलते ष 
दशाणधिपतिशासौ दत्वा नागासत्रङ्गमान्‌ । 
रथगोऽसरोषय दासीदा्ासतथा बहून ॥६२॥| तथा दासं देश फे यजा ने उनको वहुतसे च 
बञ्ालङ्कारापादि  षरोपस्करमात्मनः । _ | आामूषण, चज खम अमा शर 
नयसत तथा भाण्डैः परिपं व्यसज्जयत्‌ ॥९२॥ आदि देकर विदा किया ॥ ६३॥ 


इति श्रीमाकढेयपुराण गे दस चस (१) नाम १३३बां अ° समाघ्र । 
| - स्न - 


४२६ माकर्टर्पुराण | छ०-१२४. 


| एशसोयोतीस्वौ अष्याय 
। माकरडेय उवाच भाकरडेय वोज्ते-- (क स 
: तां लब्ध्वा दथा परस्नीं सुमनां सुमहाघुने । हे ऋरौषुकिजी ! तव गाजङ्कमार दमःने जो किं : 


श्रपने साथ अपी शमी समनी को जे श्रये थे। 


णस्य स पितुः पादौ मातश्च कषिपिपात्मनः॥ १॥ श्रपने पिता श्रौर माता के चरणों म प्रणाम “किया . 
॥ १॥ सुन्दरी खमना ने भी अपने सास, श्वशुर, , , 


गी श्रशसै = £ 

॥. १ छू नाम पना । को श्रामक्रिया । हे विभ ! माता पिताने उन दोनों 
भ्यांतो च तदा विप्र आशीमिरभिनन्दिती ॥२।॥ को धसन्न दोकर श्राशीर्वाद दिया ॥ २.॥ जव राजः 
होस्छवश्च सञ्जते नरिष्यन्तस्य वै पुरे। | इमार दम श्रपनी पली को लेकर दशां. भ से, 
दारे > त माये तथं महाराज नरिभ्यन्त के नगरम वड़ा 
(तदार च सम्पाठे दशाणाधिपतेः पुराद्‌ ॥ ३॥ च रः 
प ॥ मदाराज्ञ नरिष्यन्त श्रपने पुत्र सेः 
स्बन्धिनं दशारेशं जितां पृथिवीश्वरान्‌ | = | उत्सव इया ॥९॥ महार प 


{ता पत्रेण शुदे नरिष्यन्तो महीपतिः ॥ ४ ॥| कर दश्ाणं देश ऊ राजा. को अपना सम्बन्धी: 


\)ऽपि रेभे. मनया महाराजघुतो दमः । | वनाया दै, बहुत प्रसन् हष ॥४॥ फिर रजङ्मार , ` 
 पेवानवनोष्श-गासाद-गिरिसालुषु ॥ ५॥| दम मना क साथ छम्द्र उचानो, चनद ~ 


महलेों श्रौर पर्वतो पर रमण करते रहै ॥५॥ फिर 
२ १ फालेन महता सममा दमेन सा। बहुत काल तक दम के साथ विहार करते-करते 
बाप गभं सुमना दशाणीधिपतेः पुता ॥ ६ दशारं राज की पुरी सुमना गर्भवती दोगङ ॥ ६ ॥ .. 


यह सुनकर छि उसने वडुतसे राजाश्नो को जीत .. 


१ऽपि राजा नरिष्यन्तो शुक्तमोगो महीपतिः । | राजा नरिष्यन्त भी अनेक भोगो को भोग कर 


१ नं जगामेनद्रसेना एली चास्य यशखिनी । | । 


` निस्थविधानेन स तत्र॒ समतिष्ठत ॥ ८ ।|| भ स्थित दोकर रहने कगे ॥८॥ पक दार उसी 
क्षिणात्यः सुदं तः संक्न्दनुतो वने । | वन भ दक्षि का रहने वाला, संकन्दन 'का पुत्र, 
|# ॥ ५ [| [द्‌] न न्त “4 
| तं ष्टा तरिष्यन्त तापसं मलप्खिनम्‌ । | तप से श्तयन्त निर्वल इ नकी पली इन्द्रसेना 
1 द्रसेना्च तत्पत्नीं तपसातिसुदुव्॑ल्लाम्‌ ॥१०॥॥| को देखकर. ॥१०॥ पृष्ने लगा कि सुभे ` वतां 
"च्छ कस्त्वं भो विप्रः क्षत्रियो बा वनेचरः। | तुम कौन दो, व्राह्मण, क्त्रिय या वानपरस्थमे स्थित 
}. नमस्यमलुभापतो वेश्यो वा मम्‌ देथ्यताम्‌ ॥११।॥ वैश्य हो १॥ ९९॥ मदारज नरिण्यन्त -ने जो मोन. 
प मौनवती भूपो न हि वस्यो ददौ । | रव धारण किये इथे उसको कुच उत्तर न दिया 


तत्‌ पर । फिर इन्द्रसना ने उसको सचसच सव घृरान्त 
प्रसेन च एत्‌ सन्वसाच्टास्म यथातथम्‌ ॥१२।॥| खना दिया श अ. 


माकैएडेय उचाच माकंरडेयजी बोले $ 
{त्वा तश्च नरिष्यन्तं वपुष्मान्‌ पितरं रिपो; । जव .वपु्मागते चह मालूम विया किः बड.उत 
वि 
र त वदन्‌ कपात्‌ नरज परिश््च च ॥१२॥| उनकी जयाये पकड़ लीं श्नौरं कहां = 
ततो रला : । ` | ॥ १३॥ तव इन्द्रसेना हाय-दाय करके रोने लगी 
य, हति या शद वाष्पगद्वदम्‌ । च्रौर उसकी दिलकी वेध गहै ! क्रोध. से तलवार 
पपि पोपात्‌ सद्गञ्च वाक्यज्चेदुवाच ह। १४ सीचकर बपु्रान्‌ ने यद कटा ॥ १४ ॥ जिसने कि 


हादनतः | युद्ध मे सुभे जीता शीर जो कि मेरी 
ह स येन येन भे सुमना हृता । | द दाया (स पता कामै वध ४५१ 


1 


इन्द्रसेना के साथ वनको गये ओर वहाँ वानप्रस्थ, - 


भ्र° १३७ | माकंण्डेयपुराण ४९७ 


दमस्य तस्य पितरं हनिष्येऽपतु तं दमः ॥१५॥' षद दो तो यदय यावे ॥९५॥ उस कन्थाके ¦ 
येनाखिलमहीपालपत्राः कन्या्ैमागताः । द सव राजङ्कमासे को जिसने कि ९ :. 
शरवधूता इनिष्येऽ्टं पितरं तस्य दम्पते; ॥१ थार भधा दवा उस दष्ट पिताको 


मार्ता ह ॥१६॥ जस दुष दम को देखतेही 4 , 
योधेषु स्वरूपेण दमो यस्य दुरात्मनः । | दा दमन होजाता द उस दमक परिताको त > ° 


स दमो वारयत्वेप हन्मि तस्य रिपोगृम्‌ ॥१७।॥| ह बह आकर सकी रक्ता कर ॥ १७ ॥ 


मार्करडेय उवाच माक॑रडेयजी तैः 


यह कटटकर उस उुरात्मा वपुष्मान्‌ ने = ~ 
इत्युक्त्वा स॒ दुराचारो यपुष्मानवनीपतिः के रोते हणः महाराज नरिप्यन्त का शिर काटि 


कन्दन्त्यामिनद्रसेनायां शिरधिच्छेद्‌ तस्य च ॥१८॥| ॥ ८ ॥ फिर सव सुनि लोग च अन्य „+; 
ततो पिग्धिद्ुनिजना अन्ये च वनवासिनः उसको धिक्‌ धिक्‌ कहने लगे शौर वपुष्मान्‌ फिर 
तमूचुः सपचतं ट्ष जगास स्पपुरं वनात्‌ ॥ १ ६ श्मपने नगर को चला गया ॥१६॥ वपुष्मान्‌ के चह । 


त 6 त जाने पर इन्द्रसेना ने पक श्वास ली श्रौर श्रपः 
गते तस्मिन्‌ विनिश्वस्य सन्रतना पषुष्ति । पुत्र के पास एक शद तपी को मेजा ॥ २० | 
मेषयामास पत्रस्य समीपं श द्रतापसम्‌ ॥२०॥| उसने उस तपस्वी से कहा, “तुम शीर जाश्नो 
गच्छेया आशु मे पुत्रं दमं ब्रहि वचो मम। मेरे पति कीसृत्युका जो कुछ चचान्त दै वद भेः 

ह पुत्र दम से कटो, तुमने सब स्वयं देखा दहै, मै तुम 
अभिज्ञो यसि मद्वच उचान्त मोचयते विम्‌ २१।| से कया कह ॥ २६ ॥ तो भी भरे पुत्र से यद्‌ कदन 
तथापि वाच्यः पत्रो मे यदत्रवीम्यतिदुःखित्ता। | जो च कि म अत्यन्त इभ से कद रही ह वि. 

# इङनामीच्ती ्रलोवयैत तः राजा की देसी दशा सुभे देखी नदीं जाती , 
भराप्रां विलोक्यतां महीपतेः ॥२२॥'| मेरे पति ने तमको चारों आश्रमो का पोलन कर ` 


स भत्ताऽधिद्कतो राजा चतु परिपालकः । के वास्ते राजा वनाया था फिर यह कितनी श्रतु 
॥ 6 सि।॥२२॥ चित बात है कि तुम आाध्रमवासी तपस्वियों क॑ 
त्वमाश्रमाणां कि युक्त तापसान्‌ यन्न र र्ला नदीं करते ? ॥ २३॥ मेरे स्वामी नरिष्यन्ःं 
भ्त मम॒ नरिष्यन्तस्तापसस्तयसि स्थितः । | तपस्वी दोकर तपस्या भरं स्थित ये ष ५ 
~ लि विलाप करती हं जसे कि वह जिसका कहे नदं 
विलपन्त्यास्तयानाथो यथा नास्ति तथा त्वयि२४॥| । १ = रस्त दते दण भी कि लुम राजाह 
श्राकृष्य केरोपु वलादपराधं धिना ततः वपुष्मान्‌ ने ठम्हारे पिता को भिना किसी श्रपरा 
के वलपूर्वक केश पनङ़ कर खीचा शरीर मा 
हतो वपुष्मता ख्यातमिति ते 1 ।२५॥ डाला ॥२५॥ देसी सि तं धी कती र | 
एवं स्थिते तत्‌ क्रियतां यथ। धम्मो न कुप्यतं। | से धमेका लोप न हो । सुम च न कडना चाः 
था च नैव वक्तव्यमतोऽस्मातर तापसी हम्‌ ॥२६॥ फयोकि भै तपखिनी ह ॥२९॥ त॒म्दारे चृद्ध. तपस्व 
पिता को जिघ्छने विना किसी श्रपराध दे मारा; 
पिता हृदधस्तपस्वी च नापरोधेन दूषितः उसकी भी बही गति हो, इसपर तुसको विचा 
६...५ म्‌] [१ स्मः [) &< 
व्यं तद्विचिन्स्यताम्‌॥२७॥| करना चाहिये ॥२७॥ ठम्डारे मस्विगण चीर च 
0008 करो सव शास्यो के जानने चालते हँ उनके साथ ५५।५ 
सन्ति तै मन्विणो वीरा; सव्वंशाचाथक्ती वदाः । | करके जो उदित दो वह करो ॥ र ॥ दे राजन 
तः सहालोच्य यत्‌ काय्यैमेवस्भूते कुरुष्व तत्‌॥२८।॥| हम तपस्वियों का यद ्रधिकार नदी दै, इसव ८ 
। -नास्माकमधिकारोऽत्र तापसानां नराधिप । | पतीकार्‌ ठमको दी करा है कारण-यद्‌ राजा च 


पतिभाषितम्‌ ॥२६॥ कत्य ह ॥२९॥ जिस परकषार विदूरथ फे पिता व्‌, 
छरुष्वैतदितीत्थं त्वमेवं भू म ॥ यवन ने मारा था उसी प्रकार ठुम्दारे पिवा | 


विद्स्थस्य जनको य्यमेन यथा हतः । वपुष्मान्‌ ते मास है) बिद्श्थवयेयवनकेषुल 
तथायं तव पुत्रस्य इलं तेन विनाशितम्‌ ॥२०॥ नष्श कर दिया था ॥३०॥ अञ्ुरराज जस्भ के 


४२९८ 


साकंण्टेयपुराण 


` भ्र १३५ 


-__- ~ 
--------------------न-नन-~--------~- 


नम्भस्यासुश्यानस्य परिता दष्टो भनङ्गमे 
तेनाप्यखिलपाताल-गासिनाः पन्नगा हताः ।॥२३१॥ 
पराशरेण पितरं शक्तिञ्च रक्षसा हतम्‌ । 
भुत्वा पातितं दृत्ल रक्षसामभवद्‌ इलम्‌॥।६२॥ 
अन्यस्यापि स्ववंशस्य लंघनां क्रियते हि या । 
तां नालं क्षत्रियः सों कि पुनः पितरृमारणम्‌ ३३॥ 
नायं पिता ते निहतो नास्पिन श्रं निपातितम्‌ । 
त्याभृत्र निहतं मन्ये खि शस्तं निपातितम्‌ ॥३४ 
विभेत्यस्य हि %¦ शस्त्र न्यस्तं येन वनौकसाम्‌ । 
तव भूपस्य पुत्रस्य मारिते तु बिभेतु वा ॥३५॥ 
तवेयं लंपघना युक्ता यदरसिमिस्तत्‌ समाचर । 
वपुष्पति महराज समभूस्य-त्ताति-वान्धवे ॥२६॥ 
माकंरडेय उवाच 
' इति संकरान्तसन्देशमिन्दरसना विद्य तम्‌ । 


 पतिदेदपाश्िप्य विवेशाथ मनस्विनी ॥३७॥ 


=== = ~ ~ 
क ‡ 
४ 


1 माकरडेय उवाच 
 सेनासमा्ः स॒रत्वाशृद्रतापसः ` । 

; माच वथारोक्तं दमाय निधनं पितुः ॥ १॥ 
तपन समाख्याते दमस्तेन पितुबेषे | 
ोधेनासीव जञ्वाल हविषेवा्िश्ढधतः ॥ २॥ 
{स ठ करोधाभिना धीरो ददमानो महान । 


करं करेण निष्पिष्य वाक्यमेतदुवाच इ ॥ २ ॥ 
अनाथ इव मे तातो भयि पुत्रे तु जीवति । 


3 घातितः पुच्रशंसेन परिभृय हलं सम ॥४॥ 


र न्यायवादौ नने तस्याप्येष ककेव्यात्‌ क्षमाम्यहम्‌ । 
१ तशान्तो शिष्टानां पालनेऽधिदृता वयम्‌ । 


{एपतरचापि निहतं दृष्टा जीवन्ति -शत्रवः ॥ ५॥ 


५ ५५१ वहुना हा तातेति च किं पुनः 


५५ 


को खर्पो ने कारा था इस कारण जम्भ मे समस्त 
पातालवासी नागो को मार डला ॥ ३१ ॥ पराशर 
ने जिनके कि पिता शक्ति को राक्ञस मे भार डाला 
था यह सुनकर खमस्त राचस कुल को श्चि मे 
अंक कर भस्म करः दिया ॥ ३२॥ श्रौर भी किसी 
रकार की खुखाई को जो करि उसके साथ.कीलाय 
पक त्य नदी सह सकता है, पिता के वध के ` - 
श्रागे क्या दै १।६३॥ ये तुम्हारे पिता नीं मारेगये 
ह रौर न उनपर कोई अल्ल ही गिरा है, मेरे मत 
सेयह तरुमद्ोजो मर गयेहो तथा वुम्हारे.ऊपर 
दी शखर का धार श्रा हे ॥ २९1 जिस पापीने 
तपस्वी पर हथियार चलाया है उसको चध करने 
उरते हो १।३५॥ जिस प्रकार वपुष्मान्‌ ने 
तम्दारी इगंति की है उसी प्रकार भाई चन्धुश्या 
श्रौर जाति वालों सित उसकीदो पेखा तुमको 
प्रयत्न करना चाहिये ॥३६॥ 
माक॑रडेयजी वोले- 
इस प्रकार संदेश देकर इन्द्रसेना ने उस शद्र 
तापस को विद्या किया श्रीर वह मनस्विनी स्वयं 
श्रपने पति के शवके साथ श्रमे पवेश कर गर ॥ 


इति श्रीमाकर्डेयघुराण भे दम चरि (२) नाम का १४बां अध्याय समाप्त । 
न स -€4 - 


एको पतीस अध्याय 


माकरडेयजी वोल्े- 

इन्द्रसेना से राज्ञा पाकर उस शद्ध तापस ने 
दम के पास जाकर जिस प्रकार कि उससे महा. 
राज दम के पिता की सत्यु के विपय मेँ कटा गया 
था सव उनको कद सुनाया ॥ १॥ उस तपस्ती से 
अपने पिता के वध का समाचार नकर महाराज 
दम की क्रोधाचि इस तरह भड़क उटी जिस तरह 
हविष्य पड्ने से धि प्रज्वलित दोजाती है ॥ २॥ 
हे मदासुनि कऋरौष्टकिली ! बे धैर्यवान्‌ महाराज रोघ 
की श्चि से द्ध होने लगे श्नौर दोनों हाथ मीद 
करः यह .चचन योले ॥३॥ मुभ पु के जीवित होते 
हप भी मेरे पिता को निदेयी वपुष्मान्‌ ने मेरे कल 
का अपमान करके अनाथ की तरह मण है 1 ४॥ 
यदि मँ इसको ्षमां करता हँ तो न्यायत्ादी लोग 
सुभको नपुंसक कगे, हमारा श्रधिकार दुरो को 
मिटाने नौर खज्ञनों का पालन करने के लिये ह, 
पिता को मार कर थदि श्र जीवित रहता हो तो. 
॥ ५॥ फर हां तातः हा तात ! इस प्रकार बहुत ` 


अण १३१५ 


विलापेनात्र यत्‌ इत्यं तदेषोऽर करोम्यहम्‌ ॥ & ॥ 
य्रहं तस्य रफ्तेन देहोत्थेन वपुष्मतः 


न करोमि गुरोस्त तत्‌ भवेक्षये हताशनम्‌ ॥ ७ 


तच्छोणितेनोदककम्प तस्य॒ तातस्य संख्ये 
` विनिपातितस्य ¦ सांसेन सम्यगृद्विनभोजनञ्चन 

' चेद भवेक्ष्यामि हुताशनं तत्‌ ॥ ८ ॥ 

, , साहाय्यमस्यासुर-देव-यक्ष-गन्धव्वं - विधाधर- 
सिद्धसंघाः । इव्वेन्ति चेत्‌ तानपि वाखप्रे- 
भैस्मीकरोम्येष रुषा समेतः ॥ ६ ॥ 

निःशुरमाधम्मिकमपरगपतं त॑ दाक्षिणात्यं 
समरे निहत्य । भोभ्ये ततोऽहं पृथिवीञ्च कत्लां 

बं भरवेध्याम्यनिहत्य तं वा ॥१०॥ 

सटुम्मति तापसदद्धमोनिनं वनस्थितं शान्त- 
वचोबिपिदमम्‌ । हन्ताहमयाखिलबन्धुमित्न 

पदाति-हस्त्यश्व-यलेः समेतम्‌ ॥११। 

एषोष्टमादाय धुः सखद्गो रथी तथेवारि 
गलं समेत्य । करोमि वै यत्‌ कदनं समस्ताः 

[शयन्त॒ मे देवगणाः समेताः ॥१२॥ 

.थो यः सहाये भविताद्य तस्य मया समेतस्य 

(णाय भुयः । तस्या तिेषडलक्षयाय 

पयुद्यताऽहं निजवाहुसेन्यः ॥१२॥ 

यदि कुलिशकरोऽस्मिन संयुगे देवराजः 
परिपतिरय चोग्रं दण्डमुचम्य कोपाद्‌ । 
धनपति-वरुणाका रितु तं यतन्ते 
नि्िखसौवैघातयिष्ये तथापि ॥१४॥ 
नियतमतिरदेाषः काननाखणडलोको- 
निपतितफलमकषः स्वभूते मेः । 
प्रभवति मयि पुत्रे हसित येन तातः 
पिशिवरुषिरदका्तस्य सन्ध ध 
इति श्रीमाक॑र्डेयधुराणमे दम 


भाकंरदेयपुराण 


` ४२६ 


कटने श्रौर विलाप करने से क्याहै।! अवजो. 
करने योग्य कार्थ है उसे मै करता हँ ॥ ६॥ यदि 
घपुप्मान्‌ के शरीर मे से निकाले हप रक्त से श्चपने. 
पिता की दक्षिन करू" तो भँ अध्चिमे पवेश कर 
जाङ्गा ॥७ यदि वपुष्मान्‌ के रुधिरसे अपने सृत | 
पिता कातपंण्‌ न कर श्रीर युद्ध मै उसको मार। 
कर उसक्रा मांस ब्राह्मणों को श्राद्धं मै न खिलाड। 
तोम ्रभिमे प्रवेश कर जागा ॥८॥ छगर। 
उसकी सहायता पर राक्षस देवता, यक्त, गन्धर्व 
विद्याधर रौर सिद्धो के समूह भी होगे तो उनको, 
भी श्रपने श्रस्ों की असनि से भस्म कर दगा ॥ ६॥। 
या तो मै उस कायर, श्रधर्मी, इट दक्तिर-निवासी ` 
वपुष्मान्‌ को समर मे मार कर सम्पू पृथ्वी परः 
राज्य करूंगा अन्यथा श्रि मे प्रवेश करके मर 
जागा ॥२०॥ जिस दुष्टे मेरे वद्ध तपस्वी, मौना, 
बलम्बी, वनवासी, शान्तवाची पिता को भारा ह ' 
उसको म उसके सव भाई, वन्धु, .मिच, पैदल, 
धोडँ श्रौर सेना सदित मां गा ॥ ११॥ मँ धयुष, . 
वारु शौर तलवार ज्ेकर तथा रथ पर श्रारट हो 
कर जिस तरह शक्र का सेना सित दलन करता ` 
बह सव लोग देवतानं सहित अवश्य देख ॥ | 
जो उख वपुष्मान्‌ की सहायता करेगा उससे युद्ध | 
करने के लिये श्रीर उसके ल्षमस्त छल का नाण । 
करने के लिये मे श्रपनी युजा से तयार हँ ॥ धश 
यदि उस युद्ध मे वज्र लेकर इन्द्र, उग्र दरड तेकर, । 
क्रोध करते इषः थमराज, फुर, चर्ण श्रौर खट | 
भी उसकी रक्ता करने का प्रयत्न करेगे तो उनकं 
भी चै श्नपने तीक्ण वाणो से मारूं गा ॥ १४॥ सुस 
पुत्र ॐ दोते हप जिसने नियमशील, निर्दोष, घनः 
वासी, गिरे हप फल खाने बाले, सव प्राणियों > 
मित्र पेसे मेरे पिता को मारा है उसके मांस 


॥१५।॥| रुधिर से गिद्ध ठप हों ॥१५॥ 
चस्ति (३) नाम १३४ाँ अध्याय स० । 


(८ माकरुडेयपुराण ` ० १९९ 


एकसोव्॑तीपवां अध्याय 
नि माकैरडेय उवाच : , माकैरडेयजी व ( ५ = 
§ति `भतिज्ञाय तदा नरिष्यन्तसुतो दमः 1, ›; |. इस.भकार परति करके  नरिम्यनत , के 


दमकी शरि क्रोध के मारे रदी होगई ध 
र + छ उन्दने अपने हाथ से मूधो को पडा ॥१॥ ग्र ने 
फोपोमष्तक्षः धमश्रमाहत्य पाणिना ॥ पिव को स्मर कर उन्न कड, “य! मे 
४ हतो ं ध्यात्वा दैवं वििन्य च| मारय गया फर्‌ अपने भाग्य्‌.की निन्दा की। 
हा इतोऽसमीति पितर भयाला दै राहि इसके वाद सेव मन्त्रयां शरौर पुरोदित को बुला 
मन्विएः सव्वानानिनाय पुरोषिति्‌॥ २।॥| कर उनसे कडा ॥ २॥ | 
मोवाच म । 
ग दम उवाच | द्म ध त 
ते भते सराल्लयम्‌ । जो छ शद तपस्वी ने कडा है बह सव श्राप 
1 म लोगो ने सुना होगा । पिता के स्ग॑पहंचने पर 
शरुत मबद्नियत्‌ भोक्त तेन शृ द्रतपसिना ॥ २1 अव क्या करना उचित है सो कि ॥ त बद्ध 
ृद्धस्तपस्वी स उपो वानप्रस्थे व्रते स्थित; । ` तपस्वी मेरे पिता वानप्रस्थ चत में रढकर मौन 
मौनव्रतधरः शास्ता मन्मात्रा वेन्द्रसेनया-॥ ४ ॥| धारण किय हुष थे । मेरी माता इन्दसेनासे ॥४॥ 
४ ९ त: पर्ने पर उसने पना नाभ, पता इत्यादि सघ- ` 
प्रोक्त संपृष्टया सव्वं तथा तथ्यं वपुष्प | सच वधूष्मान्‌ को वता दिथा । इसपर वपुष्मानूने 
प॒ चं खगं समाकृष्य तथा सव्येन पाणिना ५ तलवार लीचकर क से ॥ ५॥ कीः 
ष ध । | जया पकड़ कर भ्रनाथो की तरह उनका. शिर काट 
रत्य जवान दत्ता स कनथिमनायवत्‌ । | अला शीर मेरी माता भी भेर रति धिकार पूर्वक 
पराता च मां समुदिश्य धिकृशब्दं क्व्व॑ती सती ।॥६॥ व कर॥ ६॥ तथा स श्नीर ) 
5 त । न जानकर महाराज. नरिष्यन्त को. आ- - 
मन्दभागं गतश्रीकं मवि इत्यबाहेनम्‌ । लिङ्गन करती हु श्मनि मे पवेश करे स्वम को . 
समालभ्य ` नरिष्यन्तं प्रविष्टा त्रिदशालयम्‌। ७॥ चली गह ॥७॥ अव मं बही करभा जिसको 
सोऽहमेच करिष्यामि यन्मे मातुर्दीरितम्‌ । ` की ध मानाने आज्ञा दी है] रतः दायी, 
दयश्रथपादातं  सन्यश्च परिकस्पताम्‌ ॥ ८ ॥| गोड, रथ चौर पैदल सेना को तयार कीजिये। ॥ 


स ०६ पिता का बदला लिये विना तथा पिता के मारने 
शनिवाथ्येः पतुर्बरमहत्वा॒पितृधातकम्‌ । | बाले को. मारे चिना चोर माताके कै हुए को किये 


अकृत्वा च वचो मातुजीवितुं किमिरोत्सहे ॥ & ॥|| षिना सुभे जीवित रहने का उत्साह नदीं दै॥ ६॥ 
माकैरडेय उच ` माकंर्डेयजी वोज्ते-- ॥ 
मन्त्िणस्तदवचः श्रुता हा हैतयुक्ा तथा च तत। |, ` मन्यो ने यह वचन सुनकर हाहाकारं मचा 
त पव्या तथा व्याल सन होते हप भी . उन्होने 
छतवन्तो विमनसः सभत्यवलवाहनाः ॥१०॥ क शरौर बाहनों सित सेनाको तयार क्िया।॥ 
० व > वे म्री लोग तलवार; शक्ति, षटि, रारि 
¦ सपरीवाराः खढगशक्सयर्टिपाणयः | , त 
निवेयुः सपरी ^~ | हाथमे लेकर छपने परिवारो सहित बहरनिकले, : 
ग्रदीता चाशिषो विभा त्रिकालत्नात्‌ पुरोधसः ११॥ निकालवरशी पुरोहित घे उन्दने चाश्चीवाद्‌ ग्रह्‌ 
वस्य 'दसः `भ्ायद्भपु्मतम्‌ .|‡ | "या ॥ ११॥ प्रहोराज -दम शेषनाग की तरद , 
"दमु ए ॥ ४ ~ 
प्रहिरादिव निश्वस्य 'दम भायाद्ु मतम्‌ । पुफकार र इष वपुष्मान्‌ की सीमां तक जा ` 
-सीमापालादि सामन्तान्‌ निधन्‌ याम्यदिशि खरन्‌॥ पचे भौर बद्र उन्होने रक्तको को मार कर. 
छः दक्षिण दिशा की चयोर शीघता से क्रदम बढ़ाया 
॥ १२॥ सनन्दन के पुत्र चपुप्मान्‌ को भी यह 


। इ => 


.ू-१. दमो ज्ञातो पपुष्मता। 


अ१.१३६. माकरढेयषुराण ४३९: 


५ ज --------- न ----- 


मालूम होगया कि महाराज दम परिवार, म॑न्यो, 
प्रर सेवको सहित श्रा पर्वे है ॥ १३ उसने ` 
विना वराये हुप.्रपनी सेनाघनों को तैयार -दोनने 
का ्रदेश किया तथा नगर से चाहर निकल.कर 
को दम के पासं भेजा ॥ १४॥ श्रौर उससे 
कटाक तुम दम से यह कह कर शी श्राघ्नो कि 
.५महाराज्ञ नरिप्यन् पनी सहित तर्डारी स्वर्ग भे 
प्रतीता कर रहे है । यदि तुमक्त्रियदहो तो शीघं 
मेरे पास श्राश्नो ॥ १५॥ यह मेरी सुजासे निकले 
दुष बाण शिलाश्च का मी मेदन कर देते है । यषः 
युद्ध मे तुम्दारे शरीर को छेद कर तुम्हारे रुधिर 
से श्रपनी दपा शन्त करगे" ॥ ६॥ ` 
माक॑श्डेयजी वोक्तेः - | , 
महाराज दमने भी दूतकी कष्टी हुई उस वात्र 
को सुनकर श्रपनी पदिली प्रतिक्चा की याद. 
श्रौर सर्पं की तरह श्वास सेते हुए शीघ्र वदे ॥१७॥ 
फिर वपुष्मान्‌ ने भी युद्ध मै दम को ललक्रारा 1 
इसके श्ननस्तर दम श्रौर वपुष्मान्‌ छा घोर युद्ध 
इश्रा ॥ श८॥ हे विपरि ! रथी रथी.-से, दधी. दधी 
से श्रीर धुद्सवार घुड्सवार से भिं गया ` ओर 
शरीर बह्म पर तुमृल युद्ध होने लगा ॥ १६-॥' जिस 
को कि देवता, सिद्ध, गन्धव श्रौर यत्त आदि देख 
रहे थे ! जिस समय कि करुद्ध होकर दम युद्ध करं 
रहे थे उस समय हे ब्रह्मन्‌ ! पृथ्ची कांपने लगी ॥ 
' उसके चार को कोह हाथी, स्थी या अश्व नदीं 
सटनकर खकताथा ! पिर अपनी सेनाद्रा चध्यत्त 
दोकर दपुप्मान्‌ दम के साथ युद्ध करतेलगा ॥२९॥ 
तव एक वारा से दम ने वपुष्मान्‌ को छाती मै 
भरारा जिससे कि वह गिर प्रदा जर उसकी सवः 
सेना भाग गई । इसके श्चनन्तर शमर दमशील 
महाराज दम ने उख वपुष्मान्‌ से कदा ॥२२॥ ` ` 
दम वोल्ते- । = 
, हे इट ! मरे निः्शख्र, तपस्या करतेहपःतपखी 
पिताक मार करत्‌ कट जाता है? तू यदि 
स्त्रियहे तो श्रा युद्ध कर ॥२३॥ 
माकरंडेयजी वोले- त 
ततो निवत्त च दस्मो योधयामास सानः । | किर लौट कर बश्च स्थपर सार दा 
वय - . | श्रपते माई, पुत्र, सम्बन्धियों ओर बान्धवं सदित 
सपुत्र! सह सम्बन्धि-वान्धवैयुयुषे रथी ॥२४॥ यदं करने लगा ॥ २४॥ किर उसके ५ 
॥ -धकरैवाणेर्यिं „) ` । हपःधासों चे सव दिशाय व्थाप्त दोग 
ततः शरासनान्धुक्तेवांण> नभो दिशः। | इय पयते वा क जाल से दम को च 
दमु, सरथं , साश्वं बाणनालूरयद्‌,॥९५। 


रथ खदित घेर लिया ॥ २५॥ परन्तु "दमु ` तेजो 
. 1.“ व | 
तत्‌; प्िदृ्धौतयेन कोपेन - ष॒ मुस्ता । : 


आयातः. सपरीवारः सामात्यः सपरिच्छदः ॥१३॥ 
्रकम्पितेन मनसा स्वसेन्यान्यादिदेश ह । 
तच पेषयामास॒निगेम्य ` नगरादि; ॥१४॥ 
त॑, शीघरतरमागच्छ नरिष्यन्तः परतीक्षते | | 
तमाः कषत्रनन्धो तवं समायाहि ममान्तिकम्‌॥१५॥ 
एते मदाहृनिम्कता पीता बाणाः शिलाशिताः। 
भरि्वा शरीरं संग्रामे पास्यन्ति रुधिरं तव ॥१६॥ 

५ माक॑रुडेय उवाच 
रला दमस्त तत्‌ एव्व दूतमोक्त ययो स्वरन्‌ 
सृत्वा प्रतिना र्ववक्तां निश्वसनुरगो यथा ॥१७॥ 
रहय समरे वेनं एुमान्‌ स॒न विकत्थते । , 
ततो युद्धमतीवासीदमस्य च परुष्मतः ॥१८॥ 
रथी -घ रथिना नागो हस्तिना हयिना हयी । 
भ्ययुध्यत विप्र ` स॒युद्धस्तुलोऽभवद्‌ ॥१६॥ 
पश्यतां सर्ववदेधानां पिदधगन्धव्वंयञ्विनम्‌ । 
धस्पे वसुधा ब्रह्मन्‌ युध्यमाने दमे क्रुधा ॥२०॥ 
न' गजो न रथी नाश्वस्तस्य बाणसदस्तु यः। 
ततो दमेन . युयुधे सेनाध्यक्षो वपुष्मतः ॥२१॥ 
हृदि पिव्याध च दम शृणा गादृमन्तके । . 
तस्मिन्‌ निपतिते सेन्यं पलाय॒नपरं यथा | 


एख्ामिकं ततः माह दमः शमदमस्तथा ॥२२॥ 
दम उवाच 


९ यादि दुष्ट पितरं घातयिता तपसिनम्‌ । 


भश्च तपस्यन्तं क्रियोऽसि निवचतताम्‌ ॥२२॥ 
।ओ । माकौरडेय उवाच । 


अपरे पिता के वध.के.कारय ` कुपितं; दो देः; 


प व 
# 


४३२ मकंर्टेयपुराण ० १३७ 


ः च ॥। त को कार डाला तथा श्रौरभी वाण 
विच्ेद तारा वाये तानपि २९ ज ला, त 
;एकेनेफेन वाणेन सप्र ॒पुत्रास्तथाञुजाम्‌। | क सातो पुव, भादयो, सस्बन्धियों श्रीरमितराको 
-सम्बन्धिनस्तथामित्राएयनयदयमसादनम्‌ ॥२७॥ व ध र क र ध 
पपुष्मान्‌ स रथी क्रोधान्नि्टतात्मनवान्धवः । | रथ पर सवार दोकर दम से पुनः द्ध करने लगा 
युपे च दमेनानौ शरैराशीविषोपमैः ।२८॥ शौर उसने विप के बुमे इष वाण दम पर चोड ' 
३ चन्तेद महामे । | र हे महाघरनि क्रटुकिंजी ! परन्तु दम ने उन 
चच्छद तस्य तान्‌ बाणान्‌ घ चास्य च महा सखव वाणो को कार गिरया । वे दोनों एक दुसरे ¦ 


युयुधातेऽतिसंरव्यौ परस्परबधेषिणौ - के बध की दा से भीयस यु करने लगे ॥ २२॥ 
परसपरशराधात-पिच्छिन्नपनुषौ तथा । एक दृखरे कै बाणो के आधात से दोनों के धुप 
ट्ट गये । फिर दोनों महावली योद्धा तलवार ` 
शृहीतखड्गावुततीय्यं यिक्रीडाते महाबलो ॥३०॥ शष त ख करए ये २०॥ अवी र 
¦ क्षणं दपं १ पितरं दम को वन मेँ श्रपने पिता केवधका श्याल 
व क्षणं सरपं ध्यात्वां निहतं पितरं षने । व 
केगोष्वाङृष्य चाक्रम्य निपात्य धरणीतले । | प्रथ्वी पर गिरा दिया श्र उसके शिर पर पाँब , 


 शिरोषरायां पदेन युजशु्म्य चात्रवीत्‌ ॥२ रखकर अपनी सुजा उठाकर यद वचन . योते ॥३१॥ 


द्म उवाच दम ष 

परयन्तु देवताः सर्व्वां मादुषाः सिद्ध-पजगाः | सव देवता, मचप्य, सिद्ध श्रौर नाय लोग . 
पाठ्यमानं हि हृदयं पषत्रवन्धोर्पुष्मतः ॥३२।॥| चज्रिय वपुष्मान्‌ का हदय फटता हा देखें ॥३२॥ , 
| मा्क॑रुडेय उवाच माक॑रुडेयजी वोल्े- | 
'एवघुक्त्वा च स दमो हृदयं परा्चासिना । यद कह कर दम ने उसका दय तलवार से 


वीर डाला } उसके हृदय से निकले हुपः रुधिर में 
।सातुकामेश् स सुरः क्षतजेन निवारितः ॥३३॥| जो देवता स्नान करना चाहते भे ज दमने 


तनै निषेध किया ॥३३॥ फिर दम ने वपुष्मान्‌ के रक्तेसे 
{ततव कारितस्तस्य एकतेनेबोदकक्रियाम्‌ । अपने पिता का तपेण॒ किया तथा उसके मांस से. 


'बपुष्मतव मांसेन पिण्डदानं चकार ह ॥३४॥ पिरड दान किया ॥३४॥ श्रौर उस पिण्ड को 


| राय भोजयामास रक्षलशुदगवान्‌ | | गरस इल मे उत्पन्न ब्राह्मणों को लिलाया । इस 
| ४ । प्रकार वे अपने पिता के ऋण को चुका करः श्रपने 
“आदरस्य भाप्यस पितुः एनः प्रायात्‌ खक पुरम्‌३५॥ नगर को गये ॥ ३५॥ रेसे.देते राजा लोग सूर्य 


एवंविधा हि राजानो बभूवुः घ््यवंशजाः। | वंश म होगये ह । इनके तिरि शरन्य विद्धान्‌, 
*अन्येऽपि सुधियः शूरा यज्वानो धम्पैकोपिदा३६॥ शीर, यज्ञकतां जौर धर्मज्ञ ॥ ३६॥ तथा वेदान्त 


सिः सथामिह मे पारङ्गत राजा लोग हुए जिनकी संख्या बतनि ` 
 ेदान्तपारगांस्तांश्च न ॒संस्यातुमिहोतसहे । को मै समर्थं नदीं ह । इन राजाश्चोकी कथाञ्जनकर 


, एतेषां चरितं शरुत्वा नरः पापाद्वश्ुच्यते ॥२७।॥| मलु्य पाप से सुक दोजाता है ।२७॥ 
इति श्रीमाकण्डेयपुराण म दम चरित्र (४) नाम १२६बां -अ० स०। 
~स ड 
ह एकपीकतीसवां अध्याय 
। रयं | ` | पी बोले- ह 
स॒ एनिमाकण्डेयो महातपाः । | यदह सव कहकर मदातपस्वी सुनिमाकैरडेयजी 
कौ्टुकिल्चापि च्रे मध्यािकीः निया न मिक विदाकर पनी नेमिचिक भ्या - 


.` -श्र० १२७ ५५ माकण्डेयपुराण 1 ४३३ ` 


क्रिया की ॥ १॥ हे महासुनि जैमिनिजीं । हमने मी 
उन्दी से यह कथा सुनी थी जिसको करि ्रापसे 
कह दिया यह कथा अनादि सिद्ध है शरीर सवसे 
पदे ब्रह्माजी ने ॥ २॥ मुनि माकररुडेयजी से 
कटी, जिस पुरयवती, पित्र श्रायु वदने बाली, 
श्नीर खव कामनाश्चों को सिद्ध करने बाली कथा 
को हमने श्रापसे वर्णन कर दिया ॥ ३॥ इस कथा 
को जो कोई पड़ता या श्ुनता है 'उसॐे सवै पाप, 
रूट जाते दै । ापने जो शरु मे चार प्रश्न कयि 
थे ॥ ४ ॥ उनके उत्तर स्वरूप हमने. पिता-पु8 
सम्बाद, ब्रह्मा की खष्टि, मनुश्ोँ की उत्पत्ति आर 
उनका वर्सन, तथा राजा के.खरित्र आदि -क, 
दरसन ॥ ५॥ श्रापसे कर दिया दै, अव ध्राप. क्या , 
शनौर सुनना चाहते दै । इन प्रश्नोत्तयोको सुनकर. 


` श्रस्माभिश्च रुतं तस्मादुयत्‌ ते भोक्त महान । 
ग्रनादिषिद्धमेपदधि पुरा भोक्त स्यस्धेवा ॥ २॥ 
मादैर्डेयाय भुनये यदुक्तं कथितं तव । 
एवं 'पपित्रमायुषयं सवेकामाथ॑िदधिदम्‌ ॥ २॥ 
परतां : भृएवता्चापि .. स्व॑पापेः प्रमुच्यते । 
श्रादापेव एता ये च पर्चा हि चतुरस्त्रया ॥ ४ ॥ 
पितापुत्रस्प संबादस्तथा खष्टिः सखयम्धुवः । 
` तथासनूना्ुत्यतीः राह्ा्च चरितं ने ॥ ५ 
भ्रस्माभिरेतत्‌ ते भोक्त किमन्यच्छरोतुमिच्छसि । 
` एतान्‌ स्यान्‌ नरः शृणवन्‌ पठन्नपि समापु च। रोको सुनकर, 
विधूय सव्य॑पापाणि व्रह्मएयेव लयो ध्रजेत्‌ ॥ ६॥| चा समा प व 
अदश पुराणानि यानि भा पितामहः । भ राय कदे है उत प्यः 
। तेषान्तु सप्तमं तेयं माकंरुडेयं सुविशरुतम्‌ ॥ ७।॥| माक॑रुडेय पुराण को सातवां समसनं चाये ७, 
बरह्म" पाद वैष्णव रवं भागवतं तथा । | (१९) य (२) अ 
न | 
† ८ ॥| एराण, (४ पुरस, ६ त्‌ 
व पिष सत्तमम्‌ | ॥ पुण्‌, (६ ) नारदपुराण, (७) माकडेय पराण, 
दशमं बह्मववत्तं॑दृसिरैकादशं तथा ॥ £ ॥| (१०) र (११ र ॥.६॥, ( 
` वाराहं द्वादशं भोक्त स्कान्दमत्र रयोदशम्‌ । | वारा, {( १३१ सकन्द, ^ ^“ वामनः, ५ ८; 
दं द्वादशं भोक्त स्का्दमन योदशृम्‌ म, ॥ १०॥ (एद) मतस्य, (१७) रट, ( ९८. 
चतुरं . धामनकं कौम्मे पंचदशं तथा ॥१०॥ ड 1 शन शरम पुरो के नम को ज 
मात्स्यंच गारुदध्यैव ब्रह्माएटंच ततः परम्‌ । | कोई पदृता दै श्रौरं ॥ ११॥ ८ ४ संभ्या्नो मे श्र 
, ष्टादशपुराणानां नामधेथानि यः पठेत्‌ ॥११॥| का जप करता है उको अश्नमेधं यज्ञ क. फ6 . 
प्रिसन ह ¡ जपते नित्यं सोऽश्वमेधफलं लभेत्‌ । | मा दता है चारे भरयर्नो से युक माकण. 
त तं 6 पुराण को ॥ १२॥ खनने से करोड़ों पाप नष्ट द; 
चतुःश्रसमोपेतं पुरां माकंण्डसन्कम्‌ ॥ १२॥| जाति ह । ब्रहमहत्या आदि पाप तथा न्य अग 
रुतेन न्यते पापं कटयकोटिशते; तम्‌ । | | ॥ १३॥ इस भकार न दोजने च 0 
ब्रह्महत्यादिपापानि तथान्यान्यशमानि च ॥१२॥ व ट ६. उड्‌ स (५ 
। एकर लद! ५ 
तानि सर्वाणि नन्त तूलं बाताहतं यथा। | उनका ततय ज कोवा खी ~ 
पुष्करस्नानजं पुण्यं भवणादस्य नायते ॥१४॥| क वच्चे मर जाते हो छने सोः सव 
व्या बा तता बा शरोति यदि तत्वतः । || लको सयक की मि सोती न ९ सव 
सापि ‰ लभते पुत्रं सवयक्षणसंुम्‌ ।. | भलवान भ कारे बत, च 
सा प पत्र मलों ध 9 1 जाती ट ॥ १५॥ मदि प्रान करने वाले, । र 
धनधान्यमवाभोति ख तथाक्षयम्‌ ॥१५॥ क्म करने बलि म्प्य भी १ 1 खनक 
. सरोपशोग्रकम्मां च श्रुतैतत्‌ सकलं नरः । `. | सव पापों से सुक दोजतेःह ओर मरने पर स्व 
न  सवर्शलीके महीयते ॥१६॥| को जति हे ॥ ५६॥ दे दिजो्तम. इस ,कथा चर 
आदरोपमरयं पनतम्‌ 1, . (खत बलः भ ५ 


४९४ । माकण्ठेयपुराण | = 0 अरः १२७ ` 


शषवैव ्यवन्छेदी भ्रामोति दविनसत्तस ॥१७।॥| पुव भोर वंश आदि की.पति , करता हे .॥.१७॥. 
अ व हे विप्र | दठको सुनकर जो, करना व व. 
परत्वैतत्‌ सकलसं चिप्र यद्‌ ययात्‌ तचचिशामय । | हमसे नो । चतुर म॑चुप्य को चादिये किं पदिते ` 
रत्नि समाधाय ततो होमं इरययादविचक्षणः ॥१८॥, तो अचि भज्यक्लित करे दवन करे ॥१८॥ दे सुनि. 
वाल पर किदं हतश अमि | सन्तम } फिर गोचिन्दरूप पुराणएका हदय मे ध्यान , 
प्याखा पुराणं ग विन्द ह्नि कर पुरर दी नैवे, यन, माला ओर चखा 
{नां वपुष्मतेर्ेचेगंन्धमार्याम्बरेस्तथा ॥१ शादि से पूजा करे ॥ १६॥ दे जैमिनिंजी ! फिर, ., 
॥चकन्तु . संपत्ती `` पजयेन्छुनिर॒तचम । =| वाचक की उसकी खी के खदित पूजा करे श्रीर 
य ठतो -दैया गौः सपत्सा परयसतिनी ।२०।| वाचक को वच्चे वाली, पकं इुधांरू. गाय दे ॥२०॥ 
॥चक्रय्‌ वृता दवा च ५ भ्व ना ॥*०/॥| हे विध ! सजा को केथा वाचने चालो को उप 
दमि; शस्यवती विर -हिरण्यं रजतं तथा । | जाड भूमि, खोना, चाँदी, श्राम्‌ श्नौर बादनष्विः 


१ > „~~ 


याशक्या च दातव्यं छंवामादिषाहनम्‌ ॥२१।॥| यथाशक्ति देने चादि" ॥ २१॥ वाचने वलि .को, . 
चक तेषयित्वा ठु स्वस्तीति - सणुदीरयेद्‌ । करके व 9 वि | 
8 | ~ +" ४ सस्तु छ्य वचा ज! प्क प्रलक्र 
५ 9 च (प णोति हि ॥२२॥ ॥ २९ ॥ उसको कोई पुर्य नदीं होता श्रीर विद्धान्‌ 
सौ एुख्यमवाभोंति शाख्चौरः स्मृतो शुध; । . | उसको शाख का चोर कहते द । देसे मडप्य पर 
ग तस्य देवाः प्रीणन्ति पितरे तेव पुत्रकान्‌॥२२॥ अ पितर ध त दै ॥२३॥ 
क ध त । के दिये दुए-दान श्रौर राद्ध को पितर श्रहणं 
तं श्राद्धं न चेच्छन्ति स्नानतीथफलं न च । | नहीं करते, उस शाख के चोर को स्नान श्रौर 


(भते शाष्चौरोऽपो निन्दिता षेदपाड्दैः ॥२४॥ ६ का व नदीं मिलता नौर बेदपाटी उखः 
[दर्टेयस ९ ह 9 ९ 

1केर्डेयसमप्नौ त श्त्सवं कारयेदूधुधः। | की निन्दा करते है ॥ २8 ॥ साकरएडेयपुराण की 
नं पयस्िनीं चात्‌ सर््पपिुक्तभे ॥२५॥ क 6 ५ 
{सनानि च रत्नानि सपत्नीकद्विनातये 1 | लियि डुघारू गाय का दान करं ॥ २५॥ श्नीर खी 
†ण्डले कश्चकोष्णीषं श्यां सोपस्कररामपि ॥२६॥| सहित उस ब्राह्मण को चख, रत्न, छरडल, पगडी, 


पपानव करकं स्वं-परिकां सक्थान्यकम्‌ । | श्या तथ शनोढने बिचाने के वख ॥ २६॥ जूता, 
(तयपं भोजनाथ पूतपात्रसमंन्वितम्‌ ॥२७। = सोने की, ससथान्य, ओर भोजन के हिय 
(~, न घृत संयुक्त कंसे का पात दे ॥ २७॥ हे दिजभरष्ठ |] 
1 रते द्विजशरेष्ठ॒॒दृतकत्यो भवेन्नरः । पेसा करने पर मनुप्य कृतश्ृत्य दोजाता है । पकः 
श्वमेधसदस्तस्य राजसरुयशतस्य च ॥२८।॥| दकार द प्नौर सौ राजसूय यज्ञो व [रता 
भंव श्रः र $ फल उसको यह कथा च्छ ननेसे होता. 
अ यमभीतिः स्यच तस्य नरकाद्भयम्‌ ॥[२६॥| नदीं रहता ॥ २६ ॥ बह सब पापों ते भुक्त दोकर ` 
[व्वपापानिनिम्युक्तः कृतकृत्या भवेश्नरः । | कृतकृत्य होजादा है शरीर इसमे सन्देह नदीं कि 
षिच्छिन्नःसदा वंशो मिष्यति न संशयः ॥३०॥| उखका वंश सदैव चक्लता रहता है ॥ ३० ॥ वह; 
/.गचछेि्रहोकंच ब्हलोक सनातनम्‌ । , | मञ््लोक शीर सनातन बालो वलो 
तस्ततः पने स मिष्यति मानवः ॥२१।| पया के अच च से "दनय वरय य 
९६ ४ ॥ पुराण के श्रचणं करने से मचुष्य पर्प योग कोः 
£यरुभ्रवणादेव प्रं , येगमतव्राञ्ुयात्‌ । | पात ठोता है । चाचक को चािये कि नास्तिक, ` ` 
भ[स्तिकाय न दातव्यं षले बेदनिन्दुके ॥३२॥| नपुंसक ओर वेदनिन्द्क को यद कथा न नावे; 
षिदरेषके पैव तथा भरते च। | 1२२॥ गुरु के विरोधी, ्रत भङ्ग करने वाले, 
माटपरित्यागे  सुवर्णस्तयिने माला पिता ऋ छोड देने वाले ओर वयं की, , 
४ तथा ॥(९२॥ चोरी करने बले को ॥ ३६॥ तथा मयादा -के= .. 


क 


3 ५ ~~ =+ 


(3 | ॥ सदय ` 
अर १३७ राण ४३५ 


------~----------------~------------ 


० ६५०६ 


------------------------~ 
पिश्गमव्यादके . चेव तथैवङ्नातिद्षके | तोडने स | च श बते ्ो 
५ [त्यं ति! ~प ।।॥। इसे पुराण की कथा प्राणों के करट मे ्राजाने पर 
एतेष नैव । ध ० भी न सुने ॥ २७ ॥ जो.मसुष्य लोभ से, मोह से 
लोभाद्वा यदिव याद्यापि [वदरपतेः | श्रथवा भय से इस कथा को पदता यां पड़ता है 

दरा. एल्येद्वापि स ॒गच्े्नरकं शुषम्‌ २५॥| वद निश्चय दी नरक को जाता दै ॥ ३५॥ 
, “ ैमिनिश्वप्व' ` ' | जमिनिजी वोले-- ` ` 
भारते नाभवदुयन्मे सन्देहस्फोटनं द्विना हे पक्लियो ! मदामारत म हप सन्देह फो 


1 + 1 | जिख प्रकार श्रापने निवारण किया है .उस प्रकारः 
पद्धिः कृतं तरात्‌ किदन्यः ह दृसरा श्रौर कोई नदीं करेगा ॥३६॥ श्राप ` दी 
युयं दीषायुपः स्थोेनीरोगा दृत्तिसंयुत। | श्राय वाजे होकर नीयेग रहै , शौर उच्चं इत्ति 
्र्ययोगे तथा चास्तु ुद्धिरव्यमिचारि१२७॥ बले हो । व इ मे ध 
पिशापङृतादोषादौमपन + हे ॥२७॥ पिता के शाप-जन्यदोप से श्रापको' 
दशापटृतादोषादौम्मनस्यं व्ययते ६ | रासं ५ 
एतावदुक्त्वा वचनं घ जगाम स्वमाभ्रम॥२८॥ व न 
चिन्तयन्‌ परमोदारं पक्षिणां बाक्यमीरि! | . | करते य तथा उनकी पूजा करके , अपने, आम 


नैमिनिः सुमदाभागः पूजयिता द्विजोत्तम ९६।॥ को चले गये ॥६८॥ ३६॥ 
1 इति भरीमाकरुठेयाण मेँ १२७ अध्याय समाप । 


ॐ | छमम्भूयात 
| 
६